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25.5.13

अच्छा लगता है, जब बच्चे सिखाते हैं

बच्चे, पता ही नहीं चलता है, कब बड़े हो जाते हैं? कल तक लगता था कि इन्हें अभी कितना कुछ सीखना है, साथ ही साथ हम यही सोच कर दुबले हुये जा रहे थे कि कैसे ये इतना ज्ञान समझ पायेंगे? अभी तक उनकी गतिविधियों को उत्सुकता में डूबा हुआ स्वस्थ मनोरंजन समझते रहे, सोचते रहे कि गंभीरता आने में समय लगेगा।

बच्चों की शिक्षा में हम सहयोगी होते हैं, बहुधा प्रश्न हमसे ही पूछे जाते हैं। उत्सुकता एक वाहक रहती है, हम सहायक बने रहते हैं उसे जीवन्त रखने में। जैसा हमने चीज़ों को समझा, वैसा हम समझाते भी जाते हैं। बस यही लगता है कि बच्चे आगे आगे बढ़ रहे हैं और हम उनकी सहायता कर रहे हैं।

यहाँ तक तो सब सहमत होंगे, सब यही करते भी होंगे। जो सीखा है, उसे अपने बच्चों को सिखा जाना, सबके लिये आवश्यक भी है और आनन्दमयी भी। यहाँ तक तो ठीक भी है, पर यदि आपको लगता है कि आप उनकी उत्सुकता के घेरे में नहीं हैं, तो पुनर्विचार कर लीजिये। यदि आपको लगता उनकी उत्सुकता आपको नहीं भेदती है तो आप पुनर्चिन्तन कर लीजिये।

प्रश्न करना तो ठीक है, पर आपके बच्चे आपके व्यवहार पर सार्थक टिप्पणी करने लगें तो समझ लीजिये कि घर का वातावरण अपने संक्रमण काल में पहुँच गया है। टिप्पणी का अधिकार बड़ों को ही रहता है, अनुभव से भी और आयु से भी। श्रीमतीजी की टिप्पणियों में एक व्यंग रहता है और एक आग्रह भी। बच्चों की टिप्पणी यदि आपको प्राप्त होने लगे तो समझ लीजिये कि वे समझदार भी हो गये और आप पर अधिकार भी समझने लगे। उनकी टिप्पणी में क्या रहता है, उदाहरण आप स्वयं देख लीजिये।

बिटिया कहती हैं कि आप पृथु भैया को को ठीक से डाँटते नहीं हैं। जब समझाना होता है, तब कुछ नहीं बोलते हो। जब डाँटना होता है, तब समझाने लगते हो। जब ढंग से डाँटना होता है, तब हल्के से डाँटते हो और जब पिटाई करनी होती है तो डाँटते हो। ऐसे करते रहेंगे तो वह और बिगड़ जायेगा। हे भगवान, दस साल की बिटिया और दादी अम्मा सा अवलोकन। क्या करें, कुछ नहीं बोल पाये, सोचने लगे कि सच ही तो बोल रही है बिटिया। अब उसे कैसे बतायें कि हम ऐसा क्यों करते हैं? अभी तो प्रश्न पर ही अचम्भित हैं, थोड़ी और बड़ी होगी तो समझाया जायेगा, विस्तार से। उसके अवलोकन और सलाह को सर हिला कर स्वीकार कर लेते हैं।

पृथु कहते हैं कि आप इतना लिखते क्यों हो, इतना समय ब्लॉगिंग में क्यों देते हो? आपको लगता नहीं कि आप समय व्यर्थ कर रहे हो, इससे आपको क्या मिलता है? थोड़ा और खेला कीजिये, नहीं तो बैठे बैठे मोटे हो जायेंगे। चेहरे पर मुस्कान भी आती है और मन में अभिमान भी। मुस्कान इसलिये कि इतना सपाट प्रश्न तो मैं स्वयं से भी कभी नहीं पूछ पाया और अभिमान इसलिये कि अधिकारपूर्ण अभिव्यक्ति का लक्ष्य आपका स्वास्थ्य ही है और वह आपका पुत्र बोल रहा है।

ऐसा कदापि नहीं है कि यह एक अवलोकन मात्र है। यदि उन्हे मेरी ब्लॉगिंग के ऊपर दस मिनट बोलने को कहा जाये तो वह उतने समय में सारे भेद खोल देंगे। पोस्ट छपने के एक दिन पहले तक यदि पोस्ट नहीं लिख पाया हूँ तो वह उन्हें पता चल जाता है। यदि अधिक व्यग्रता और व्यस्तता दिखती है तो कोई पुरानी कविता पोस्ट कर देने की सलाह भी दे देते हैं, पृथुजी। लगता है कि कहीं भविष्य में मेरे लेखन की विवेचना और समीक्षा न करने लगें श्रीमानजी।

