यदि आपके पास बीस मिनट का समय हो, तो आप क्या करेंगे? बड़ा ही अटपटा प्रश्न है और उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि कहाँ पर हैं और किस मनस्थिति में हैं। बहुत संभव हो कि आप कुछ न करें, बीस मिनट में भला किया भी क्या जा सकता है? ऐसे बीस मिनट के बहुत से अवसर आते हैं, प्रत्येक दिन, जीवनपर्यन्त। आप कार्यालय के लिये तैयार तो हो गये हैं पर निकलने में बीस मिनट है। आप फिल्म जाने को तैयार हैं, आपकी श्रीमतीजी को श्रंगार में बीस मिनट और लगेगा। भोजन करने बैठे हैं, पर सलाद कटने में बीस मिनट और लग जायेगा। बैठक बीस मिनट देरी से प्रारम्भ होने वाली है, आप स्टेशन बीस मिनट पहले पहुँच गये। इस तरह के न जाने कितने अवसर निकल आते हैं जो आपने सोचे नहीं होते हैं पर आपके पास बीस मिनट उपस्थित रहते हैं। आप क्या करते हैं, या क्या करेंगे?
देखा जाये तो ऐसे बीस मिनटों का जीवन में बड़ा महत्व है। एक दिन में तीन भी बार ऐसा संयोग हो जाये तो मान कर चलिये कि दिन में एक घंटा अधिक मिल गया आपको। बड़ी ही रोचक बात है कि अलग अलग देखा जाये तो उस समय की क्या उत्पादकता? बहुत से लोगों के लिये आगत की तैयारी में या विगत के चिन्तन में यह समय निकल जाता है। आप यदि कुछ नहीं करेंगे तो विचार तो वैसे भी समय को रिक्त नहीं रहने देंगे, कुछ न कुछ लाकर भर ही देंगे।
कहने के लिये बीस मिनट बहुत कम होते हैं पर कहने को कहा जाये तो बहुत अधिक हो जाते हैं। कोई एक विषय देकर कहा जाये कि इस पर बीस मिनट बोलना है तो आधे के बाद ही साँस फूलने लगती है, विषय के छोर नहीं सूझते हैं तब। हँसी हल्ला में तो घंटों निकल जाते हैं पर पिछले दो घंटों में क्या चर्चा हुयी, इस पर बोलने को कहा जाये तो सर भनभनाने लगता है। एक घटना याद आती है, किसी चालक दल ने इंजन का कार्यभार लेने में पाँच के स्थान पर दस मिनट लिये। जब वरिष्ठ अधिकारी ने बुलाया और इस देरी का कारण पूछा तो उत्तर देने में चालक दल ने यह संकेत देने का प्रयास किया कि पाँच अतिरिक्त मिनट कोई अधिक नहीं होते। वरिष्ठ अधिकारी ने बड़े शान्त भाव से उन्हें सुना और कहा कि बस पाँच मिनट तक वे सामने लगी घड़ी को देखते रहें और उसके बाद अपने मन की बात बता कर चले जायें, कोई आरोप नहीं लगेंगे। पाँच मिनट बाद चालक दल स्वयं ही भविष्य में उस भूल को न दुहराने का आश्वासन देकर चले गये।
कभी कभी समस्या भिन्न प्रकार से आती है, यदि आप किसी विषय के विशेषज्ञ हों, आपने जीवन के न जाने कितने वर्ष उस विषय को दिये हों, न जाने कितने शोधपत्र छाप दिये हों, आपने कोई ऐसा नया कार्य किया हो जिसने विज्ञान, विकास, अर्थ, समाज आदि की दिशा बदल दी हो, और तब आपसे कहा जाये कि सार केवल बीस मिनट में प्रस्तुत करें। आपके सामने उस विषय को सामान्य रूप से समझने वाले श्रोतागण बैठे हैं, आपको इतने विस्तार को समेट कर उसका निचोड़ बीस मिनट में प्रस्तुत करना है। यह समस्या लगभग उसी प्रकार से हुयी कि आपसे कहा जाये कि आपको अपने सामानों में केवल बीस को ले जाने की अनुमति है, तो आप कौन से ले जायेंगे। तब जितना श्रम आपको बीस वस्तुओं को निर्धारित करने में लगेगा उससे कहीं अधिक श्रम आपको अपने जीवन की विशेषज्ञविधा को बीस मिनट में समेटने में लगेगा।
