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13.3.13

नेटवर्क टैक्स

कई बार ऐसा हुआ है ट्रेन यात्रा के समय रात में सोया और सुबह उठने पर पाया कि मोबाइल में १५% बैटरी कम हो गयी। कोई फ़ोन नहीं, कोई इण्टरनेट नहीं, तब कौन सा टैक्स लग गया? थोड़ा शोध किया तो पता चला कि यह नेटवर्क टैक्स है, आपका बिल नहीं खाता है, बस बैटरी खाता है।

कुछ दिनों बाद सामान्य ज्ञान के प्रश्न कुछ इस तरह से हुआ करेंगे। माना कि १००० किमी की यात्रा में २०० किमी में नेटवर्क नहीं है। पहले मार्ग में २०० किमी की यह दूरी २० किमी के १० हिस्सों में बंटी है। दूसरे मार्ग में २०० किमी की यह दूरी एक साथ है। किस मार्ग में जाने से आपकी बैटरी अधिक कम होगी और क्यों? उत्तर कठिन नहीं है, पहले मार्ग में बैटरी का क्षय दूसरे मार्ग से कहीं अधिक होगा।

क्यों का उत्तर भी समझाया जा सकता है, पर उसके लिये मोबाइल की सामान्य कार्यप्रणाली समझनी होगी। मोबाइल के अन्दर एक चिप होती है, जिसका कार्य बैटरी की ऊर्जा को रेडियो सिग्नल में बदलना होता है, रेडियो सिग्नल के माध्यम से हम नेटवर्क से संपर्क साध पाते हैं। यही चिप जिसे हम पॉवर एम्पलीफायर भी कहते हैं, मोबाइल की ६५% तक ऊर्जा खा जाती है। यदि नेटवर्क से संपर्क बना रहता है तो थोड़ी कम ऊर्जा लगती है, यदि नेटवर्क ढूँढना हो तो यही ऊर्जा और अधिक व्यय हो जाती है। यही नहीं, नेटवर्क न मिलने की दशा में पुनः खोज प्रारम्भ हो जाती है और तब तक चलती है जब तक वह मिल न जाये। कई अच्छी तकनीक वाले फ़ोन इस नेटवर्क बाधा से परिचित होते हैं और लगभग ३० मिनट बाद प्रयास करना बन्द कर देते हैं और अगले प्रयास के पहले थोड़ा विश्राम ले लेते हैं। कम समझदार मोबाइल जूझे रहते हैं और बैटरी गँवा कर गर्म होते रहते हैं।

२०० किमी में जब १० बार यह नेटवर्क बाधा आयेगी तो अधिक ऊर्जा व्यय होगी, जबकि केवल एक बार बाधा आने से यही व्यय बहुत कम होगा। ऐसा नहीं है कि नेटवर्क का न होना ही ऊर्जा व्यय करता है। जब भी नेटवर्क की उपस्थिति कम होती है या कहें कि आपको अपने मोबाइल में कम डंडियाँ दिख रही हों, समझ लीजिये कि चिप महोदय बैटरी का ख़ून चूसने में लगे हैं, नेटवर्क से अपना संबंध स्थापित करने के लिये और आपको अधिक डंडियाँ दिखाने के लिये। अधिक सघनता या टॉवर से दूरी के कारण नेटवर्क की क्षमता में आये उतार चढ़ाव आपकी मोबाइल बैटरी को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। संभव है कि दो कम्पनियों के नेटवर्क एक ही तरह के मोबाइल पर भिन्न प्रभाव डालें। एक नगर में भी किसी कम्पनी के टॉवरों को इस तरह से लगाया जाता है कि कम से कम टॉवरों में सारा नगर ढक जाये और बाधित नेटवर्क के स्थान भी न्यूनतम रहें। यदि उसमें कोई कमी रही है तो उसका दण्ड आपकी मोबाइल बैटरी को देना होगा, नेटवर्क टैक्स के रूप में।

फोन का यह नियत टैक्स तो सबको ही देना पड़ेगा। अब जो लोग फ़ेसबुक, ट्विटर आदि के लिये इण्टरनेट का भी उपयोग करते हैं, उनकी बैटरी लगभग दुगनी गति से कम होती है। कुछ और लोग जो बड़े नगरों में हैं और साधारण जीएसएम के स्थान पर २जी या ३जी का उपयोग करते हैं, उनका कार्य और भी तीव्र गति से हो जाता है। उन्हें अधिक डाटा डाउनलोड करने की सुविधा रहती है पर उनकी बैटरी और भी अधिक मात्रा में कम हो जाती है। सिद्धान्त वही है कि जितना तेज भागना हो उतनी तेजी से ऊर्जा बहानी पड़ती है।

आप यदि अतिव्यस्त हैं तो चाहेंगे कि जैसे ही कोई ईमेल हो या फेसबुक स्टेटस आया हो, वह तुरन्त ही आपके मोबाइल पर उपस्थित हो जाये। इस दशा में आप अपना २जी या ३जी नेटवर्क हर समय चालू रखते हैं और आपका संबंधित एप्लीकेशन सदा ही यह पता करने में लगा रहता है कि कोई आगत संदेश तो नहीं है। इस स्थिति में बैटरी अत्यन्त दयनीय हो जाती है, पता नहीं कब समाप्त हो जाये, कभी कभी तो एक दिन भी नहीं। प्रारम्भिक फोनों में एक नोकिया का फोन ऐसा था जो डाटा केवल एप्लीकेशन खोलने पर ही जोड़ता था और शेष समय बन्द रखता था। सारे फोनों में यह सुविधा नहीं है और बहुधा डाटा बहता ही रहता है, न जाने कितने स्रोतों से। एक नये शोध में यह भी बताया गया है कि फ्री में मिलने वाले एप्लीकेशन सर्वाधिक डाटा खाते हैं क्योंकि उसमें आपके मोबाइल से संबंधित जानकारी अपलोड होने की और विविध प्रचार डाउनलोड होने की विवशता होती है। हो सके तो वह अनुप्रयोग खरीद ले, उसमें प्रचार नहीं होगा और वह डाटा और बैटरी पर होने वाले धन के व्यय को भी बचायेगा।

