29.9.10

नखरे सहने का गुण

कुछ लोगों की सहनशक्ति अद्भुत होती है। उनका अन्तस्थल इतना गहरा होता है कि छोटी मोटी हलचल कहाँ खो जाती है, पता ही नहीं चलता है। वाक्यों की बौछार हो या समस्या का प्रहार, मुखमण्डल में प्रखर साम्य स्थापित। उनसे इतना सीखता रहा जीवन भर कि अब तो दर्पण के सामने खड़े होकर स्वयं को पहचान नहीं पाता हूँ। जीवन जीने में वह गुण अधिक प्रयोग हुआ हो या न हुआ हो पर एक क्षेत्र में यह गुण सघनता से उपयोग में आया है, वह है नखरे सहने में। अब तो बड़े बड़े नखरे पचा ले जाता हूँ, बिना तनिक भी विचलित हुये। 

सहजीवन की एक कला है, यह नखरे सहने का गुण। कभी बच्चों के, कभी उनकी माँ के, कभी समाज के कर्णधारों के, कभी यशदीप के तारों के। यह अपार सहनशक्ति यदि जल बन सागर में प्रवाहित हो जाये तो केवल मनु ही पुनः बचेंगे, वह भी हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, भीगे नयनों से प्रलय-प्रवाह देखते हुये। 

जब तक हमारी नखरे सहने की कुल क्षमता, नखरे करने वालों की क्रियाशीलता से अधिक रहती है, परिवेश में शान्ति बनी रहती है। जैसे ही सहनशक्ति क्षरित होने लगती है, हुड़दंग मचने लगता है। दो कार वाले सम्पन्न जीव, बेकार सी बात के लिये, साधिकार द्वन्दयुद्ध में उद्धृत दिखाई दे जायेंगे। परिवेशीय संतुलन का यह विशेष गुण शान्तिप्रिय जनों की अन्तिम आशा है, जीवन में स्थायित्व बनाये रखने के लिये। अभ्यास मात्र से यह गुण कितना भी बढ़ाया जा सकता है। अपने अपने जीवन में झाँककर देखिये तो आपको यह तथ्य सिद्ध होता दिख जायेगा।

नखरे सहने का गुण पर इतना परमहंसीय भी नहीं है। प्रेम के समय नखरों को क्षमता से अधिक सहन करने का क्रम अन्ततः किसी विस्फोट के रूप में निकलता है। नेताओं के नखरे पाँच वर्षों बाद सड़कों पर निरीह खड़े दिखते हैं। नखरे न केवल सह लेना चाहिये वरन उसे पचा भी ले जाना चाहिये, सदा के लिये। जो नहीं पचा पाते हैं, विकारग्रस्त होने लगते हैं, धीरे धीरे। इस गुण को या तो कभी न अपनायें या अपनायें तो उस पर कोई सीमा न रखें। बस सहते जायें नखरे उनके, एक के बाद एक, निर्विकार हो।

नखरे सहने के गुण में प्रवीणता पाने के लिये नखरे करने वालों की भी मनोस्थिति समझना आवश्यक है। अपने एक गुण के आधार पर पूरा व्यक्तित्व ढेलने के प्रयास को नखरे के रूप में मान्यता प्राप्त है। यदि प्रेमी बहुत सुन्दर हो तो उसके विचार, उसके परिवार, उसके बनाये अचार, सभी की प्रशंसा आपका कर्तव्य है। एक भी क्षेत्र में बरती कोताही का प्रभाव व्यापक और त्वरित होता है। यदि कोई बड़ा नेता बन गया, किसी भी कारण से, तो उसके व्यवहार का अनुकरण और उसके प्रति बौद्धिक समर्पण दोनों ही आपके लिये आवश्यक है। व्यक्तित्व के प्रति पूर्ण समर्पण ही नखरे सह लेने की योग्यता का आधार स्तम्भ है।

आत्मज्ञान जहाँ एक ओर आपकी सहनशक्ति बढ़ाता है वहीं दूसरे पक्ष की क्रियाशीलता कम भी करता है। भारत में आत्मज्ञानी साधुओं और गृहस्थों की अधिक संख्या, विश्वशान्ति के प्रति हमारी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं।

नखरे सहने में और मूर्खता करने में कुछ तो अन्तर हो। नखरे सहते सहते स्वयं ही कश्मीर बना लेना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? नखरे सहने की राह सदा ही मूर्खता के गड्ढों से बचा कर रखें, हम सब। कभी न कभी तो दो टूक उत्तर का भी स्थान हो हमारे वचनों में।

25.9.10

जाति क्या है?

बड़ा सरल प्रश्न है। इस पर जब इतना कहा जा चुका है, इस पर जब इतना सहा जा चुका है, तब पूछने का औचित्य? राजनीति में जाना है या समाज को बाटने की एक नयी विधि का श्रेय लेना है? नहीं, तब क्या बौद्धिकता में खुजली हो रही है जो इतना विवादास्पद विषय उठा रहे होयह एक ऐसा शब्द है, जिसे सुन बहुतों की भृकुटियाँ तन जाती हैं पर मेरा वचन है, कुछ भी ऐसा न लिखने का, जिससे किसी को ठेस पहुँचे।

मेरे परम मित्र हैं, श्री लक्ष्मण सिंह। उनके पिताजी न्यायिक सेवा में ऊँचे पदस्थ रहे, घर में सुसंस्कृत संस्कार। सेवा की अनिवार्यताओं के कारण आम समाज से थोड़ा अलग रहा उनका प्रारम्भिक जीवन। युवक होने तक जाति जैसे किसी शब्द के सम्पर्क में नहीं आयी उनकी विचारधारा। उन्हें अटपटा लगना तब प्रारम्भ हुआ, जब जाति जैसी उपाधि के नाम पर समाज की ऊर्जा को कई दिशाओं में भटकते देखा। मेरा अनुभव भले ही कमलपत्रवत न रहा हो पर मुझे भी सदैव ही जाति के प्रसंग पर चुप रहना श्रेयस्कर लगा है। पता नहीं आज क्यों लिखने की ऊर्जा जुटा पा रहा हूँ?
  
कोई भी ऐसी विचारधारा जिसमें बाटने के बीज छिपे हों, लक्ष्मण सिंह जैसे व्यक्तियों को दुख देगी।

तब क्या विविधतायें न हों जगत में?

विविधतायें हों, उनकी नग्नता न हो। विविधतायें भी शालीन स्वरूप धरे रह सकती हैं।

समृद्धि के समय विविधतायें बाग में खिले हुये पुष्पों की भाँति होती हैं, सबका अपना महत्व, सबकी अपनी प्रसन्नता। जब संसाधन कम पड़ते हैं और विपत्ति आती है, तब यही अन्तर शूल की भाँति हृदय में चुभने लगता है। किसी की उपलब्धि को उसको दी हुयी उपाधि से जोड़कर देखा जाने लगता है, उसी उपाधि को अपने कष्ट का कारण बनाकर विचार प्रक्रिया में रोपित कर दिया जाता है। अपने दुख का कारण अपने भीतर न ढूढ़कर दूसरे की उपाधियों में ढूढ़ने का प्रयत्न होने लगता है। समूह बनने लगते हैं, उनकी स्तुतियाँ होने लगती हैं, अपना तुच्छ भी उनके श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर लगता है।

जो भी पौराणिक कारण हो पर हर समूह की अपनी स्वस्थ परम्परायें होती हैं और अपने हिस्से की दुर्बलतायें। विकासशील समूह अपनी दुर्बलताओं की निर्मम बलि देकर आगे बढ़ते जाते हैं और मानसिक, बौद्धिक व आर्थिक रूप से सुदृढ़ होते जाते हैं। जो उन्मत्त रहते हैं अपने इतिहास के महानाद से, उन्हे भविष्य की पदचाप नहीं सुनाई पड़ती है और समय के चक्र में उनके क्षरित शब्द ही गूँजते रहते हैं।

हमें यदि आपस में लड़ने का बहाना चाहिये तो दसियों कारण उपस्थित हैं। भाई भाई पर घात लगाये बैठे हैं। लड़ाके शेर मेमनों को किसी न किसी विधि से लील ही जायेंगे। हमें यदि अपनी विविधता संरक्षित रखनी है तो आपत्ति काल में उसे सुरक्षित रख, कौरव व पाण्डव न बन, 105 बन खड़े हों। होना यह चाहिये कि विपत्ति के समय हमें अपनी समानतायें उभारनी चाहिये, विपत्ति से जूझने के लिये। जब देश डूबा हो, समाज रुग्ण हो, तब भी हमें यदि अपने समूह का गुणगान करने का समय मिल जाये तो आश्चर्य होना चाहिये। जीत के बाद जब विजयोत्सव मनेगा, तब अपनी परम्पराओं के अनुसार आनन्द मनायेंगे हम सब, अपने अपने इष्ट पूजेंगे हम सब।

उद्गार एक कविता के माध्यम से बहा है,

नर-नारी की मान-प्रतिष्ठा, पाने नित अधिकार लड़ रही,
भाषा लड़ती, वर्ण लड़ रहे, बुद्धि विषमता ओर बढ़ रही ।
देश, प्रदेश, विशेष लड़ रहे, भौहें सकल प्रकार चढ़ रहीं,
नयी, पुरातन पीढ़ी, पृथक विचार, घरों के द्वार लड़ रही ।

धर्म लड़े, बन हठी खड़े हैं, उस पर भी अब जाति लड़ी है,
देखो तो किस तरह मनुज की, लोलुपता हर भाँति लड़ी है ।।

