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8.1.14

इन्स्क्रिप्ट में ही टाइप करें

आज भी बहुत से ब्लॉगर ऐसे हैं जो अभी भी अंग्रेजी आधारित हिन्दी टाइपिंग करते हैं। यही क्या कम है कि वे अन्ततः हिन्दी में लिख रहे हैं, माध्यम जो भी हो, पढ़ने को तो हिन्दी मिल रही है। पहले मुझे लगता था कि कैसे अपनी भाषा लिखने के लिये दूसरी भाषा का आश्रय ले लेते हैं ब्लॉगर? कैसे वही शब्द लिखने के लिये अधिक श्रम करना चाहते हैं लोग? कैसे कुछ शब्द न लिख पाने की स्थिति में उसका प्रयोग छोड़ सकते हैं लेखकगण?

इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड
अनुभव से यही पाया कि हिन्दी में टाइप करने के पहले हम सब अंग्रेजी में ही टाइप करते आये थे। यही नहीं, अभी भी पर्याप्त समय हम अंग्रेजी लिखते भी हैं। इस स्थिति में एक ही वर्णमाला की टाइपिंग में सिद्धहस्त हो यदि हम हिन्दी भी टाइप कर सकें तो दूसरा कीबोर्ड सीखने के श्रम से बचा जा सकता है। यही सुविधा और गहराती जाती है और ब्लॉगर हिन्दी लिखने के लिये रोमन वर्णमाला की विवशता त्याग नहीं पाते हैं। गूगल ने भी इस विवशता को समझा और यथानुसार समर्थ फ़ोनेटिक सहायक भी प्रस्तुत कर दिया। यही नहीं शब्दकोष की सक्षम विकल्प प्रणाली से हर संभव शब्द उपस्थित भी हो जाता है, चुनने के लिये।

हिन्दी में लिखने के प्रारम्भिक काल में हमने भी फोनेटिक कीबोर्ड का उपयोग किया था। हिन्दी में टाइप करने की आवश्यकता थी और इन्स्क्रिप्ट के बारे में पता नहीं था। उस समय सभी ने बराह के उपयोग की सलाह भी दी थी। कुछ भी न होने से कुछ होना अच्छा था। प्रयोग करते करते कुछ ब्लॉगरों ने इन्स्क्रिप्ट के बारे में भी सुझाया, पर नये कीबोर्ड को याद कर सकने की असुविधा ने इन्स्क्रिप्ट को द्वितीय विकल्प के रूप में ही रखा। साथ में यह भी नहीं ज्ञात था कि इन्स्क्रिप्ट में यदि टाइप करेंगे भी तो उसमें गति बढ़ेगी या नहीं? वहीं दूसरी ओर अंग्रेज़ी टाइपिंग में सहजता थी, हिन्दी को भी उससे व्यक्त किया जा सकता था। जहाँ तक हिन्दी शब्दों को यथारूप अंग्रेज़ी शब्दों में बदलने का मानसिक कार्य था, वह प्रारम्भ में बड़ा कठिन तो था पर अभ्यास और भूलों के मार्ग से होते हुये कुछ न कुछ लिखा जा सकता था। 

इतना कोई कैसे याद करे
उस समय शब्दों के विकल्प भी नहीं होते थे, जो लिखना होता था, पूरा लिखना होता था। कई बार ऐसा भी होता था कि उपयुक्त शब्द यदि वर्तनी में कठिन होता था तो उसका कोई ऐसा विकल्प ढूँढ़ते थे जिससे मानसिक अनुवाद का कठिन कार्य कम किया जा सके। उस समय बहुधा चर्चा भी होती थी कि कोई शब्द विशेष कैसे लिखा जाये। कई बार किसी कठिन शब्द को संग्रह कर लिया जाता था, जिससे समय पड़ने पर उस कॉपी करके उतारा जा सके। सच कहा जाये तो हिन्दी में टाइप करना बड़ा रोमांचक कार्य था। उत्साह अधिक था और छपे जाने का आनन्द भी रोका नहीं जा सकता था, अतः इन्स्क्रिप्ट के विचार पर तात्कालिक ध्यान नहीं दिया गया।वह समय भौतिक कीबोर्ड का था और उनमें देवनागरी के स्टीकर भी नहीं थे। यदि वे सहज ही उपलब्ध होते तो संभवतः फोनेटिक अधिक समय तक न चल पाता। कठिनाई को बहुत होती थी क्योंकि अंग्रेज़ी वर्णमाला से हिन्दी में परिवर्तन करने वाले सारे नियम सहजता से याद रखना संभव भी नहीं था। शब्द सरल हुये तो गति अच्छी रही, शब्द कठिन हुये तो गतिरोध हुआ।