आजकल हम पर ध्यान थोड़ा कम है, माताजी और पिताजी घर आये हैं, दोनों की उत्सुकता के घेरे में इस समय दादा दादी हैं। न केवल उनसे उनके बारे में जाना जा रहा है, वरन हमारे बचपन के भी कच्चे चिट्ठे उगलवाये जा रहे हैं। कौन अधिक खेलता था, कौन अधिक पढ़ता था, कौन किससे लड़ता था, आदि आदि। मुझे ज्ञात है कि इन दो पीढ़ियों का बतियाना किसी दिन मुझे भारी पड़ने वाला है। माताजी और पिताजी भले ही बचपन में मुझे डाँटने आदि से बचते रहे, पर मेरे व्यवहार रहस्य बच्चों को बता कर कुछ न कुछ भविष्य के लिये अवश्य ही छोड़े जा रहे हैं।

कई बच्चे अपने माता पिता को अपना आदर्श मानते हैं, उनकी तरह बनना चाहते हैं। पर जब उनके अन्दर यह भाव आ जाये कि उन्हे थोड़ा और सुधारा जा सकता है, थोड़ा और सिखाया जा सकता है तो वे अपने आदर्शों को परिवर्धित करने की स्थिति में पहुँच गये हैं। उनके अन्दर वह क्षमता व बोध आ गया है जो वातावरण को अपने अनुसार ढालने में सक्षम है। समय आ गया है कि उन्होंने अपनी राहों की प्रारम्भिक रूपरेखा रचने का कार्य भलीभाँति समझ लिया है।

पता नहीं कि हम कितना और सुधरेंगे या सँवरेंगे, पर जब बच्चे सिखाते हैं तब बहुत अच्छा लगता है।

6.10.12

बच्चों की संस्कृति

अपनी संस्कृति पर गर्व होना स्वाभाविक है, पर सारा जीवन अपनी संस्कृति के एकान्त में नहीं जिया जा सकता है, अन्य संस्कृतियाँ प्रभावित करती हैं। पहले का समय था, संस्कृतियों के बीच का संवाद सीमित था, परस्पर प्रभाव सीमित था, जो बाहर जाते थे वे ही बाहर की संस्कृति के कुछ अंश ले आते थे, पर दूसरी संस्कृति में जीवन निभा पाने के समुचित श्रम के पश्चात। आज न जाने कितनी फुहारें बरसती हैं, बड़ा ही कठिन होता है, भीग न पाना। हर संस्कृति की एक जीवनशैली है, अपने सिद्धान्त हैं और उसमें पगी दिनचर्या। औरों की संस्कृति पहले तो रोचक लगती है, पर धीरे धीरे रोचकता हृदय बसने लगती है, हम औरों की संस्कृति के पक्ष अपना लेते हैं, अपनी सुविधानुसार, अपनी इच्छानुसार।

मुझे भी अपनी संस्कृति पर गर्व है, खोल पर नहीं, उसकी आत्मा पर है। कई कारण हैं उसके, वर्षों की समझ के बाद निर्मित हुये हैं वे कारण। बहुत कारण ऐसे हैं, जो सिद्ध न कर पाऊँ, समझा न पाऊँ, भावानात्मक हैं, बौद्धिक हैं, आध्यात्मिक हैं। आवश्यकता भी नहीं है कि उनके लिये तर्कों से श्रेष्ठता के महल निर्माण करूँ, अनुभवजन्य तथ्य तर्कों की वैशाखियाँ पर निर्भर भी नहीं रहते हैं। यह भी नहीं है कि मुझे अन्य संस्कृतियों से कोई अरुचि हो, जब खोल अनावश्यक हो जाते हैं तो तुलना करने के लिये बहुत कम बिन्दु ही रह जाते हैं। सिद्धान्तों की मौलिकता में किसी भी संस्कृति को समझना कितना सरल हो जाता है, कम समझना होता है तब, गहरा समझना होता है तब। कबिरा की 'मरम न कोउ जाना', यही पंक्ति पथप्रदर्शन करने लगती है। किसी संस्कृति का श्रेष्ठ स्वीकार करना ही उस संस्कृति का समुचित आदर है। खोल का ढोल पीटने वाले, न अपनी संस्कृति को समझ पाते हैं, न औरों की।

आज आधुनिक एक आभूषण बन गया है, पुरातन एक अभिशाप। भविष्य सदा ही अधिक संभावनायें लिये होता है, भूतकाल से कहीं अधिक मात्रा में, कहीं अधिक स्पष्टता में। पुरातन को अपने दोषों का कारण मान, सब कुछ उसी पर मढ़ हम हल्के हो लेते हैं, कोई भार नहीं, कोई अनुशासन नहीं, कोई नियम नहीं, उन्मुक्त पंछी से। यदि यही आधुनिकता के रूप में परिभाषित होना है, तब तो हम स्वयं को संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में कभी समझे ही नहीं। आधुनिकता और खुले विचार वालों ने अपनी स्वच्छन्दता के सीमित आकाश में संस्कृति की उस असीमित आकाशगंगा को तज दिया है, जिसमें हम सब सदियों से निर्बाध और आनन्दित हो विचरण करते रहे हैं।

