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24.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - तकनीकी पक्ष

जीवन में लैपटॉप की आवश्यकता सबसे पहले तब लगी थी, जब कार्यालय और घर के डेस्कटॉपों पर पेनड्राइव के माध्यम से डाटा स्थानान्तरित करते करते पक गया था। लैपटॉप आने से दोनों डेस्कटॉप मेरे लिये अतिरिक्त हो गये। लैपटॉप की और छोटे होने की चाह बनती ही रही, कारण रहा, उस १५.६ इंच के लैपटॉप को ट्रेन यात्रा और कार यात्रा के समय अधिकतम उपयोग न कर पाने की विवशता। १२ सेल की बैटरी के साथ लगभग ४ किलो का उपकरण सहजता से यात्रा में उपयोगी नहीं हो सकता था। बैठकों में भी १५.६ इंच का लैपटॉप अपने सामने रखना अटपटा सा लगता था, लगता था कि कोई और व्यक्ति सामने आकर बैठ गया हो। अन्ततः वह लैपटॉप दो डेस्कटॉपों के स्थानापन्न के रूप में बना रहा।

मेरी यह चाह संभवतः तकनीक की भी राह रही, बहुतों को यही समस्या रही होगी, बहुत लोग लैपटॉप का उपयोग और अधिक स्थानों पर करना चाहते होंगे। १० इंच की छोटी स्क्रीन की ढेरों नेटबुक बाजार में आयीं, पर बाधित और सीमित क्षमता के कारण अपना समुचित स्थान नहीं बना पायीं। लैपटॉप की क्षमता एक मानक बन चुकी थी और कोई उससे कम पर सहमत भी नहीं था। १३ इंच के कई लैपट़ॉप बड़ी संभावना लेकर आये, पर उसमें भी भार अधिक कम नहीं हुआ, हाँ छोटी स्क्रीन पर अधिक न समेट पाने के कारण कार्य करने पर आँखों को बड़ा कष्ट सा होता रहा। जूम करना, विण्डो बदलना आदि ढेर सारे कार्य करने के लिये माउस से हैण्डल ढूढ़ना बड़ा कष्टकर कार्य हो जाता था।

तकनीक अपने रास्ते ढूढ़ ही लेती है। हार्डड्राइव, बैटरी, चिप, स्क्रीन आदि क्षेत्रों में गजब का विकास हुआ और जो उत्पाद सामने आया, उनका नामकरण अल्ट्राबुक्स हुआ। मैकबुक एयर की डिजायन एक मानक बन गयी, जिस पर अन्य मॉडल आधारित होने लगे। ११.६ और १३ इंच की स्क्रीन, वजन १.० और १.३ किलो। इससे हल्के लैपटॉप पहले कभी नहीं बने थे। उन्हे तो चलते चलते भी उपयोग में लाया जा सकता है, एक हाथ से उठा कर दूसरे हाथ से टाइप किया जा सकता है।

लैपटॉप में टचपैड ने माउस का प्रयोग लगभग समाप्त ही कर दिया था, पर उपयोग की दृष्टि से टचपैड का स्क्रीन पर पूर्ण नियन्त्रण उसके बड़े होने और बहुआयामी कार्य करने से आया। पिंच जूम, सरकाना, पलटना, पिछले पृष्ठ पर जाना, नयी विण्डो खोलना आदि टचपैड से होने लगा, स्क्रीन का सारा नियन्त्रण विधिवत रूप से ऊँगलियों से ही होने लगा। इसका सीधा प्रभाव यह पड़ा कि ११.६ इंच की छोटी स्क्रीन भी गतिशील और बड़ी लगने लगी।

