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10.7.13

मैं किनारा रात का

मैं किनारा रात का,
उस पार मेरे सुबह बैठी,
बीच बहते स्वप्न सारे, हैं अनूठे।

मैं उजाला प्रात का,
कल छोड़ कितने स्वप्न आया,
क्या बताऊँ, रात के हर अंश रूठे।

मैं उमड़ना वात का,
चल पड़ा था रिक्त भरने,
मैं बहा कुछ देर, पथ में पत्र टूटे।

लक्ष्य मैं आघात का,
जो उठे हर दृष्टि से नित,
ले हमारा नाम, घातक तीक्ष्ण छूटे।

मैं धुरा अनुपात का,
जो न पाता एक भी तृण,
न्याय करता, पा सके सम्मान झूठे।

मैं बिछड़ना साथ का,
जो रहे बनकर अतिथिवत,
भाव के उद्योग में निर्जीव ठूठे।

तत्व मैं हर बात का,
जो न बहरी किन्तु गहरी,
और जीवन का सुखद आधार लूटे।

30.3.13

मेरा परिचय

आज से पहले अपना इतना विस्तृत परिचय किसी को नहीं दिया है। रश्मि प्रभाजी का आदेश आया तो सोच में पड़ गया, उन्हें कुछ कविताओं के साथ मेरा परिचय व चित्र चाहिये था। किसी भी लेखक को लग सकता है कि उनका लेखन ही उनकी अभिव्यक्ति है, वही उनका परिचय है। सच है भी क्योंकि लेखन में उतरी विचार प्रक्रिया व्यक्तित्व का ही तो अनुनाद होती है। जो शब्दों में बहता है वह लेखक के व्यक्तित्व से ही तो पिघल कर निकलता है। यद्यपि मैं लेखक होने का दम्भ नहीं भर सकता, पर प्रयास तो यही करता रहता हूँ कि जो कहूँ वह तथ्य से अधिक व्यक्तित्व का प्रक्षेपण हो। यदि व्यक्तित्व पूरा न उभरे तो कम से कम उसका आभास या सारांश तो बता सके।

फिर लगा कि लेखन के अतिरिक्त कुछ और भी तथ्य हैं जो परिचय के आधारभूत स्तम्भ होते हैं। महादेवी वर्मा का परिचय माने तो हृदय विदीर्ण करने वाली पंक्तियाँ याद आ जाती हैं, मैं नीर भरी दुख की बदली, परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी, मिट आज चली। मिटना हम सबको है, परिचय संक्षिप्त दें तो बहुत कुछ इसी तरह का भाव निकलेगा, कुछ के लिये भले दुख इतना संघनित न हो। फिर भी वर्षों के विस्तृत समय काल में कुछ ऐसी बातें निकल आती हैं जिन्हें आप महत्वपूर्ण मानते हैं और उनका आधार बनाकर अपने परिचय का संसार गढ़ना चाहते हैं। इसी को मानक मान कर जितना संभव हो सका, स्वयं को स्वरचित शब्दों के दर्पण में देखने का प्रयास करता हूँ।

जब परिचय लिखने का सोचता हूँ तो सोच में पड़ जाता हूँ कि क्या लिखूँ और क्या छोड़ दूँ। एक अजब सी दुविधा आ जाती है। न जाने कितनी उपाधियाँ जुड़ी हैं, इस शरीर के साथ, कुछ जन्म से, कुछ परिवेश से, कुछ क्षेत्र से, कुछ परिवार से, कुछ धर्म से। थोड़ा और बढ़े तो संस्कृति की छाँह मिली, संस्कारों की श्रंखला मिली, परिचय में मढ़ता गया, जीवन में तनिक और गढ़ता गया। युवावस्था में लगा कि आगत परिचय अनिश्चितता से परिभाषित है, न जाने कितनी उमंगें थीं, न जाने कितनी ऊर्जा थी, क्या न कर जायें, क्या न बन जायें? शिक्षा पूरी हुयी, नौकरी और फिर विवाह। परिवार बढ़ा, अनुभव के नये पक्ष उद्घाटित हुये, स्थिरता आयी और धीरे धीरे परिचय का विस्तार ठहर गया। जहाँ हर वर्ष परिचय बदलता था, हर वर्ष उपाधि मिलती थी, अब वर्ष क्रियाहीन निकलने लगे। प्रौढ़ता की स्थिरता परिचय की स्थिरता बन गयी, अब कुछ ठहरा ठहरा सा लगता है।