22.9.10

चार प्रभातीय अध्याय

वैवाहिक जीवन की सीमायें आपको बहुत अधिक बहकने नहीं देती हैं, किसी भी दिशा में। जब मुझे अपने मानसिक ढलान को रोकने के 21 दिवसीय प्रयास सफल होते दिख रहे थे, श्रीमती जी की आपत्ति, सीमा बना कर ठोंक दी गयी। आप तो स्वयं युवा होते जा रहे हैं, पर मेरा क्या? क्या करना है? सुबह सुबह टहलने चलते हैं फ्रीडम पार्क, साथ साथ, नित चार चक्कर, कुल 4 किलोमीटर, बस केवल 21 दिन के लिये। इतने निश्चय व आत्मविश्वास के सम्मुख मेरी कई व्यस्ततायें और तर्क ध्वस्त हो गये।

जब तेज चलने वाले को, किसी का साथ देने के लिये धीरे धीरे चलना पड़े तो शाऱीरिक व्यायाम तो असम्भव ही है पर मानसिक व्यायाम में कहाँ के पहरे लगे हैं? पिछले कई दिनों में चार चक्करों के मंथन में विचारणीय अवलोकन जन्म ले रहे हैं। आज सब के सब साथ में उपस्थित थे। आईये, एक एक कर के देखते हैं।

पार्क के बाहर ही एक खुले मैदान में टेन्ट लगा है। पर्युषण पर्व पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रवचन सुन रहे हैं। बाहर विविध प्रकार के व्यंजन मेजों पर सजे हैं, भण्डारे की तैयारी है। उन पर अलिप्त सी दिखने वाली संलिप्त दृष्टि डाल कर पार्क में टहलना प्रारम्भ कर देता हूँ। पहले चक्कर में श्रीमती जी की महत्वपूर्ण सी लगने वाली कई बातों पर हाँ, हूँ तो किया पर मन उसी भण्डारे पर टिका रहा। सुबह सुबह प्रवचन का इतना कैलोरिफिक उत्सव?

दूसरे चक्कर के प्रारम्भ में ही एक युवा युगल दिखता है, अविवाहित क्योंकि उनके चेहरे पर भविष्य को लेकर असमंजस स्पष्ट था। पिछले कई दिनों से नित अपनी समस्याओं के भँवर में डूबते उतराते दिख रहे हैं दोनों। प्रेम विवाह के इस उबड खाबड़ रास्तों से हम तो बचे रहे पर सुबह सुबह उन्हें वहाँ देख दो विचार ही मन में आये। पहला, घर में क्या बोल कर आते होंगे, संभवतः स्वास्थ्य बनाने। दूसरा, कितने भाग्यशाली हैं कि रात में एक दूसरे को स्वप्नों में निहार कर सुबह पुनः उसे मूर्त रूप देने में लग जाते हैं।

तीसरे चक्कर में एक विदेशी दिखते हैं, दौड़ लगा रहे हैं। यहाँ किसी बैठक में आये होंगे क्योंकि उन्हे पहली बार ही देखा है। दिन प्रारम्भ करने के पहले शरीर पर ध्यान देना एक गुणवत्तापूर्ण जीवन का पर्याय है। उन्हें देख कर हमारी भी दौड़ने की इच्छा बलवती हुयी पर तुरन्त अपनी भूमिका का भान होता है और हम अपनी चाल ढीली कर पुनः मानसिक व्यायाम में उतर जाते हैं। सुबह की दो विभिन्न गतियों पर मन बहुत देर तक खिंचा रहा।

चौथे चक्कर में, पाँच लड़कियों को देखता हूँ, पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ, सप्ताहान्त को छोड़कर। निश्चय ही आसपास के किसी कॉलेज से होंगी। कॉलेज खुलने से पहले का समय पार्क की शीतल हवा में व्यतीत करती हैं और कहीं बेंच पर बैठ कर या तो बातें करती हैं या कोई पुस्तक पढ़ती हैं। प्राकृतिक वातावरण में और सुबह की ग्राह्य वेला में समय का सुन्दर उपयोग। मुझे भी पुस्तक पढ़ना अच्छा लगता है सुबह सुबह पर श्रीमती जी के सामने उस विषय पर दी टिप्पणी व दिखायी गयी उत्सुकता घातक हो सकती थी अतः अन्यत्रमना से प्रतीत होते हुये टहलते रहे।

कारसेवा कर वापस आते समय तक भंडारा प्रारम्भ हो चुका था। कई पकवान दिख रहे थे। कदम ठिठके, सोचा कि घुल मिल लेते हैं क्योंकि चेहरे से पूरी तरह अहिंसक और निर्लिप्त जैनी लग रहे थे। आशाओं को अर्धांगिनी का समर्थन न मिलने से अर्धमना होकर रह गये।

घर पर पाँचवाँ अध्याय प्रतीक्षा में था।

ब्लॉगिंग का। हमें तो आपका ही सहारा है।

18.9.10

कटी पतंग से इश्किया तक

चालीस वर्षों में एक पीढ़ी दूसरी में पदोन्नति पा जाती है पर नहीं भुलाये जा पाते हैं वह अनुभव व भावनायें जो हम जी आये होते हैं। बहुत से गुदगुदा जाने वाले क्षणों में हमारे प्रेम की अवधारणा कहीं न कहीं छिपी रहती है। किसी व्यक्ति विशेष के लिये प्रेम की यह अवधारणा भले ही न बदले पर समाज में आया बदलाव भी आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता है। 1970 से 2010 तक, ये बदलाव क्या रंग लाये हैं, यदि देखना चाहें तो आपको मैं टहला लाता हूँ।

कटी पतंग नामक फिल्म आयी थी 1970 में। एक विधवा(कटी पतंग) के प्रति उमड़ता नायक का प्रेम व्यक्त होता है, एक गीत के माध्यम से। राजेश खन्ना आशा पारिख को नाव में बिठा कर ले जा रहे हैं और गा रहे है "जिस गली में तेरा घर न हो बालमा, उस गली से हमें तो गुज़रना नहीं"। पूरा गीत सुने तो भाव निकलेगें पूर्ण समर्पण व एकनिष्ठता के। आज भी जब कोई युवा नायिका वह गीत सुनती है तो स्वयं को सातवें आसमान में पाती है, जबकि वही गीत सुनकर युवा नायक स्वयं को सात कारागारों में घिरा पाता है।

इस वर्ष एक फिल्म आयी, इश्किया। इसमें भी एक विधवा के प्रति नायकों का प्रेम उमड़ता है, एक दूसरे गीत के माध्यम से। नसीरुद्दीन शाह व अरशद वारसी विद्याबालन को देख गाना गाते हैं "डर लगता है तनहा सोने में जी, दिल तो बच्चा है जी"। इस गीत के बोल दिल की असंतुलित, बच्चासम और कुछ भी कर जाने की प्रवृति पर केन्द्रित हैं। इस गाने को सुन भले ही नायिकायें उतना सहज न अनुभव करें पर नायकगण अपनी उन्मुक्तता दिल के बच्चेपन पर न्योछावर कर बड़ा स्वच्छन्द अनुभव करते हैं।

जिन्होने अपनी युवावस्था में कटी पतंग आधारित प्रेम अवधारणा अपनी मानसिकता में सजायी है, उन्हें इश्किया के विचार भाव छिछोरापन लगेंगे, वहीं आज की पीढ़ी को कटी पतंग जैसा समर्पण सम्पूर्ण-मूर्खता लगती है।

1970 में मेरा जन्म नहीं हुआ था और 2010 में हम प्रेम के अवस्था को पार कर गृहस्थी में बँधे हैं। इस प्रकार हम तो कोई भी छोर नहीं पकड़ पाये। पर कुछ वयोवृद्ध व कुछ उदीयमान ब्लॉगर अब तक इस पोस्ट की तह तक पहुँच चुके होंगे और करने के लिये टिप्पणी भी सोच ली होगी। उन्हीं का प्रकाश, प्रेम के इस अन्धतम में जी रहे हम अल्पज्ञों का ज्ञान बढ़ा पायेगा। कुछ व्यक्तित्व जो प्रेमजगत के अत्याधिपति हैं, निश्चय ही अल्पज्ञों के मार्गदर्शन में स्वतः आगे आयेंगे।

पता नहीं कि कौन सा सच आपके हृदय की धड़कन है?

आपके प्रेम की अवधारणा जिस पर भी ठीक उतरती हो आप वह गाना सुन लीजिये। दोनों के ही सुर उतने ही उखड़े हैं जितना इस काल में प्रेम पर विश्वास। मेरे गाने के पूर्व दुस्साहस को सराहने का फल मात्र है यह श्रवण। अपना बढ़ना बन्द करने के प्रयास में मैंने कुछ दिन पहले ये दोनों गीत मंच से गाये थे। जब गीत चयन कर रहा था तब यह आशा नहीं थी कि मैं प्रेम के दो छोरों में, सारे सुनने वालों को बाँधने का प्रयास कर रहा हूँ।


जिस गली में तेरा घर न हो बालमा


दिल तो बच्चा है जी

15.9.10

धन घमंड अब गरजत घोरा

मुझे कई दिनों से एक बात कचोट रही थी कि किसी धनवान का धन उसकी सामाजिकता को किस तरह प्रभावित करता है? स्वयं का अनुभव मध्यमवर्गीयता का प्रबल आस्वादन मात्र ही रह पाया। कई धनवान मित्र हैं पर धन को लेकर न मेरी जिज्ञासा रही और न ही उनका खुलापन। किसी धनाढ्य से उसके धन के बारे में पूछना थोड़ा आक्रामक सा प्रतीत होता है और धनाढ्य का स्वयं ही बता देना उस परिश्रम को एक सार्वजनिक स्वरूप दे देना होगा जिससे वह धन अर्जित किया गया है।

धन को साधन के रूप में स्वीकार करने से तो यह लगता है कि धन की मात्रा बढ़ने से सामाजिकता भी बढ़नी चाहिये। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो होता विपरीत ही है। धन के द्वारा लोगों का सामाजिक विस्तार सिकुड़ते ही पाया है।

