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4.10.14

समय

मैं टूट रहा प्रतिपल, प्रतिक्षण, वह भाग रहा अपनी गति से,
मैं खड़ा हुआ संवेदित मन, वह टले नहीं निज नियमों से ।
मैं छूट गया इस जीवन में, वह ‘अथक’ निकलता चला गया,
जीवन के सुन्दर स्वप्नों को, वह ‘समय’ रौंदता चला गया ।।१।।

ना ही जाने का स्वर-निनाद, ना ही आने की शहनाई,
है नहीं समय का जन्म कभी, ना बालकपन, ना तरुणाई ।
वह सर्वव्याप्त, वह शान्त सदा, है मन्द अचर गति पायी,
है वही नियामक जीवन का, सब सृष्टि उसी से चल पायी ।।२।।
 
श्रम-बिन्दु समय की बेदी पर, हैं जीवन-पथ में सुधाधार,
प्रत्येक कदम कर निर्धारित, हे मानव, तो है सुख अपार ।
यदि शेष बचे इस जीवन का, हो जाये हर पल श्वेत-धवल,
वह क्षमाशील कर देगा तुझको हर बाधा के सेतु पार ।।३।।

17.4.13

एक दुपहरी

एक दुपहरी, गर्म नहीं, गुनगुनी,
मन अकेला, व्यग्र नहीं, अनमना,
मिलकर सोचने लगे, क्या करें,
समय का रिक्त है, कैसे भरें,
कुछ उत्पादक, सार्थक, ठोस,
या सुन्दर, जैसे सुबह पड़ी ओस,
जो उत्पादक, सजेगा रत्न सा,
सुन्दर सुखमय, पर स्वप्न सा,
सोचा, कौन अधिक उपयोगी,
सोचा, किससे प्यास बुझेगी?

प्रश्न जूझते, उत्तर खिंचते,
दोनों गुत्थम गुत्था भिंचते,
समय खड़ा है, खड़े स्वयं हम,
उत्तर आये, बढ़ जाये क्रम,
उपयोगी हो या मन भाये,
रत्न मिले या सुख दे जाये,
किन्तु दुपहरी, अब तक ठहरी,
असमंजस मति पैठी गहरी,
मन भी बैठा रहा व्यवस्थित,
गति स्थिरता मध्य विवश चित,

गर्म दुपहरी, व्यग्र रहा मन
निर्णय में उलझा है चिन्तन।

2.2.13

बस, बीस मिनट

यदि आपके पास बीस मिनट का समय हो, तो आप क्या करेंगे? बड़ा ही अटपटा प्रश्न है और उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि कहाँ पर हैं और किस मनस्थिति में हैं। बहुत संभव हो कि आप कुछ न करें, बीस मिनट में भला किया भी क्या जा सकता है? ऐसे बीस मिनट के बहुत से अवसर आते हैं, प्रत्येक दिन, जीवनपर्यन्त। आप कार्यालय के लिये तैयार तो हो गये हैं पर निकलने में बीस मिनट है। आप फिल्म जाने को तैयार हैं, आपकी श्रीमतीजी को श्रंगार में बीस मिनट और लगेगा। भोजन करने बैठे हैं, पर सलाद कटने में बीस मिनट और लग जायेगा। बैठक बीस मिनट देरी से प्रारम्भ होने वाली है, आप स्टेशन बीस मिनट पहले पहुँच गये। इस तरह के न जाने कितने अवसर निकल आते हैं जो आपने सोचे नहीं होते हैं पर आपके पास बीस मिनट उपस्थित रहते हैं। आप क्या करते हैं, या क्या करेंगे?

देखा जाये तो ऐसे बीस मिनटों का जीवन में बड़ा महत्व है। एक दिन में तीन भी बार ऐसा संयोग हो जाये तो मान कर चलिये कि दिन में एक घंटा अधिक मिल गया आपको। बड़ी ही रोचक बात है कि अलग अलग देखा जाये तो उस समय की क्या उत्पादकता? बहुत से लोगों के लिये आगत की तैयारी में या विगत के चिन्तन में यह समय निकल जाता है। आप यदि कुछ नहीं करेंगे तो विचार तो वैसे भी समय को रिक्त नहीं रहने देंगे, कुछ न कुछ लाकर भर ही देंगे।

कहने के लिये बीस मिनट बहुत कम होते हैं पर कहने को कहा जाये तो बहुत अधिक हो जाते हैं। कोई एक विषय देकर कहा जाये कि इस पर बीस मिनट बोलना है तो आधे के बाद ही साँस फूलने लगती है, विषय के छोर नहीं सूझते हैं तब। हँसी हल्ला में तो घंटों निकल जाते हैं पर पिछले दो घंटों में क्या चर्चा हुयी, इस पर बोलने को कहा जाये तो सर भनभनाने लगता है। एक घटना याद आती है, किसी चालक दल ने इंजन का कार्यभार लेने में पाँच के स्थान पर दस मिनट लिये। जब वरिष्ठ अधिकारी ने बुलाया और इस देरी का कारण पूछा तो उत्तर देने में चालक दल ने यह संकेत देने का प्रयास किया कि पाँच अतिरिक्त मिनट कोई अधिक नहीं होते। वरिष्ठ अधिकारी ने बड़े शान्त भाव से उन्हें सुना और कहा कि बस पाँच मिनट तक वे सामने लगी घड़ी को देखते रहें और उसके बाद अपने मन की बात बता कर चले जायें, कोई आरोप नहीं लगेंगे। पाँच मिनट बाद चालक दल स्वयं ही भविष्य में उस भूल को न दुहराने का आश्वासन देकर चले गये।