इसी प्रकार न जाने कितनी घटनायें जुड़ी हैं, न जाने कितने और व्यक्तित्व जुड़े हैं, जिन्होनें जीवन पर स्पष्ट प्रभाव छोड़ा है। किसको याद रखूँ, किसको गौड़ मानू, समझ नहीं आता। किसको परिचय का अंग बनाऊँ, किसे छोड़ दूँ, समझ नहीं आता। द्वन्द्व भरा व्यक्तित्व है, मन में दो विरोधी विचार साथ साथ सहज भाव से रह लेते हैं, किसको अपना मानकर कह दूँ और किससे नाता तोड़ दूँ? या दोनों बताने का साहस हो तो कौन सा पक्ष पहले बताऊँ? इसी पशोपेश में कुछ न बताऊँ तो भी न चल पायेगा। कुछ सामाजिक तथ्य बता देता हूँ, मन खोलने बैठूँगा तो यात्रा अन्तहीन हो जायेगी।

जन्म सन १९७२ हमीरपुर उप्र में, पिछड़ा क्षेत्र, पर परिवार में शिक्षा के महत्व पर किसी को संदेह नहीं रहा। अच्छे विद्यालय के आभाव में कक्षा ६ से कानपुर आकर छात्रावास में रह कर पढ़ाई की। छात्रावास ने स्वतन्त्र चिन्तन और निर्भयता का अमूल्य उपहार दिया। आईआईटी कानपुर से १९९३ में बी टेक, मैकेनिकल इन्जीनियरिंग से। साल भर की नौकरी, तत्पश्चात १९९६ में आईआईटी कानपुर से ही एम टेक। १९९६ में सिविल सेवा में चयन, रेलवे की यातायात सेवा में। पिछले १७ वर्षों की आनन्दभरी यात्रा में पूरा देशभ्रमण हो चुका है, बस पश्चिमी भारत छूटा है। रेलवे की कार्यप्रणाली ने लगन और सक्षमता के न जाने कितने ही अध्याय सिखाये हैं, अभिभूत हूँ।

१९८५ में पहली कविता, एक वर्ष बाद ही पहला नाटक जो कि व्यवस्था के विरुद्ध होने के कारण चोरी चला गया, सृजन का यूँ चोरी हो जाना अभी भी मन में दुखद स्मृति के रूप में विद्यमान है। उसके पश्चात सृजन मन्थर, निरुत्साहित और मदमय रहा। रेल यात्रा और रेल सेवा, व्यक्तित्वों व समाज के अनगिन अध्यायों से परिचय करा गयी। उन अनुभवों को पुनः खो देने का भय मन मे सदा ही गहराता रहा, एक गहरी सी ललक सदा ही बनी रही, उन्हें लिपिबद्ध कर देने की। विद्यालय से विरासत में प्राप्त हिन्दी प्रेम और निपुणता, पुस्तकों से आत्मीयता और अनुभवों की लम्बी डोर, सबने बहुत उकसाया, लिखने के लिये। ब्लॉग के रूप में एक माध्यम मिला और जिसने पुनः प्रेरित किया, स्थिर किया और अब लगभग चपेट में ले लिया है, निकलना असम्भव है। लिखता गया, दृष्टि और गहराती गयी, निकलना चाहूँ भी, तो मेरे ब्लॉग का शीर्षक ही मुझे रोक लेता है।