और अधिक धन की आकांक्षा समय की उपलब्धता कम कर देती है जिससे सम्बन्ध सिकुड़ने लगते हैं। अधिक धन का होना व्यक्ति को समाज की एक विशेष श्रेणी में खड़ा कर देता है, जहाँ पर सामाजिकता कम और दिखावा अधिक होता है। धन चले जाने का या माँग लिये जाने का भय भी धनवान को अन्य वर्गों से दूर रखता है। इन तीन संभावित कारणों के बारे में जब किसी उत्तर पर नहीं पहुँच पाया तो निर्मम हो एक से यह प्रश्न पूछ ही बैठा।

"क्या आपको लगता है कि यदि कोई आपसे बात करने आता है तो उसे केवल आपके धन में रुचि है?"  प्रश्न रूक्ष और आहत करने वाला था और मैं उत्तर की अपेक्षा भी नहीं कर रहा था। असहज उत्तर मिला कि नहीं, ऐसा नहीं है। जो भाव शब्द छिपाना चाह रहे थे, मुखमण्डल ने उन्मुक्तता से बिखेर दिये। ऐसा नहीं है कि धनाढ्य के अतिरिक्त, धन का उल्लेख किसी और को विचलित नहीं करता है। मध्यमवर्गीय के मन में यदि धन घुल गया तो उसका, उसके परिवार का और उसके समाज का विस्तार उस धनाक्त मानसिकता में तिरोहित हो जाता है। निर्धन के लिये तो सदैव ही धन एक चाँद सितारे के उपमानों से कम नहीं है जीवन में।

कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय,
वा खाये बौराय जग, वा पाये बौराय।

जब पहली बार पढ़ा था यह दोहा तो उतना जीवन्त नहीं लगा था यमक अलंकार का यह उदाहरण। अनुभव के मार्गों में पर इस दोहे को नित्य जीवन पाते देखा है। बौराने की स्थिति में सम्बन्धों का भार उठाना बड़े झंझट का कार्य लगता हो संभवतः। बौराने की स्थिति में सामाजिकता के विस्तार की बात तो दूर, समाज पर ही भार बन जाता है व्यक्ति।

स्वयं का अनुभव इस जीवन में मिल पाये, इतनी प्रतीक्षा न कर पाऊँगा, उत्तरों के लिये। किसी लक्ष्मीपति से इस प्रश्न का उत्तर मिले तो अवश्य बताईयेगा। लक्ष्मीवाहनों से इस विषय पर चर्चा कर अब अपना समय व्यर्थ नहीं करूँगा। आपके लिये भी यही सलाह है।

11.9.10

खबर पक्की है, दुर्दशा जारी है

रेलवे का कलेवर आपको बाहर से सरकारी दिख सकता है पर किसी मल्टीनेशनल की भाँति हमारे अन्दर भी लाभ हानि का भाव कुलबुलाता रहता है। जहाँ पिछले वर्षों की तुलना में उच्च प्रदर्शन प्रसन्नता देता है वहीं निम्न प्रदर्शन उन कारणों का पता लगाने को प्रेरित करता है जो प्रगति में बाधक रहे। वैसे तो हर विभाग के मानक आँकड़े भिन्न हैं पर अन्ततः निष्कर्ष आर्थिक आकड़ों से आँके जाते हैं।

बात झाँसी मण्डल की है, आज से दो वर्ष पहले की। वाणिज्य विभाग का मुखिया होने के कारण एक बैठक में पर्यवेक्षकों के साथ विभिन्न खण्डों की आय पर परिचर्चा कर रहा था। पिछले वर्ष की तुलना में कम आय दिखाने वाले एक दो पर्यवेक्षकों की खिचाई हुयी। उसके बाद प्रफुल्लित मन से लाभ देने वाले खण्डों पर दृष्टि गयी तो झाँसी-महोबा-बाँदा-मानिकपुर खण्ड की आय में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि थी। सड़कों की बुरी स्थिति व बसों का तीन-चार गुना किराया कारण तो थे पर ऐसी स्थिति तो कई वर्षों से थी। कुछ अवश्य ही अलग कारण था इस वर्ष। पर्यवेक्षक से पूछने पर आशा थी कि वह अपने प्रयासों के विशेष योगदान की स्तुतियाँ गायेगा पर जब उस संवेदनशील ने बोलना प्रारम्भ किया तो उसके नयन आर्द्र थे और गला रुद्ध। वार्ता का सार यह था।

इस वर्ष गाँव के गाँव दिल्ली और पंजाब की ओर पलायन कर रहे हैं। केवल वृद्ध रह गये हैं घरों की रखवाली के लिये। पशुओं को छोड़ दिया गया है अपना चारा ढूढ़ने को, इस आशा में कि वे स्वयं को जीवित रख सकेंगे पालकों के वापस आने तक। दिल्ली में नये निर्माण में व पंजाब में खेतों में काम मिलने का आसरा है इनको। खेत धूप की तीव्रता सह सह चटक चुके हैं। न कोई गुड़ाई करने वाला, न उन पर बनी मड़ैया से उन्हें ममतामयी दृष्टि से निहारने वाला, न बैलों के गले बँधे घुँघुरुओं की छन-छन, न पेड़ के नीचे कोई सूखी रोटी प्याज-नमक के साथ खाने वाला। जमीन के लिये जान लेने और देने की बातें करने वाले, अपनी अपनी जमीन को त्यक्तमना छोड़ पलायन कर गये हैं। पिछले दो वर्षों से आँखें आसमान पर टिकाये रहने से थक गये निवासी अपने लिये नयी छत ढूढ़ने समृद्धदेश चले गये हैं। जल स्तर भी मुँह मोड़ पाताल में समा गया। तालाब कीचड़ का संग्रहालय बन गये हैं।

उल्लिखित खण्ड उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश को दसियों बार काटता है। मानचित्र पर लकीर खीचते समय तो कई बारीकियों के कारण खिचपिच मचा चुके लोग, यहाँ के निवासियों की दुर्दशा को मानसूनी कारण का कफन उढ़ा चुके हैं। आल्हा ऊदल की नगरी और तालों का नगर कहे जाने वाले महोबा में जब पानी के टैंकरों से पानी लूटने में हत्यायें होते देखता हूँ तो सारा अस्तित्व ही सिहर उठता है। यही स्थिति रही तो गाँव के साथ साथ नगर भी त्यक्त हो जायेंगे। जब तक दुर्दशा रहेगी, आय में वृद्धि रहेगी। जब दुर्दशा पूर्ण होगी तब न कोई जाने वाला रहेगा और न ही कुछ आय होगी।

बढ़ी हुयी आय के पीछे एक समग्र दुर्दशा देखकर मन चीत्कार कर उठा। कुछ बोल नहीं सका, आँख बन्द कर बैठा रहा। मेरे स्वभाव से परिचित सभी पर्यवेक्षक भी बिना कुछ बोले कक्ष से चले गये। घर आकर बिना कुछ खाये ही भारी पलकें नींद ले आयीं।

कल कई ब्लॉगरों की संस्तुति पर "पीप्ली लाइव" देखने गया तो दो वर्ष पुराना घाव पुनः हरा हो गया। अपने बुन्देलखण्ड में वीरों के रक्तयुक्त इतिहास को अश्रुयुक्त भविष्य में परिवर्तित होते देख मन पुनः खट्टा हो गया।

कल झाँसी बात की, उस खण्ड की आय पूछी, आय अब भी बढ़ रही है।

आप भी दो आँसू टपका लें। खबर पक्की है, दुर्दशा जारी है।

8.9.10

माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं


जीवन में विधि ने लिख डाले, कुछ दुख तेरे, कुछ मेरे हैं,

जीना संग है, फिर क्यों मन में, एकाकी भाव उकेरे हैं ।

ढालो शब्दों में, बतला दो, पीड़ा आँखों से जतला दो,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।१।।

 

भटके हम दोनों मन-वन में,

पर बँधे रहे जीवन-क्रम में,

बन प्राण मिला वह जीवन को, 

घर तेरा है, सज्जित कर लो ।

क्यों सम्बन्धों के आँगन में, अब आशंका के डेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।२।।

 

निश्चय ही जीवन को हमने,

पाया तपते, मन को जलते,

क्यों पुनः बवंडर बन उठतीं,

मन भूल गया स्मृतियाँ थीं ।

आगन्तुक जीवन-सुख-रजनी, क्यों चिंता-स्याह घनेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।३।।

 

अति शुष्क हृदय है, यदि सुख की,

आकांक्षा रह रहकर उठती,

मन में क्यों दुख-चिन्तन आये,

मिल पाये नहीं जो सुख चाहे ।

अर्पित कर दूँगा सुख जो भी, आमन्त्रण से मुँह फेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।४।।

 

क्यों मन, आँखें उद्विग्न, भरी,

पड़ती छाया आगत-दुख की,

पहले क्यों शोक मनायेंगे, 

दुख आयेंगे, सह जायेंगे ।

तज कातरता निश्चिन्त रहो, मेरी बाहों के घेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।५।।

 

यहीं बसेरा हम दो कर लें, 

जीवन-घट, सुख लाकर भर लें,

और परस्पर होकर आश्रित, 

सुख-आलम्बन बन जायें नित ।

जीवन छोटा, संग रहने को, पल मिले नहीं बहुतेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।६।।


4.9.10

आओ, मैं स्वागत में बैठा हूँ

समय के पीछे भागने का अनुभव हम सबको है। यह लगता है कि हमारी घड़ी बस 10 मिनट आगे होती तो जीवन की कितनी कठिनाईयाँ टाली जा सकती थीं। कितना कुछ है करने को, समय नहीं है। समय कम है, कार्य अधिक है, बमचक भागा दौड़ी मची है।