एक बड़ा सीधा सा प्रश्न आ सकता है कि जब इतने पैसे खर्च कर एक स्मार्टफोन लिया है तो क्यों न उसका उपयोग अधिकतम करें। और यदि संसार से हर समय जुड़े रहना है तो इण्टरनेट को सदा ही चालू रखना होगा, थोड़ी बहुत बैटरी जाती है तो जाये। प्रश्न अच्छा है पर यह एक और बड़ा प्रश्न खड़ा करता है, क्या आप चाहते हैं कि आपका मोबाइल हर समय आपकी दिनचर्या या कार्यचर्या में व्यवधान डालता रहे, या आपके अनुसार चले? यदि आप हर समय व्यवधान नहीं चाहते हैं तो दोनों ही ध्येय साधे जा सकते हैं, पहला सदा ही सूचित बने रहने का, दूसरा लम्बी बैटरी समय का। पर उसके लिये एक नियम बनाना पड़ेगा।

अपना डाटा 'पुस' के स्थान पर 'फेच' पर कर लें, कहने का आशय है कि जब भी आप अपना एप्लीकेशन खोलेंगे तभी डाटा बहना प्रारम्भ होगा। हो सकता है यह करने के पश्चात आप दिन में कई बार देखें, पर बीच का जो समय बचेगा उस समय आपका मोबाइल व्यर्थ श्रम करने से बच जायेगा और बैटरी अधिक चलेगी। ऐसा करने भर से बैटरी में २०% तक ही वृद्धि हो जायेगी, न कुछ छूटेगा और व्यवधान भी कम होगा। यदि बैटरी और बचानी हो तो डाटा को पूरी तरह से बन्द कर दें और जब भी एप्लीकेशन देखना हो उसके पहले ही डाटा भी जोड़ें। जब एप्लीकेशन नहीं भी चल रहा होता है तब भी २जी या ३जी को स्थापित किये रहने में बहुत बैटरी खर्च होती है। साथ ही साथ ३जी नेटवर्क पर किया फोन और एसएमएस भी सामान्य की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा खाते हैं। डाटा भी बन्द कर देने से बैटरी का समय लगभग दुगना हो गया। ऐसा नहीं कि कोई कार्य छूट गया हो, बस थोड़ा सा व्यवस्थित भर हो गया। दो या तीन घंटे में समय पाकर एक बार डाटा चालू कर सारे स्टेटस और ईमेल देख लेते थे और फिर अपने कार्य में। थोड़ा धैर्य भर बढ़ गया, सूचना पूरी मिलती रही।

एक बात और, मोबाइल में वाईफाई के माध्यम से इण्टरनेट देखने में नेटवर्क की तुलना में बहुत कम ऊर्जा व्यय होती है और गति अधिक मिलती है सो अलग। यदि आपके पास घर या कार्यालय में वाईफाई की सुविधा है तो उसका उपयोग अवश्य करें। वाईफाई होने पर उसी को नेटवर्क के ऊपर प्राथमिकता मिलती है। यह प्रयोग आईफोन पर किया और पहले की तुलना में लगभग दुगनी बैटरी चलने लगी। पहले एक दिन चलती थी, अब दो दिन से भी अधिक खिंच गयी। हमने नेटवर्क से यथासंभव कम संपर्क रखा हुआ है, केवल कार्यानुसार ३जी चलता है, बैटरी के रूप में हमारा नेटवर्क टैक्स भी कम हो गया है। आप भी प्रयोग कर डालिये।

6.3.13

अलग अलग कीबोर्ड

मेरी प्रतीक्षा को निराशा मिली। यद्यपि मैं लगभग डेढ़ वर्ष पहले से ही आईफ़ोन में हिन्दी कीबोर्ड का उपयोग कर रहा हूँ पर विण्डो व एण्ड्रायड फ़ोनों में हिन्दी के कीबोर्डों का स्वरूप कैसा होगा, यह उत्सुकता मन में  लिये डेढ़ वर्ष से प्रतीक्षा कर रहा था। यदि इन दोनों फ़ोनों में हिन्दी कीबोर्ड पहले आ गये होते तो संभव था कि कुछ पैसे बचाने के लिये मैं आईफ़ोन का उपयोग न कर के इनमें से किसी एक के अच्छे मॉडल का उपयोग कर रहा होता। मेरे लिये आईफ़ोन ख़रीदने का प्राथमिक कारण उस पर हिन्दी कीबोर्ड का आना था, यदि उसने भी देर की होती तो एप्पल से जान पहचान ही न हुयी होती। आज एक नहीं, चार और एप्पल उत्पाद ले चुका हूँ और बहुत संतुष्ट भी हूँ। सीधा सा हिसाब था, एप्पल ने हिन्दी का सम्मान किया, इस कारण मेरा परिचय बढ़ा और अब प्यार हो गया है, इसकी गुणवत्ता से। संभवत एप्पल को ज्ञात था कि मुझ तक पहुँचने का मार्ग हिन्दी से होकर जाता है।

