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29.9.12

बच्चों की खिलती मुस्कान

भाग्य ने अपने सारे दाँव कॉन्क्रीट के जंगलों में लगा दिये हैं, बड़े नगरों में ही समृद्धि की नयी परिभाषायें गढ़ने में लगी हैं सभ्यतायें। आलोक को अपनी प्रतिभा और सृजनशीलता के लिये ढेरों संभावनायें थी यहाँ पर, अच्छी नौकरी थी, भव्य भविष्य था, पर मन के अन्दर और बाहर साम्य स्थापित नहीं हो पा रहा था। बंगलोर जैसा बड़ा नगर भी उसके हृदय के विस्तृत वितान को समेटने में असमर्थ था। एक दिन उसने सामान समेटा और जा पहुँचा गोवा, जहाँ पर सागर की मदमाती लहरें थीं, क्षितिज में जल और आकाश का मिलन दिखता था और स्थानीय निवासियों के प्रतिरोध ने कॉन्क्रीट का कद पेड़ों के ऊपर जाने नहीं दिया था। यहाँ प्रकृति अपने मोहक स्वरूप में अभी भी विद्यमान थी। बस यहीं आलोक का मन तनिक स्थिर हुआ, एक मकान किराये पर लिया, एक कमरे में अपना स्टूडियो स्थापित किया और चित्रकला में डूब गया, उन रंगों में डूब गया जिनके गाढ़ेपन में उसके भाव गहराते थे, जिनकी छिटकन स्मृतियाँ बन फैल जाती थी, मन को सम्मोहित कर लेती थी।

स्थानीय निवासियों को धीरे धीरे चित्रकला के इस दीवाने के बारे में ज्ञात हुआ, उत्सुकतावश ही सही, विचार विनिमय हुआ, संवाद हुआ, कई स्थानों पर उसे अपनी बात कहने के लिये बुलाया गया। संवेदनशीलों के संसार में आपका आनन्द बढ़ता ही है, आपकी प्रतिभा और सदाशयता कई और रूपों में बह जाना चाहती है, आपकी अभिव्यक्ति थोड़ी और मुखर हो जाना चाहती है। 'हमारा स्कूल' नाम की एक संस्था जो झुग्गियों में रहने वाले, निर्धन, समाज के दूसरे छोर पर त्यक्त अवस्थित समूह के बच्चों के विकास में हृदय से लगी थी, उनकी संचालिका ने आलोक को मना लिया, उन बच्चों को थोड़ी बहुत चित्रकला सिखाने के लिये, प्रत्येक रविवार।

नियत दिन आया, सारे बच्चे नहा धोकर आलोक की प्रतीक्षा कर रहे थे, उन बच्चों में ट्रक ड्राइवरों, निर्माण कार्य में लगे मजदूरों, घर मे काम करने वाली बाइयों, मछुआरों और वेश्याओं के बच्चे थे। संवाद खुला, 'मैं कलाकार हूँ और दिनभर बैठा बैठा चित्र बनाता रहता हूँ' आलोक ने परिचय दिया। सब ठहाका मार के हँस पड़े, 'अच्छा आप अभी तक चित्र बनाते हो, ऑफिस नहीं जाते हो?' एक बच्चा बोल पड़ा। आलोक ने धीरे से अपने द्वारा बनाये आधुनिक कला के कई चित्र सामने रख दिये, बच्चे उत्सुकता से देखने लगे। वे सारे चित्र जिन्हें कलाजगत में बड़ी उत्साहजनक टिप्पणियाँ मिली थीं, आज उन बच्चों के अवलोकन के लिये प्रस्तुत थे। सबने ध्यान से देखा, कुछ को कुछ भी समझ नहीं आया, कुछ को कुछ समझ आया, कुछ ने कुछ समझने जैसी आँखें सिकोड़ीं और अन्त में एक ने कह ही दिया कि यह तो बड़ा गिचपिच सा लग रहा है।

'जब आप बनाते हो तो अच्छा लगता है, जब हम बनाते हैं तो अच्छा ही नहीं बनता है।' एक बच्ची बोली। 'पर मैं तो बस आपकी तरह ही बनाता हूँ' आलोक ने समझाया। 'अच्छा आप इतने बड़े हो गये हो और अभी तक हमारी तरह ही बनाते हो' कहीं से आवाज़ आयी। आलोक के अहं को इतनी ठेस आज तक नहीं पहुँची थी। आलोक ने घर आकर अब तक के एकत्रित आर्ट पेपर, रंग, ब्रश आदि इकठ्ठा किये और अगले दिन वहाँ पहुँचा। हर एक बच्चे के सामने एक आर्ट पेपर था, सब शान्त बैठे थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या बोलें, क्या करें?