फोनेटिक टाइपिंग का सर्वाधिक दुष्प्रभाव चिन्तन पर पड़ता था। एक तो विषय के बारे में सोचना और दूसरा इस बारे में सोचना कि अभिव्यक्ति को किस प्रकार अंग्रेज़ी शब्दों से व्यक्त किया जाये। एक साथ मस्तिष्क यदि दो कार्य करना पड़े तो गति बाधित होना स्वाभाविक है। कठिन शब्दों से खेलते समय यदि भूल हो जाये तो सारी सृजनात्मकता उसी क्षण धाराशायी हो जाती थी। लगता था कि अभिव्यक्ति के दो चरण एक साथ नापने के प्रयास में हाँफे जा रहे हैं।

यह क्रम लगभग ६ माह चला, किसी तरह घिसटते हुये हिन्दी टाइपिंग हो रही थी। उस समय हम केवल पाठक हुआ करते थे और टाइपिंग का कार्य कुछ चुने हुये ब्लॉगों पर टिप्पणी देने तक ही सीमित था। किसी तरह सरल शब्दों में मन के भाव व्यक्त कर लेते थे, समय फिर भी लगता था, पर साधा जा सकता था।

ब्लॉग के प्रति प्रतिबद्धता तनिक और बढ़ी और हमें ज्ञानदत्तजी ने लिखने के लिये उकसाया, सप्ताह में एक ब्लॉग, वह भी उनके ब्लॉग पर अतिथि ब्लॉगर के रूप में। स्वलेखन की मात्रा बढ़ी, साथ ही साथ अन्य ब्लॉगों पर भी अधिक जाने से टिप्पणियों में भी अधिक लिखना हुआ। अब बराह पैड में लिखकर उसे काट कर टिप्पणी बॉक्स में चिपकाने के झंझट ने टिप्पणी देना एक उबाऊ कार्य बना दिया। कई बार चाह कर भी लिखना नहीं हो पाया, कभी आलस्य में कम में कह कर कार्य चला लिया। अन्ततः मन में अधिक गति से टाइप करने की चाह उत्कट होती गयी।

तब बैठकर शोध किया गया कि यदि इन्स्क्रिप्ट सीखी जाये तो कितना समय लगेगा और इन्स्क्रिप्ट में टाइप करने से कितना समय बचेगा? गणना की कि एक शब्द को टाइप करने में फोनेटिक विधि में लगभग ढाई गुना अधिक की दबानी पड़ती हैं। मन में अनुवाद की सतत प्रक्रिया से सृजन के बाधित प्रवाह से गति दो तिहाई ही रह जाती है। हर एक वाक्य में हुयी भूलों से लगभग २० प्रतिशत समय अधिक लगता था। साथ ही साथ कठिनता से बचने के लिये उपयुक्त शब्द न लिख पाये के दुख की गणना संभव भी नहीं थी। तय किया कि इन्स्क्रिप्ट टाइपिंग में गति यदि एक तिहाई भी रह जाये तो भी समय व्यर्थ नहीं होगा।

एक काग़ज़ में इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड का प्रारूप सजाकर सीखने का शुभारम्भ किया। सीखना जितना सरल सोचा था, उससे कहीं कठिन लगा। बार बार काग़ज़ पर कीबोर्ड को देखना और उससे संबंधित की को दबाना बड़ा ही श्रमसाध्य लगा। प्रारम्भिक दो दिन में लगा कि फोनेटिक ही अच्छा था, पर प्रयोग की अवधि को दो सप्ताह तक जीवित रखने के संकल्प ने निष्कर्ष देने प्रारम्भ कर दिये। दो सप्ताह में कीबोर्ड ८० प्रतिशत तक याद हो गया और फोनेटिक के समक्ष टाइपिंग गति भी आ गयी। उस समय लगा कि यदि कहीं से हिन्दी के स्टीकर मिल जायें तो गति और बढ़ायी जा सकती है। अमेजन में स्टीकर देखें, वे न केवल मँहगे थे, वरन उनको बाहर से मँगाने में बहुत समय लगने वाला था। तभी बेंगलोर के एक पर्यवेक्षक ने प्रिंटिग प्रेस से स्तरीय स्टीकर बनवा दिये। वह दिन मेरे लिये फोनेटिक कीबोर्ड पर कभी न वापस देखने का दिन था।