ऐसा नहीं है कि विण्डो व एण्ड्रायड फ़ोनों ने हिन्दी के महत्व को समझा नहीं। समुचित समझा पर बड़े देर से समझा। बस कुछ सप्ताह पहले ही दोनों के हिन्दी कीबोर्ड आ गये। पर अब दोनों के हिन्दी कीबोर्डों को देख कर लग रहा है कि दोनों ने ही अपनी सुविधानुसार कीबोर्ड बना दिया, बिना अधिक विश्लेषण किये हुये। इस निर्णय से न हिन्दी टाइप करने वालों का कोई लाभ होने वाला है और न ही इन दोनों कम्पनियों को हिन्दी के इस बाज़ार में कोई सफलता मिलने वाली है। मेरा आशय किसी पर कटाक्ष करने का नहीं है या आलोचना में उद्धत होने का नहीं है, पर हिन्दी कीबोर्ड के उद्भव में भिन्न भिन्न राग सुना रहे लोगों को यह बताने का है कि बिना मानकीकरण न आपका भला होगा और न ही हिन्दी का। और साथ ही साथ मेरे लिये भी भविष्य में आईफ़ोन छोड़ पाने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जायेगी।

विज्ञ कह सकते हैं कि भले ही विण्डो में हिन्दी कीबोर्ड अभी आया हो पर एण्ड्रायड में तो लगभग एक वर्ष से हिन्दी कीबोर्ड है। निश्चय ही हिन्दी कीबोर्ड था, पर वह वाह्य एप्स के रूप में था, तनिक छोटे आकार का था और उपयोग में बहुत ही कष्टकर। जब कभी भी उससे टाइप करने का प्रयास किया, प्रवाह बाधित रहा, कारण निश्चय ही उनका वाह्य आरोपित होना होगा, हर बार ओएस की दीवार भेद कर जाने और वापस आने में समय तो लगता ही है। न ही उससे प्रभावित हुआ जा सकता था और न ही उससे लम्बे समय तक टाइप किया जा सकता है। यद्यपि अभी भी गूगल हिन्दी इनपुट के नाम से जो एप्स आया है, वह भी वाह्य एप्स के रूप में ही आया है, पर गूगल के द्वारा तैयार होने पर उसका समन्वय ओएस से कहीं गहरा होगा, तनिक तीव्र होगी उसकी गति औरों की तुलना में। प्रसन्नता तब और अधिक होती जब ओएस के अगले संस्करण में हिन्दी के कीबोर्ड को सम्मिलित किया गया होता।

जब नोकिया का सी३ फ़ोन उपयोग में लाता था तो उसमें एक वाह्य हिन्दी कीबोर्ड था। लगा था कि नोकिया के पास यह तकनीक होने के कारण विण्डो के नये फ़ोनों में पहले दिन से ही हिन्दी आयेगी। ऐसा नहीं हुआ, कई बार जाकर उसमें हिन्दी खोजी तो नहीं मिली। बड़ा दुख भी हुआ और आश्चर्य भी। जब विण्डो ५ के फ़ोन से आईरॉन का हिन्दी कीबोर्ड उपस्थित था, नोकिया सी३ में हिन्दी की बोर्ड उपस्थित था तो विण्डो के नये फ़ोनों में उनका होना स्वाभाविक ही था। अच्छा हुआ विण्डो फ़ोनों में ओएस स्तर हिन्दी कीबोर्ड आ गया है पर उसका भी अवतरण प्रभावित नहीं कर पाया।

जब भी मैं कहता हूँ कि हिन्दी का कीबोर्ड ओएस के स्तर पर होना चाहिये तो मेरा संकेत दो लाभों की ओर है। पहला तो इससे कीबोर्ड की गति बढ़ जाती है, उसका अन्य एप्स से समन्वय गाढ़ा हो जाता है, टाइपिंग निर्बाध गति से होती है और किसी समस्या की संभावना भी नहीं होती है। दूसरा, ओएस के अपग्रेड होने पर कीबोर्ड भी स्वतः ही अपग्रेड हो जाता है और एप्स के अलग से अपग्रेड होने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती है। यही कारण है कि ओएस में ही कीबोर्ड का होना अधिक लाभदायक है और साथ ही साथ अधिक प्रभावी भी।

कहने को तो गूगल हिन्दी इनपुट में फ़ोनेटिक व्यवस्था भी है, यही कि आप अंग्रेज़ी में टाइप करें और वह स्वतः ही बदल कर हिन्दी में बदल जायेगा। पहले भी बारहा के उपयोग से लैपटॉप पर हिन्दी बहुत दिनों तक टाइप भी की है, पर गति धीमी होने के कारण और हिन्दी शब्दों को अंग्रेज़ी की बैसाखी पहनाने के कारण उसका त्याग कर दिया। उसके स्थान पर हर लैपटॉप में उपस्थित देवनागरी इन्स्क्रिप्ट में टाइप करना सीखना प्रारम्भ में तनिक कठिन लगा पर एक सप्ताह में ही गति आ गयी। कहने का आशय यह कि फ़ोनेटिक टाइपिंग का उपयोग तब तक नहीं करना चाहिये जब तक कोई सीधा साधन उपस्थित हो।