संस्कृति की हमारी संकर समझ उस समय उभर कर सामने आ जाती है, जब हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पाश्चात्य संस्कृति सीखें, उनकी तरह विकसित हों, उनकी तरह आत्मविश्वास से पूर्ण दिखें, पर घर की मान्यताओं, परम्पराओं और संस्कारों को अक्षुण्ण रखे। जो भी कारण रहा हो, भारतीय संस्कृति शापित रही हो या शासित रही हो, आधुनिक परिवेश में श्रमशीलता, अनुशासन और कर्मप्रवृत्तता भारतीय संस्कृति के अनुपस्थित शब्द रहे हैं। वानप्रस्थ और सन्यास वर्षों में अध्यात्म का संतोष और जीवन समेटने की चेष्टाओं को ब्रह्मचर्य और गृहस्थ में ही स्वीकार कर लेने से जो अकर्मण्यता हमारी जीवनशैली में समा गयी है, उसकी भी उत्तरदायी है संस्कृति के बारे में हमारी संकर समझ।

क्या करें, संस्कृति का सही अर्थ बच्चों को समझाने बैठें या उन्हें स्वयं ही समझने दें? कपाट बन्द करने से उसके कूप मण्डूक हो जाने का भय है, कपाट खोल देने से वाह्य संस्कृतियों के दुर्गुण स्वीकारने का भय? जब हमें चकाचौंध भाती है तो उन्हें भला क्यों न अच्छी लगेगी, क्या तब बच्चे लोभ संवरण कर पायेंगे? बहुत से ऐसे ही प्रश्न उठ खड़े होते हैं जब बच्चों का परिचय हम अन्य संस्कृतियों से करवाते हैं। क्या उपाय है, संस्कृति की आत्मा सिखायें, या खोल चढ़ा दें, या उसे स्वयं ही समझने दें? उत्तर तो पाने ही हैं, अनभिज्ञता हर दृष्टि से घातक है। बहुत बार बस यही लगता है कि जो भी सिखाना हो, जो भी श्रेष्ठ हो, उसे स्वयं के जीवन में उतार लीजिये, बच्चे समझदार होते हैं, सब देख देखकर ही समझ लेते हैं।

एक मित्र के बारे में कहना चाहूँगा, वह पूर्ण नास्तिक, कारण बड़ा रोचक है पर। बचपन में अपने पिता को देखता था, बहुत अधिक पूजा पाठ करते थे, धार्मिक थे। भ्रष्टाचार का धन और परिवारजनों, विशेषकर पत्नी के प्रति अप्रिय व्यवहार। यह विरोधाभास उसको कभी समझ न आया, उसे लगा कि इस विरोधाभास का स्रोत धर्म ही हो, किसी से कभी कुछ नहीं कहा, बस वह ईश्वर से रूठ गया, जीवन भर के लिये नास्तिक हो गया। देखा जाये तो हमारा जीवन ही बच्चों के लिये हमारी संस्कृति का जीवन्त उदाहरण है, वही पर्याप्त होता है बस, प्रभावित करने में शब्द आदि निष्प्राण हो जाते हैं, अन्त में व्यवहार ही अनुसरणीय हो जाता है।

पाश्चात्य समाज में बच्चे अधिक स्वतन्त्र होते हैं, विकास के लिये एक आवश्यक गुण है यह। अपने जीवन के दो महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं करते हैं वे, जीवन यापन कैसे करना है और जीवन यापन किसके साथ करना है? हम अपनी संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो संभवतः हजम न कर पायें, पर उनके लिये यह स्वाभाविक व्यवहार है। यदि आप चाहेंगे कि आपके बच्चे भी उनकी तरह स्वतन्त्र बने या स्मार्ट बने, तो उन्हें बचपन से ही अपने निर्णय लेने के लिये उकसाना होगा। तब निर्णयों में मतभेद भी होंगे, कई बार मर्यादा दरकती हुयी सी लगेगी। जो बच्चे आपके निर्णयों से सहमत न हो अपना पंथ सोचने लगते हैं, उन्हें बागियों की उपाधि मिल जाती है। जो बच्चे आपके निर्णयों से असहमत होकर कार्यों में रुचि खो देते हैं और अनमने हो जाते हैं, उन्हें आप नकारा की संज्ञा से सुशोभित कर देते हैं। स्वतन्त्र दोनों ही होते हैं, जीवन अपना दोनों ही जीते हैं, बहुधा अपने कार्य में अत्यधिक सफल भी रहते हैं, पर समाज की दृष्टिकोण से आदर्श बच्चे नहीं कहे जाते हैं।