जब अंग्रेज़ी में टाइप करते थे तो दो उँगलियाँ ही उपयोग में आती थीं और देखकर ही टाइपिंग हो पाती थी। हिन्दी स्टीकर लगाने से वह गति अगले दो तीन दिन में ही आ गयी। जब दोनों में ही गति समान हो गयी तो उतने ही समय में लगभग दुगना लिखने लगे और भूलें भी नगण्य हो गयीं। हिन्दी टाइपिंग में आनन्द आने लगा, अभिव्यक्ति सहज होने लगी और मस्तिष्क का सारा कार्य विचार प्रक्रिया और सृजनात्मकता को समर्पित हो गया।

स्क्रीन पर आये हिन्दी कीबोर्ड ने मेरी इन्स्क्रिप्ट टाइपिंग को मोबाइल और टैबलेट में गति दी और यही कारण है कि मेरा अधिक लेखन आइपैड और मोबाइल पर ही होता है। उस पर किया हुआ अभ्यास कम्प्यूटर पर भी टाइपिंग के लिये लाभदायक हुआ। धीरे धीरे विचार की गति टाइपिंग की गति से मेल खा रही है, अभिव्यक्ति निर्बाध और प्रवाहमान होती जा रही है। वहीं दूसरी ओर गूगल टूल में आयी विकल्प की सुविधा ने निश्चय ही फोनेटिक की गति बढ़ायी होगी, पर यदि वही सुविधा इन्स्क्रिप्ट में भी आ जाये तो इन्स्क्रिप्ट पर टाइपिंग की गति में गुणात्मक सुधार हो जायेगा।

वर्तमान में एक ब्लॉगर, जिन्हें मैं नियमित पढ़ता हूँ, जिनका लेखन ब्लॉग जगत के लिये संग्रहणीय निधि है और जिनको भविष्य अधिकता से लिखने के लिये बाध्य करेगा, उन्होंने जब फोनेटिक पर टिके रहने की बाध्यता जताई तो मन बिना विश्लेषण किये न रह पाया। मैं मानता हूँ कि कुछ प्रयास अवश्य लगेगा, कुछ समय अवश्य लगेगा, पर वर्षों की आगामी साधना में जो समय बचेगा उसकी तुलना में इन्स्क्रिप्ट सीखने में लगा श्रम और समय नगण्य है। अंग्रेज़ी के प्रति किसी दुर्भाव से नहीं वरन पूर्ण वैज्ञानिकता और अनुभव की दृष्टि से इन्स्क्रिप्ट ही श्रेष्ठ है। इन्स्क्रिप्ट में ही टाइप करें।

4.1.14

हिन्दी टाइपिंग - स्वेच्छा और अपेक्षा

कम्प्यूटर के लिये इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड
हिन्दी टाइपिंग में हो रहे परिवर्तनों में विशेष रुचि रही है, कारण उसका शून्य से विकसित होते देखते रहना है। कम्प्यूटरों में हिन्दी टाइपिंग की सुविधा ने संभावनाओं के द्वार खोल दिये थे, हिन्दी प्रेमियों ने डिजिटल रूप में इण्टरनेट अदि में न जाने कितना लिखना प्रारम्भ कर दिया था। पहले फॉण्ट की विषमता रही, पर यूनीकोड आने से सबका लिखा सब पढ़ने में सक्षम होते गये। कई तरह के कीबोर्ड आये, अन्ततः इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड के स्वरूप को सीडैक ने आधिकारिक घोषित किया। यह होने के बाद भी हिन्दीजन बाराह और अन्य फोनेटिक टाइपिंग तन्त्रों को सुविधानुसार चाहते रहे। यद्यपि इन्स्क्रिप्ट में गति कहीं अधिक है पर धाराप्रवाह टाइप करने के लिये कीबोर्ड पर अक्षरों की स्थिति का अभ्यास होने में दो सप्ताह का समय लग जाता है। यही कारण है कि सम्प्रति कम्प्यूटर जगत में हिन्दी टाइपिंग इन दो धड़ों में बराबर से बटी है। भारतीय भाषाओं के संदर्भ में इन्स्क्रिप्ट की एकरूपता एक अलग पोस्ट का विषय है।