आइये तीन प्रमुख मोबाइल उत्पादकों का हिन्दी कीबोर्ड से संबंधित असंबद्धता देखें। एक तथ्य तो स्पष्ट दिख रहा है कि कोई एक उत्पाद आपने ले लिया और उस पर हिन्दी टाइपिंग करते हुये रम गये तो भविष्य में कोई अन्य मोबाइल ख़रीदने का साहस नहीं कर पायेंगे, एक में ही अटक कर रह जायेंगे। तीनों में हिन्दी कीबोर्ड के भिन्न भिन्न प्रकार आपके लिये बाधा बनकर खड़े रहेंगे। दूसरा, यदि आप लैपटॉप पर देवनागरी इन्स्क्रिप्ट में टाइप करते हैं तो आपको विण्डो या एण्ड्रायड में टाइप करने के लिये एक अतिरिक्त और सर्वथा भिन्न प्रारूप समझना पड़ेगा। दों भिन्न प्रारूपों में भ्रम की संभावना सदा ही बनी रहेगी। आपको बताते चलें कि देवनागरी इन्स्क्रिप्ट प्रारूप ही भारतीय मानक है और हर लैपटॉप में उपस्थित भी।

जब मैंने कहा था कि प्रतीक्षा ने निराश किया है, तब मेरा आशय प्रमुख मोबाइल उत्पादकों के द्वारा भिन्न दिशाओं में भागा जाना था। अभी ब्लैकबेरी १० का पदार्पण होना है पर उसके इतिहास को देख कर यह लगता नहीं है कि वह भी हिन्दी कीबोर्ड के क्षेत्र में अपना राग नहीं अलापेगी।

पिछले ७ वर्षों से मेरा मार्ग अब तक देवनागरी इन्स्क्रिप्ट प्रारूप से होकर आया है, आईफ़ोन के अतिरिक्त अन्य सबने लगभग यह सिद्ध कर दिया है कि चाहे मानक कीबोर्ड जायें भाड़ में पर वे अपने तरीक़े से भारतीयों से हिन्दी टाइप करवायेंगे। यदि ऐसा है तो बड़ा ही कठिन हो जायेगा, तीन चार भिन्न प्रकार के कीबोर्डों से तो हिन्दी में भी नये वर्ग खड़े हो जायेंगे। इतने वर्षों के प्रयास के बाद कम से कम हिन्दी के कीबोर्ड आ रहे हैं, पर उनका भी क्या लाभ जो मानक न हों और उपयोगकर्ता को नये प्रकार से सीखने को विवश करें।

पता नहीं कि नये प्रारूप के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है या सुविधा है वर्णमाला को एक क्रम में सजा देने की। सबको यह तो लगता है कि बिना हिन्दी कीबोर्ड उनका विकास और फैलाव बाधित रहेगा पर किस प्रकार से उसे प्रस्तुत करना है, इस पर कोई समुचित विचार नहीं हुआ है। मेरा केवल एक ही विनम्र अनुरोध है कि कृपा कर मानक देवनागरी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड को ही साथ लेकर चले।

11.2.12

क्लाउड का धुंध

विकल्प की अधिकता भ्रम उत्पन्न करती है, भ्रम स्पष्ट दिशा ढाँक देता है, भ्रम सोचने पर विवश करता है, भ्रम निर्णय लेने को उकसाता है, भ्रम का धुंध छटने का अधैर्य एक अतिरिक्त भार की तरह साथ में लगा रहता है। कितना ही अच्छा होता कि विश्व एक मार्गी होता, एक विमीय, बढ़ते रहिये, कोई चौराहे नहीं, कोई विकल्प नहीं। पर क्या यह मानव मस्तिष्क को स्वीकार है, नहीं और जिस दिन यह स्वीकार होगा, उस दिन विकास का शब्द धरा से विदा ले लेगा। किसी कार्य को श्रेष्ठतर और उन्नत विधि से करने की ललक विकास का बीजरूप है। यह बीजरूप इस जगत में बहुतायत से फैला है। अतः जब तक विकास रहेगा, विकल्प रहेगा, भ्रम रहेगा, धुंध रहेगा। धुंध के पीछे का सूरज देखने की कला तो विकसित करनी होगी, धुंध छाटते रहना विकासीय मानव का नियत कर्म है।

ऐसा ही कुछ धुंध, इण्टरनेट में क्लाउड ने कर रखा है। क्लाउड का शाब्दिक अर्थ बादल है, प्रतीक पानी बरसाने का, संभवतः ध्येय भी वही है, सूचना के क्षेत्र में। यही भविष्य माना जा रहा है क्योंकि अपने उत्पाद बेचने के लिये और अपनी बेब साइटों पर आवागमन बनाये रखने के लिये क्लॉउड को विशेष उत्प्रेरक माना जा रहा है। पहले कितना अच्छा था कि एक हार्डडिस्क या पेन ड्राइव लिये हम लोग घूमते रहते थे, कभी कार्यालय के कम्प्यूटर से, कभी घर के कम्प्यूटर से, कभी मोबाइल से, कभी इण्टरनेट से, सूचनायें निकालते और भेजते रहते थे। एक कीड़ा काटा किसी को, कि काश यह सब अपने आप हो जाता, लीजिये प्रारम्भ हो गयी क्लाउड यात्रा।

इसके तीन अंग हैं, पहली वह सूचना जो आप इण्टरनेट पर संरक्षित रखना चाहते हैं, दूसरे वे यन्त्र जिन्हे आप उपयोग ला रहे हैं और तीसरे वह एप्पलीकेशन व माध्यम जो इस प्रक्रिया में सहायक बनते हैं। इन तीनों अंगों को दो कार्य निभाने होते हैं, पहला स्वतः सूचना संरक्षित करने का और दूसरा आपके यन्त्रों के बीच सूचनाओं की सततता बनाये रखने का। जो लोग यह मान कर चलते हैं कि इण्टरनेट की उपलब्धता अनवरत बनी रहेगी और उसके अनुसार इन सेवाओं का प्रारूप बनाते हैं, वे प्रारम्भ से ही उन स्थानों को इन सेवाओं से बाहर कर देते हैं जहाँ इंटरनेट अपने पाँव पसारने का प्रयास कर रहा है। इसके विस्तृत उपयोग के लिये यह आवश्यक है कि इन सेवाओं को, इंटरनेट की उपलब्धता और अनुपलब्धता, दोनों ही दशाओं में सुचारु चलने के लिये बनाया जाये।