समय बहुमूल्य है। कारण विशुद्ध माँग और पूर्ति का है। समय के सम्मुख जीवन गौड़ हो गया है। बड़े बड़े लक्ष्य हैं जीवन के सामने। लक्ष्यों की ऊँचाई और वास्तविकता के बीच खिंचा हुआ जीवन। उसके ऊपर समय पेर रहा है जीवन का तत्व, जैसे कि गन्ने को पेर कर मीठा रस निकलता है। मानवता के लिये लोग अपना जीवन पेरे जा रहे हैं, मानवता में अपने व्यक्तित्व की मिठास घोलने को आतुर। कुछ बड़ी बड़ी ज्ञानदायिनी बातें जो कानों में घुसकर सारे व्यक्तित्व को बदलने की क्षमता रखती हैं। उनको सुनने के बाद कहाँ विश्राम, एक जीवन कम लगता है उस पर लुटाने को। समय के साथ लगी हुयी है दौड़। जीवन की थकान को उपलब्धि का लॉलीपॉप। मानसिक सन्तोष कि आप के सामने गाँव की नहरिया नहीं, होटल ललित अशोक का स्वीमिंग पूल है। खाने को दाल रोटी नहीं, वाइन व श्रिम्प है। भूख, गरीबी, बेरोजगारी के मरुस्थल नहीं, विकास व ऐश्वर्य की अट्टालिकायें हैं। आप भाग रहे हैं समय के पीछे।

कभी कभी आनन्द व ध्यान के क्षणों में आपने अनुभव किया होगा कि समय रुका हुआ सा है। आप कुछ नहीं कर रहे होते हैं तो समय रुका हुआ सा लगने लगा। अच्छा लेख, कविता, ब्लॉग व पुस्तक पढ़ना प्रारम्भ करते हैं समय रुका हुआ सा लगता है, पता नहीं चलता कि छोटी सुई कितने चक्कर मार चुकी है। न भूख, न प्यास, न चिन्ता, न ध्येय, न आदर्श, न परिवार, न संसार। आपके लिये सब रुका हुआ। अब इतनी बार समय रोक देंगे तो जीवन को सुस्ताने का लाभ मिल जायेगा। प्रेम में पुँजे युगलों से पूछता हूँ कि क्या भाई ! मोबाइल पर 3 घंटे बतिया कर कान व गला नहीं पिराया? अरे, पता ही नहीं चला। सम्मोहन किसमें है? मोबाइल में है, प्रेमी में है, आप में है या होने वाली बात में है। विवाहित मित्र उचक के उत्तर देंगे, किसी में नहीं। वह समय कुछ और था, रुका हुआ लगता था अब तो लगता है बलात् कढ़ील के लिये जा रहा है।

सम्मोहन तो जीवन का ही है, समय का नहीं। जीवन जीने लगते हैं और समय नेपथ्य में चला जाता है। आकर्षण व्यक्तित्व का होता है, आयु का नहीं। महान कोई एक विचार बना देता है, बेचारी व्यस्तता नहीं।

मैं कल्पना करता हूँ कि मैं बैठा हूँ समय से परे, अपने अस्तित्व के एकान्त में। दरवाजे पर आहट होती है, आँखें उठाता हूँ। भंगिमा प्रश्नवाचक हो उसके पहले ही आगन्तुक बोल उठता है। मैं समय हूँ, आपके साथ रहना चाहता हूँ, आपकी गति से चलना चाहता हूँ, मुझे स्वीकार करें। पुनः माँग हुयी और पूर्ति भी, बस दिशा बदल गयी। जीवन समय से अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

काल की अग्नि में सबको तिरोहित होना है। मैं दौड़ लगा कर आत्मदाह नहीं करूँगा। अपना जीवन अपनी गति से जीकर आगन्तुक से कहूँगा।

" आओ, मैं स्वागत में बैठा हूँ "

1.9.10

मुरलीधारी मधुर मनोहर


मैं अपूर्ण, प्रभु पूर्ण-पुरुष तुम,

मैं नश्वर, प्रभु चिर-आयुष तुम ।

मैं कामी, प्रभु कोटि काम-रति,

मैं प्राणी, प्रभु सकल प्राण-गति ।

मैं भिक्षुक, प्रभु दानवीर हो,

मैं मरुथल, प्रभु अमिय-नीर हो ।

मैं प्यासा, प्रभु आशा गगरी,

मैं भटकूँ, प्रभु उत्सव-नगरी ।

मैं कुरूप, प्रभु रूप-प्रतिष्ठा,

मैं प्रपंच, प्रभु निर्मल निष्ठा ।

मैं बाती, प्रभु कोटि दिवाकर,

मैं बूँदी, प्रभु यश के सागर ।

मैं अशक्त, प्रभु पूर्ण शक्तिमय,

मैं शंका, प्रभु अन्तिम निर्णय ।

मैं मूरख, प्रभु ज्ञान-सिन्धु सम,

मैं रागी, प्रभु त्याग, तपोवन ।

मैं कर्कश, प्रभु वंशी सुरलय,

मैं ईर्ष्या, प्रभु प्रेम, प्रीतिमय ।

मैं प्रश्नावलि, प्रभु दर्शन हो,

मैं त्यक्या, प्रभु आकर्षण हो ।

मैं आँसू, प्रभु वृन्दावन-सुख,

मैं मथुरा, प्रभु गोकुल उन्मुख ।

मैं मदमत, प्रभु क्षमा-नीर नद,

मैं क्रोधी, प्रभु शान्त, शीलप्रद । 

मैं पंथी, प्रभु अंत-पंथ हो,

मैं आश्रित, प्रभु कृपावंत हो ।

 

मुरलीधारी मधुर मनोहर,

शापित शक्तिहीन सेवक पर,

बरसा दो प्रभु दया अहैतुक,

कृपा करो हे प्रेम सरोवर ।


28.8.10

21 दिवसीय महाभारत

21 दिन पहले मानसिक ढलान को ठहरा देने का वचन किया था, स्वयं से। वह वचन भी नित दिये जाने वाले प्रवचनों की तरह ही प्रभावहीन निकल गया होता यदि उसमें रॉबिन शर्मा की 21 दिवसीय सुधारात्मक अवधि का उल्लेख न होता। जिस समय 21 दिन वाले नियम का उल्लेख कर रहा था, खटका उसी समय लगा था कि कहीं अपनी गर्दन टाँग रहा हूँ। पहली टिप्पणी से ही पोस्ट का फँसात्मक पहलू उभर उभर कर सामने नाचने लगा। सायं होते होते पूरी तरह से लगने लगा कि प्रवीणजी आप नप चुके हैं, अब या तो 21 दिन बाद अपने वचन पालन न करने का क्षोभ सह लें या परिश्रम कर ससम्मान निकल लें। ब्लॉगजगत तो इसे भूल न पायेगा और पोस्ट तो लिखनी ही पड़ेगी। झूठ बोलना हो नहीं पायेगा क्योंकि वह आने वाली पोस्टों के हर शब्द को कचोटता रहेगा। निश्चय किया कि एक सार्थक प्रयास तो किया ही जा सकता है।

लगभग तीन वर्ष पहले जब रॉबिन शर्मा को पढ़ना प्रारम्भ किया था, उनकी सरल शैली व प्रभावी संदेश-सम्प्रेषण पर मुग्ध था। भारतीय संस्कृति के आधार पर विश्व के प्रखरतम साहित्य को कहानी का रूप प्रदान कर प्रस्तुत कर सकना कोई सरल कार्य नहीं। उनके नायकों के द्वारा शीर्ष पर पहुँचकर भी आध्यात्मिक निर्वात का अनुभव पुस्तकों को प्रथम पृष्ठ से ही रुचिकर बना देता है। युद्धक्षेत्र की जैसी स्थितियों में ज्ञान देने की प्रथा हमारी संस्कृति में पुरानी है। ऐसा ज्ञान समझ में भी बहुत आता है क्योंकि सुख में तो ज्ञान पाने का समय किसी के पास होता ही नहीं है।

उनकी सारी पुस्तकें पढ़ डालीं, विशुद्ध ज्ञान के रूप में। शरीर को तनिक भी पीड़ा देने की बात पर पृष्ठ पलटते पलटते स्वयं के ऊपर एक ऋण सा लगने लगा था। जब 21 दिन पहले स्वयं को घिरा पाया तो रॉबिन शर्मा के ऋण को अपने कर्म से उतारने का भार मेरे निश्चय को गुरुतर बना गया।

रणभेरियाँ बज चुकी थीं। मेरा रण द्वापरयुगीन महाभारत से 3 दिन अधिक का था। न सारथी कृष्ण, न धर्मराज युधिष्ठिर और न ही मेरा अर्जुन समान प्रशिक्षण। सम्मुख क्रूरतम शत्रु, मेरा मन। गीता के दो श्लोकों में इस शत्रु के बारे में जानकर कुछ और विश्लेषण करना शेष नहीं रह गया था। उपाय एक ही था, अभ्यास। हर कार्य उत्साह से करने का अभ्यास, हर कार्य नियमित करने का अभ्यास।

इस अवधि में नियमित शारीरिक श्रम किया। बैडमिन्टन कोर्ट में प्रकाश पादुकोन जैसा खेल न दिखा पाने की झुँझलाहट में मैकनरो जैसा स्वयं पर किया गया क्रोध मेरी आयु भले ही न कम कर पाया हो पर 21 दिनों में मेरे खेल के स्तर को उत्तरोत्तर बढ़ाता गया। बच्चों को अधिकाधिक समय देने से दिल तो सच में बच्चा जैसा अनुभव करने लगा। बिल्लियाँ और कुत्ते मेरे बदलाव से प्रसन्न होने के भाव अपनी मुद्राओं से व्यक्त करने में सक्षम दिखे। तीन फिल्में देखीं और एक पुस्तक पढ़ी। कार्यालय में प्रकल्पों को गति दी और दोनों बच्चों के विद्यालय गया अभिभावक बैठकों में भाग लेने।

दो घटनायें जो मानसिक ढलान को रोक देने की प्रक्रिया में अग्रणी रहीं, मात्र भाग्यवश ही इस अवधि में टकरा गयीं। पहली थी फूलों की प्रदर्शनी जिसमें सपरिवार जाकर मन प्रफुल्लित हो उठा और उनके सौन्दर्य व भाव सम्प्रेषण में कई दिनों तक अटका रहा। मन को सार्थक रूप से उलझा देने से उसके ऋणात्मक पहलू का उभरना कम होने लगता है और वह आपके आनन्द में मगन रहता है। दूसरी थी स्टेज पर जाकर तीन गाने गाने की घटना। वे गाने थे, फूलों के रंग से, ओ हंसिनी और किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार। गाना भले ही इंडियन आईडियल की तरह न गाया हो पर गाया पूरे मन से।

निर्णय कर लिया था कि एक एक दिन पूरा जीना है उत्साह के साथ। और जिया भी।

विजयोत्सव मनाने का समय नहीं है पर इतना आत्मविश्वास अवश्य आ गया है कि मानसिक ढलान पूर्णतया रोका जा सकता है।

धन्यवाद, खूँटी पर टाँगने वाले ब्लॉगर-शुभचिन्तकों को और रॉबिन भाई को।

जय हो। 

25.8.10

आपकी भी मूर्खता छटपटाती है?