मोबाइल और टैबलेट के पदार्पण से राह और सुगम हो चली। अब यथारूप टाइप करने के लिये कीबोर्ड स्क्रीन पर ही उपस्थित है, इन्स्क्रिप्ट टाइपिंग के लिये अक्षरों की स्थिति जानने की कोई समस्या नहीं। फिर भी पता नहीं क्यों मोबाइल बनाने वाले नये नये कीपैडों के प्रयोग में क्यों लगे हुये हैं, जो न मानक हैं, जिनका न सिर पैर है, जिनका न टाइप करने वालों में अभ्यास है, जिसके पीछे न कोई तर्क या वैज्ञानिकता ही है? यदि इस तरह के प्रयोग वैकल्पिक होते तो बात अलग थी, लोग श्रेष्ठ को चुनते, शेष को छोड़ देते। पर इन विचित्र कीबोर्डों का एकमात्र की बोर्ड होना और मानक इन्स्क्रिप्ट कीबोर्डों की अनुपस्थिति हिन्दीजनों के धैर्य को सतत टटोलने जैसे विचित्र कार्य हैं।

वर्तमान में एप्पल और एण्ड्रॉयड में इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड को मानक मान लिया गया है। विण्डो फोन अभी भी अधर में अटके हैं, सारी वर्णमाला एक ओर से लिख कर उसे कीबोर्ड का नाम दे दिया। आश्चर्य तब और होता है कि आज से ६ वर्ष पहले विण्डो के एचटीसी फोन पर इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड उपयोग में लाते थे और ३ वर्ष पहले नोकिया के सी३ फोन पर भी उसी कीबोर्ड का उपयोग किया था। अब दोनों कम्पनी एक हो गयीं और मानक इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड को भूल गयीं। पर्याप्त समय हो चुका है और अब तक सबको यह समझ जाना चाहिये कि हिन्दी का मानक कीबोर्ड क्या है। प्रयोग भी बहुत हो चुके हैं, अब ये प्रयोग बन्द कर मानक कीबोर्ड के संवर्धन पर ध्यान दिया जाये।

स्क्रीन कीबोर्डों के लिये संवर्धन के क्या और होना चाहिये, इस पर अपेक्षाओं की सूची लम्बी है। इनमें से कई आंशिक रूप से उपस्थित भी हैं, पर उनको पूरी तरह से उपयोग करने के लिये पूरी सूची का क्रमवार होना आवश्यक है।

मोबाइल का परिवर्धित इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड
पहला है, नोटपैड और कीबोर्ड की स्पष्टता। इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड की एक पंक्ति में १३ अक्षर होते हैं, यदि ये सारे अक्षर मोबाइल  में या टैबलेट में यथारूप डाल देंगे तो चौड़ाई में अक्षरों का आकार बहुत छोटा हो जायेगा और टाइप करने में बहुत कठिनाई भी होगी। साथ ही साथ पाँच पंक्ति का मानक स्वरूप रखेंगे तो कीबोर्ड का आकार बहुत ऊँचा हो जायेगा और तब नोटपैड पर लिखने के लिये कम स्थान मिलेगा। जहाँ एप्पल के इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड में ४ पंक्तियाँ और एक पंक्ति में अधिकतम ११ अक्षर हैं, वहीं एण्ड्रॉयड में ४ पंक्तियाँ और एक पंक्ति में १२ अक्षर हैं। यही नहीं, एक हाथ में पकड़कर अँगूठे से टाइप करने की सुविधा के लिये मोबाइल की चौड़ाई अँगूठे की लम्बाई से अधिक नहीं होना चाहिये। बहुत बड़ी स्क्रीन के चौड़े मोबाइल मुझे संभवतः इसीलिये नहीं सुहाते और मैं अपने ३.५ इंच की स्क्रीन के आईफोन ४एस से अत्यधिक संतुष्ट हूँ। मुझे लगता है कि बहुत बड़ी स्क्रीन का फ़ोन लेने के क्रम में हम एक हाथ से टाइपिंग की सुविधा खो बैठते हैं। अँगूठे भर की लम्बाई में ११ से अधिक अक्षर बहुत छोटे लगते हैं। बताते चलें कि अंग्रेजी वर्णमाला के लिये एक पंक्ति में केवल १० अक्षर होने से उसका कीपैड कहीं अधिक स्पष्ट दिखता है।