तीन सिद्धान्त हैं जिनके आधार पर आप किसी भी क्लाउड सेवा की गुणवत्ता माप सकते हैं।

१. मोबाइल, लैपटॉप और इण्टरनेट पर एक ही प्रोग्राम हो। यह हो सकता है कि प्रोग्राम अपने पूर्णावतार में लैपटॉप पर हो, मोबाइल व इंटरनेट पर अर्धावतार में आ पाये, पर सूचनाओं के संपादन की सुविधा तीनों में होना आवश्यक है। इस प्रकार किसी भी माध्यम में कार्य करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यदि प्रोग्राम केवल इंटरनेट पर ही होगा तो आप इंटरनेट के लुप्त होते ही अपंग हो जायेंगे।

२. ऑफलाइन संपादन बहुत आवश्यक है, इस प्रकार आप उस सेवा का उपयोग कभी भी कर सकते हैं। पिछले समन्वय के बाद हुये परिवर्तनों को एकत्र करने और उसे इंटरनेट के उपलब्ध होते ही क्लाउड पर भेज देने से समन्वय का एक नया बिन्दु बन जाता है। यही क्रम चलता रहता है, हर बार, जब भी ऑफलाइन संपादन होता है। हुये बदलाव को किस प्रकार कम से कम डाटा में परिवर्तित कर क्लाउड में भेजा जाता है, यह एक अत्यन्त तकनीकी विषय है।

३. एक बार क्लाउड में परिवर्तन हो जाता है, उसके बाद किस प्रकार वह सूचना अन्य यन्त्रों पर पहुँच कर संपादित होती है, इस पर क्लाउड सेवा की गुणवत्ता का स्पष्ट निर्धारण होता है। यदि आपको उस प्रोग्राम में जाकर सूचना को अद्यतन करने के लिये अपने हाथों समन्वय करना पड़े तो वह सेवा आदर्श नहीं है। प्रोग्राम खोलते ही समन्वय स्वतः होना चाहिये। यह भी हो सकता है कि किसी एक ही लेख पर आपने मोबाइल और लैपटॉप पर आपने अलग अलग ऑफलाइन संपादन किया, बाद में इंटरनेट आने पर उन दोनों संपादनों को किस प्रकार क्लाउड सेवा सुलझायेगी और सहेजेगी, यह क्लाउड सेवा की गुणवत्ता का उन्नत अंग है।

कई कम्पनियाँ क्लाउड सेवाओं में 'कई लोगों के द्वारा संपादन की सुविधा' को जोड़कर उसे और व्यापक बना रही हैं। इसमें एक फाइल पर एक समय में कई लोग कार्य कर सकते हैं। बड़े लेखकीय प्रकल्पों पर एक साथ कार्य कर रहे कई व्यक्तियों के लिये इससे उत्कृष्ट और स्पष्ट साधन नहीं हो सकता है।

आजकल मैं अपने लेखन में इस सेवा का भरपूर उपयोग कर रहा हूँ, यह पोस्ट आधी आईफोन पर, आधी मैकबुक पर, एक चौथाई ब्रॉडबैंड के समय, एक चौथाई जीपीआरएस के समय और आधी इंटरनेट की अनुपलब्धता के समय लिखी है। एक जगह किया संपादन स्वतः ही दूसरी जगह पहुँचता रहा और अन्ततः पोस्ट आप तक।

इस समय कई क्लाउड सेवायें सक्रिय हैं, जो भी चुनें उन्हें उपरोक्त सिद्धान्तों की कसौटी पर ही चुनें, आपका जीवन सरल हो जायेगा। यदि क्लाउड सेवा में इतनी सुविधायें नहीं है तो अच्छा है कि पेन ड्राइव से ही काम चलाया जाये।

4.6.11

आधुनिक झुमका

तकनीक हमारी जीवनशैली बदल देती है। नयी जीवनशैली नये अनुभव लेकर आती है। दो घटनायें ही इस तथ्य को स्थापित करने के लिये पर्याप्त हैं।

सामने से आते एक व्यक्ति को हल्के से मुस्कराते हुये देखता हूँ, सोचता हूँ कि कोई परिचित तो नहीं, याद करने का यत्न करता हूँ कि कहाँ देखा है, जैसे जैसे पग आगे बढ़ाता हूँ अपनी स्मरणशक्ति पर झुँझलाहट होने लगती है, भ्रम-मध्य में खड़ा परिचय-अपरिचय की मिश्रित भंगिमा बनाकर उनके सम्बोधन की डोर ढूँढ़ता हूँ, किन्तु आगन्तुक बिना कुछ कहे ही निकल जाते हैं। अरे, तो मुस्कराये क्यों थे, थोड़ा ध्यान से देखा तो महाशय ब्लूटूथ पर अपनी प्रेमिका से बतिया रहे थे और हमारी स्मरणशक्ति पर अकारण ही जोर डाल रहे थे। चलिये, एक बार स्मरणशक्ति पर तो आक्षेप सहा जा सकता है पर जब सामने से यही प्रक्रिया कोई कन्या कर बैठे तो आप वहीं खड़े हो जायेंगे, किंकर्तव्यविमूढ़ से। यदि दुर्भाग्यवश आपकी पत्नी आपके साथ में हों तो संशयात्मक भँवरों में उतराने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं बचेगा आपके लिये।