कभी कभी समस्या भिन्न प्रकार से आती है, यदि आप किसी विषय के विशेषज्ञ हों, आपने जीवन के न जाने कितने वर्ष उस विषय को दिये हों, न जाने कितने शोधपत्र छाप दिये हों, आपने कोई ऐसा नया कार्य किया हो जिसने विज्ञान, विकास, अर्थ, समाज आदि की दिशा बदल दी हो, और तब आपसे कहा जाये कि सार केवल बीस मिनट में प्रस्तुत करें। आपके सामने उस विषय को सामान्य रूप से समझने वाले श्रोतागण बैठे हैं, आपको इतने विस्तार को समेट कर उसका निचोड़ बीस मिनट में प्रस्तुत करना है। यह समस्या लगभग उसी प्रकार से हुयी कि आपसे कहा जाये कि आपको अपने सामानों में केवल बीस को ले जाने की अनुमति है, तो आप कौन से ले जायेंगे। तब जितना श्रम आपको बीस वस्तुओं को निर्धारित करने में लगेगा उससे कहीं अधिक श्रम आपको अपने जीवन की विशेषज्ञविधा को बीस मिनट में समेटने में लगेगा।

आप क्या करेंगे यदि आपको भी यही कहा जाये? संभवतः मर्म को सर्वाधिक महत्व देंगे, उसके चारों ओर जो भी अनावश्यक या कम आवश्यक है उसे उन बीस मिनटों की परिधि के बाहर रखेंगे। जब कहने को सीमित समय हो और कम तथ्य हों तो संवाद की कुशलता सीधे हृदय उतरती है। संवाद कुशल व्यक्ति यह जानते हैं कि श्रोताओं के हृदय में उतरने का मार्ग विषय को सरल ढंग से प्रस्तुत करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। विषय को सरल ढंग से व्यक्त करने के लिये और अधिक श्रम करना पड़ता है और यह कार्य केवल विशेषज्ञ और मर्मज्ञ ही कर सकते हैं।

ऐसा ही कुछ अनुप्रयोग आजकल मुझे आकर्षित कर रहा है और मैं इधर उधर पड़े अपने बीस मिनटों को वही सुनने में लगा रहा हूँ। दिन में तीन और पिछले एक माह से, लगभग ८०-९० वार्तायें सुन चुका हूँ। शिक्षा, विज्ञान, समाज, संगीत, देश और न जाने कितने ही विषय, सारे के सारे उनके विशेषज्ञों द्वारा, हर वार्ता बस बीस मिनट की। रहस्य को और अधिक नहीं खीचूँगा, यह वार्तायें टेड (TED - Technology Entertainment and Design) के नाम से आयोजित की जाती हैं और इनका ध्येय वाक्य है, प्रसारयोग्य विचार (Ideas worth spreading)। विधि भी बड़ी सरल अपना रखी है, अपने आईपैड मिनी पर चुनी हुयी ढेरों वार्तायें डाउनलोड करके रखता हूँ और जब भी १५-२० मिनट की संभावना मिलती है, सुनना प्रारम्भ कर देता हूँ। कार्यालय जाते समय, निरीक्षण के बीच मिले अन्तराल में, किसी बैठक के प्रारम्भ होने की प्रतीक्षा में और कभी कभी सोने के पहले भी, एक बार में बस बीस मिनट निकालने से कार्य चल जाता है।

इस कार्य में रोचकता कई कारणों से आती है और अब तो यह एक खेल जैसा भी लगने लगा है। पहला तो बीस मिनट निकालना कोई कठिन कार्य नहीं है, ईश्वर ऐसे अवसर बहुतायत में भेंट कर देता है। दूसरा, आपके बीस मिनट किसी विशेषज्ञ से उसके किये हुये कार्य के वर्णन व प्रभाव सुनने में निकलते हैं, विचारों को प्रवाह सदा ही गतिमय और विविधता से भरा होता है। तीसरा, आपकी सृजनात्मकता सदा ही उत्कृष्टता और नवीनता से पोषित होती है। अपने क्षेत्र में विशिष्टतम कार्य करने वालों के ही मुख से उनका अनुभव व उद्गार सुनना, समय का इससे अच्छा उपयोग क्या हो सकता है भला? इसमें हजार से ऊपर वार्तायें हैं जोकि एक अरब से भी अधिक बार सुनी जा चुकी हैं, ये संख्यायें इसकी रोचकता को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती हैं।