तकनीक से अगाध व अबाध प्रेम है, उसे सामाजिक निर्वाण का साधन मानता हूँ मैं। पर मेरी तकनीक जटिल दिशा में कभी नहीं जा पाती है। जब भी मेरी तकनीक की दिशा भटक जाती है, मैं उसे वहीं छोड़कर स्वयं में सिमट जाता हूँ, नयी दिशा खोजता हूँ। मेरी तकनीक पुराने सन्तों के अपरिग्रह के मार्ग से अनुप्राणित है, जो भी आवश्यकता से अधिक है, वह भार है, उसे हम व्यर्थ ही ढो रहे हैं, वह त्याज्य है। संग्रहण न्यून हो पर सर्वश्रेष्ठ हो, उसे पाने में सतत प्रयासरत। प्रयोगधर्मिता के प्रति यही ललक मन में बालमना ऊर्जा बनाये रखती है।

जहाँ जीवन का अग्रछोर तकनीक ने सम्हाला है, वहीं पार्श्व में वह संस्कृति के सिद्धान्तों के सशक्त स्तम्भों पर टिकी है। मुझे अपने प्रश्नों के उत्तर बड़े स्पष्ट दिखते हैं यहाँ। उस पर अपार श्रद्धा जीवन का सर्वाधिक प्रवाहमय स्रोत है मेरे लिये, ऊर्जा का, सृजनता का, दर्शन का। जब भी मन भरमाता है, वहीं से सहारा आता है। प्राचीन और नवीन के बीच यह साम्य सदा ही बना रहेगा, परिचय का सुदृढ़ अंग बना रहेगा।

परिवार केन्द्रित सामाजिक जीवन भाता है और कार्यालय के बाद का पूरा समय घर पर ही देता हूँ। बच्चों के साथ बतियाने का आनन्द रूखी पार्टियों से कहीं अधिक है मेरे लिये। उन्हें आजकल सिखा कम रहा हूँ, उनके द्वारा सिखाया अधिक जा रहा हूँ। वात्सल्य का यह निर्झर भला कौन छोड़कर जा सकता है। यदा कदा खेलकूद और संगीत पर भी अभिरुचि बनी रहती है, आलस्य गति कम करता है पर जब भी अवसर मिलता है, शरीर और मन ऊर्जान्वित बनाये रखता हूँ।

पता नहीं, परिचय के जिन पक्षों पर केन्द्रित करना था, वे कहीं अनुत्तरित तो नहीं रह गये हैं? आत्ममुग्धता और आत्मप्रशंसा के आक्षेप का कड़वा घूँट पीकर ही आत्मपरिचय लिखने बैठा हूँ। मन की कह देने से न केवल मन हल्का हो जाता है वरन निश्चय कुछ और गहरा जाते हैं, परिचय स्वयं से भी हो जाता है।

12.9.12

ध्यान से देखो, थोड़ा और ध्यान से

दर्पण देखता गया, पंथ खुलता गया। चेहरे पर दिखता, त्वचा का ढीला पड़ता कसाव, जो यह बताने लगा है कि समय भागा जा रहा है। शरीर की घड़ी गोल गोल न घूमकर सिकुड़ सिकुड़ सरकती है, शक्ति और सौन्दर्य के प्रतिमानों को धूमिल करती हुयी सरकती है, समय अपना प्रभाव धीरे धीरे व्यक्त करता है। शरीर सरलता की ओर सरकता है, निर्जीव पड़े केश-गुच्छ कम हो जाते हैं, श्वेतरंगी हो जाते हैं, बाहों और वक्ष के माँसल अवयव सपाट और कोमल होने लगते हैं, चेहरे पर पल पल बदलते भाव एकमना हो जाते हैं, जीवन प्रतीक्षारत सा दिखने लगता है। अन्त दिखते ही जीवन ठिठक जाता है, संशय अपना लेता है, गतिहीन होने लगता है, धीरे धीरे।