एक साफ्टवेयर कम्पनी में कार्यरत पतिदेव अपनी श्रीमतीजी के साथ होटल में खाने जाते हैं। इसी बीच एक अन्तर्राष्ट्रीय कान्फ्रेन्स कॉल आ जाती है, पत्नी को बिना कुछ बताये पतिदेव कान में ब्लूटूथ लगाकर वार्तालाप सुनने लगते हैं, पर आँखें एकाग्र अपनी पत्नी पर टिकाये हुये। पत्नी का हृदय आनन्द में हिलोर उठता है, उन्हें लगता है कि पुराने दिन पुनः वापस आ गये हैं, आनन्दविभोर उनकी माँगों की सूची धीरे धीरे शब्दरूप लेने लगती हैं एक के बाद एक, वह भी बड़े प्यार से, पति एकाग्रचित्त हो सप्रेम देखते ही रहते हैं। अब सूची इतनी बड़ी हो गयी कि पत्नी को संशय होने लगा, अटपटा भी लगने लगा, सकुचा कर पत्नी शान्त हो जाती हैं। उसी समय कॉल समाप्त होती है और पति उत्सुकता वश पूछ बैठते हैं कि आप कुछ कह रहीं थी क्या? उफ्फ..., अब शेष दृश्य आप बस कल्पना कर लीजिये, मुझमें तो वह सब सुनाने की सामर्थ्य नहीं है।

कान में लगाने वाला ब्लूटूथ का यन्त्र आधुनिक जीवनशैली का अभिन्न अंग है। जिन्होने आधा किलो के फोन रिसीवर का कभी भी उपयोग किया है, उनके लिये डेढ़ छटाक का यह आधुनिक झुमका किसी चमत्कार से कम नहीं है। आप बात कर रहे हैं पर आपके दोनों हाथ स्वतन्त्र हैं, कुछ भी करने के लिये। न जाने कितने लोग इसका उपयोग कर गाड़ी चलाते हुये भी बतियाते हैं, ट्रैफिकवाला भले ही कितनी भी बड़ी दुरबीन लेकर देख ले, उसे किसी भी नियम का उल्लंघन होता हुआ नहीं दिखायी देगा, अपितु लगेगा कि कितने एकाग्र व प्रसन्नचित्त वाहन चालक हैं।

निश्चय ही बहुत घटनायें होंगी, चलते चलते खम्भे से भिड़ने की या चलाते चलाते गाड़ी भिड़ाने की। आधुनिक झुमका होने से कम से कम इतनी सुविधा तो है कि दोनों हाथ खाली रहते हैं, स्वयं को सम्हालने के लिये। एक हाथ में मोबाइल होने से तो भिड़ने व भिड़ाने की सम्भावनायें दुगनी हो जाती हैं।

हमारे पास भी आधुनिक झुमका है, फोन आते ही कान में लगा लेते हैं। सुरक्षित क्षेत्र में हैं क्योंकि न ही गाड़ी चलाते हैं और न ही हँसकर बात करने वाली कोई प्रेमिका ही है। बात करते करते निर्देशों को मोबाइल पर ही लिख लेते हैं, बात यदि हल्की फुल्की हो तो मेज पर हल्का सा तबला बजा लेते हैं, बात यदि बहुत लम्बी चलनी हो तो घर में फैला हुआ सामान समेटने में लग जाते हैं।

कल ही पढ़ा है कि मोबाइल तरंगें, ब्लूटूथ तरंगों से अधिक घातक होती हैं, कैंसर तक हो सकता है, आधुनिक झुमका लेना हमारे लिये व्यर्थ नहीं गया। मोबाइल भी आवश्यक है और शरीर भी, दोनों में सुलह करा देता है यह आधुनिक झुमका। कम से कम साधनों में जीने वाले जीवों को एक अतिरिक्त यन्त्र को सम्हाल कर रखना बड़ा कष्टप्रद हो सकता है पर स्वास्थ्य, सुरक्षा और सौन्दर्य की दृष्टि से यह आवश्यक भी है। श्रीमतीजी के कनक-छल्लों से तो बराबरी नहीं कर पायेगा आधुनिक छल्ला पर इसे पहन कर आप अधिक व्यस्त और कम त्रस्त अवश्य ही दिखेंगे।

16.2.11

नोकिया और माइक्रोसॉफ्ट

बहुत अन्तर नहीं पड़ता किसी को, यदि मोबाइल का उपयोग मात्र बात करने के लिये ही किया जाता, पर न जाने क्या ललक है मानव मन की, जो हथेली के आकार के मोबाइल फोन से सब कुछ कर डालना चाहता है। श्रेष्ठतम पा लेने का यह उपक्रम, न केवल वातावरण को जिज्ञासु बनाये रखता है वरन मोबाइल बाजार में भी जीवन्तता बरसाये रहता है।

ऐसी ही एक हलचल हुयी पाँच दिन पहले जब नोकिया और माइक्रोसॉफ्ट ने हाथ मिला लिया और निश्चय किया कि आगे आने वाले नोकिया के सारे स्मार्टफोन विण्डो फोन 7 पर चलेंगे।