माना कि पाश्चात्य दृष्टिकोण में बहुत दोष हैं, आध्यात्मिक आधार पर भारतीय संस्कृति कहीं उन्नत है, सामाजिक संरचना और संबंधों के निर्वाह में हमारा समाज अधिक स्थायी है, एक कष्ट पर दसियों हाथ सहायता करने को तत्पर रहते हैं। तो क्या हम भौतिकता की आधारभूत आवश्यकताओं पर भी ध्यान न दें, सन्तोष की चादर ओढ़ अपने सांस्कृतिक वर्चस्व के स्वप्न देखें? पृथु के पास एक मोटी पुस्तक है, टॉप टेन ऑफ ऐवरीथिंग, उसमें वह देखता है कि अपना देश विकास के मानकों के आधार पर पाश्चात्य देशों के सामने कहीं नहीं टिकता है, पूछता है कि हम सबमें पीछे क्यों हैं? क्या उसको यह बताना ठीक रहेगा कि विवाह तक तो यहाँ का युवा अपने हर निर्णय के लिये अपने बड़ों का मुँह ताकता रहता है, यौवन भर औरों के द्वारा प्रायोजित और संरक्षित जीवन जीता है, प्रौढ़ होते ही असहाय हो अन्त ताकने लगता है और आध्यात्मिक हो जाता है। कब उसे समय मिलता है अपने स्वप्न देखने का, उन्हें साकार करने का? संभावित ऊर्जा सदा ही संभावना बनी रहती है, कोई आकार नहीं ले पाती है।

हम इस भय में जीते रहते हैं कि हमें अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ी के लिये सुविधामयी जीवन संजो के जाना है, वही भय हमारे बच्चों में मूर्तरूप ले जी रहा है। सब के सब सधे भविष्य की ओर भागे जा रहे हैं, स्थापित तन्त्रों के सेवार्थ, उन तन्त्रों में जुत जाना चाहते हैं जो विश्व में बहुत नीचे हैं। हजारों की एक ऐसी सेना तैयार हो जिनके मन में दिवा स्वप्न हों, श्रेष्ठतम और उत्कृष्टतम पा जाने की उद्दाम ललक हो, हर ऐसे क्षेत्र में देश को स्थापित करने का विश्वास हो जिनके लिये हम जीभ लपलपाते रहते हैं। इस तरह की शक्ति तो एक दिन में चमत्कारस्वरूप मिलने से रही, बच्चे रोजगार ढूढ़ने में लगे रहे तो रोजगार के अतिरिक्त कुछ पा भी नहीं पायेंगे, देश में नहीं मिलेगा तो विदेश सरक जायेंगे।

हमारा देश सर्वाधिक युवा देश है, कारण है कि बच्चे अधिक हैं। अब दो विकल्प हैं, या तो बच्चों को अतिसंरक्षित जीवन जिलाते रहें और भविष्य में जब प्रतियोगिता की मारकाट अपने चरम पर होगी, उन्हें उन पर ही छोड़ दिया जाय, भाग्य के भरोसे। एक पतले रास्ते पर भला कितने लोग चल पायेंगे? दूसरा विकल्प यह है कि अपने बच्चों को दृढ़ और सशक्त बनायें जिससे न केवल वे अपनी राह गढ़ेंगे वरन न जाने कितनों को अपने साथ लेकर चलेंगे।

निर्णय आपको करना है कि बच्चों के निर्णय कौन लेगा? निर्णय आपको करना है कि बच्चों की संस्कृति क्या हो? निर्णय आपको करना है कि संस्कृतियों के बन्द किलों में ही बच्चे रहें या सबके ऊपर उड़ें, आसमान में? निर्णय आपको करना है कि संस्कृति को बचाये रखने वाले बचे रहें और संस्कृति को बचाये रखे या संस्कृति में सिमटे हुये विश्वपटल से अवसान कर जायें? भविष्य के निर्णय तो आज के बच्चे लेंगे, पर उन्हें इस योग्य बनाने के निर्णय आपको लेने हैं, आज ही।

29.9.12

बच्चों की खिलती मुस्कान

भाग्य ने अपने सारे दाँव कॉन्क्रीट के जंगलों में लगा दिये हैं, बड़े नगरों में ही समृद्धि की नयी परिभाषायें गढ़ने में लगी हैं सभ्यतायें। आलोक को अपनी प्रतिभा और सृजनशीलता के लिये ढेरों संभावनायें थी यहाँ पर, अच्छी नौकरी थी, भव्य भविष्य था, पर मन के अन्दर और बाहर साम्य स्थापित नहीं हो पा रहा था। बंगलोर जैसा बड़ा नगर भी उसके हृदय के विस्तृत वितान को समेटने में असमर्थ था। एक दिन उसने सामान समेटा और जा पहुँचा गोवा, जहाँ पर सागर की मदमाती लहरें थीं, क्षितिज में जल और आकाश का मिलन दिखता था और स्थानीय निवासियों के प्रतिरोध ने कॉन्क्रीट का कद पेड़ों के ऊपर जाने नहीं दिया था। यहाँ प्रकृति अपने मोहक स्वरूप में अभी भी विद्यमान थी। बस यहीं आलोक का मन तनिक स्थिर हुआ, एक मकान किराये पर लिया, एक कमरे में अपना स्टूडियो स्थापित किया और चित्रकला में डूब गया, उन रंगों में डूब गया जिनके गाढ़ेपन में उसके भाव गहराते थे, जिनकी छिटकन स्मृतियाँ बन फैल जाती थी, मन को सम्मोहित कर लेती थी।