जब कीपैड आये तो स्क्रीन में शेष स्थान यथासंभव खाली रहना चाहिये, जिससे लिखा हुया अधिक और स्पष्ट दिखायी पड़े। साथ ही साथ कीपैड और कर्सर के बीच बहुत अधिक दूरी होगी तो लेखन में असुविधा बढ़ती है। यदि कीपैड आने के पश्चात नोटपैड में कम स्थान यदि बचता भी हो तो कर्सर कीपैड के यथासंभव निकट होने से टाइप होने की असुविधा कम की जा सकती है।

बिना शिफ्ट की के टाइपिंग
स्क्रीन कीपैड में एक और सुविधा है जिससे टाइपिंग की गति बढ़ाई जा सकती है। टाइपिंग में शिफ़्ट की जितनी कम दबाई जाये, उतनी अधिक गति बढ़ जाती है। इन्स्क्रिप्ट कीपैड में आधे अक्षर शिफ़्ट की दबा कर ही आते हैं। सामान्य लेखन में शिफ़्ट की के अक्षरों का प्रयोग एक तिहाई ही है। उसे भी और कम किया जा सकता है। यदि क को तनिक अधिक देर दबाये रखें तो ख आ जाता है। यह समय शिफ़्ट की दबाने से थोड़ा कम होता है। इसी प्रकार न को दबाये रखने से हर वर्ग का पाँचवाँ अक्षर आ जाता है और आप बिना अधिक प्रयास के उसे चुन सकते हैं। इसमें न केवल गति बढ़ जाती है, वरन कई अक्षरों को ढूँढ़ने में अधिक प्रयास भी नहीं करना पड़ता है। बहुत दिनों के अभ्यास के बाद ही यह कह रहा हूँ कि इससे टाइपिंग में शिफ़्ट की न केवल हटाई जा सकती है, वरन चार के स्थान पर तीन पंक्तियों में ही हिन्दी वर्णमाला सीमित की जा सकती है। एक अँगूठे से टाइप करने में यदि सुविधा और भी प्रभावी हो जाती है, भ्रम भी कम हो जाता है और गति भी बढ़ जाती है। इस तथ्य पर तनिक और शोध करके हिन्दी टाइपिंग को और भी सुगम और गतिमय बनाया जा सकता है।

 हिन्दी टाइपिंग में अगली सुविधा है, शब्दकोष के अनुसार शब्दों का विकल्प देना। एण्ड्रॉयड फ़ोनों में जैसे ही आप टाइप करना प्रारम्भ करते हैं, कीपैड के ऊपर संभावित शब्दों के विकल्प आ जाते हैं, उनमें से एक को चुनने से टाइपिंग में लगा शेष श्रम बच जाता है। वहीं दूसरी ओर एप्पल में टाइप करते समय केवल एक ही विकल्प आता है जो कर्सर के साथ ही रहता है। यदि उस समय आपने स्पेस दबा दिया तो वह विकल्प चुन लिया जाता है। तुलनात्मक दृष्टि से यह सुविधा कम लगती है पर इसका एक विशेष पक्ष इसे अत्यधिक उपयोगी बना देता है। एप्पल का विकल्प देने वाला तन्त्र आपसे सतत ही सीखता रहता है और उसी के अनुसार विकल्प देता है। कहने का अर्थ है कि आप जितना अधिक टाइप करेंगे, विकल्प प्रस्तुत करने का तन्त्र उतना ही प्रभावी और सटीक होगा। यही नहीं, छोटी मोटी टाइपिंग की भूलें तो वह स्वतः ही ठीक कर देता है, जिससे आप चाह कर भी कोई भूल नहीं कर सकते हैं। एण्ड्रायड में ऊपर की पंक्ति में विकल्प होने से कीपैड की ऊँचाई बढ़ जाती है, जिससे टाइप करने में तनिक असुविधा होने लगती है। साथ ही साथ अधिक विकल्प की स्थिति न केवल भ्रमित करती है वरन गति भी कम कर देती है।