आप अपने मोबाइल से केवल बात ही करते हैं तो हजार रुपये से अधिक न व्यय करें उस पर। पर यदि आपके लिये मोबाइल का उपयोग अधिक है तो इस हलचल का मन्तव्य समझना होगा। उनके लिये महत्व और बढ़ जाता है जो अपने लैपटॉप या डेस्कटॉप और अपने मोबाइल के बीच नियमित समन्वय बनाये रखते हैं। इण्टरनेटीय क्लॉउड में अपनी सूचनायें और सामग्री रखने वालों के लिये इसे और भी गहनता से समझना चाहिये। मोबाइल, लैपटॉप और इण्टरनेट के त्रिभुज के बीच छिपा है आपके डिजिटल जीवन का रहस्य। यदि आप इन तीनों को भिन्नता में देखते हैं तो आप इस विकासीय त्रिभुज की परिधि से बाहर हैं।

मैं जब से विण्डो फोन उपयोग में ला रहा हूँ, मेरे लिये इस त्रिभुज में बने रहना बड़ा सरल हो चला है। सभी संपर्क, कार्य, समयबद्धता, नोट्स, लेखन और सूचना उपलब्धता, इन सभी क्षेत्रों में मोबाइल, लैपटॉप या इण्टरनेट पर किया हुआ कोई भी संपादन स्वमेव अन्य में पहुँच जाता है। कुछ सूझा, मोबाइल पर फ्रीहैण्ड से लिख लिया, लैपटॉप पर बैठे और उसमें कुछ जोड़ दिया। लेख और अनुसंधान एक दिन में अवतरित नहीं होते हैं, उस दृष्टि से इस प्रकार निर्बाध निर्माण होता है विचार-प्रवाह का। अन्य जनों की भागीदारी भी इण्टरनेट के माध्यम से समन्वय पा जाती है।

इस युद्ध में अब तीन योद्धा हैं, एप्पल जो अपना सॉफ्टवेयर और मोबाइल स्वयं बनाता है, गूगल जो एक ओपन सोर्स मंच तैयार कर रहा है और तीसरा यह गठबंधन नोकिया और माइक्रोसॉफ्ट का।

हर देश के लिये इस संघर्ष के संदर्भ अलग हो सकते हैं पर भारत के लिये इसका विशेष महत्व है। देश के लगभग 95 प्रतिशत से अधिक कम्प्यूटर माइक्रोसॉप्ट के सॉफ्टवेयर उपयोग में ला रहे हैं। नोकिया के मोबाइल लगभग 54 प्रतिशत लोगों के हाथों में हैं। जहाँ एक ओर माइक्रोसॉफ्ट मोबाइल क्षेत्र में अपनी पहुँच बढ़ाने के लिये प्रयासरत है, वहीं दूसरी ओर सुदृढ़ मोबाइल सॉफ्टवेयर के आभाव में नोकिया के हाथ से मोबाइल का बाजार खिसकता जा रहा है। यह गठबंधन जहाँ इन दोनों के लिये लाभप्रद है, वहीं हम उपयोगकर्ताओं के लिये समन्वय की दृष्टि से सरल है।

नोकिया की क्षमता मोबाइल सेटों के दमखम में है। बनावट, भाषा समर्थन, जनसाधारण तक पहुँच, मानचित्र और ओवी स्टोर का लाभ विण्डो फोन 7 के फोनों को मिलेगा। माइक्रोसॉफ्ट की क्षमता सॉफ्टवेयर में है। बिंग खोज, प्रचारतंत्र, एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर, विण्डो लाइव और ऑफिस डॉकुमेन्ट्स नोकिया के फोनों को और स्मार्ट बना देंगे। बहुत संभावना है कि हिन्दी कीबोर्ड उसमें आ जाये क्योंकि नोकिया सी5 में हिन्दी कीबोर्ड को लाया जा चुका है।

एप्पल के मोबाइल निसन्देह तकनीक के कई पक्षों में अग्रणी हैं पर उनकी कारागारीय मानसिकता में बँध कर रहना भारतीयों को भाता नहीं है। गूगल को विकास के लिये खुला मंच प्राप्त है पर अपना ओ एस न होने से लैपटॉप से समन्वय में उनकी सक्षमता बहुत कम है क्योंकि इण्टरनेट पर सतत निर्भरता भारत में अधिक संभव नहीं है। दोनों ही हिन्दी के क्षेत्र में अपने अपने उपेक्षा स्वर व्यक्त कर रहे हैं। इन स्थितियों में यह गठबंधन सशक्त लगता है और भारत के लिये अधिक संभावनाये लिये हुये है। भारत में पूर्ववर्णित त्रिभुज की समग्रता से देखें तो यही घोड़ा आगे निकलेगा।

मेरे विण्डो फोन को साढ़े तीन साल हो चुके हैं, हम दोनों एक दूसरे से प्रसन्न और संतुष्ट हैं। नोकिया के विण्डो फोन 7 की प्रतीक्षा करने को तैयार हूँ, अगले एक वर्ष तक, संभव है उसके पहले ही मुझे नया मोबाइल मिल जायेगा।  

21.8.10

मेरे प्रिय - मोबाइल और हिन्दी

मोबाइल फोन शहीद होने की अनेक विधियों में एक और जोड़ने का न तो मेरा उद्देश्य था और न ही उसे पैटेन्ट कराने का मन है। मनुष्यों के साथ रहते रहते मोबाइल फोन भी जन्म-मृत्यु के चक्र से बिना भयभीत हुये अपने कर्म में रत रहते हैं। हमारे तीन वर्षों के दिन-रात के साथी को, जिन्हे श्रीमतीजी सौत के नाम से भी बुलाती थीं और जो बिल गेट्स के विन्डो-मोबाइल परिवार से थे, सदैव ही इस बात का गर्व रहेगा कि उन्होने अपने प्राण हमारे हाथों में कर्मरत हो त्यागे, न कि फैशन की दौड़ में हारने के बाद किन्ही पुरानी अल्मारियों में त्यक्तमना हो। आइये स्मृति में दो मिनट का मौन रख लें।