बचपन में विद्वता का विलोम पढ़ा था, मूर्खता। ज्यों ज्यों अनुभव के घट भरता गया तो लगा कि शब्दकोष यदि अनुभव के आधार पर लिखा जाता तो संभवतः मूर्खता शब्द का इतना अवमूल्यन न होता। यह एक स्वनामधन्य शब्द है और एक गुण के रूप में आधुनिक समाज में विकसित हुआ है। मैं जानता हूँ, "शब्दों का सफर" मेरी खोज को महत्व नहीं देगा। मैं उद्गम और स्थान विशेष से सम्बन्ध ढूढ़ने से अधिक इस शब्द को जी लेने का पक्षधर हूँ। आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है आप भी इस शब्द को हृदयांगम करने के पश्चात ही इसके उपकारी पक्ष को समझ पायेंगे।

अनेक परिस्थितियों में मूर्खता के अश्वमेघ यज्ञ होते देख मेरे अन्दर की मूर्खता ने विद्रोह कर दिया। कहने लगी कि लोकतन्त्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है। आप हर बार विद्वता का सहारा लेकर अपने आप को सिद्ध करने में लगे रहते हैं और मुँह लटकाये घर चले आते हैं। संविधान के अनुच्छेद 14 का मान न रख पायें तो, मन बदलने के ही नाते मुझे भी एक अवसर प्रदान करें।

इतना आत्मविश्वास देख तो बहुत दिनों तक यह निश्चय नहीं कर पाया कि मूर्खता को विकलांगता की श्रेणी में रखा जाये या क्षमता की श्रेणी में। स्वार्थवश और सफलता की प्यास में डूबा मैं भी ढीला पड़ गया और मूर्खता को जीवनमंचन में स्थान प्रदान कर दिया। इतने दिनों के सयानेपन का हैंगओवर हटाने के लिये मूर्खता ने ही 6 सरल सूत्र सुझाये।

1. किसी के दुख को देखकर बुद्ध बने रहिये। मुख में विकार का अर्थ होगा कि आप विद्यता को भुला नहीं पा रहे हैं।

2. जब तक पूछा न जाये, स्वतःस्फूर्त प्रश्नों के उत्तर न दें। पूछने पर भी, समझने का समुचित प्रयास करते हुये से तब तक प्रतीत होते रहिये जब तक प्रश्नकर्ता स्वयं ही उत्तर न दे बैठे।

3. विश्व के ज्ञान का प्रवाह अपने ओर बहने दें। निर्लिप्त जो स्वतः ही धँस जाये, उसके अतिरिक्त कुछ भी लोभ न करें।

4. उत्साह सबका बढ़ायें, बिना ज्ञान दिये। ज्ञान देने में विद्वता और उत्साह न बढ़ाने में विरोध प्रकट होता है। विरोध भी विद्वता का दूसरा सिरा है।

5. न्यूनतम जितना करने से जब तक रोटी मिलती रहती है, खाते रहें।

6. जीवन के लक्ष्यों को अलक्ष कर दें। ये आपको शान्ति से बैठने नहीं देंगे।

अभ्यास से क्या संभव नहीं और जब मैंने स्वयं अनुभव कर जानने का निश्चय किया तो मूर्खता के अभ्यास का कष्ट भी सह लिया। वर्षों से अर्जित ज्ञान और अनुभव को एक काजल की डिबिया में बन्दकर सुरक्षित रख दिया था। आनन्द की अनुभूति इन सूत्रों के अनुपालन से बढ़ती गयी। मूर्खत्व की खोज में परमहंसीय जीवन हो गया आदि और अन्त से परे। कर्मठ प्राणी माया के पाश में छटपटाते दिखे।

ब्रम्हा की तरह ही एक प्रश्न मेरे मन में भी उठा कि हे भगवन मैं इस सुख में डूब गया तो सृष्टि कैसे चलेगी?

आकाशवाणी होती है,

बालक ! अपने मूर्खत्व की रक्षा कर।

और

बने रहो पगला,

काम करेगा अगला।

....

....

उठिये, उठिये, इण्टरसिटी से चलना है।

(हुँह, यह उमर है सपना देखने की। इतना मुस्कराते तो पहले कभी नहीं देखा। बच के रहना, सुबह का सपना सच हो जाता है। हो जाये तो?) चेहरा देख कर ऐसा लगा कि श्रीमती जी ने यही सोचा होगा।

मैं चला स्टेशन का निरीक्षण करने। आप एक डुबकी तो मारिये।

21.8.10

मेरे प्रिय - मोबाइल और हिन्दी

मोबाइल फोन शहीद होने की अनेक विधियों में एक और जोड़ने का न तो मेरा उद्देश्य था और न ही उसे पैटेन्ट कराने का मन है। मनुष्यों के साथ रहते रहते मोबाइल फोन भी जन्म-मृत्यु के चक्र से बिना भयभीत हुये अपने कर्म में रत रहते हैं। हमारे तीन वर्षों के दिन-रात के साथी को, जिन्हे श्रीमतीजी सौत के नाम से भी बुलाती थीं और जो बिल गेट्स के विन्डो-मोबाइल परिवार से थे, सदैव ही इस बात का गर्व रहेगा कि उन्होने अपने प्राण हमारे हाथों में कर्मरत हो त्यागे, न कि फैशन की दौड़ में हारने के बाद किन्ही पुरानी अल्मारियों में त्यक्तमना हो। आइये स्मृति में दो मिनट का मौन रख लें।

बैडमिन्टन में पूर्णतया श्रम-निमग्न होने के पश्चात कोर्ट से बाहर आता हूँ, फोन बजते हैं, वार्तालाप में डूब जाने के समय पता ही नहीं चलता है कि कान के ऊपर बालों से टपकती स्वेद की बूँदें फोन के मेमोरी स्लॉट से अन्दर जा रही हैं। दो मिनट के बाद वार्तालाप सहसा रुद्ध होने पर जब तक भूल का भान होता, स्वेद का खारापन मोबाइल फोन की चेतना को लील चुका था। यद्यपि अभी उन्हें चेतना में लाने का श्रम चल रहा है पर आशायें अतिक्षीण हैं।

प्रियतम मोबाइल के जाने का दुख, मोबाइल न होने से विश्व से सम्पर्क टूट जाने का दुख और शीघ्र ही नया मोबाइल लेने में आने वाले आर्थिक भार का दुख, तीनों ही दुख मेरे स्वेद में घुलमिल कर टपक रहे थे। आँसू नहीं थे पर घर आकर बिटिया ने बोल ही दिया कि खेल में हार जाने से रोना नहीं चाहिये।

ऐसे अवसरों की कल्पना थी और घर में एक अतिरिक्त मोबाइल रहता था पर अपनों पर होने वाली आसक्ति और विश्वास में हम बाकी आधार छोड़ इतना आगे निकल आते हैं कि हमें अतिरिक्ततायें भार लगने लगती हैं। पिछले माह भाई को वह मोबाइल दे हम भी भारमुक्त हो गये थे।

रात्रि के 9 बजे दो जन मॉल पहुँचते हैं, सेल्समानव भी अचम्भित क्योंकि मोबाइल हड़बड़ी में खरीदने की वस्तु नहीं। बड़ा ही योग्य युवक। पूछा किस रेन्ज में और किन विशेषताओं के साथ? हमने डायलॉग मारा कि रेन्ज की समस्या नहीं पर उसमें हिन्दी कीबोर्ड होना चाहिये। श्रीमती जी मन में यह सोचकर मुस्करा रहीं थी कि निकट भविष्य में उनका डायलॉग भी कुछ ऐसा ही होने वाला है। रेन्ज की समस्या नहीं पर उसमें डायमण्ड होना चाहिये।

मोबाइल पर लिये निर्णय पर बहस कुछ ऐसी थी।
  1. विन्डो मोबाइल के पुराने मॉडल लेने का प्रश्न नहीं। विन्डो फोन 7 आने में देर है पर उसमें भारतीय भाषाओं के कीबोर्ड का प्रावधान नहीं है। आइरॉन केवल विण्डो मोबाइल 6.1 तक ही हिन्दी कीबोर्ड उपलब्ध कराते हैं।
  2. आईफोन ने 37 भाषाओं के कीबोर्ड दिये हैं पर भारतीय भाषाओं को इस लायक न समझ कर भारत का दम्भयुक्त उपहास किया है।
  3. एन्ड्रायड फोन नये हैं। गूगल ने जो प्रयास सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने में किये हैं, उन्हें इन फोनों में आते आते समय लगेगा।
  4. सिम्बियानयुक्त नोकिया के फोनों में भी हिन्दी कीबोर्ड के दर्शन नहीं हुये। मैं ट्रान्सइटरेशन के पक्ष में नहीं हूँ।

हम लगभग निराश हो चले थे कि आज का चौथा दुख मोबाइल में हिन्दीहीन हो जाने का होगा, तभी सेल्समानव को एक मॉडल याद आया LG GS290। उसमें उन्होने हिन्दी अंग्रेजी शब्दकोष देखा था। उस मॉडल को जब हमने परखा तो उसमें हिन्दी कीबोर्ड उपस्थित था, यूनीकोड से युक्त।

मेरे चारों दुख वाष्पित हो गये और आँखों में आह्लाद का नीर उमड़ आया। आह्लाद उस समय और खिल गया जब उसका मूल्य 6000 ही पाया। हिन्दी कीबोर्ड के लिये 30000 के खर्चे का मन बना चुके हम, लगभग 24000 की बचत पर आनन्दित थे। अब इस पूरे घटनाक्रम को आप दैवयोग न कहेंगे तो क्या कहेंगे?