कीपैड को न केवल मानक शब्दकोष का ज्ञान हो, वरन आपके उपयोग के बारे में जानकारी हो। यही विस्तार व्याकरण के क्षेत्र में भी किया जा सकता है। व्याकरण के नियमों को सीखकर वह अगला संभावित शब्द या शब्द श्रंखला भी सुझा सकता है। यही नहीं स्त्रीलिंग-पुल्लिंग, एकवचन-बहुवचन आदि की वाक्य रचनाओं में की गयी सामान्य भूलों को भी पहचान कर सुधारने में वह आपकी सहायता कर सकता है। इस पक्ष पर अधिक शोध नहीं हुआ है, पर इस पर किया गया श्रम हिन्दी टाइपिंग के लिये एक मील का पत्थर सिद्ध होगा।

अगली सुविधा है, लिखा हुआ पढ़ना। कभी कभी लम्बा लेख लिखने के बाद पढ़ने की इच्छा न हो तो उसे सुन पाने की सुविधा होनी चाहिये। यद्यपि एप्पल में बोलने वाली उतनी स्पष्टता से हिन्दी नहीं बोल पाती है, पर सब समझ में आ जाता है और संपादन भी किया जा सकता है। इस सुविधा को विकसित करने के लिये वर्तनी के नियम, उच्चारण और संयुक्ताक्षर प्रमुख हो जाते है। बहुधा लम्बी कहानियों को भी इसी सुविधा का उपयोग कर मैंने सुना है। यही नहीं सुनने के क्रम में अर्धविराम और पूर्णविराम के महत्व को समझने की शक्ति विकसित हो जाती है, जो कि संवाद के लिये अत्यावश्यक है।

इसी सुविधा से सीधे जुड़ी हुयी सुविधा है, बोला हुआ लिखना। कई भाषाओं में यह सुविधा अत्यधिक विकसित है पर हिन्दी में यह अपने विकास की प्रतीक्षा कर रही है। यदि यह पूरी तरह से संभव हो सका, मोबाइल आधुनिक गणेश का अवतार धर लेंगे। इसी प्रकार हाथ का लिखा पढ़ना भी एक क्षेत्र है जिसमें अधिक कार्य की आवश्यकता है। विण्डो में अंग्रेजी भाषा के लिये इस सुविधा के उपयोग के पश्चात हिन्दी में वह अपेक्षा होना स्वाभाविक ही है। इसके अतिरिक्त एक वृहद शब्दकोष और दूसरी भाषाओं में अनुवाद की सुविधा हिन्दी के लिये आगामी और मूलभूत आवश्यकतायें हैं। हमें मानकीकरण की स्वेच्छा से वांछित अपेक्षाओं तक की लम्बी यात्रा अपने ही पैरों पर चलनी है।

6.3.13

अलग अलग कीबोर्ड

मेरी प्रतीक्षा को निराशा मिली। यद्यपि मैं लगभग डेढ़ वर्ष पहले से ही आईफ़ोन में हिन्दी कीबोर्ड का उपयोग कर रहा हूँ पर विण्डो व एण्ड्रायड फ़ोनों में हिन्दी के कीबोर्डों का स्वरूप कैसा होगा, यह उत्सुकता मन में  लिये डेढ़ वर्ष से प्रतीक्षा कर रहा था। यदि इन दोनों फ़ोनों में हिन्दी कीबोर्ड पहले आ गये होते तो संभव था कि कुछ पैसे बचाने के लिये मैं आईफ़ोन का उपयोग न कर के इनमें से किसी एक के अच्छे मॉडल का उपयोग कर रहा होता। मेरे लिये आईफ़ोन ख़रीदने का प्राथमिक कारण उस पर हिन्दी कीबोर्ड का आना था, यदि उसने भी देर की होती तो एप्पल से जान पहचान ही न हुयी होती। आज एक नहीं, चार और एप्पल उत्पाद ले चुका हूँ और बहुत संतुष्ट भी हूँ। सीधा सा हिसाब था, एप्पल ने हिन्दी का सम्मान किया, इस कारण मेरा परिचय बढ़ा और अब प्यार हो गया है, इसकी गुणवत्ता से। संभवत एप्पल को ज्ञात था कि मुझ तक पहुँचने का मार्ग हिन्दी से होकर जाता है।