बैडमिन्टन में पूर्णतया श्रम-निमग्न होने के पश्चात कोर्ट से बाहर आता हूँ, फोन बजते हैं, वार्तालाप में डूब जाने के समय पता ही नहीं चलता है कि कान के ऊपर बालों से टपकती स्वेद की बूँदें फोन के मेमोरी स्लॉट से अन्दर जा रही हैं। दो मिनट के बाद वार्तालाप सहसा रुद्ध होने पर जब तक भूल का भान होता, स्वेद का खारापन मोबाइल फोन की चेतना को लील चुका था। यद्यपि अभी उन्हें चेतना में लाने का श्रम चल रहा है पर आशायें अतिक्षीण हैं।

प्रियतम मोबाइल के जाने का दुख, मोबाइल न होने से विश्व से सम्पर्क टूट जाने का दुख और शीघ्र ही नया मोबाइल लेने में आने वाले आर्थिक भार का दुख, तीनों ही दुख मेरे स्वेद में घुलमिल कर टपक रहे थे। आँसू नहीं थे पर घर आकर बिटिया ने बोल ही दिया कि खेल में हार जाने से रोना नहीं चाहिये।

ऐसे अवसरों की कल्पना थी और घर में एक अतिरिक्त मोबाइल रहता था पर अपनों पर होने वाली आसक्ति और विश्वास में हम बाकी आधार छोड़ इतना आगे निकल आते हैं कि हमें अतिरिक्ततायें भार लगने लगती हैं। पिछले माह भाई को वह मोबाइल दे हम भी भारमुक्त हो गये थे।

रात्रि के 9 बजे दो जन मॉल पहुँचते हैं, सेल्समानव भी अचम्भित क्योंकि मोबाइल हड़बड़ी में खरीदने की वस्तु नहीं। बड़ा ही योग्य युवक। पूछा किस रेन्ज में और किन विशेषताओं के साथ? हमने डायलॉग मारा कि रेन्ज की समस्या नहीं पर उसमें हिन्दी कीबोर्ड होना चाहिये। श्रीमती जी मन में यह सोचकर मुस्करा रहीं थी कि निकट भविष्य में उनका डायलॉग भी कुछ ऐसा ही होने वाला है। रेन्ज की समस्या नहीं पर उसमें डायमण्ड होना चाहिये।

मोबाइल पर लिये निर्णय पर बहस कुछ ऐसी थी।
  1. विन्डो मोबाइल के पुराने मॉडल लेने का प्रश्न नहीं। विन्डो फोन 7 आने में देर है पर उसमें भारतीय भाषाओं के कीबोर्ड का प्रावधान नहीं है। आइरॉन केवल विण्डो मोबाइल 6.1 तक ही हिन्दी कीबोर्ड उपलब्ध कराते हैं।
  2. आईफोन ने 37 भाषाओं के कीबोर्ड दिये हैं पर भारतीय भाषाओं को इस लायक न समझ कर भारत का दम्भयुक्त उपहास किया है।
  3. एन्ड्रायड फोन नये हैं। गूगल ने जो प्रयास सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने में किये हैं, उन्हें इन फोनों में आते आते समय लगेगा।
  4. सिम्बियानयुक्त नोकिया के फोनों में भी हिन्दी कीबोर्ड के दर्शन नहीं हुये। मैं ट्रान्सइटरेशन के पक्ष में नहीं हूँ।

हम लगभग निराश हो चले थे कि आज का चौथा दुख मोबाइल में हिन्दीहीन हो जाने का होगा, तभी सेल्समानव को एक मॉडल याद आया LG GS290। उसमें उन्होने हिन्दी अंग्रेजी शब्दकोष देखा था। उस मॉडल को जब हमने परखा तो उसमें हिन्दी कीबोर्ड उपस्थित था, यूनीकोड से युक्त।

मेरे चारों दुख वाष्पित हो गये और आँखों में आह्लाद का नीर उमड़ आया। आह्लाद उस समय और खिल गया जब उसका मूल्य 6000 ही पाया। हिन्दी कीबोर्ड के लिये 30000 के खर्चे का मन बना चुके हम, लगभग 24000 की बचत पर आनन्दित थे। अब इस पूरे घटनाक्रम को आप दैवयोग न कहेंगे तो क्या कहेंगे?

पर क्रोध की एक रेखा मन में बनी है अब तक।

मोबाइल जगत के धुरन्धर, भारतीय भाषाओं की दम्भयुक्त उपेक्षा कर रहे हैं और हम अपने सॉफ्टवेयरीय दास्यभाव में फूले नहीं समा रहे हैं। भारत एक भाषाप्रधान देश है तो क्या एक भी भारतीय लाल नहीं है जो इस सुविधा को विकसित कर सके? क्या सरकारों में इतना दम नहीं कि मना कर दे मोबाइल बेचने वालों को जब तक उनमें सारी भारतीय भाषाओं के लिये स्थान न हो? क्या हम अपनी भाषा को रोमन में लिख लिख कर अपने भाषा प्रेम का प्रदर्शन करते रहेंगे। कीबोर्ड के अभाव में यदि हम रोमन में लिख रहे हैं तो क्या यह अभाव हमारे देश की बौद्धिक सम्पदाओं के अनुरूप है?

मुझे उस दिन की प्रतीक्षा है जब हम अपनी विन्डो में बैठ अपना एप्पल खायेंगे।