पर क्रोध की एक रेखा मन में बनी है अब तक।

मोबाइल जगत के धुरन्धर, भारतीय भाषाओं की दम्भयुक्त उपेक्षा कर रहे हैं और हम अपने सॉफ्टवेयरीय दास्यभाव में फूले नहीं समा रहे हैं। भारत एक भाषाप्रधान देश है तो क्या एक भी भारतीय लाल नहीं है जो इस सुविधा को विकसित कर सके? क्या सरकारों में इतना दम नहीं कि मना कर दे मोबाइल बेचने वालों को जब तक उनमें सारी भारतीय भाषाओं के लिये स्थान न हो? क्या हम अपनी भाषा को रोमन में लिख लिख कर अपने भाषा प्रेम का प्रदर्शन करते रहेंगे। कीबोर्ड के अभाव में यदि हम रोमन में लिख रहे हैं तो क्या यह अभाव हमारे देश की बौद्धिक सम्पदाओं के अनुरूप है?

मुझे उस दिन की प्रतीक्षा है जब हम अपनी विन्डो में बैठ अपना एप्पल खायेंगे।

18.8.10

सर तो बिजी है

सरकार व नौकरशाही का प्रतीक है लाल बत्ती। कार्यालयों के बाहर लगी दिख जाती है। सामान्य व असामान्य मानसिकता के बीच की रेखा। इसके प्रमुखतः दो उपयोग हैं, पहला दूरी बनाने में और दूसरा स्वयं को व्यस्त बताने में। मेरे लिये इसका उपयोग तीसरा है। वाणिज्य विभाग में होने के कारण जनता व उनके प्रतिनिधियों से सीधा सम्पर्क रहता है। लगातार लोगों के आते रहने से फाईलें निपटाने का समय नहीं मिल पाता है। सप्ताह में एक दिन तीन घंटों के लिये इस ऐतिहासिक सुविधा का उपयोग फाईलों से दूरियाँ मिटाने के लिये होता है।

द्वारपाल महोदय आदेश पाकर सतर्क हो बैठ जाते हैं। उन तीन घंटों के लिये उनके हाथों में सारे अधिकार सिमट जाते हैं। आगन्तुक कोई भी हो, उत्तर एक ही मिलता है।

"सर तो बिजी है।"

यदि द्वारपाल महोदय को आप यह मनवा सके कि आप यदि अभी नहीं मिले तो बहुत बड़ा अनर्थ होने वाला है, तभी आपका नाम स्लिप में लिखकर अन्दर पहुँचाया जायेगा। नहीं तो आप कितनी भी अंग्रेजी बोल लें, उनको हिलाना असम्भव। बस एक ही उत्तर।

"सर तो बिजी है।"

एक दिन बाहर से कुछ बहस के स्वर सुनायी पड़े। एक लड़की जिद पकड़कर बैठी थी कि उसे अभी मिलना है। दस मिनट तक ध्यान बँटता रहा तो फाईल बन्द कर उन्हें अन्दर बुला लिया। लड़की उत्तर पूर्व से थी व बंगलोर में अध्ययनरत थी। घर में पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं था और उन्हें उसी दिन गुवाहटी जाना था। पहले उन्हें पानी पिलवाया और उसके बाद एक इन्स्पेक्टर महोदय को बुला त्वरित सहायता कर दी गयी।

तनावमुक्त और अभिभूत हो उन्होने धन्यवाद तो दिया ही पर यह भी कहा कि आपने इतनी शिष्टता से सहायता की पर आपका द्वारपाल तो आने ही नहीं दे रहा था। उसको हटा दीजिये, आपकी छवि खराब कर रहा है। मैंने द्वारपाल के व्यवहार के लिये क्षमा माँग ली और कहा गलती मेरी ही है क्योंकि आदेश मेरा ही था। लड़की ने बताया कि वह भी सिविल सेवा की तैयारी कर रही है और उसमें सफल होने के बारे में मेरे अनुभव भी जानने चाहे। कार्य का क्रम टूट ही चुका था तो मैं भी एक भावी अधिकारी का भविष्य बनाने में लग गया। समय का पता नहीं चला और लाल बत्ती जलती रही।

द्वारपाल बाहर तने बैठे रहे। कई और लोग आये पर अब उनका उत्तर थोड़ा बदल चुका था।

"सर तो अबी बहोत बिजी है। अन्दर एक मैडम भी है।"

पता नहीं द्वारपाल महोदय लड़की से झगड़े का बदला ले रहे थे या हमारी छवि में चार चाँद लगा रहे थे।

14.8.10

फूलों का मुस्कराना

जब भी भावों को व्यक्त करने के लिये माध्यमों की बात होती है, फूलों का स्थान वनस्पति जगत से निकल कर मानवीय आलम्बनों की प्रथम पंक्ति में आ जाता है। प्रकृति के अंगों में रंगों की विविधता लिये एक यही उपमान है, शेष सभी या तो श्वेत-श्याम हैं या एकरंगी हैं। फिल्मों में भी जब कभी दर्शकों को भावों की प्रगाढ़ता सम्प्रेषित करनी हो तो फूलों का टकराना, हिल डुल कर सिहर उठना, कली का खिलना आदि क्रियायें दिखाकर निर्देशकगण अपनी अभिव्यक्ति की पराकाष्ठा पा जाते हैं। कोई देवालय में, कोई कोट में, कोई गजरे में, कोई पुष्पगुच्छ में और कोई कलाईयों में लपेट कर फूलों के माध्यम से अपने भावों को एक उच्च संवादी-स्वर दे देते हैं। प्रेमीगण रात भर न सो पाने की उलझन, विचारों की व्यग्रता, मन व्यक्त न कर पाने की विवशता और भविष्य की अनिश्चितता आदि के सारे भाव फूलों में समेटकर कह देना चाहते हैं। भावों से संतृप्त फूलों के गाढ़े रंगों को समझ सकने में भी दूसरे पक्ष से आज तक कभी कोई भूल होते नहीं देखी है हमने।

अब भावों की भाषा को सरल बनाते रंग बिरंगे संवाहकों को कोई कैसे केवल सौन्दर्यबोध की श्रेणी में ही रख देने की भूल कर सकता है। फूल पा कर भाव समझ लेना आपकी योग्यता भले न हो पर भाव न समझ पाना मूर्खता व संकट-आमन्त्रण की श्रेणी में अवश्य आ जायेगा। एक बार जब सुबह उठने पर अपने सिरहाने पर रखे गुलदस्ते पर कुछ फूल रखे पाये तो बड़ा अच्छा लगा। हम बिना भाव पढ़े सौन्दर्यबोध में खो गये। दिनभर के रूक्ष पारिवारिक वातावरण में सायं होते होते अपनी भूल समझ में आ गयी। बंगलोर आने के बाद घर मे हुये पहले फूल के बारे में अपने हर्षोद्गार व्यक्त न करना घातक हो सकता था, इसका अनुमान लग गया हमें। दिनभर मानसिक उत्पात के बाद उत्पन्न हुयी बिगड़ी स्थिति को अन्ततः फूलों ने ही सम्हाला हमारे लिये। यदि विश्वास न हो तो आप भी प्रयोग कर के देख लें।

बंगलोर की जलवायु बड़ी मदिर बनी रहती है, वर्षभर। यहाँ के विकास में, जनमानस के स्वभाव में और कार्य का माहौल बनाये रखने के अतिरिक्त फूलों के उत्पादन में भी इसी जलवायु का महत योगदान है। संसार भर में पाये जाने वाले सभी फूलों का उत्पादन कर उनके निर्यात के माध्यम से यहाँ की अर्थव्यवस्था को एक सुदृढ़ भाग प्रदान करता है यहाँ का फूल-व्यवसाय। यहाँ की संस्कृति में फूलों का उपयोग हर प्रकार के धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठानों में बहुतायत से होता है। महिलाओं के सौन्दर्य प्रसाधन का अभिन्न अंग है, फूलों का गजरा।

यहाँ के जीवन में फूलों की सर्वमान्य उपस्थिति का एक उच्चारण है यहाँ पर होने वाली वार्षिक पुष्प प्रदर्शनी। पूरे देश से आये फूलों का अप्रतिम व सुन्दरतम प्रदर्शन। गत रविवार हमारे सौभाग्य की कड़ी में एक और अध्याय जुड़ गया जब सपरिवार इस प्रदर्शनी को देखने का अवसर मिला। सुबह शीघ्र पहुँचने से बिना अधिक प्रतीक्षा किये देखने को मिल गया क्योंकि वापस आते समय सैकड़ों की संख्या में नगरवासी टिकटार्थ खड़े थे। मन के कोमल भावों की सुन्दरतम अभिव्यक्ति के वाहकों की प्रदर्शनी न केवल दृष्टि के लिये अमृतवत थी वरन भीनी भीनी सुगन्ध मन को दूसरे लोकों में ले जाने में सक्षम प्रतीत हो रही थी।

मन पूर्णतृप्त था, उपकार फूलों का, जीवन के रंगों में घुल जाते रंग,भावों को कहते अपनों के संग।

आप प्रदर्शनी में दिखाये कुछ दृश्य देखें और अगली बार जब भी कोई फूल दिखे, उसमें छुपाये और सहेजे भावों को पढ़ने का यत्न अवश्य करें।