स्थानीय निवासियों को धीरे धीरे चित्रकला के इस दीवाने के बारे में ज्ञात हुआ, उत्सुकतावश ही सही, विचार विनिमय हुआ, संवाद हुआ, कई स्थानों पर उसे अपनी बात कहने के लिये बुलाया गया। संवेदनशीलों के संसार में आपका आनन्द बढ़ता ही है, आपकी प्रतिभा और सदाशयता कई और रूपों में बह जाना चाहती है, आपकी अभिव्यक्ति थोड़ी और मुखर हो जाना चाहती है। 'हमारा स्कूल' नाम की एक संस्था जो झुग्गियों में रहने वाले, निर्धन, समाज के दूसरे छोर पर त्यक्त अवस्थित समूह के बच्चों के विकास में हृदय से लगी थी, उनकी संचालिका ने आलोक को मना लिया, उन बच्चों को थोड़ी बहुत चित्रकला सिखाने के लिये, प्रत्येक रविवार।

नियत दिन आया, सारे बच्चे नहा धोकर आलोक की प्रतीक्षा कर रहे थे, उन बच्चों में ट्रक ड्राइवरों, निर्माण कार्य में लगे मजदूरों, घर मे काम करने वाली बाइयों, मछुआरों और वेश्याओं के बच्चे थे। संवाद खुला, 'मैं कलाकार हूँ और दिनभर बैठा बैठा चित्र बनाता रहता हूँ' आलोक ने परिचय दिया। सब ठहाका मार के हँस पड़े, 'अच्छा आप अभी तक चित्र बनाते हो, ऑफिस नहीं जाते हो?' एक बच्चा बोल पड़ा। आलोक ने धीरे से अपने द्वारा बनाये आधुनिक कला के कई चित्र सामने रख दिये, बच्चे उत्सुकता से देखने लगे। वे सारे चित्र जिन्हें कलाजगत में बड़ी उत्साहजनक टिप्पणियाँ मिली थीं, आज उन बच्चों के अवलोकन के लिये प्रस्तुत थे। सबने ध्यान से देखा, कुछ को कुछ भी समझ नहीं आया, कुछ को कुछ समझ आया, कुछ ने कुछ समझने जैसी आँखें सिकोड़ीं और अन्त में एक ने कह ही दिया कि यह तो बड़ा गिचपिच सा लग रहा है।

'जब आप बनाते हो तो अच्छा लगता है, जब हम बनाते हैं तो अच्छा ही नहीं बनता है।' एक बच्ची बोली। 'पर मैं तो बस आपकी तरह ही बनाता हूँ' आलोक ने समझाया। 'अच्छा आप इतने बड़े हो गये हो और अभी तक हमारी तरह ही बनाते हो' कहीं से आवाज़ आयी। आलोक के अहं को इतनी ठेस आज तक नहीं पहुँची थी। आलोक ने घर आकर अब तक के एकत्रित आर्ट पेपर, रंग, ब्रश आदि इकठ्ठा किये और अगले दिन वहाँ पहुँचा। हर एक बच्चे के सामने एक आर्ट पेपर था, सब शान्त बैठे थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या बोलें, क्या करें?

'यदि हम अच्छा नहीं बना पाये तो, यदि यह पेपर खराब हो गया तो?' उनकी आँखों के प्रश्न वाक्य का रूप पा गये। 'अच्छा क्या होता है?' बिल्कुल शान्ति, 'बुरा क्या होता है?' और भी सन्नाटा। आलोक ने एक पेपर उठाया, उनके साथ बैठ गया और हाथों में चारकोल लेकर अपना ही स्केच बनाने लगा। सब उसे घेरकर खड़े हो गये और ध्यान से देखने लगे, आलोक इतनी एकाग्रता से लगा था कि मानो अपने आलोचकों के गढ़ में जाकर उन्हें प्रभावित कर रहा हो। आकृति उभरी, गंजा सर, गोल चश्मा और एक टीशर्ट। 'अहा, यह तो गाँधीजी लग रहे हैं, टीशर्ट पहने।' छह वर्ष का करन सहसा बोल उठा। बच्चों का धैर्य बह निकला, सब चित्र बनाने में लग गये, जिसे जो भी सूझा, जैसे भी सूझा। आलोक देखकर मुदित होता रहा, बच्चे कागज पर अपने बचपन के रंग बिखेरते रहे।