थोड़ा और ध्यान से दर्पण देखता हूँ। मन यह विश्वास दिलाना चाहता है कि तुम अब भी वही हो, दर्पण के असत्य को स्वीकार मत करो, तनिक और ध्यान से देखो, कुछ भी तो नहीं बदला है। मन की बात का विश्वास होता ही नहीं है, सच भी हो तब भी नहीं, इतने छल सहने के बाद भला कौन विश्वास करेगा मन का। आज दर्पण को देख रहा हूँ तो मन की मानने का मन नहीं कर रहा है। मन समझ जाता है कि दर्पण सत्य बता रहा है, मन की माया रण हार रही है। मन आँख बन्द कर सोचने को कहता है, क्षय का पीड़ामयी आक्रोश तो वैसे भी नहीं सम्हाला जा रहा था आँखों से, आँखें बन्द हो जाती हैं।

आँख बन्द कर जब शरीर का भाव खोता है तो लगता है कि हम अभी भी वही हैं जो कुछ वर्ष पहले थे, कुछ दिन पहले भी स्वयं के बारे में जो अनुभूति थी, वह अभी भी विद्यमान है, कुछ भी नहीं बदला है, सब कुछ वही है। बन्द आँखों में एक भाव, खुली में दूसरे। मन की माया सच है या कि दर्पण का दर्शन। कठिन प्रश्न है, काश अपना चेहरा न दिखता, काश दर्पण ही न होता।

चिन्तन की लहरें उछाल ले रही हों तो किसी और कार्य में मन भी तो नहीं लगता है। सामने दर्पण है, मन के भाव अस्त-व्यस्त कपड़ों से फैले हुये हैं, न समेटने की इच्छा होती है, न ही दृष्टि हटाने का साहस। स्मृतियों का एक एक कपड़ा निहारने लगता हूँ, लगा कि सबको एक बार ढंग से देख लूँगा तो मन शान्त हो जायेगा। जीवन बचपन से लेकर अब तक घूम जाता है, संक्षिप्त सा।

बचपन की प्रथम स्मृति से लेकर अब तक के न जाने कितने रूप सामने दिखने लगते हैं, सब के सब स्पष्ट से सामने आ जाते हैं, मानो वे भी सजे धजे से राह देख रहे थे, स्मृतियों की बारात में जाने के लिये। बचपन की अथाह ऊर्जा, निश्छल उच्श्रंखलता और अपरिमित प्रवाह अब भी अभिभूत करता है। फिर न जाने क्या ग्रहण लग गया उसे, उस पर सबकी आशाओं और आकांक्षाओं की धूल चढ़ने लगी, दायित्वों और कर्तव्यों के न जाने कितने गहरे दलदल में फँसा हुआ है अभी तक। हर दिन कुछ न कुछ बदलता गया, धीरे धीरे। जब इतना कुछ बदल गया तो क्यों मन यह दम्भ पाले है कि कुछ नहीं बदला है? आँख खुली रहने पर दर्पण मन को झुठलाता है, आँख बन्द करने पर भी मन की नहीं चलती, स्मृतियाँ मन को झुठलाने लगती हैं।

आँखे फिर खुल जाती हैं, दर्पण आपके सामने आपका चेहरा फिर प्रस्तुत कर देता है। निष्कर्ष अब भी दूर हैं, साम्य नहीं है, अन्दर और बाहर। क्यों, कारण ज्ञात नहीं, पर दर्पण से कभी इतना गहरा संवाद हुआ ही नहीं। जब भी चिन्तन हुआ, मन उस पर हावी रहा, सारी परिभाषायें, सारे परिचय, सारे अवलोकन, सारे निर्णय मन के ही रास्ते होकर आये। दर्पण के रूप में आज कोई मिला है जो मन को ललकार रहा है।