स्क्रीन को छोटा और भार को कम करने में भौतिक कीबोर्ड एक बाधा था, जगह घेरता था और भारी होता था। उन्हे हटा कर स्क्रीन में ही छूकर कार्य करने की तकनीक ने टैबलेट को जन्म दिया। १० इंच का टैबलेट पर्याप्त लगा, सारे कार्य निपटाने में। इस प्रयास में भार और आकार तो कम हो गया पर दो विकार अनचाहे ही आ गये। एक तो ओएस अपनी पूर्ण क्षमता से रहित हो गया और दूसरा स्क्रीन का आकार कीपैड के कारण और सीमित हो गया। १० इंच का टैबलेट ६०० ग्राम के आसपास सिमट आया, कहीं भी ले जाने के लिये सुविधाजनक।

श्रीमतीजी के आईपैड में कई बार प्रयास किया कि कम से कम एक पोस्ट के बराबर लेखन करें। कीपैड के माध्यम से टाइप करने से न तो वह गति आयी और न ही वह सहजता जो मेकबुक एयर के चिकलेट कीबोर्ड से मिलती है। संभवतः ऊँगलियाँ इस तरह टाइप करने की अभ्यस्त ही नहीं हैं। एक अलग भौतिक कीबोर्ड लेने से और टैबलेट की स्क्रीन को बचाने का कवर लेने से, टैबलेट का भार और आकार लगभग मैकबुक एयर के बराबर ही हो जाता है, सम्हालने में मैकबुक एयर से कहीं अधिक कठिनाई के साथ। मैकबुक एयर बन्द करते ही पूरी तरह सुरक्षित हो जाती है।

यही कारण रहे कि हमने मैकबुक एयर को आईपैड के ऊपर चुना, पूरी क्षमता और सबसे हल्का। चर्चा में है कि बाजार में विण्डोज ८ पर आधारित टैबलेट आने वाला है, उसमें लैपटॉप की क्षमता रहेगी। ऐसे टैबलेट का भार और आकार निश्चय ही उत्सुकता का विषय रहेगा। बहुत लोग जो अधिक लेखन आदि नहीं करते हैं, उनके लिये हल्के टैबलेट बड़े लाभदायक हो सकते हैं, पर मेरे लिये लैपटॉप से अधिक उपयोगी कुछ भी नहीं है। मैकबुक एयर के रूप में सर्वश्रेष्ठ लैपटॉप का अनुभव अत्यन्त संतुष्टिपूर्ण रहा है। श्रीमतीजी अपने आईपैड से अत्यन्त प्रसन्न हैं, उनकी आवश्यकता के लिये टैबलेट ही सर्वोत्तम है।

यदि टैबलेट के विषय में कोई एक पक्ष है जो सर्वाधिक सशक्त लगता है, तो वह है इसकी बैटरी। लगभग दुगना समय टैबलेट चलता है। अधिक क्षमता के यन्त्र अधिक ऊर्जा लेते हैं, यही कारण है कि हमें अधिक ऊर्जा खपानी पड़ती है। लैपटॉप आधारित उपकरणों पर जीवन बीतने से टैबलेट थोड़ा सकुचाया सा दिखता है, पर कुछ एक कार्यों को छोड़ दें तो टैबलेट लैपटॉप के सारे कार्य कर सकता है। घर में यदि एक लैपटॉप है तो अन्य लोग टैबलेट से काम चला सकते हैं। टैबलेट लैपटॉप की तुलना में अधिक सस्ता भी होता है। यदि एक घर के सारे उपकरणों को एक पारितन्त्र के रूप में कार्य करते हुये समझें तो, एक लैपटॉप का पहले से होना टैबलेट के लिये मार्ग प्रशस्त करता है।

मोबाइल के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो अधिक शक्तिशाली मोबाइल टैबलेट के ढेरों कार्य कर सकता है, पर आकार छोटा होने के कारण वही कार्य करने में उतनी सहजता नहीं आ पाती है। कार में जाते समय या रसहीन बैठकों में बैठे हुये मोबाइल से न जाने कितने कार्य हो जाते हैं। यह मानकर चलता हूँ कि कोई याद आयी पंक्ति या विचार छूट न जाये और एक भी पल व्यर्थ न जाये, मोबाइल इन दोनों स्थितियों में उत्पादकता बनाये रखता है। आईक्लाउड के माध्यम से प्रयासों में सततता भी बनी रहती है।

