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7.8.21

प्रार्थना


मुझ पापी को ज्ञान नहीं है, 

सत्कर्मों का भान नहीं है ।

प्रायश्चित का अवसर देना,

माया का श्मशान न देना ।।१।।

 

धन की अन्तिम बूँद छीन लो,

वंचित सुख से करो दीन को ।

या काँटों पर दे दो सोना,

पर ईश्वर अभिमान न देना ।।२।।

 

मुझमें किञ्चित भक्ति नहीं थी,

तुझ पर भी आसक्ति नहीं थी ।

निज भक्ति की राह दिखाना,

भौतिक सुख की छाँह न देना ।।३।।

 

जब तक तेरे सेवक के 

सेवक का सेवक तृप्त नहीं हो,

तब तक मुझको सेवा में

उनकी पल भर विश्राम न देना ।।४।।

19.6.21

चला भगवन पंथ तेरे

 

आज प्रभु जब निकट कुछ तेरे बढ़ा मैं,

मोह बन्धन जगत के दृढ़ खींचते हैं ।

पूछता मन प्रश्न बारम्बार निर्मम,

क्या कहूँ, जब नहीं उत्तर सूझते हैं ।।१।।

 

नहीं चाहूँ, जटिल मति के, कुटिल जग के,

तर्क अगणित बन विषों के बाण आते ।

कभी मैं बचता तुम्हारी प्रेरणा से,

किन्तु बहुधा वेदना बन समा जाते ।।२।।

 

किन्तु सुख अनुभव किया जो,

चरण में भगवन तुम्हारे ।

शब्द की अभिव्यक्ति के बिन,

छिपा रहता हृद हमारे ।।३।।

 

दर्श अदर्शन, लुप्त प्राय मति,

प्रेम-पुन्ज नवपंथ दिखा दो ।

स्थित हो जब सबमें प्रियतम,

द्वेषी जग से हृदय बचा लो ।।४।।

 

कुशल भगवन, सर्वहित प्रेरक बने हो,

तम हृदय में, प्रेम के दीपक जला दो ।

तव प्रतिष्ठा अनवरत होवे प्रचारित,

भावरस में ज्ञानपूरित स्वर मिला दो ।।५।।

24.8.11

प्रार्थना

इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो न।

5.2.11

मन का बच्चा बचा रहे

मैं न कभी उद्वेगों को समझा पाया,
मैं न कभी एक निश्चित चाह बना पाया,
जब देखा जीवन को जलते, बस पानी लेकर दौड़ गया,
था जितना बचता साध लिया, और शेष प्रज्जवलित छोड़ गया,
जीवन को संचय का कोरा घट, नहीं बना मैं सकता हूँ,
सज्जनता से जीवित होता, झूठे भावों से थकता हूँ।

पर एक प्रार्थना ईश्वर से कर लेता होकर द्वन्दरहित,
जीवन की रचना स्वस्थ रहे, यद्यपि हो जाये रंगरहित,

जो था अच्छा बचा रहे,
जो था सच्चा बचा रहे,
जीवन की यह आपाधापी,
मन का बच्चा बचा रहे 

1.9.10

मुरलीधारी मधुर मनोहर


मैं अपूर्ण, प्रभु पूर्ण-पुरुष तुम,

मैं नश्वर, प्रभु चिर-आयुष तुम ।

मैं कामी, प्रभु कोटि काम-रति,

मैं प्राणी, प्रभु सकल प्राण-गति ।

मैं भिक्षुक, प्रभु दानवीर हो,

मैं मरुथल, प्रभु अमिय-नीर हो ।

मैं प्यासा, प्रभु आशा गगरी,

मैं भटकूँ, प्रभु उत्सव-नगरी ।

मैं कुरूप, प्रभु रूप-प्रतिष्ठा,

मैं प्रपंच, प्रभु निर्मल निष्ठा ।

मैं बाती, प्रभु कोटि दिवाकर,

मैं बूँदी, प्रभु यश के सागर ।

मैं अशक्त, प्रभु पूर्ण शक्तिमय,

मैं शंका, प्रभु अन्तिम निर्णय ।

मैं मूरख, प्रभु ज्ञान-सिन्धु सम,

मैं रागी, प्रभु त्याग, तपोवन ।

मैं कर्कश, प्रभु वंशी सुरलय,

मैं ईर्ष्या, प्रभु प्रेम, प्रीतिमय ।

मैं प्रश्नावलि, प्रभु दर्शन हो,

मैं त्यक्या, प्रभु आकर्षण हो ।

मैं आँसू, प्रभु वृन्दावन-सुख,

मैं मथुरा, प्रभु गोकुल उन्मुख ।

मैं मदमत, प्रभु क्षमा-नीर नद,

मैं क्रोधी, प्रभु शान्त, शीलप्रद । 

मैं पंथी, प्रभु अंत-पंथ हो,

मैं आश्रित, प्रभु कृपावंत हो ।

 

मुरलीधारी मधुर मनोहर,

शापित शक्तिहीन सेवक पर,

बरसा दो प्रभु दया अहैतुक,

कृपा करो हे प्रेम सरोवर ।