मन हारता है तो आपको भरमाने लगता है। दर्पण आज मन का एकाधिकार ध्वस्त करने खड़ा है, वह बताना चाह रहा है कि आप बदल चुके हैं, सब बदल चुके हैं, मन है कि यह मानने को तैयार ही नहीं, किसी भी रूप में नहीं। यह उहापोह वातावरण गरमा देती है, वहाँ से हटना असंभव सा हो जाता है। मैं दर्पण फिर देखता हूँ, कभी मुझे एक पुरुष दिखता है, कभी एक भारतीय, कभी एक हिन्दू, कभी एक हिन्दीभाषी, कभी एक लेखक, और अन्दर झाँकता हूँ तो कुछ और नहीं दिखता है, सब की सब उपाधियाँ अलग अलग झलकती हैं। पलक झपकती है, तो कभी एक पुत्र, कभी एक भाई, कभी एक पति, कभी एक पिता, संबंधों के जाल दर्पण पुनः धुँधला देते हैं। आँख फाड़ कर और ध्यान से देखता हूँ, तो परिचितों की आकाक्षाओं से निर्मित भविष्य के व्यक्तित्व दिखने लगते हैं। लोगों की आशाओं पर खरा न उतर पाने का भाव भला दर्पण को कैसे ज्ञात हुआ? नहीं, नहीं, चेहरा ही नहीं छिपा पा रहा है, यह भाव।

मन झूठा सिद्ध हो चला था, वह यह समझा ही नहीं पा रहा था कि मैं अब भी वही हूँ, जो पिछले ४० वर्षों से उसके निर्देशों पर नृत्य किये जा रहा हूँ। आज दर्पण ने मुझे मेरे इतने रूप दिखा दिये थे कि किसी पर कोई विश्वास ही नहीं रहा, व्यक्तित्व बादलों सा हो गया, हर समय अपना आकार बदलने लगा। कुछ भी पहचाना सा नहीं लगता है, कोई ऐसी डोर नहीं दिखती है जो मुझे मुझसे मिला दे।

स्वयं के खो जाने की पीड़ा अथाह है, एक गहरी सी लहराती हुयी रेख उभर आती है पीड़ा की, विश्वास हो उठता दर्पण पर, विश्वास हो आता है अपने खोने का। मन थक हार कर शान्त बैठ जाता है, एक निर्धन और गृहहीन सा।

आँखे धीरे धीरे फिर खुलती हैं, दर्पण अब भी सामने है, कुछ धँुधला सा दिखता है, आँखों का खारापन पोंछता हूँ। चेहरा पूर्ण संयत हो चला है, सारी उपाधियाँ चेहरे से विदा ले चुकी हैं, चेहरे के कोई भाव नहीं दिखते हैं, बस दिखती हैं तो आँखें। अहा, कोई जाना पहचाना सा दिखता है, अपनी आँखों में अपनी पहचान दिखने लगती है, वह आँखे जिससे अभी तक सारी दुनिया मापते आयें हैं। आँखों में और गहरे देखता हूँ, उसमें बिखरे हुये सारे व्यक्तित्वों का केन्द्र दिखने लगता है। कुछ और देर देखता रहता हूँ, सब कुछ सिमटने लगता है, सब कुछ व्यवस्थित होने लगता है। मन सहसा ऊर्जा पा जाता है, उसे स्वयं को सत्य सिद्ध करने का अवसर मिल जाता है, मन इस बार धैर्य नहीं खोता है, बस यही कहता है…

ध्यान से देखो, थोड़ा और ध्यान से...

21.7.12

उर्वशी, एक परिचय

जो भी कारण रहा हो पर जिसे भी उर्वशी की कथा सुनायी, उसके लिये वह नयी थी। पुस्तक पढ़ने के बाद, पात्रों को समझने के बाद, कथा कहना और भी सरल हो जाता है, और भी रुचिकर हो जाता है। लगता है मानो सबकुछ आपके सामने ही घटा है, मानो पात्रों ने अपने मन के उद्गार एकान्त में आपसे कहे हों। कालिदास कृत विक्रमोर्वशीयम् भी एक नाटक के रूप में लिखी गयी है, दिनकर कृत उर्वशी भी उसी शैली में निरूपित है, पात्रों को अपनी बात कहने में कठिनता नहीं होती, हर बार संदर्भ और सूत्रधार की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