अनुभव और तकनीक के आधार पर मैकबुक एयर और आईफोन की जोड़ी मेरे लिये पर्याप्त है और उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही है। अब इन दो उपकरणों के आधार पर कार्यशैली और जीवनशैली किस प्रकार विकसित हो रही, यह अगली पोस्ट का विषय रहेगा। 

20.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - अनुभव पक्ष

पता नहीं जो लोग ढेरों पैसा कमा लेते होंगे, वे अपनी वसीयत कैसे लिखते होंगे, बड़ा ही कठिन कार्य है यह, पहले संग्रहण करो फिर बाँट दो। हम तो एक एक संग्रह में पसीना बहा देते हैं, खरीदने के पहले ही उसके निस्तारण का निर्णय लेना पड़ता है। ऐसा ही कुछ हमारे घर में भी हुआ, बड़ी रोचकता से भरा, संभवतः सबके साथ कुछ ऐसा ही होता होगा।

हम मैकबुक एयर और आईफोन खरीद चुके थे और अपने घर में ही विकसित देशों के नागरिक की तरह रह रहे थे। घर के शेष तीन लोग पुराने उपकरणों के साथ थे और स्वयं को विकासशील देश के नागरिक की तरह समझ रहे थे। वितरण इस प्रकार था, डेस्कटॉप व पुराना आईपॉड बच्चों के हिस्से में, हमारे द्वारा मुक्त किया गया तोशीबा का लैपटॉप व ब्लैकबेरी का मोबाइल श्रीमतीजी के हिस्से में और एप्पल के दो नवीनतम उत्पाद हमारे हिस्से में। वितरण आवश्यक था, नहीं तो सबको एक साथ ही एक उपकरण में कार्य करने की सूझती है।

लगा था कि वितरण बड़े ही न्यायप्रिय दृष्टि से हुआ है, न केवल शान्ति बनी रहेगी वरन प्रसन्नता भी बिखरेगी। ऐसा नहीं हुआ, हमारे घर में ही हमारे विरुद्ध विरोध के स्वर उठने लगे। अपने लिये तो इतना अच्छा ले लिया, हम लोगों के लिये पुराना, यह डेस्कटॉप कितनी आवाज करता है, हमारा सिस्टम कितने धीरे चलता है, आप तो घर में कभी भी बैठ कर काम कर लेते हैं, आदि आदि। हमें लगने लगा कि एक स्थिति बन रही है जिसमें घर का मुखिया अपने लिये सारी सुविधायें रख कर औरों को उनसे वंचित रखता है। हमारा ग्लानि भाव धीरे धीरे बढ़ने लगा, उससे बाहर निकलना आवश्यक था।

विकल्प अधिक नहीं थे। निर्णय लिये जाने आवश्यक थे, पर इस बार ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था, जिससे असंतुष्टि बनी रहे, निर्णय में सबको सहभागी बनाना आवश्यक था। बहुत सोच विचार कर एक प्रस्ताव हमने परिवार-परिषद में रखा। बहुत कम होता है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सब प्रसन्न रहें, किसी एक का हित साधा जाता है तो दूसरा रूठ जाता है। बहुत कम ही ऐसे समाधान होते हैं, जो सबको अपना सा लगे। सीमित संसाधन होते हैं और सबको बांटे भी नहीं जा सकते हैं।