ऐसा नहीं है कि विण्डो व एण्ड्रायड फ़ोनों ने हिन्दी के महत्व को समझा नहीं। समुचित समझा पर बड़े देर से समझा। बस कुछ सप्ताह पहले ही दोनों के हिन्दी कीबोर्ड आ गये। पर अब दोनों के हिन्दी कीबोर्डों को देख कर लग रहा है कि दोनों ने ही अपनी सुविधानुसार कीबोर्ड बना दिया, बिना अधिक विश्लेषण किये हुये। इस निर्णय से न हिन्दी टाइप करने वालों का कोई लाभ होने वाला है और न ही इन दोनों कम्पनियों को हिन्दी के इस बाज़ार में कोई सफलता मिलने वाली है। मेरा आशय किसी पर कटाक्ष करने का नहीं है या आलोचना में उद्धत होने का नहीं है, पर हिन्दी कीबोर्ड के उद्भव में भिन्न भिन्न राग सुना रहे लोगों को यह बताने का है कि बिना मानकीकरण न आपका भला होगा और न ही हिन्दी का। और साथ ही साथ मेरे लिये भी भविष्य में आईफ़ोन छोड़ पाने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जायेगी।

विज्ञ कह सकते हैं कि भले ही विण्डो में हिन्दी कीबोर्ड अभी आया हो पर एण्ड्रायड में तो लगभग एक वर्ष से हिन्दी कीबोर्ड है। निश्चय ही हिन्दी कीबोर्ड था, पर वह वाह्य एप्स के रूप में था, तनिक छोटे आकार का था और उपयोग में बहुत ही कष्टकर। जब कभी भी उससे टाइप करने का प्रयास किया, प्रवाह बाधित रहा, कारण निश्चय ही उनका वाह्य आरोपित होना होगा, हर बार ओएस की दीवार भेद कर जाने और वापस आने में समय तो लगता ही है। न ही उससे प्रभावित हुआ जा सकता था और न ही उससे लम्बे समय तक टाइप किया जा सकता है। यद्यपि अभी भी गूगल हिन्दी इनपुट के नाम से जो एप्स आया है, वह भी वाह्य एप्स के रूप में ही आया है, पर गूगल के द्वारा तैयार होने पर उसका समन्वय ओएस से कहीं गहरा होगा, तनिक तीव्र होगी उसकी गति औरों की तुलना में। प्रसन्नता तब और अधिक होती जब ओएस के अगले संस्करण में हिन्दी के कीबोर्ड को सम्मिलित किया गया होता।

जब नोकिया का सी३ फ़ोन उपयोग में लाता था तो उसमें एक वाह्य हिन्दी कीबोर्ड था। लगा था कि नोकिया के पास यह तकनीक होने के कारण विण्डो के नये फ़ोनों में पहले दिन से ही हिन्दी आयेगी। ऐसा नहीं हुआ, कई बार जाकर उसमें हिन्दी खोजी तो नहीं मिली। बड़ा दुख भी हुआ और आश्चर्य भी। जब विण्डो ५ के फ़ोन से आईरॉन का हिन्दी कीबोर्ड उपस्थित था, नोकिया सी३ में हिन्दी की बोर्ड उपस्थित था तो विण्डो के नये फ़ोनों में उनका होना स्वाभाविक ही था। अच्छा हुआ विण्डो फ़ोनों में ओएस स्तर हिन्दी कीबोर्ड आ गया है पर उसका भी अवतरण प्रभावित नहीं कर पाया।

जब भी मैं कहता हूँ कि हिन्दी का कीबोर्ड ओएस के स्तर पर होना चाहिये तो मेरा संकेत दो लाभों की ओर है। पहला तो इससे कीबोर्ड की गति बढ़ जाती है, उसका अन्य एप्स से समन्वय गाढ़ा हो जाता है, टाइपिंग निर्बाध गति से होती है और किसी समस्या की संभावना भी नहीं होती है। दूसरा, ओएस के अपग्रेड होने पर कीबोर्ड भी स्वतः ही अपग्रेड हो जाता है और एप्स के अलग से अपग्रेड होने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती है। यही कारण है कि ओएस में ही कीबोर्ड का होना अधिक लाभदायक है और साथ ही साथ अधिक प्रभावी भी।

