मुझ पापी को ज्ञान नहीं है,
सत्कर्मों का भान नहीं है ।
प्रायश्चित का अवसर देना,
माया का श्मशान न देना ।।१।।
धन की अन्तिम बूँद छीन लो,
वंचित सुख से करो दीन को ।
या काँटों पर दे दो सोना,
पर ईश्वर अभिमान न देना ।।२।।
मुझमें किञ्चित भक्ति नहीं थी,
तुझ पर भी आसक्ति नहीं थी ।
निज भक्ति की राह दिखाना,
भौतिक सुख की छाँह न देना ।।३।।
जब तक तेरे सेवक के
सेवक का सेवक तृप्त नहीं हो,
तब तक मुझको सेवा में
उनकी पल भर विश्राम न देना ।।४।।