लेखन यात्रा में बहुधा लगता है कि घट खाली हुआ जा रहा है, समय रहता है पर सूझता नहीं कि क्या लिखा जाये? विचार मानसून की भविष्यवाणी की तरह ही आते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं। जब कुछ देने की स्थिति में नहीं होता है जीवन तो याचक के रूप में आकर कुछ ग्रहण कर लेना रोचक भी लगता है और आवश्यक भी। पता नहीं घट कब तक भरेगा? कभी कभी तो लगता है कि इतने अच्छे और उत्कृष्ट विचार सुनने के क्रम में हम अपनी प्यास और बढ़ा बैठे हैं, जितना सुनते हैं, उतने प्यासे और रह जाते हैं। लगने लगता है कि कितना नहीं आता है अभी, कितना सीखना शेष है अभी।

सुनना व्यर्थ न जायेगा, कुछ न कुछ नये विचार सूत्र अवश्य निकलेंगे, कुछ श्रंखलायें अवश्य बनेगी जिनमें सबको प्रभावित कर जाने की क्षमता होगी, कुछ दर्शन उभरेगा जिसमें हम अपने उत्तर पाने की दिशा में बढ़ने लगेंगे। कुछ नया सीखने या जानने का मन हो तो आप क्या करेंगे? विशेषज्ञों से अच्छा भला और कौन बता पायेगा आपको, वह भी बस बीस मिनट में।

16.11.11

मल्टीटास्किंग

मल्टीटास्किंग एक अंग्रेजी शब्द है जिसका अर्थ है, एक समय में कई कार्य करना। इस शब्द का आधुनिक प्रयोग मोबाइलों की क्षमता आँकने के लिये होता रहा है, अर्थ यह कि एक समय में अधिक कार्य करने वाला मोबाइल अधिक शक्तिशाली। गाना भी चलता हो, ईमेल भी स्वतः आ रहा हो, मैसेज का उत्तर भी लिखा जा सके, और हाँ, फोन आये तो बात भी कर लें, वह भी सब एक ही समय में। कान में ठुसे ईयरफोन, कीबोर्ड पर लयबद्ध नाचती उँगलियाँ, छोटी सी स्क्रीन पर उत्सुकता से निहारती आँखें, एक समय में सब कुछ कर लेने को सयत्न जुटे लोगों के दृश्य आपको अवश्य प्रभावित करते होंगे। आपको भी लगता होगा कि काश हम भी ऐसा कुछ कर पाते, काश हम भी डिजिटल सुपरमैन बन पाते।

ईश्वर ने आपको ५ कर्मेन्द्रियाँ व ५ ज्ञानेन्द्रियाँ देकर मल्टीटास्किंग का आधार तो दे ही दिया है। पर यह तो उत्पाद के निर्माता से ही पूछना पड़ेगा कि दसों इन्द्रियों को एक साथ उपयोग में लाना है या अलग अलग समय में। एक समय में एक कर्मेन्द्रिय और एक ज्ञानेन्द्रिय तो कार्य कर सकती हैं पर दो कर्मेन्द्रिय या दो ज्ञानेन्द्रिय को सम्हालना कठिन हो जाता है। दस इन्द्रियों के साथ एक ही मन और एक ही बुद्धि प्रदान कर ईश्वर ने अपना मन्तव्य स्पष्ट कर दिया है।

खाना बनाते हुये गुनगनाना, रेडियो सुनते हुये पढ़ना आदि मल्टीटास्किंग के प्राथमिक उदाहरण हैं और बहुलता में पाये जाते हैं। जटिलता जैसे जैसे बढ़ती जाती है, मल्टीटास्किंग उतनी ही विरल होती जाती है। मोबाइल कम्पनियों को संभवतः पता ही न हो और वे हमारे लिये मल्टीटास्किंग के और सूक्ष्म तन्त्र बनाने में व्यस्त हों।

आप में से बहुत लोग यह कह सकते हैं कि मल्टीटास्किंग तो संभव ही नहीं है, समय व्यर्थ करने का उपक्रम। एक समय में तो एक ही काम होता है, ध्यान बटेगा तो कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होगी या दुर्घटना घटेगी। एक समय में एक ही विषय पर ध्यान दिया जा सकता है। मैं तो आपकी बात से सहमत हो भी जाऊँ पर उन युवाओं को आप कैसे समझायेंगे जो एक ही समय में ही सब कुछ कर डालना चाहते हैं, ऊर्जा की अधिकता और अधैर्य में उतराते युवाओं को। जेन के अनुयायी इसे एक समय में कई केन्द्र बिन्दुओं पर मन को एकाग्र करने जैसा मानते हैं, जिसके निष्कर्ष आपको भटका देने वाले होते हैं। हमारे बच्चे जब भी भोजन करते समय टीवी देखते हैं, दस मिनट का कार्य आधे घंटे में होता है, पता नहीं क्या अधिक चबाया जाता है, भोजन या कार्टून।

थोड़ी गहनता से विचार किया जाये तो, मल्टीटास्किंग का गुण अभ्यास से ही आता है। अभ्यास जब इतना हो जाये कि वह कार्य स्वतः ही होने लगे, बिना आपके ध्यान दिये हुये, तब आप उस कार्य को मल्टीटास्किंग के एक अवयव के रूप में ले सकते हैं। धीरे धीरे यह कलाकारी बढ़ती जाती है और आप एक समय में कई कार्य सम्हालने के योग्य हो जाते हैं, आपकी उत्पादकता बढ़ जाती है और सामने वाले का आश्चर्य।