आलोक ने सारे चित्र दीवार पर लगा दिये, अपने चित्र के साथ ही। 'अब बताओ कि इनमें सबसे खराब कौन सा लग रहा है?' आलोक ने पूछा। सब मौन, कई बार कहने पर सबने अन्ततः एक चित्र निकाला। आलोक ने वह चित्र सामने वाली दीवार पर लगा दिया और पूछा कि अब बताओ कि अब कैसा लग रहा है? 'अब तो यह भी अच्छा लग रहा है', कई बच्चे बोल पड़े। बच्चों को समझ नहीं आ रहा था कि यही चित्र जब सबके साथ था तो खराब लग रहा था, अकेला लगा दिया तो अच्छा लग रहा है।

'बच्चों, तुम लोग भी जब स्वयं को भीड़ के साथ रखते हो तो स्वयं को कमतर समझने लगते हो, कभी कम धनी समझते हो, कभी कम भाग्यशाली समझते हो, कभी कम सुन्दर समझते हो। जब स्वयं को भीड़ से अलग रखकर देखोगे, स्वयं को दर्पण में जाकर देखोगे तो तुम्हें भी स्वयं पर गर्व करने के ढेरों कारण मिल जायेंगे।' आलोक ने व्याप्त संशय दूर कर दिया। सब मुस्करा उठे, बस एक छुटका नहीं, वह थक कर सो चुका था। सारे बच्चे आज स्वयं पर एक नया विश्वास लेकर घर पहुँचेगे, सबके चेहरे पर गजब का आत्मसन्तोष झलक रहा था।

हर सप्ताह बच्चे बड़ी आतुरता से अपने टीशर्ट वाले गाँधीजी से मिलने की प्रतीक्षा करते हैं, उन्हें चित्रकला भी अच्छी लग रही है और स्वयं का समझना भी, हर बार उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा है। आलोक को भी रविवार की प्रतीक्षा रहती है। एक दिन संचालिका ने आलोक से उसकी फीस के बारे में पूछा, आलोक ने मुस्कराते हुये कहा कि उसकी फीस बच्चों से मिल जाती है। आश्चर्य से संचालिका ने कारण पूछा।

'मैं कई नगरों में कार्यशालायें आयोजित करता हूँ, सबको एक चित्र बनाने को देता हूँ, आधे समय के बाद सबके चित्र आपस में बदल देता हूँ और एक दूसरे के चित्र पूरे करने को कहता हूँ। नगर के बच्चे कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, हमारा चित्र आपने दूसरे को कैसे दे दिया, हमने इतनी मेहनत से बनाया था? ठीक उसी तरह जिस तरह आधुनिक मैनेजर अपनी योजनाओं से चिपका रहता है, अपनी उपलब्धियों से चिपका रहता है, दूसरों के कार्य उसके लिये महत्वहीन हों मानो। और इन बच्चों को देखो, इन्होने आज तक कभी कोई शिकायत नहीं की है, इन्हें जो भी, जैसा भी, आधा अधूरा चित्र दे दो, उसे भी अच्छा बनाने में लग जाते हैं। काश हम सब भी अन्य की कृतियों और कार्यों के प्रति यही भाव रखें, सब विशिष्ट हैं। मैं हर बार इनके पास बस यही सीखने आता हूँ और यही मेरा पारिश्रमिक भी है।' आलोक प्रवाह में बोलता जा रहा था।

आलोक वहाँ हर रविवार जाता है, सब सोचते हैं कि आलोक उन्हें कला सिखाने जाता है, पर यह केवल आलोक ही जानता है कि वह वहाँ बच्चों से क्या सीखने जाता है?



(यह कहानी जेन गोपालकृष्णन ने अंग्रेजी में वर्णित की है और सर्वप्रथम 'चिकेन सूप फॉर सोल - इंडियन टीचर' में प्रकाशित हुयी है। आलोक और जेन के प्रति आभार)

26.9.12

बच्चों का जीवन

'ऐसी क्या चीज है, जो आपको तो नहीं मिलती है पर आपसे उसकी आशा सदैव की जाती है', आलोक ने बच्चों से पूछा। इज्जत या आदर, उत्तर मिलने में अधिक देर नहीं लगी, और बहुत बच्चों ने यह उत्तर दिया। उत्तर सही भी है, बच्चे के दृष्टिकोण से देखें, उससे सदा ही आशा की जाती है कि वह अपने माता-पिता, गुरुजनों और अग्रजों का आदर करे, पर उसे सदा ही अनुशासनात्मक, उपदेशात्मक और प्रताड़ित करते हुये से आदेश मिलते हैं। किसी के जीवन में इसकी मात्रा कम रही होगी, किसी के जीवन में अधिक, पर भूला तो कोई भी नहीं होगा। बच्चों के लिये अन्याय और अनादर भूलना बहुत कठिन होता है। झाँसी प्रवास के समय हमारे पुत्र की पूरी कक्षा को किसी एक की उद्दण्डता के लिये दण्ड मिला, बहुधा शान्त से रहने वाले हमारे सुपुत्र जी इसको पचा नहीं पाये और बहुत क्रोधित हुये। क्रोध तो धीरे धीरे शान्त हो गया पर उनकी स्मृति में उन अध्यापक के प्रति एक निम्न धारणा बन गयी। ऐसी चीजें भूलना कठिन भी होती हैं, जहाँ जहाँ मुझे बिना मेरी भूल के डाँट या मार पड़ी है, वे सारे स्थान, व्यक्ति और घटनायें स्पष्ट याद हैं। बड़े होने के बाद बहुत से अन्याय या तो भूल गया हूँ या क्षमा करता आया हूँ, पर बचपन के नहीं भूलते हैं, न जाने क्यों?