मानकर चल रहा हूँ कि आप में अधिकांश को यह कथा ज्ञात होगी, फिर भी उसे एक बार और कह देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। पात्रों का परिचय और उनकी चरित्रगत विशेषता का पूर्वज्ञान पाठकों को लेखक के साथ कदमताल का आनन्द देती है और बहुधा लेखक जो कहने वाला होता है, वह बात पाठक के मन में पहले ही घुमड़ आती है। संभवतः इसे ही पढ़ने का रस कहा जाता है, तब लगता है कि लेखक से आमने सामने बैठकर बातें की जा रही हैं। पात्र भी साथ में बैठे हैं, चर्चा जब भटकती है तब वे उसे सुधार देते हैं, नहीं तो सहमति में सर हिला देते हैं।

यदि विषयवस्तु को केन्द्र में रखें तो नारी पात्रों को चार स्तरों पर रखा जा सकता है। ये सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके आपसी संवादों के माध्यम से ही दिनकर ने प्रेम के रहस्यों की पर्तों को धीरे धीरे खोला है। एक छोर में अप्सरायें हैं, जो स्वतन्त्र हैं, स्वच्छन्द हैं, उत्श्रंखल हैं, भोग और आनन्द में आकण्ठ डूबी। उन्हें न भविष्य की चिन्ता है, न भूतकाल का दुख, वे वर्तमान के स्वर्ग में जीती हैं। सौन्दर्य की स्वामिनी इन्द्रलोक में रहती हैं, सुविधाओं के ऐश्वर्य में। चिरयौवना हैं और उसके प्रति सजग भी, किसी की माँ बनकर वे अपना यौवन क्षणभर के लिये भी नहीं खोना चाहती हैं। देवता उनके प्रशंसक हैं और प्रेमी भी, कोई एक नहीं सब, किसी एक के लिये नहीं, सबके लिये। नृत्य, संगीत, गीत, कला आदि में संतृप्त निमग्न आनन्दविलास की प्रतिमूर्ति हैं अप्सरायें। देव, मनुज, दानव, सब के सब लालायित रहते हैं, उनका सानिध्य पाने के लिये, उनका होना उत्सवीय होता है, उनका न होना प्रतीक्षापूर्ण। कोई तापस अपनी तपस्या से इन्द्र के आसन पर अधिकार न कर बैठे, उस हेतु सदा ही अप्सराओं को भेजा जाता रहा है, उनकी तपस्या भंग करने।

कथा के दूसरे छोर पर हैं, सुकन्या, महर्षि च्यवन की सहधर्मिणी। कहते हैं, जब महर्षि च्यवन तपस्यारत थे, चंचल सुकन्या ने कौतूहलवश तपस्वी की पलक खींच दी थी। तपस्या टूटती है, सुकन्या को लगता है कि महर्षि उसे भस्म कर देंगे। पता नहीं विधि ने क्या नियत किया था कि महर्षि की आँखों में कोप के अंगार के स्थान पर प्रेम की लालिमा उभर आयी, रूपमयी सुकन्या का सात्विक सौन्दर्य उन्हें बहा ले गया। उन्होंने रुपमयी सुकन्या से विवाह का प्रस्ताव रखा। वृद्ध महर्षि ने विवाह हेतु तपस्या से ही पुनः यौवन ग्रहण करने का विश्वास दिलाया। उनके पास अर्पित करने के लिये केवल तापस का तप था, उन्होने अपने प्रेम से अरण्य में स्वर्ग उतारने का वचन दिया। बस यही कहा कि 'हरि प्रसन्न यदि नहीं, सिद्धि बनकर तुम क्यों आयी हो'। सुकन्या, जिससे विवाह के लिये न जाने कितने युवराज आतुर थे, महर्षि के एकांगी समर्पण में सहर्ष सिमट गयी और अरण्य में महर्षि च्वयन की पत्नी बन गुरुकुल में व्यस्त हो गयी।