क्या हमारे पास सच में समय की इतनी कमी है कि हमें मल्टीटास्किंग की आवश्यकता पड़े? क्या मल्टीटास्किंग में सच में समय बचता है? औरों के बारे में तो नहीं कह सकता पर मेरे पास इतना समय है कि एक समय में दो कार्य करने की आवश्यकता न पड़े। एक समय में एक कार्य, वह भी पूरे मनोयोग से, उसके बाद अगला कार्य। वहीं दूसरी ओर एक समय में एक कार्य को पूर्ण एकाग्रता से करने में हर बार समय बचता ही है। इस समय लैपटॉप पर लिख रहा हूँ तो वाई-फाई बन्द है, शेष प्रोग्राम बन्द हैं, एक समय में बस एक कार्य। मेरे लिये कम्प्यूटरीय या मोबाइलीय सहस्रबाहु किसी काम का नहीं।

आजकल कार्यालय आते समय एक तेलगू फिल्म का पोस्टर देखता हूँ, बड़ी भीड़ भी रहती है वहाँ, कोई बड़ा हीरो है। आप चित्र देख लें, मल्टीटास्किंग का बेजोड़ उदाहरण है यह, बदमाश की गर्दन पर पैर, खोपड़ी पर पिस्तौल तनी, मोबाइल से कहीं बातचीत और बीच सड़क पर ‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ का मंचन।

क्या आप भी हैं मल्टीटास्किंग के हीरो?

21.9.11

क्या हुआ तेरा वादा ?

पुस्तकें बड़ी प्रिय हैं, जब भी कभी बाहर जाता हूँ दो पुस्तकें अवश्य रख लेता हूँ। पढ़ने का समय हो न हो, यात्रा कितनी भी छोटी हो, एक संबल बना रहता है कि यदि विश्राम के क्षण मिले तो पुस्तक खोल कर पढ़ी जा सकती है। बहुत बार पुस्तक पढ़ने का अवसर मिल जाता है पर शेष समय पुस्तकें ढोकर ही अपना ज्ञान बढ़ाते रहते हैं। पुस्तक साथ रहती है तो एक संतुष्टि बनी रहती है कि सहयात्री यदि मुँह बनाये बैठे रहे तो समय काटना कठिन नहीं होगा, यद्यपि बहुत कम ऐसा हुआ है कि शेष पाँच सहयात्री ठूँठ निकले हों। अन्ततः कुछ ही न पढ़कर पुस्तकें सुरक्षित वापस आ जाती हैं। पुस्तकस्था तु या विद्या का श्लोक पढ़ा था पर सारा ज्ञान पुस्तक में लिये घूमते रहते हैं और ज्ञानी होने का मानसिक अनुभव भी करते हैं।

पहले समय अधिक रहता था, पुस्तके पढ़ने और समाप्त करने का समय मिल जाता था। मुझे अभी भी याद है कि कई पुस्तकें मैने एक बार में ही बैठ कर समाप्त की हैं। जिस लेखक की कोई पुस्तक अच्छी लगती थी, उसकी सारी पुस्तकें पढ़ डालने का उपक्रम अपने निष्कर्ष तक चलता रहता था। कभी भी किसी विषय पर रोचक शैली में लिखा कुछ भी अच्छा लगने लगता है, सब क्षेत्रों में कुछ न कुछ आता है पर किसी क्षेत्र विशेष में शोधार्थ समय बहाने की उत्सुकता संवरण करता रहता हूँ। किसी पुस्तक को मेरे द्वारा पुनः पढ़वा पाने का श्रेय बस कुछ गिने चुने लेखकों को ही जाता है।

उपरिलिखित बाध्यताओं के कारण घर में पुस्तकों का अम्बार सजा है। श्रीमती जी को भी यह अभिरुचि भा गयी है, पर उनके विषय अलग होने के कारण एक नयी अल्मारी लेनी पड़ गयी है। पुस्तकें पढ़ने की गति से पुस्तकें खरीदी भी जानी चाहिये नहीं तो समय में व मस्तिष्क में निर्वात सा उत्पन्न होने लगता है। धीरे धीरे पुस्तकें घर आने लगीं, जब कभी भी मॉल जाना होता था, कुछ भी लाने के लिये, पर वापस आते समय हाथ में एक दो पुस्तकें आ ही जाती हैं। अल्मारी भरने लगती हैं, पढ़ी हुयी पुस्तकें उस पर सजने लगती हैं, आते जाते जब पढ़ी हुयी पुस्तकों पर दृष्टि पड़ती है तो अपने अर्जित ज्ञान पर विश्वास बढ़ने लगता है, किसी ने सच ही कहा है कि जिस घर में पुस्तकें रहती हैं उस घर का आत्मविश्वास बढ़ा रहता है।