11.8.10

मेरे देश का मानचित्र कौन बनायेगा

बड़े घर की समस्या यह है कि सबको अपने अपने कमरे चाहिये होते हैं। मुझे तो पहली बार अपना कमरा आईआईटी के तीसरे वर्ष में जाकर मिला था अतः मेरा अनुभव इस समस्या के बारे में कम ही था। पृथु और देवला अभी तक एक कमरे मे ही थे। देवला की सहेलियों की गुड़िया-प्राधान्य बातों से व्यथित हो, पृथु ने अलग कमरे की माँग रख दी। एक अतिरिक्त कमरा था, अतः दे दिया गया।

पृथु को अलग कमरा क्या मिला, देवला ने विद्रोह कर दिया। जिन सुविधाओं पर अब तक दोनों का साझा अधिकार था, उनमें से कुछ के लिये अब उसे चिचौरी करनी पड़ सकती थी। अब घर में सबसे अधिक मुखर वही है, तर्क दे तर्क, पीछे पड़ी रही। पहले तो हम टालते रहे। उसके बाद तथ्यों में उलझाने का प्रयास किया। बातचीत तो कितनी भी लम्बी खींची जा सकती है। हम लोगों के टालमटोलू रवैये से उकता कर वह कागज और पेन लायी, घर का मानचित्र बनाया और सबके कमरे पुनः निर्धारित कर दिये। मुझे सबसे बड़ा विरोधी मान सबसे छोटा और कम सुविधाओं वाला कमरा दिया गया। अब इस विषय पर कमेटी व सब कमेटी बनाये बिना ही हमें ऐसा समाधान निकालना पड़ा जिससे समस्या अन्ततः हल हो गयी। इस विषय में मेरा अनुभव भी थोड़ा और बढ़ गया।

मेरा देश भी बड़ा है, सबके अपने अपने कमरे हैं। अब घर के हर कमरे में यदि एक दरवाज़ा बना दिया जाये बाहर जाने के लिये तो घर का स्वरूप कैसा होगा। कश्मीर अपना दरवाज़ा खोलकर बैठा है, उत्तरपूर्व अपना दरवाज़ा खोलकर बैठा है। सूराख और सेंधें तो दसियों लगी हैं। घर के अन्दर कमरों में बैठे लोगों ने अपना स्वातन्त्र्य घोषित कर दिया है। नक्सल अपना मानचित्र बनाये बैठे हैं। मुम्बई के मानचित्र को कोई अपना बता चुका है। कोई जाति विशेष, धर्म विशेष के कमरों का प्रतिनिधि बना बैठा है देश के सबसे बड़े कमरे में। देश को कब्जा कर लेने की प्रक्रिया चल रही है, देश के मानचित्र में अपने प्रभुत्व की रेखायें खींच रहे हैं कुछ ठेकेदार, यह भी नहीं जान पा रहे हैं कि अब उससे रक्त की धार बहने लगी है। देश की चीत्कार नहीं सुन पा रहे हैं, संभव है कि उसकी मृत्यु का संकेत भी न समझ पायें ये रक्तपिपासु।
 
इतनी ढेर सारी क्षेत्रीय समस्यायें देख कर तो लगता है कि समस्यायें भी मदिरा की भाँति होती हैं। जितनी पुरानी, उतना नशे में डूबी। यदि तुरन्त सुलझ गयीं तो क्या आनन्द? सारा देश इसी नशे में आकण्ठ डूबा है।

मेरे घर का छोटा सा विवाद, बिटिया की सुलझाने की इच्छा व दृढ़विश्वास, समाधान एक मानचित्र के रूप में आ गया।

मेरे घर का मानचित्र तो बिटिया बना लाई, मेरे देश का मानचित्र कौन बनायेगा?

आह्वान है उनसे जिनके हाथ में कुछ लिख देने की क्षमता है, आह्वान है उनसे जिनकी वाणी का प्रभाव अंगुलिमालीय मानसिकतायें बदल सकता है, आह्वान है उनसे जो इतिहास के पन्नों में न खो जाने की चाह रखते हैं, आह्वान है उनसे जिनकी दृष्टि देश का खण्डित स्वरूप देखकर पथरा जाती है और आह्वान है उनसे जो मूक दर्शक हैं इस अलगाववादी तांडव के। आप सब में देश का मानचित्र बना देने और उसे सबके अस्तित्व में बसा देने की क्षमता है।

का चुप साधि रहा बलवाना।
   
मेरा विश्वास है कि मेरा नैराश्य मेरी मृत्यु तक जीवित नहीं रहेगा क्योंकि यदि मेरी बिटिया में घर का मानचित्र बनाकर मेरे सम्मुख रख देने का साहस है तो वह और उसके सरीखे अनेक बच्चे कल हमारे हाथों से निर्णय का अधिकार छीनकर देश का मानचित्र भी बना देंगे।

7.8.10

अब बढ़ना बन्द

ज्ञानी कहते हैं कि जीवन में शारीरिक ढलान बाद में आता है, उससे सम्बन्धित मानसिक ढलान पहले ही प्रारम्भ हो जाता है। किसी क्रिकेटर को 35 वर्ष कि उम्र में सन्यास लेते हुये देखते है और मानसिक रूप से उसके साथ स्वयं भी सन्यास ले लेते हैं। ऐसा लगता है कि हमारा शरीर भी अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के लिये ही बना था और अब उसका कोई उपयोग नहीं। घर में एक दो बड़े निर्णय लेकर स्वयं को प्रबुद्ध समझने लगते हैं और मानसिक गुरुता में खेलना या व्यायाम कम कर देते हैं। एक दो समस्यायें आ जायें तो आयु तीव्रतम बढ़ जाती है और स्वयं को प्रौढ़ मानने लगते हैं, खेलना बन्द। यदि बच्चे बड़े होने लगें तो लगता है कि हम वृद्ध हो गये और अब बच्चों के खेलने के दिन हैं, अब परमार्थ कर लिया जायें, पुनः खेलना बन्द। कोई कार्य में व्यस्त, कोई धनोपार्जन में व्यस्त, व्यस्तता हुयी और शारीरिक श्रम बन्द।


इन सारी विचारधाराओं से ओतप्रोत पिछले एक दो वर्षों से हम भी शारीरिक श्रम से बहुत कन्नी काटते रहे। बीच बीच में कभी कोई क्रिकेट मैच, थोड़ा बैडमिन्टन, पर्यटन-श्रम और मॉल में घुमाई होती रही। भला हो फुटबॉल के वर्ल्डकप का, एक दिन कॉलोनी में खेलते खेलते पेट शरीर से अलग प्रतीत होने लगा। लगने लगा कि पेट साथ मे दौड़ना ही नहीं चाहता है। केवल 10 वर्ष पहले तक पूरे 90 मिनट तक फुटबाल खेल सकने का दम्भ स्वाहा हो गया। उस समय आवश्यक कार्य का बहाना बना कर निकल तो लिये पर स्वभाववश स्वयं से भागना कठिन हो गया। लगने लगा कि यह ढलान अब रोकना ही पड़ेगा।


आज के युग में सुविधा पाये शरीर को हिलाना सबसे बड़ा कार्य है। इस समय मन भी शरीर के साथ जड़ता झोंकने लगा। एक प्राण, दो दो शत्रु। एक साथ दो शत्रुओं से निपटना कठिन लगा तो निश्चय किया गया कि पहले बड़े शत्रु को निपटाते हैं, छोटा तो अपने आप दुबक लेगा। अन्तःकरण ने निश्चय की हुंकार भरी कि आज से मानसिक ढलान बन्द।

अब बढ़ना बन्द।

सुबह जल्दी उठे। घर में ही पिजरें में बन्द सिंह की भाँति चहलकदमी की। सबको लगा कि अब सुबह सुबह कैसा तनाव? उन्हें क्या ज्ञात कि 'चंचलं हि मनः कृष्णः' की ख्याति प्राप्त योद्धा को जीतने का प्रयास चल रहा है। वाणिज्यिक आँकड़ों को भी आज के दिन ही गड़बड़ होना था। फोन से ही सिहांत्मक गर्जना हुयी तो पर्यवेक्षकों को सधे सधाये तन्तु हिलते दिखे। थोड़ी देर में 'दिल तो बच्चा है जी' का गाना रिपीट में लगा ब्लॉगीय झील में उतर गये। जब 8-10 बार बजने के बाद पर्याप्त मानसिक आयु कम हो गयी तो ही अन्य क्रियाकलाप प्रारम्भ किये। मन को इस रगड़ीय स्थिति में कढ़ीले लिये जा रहे थे पर सायं होते होते शरीर नौटंकी करने लगा। सायं को खेलने गये जिससे पुनः हल्का अनुभव होने लगा। रात को शान्त-क्लांत निद्रा-उर में सिमट गये।

एक बार रॉबिन शर्मा को कहते सुना था कि 21 दिन पर्याप्त होते हैं किसी नयी आदत को डालने में और स्वयं को उसके अनुसार ढालने में। अभी कुछ दिन ही हुये हैं गति पकड़े पर निश्चय 21 दिन का नहीं वरन जीवन पर्यन्त का है।

अब बढ़ना बन्द।

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। मन को साधने से शरीर सधने लगता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिये इसको बहुत प्यार से सम्हाल कर रखने की आवश्यकता नहीं है संभवतः। अंगों का स्वभाव है श्रम। स्वभाव में जीने से सब आनन्द में रहते हैं, स्वस्थ भी रहते हैं। स्वस्थ शरीर का पुष्ट भौतिकता के अतिरिक्त उच्च बौद्धिक व आध्यात्मिक स्तर बनाये रखने में बड़ा योगदान है। 

अब अगले कई वर्षों तक मेरी आयु न पूछियेगा। मैं 37 ही बताऊँगा।

क्योंकि, अब बढ़ना बन्द।

4.8.10

मॉल और माइक्रोसॉफ्ट

तब पढ़ाई हो, यह कारण रहता था  पिता जी के साथ बाजार न जाने का। अब लड़ाई न हो, इस कारण से बाजार जाना पड़ता है। हमारी भागने की प्रवृत्ति हमको घेर के वहाँ पर ले आती है जहाँ पर कोई विकल्प नहीं रहता और अन्ततः वही कार्य करने पड़ते हैं, जिनसे हम सदैव भागते रहते हैं।