इन दोनों छोरों के बीच में हैं दो और पात्र, औशीनरी और उर्वशी। औशीनरी पुरुरवा की धर्मपत्नी है, राज्य चलाने में सहयोगिनी है, पर दुर्भाग्यवश निःसन्तान है। वह मानवी है अतः प्रेम उसके लिये समर्पण भी है और अधिकार भी। पुरुरवा का उर्वशी के प्रति आकृष्ट होना उसे सालता है, पर पुरुरवा के मन में उसके लिये सम्मान कम नहीं होता है, सारे राजकीय व धार्मिक अवसरों पर औशीनरी ही पुरुरवा के वामांग में विराजती है। पुरुरवा को सन्तान की उत्कट चाह थी, वंश बढ़ाने का भार था, उस पृष्ठभूमि में पुरुरवा और उर्वशी की प्रेमकथा सहती है औशीनरी। कहानी के अन्त में पुरुरवा और उर्वशी के पुत्र आयु की राजमाता बन, औशीनरी उस पर वर्षों का संचित वात्सल्य उड़ेलने से भी नहीं पीछे रहती है।

कथा के केन्द्र में है उर्वशी, उसकी गति के माध्यम से कथा में संक्रमण होता है, अप्सरा, मानवी और तापसी के चरित्रों के बीच। उर्वशी अप्सरा है, इन्द्रलोक का प्रमुखतम आकर्षण, सब देव उसके लिये कुछ भी कर देने को लालायित रहते थे। एक अप्सरा जिसका मन स्वर्गलोक के आनन्द विलास की एकरूपता से उकता जाता है। उसे प्रेम की वह अवस्था चाहिये जिसमें अग्नि की धधक हो, जिसमें आकर्ष की तपन हो, जिसमें स्नेहिल अनुराग हो। देवप्रेम का कृत्रिम स्वरूप उसके लिये असहनीय सा था, उसे मानवीय प्रेम की प्राकृतिक रूक्षता रुचिकर लगती थी। उसे मृत्युलोक अच्छा लगता था। इस बीज का क्या वृक्ष पनपता है, इसकी कहानी है उर्वशी।

पुरुरवा ही प्रमुख नर पात्र की ध्वजा वहन करते हैं, उन्हीं के माध्यम से नर के भीतर की विभिन्न मनोदशाओं का चित्रण किया गया है। वह एक प्रतापी राजा हैं, देवों को बहुधा सहायता देते रहते हैं, दानवों के विरुद्ध। पुरुरवा के मन में देवलोक के प्रति अप्रतिम आकर्षण है, उन्हें यह तथ्य कचोटता भी है कि श्रेष्ठ होने पर भी उनके पास वह सब क्यों नहीं है? एक अतृप्त तृषा सदा ही उनके पीछे भागती है, एक अधूरेपन के भाव का लहराना उन्हें खटकता है।

यही पाँच पात्र उर्वशी की कथाभूमि का निर्माण करते हैं, उनकी चरित्रगत विशेषता कथा के अन्दर प्रेम के इतने रंग भर लाती है जो विषय समझने में बड़े आवश्यक होते हैं। आज भी ध्यान से देखेंगे तो यही पात्र हमारे चारों ओर खड़े दिखायी पड़ेंगे। हमारा प्रेम भले ही किसी एक पात्र से स्वयं को न जोड़ पाये, पर वह निश्चय ही इन्हीं के बीच कहीं अवस्थित रहता है।

सृष्टि के चलने में प्रेम धुरा सा कार्य करता है, धुरा जो स्वयं तो स्थिर रहता है पर किनारों को चलाता रहता है। प्रेम के प्रवाह में अस्थिर हम सब उस मर्म को समझना चाहते हैं जिसमें हमें तृप्ति का आनन्द मिले। उर्वशी का पढ़ना संभवतः उन सिद्धान्तों को समझने की राह बने, जिस पर हमारी चाह चलना चाहती हो।