आजकल अन्य कार्यों में व्यस्तता बढ़ जाने के कारण पुस्तकें घर तो आ रही हैं, पढ़ी नहीं जा पा रही हैं। अब अल्मारी के पास से निकलते समय कुछ अनपहचाने चेहरे मुलकते हैं तो ठिठक कर वहीं रुक जाता हूँ क्षण भर के लिये। कई बार ऐसे ही हो गया तो अगली बार उनसे मुँह चुराने लगा। घर यदि बड़े नगरों की तरह कई रास्तों का होता तो राह बदल कर निकल जाते, यहाँ तो नित्य भेंट की संभावना बनी रहती है।

जब एक दिन न रहा गया तो लगभग १२ अनपढ़ी पुस्तकों को समेटा, मेज पर सामने रख कर बहुत देर तक देखता रहा, गहरी साँसे ली और निश्चय किया कि आने वाले ६ महीनों में इन्हें पढ़ा जायेगा, अर्थात १५ दिन में एक। स्मृति बनी रहे, अतः १२ पुस्तकों को मेज पर रख दिया गया। जहाँ एक ओर आपकी शिथिलता को तो प्रकृति सहयोग करती है वहीं दूसरी ओर आपके विश्वास को परखने बैठ जाती है। जो नहीं होना था, हो गया, व्यस्तता अधिक बढ़ गयी और शरीर ढीला पड़ कर अपना ही राग अलापने लगा, या तो कार्य होता था या फिर शयन। कोल्हू के बैल सम अनुभव करने लगा।

कई दिन से मेज पर बैठा ही नहीं, कि कहीं पुस्तकें दिख न जायें, सोफे पर ही बैठकर ब्लॉगिंग आदि का कार्य कर लेता था। आज याद नहीं रहा और किसी कार्यवश मेज के पास पहुँच गया। सारी पुस्तकें एक स्वर में बोल उठीं….

 क्या हुआ तेरा वादा ?




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@ संतोष त्रिवेदी, @ डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ , @ Rahul Singh, @ Dr. shyam gupta
संभवतः अनपढ़ी पुस्तकों में हिन्दी की पुस्तक न पाना आप लोगों को निराश कर गया और यह अवधारणा दे गया कि मेरा पुस्तकीय प्रेम अंग्रेजी में ही सिमटा हुआ है। हिन्दी पुस्तकें बहुत पढ़ता हूँ और खरीदने के बाद अतिशीघ्र पढ़ लेता हूँ, इसीलिये कोई हिन्दी पुस्तक बची नहीं थी। यह तथ्य ध्यान दिलाकर आपने मेरा सुख बढ़ाया है।

12.1.11

सामाजिकता का फैलाव

आपको कितने मित्र चाहिये और किस क्षेत्र में चाहिये? आपके क्षेत्र में मित्र बढ़ाने का सर्वोत्तम माध्यम क्या है? एक मित्र से आप कितने माध्यमों से संपर्क रख सकते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि माध्यमों की अधिकता से हमारे सम्पर्क की गुणवत्ता और मात्रा कम हो गयी हो?

सूचना क्रान्ति ने हमारे मित्रों की उपलब्धता सतत कर दी है, सब के सब मोबाइल फोन पर उपस्थित। उन्हे अपने बारे में जानकारी देने के लिये केवल लिख कर भेजना भर है। भविष्य में सुयोग्य यन्त्र स्वतः ही यह प्रचारित कर दिया करेंगे। पर क्या जानकारी दें हम उससे? यदि आपको लगता है कि आपके मित्र आपकी छीकों के बारे में भी जानने के लिये लालायित रहते हैं तो अवश्य बतायें उन्हें इसके बारे में और भविष्य में तैयार भी रहें उनकी छीकों की गिनती करने के लिये। आपको जो रुचिकर लगता हो, संभवतः औरों को वह न भाये।

सबको यह अच्छा लगता है कि अन्य उन्हें जाने। जान-पहचान का आधार बहुधा एक अभिरुचि होती है जो आपको एक दूसरे के संपर्क में बनाये रखती है। सौन्दर्यबोध एक शाश्वत अभिरुचि है पर उसमें मन लगने और उचटने में अधिक समय नहीं लगता है। हर अभिरुचि का एक सशक्त माध्यम है, कुछ समूह हैं विभिन्न माध्यमों में, लोग जुड़ते हैं, लोग अलग हो जाते हैं, अच्छी चर्चायें होती हैं।

पहुँच बढ़ाने का प्रयास है यह, पर कहाँ पहुँच रहे हैं यह ज्ञात नहीं है हमें। पहुँच बढ़ा रहे हैं, ज्ञान बढ़ा रहे हैं या समय व्यर्थ कर रहे हैं। किसी भी क्षेत्र में बिना समय दिये सार्थकता नहीं निकलती। माध्यमों की बहुलता और फैलाव क्या हमें इतना समय दे पा रहा है जिसमें हम अपनी अभिरुचियाँ पल्लवित कर सकें?