आलोक चित्रकार हैं, मित्र हैं और गोवा में रहते हैं। बच्चों के विषय में अत्यन्त संवेदनशील है और बच्चों के उन्मुक्त विकास के बारे में अद्भुत विचारों से परिपूर्ण भी। जो तथ्य उसको सर्वाधिक कचोटता है कि किस प्रकार हम समाज के रूप में अपनी ही क्षमताओं और संभावनाओं का हनन करते रहते हैं, बचपन से अब तक। हम कैसे अपने बच्चों के प्रति अति अतिसंरक्षणमना हो जाते हैं, उसकी राह की दोनों ओर दीवार बनाते हुये चलते हैं और अपनी इस मूढ़ता को सफलता मानकर प्रसन्न भी हो लेते हैं। आलोक की माने तो बच्चे प्राकृतिक रूप से चित्रकार होते हैं, सबसे अच्छे, उनके हाथ में रंग और ब्रश पकड़ाकर देखिये बस, उनकी अभिव्यक्ति पवित्रतम और सृजनतम होती है। धीरे धीरे वे बड़े हो जाते हैं, उनके ऊपर दायित्वों, कर्तव्यों और आकड़ों का बोझ डाल देते हैं हम सब, बड़ा होते होते वह सारी चित्रकला भूल जाता है।

यद्यपि आलोक बहुत अच्छे चित्रकार हैं पर उन्हें भी लगता है कि बड़े होने के प्रयास में वह थोड़ी बहुत चित्रकला भूल गये हैं। यही कारण है कि उन्हें बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। पहला कारण यह कि बच्चों के व्यवहार में कोई कृत्रिमता नहीं होती और दूसरा यह कि बच्चों के साथ रहने से हर बार उसे कुछ न कुछ सीखने को मिल जाता है, अपनी चित्रकला के लिये, अपने व्यक्तित्व के लिये। आलोक नियमतः प्रत्येक रविवार सड़क पर रहने वाले या अतिनिर्धनता में जीवन यापन करने वाले बच्चों को चित्रकला सिखाते हैं, एक संस्था के लिये, मुफ्त में। यही नहीं, आलोक उस संस्था के प्रति कृतज्ञ भी रहते हैं क्योंकि उनका कहना है कि हर बार वह उन बच्चों से कुछ सीख कर ही जाते हैं। हम सब पर भी यही नियम लागू होता है, जब कभी भी आपके पास विचारों की कमी हो या विचारों के प्रवाह में स्तब्धता हो, तो बच्चों को देखिये, बच्चों के साथ समय बिताइये, बच्चों से सीखिये।

उपरोक्त प्रश्न, ऐसी ही एक कक्षा के समय पूछा था आलोक ने। प्रश्न अच्छा खासा समझा हुआ था और उत्तर अन्ततः वहीं पर जाना था। बच्चों की तार्किक क्षमता को कमतर समझने की हमारी मानसिकता को झटका तब लगता है जब बच्चे सीधा और अन्तिम उत्तर दे देते हैं। उत्तर इतना सटीक और बहुतायत में मिलेगा, यह आलोक के लिये भी आश्चर्य का विषय था। बच्चों से यह प्रश्न सीधे भी पूछा जा सकता था कि कौन आपको अच्छा लगता है, कौन नहीं। बच्चों के लिये अच्छा लगने या अच्छा न लगने का केवल एक ही मानक है, कि कौन उनके अस्तित्व का आदर करता है या कौन नहीं।

इसके पहले कि इस विषय में प्रतिप्रश्न खड़े हो जायें, इस बात को स्पष्ट कर देता हूँ कि अनुशासन और अनादर में अन्तर है। पारिवारिक अनुशासन आवश्यक है और वह बड़ों को अपने आचरण से स्थापित करना होता है, बच्चों को श्रम का गुण सिखाना हो तो स्वयं भी खटना होता है। अनुशासन का यह स्वरूप आदर के साथ संप्रेषित होता है। कुछ स्वयं न करें और स्वयं को बच्चों को थोप दें, यह अनुशासन तो है पर अनादर के साथ। अनुशासन के अतिरिक्त बहुत से ऐसे निर्णय होते हैं जिनमें हम अपने बच्चों की चिन्तन प्रक्रिया को मान नहीं देते हैं, उनके उत्साह को अपने अनुभव से ढकने का प्रयास करते हैं। निश्चय ही बड़ों ने अधिक जीवन जिया है और उनके अन्दर अपने बच्चों के योगक्षेम की भावना भी अधिक है, पर उस अनुभव से और उस प्यार से बच्चों की निर्णय प्रक्रिया को बल मिले, न कि अनादर।