आप क्या करेंगे यदि आपको भी यही कहा जाये? संभवतः मर्म को सर्वाधिक महत्व देंगे, उसके चारों ओर जो भी अनावश्यक या कम आवश्यक है उसे उन बीस मिनटों की परिधि के बाहर रखेंगे। जब कहने को सीमित समय हो और कम तथ्य हों तो संवाद की कुशलता सीधे हृदय उतरती है। संवाद कुशल व्यक्ति यह जानते हैं कि श्रोताओं के हृदय में उतरने का मार्ग विषय को सरल ढंग से प्रस्तुत करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। विषय को सरल ढंग से व्यक्त करने के लिये और अधिक श्रम करना पड़ता है और यह कार्य केवल विशेषज्ञ और मर्मज्ञ ही कर सकते हैं।
ऐसा ही कुछ अनुप्रयोग आजकल मुझे आकर्षित कर रहा है और मैं इधर उधर पड़े अपने बीस मिनटों को वही सुनने में लगा रहा हूँ। दिन में तीन और पिछले एक माह से, लगभग ८०-९० वार्तायें सुन चुका हूँ। शिक्षा, विज्ञान, समाज, संगीत, देश और न जाने कितने ही विषय, सारे के सारे उनके विशेषज्ञों द्वारा, हर वार्ता बस बीस मिनट की। रहस्य को और अधिक नहीं खीचूँगा, यह वार्तायें
टेड (TED - Technology Entertainment and Design) के नाम से आयोजित की जाती हैं और इनका ध्येय वाक्य है, प्रसारयोग्य विचार (Ideas worth spreading)। विधि भी बड़ी सरल अपना रखी है, अपने आईपैड मिनी पर चुनी हुयी ढेरों वार्तायें डाउनलोड करके रखता हूँ और जब भी १५-२० मिनट की संभावना मिलती है, सुनना प्रारम्भ कर देता हूँ। कार्यालय जाते समय, निरीक्षण के बीच मिले अन्तराल में, किसी बैठक के प्रारम्भ होने की प्रतीक्षा में और कभी कभी सोने के पहले भी, एक बार में बस बीस मिनट निकालने से कार्य चल जाता है।
इस कार्य में रोचकता कई कारणों से आती है और अब तो यह एक खेल जैसा भी लगने लगा है। पहला तो बीस मिनट निकालना कोई कठिन कार्य नहीं है, ईश्वर ऐसे अवसर बहुतायत में भेंट कर देता है। दूसरा, आपके बीस मिनट किसी विशेषज्ञ से उसके किये हुये कार्य के वर्णन व प्रभाव सुनने में निकलते हैं, विचारों को प्रवाह सदा ही गतिमय और विविधता से भरा होता है। तीसरा, आपकी सृजनात्मकता सदा ही उत्कृष्टता और नवीनता से पोषित होती है। अपने क्षेत्र में विशिष्टतम कार्य करने वालों के ही मुख से उनका अनुभव व उद्गार सुनना, समय का इससे अच्छा उपयोग क्या हो सकता है भला? इसमें हजार से ऊपर वार्तायें हैं जोकि एक अरब से भी अधिक बार सुनी जा चुकी हैं, ये संख्यायें इसकी रोचकता को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती हैं।
लेखन यात्रा में बहुधा लगता है कि घट खाली हुआ जा रहा है, समय रहता है पर सूझता नहीं कि क्या लिखा जाये? विचार मानसून की भविष्यवाणी की तरह ही आते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं। जब कुछ देने की स्थिति में नहीं होता है जीवन तो याचक के रूप में आकर कुछ ग्रहण कर लेना रोचक भी लगता है और आवश्यक भी। पता नहीं घट कब तक भरेगा? कभी कभी तो लगता है कि इतने अच्छे और उत्कृष्ट विचार सुनने के क्रम में हम अपनी प्यास और बढ़ा बैठे हैं, जितना सुनते हैं, उतने प्यासे और रह जाते हैं। लगने लगता है कि कितना नहीं आता है अभी, कितना सीखना शेष है अभी।
सुनना व्यर्थ न जायेगा, कुछ न कुछ नये विचार सूत्र अवश्य निकलेंगे, कुछ श्रंखलायें अवश्य बनेगी जिनमें सबको प्रभावित कर जाने की क्षमता होगी, कुछ दर्शन उभरेगा जिसमें हम अपने उत्तर पाने की दिशा में बढ़ने लगेंगे। कुछ नया सीखने या जानने का मन हो तो आप क्या करेंगे? विशेषज्ञों से अच्छा भला और कौन बता पायेगा आपको, वह भी बस बीस मिनट में।