पिछले 5 माह से यह अन्तर्द्वन्द मेरे मन में चल रहा है। ट्विटर, फेसबुक, ऑर्कुट और 5 ब्लॉगों में अपनी पहचान खोलने के बाद भी यह समझ नहीं आ रहा था कि कहाँ जा रहा हूँ और क्या चाह रहा हूँ? इतना फैलाव हो रहा था कि न तो स्वयं को सम्हाल पा रहा था और न ही अभिरुचियों की गुणवत्ता को। फैलाव आपकी ऊर्जा बाँध देता है।

जब नदी का प्रवाह सम्हाला न जा सके तक किनारे की ओर चल देना चाहिये। तेज बहते कई माध्यमों से स्वयं को विलग कर लिया। फेसबुक और ट्विटर बन्द कर दिया। लिंकडेन व अन्य माध्यमों के सारे अनुरोध उत्तरित नहीं किये। ऑर्कुट में साप्ताहिक जाना होता है क्योंकि वहाँ कई संबंधियों के बारे में जानकारी मिलती रहती है। एक ब्लॉग छोड़ शेष निष्क्रिय हैं और संभवतः निकट भविष्य में गतिशील न हो पायें। एक ब्लॉग, गूगल रीडर व बज़ के माध्यम से सारे साहित्यिक सुधीजनों से संपर्क स्थापित है। सप्ताह में दो पोस्ट लिखने में और आप लोगों की पोस्ट पढ़ टिप्पणी करने में ही सारा इण्टरनेटीय समय निकल जाता है।

मेरी सामाजिकता, उसका फैलाव और मित्रों का चयन, सम्प्रति ब्लॉगीय परिवेश में ही भ्रमण करता है। आपका दूर देश जाना होता हो और कोई रोचकता दिखे तो मुझ तक अवश्य पहुँचायें।

उत्सुकता अतीव है, सब जानने की।

पता नहीं क्यों?

24.11.10

ट्रेन में क्या कर सकते हैं

कुछ दिन पहले समीरलाल जी का बज़-तश्तरी पर रखा हुआ उड़न-प्रश्न आया था कि 17 घंटे की ट्रेन यात्रा में क्या कर सकते है? प्रश्न तो समय-भावना से प्रेरित था, सोचने बैठा तो उत्तर संभावनाओं से पूरित लगा।

ट्रेन-यात्रा में क्या नहीं कर सकते, प्रश्न यह होना था। सतीश पंचम जी ने ट्रेन की ऊपरी सीट पर बैठे बैठे एक के बाद एक, तीन पोस्टें दाग दी, वह भी बैटरी चुकने से पहले और नेटवर्क से आँख मिचौली करते हुये। वह तो भला हो कि ट्रेन के स्लीपर कोच में मोबाइल चार्जिंग प्वांइट नहीं लगाये गये हैं, नहीं तो जितना वह देख पा रहे थे और जितना समय उनके पास था, उसमें दस पोस्टें तो बड़ी सरलता से दागी जा सकती थीं।

ट्रेन में कुछ कर सकने के लिये क्या चाहिये होता है, ब्लॉगरों के लिये नेटवर्क और चार्जिंग प्वांइट। यदि यह मिले तो शेष आपकी कल्पना शक्ति पर निर्भर करता है। आँख बन्द कीजिये, ट्रेन आपको धीरे धीरे डुलाती है, आपके जीवन के सारे जड़ भावों को तरल करती हुयी, डूब जाईये अपने भावों की तरलतम व सरलतम गहराईयों में और निकाल लाईये एक कालजयी कविता। खिड़की के बाहर खेतों, जंगलों और पहाड़ों को निहारते रहिये, घंटों भर, बदलते प्रकृतिक दृश्य आप के अन्दर के पन्त को बाहर निकाल लायेंगे। सहयात्री के जीवन अनुभव सप्रयास सुनने लगिये, उसमें यदि जीवन का सत्य न भी निकले, एक ब्लॉग पोस्ट तो निकल ही आयेगी।

पंकज, प्रशान्त और अभिषेक जैसे अविवाहितों के लिये कोच के बाहर लगा रिजर्वेशन चार्ट किसी संभावना-पत्रक से कम महत्वपूर्ण नहीं होता है। उनकी आँखें यह मनाती हैं चार्ट से कि उनके आसपास के सहयात्री  रोचक हों, सही उम्र आदि के हों। बहुधा ईश्वर प्रार्थनायें सुन लेता है और यात्रा में "रब ने बना दी जोड़ी" जैसी मानसिक-पेंगे भी बढ़ जाती हैं। दो निकटस्थ युगलों को जानता हूँ जिनके ऊपर उपकार है उन रेल यात्राओं के, जिन्होने उनके प्रेम सम्बन्धों को विवाह तक पहुँचाने में सहायता की। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ देखी हैं जहाँ पर बिहारी लाल का "कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत खिलत, लजियात। भरे भवन में करत हैं नयनन हीं सों बात।" जीवन्त होते देखा है।
 
मेरे कई मित्र हैं जिन्हें ट्रेन में अपने महीनों की नींद पूरी कर लेने की इतनी शीघ्रता रहती है कि सामान में ताला लगाते ही सो जाते हैं, नाश्ते और भोजन के समय ही उठते हैं और खाना खाकर पुनः पसर जाते हैं। पुस्तक पढ़ते, मोबाइल पर बतियाते और गेम खेलते, फिल्में देखते, गाने सुनते, ताश खेलते, अन्ताक्षरी में सुर खंगालते, ऊँघते, खाद्य मुँह में भर जुगाली करते, पूरा का पूरा रुचिकर संसार दिख जाता है ट्रेन में।