निश्चय किया गया कि एक आईपैड ले लेते हैं और डेस्कटॉप को विदा कर देते हैं। डेस्कटॉप बहुत ऊर्जा खा रहा था, तुलना की जाये तो उसी कार्य के लिये लगभग २० गुना। हम मैकबुक एयर और आईफोन रखे रहेंगे, श्रीमतीजी को आईपैड और ब्लैकबेरी और बच्चों को तोशीबा का लैपटॉप व आईपॉड। यही नहीं, इस बात का भी निर्णय लिया गया कि चार वर्ष बाद जब हमारा मैकबुक एयर और आईफोन पृथु को मिलेंगे, श्रीमतीजी के उपकरण देवला को मिलेंगे, हम लोग तब तकनीक के नये प्रयोग पुनः प्रारम्भ करने के लिये स्वच्छन्द रहेंगे। अगले चार वर्षों में तोशीबा का लैपटॉप ९ वर्ष का जीवन जी लेगा और आईपॉड भी लगभग ७ वर्ष की उपयोगिता निभा जायेगा, उसके बाद दोनों सेवानिवृत्त हो जायेंगे। उत्तराधिकार नियत करने से बच्चों को हमारे उपकरणों से लगाव हो चला है, विरोध के स्वर भी शमित हो गये हैं और भविष्य में और आधुनिक उपकरण लेने के लिये निश्चयात्मकता भी हो गयी है।

मूल प्रश्न अभी भी वहीं टँगा है कि लैपटॉप या टैबलेट। यद्यपि जिस समय मैंने मैकबुक एयर लिया था, उस समय पर्याप्त समय दिया था और विश्लेषण किया था, यह निर्धारित करने के लिये कि लैपटॉप लें या टैबलेट, और वह भी किस कम्पनी का। उस समय शोरूम में ही जाकर दोनों का अनुभव लिया था, तब भार की दृष्टि से, धन की दृष्टि से, सम्हालने की दृष्टि से, कार्य विशेष की दृष्टि से, हर प्रकार से यही निर्णय लिया कि मैकबुक एयर ही लेना है। तब समय भी कम था और विश्लेषण बौद्धिक अधिक था, व्यवहारिक कम। अब जब घोर पारिवारिक कारणों से आईपैड भी घर में आ गया है और लगभग ७ माह का अनुभव दे चुका है, दोनों की तुलना अपना रंग बदल चुकी है, कुछ तथ्य नये आये हैं और कुछ पुराने तथ्य गलत सिद्ध हुये हैं। साथ ही साथ मोबाइल की उपस्थिति ने विश्लेषण को एक नयी गहराई दी है।

लैपट़ॉप, टैबलेट और स्मार्टफोन, तीनों रखने का कोई औचित्य नहीं है, पर केवल दो से भी पूरा कार्य नहीं चल सकता है। यह वाक्य भ्रमित करने वाला लग सकता है, पर इसके पीछे कारण है, एक द्वन्द्व छिपा है, एक दर्शन छिपा है। यदि आप गतिमय रहेंगे तो सारी क्षमतायें ढोकर नहीं चल सकते। मोबाइल फोन गतिमयता का प्रतीक है, लैपटॉप क्षमताओं का। टैबलेट दोनों के बीच का है, इसमें गतिमयता भी है और क्षमता भी, पर समय पड़ने पर दोनों के कई कार्य नहीं कर पाता है।

यदि आपके पास तीनों है तो कुछ न कुछ अतिरिक्त है, लगभग २० प्रतिशत। यदि आपके पास केवल लैपटॉप और मोबाइल है तो आपका कुछ न कुछ छूट रहा है, लगभग २० प्रतिशत। तीनों उपकरण लेकर न केवल आप अधिक धन खर्च करेंगे वरन तीनों के सामञ्जस्य के लिये ढेरों समय भी व्यर्थ करेंगे, भ्रम बना रहेगा और सततता बाधित होगी, वह भी अलग से। लेकिन दो उपकरण होने पर भी आपको २० प्रतिशत उपयोगिता की रिक्तता अपनी ओर से भरनी पड़ती है। यह रिक्तता भी तीन तरह से भरी जा सकती है या तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके, या अपनी आदतों में बदलाव लाकर या उन्नत तकनीक अपना कर। तीनों को उदाहरणों से स्पष्ट करना आवश्यक है।