'यदि हम अच्छा नहीं बना पाये तो, यदि यह पेपर खराब हो गया तो?' उनकी आँखों के प्रश्न वाक्य का रूप पा गये। 'अच्छा क्या होता है?' बिल्कुल शान्ति, 'बुरा क्या होता है?' और भी सन्नाटा। आलोक ने एक पेपर उठाया, उनके साथ बैठ गया और हाथों में चारकोल लेकर अपना ही स्केच बनाने लगा। सब उसे घेरकर खड़े हो गये और ध्यान से देखने लगे, आलोक इतनी एकाग्रता से लगा था कि मानो अपने आलोचकों के गढ़ में जाकर उन्हें प्रभावित कर रहा हो। आकृति उभरी, गंजा सर, गोल चश्मा और एक टीशर्ट। 'अहा, यह तो गाँधीजी लग रहे हैं, टीशर्ट पहने।' छह वर्ष का करन सहसा बोल उठा। बच्चों का धैर्य बह निकला, सब चित्र बनाने में लग गये, जिसे जो भी सूझा, जैसे भी सूझा। आलोक देखकर मुदित होता रहा, बच्चे कागज पर अपने बचपन के रंग बिखेरते रहे।

आलोक ने सारे चित्र दीवार पर लगा दिये, अपने चित्र के साथ ही। 'अब बताओ कि इनमें सबसे खराब कौन सा लग रहा है?' आलोक ने पूछा। सब मौन, कई बार कहने पर सबने अन्ततः एक चित्र निकाला। आलोक ने वह चित्र सामने वाली दीवार पर लगा दिया और पूछा कि अब बताओ कि अब कैसा लग रहा है? 'अब तो यह भी अच्छा लग रहा है', कई बच्चे बोल पड़े। बच्चों को समझ नहीं आ रहा था कि यही चित्र जब सबके साथ था तो खराब लग रहा था, अकेला लगा दिया तो अच्छा लग रहा है।

'बच्चों, तुम लोग भी जब स्वयं को भीड़ के साथ रखते हो तो स्वयं को कमतर समझने लगते हो, कभी कम धनी समझते हो, कभी कम भाग्यशाली समझते हो, कभी कम सुन्दर समझते हो। जब स्वयं को भीड़ से अलग रखकर देखोगे, स्वयं को दर्पण में जाकर देखोगे तो तुम्हें भी स्वयं पर गर्व करने के ढेरों कारण मिल जायेंगे।' आलोक ने व्याप्त संशय दूर कर दिया। सब मुस्करा उठे, बस एक छुटका नहीं, वह थक कर सो चुका था। सारे बच्चे आज स्वयं पर एक नया विश्वास लेकर घर पहुँचेगे, सबके चेहरे पर गजब का आत्मसन्तोष झलक रहा था।

हर सप्ताह बच्चे बड़ी आतुरता से अपने टीशर्ट वाले गाँधीजी से मिलने की प्रतीक्षा करते हैं, उन्हें चित्रकला भी अच्छी लग रही है और स्वयं का समझना भी, हर बार उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा है। आलोक को भी रविवार की प्रतीक्षा रहती है। एक दिन संचालिका ने आलोक से उसकी फीस के बारे में पूछा, आलोक ने मुस्कराते हुये कहा कि उसकी फीस बच्चों से मिल जाती है। आश्चर्य से संचालिका ने कारण पूछा।