हम यह तथ्य भी कैसे भूल सकते हैं कि गाँधीजी ने ट्रेन में घूम घूम कर देश जोड़ दिया।

मैं समय बाँट लेता हूँ, सहयात्री यदि रुचिकर है तो उत्सुकता-रस में डूब जाता हूँ, जब बाहर निकल पाता हूँ अपना लैपटॉप खोल कर बैठ जाता हूँ। पहले प्रशासनिक कार्य व्यवस्थित करता हूँ, कार्यानुसार मोबाइल फोन से मंत्रणा और उसके बाद सारा समय अपनी अपूर्ण कविताओं और पोस्टों को। यदि कोई नया विचार मिलता है तो वह प्रकल्प-सूची में चला जाता है। मेरे ब्लॉग पर आयी कई पोस्टें और कवितायें ऐसी ही उत्पादक ट्रेन यात्राओं के सुमधुर निष्कर्ष रहे हैं। एक बार 28 घंटे की यात्रा ने जीवन के कई छिपे कोमल भावों को उद्घाटित करने में लेखन को उकसाया था।

ऐसा भी नहीं है कि सारी ट्रेन यात्रायें इतनी रोमांचक व उत्पादक हों। पूरी यात्रा में कोई एक छोटी सी घटना और व्यग्रमना सहयात्री आपका सारा आनन्द चौपट कर देने की सामर्थ्य रखते हैं। बगल की सीट में बेसुध पड़े सज्जन यदि रात भर खर्राटे लेते रहें तो आप चाह कर भी उनका कुछ नहीं कर सकते हैं।

पर आप अपनी ट्रेन यात्रा में बहुत कुछ कर सकें, बहुत कुछ पा सकें, समीरलालजी को व आप सबको  अतिशय शुभकामनाओं के साथ......

भारतीय रेल आपकी मंगलमयी यात्रा की हार्दिक कामना करती है।

9.10.10

बात तो बस शुरुआत करने की है

आप के मन में कोई योजना है। आप प्रारम्भ करना चाहते हैं। दुविधा है कि अभी प्रारम्भ करें या थोड़ा रुककर कुछ समय के बाद। संशय में हैं आपका मन क्योंकि दोनों के ही अपने हानि-लाभ हैं।


अभी करने से समय की हानि नहीं होगी पर क्रियान्वयन के समय ऐसी समस्यायें आ सकती हैं जिन पर आपने पहले भलीभाँति विचार ही नहीं किया हो। ऐसा भी हो सकता है कि समस्यायें इतनी गहरी हों कि आपकी योजना धरी की धरी रह जाये।

वहीं दूसरी ओर भलीभाँति विचार करने के लिये समय चाहिये। जितना अधिक आप विचार करेंगे,  भावी बाधाओं को उतना समझने में आपको सहायता होगी। आप विस्तृत कार्ययोजना बनाने लगते हैं पर जब तक कार्य प्रारम्भ करने का समय आता है तो बहुत संभावना है कि कोई अन्य व्यक्ति उस विचार पर कार्य प्रारम्भ कर चुका हो या परिस्थितियाँ ही अनुकूल न रहें। आपका विचार और उससे सम्बन्धित बाज़ार आप के हाथ से जा चुका होगा।

आपका क्या निर्णय होगा? यह एक ऐसा निर्णय है जिस पर आपके कार्य की सफलता निर्भर करती है।

मूलतः दो प्रश्न हैं। किसी कार्य को प्रारम्भ करने का कौन सा समय सर्वोत्तम है? और कितना समय उपलब्ध है हमारे पास निर्णय के लिये?

मन में किसी नयी योजना का विचार आना एक दैवीय संकेत है और बिना समय गँवाये उस पर तत्परता से हानि-लाभ का विश्लेषण प्रारम्भ कर देना चाहिये। किसी भी विचार को लिखकर रख लेने से और विचारों के प्रवाह में स्थान दे देने से सम्बन्धित विचार द्रुतगति से आने लगते हैं। उनको लिखते जायें और अन्य पक्षों पर चिन्तन का मार्ग खोल दें। आधार जब इतना सुदृढ़ हो जाये कि मन को सन्तोष सा होने लगे तो मान लीजिये कि कार्य प्रारम्भ करने का समय आ गया है।

विचार प्रक्रिया यदि बहुत लम्बी चलने दी तो केवल बौद्धिक प्रकल्प बन कर रह जायेगी आपकी योजना। फल के पकने के बाद से टपकने तक का समय होता है हमारे पास। इसी कालखण्ड में निर्णय लेना पड़ता है हमें। प्रकृति इससे अधिक समय नहीं देती है फल तोड़ने को। आप को कैसा लगेगा कि आप जिस पके फल को तोड़ने के लिये डाल पर चढ़ने का श्रम कर रहे हैं, वह टपक जाये और कोई और उसका लाभ उठा ले। इस तरह के उदाहरणों से उद्योगों का इतिहास भरा पड़ा है।