श्रीमतीजी के पास टैबलेट और मोबाइल है, उनका लगभग सारा कार्य गतिमयता से हो जाता है। लगभग २० प्रतिशत कार्य छूटता है, बड़ी फिल्में नहीं देख पाती हैं, फोटो आदि नहीं सहेज पाती है, गाने इत्यादि डाउनलोड नहीं कर पाती हैं, १६ जीबी से अतिरिक्त कुछ सहेजने के लिये उन्हें सोचना पड़ता है, हम पर या बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है। उन्हें संकोच नहीं होता है, हम सब भी उन्हें तकनीक सिखाने को तत्पर रहते हैं, वह तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके अपना कार्य चला लेती हैं।

दूसरी श्रेणी में हमारे एक मित्र हैं, घर में एक बड़ा सा लैपटॉप है और हाथ में औसत से अधिक क्षमता का मोबाइल। गतिमयता का पर्याप्त कार्य मोबाइल से कर लेते हैं, ईमेल देख लेते हैं, फेसबुक स्टेटस चेक कर लेते हैं, छोटे मोटे नोट्स भी लिख लेते हैं। घर पहुँचकर ही वे अपने शेष कार्य कर पाते हैं, ब्लॉग पर टिप्पणी करना, लेख लिखना, शोध करना। उन्होंने अपनी आदतों में यह बसा लिया है कि कब क्या करना है? जो २० प्रतिशत की यह रिक्तता है, वह उससे संतुष्ट हैं।

तीसरी श्रेणी में हम जैसे लोग आते हैं। हम न तो किसी पर निर्भर रहना चाहते हैं और न ही अपनी आदतों में ही कोई बदलाव लाना चाहते हैं। हम २० प्रतिशत की रिक्तता तकनीक से भरना चाहते हैं। एक ऐसा लैपटॉप ढूढ़ते हैं जो पूरी क्षमता का हो, हल्का हो और कहीं भी ले जाया जा सके। साथ ही साथ एक ऐसा मोबाइल जो सारे कार्य करने में सक्षम हो, क्षमताओं से भरा हो। हर कम्पनी के नये मॉडल इसी दिशा में आ रहे हैं और अधिक मँहगे भी हैं। धन व्यय करना तभी करना चाहिये जब हम में उन उपकरणों की पूरी क्षमता निचोड़ने की इच्छाशक्ति हो।

तीसरी श्रेणी के समक्ष उपस्थित विकल्पों और तकनीक से जुड़े पहलुओं पर चर्चा अगली पोस्ट में।

15.6.11

लिखें या टाइप करें

इस विषय में कोई संशय नहीं कि लिखित साहित्य ने पूरे विश्व की मानसिक चेतना का स्तर ऊपर उठाने में एक महत योगदान दिया है। सुनकर याद रखने के क्रम की परिणति कालान्तर में भ्रामक हो जाती है और बहुत कुछ परम्परा के वाहक पर भी निर्भर करती है। व्यासजी ने भी यह तथ्य समझा और स्मृति-ज्ञान को लिखित साहित्य बनाने के लिये गणेशजी को आमन्त्रित किया। व्यासजी के विचारों की गति गणेशजी के द्रुतलेखन की गति से कहीं अधिक थी अतः प्रथम लेखन का यह कार्य बिना व्यवधान सम्पन्न हुआ।

व्यासजी और गणेशजी का सम्मिलित प्रयत्न हम सब नित्य करते हैं, विचार करते हैं और लिखते हैं। जब तक टाइप मशीनों व छापाखानों का निर्माण नहीं हुआ था, हस्तलिखित प्रतियाँ ही बटती थीं। कुछ वर्ष पहले तक न्यायालयों में निर्णयों की लिखित-प्रति देने का गणेशीय कर्म नकलबाबू ही करते रहे। अब हाथ का लिखा, प्रशासनिक आदेशों, परीक्षा पुस्तिकाओं, प्रेमपत्रों और शिक्षा माध्यमों तक ही रह गया है, कम्प्यूटर और आई टी हस्तलेखन लीलने को तत्पर बैठे हैं।

ज्ञान-क्रांति ने पुस्तकों का बड़ा अम्बार खड़ा कर दिया है, जिसको जैसा विषय मिला, पुस्तक लिख डाली गयी। इस महायज्ञ में पेड़ों की आहुतियाँ डालते रहने से पर्यावरण पर भय के बादल उमड़ने लगे हैं। अब समय आ गया है कि हमें अपनी व्यवस्थायें बदलनी होंगी, कागज के स्थान पर कम्प्यूटर का प्रयोग करना होगा।