'मैं कई नगरों में कार्यशालायें आयोजित करता हूँ, सबको एक चित्र बनाने को देता हूँ, आधे समय के बाद सबके चित्र आपस में बदल देता हूँ और एक दूसरे के चित्र पूरे करने को कहता हूँ। नगर के बच्चे कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, हमारा चित्र आपने दूसरे को कैसे दे दिया, हमने इतनी मेहनत से बनाया था? ठीक उसी तरह जिस तरह आधुनिक मैनेजर अपनी योजनाओं से चिपका रहता है, अपनी उपलब्धियों से चिपका रहता है, दूसरों के कार्य उसके लिये महत्वहीन हों मानो। और इन बच्चों को देखो, इन्होने आज तक कभी कोई शिकायत नहीं की है, इन्हें जो भी, जैसा भी, आधा अधूरा चित्र दे दो, उसे भी अच्छा बनाने में लग जाते हैं। काश हम सब भी अन्य की कृतियों और कार्यों के प्रति यही भाव रखें, सब विशिष्ट हैं। मैं हर बार इनके पास बस यही सीखने आता हूँ और यही मेरा पारिश्रमिक भी है।' आलोक प्रवाह में बोलता जा रहा था।

आलोक वहाँ हर रविवार जाता है, सब सोचते हैं कि आलोक उन्हें कला सिखाने जाता है, पर यह केवल आलोक ही जानता है कि वह वहाँ बच्चों से क्या सीखने जाता है?



(यह कहानी जेन गोपालकृष्णन ने अंग्रेजी में वर्णित की है और सर्वप्रथम 'चिकेन सूप फॉर सोल - इंडियन टीचर' में प्रकाशित हुयी है। आलोक और जेन के प्रति आभार)

4.1.12

एक चित्रकार की कहानी

दस वर्ष का बच्चा अपनी माँ से कहे कि उसे तो बस चित्रकार ही बनना है, तो माँ को कुछ अटपटा सा लगेगा, सोचेगी कि डॉक्टर, इन्जीनियर, आईएएस बनने की चाह रखने वालों की दुनिया में उसका बच्चा अलबेला है, पर कोई बात नहीं, बड़े होते होते उसकी समझ विकसित हो जायेगी और वह भी कल्पना की दुनिया से मोहच्युत हो विकास के मानकों की अग्रिम पंक्ति में सम्मिलित हो जायेगा। इसी बात पर पिता के क्रोध करने पर यदि वह बच्चा सब सर झुकाये सुनता रहे और जाते जाते पिता की तनी भृकुटियों का चित्र बना माँ को पहचानने के लिये पकड़ा दे, तो माँ को बच्चे की इच्छा शक्ति बालहठ से कहीं अधिक लगेगी। वह तब अपने बच्चे का संभावित भविष्य एक चित्रकार के रूप सोचना प्रारम्भ तो कर देगी, पर वह चिन्तन संशयात्मक अधिक होगा, निश्चयात्मक कम। बच्चा और बड़ा होकर अपने निर्णय पर अटल रहते हुये एक महाविद्यालय के कला संभाग में पढ़ने लगे, पर एक वर्ष बाद ही जब उसके प्राध्यापक उसे बुलाकर समझायें कि कला तो उसमें जन्मजात है, अब उसे और कला सीखने की आवश्यकता नहीं है, यदि महाविद्यालय में शेष वर्षों का सदुपयोग करना है तो उसे जीविकोपार्जन के लिये विज्ञापन या फोटोग्राफी भी सीख लेनी चाहिये। तब कहीं उसकी माँ अपने बच्चे के भविष्य के प्रति आश्वस्त हुयी होगी और उसे यह विश्वास हो गया होगा कि उसका बच्चा जीवन निर्वाह सकुशल कर पायेगा।

माँ की चिन्ता तो यहीं समाप्त हो जाती है पर क्या आप उसके बाद के लगभग २० वर्षों को नहीं जानना चाहेंगे जो उस बच्चे के स्वप्न को पूर्ण रूप से साकार होने में लगे और जिसका जानना हर उस माँ के लिये आवश्यक है जिनके बच्चे की कला में बहुत अधिक रुचि है या जिनका बच्चा १० वर्ष की उम्र में ही चित्रकार बनने की भीष्म प्रतिज्ञा किये बैठा है। हम सबको ऐसे बाल-निश्चयों को गम्भीरता से लेना होगा क्योंकि स्वयं को दस वर्ष की छोटी अवस्था में समझ पाना और अपने बनाये सपने को जी पाना मन की जीवटता का अद्भुत निरूपण है।