तैयारी इसे ही कहते हैं कि पकने से टपकने तक के समय में हमारी बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक क्षमता इतनी अधिक हो कि हम फल तोड़ सकें। इसको ही संभवतः भाग्य कहते हैं। हममें से लगभग सभी ने कभी न कभी या तो समय के पहले फल तोड़ लिया या उसे टपक जाने दिया।

तैयारी पूरी रखी जाये, खिड़की सबके लिये कभी न कभी खुलती ही है।

एप्पल व पिज्जा हट का उदाहरण तो यह बताता है कि यदि आप के मन में योजना आयी है तो प्रारम्भ कर ही दें। आये विचार का को सम्मान दें, हो सकता है पुनः न आये।

4.9.10

आओ, मैं स्वागत में बैठा हूँ

समय के पीछे भागने का अनुभव हम सबको है। यह लगता है कि हमारी घड़ी बस 10 मिनट आगे होती तो जीवन की कितनी कठिनाईयाँ टाली जा सकती थीं। कितना कुछ है करने को, समय नहीं है। समय कम है, कार्य अधिक है, बमचक भागा दौड़ी मची है।

समय बहुमूल्य है। कारण विशुद्ध माँग और पूर्ति का है। समय के सम्मुख जीवन गौड़ हो गया है। बड़े बड़े लक्ष्य हैं जीवन के सामने। लक्ष्यों की ऊँचाई और वास्तविकता के बीच खिंचा हुआ जीवन। उसके ऊपर समय पेर रहा है जीवन का तत्व, जैसे कि गन्ने को पेर कर मीठा रस निकलता है। मानवता के लिये लोग अपना जीवन पेरे जा रहे हैं, मानवता में अपने व्यक्तित्व की मिठास घोलने को आतुर। कुछ बड़ी बड़ी ज्ञानदायिनी बातें जो कानों में घुसकर सारे व्यक्तित्व को बदलने की क्षमता रखती हैं। उनको सुनने के बाद कहाँ विश्राम, एक जीवन कम लगता है उस पर लुटाने को। समय के साथ लगी हुयी है दौड़। जीवन की थकान को उपलब्धि का लॉलीपॉप। मानसिक सन्तोष कि आप के सामने गाँव की नहरिया नहीं, होटल ललित अशोक का स्वीमिंग पूल है। खाने को दाल रोटी नहीं, वाइन व श्रिम्प है। भूख, गरीबी, बेरोजगारी के मरुस्थल नहीं, विकास व ऐश्वर्य की अट्टालिकायें हैं। आप भाग रहे हैं समय के पीछे।

कभी कभी आनन्द व ध्यान के क्षणों में आपने अनुभव किया होगा कि समय रुका हुआ सा है। आप कुछ नहीं कर रहे होते हैं तो समय रुका हुआ सा लगने लगा। अच्छा लेख, कविता, ब्लॉग व पुस्तक पढ़ना प्रारम्भ करते हैं समय रुका हुआ सा लगता है, पता नहीं चलता कि छोटी सुई कितने चक्कर मार चुकी है। न भूख, न प्यास, न चिन्ता, न ध्येय, न आदर्श, न परिवार, न संसार। आपके लिये सब रुका हुआ। अब इतनी बार समय रोक देंगे तो जीवन को सुस्ताने का लाभ मिल जायेगा। प्रेम में पुँजे युगलों से पूछता हूँ कि क्या भाई ! मोबाइल पर 3 घंटे बतिया कर कान व गला नहीं पिराया? अरे, पता ही नहीं चला। सम्मोहन किसमें है? मोबाइल में है, प्रेमी में है, आप में है या होने वाली बात में है। विवाहित मित्र उचक के उत्तर देंगे, किसी में नहीं। वह समय कुछ और था, रुका हुआ लगता था अब तो लगता है बलात् कढ़ील के लिये जा रहा है।

सम्मोहन तो जीवन का ही है, समय का नहीं। जीवन जीने लगते हैं और समय नेपथ्य में चला जाता है। आकर्षण व्यक्तित्व का होता है, आयु का नहीं। महान कोई एक विचार बना देता है, बेचारी व्यस्तता नहीं।

मैं कल्पना करता हूँ कि मैं बैठा हूँ समय से परे, अपने अस्तित्व के एकान्त में। दरवाजे पर आहट होती है, आँखें उठाता हूँ। भंगिमा प्रश्नवाचक हो उसके पहले ही आगन्तुक बोल उठता है। मैं समय हूँ, आपके साथ रहना चाहता हूँ, आपकी गति से चलना चाहता हूँ, मुझे स्वीकार करें। पुनः माँग हुयी और पूर्ति भी, बस दिशा बदल गयी। जीवन समय से अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

काल की अग्नि में सबको तिरोहित होना है। मैं दौड़ लगा कर आत्मदाह नहीं करूँगा। अपना जीवन अपनी गति से जीकर आगन्तुक से कहूँगा।

" आओ, मैं स्वागत में बैठा हूँ "