भ्रष्टाचार के दलदल में आकण्ठ डूबी सरकारी फाइलों का कम्प्यूटरीकरण करने में निहित स्वार्थों का विरोध तो झेलना ही पड़ेगा, साथ ही साथ एक और समस्या आयेगी, लिखें या टाइप करें। यही समस्या विद्यालयों में भी आयेगी जब हम बच्चों को एक लैपटॉप देने का प्रयास करेंगे, लिखें या टाइप करें। बहुधा कई संवादों को तुरन्त ही लिखना होगा, तब भी समस्या आयेगी, लिखें या टाइप करें। यदि हमें भविष्य की ओर बढ़ने का सार्थक प्रयास करना है तो इस प्रश्न को सुलझाना होगा, लिखें या टाइप करें।

हस्तलेखन प्राकृतिक है, टाइप करने के लिये बड़े उपक्रम जुटाने होते हैं। एक कलम हाथ में हो तो आप लिखना प्रारम्भ कर सकते हैं कभी भी, टाइपिंग के लिये एक कीबोर्ड हो उस भाषा का, उस पर अभ्यास हो जिससे गति बन सके। सबकी शिक्षा हाथ में कलम लेकर प्रारम्भ हुयी है और इतना कुछ कम्प्यूटर पर टाइप कर लेने के बाद भी सुविधा लेखन में ही होती है। हर दृष्टि से लेखन टाइपिंग से अधिक सरल और सहज है। तब क्या हम सब पुराने युग में लौट चलें? नहीं, अपितु भविष्य को अपने अनुकूल बनायें। हस्तलेखन और आधुनिक तकनीक का संमिश्रण करें तो ही आगत भविष्य की राह सहज हो पायेगी।

टैबलेट कम्प्यूटरों का पदार्पण एक संकेत है। धीरे धीरे भौतिक कीबोर्ड और माउस का स्थान आभासी कीबोर्ड ले रहा है। ऊँगलियों और डिजिटल पेन के माध्यम से आप स्क्रीन पर ही अपना कार्य कर सकते हैं। इसमें लगायी जाने वाली गोरिल्ला स्क्रीन अन्य स्क्रीनों से अधिक सुदृढ़ होती है और बार बार उपयोग में लाये जाने पर भी अपनी कार्य-क्षमता नहीं खोती है। कम्प्यूटर पर अपने हाथ से लिखा पढ़ने का आनन्द ही कुछ और है। कुछ दिन पहले ही एक टचपैड के माध्यम से कुछ चित्र बनायें है और हाथ से लिखा भी है।

ऐसा नहीं है कि आपका हस्तलेखन कम्प्यूटर पहचान नहीं सकता है। अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में यह तकनीक विकसित कर ली गयी है और आशा है कि हिन्दी के लिये भी यह तकनीक शीघ्र ही आ जायेगी। ऐसा होने पर आप जो भी लिखेंगे, जिस भाषा में लिखेंगे, वह यूनीकोड में परिवर्तित हो जायेगा। अब आप जब चाहें उसे उपयोग में ला सकते हैं, ब्लॉग के लिये, ईमेल के लिये, छापने के लिये, संग्रह के लिये।

जब स्लेट की आकार की टैबलेट हर हाथों में होंगे और साथ में होंगे लिखने के लिये डिजिटल पेन, जब इन माध्यमों से हम अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक कार्य निष्पादित कर सकेंगे, तब कहीं आधुनिकतम तकनीक और प्राचीनतम विधा का मेल हो पायेगा, तब कहीं हमें प्राकृतिक वातावरण मिल पायेगा, अपने ज्ञान के विस्तार का। बचपन में जिस तरह लिखना सीखा था, वही अभिव्यक्ति का माध्यम बना रहेगा, जीवनपर्यन्त।