जो अच्छा लगे वह कर पाना बहुत कठिन है। अपने जैसे बहुतों को जानता भी हूँ जो औरों से अपनी तुलना करते करते जीवन व्यर्थ कर डालते हैं और जब तक समझ में आता है तब तक बहुत देर हो जाती है, सपनों को साकार करने में। समाज जिसे महत्व देता है, वही लबादा ओढ़ लेते हैं हम लोग, दम घुट जाये किसे परवाह। जो हैं, वह बन कर जी पाना ही सर्वाधिक सुख देता है। वह सुख अनुभव तो नहीं किया जा सकता है पर सबके लिये अनुकरणीय बन जाता है। जीवटता की कठिन राह से निकल आने के बाद तो हम उनसे प्रभावित होते हैं पर उनको किन परिस्थितियों ने प्रभावित किया और किस प्रकार अनजाने और विशेष जीवन को जीते हुये उन्होने अपने सपनों को निभाया है, यह जानना भी आवश्यक है।

हाँ, इस परिप्रेक्ष्य में फिर आते हैं उस कहानी पर। चित्रकला नियमित रूप से जुड़ी रहती है उससे पर पढ़ाई करने के बाद पहली नौकरी एक बहुराष्ट्रीय विज्ञापन कम्पनी में करने जाता है वह। चित्रों में अपनी आशा स्थापित करने वाला बच्चा अपनी सृजनात्मकता कम्पनी के उत्पाद बिकवाने के लिये और आमजन के अन्दर उसकी आवश्यकता के सपने जगाने में लगाने लगता है। कला का उपयोग साबुन, कोला, तेल या चॉकलेट बेचने के लिये। मैं भले ही ऐसे विज्ञापनों का धुर विरोधी न हूँ पर दस वर्ष की अवस्था में जिस बच्चे ने ब्रश से अपनी कल्पना उकेरने का सपना पाला हो उसके लिये यह एक स्थायी निष्कर्ष नहीं हो सकता था, भले ही कितना पैसा उसे मिल रहा हो। लोग इसे प्रतिभा का व्यावसायिक उपयोग मान सकते हैं, पर मन की संतुष्टि के सम्मुख धन का क्या मोल? अन्ततः विज्ञापन के व्यूह से बाहर आ जाता है वह।

फोटोग्राफी में महारत और दूसरी कम्पनी में नौकरी, एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी से बड़ा कार्य मिलता है, भारत के बच्चों के बारे में फोटोग्राफ-श्रंखला बनाने का। जहाँ एक ओर हमारे नित के जीवन में एक ही जगह पड़े रहने से और कृत्रिमता ओढ़ लेने से संवेदना का अकाल पड़ जाता है, उसको ईश्वर प्रदत्त अवसर मिलता है, पूरा देश घूमने का और बच्चों के चेहरों में जीवन के भाव पढ़ने का। सड़कों में, गरीबी में, भूख में, उत्साह में, उन्माद में, खेल में, बालश्रम मे, शापित, शोषित, हर ओर बच्चों के भाव, संवेदनाओं की उर्वरा भूमि देखने का अवसर, देश के भविष्य को पढ़ने का अवसर। हर यात्रा में चित्रकला को संवेदना का ग्रास मिलने लगता है।

जीवन बढ़ता है, चित्रकला अधिक के लिये उकेरने लगती है, गौड़ से मूल स्थान पाना चाहती है जीवन में। धीरे धीरे सारी व्यस्ततायें चित्रकला के मौलिक व्यसन के लिये सिमटती जाती हैं। दिन में, रात में, भीड़ में, एकान्त में, हर समय कल्पनाओं के घुमड़ते बादल रंग और आकार में ढल जाना चाहते हैं। अपना सपना देखने के २५ वर्ष बाद उसे अपनी चित्रकला का एकान्त मिलता है, मन के बाँध अपने सारे द्वार खोल देने को तत्पर हैं, प्रवाह अनवरत बने रहना चाहता है।

माँ बेटे के सपने को वास्तविकता बनते हुये देखती है, विश्वास के साथ, अभिमान के साथ। इस चित्रकार की सफल कहानी उन माँओं को विचलित नहीं करेगी जिनके बच्चे ऐसी ही भीष्म प्रतिज्ञायें करने को तत्पर बैठे हैं।

(मेरे मित्र की जीवन कथा है यह, २५ वर्ष बाद हम मिले, मेरे हाथ में कलम उसके हाथ में ब्रश, मैं बद्ध वह निर्बन्ध, मैं अपने सपनों का सेवक वह अपने सपनों का राजा)