आलोक बचपन से ही चित्रकार बनना चाहता था, उसे घर में थोड़ा प्रतिरोध और बहुत सहयोग मिला, उसके निर्णय को आदर मिला, उसने अपना जीवन बचपन से ही स्थापित दिशा में बढ़ाया। जब बचपन से ही आपके अस्तित्व को सम्मान मिलता है, लाड़ दुलार से थोड़ा अधिक गंभीर, तो जीवन जीने का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। निर्णय तो देर सबेर लेने ही होते हैं, यदि आप बचपन में नहीं लेंगे तो बड़े होकर आपका पीछा करेंगे। अपने निर्णय लेने से साहस बढ़ता है। कई मित्रों को जानता हूँ जो अभी भी स्वतन्त्र निर्णय लेने में घबराते हैं, दूसरे का मुँह ताकने लगते हैं। माता पिता के रूप में हम उनके शुभचिन्तक अवश्य हो सकते है, उन्हें अपने अनुभव व ज्ञान के आधार पर समुचित सलाह भी दे सकते हैं, पर निर्णय बच्चों को ही लेने देना हो। अपने लिये निर्णयों में मन खपा देने की ऊर्जा आ जाती है बालमनों के अन्दर।

वहीं दूसरी ओर अपना बचपन देखता हूँ तो निर्णय लेने की सारी स्वतन्त्रता थी, छात्रावास में रहने से निर्णय-प्रक्रिया समय के पहले ही पक गयी। कभी कभी बच्चों से विनोद में पूछता हूँ कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं तो वे उल्टा प्रश्न ही दाग देते हैं, कि आपके पिताजी आपको क्या बनाना चाहते थे? जब कहता हूँ कि मुझे पूरी स्वतन्त्रता थी निर्णय लेने की कि मैं क्या बनना चाहता हूँ, तो उन्हें बड़ा अच्छा लगता है कि घर में बच्चों का अधिकार न हड़पने की परम्परा है। अगला प्रश्न और पेचीदा होता है, कि आपको जब छूट थी और आपने जो चाहा, वह बन भी गये तो अब लैपटॉप के आगे बैठकर लिखते क्या रहते हो? स्मृतियाँ सामने घूम जाती हैं और मैं बच्चों को मन का सच बता देता हूँ।

स्वतन्त्रता थी और मन में इच्छा गणितज्ञ बनने की थी, गहरी रुचि भी थी गणित में, सवालों और अंकों से मित्रता सी रहती थी। यदि और अधिक नहीं सोचता तो निश्चय ही किसी विश्वविद्यालय में गणित की गुत्थियाँ सुलझा रहा होता, अंकों की भाषा विद्यार्थियों को सिखा रहा होता। आईआईटी में प्रवेश भी मिल गया और तब वह समय आया जब यह निर्णय करना था कि अन्ततः क्या करना है? जब निर्णय लेने की स्वतन्त्रता मिलती है तो व्यक्ति समय के पहले ही प्रौढ़ हो जाता है, माता-पिता ने जब बालमन को यह आदर दिया तो बरबस ही मन यह जानने लग गया कि भला माता-पिता क्या चाहते हैं? एक बार उनके मन की जानी तो मन ने निश्चय कर लिया कि सिविल सेवा में जाना है, सफलता मिली और रेलवे में आना हुआ, कार्य में मनोयोग से लगे भी हैं। बहुत पहले से लेखन भी होता था, अब धीरे धीरे लेखन में मन लगने लगा है, अंकों से खेलने वाला बालमन अब शब्दों के अर्थ समझ रहा है, और अब तो यह भी पता नहीं कि अभी अस्तित्व के कितने खोल उतरने शेष हैं?

बच्चों के आँखों में चमक तो आयी पर उसका अर्थ मुझे समझ न आया। उन्हें आलोक की भी कथा ज्ञात है, आलोक ने बचपन में एक निर्णय लिया और उसमें अपना जीवन पहचान भी चुका है। मैं अब भी निर्णयों के कई मोड़ों से होकर निकल रहा हूँ, चल रहा हूँ और स्वयं को चलते देख भी रहा हूँ। बच्चों को ज्ञात है कि उन पर कोई निर्णय थोपा नहीं जायेगा, जब भी लेंगे, जो भी लेंगे, वह उनका अपना निर्णय होगा। उनकी आँखों में कोई निर्णय लेने की शीघ्रता भी नहीं है, वे दोनों ही अभी अपने बचपन का आनन्द उठाने में व्यस्त हैं।

उनके प्रति हमारा व्यवहार अनुशासनप्रद भी रहेगा और आदरयुक्त भी, हमारे हाथ इतने दूर भी रहेंगे कि उन्हें दौड़ने में बाधा न हो और इतने पास भी कि गिरने पर उन्हें सम्हाल सकें।