हम जैसे प्रशिक्षार्थियों के लिये मॉल खुल जाने से यह कार्य अब उतना कष्टप्रद नहीं रह गया है। बाज़ारों के धूल-धक्कड़ से दूर मॉल का शीतल वातावरण व मनपसन्द वस्तुयें चुन पाने की सुविधा हम सबको सुहाती भी है। अब बच्चों का भविष्य हमारे वर्तमान की तरह न हो इसलिये उन्हें भी साथ ले लिया जाता है। मॉल में देवला ट्रॉली पकड़ती हैं और पृथु लिस्ट से सामान बता कर उसमें डालते रहते हैं। हमारा कार्य शंकाओं का समाधान करना होता है, कारण सहित। पारिश्रमिक कितना दिया गया, यह तब पता लगता है जब घर आकर लिस्ट के बाहर के सामानों का जोड़ होता है। कुछ दिनों में दोनों  इतने योग्य हो जायेंगे कि स्वयं जाकर ही खरीददारी कर आया करेंगे। बाल श्रम नहीं है, यह उनकी तैयारी है आगामी जीवन के लिये।

मॉल में बिलिंग यन्त्रवत सी लगती है। एक लड़का 'बार कोडिंग मशीन' के सम्मुख सामान दिखाता और आगे बढ़ा देता। 2000 का बिल बनाने में 30 सेकेण्ड समय लगा होगा। किसी गणितीय भूल की संभावना नहीं और समय की बचत भी।

इस पूरे प्रकरण में बस एक बात खटकी। मुझे अनायास ही अपने विद्यालय के एक मित्र अनुराग की याद आ गयी, वह अभी माइक्रोसॉफ्ट में है।

अनुराग की गणितीय गणना करने की क्षमता हम सबसे कहीं अधिक थी। कारण था बचपन में उसका अपने पिता जी की दुकान में बहुधा अकेले बैठना। छोटे कस्बे में छोटा व्यवसाय था। कोई कैलकुलेटर नहीं, कोई कम्प्यूटर नहीं, सब गणना मानसिक। भूल का अर्थ था हानि। वही क्षमता उसे पहले आई आई टी तक लायी और अन्ततः माइक्रोसॉफ्ट तक ले गयी।

मॉल संस्कृति जिस गति से फैल रही है, लगता है कि कुछ ही समय में सारे के सारे छोटे व्यवसायों और व्यवसायियों को सुरसावत निगल जायेगी। मॉल में लगी भीड़ इसका प्रमाण मात्र है। सीधे उत्पादन से उपभोक्ता तक सामान लाने की पूरी प्रक्रिया कम्प्यूटरों पर बिछी हुयी है। उद्देश्य लागत न्यूनतम करना है।

अब छोटे व्यवसाय नहीं रहेंगे तो कई और अनुराग उन दुकानों में कैसे बैठेंगे? कैसे उनकी गणितीय क्षमता पल्लवित हो सकेगी? माइक्रोसॉफ्ट को तब कैसे उतने योग्य मस्तिष्क मिल पायेंगे?

बिलिंग के 25 काउण्टरों में मुझे एक भी अनुराग नहीं दिखा, दिखा तो एक अर्थव्यवस्था का वह चेहरा जिसे न छोटी दुकानों की आवश्यकता है और न उसमें बैठने वालों अनुरागों की। मुझे यह भी दिखा कि भारत अपनी जिस बौद्धिक और मानसिक क्षमता पर इतना इतराता है, उनका भी मूल्य कम कर देंगे बाजार-व्यवस्था के समर्थक। अब मुहल्ले में आर्थिक समस्याग्रस्त लोगों को उधार कौन देगा? अब माइक्रोसॉफ्ट को अनुराग कौन देगा? हम जैसे विद्यार्थियों को ईर्ष्या करने के लिये अनुराग कौन देगा?

कई अनुराग खो गये हैं इन्ही मॉलों में। किसी को भी, किसी भी मॉल में, कभी भी यदि अनुराग दिखे तो मुझे बता दें। मुझे तो बस मेरा अनुराग वापस चाहिये।

31.7.10

मेरे कुम्हार

यूँ तो जीवन में जो भी मिला कुछ न कुछ सिखाता गया। प्रारम्भ माता पिता से किया और सम्प्रति बच्चों से सीख रहा हूँ। बीच में पर व्यक्तित्वों की एक श्रंखला है जो ढालते गये गीली मिट्टी को एक उपयोगी पात्र में, रौंद कर अनुशासन तले, अभ्यास के चाक में बार बार घुमाकर, विकारों को ठोंक पीट कर और तप की आग में तपा कर। यद्यपि मिट्टी को यह बर्ताव उस समय नहीं सुहाता है पर जब एकान्त में निर्विकार चिन्तन होता है तब उन कुम्हारों को बहुत याद करता होगा पात्र। बिन उनके तो वह बना रहता लोंदा, मिट्टी का, पृथ्वी पर भार।

कुम्हार को क्या पड़ी है, हाथ गन्दा करने की? क्या पड़ी है बार बार ध्यान दे देकर अपना समय व्यर्थ करने की? क्या पड़ी है बर्तन के साथ स्वयं तपने की? क्यों उलझ गये मेरे लोंदीय अस्तित्व से? मुझे पड़ा रहने देते, मैं जैसा था। कह देते कि यह मिट्टी किसी योग्य नहीं है। कह देते कि इसमें सुपात्र तो क्या, पात्र बनने की भी योग्यता नहीं है। कह देते कि व्यक्तित्व के अनियमित उभार यूँ ही वक्र रहेंगे और खटकते रहेंगे समाज की दृष्टि में। न भी घ्यान देते तो भी उनकी जीविका चल रही थी और चलती रहती, मैं पड़ा रहता मिट्टी के ढेर में एक और लोंदे सा।

यह मेरा प्रारब्ध था या उनका स्वभाव। मेरी लालसा थी सीखने की या उनकी उत्कण्ठा अधिकाधिक बताने की। तथ्यों पर मेरी ध्यान न देने की प्रवृत्ति पर उनकी ध्यान दिलाने की आवृत्ति अधिक भारी पड़ी। हठ मेरा न सुधरने का या विश्वास उनका कि यह सुधरकर रहेगा। मैं टोंका जाता गया, मेरा विरोध, अनमनापन, आलस्य बार बार टोंका गया। जब समझने योग्य बुद्धि हुयी तब कहीं मेरे कुम्हारों को जाकर विश्वास हुआ कि अब यह योग्य है और तब ही मुझे छोड़ दिया गया समाज में अपना अनुभव-घट स्वतः भरने के लिये।

उनकी याद मुझे दर्पण में अपनी आँखें देखकर ही आ जाती है। आँखों की गहराई में बस गया स्थायी इतिहास सहसा बात करने लगता है। एक एक तथ्य बोलते हुये निकल कर सामने आने लगते हैं।

बचपन मेरा और 'बुढ्ढे मास्साब' की वृद्धावस्था। मेरी चंचलता पर उनका धैर्य भारी पड़ा। कुम्हार जाति के थे, संभवतः तभी उनको आता था कि इस लोंदे को कैसे गढ़ना है, धैर्यपूर्वक। हाथ में कलम पकड़ाकर एक एक अक्षर लिखना सिखाया। आज जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिखता हूँ फाइलों पर तो मुझे मेरे बुढ्ढे मास्साब का हाथ अपने हाथों में धरा प्रतीत होता है।

विद्यालय में आया तो अध्यापकों का हर माह घर आना याद आता है। पूरे माह इस दिन की प्रतीक्षा यह जानने के लिये करता था कि कहीं अनजाने में कोई भूल तो नहीं हो गयी।

कानपुर पढ़ने छात्रावास में आया तो एक अध्यापक मिले, मराठी। बाहर से बड़ी सी डरावनी दाढ़ी और अन्दर से उतना ही मृदुल हृदय। अनुशासनप्रिय। छात्रावास में रहने के बाद भी क्या हिम्मत कि बिना पूछे बाहर जाकर चाट खा आयें। बहुत दिनों तक अखरता रहा यह अनुशासन पर अब वही एक संचित कोष लगता है उन क्षणों का जिसमें मेधा ने विकास की अँगड़ाई ली।

कई अध्यापक जो समाज के सभी भागों का प्रतिनिधित्व करते थे, निस्वार्थ भाव से मेरे ज्ञानकोष में अपने अनुभव का अंबार उड़ेल कर चले गये, बार बार समझा कर, बार बार डाँट कर, इस पात्र को आकार दे गये।
  
गढ़े जाने का क्रम बना रहा, समाज ने जितना सिखाया, उतना सीखता रहा, सबसे सीखा। संभवतः आज की राजनीति का प्रभाव न था मेरे ऊपर, संभवतः सारे भेद ज्ञान से निम्न जान पड़ते थे मुझे। कई राज्यों के ऋण हैं मेरे ऊपर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, बिहार, उत्तरप्रदेश और अब कर्नाटक। हर संस्कृति ने व्यक्तित्व में कुछ न कुछ जोड़ा ही है।

मुझे अपनी आँखों में जाति, भाषा, राज्य और धर्म से परे कुम्हारों की श्रंखलायें दिखायी पड़ती हैं। अब कोई मुझसे किसी एक का पक्ष लेने की मानसिकता सिखाये तो मैं अपने कुम्हारों को क्या उत्तर दूँगा? कैसे उनकी आकांक्षायें अपने बर्तन से हटाऊँगा? हटाने से मेरे व्यक्तित्व में वह छेद हो जायेगा जिससे मेरा अस्तित्व ही बह जायेगा, इन संकीर्ण नालियों में।