कहने को तो गूगल हिन्दी इनपुट में फ़ोनेटिक व्यवस्था भी है, यही कि आप अंग्रेज़ी में टाइप करें और वह स्वतः ही बदल कर हिन्दी में बदल जायेगा। पहले भी बारहा के उपयोग से लैपटॉप पर हिन्दी बहुत दिनों तक टाइप भी की है, पर गति धीमी होने के कारण और हिन्दी शब्दों को अंग्रेज़ी की बैसाखी पहनाने के कारण उसका त्याग कर दिया। उसके स्थान पर हर लैपटॉप में उपस्थित देवनागरी इन्स्क्रिप्ट में टाइप करना सीखना प्रारम्भ में तनिक कठिन लगा पर एक सप्ताह में ही गति आ गयी। कहने का आशय यह कि फ़ोनेटिक टाइपिंग का उपयोग तब तक नहीं करना चाहिये जब तक कोई सीधा साधन उपस्थित हो।

आइये तीन प्रमुख मोबाइल उत्पादकों का हिन्दी कीबोर्ड से संबंधित असंबद्धता देखें। एक तथ्य तो स्पष्ट दिख रहा है कि कोई एक उत्पाद आपने ले लिया और उस पर हिन्दी टाइपिंग करते हुये रम गये तो भविष्य में कोई अन्य मोबाइल ख़रीदने का साहस नहीं कर पायेंगे, एक में ही अटक कर रह जायेंगे। तीनों में हिन्दी कीबोर्ड के भिन्न भिन्न प्रकार आपके लिये बाधा बनकर खड़े रहेंगे। दूसरा, यदि आप लैपटॉप पर देवनागरी इन्स्क्रिप्ट में टाइप करते हैं तो आपको विण्डो या एण्ड्रायड में टाइप करने के लिये एक अतिरिक्त और सर्वथा भिन्न प्रारूप समझना पड़ेगा। दों भिन्न प्रारूपों में भ्रम की संभावना सदा ही बनी रहेगी। आपको बताते चलें कि देवनागरी इन्स्क्रिप्ट प्रारूप ही भारतीय मानक है और हर लैपटॉप में उपस्थित भी।

जब मैंने कहा था कि प्रतीक्षा ने निराश किया है, तब मेरा आशय प्रमुख मोबाइल उत्पादकों के द्वारा भिन्न दिशाओं में भागा जाना था। अभी ब्लैकबेरी १० का पदार्पण होना है पर उसके इतिहास को देख कर यह लगता नहीं है कि वह भी हिन्दी कीबोर्ड के क्षेत्र में अपना राग नहीं अलापेगी।

पिछले ७ वर्षों से मेरा मार्ग अब तक देवनागरी इन्स्क्रिप्ट प्रारूप से होकर आया है, आईफ़ोन के अतिरिक्त अन्य सबने लगभग यह सिद्ध कर दिया है कि चाहे मानक कीबोर्ड जायें भाड़ में पर वे अपने तरीक़े से भारतीयों से हिन्दी टाइप करवायेंगे। यदि ऐसा है तो बड़ा ही कठिन हो जायेगा, तीन चार भिन्न प्रकार के कीबोर्डों से तो हिन्दी में भी नये वर्ग खड़े हो जायेंगे। इतने वर्षों के प्रयास के बाद कम से कम हिन्दी के कीबोर्ड आ रहे हैं, पर उनका भी क्या लाभ जो मानक न हों और उपयोगकर्ता को नये प्रकार से सीखने को विवश करें।

पता नहीं कि नये प्रारूप के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है या सुविधा है वर्णमाला को एक क्रम में सजा देने की। सबको यह तो लगता है कि बिना हिन्दी कीबोर्ड उनका विकास और फैलाव बाधित रहेगा पर किस प्रकार से उसे प्रस्तुत करना है, इस पर कोई समुचित विचार नहीं हुआ है। मेरा केवल एक ही विनम्र अनुरोध है कि कृपा कर मानक देवनागरी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड को ही साथ लेकर चले।

1.6.11

कुछ और बढ़ें - हिन्दी और मोबाइल

यह बात तो निश्चित है कि जब तक मोबाइल में हिन्दी पूरी तरह से संस्थापित नहीं हो जाती है, तब तक हम भी गूगल में अपनी खोज धौंकते रहेंगे। हर बार थोड़ा समय मिलते ही शोध प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, कुछ नहीं तो उस पर चल रहे संवादों और सम्बन्धित प्रकल्पों की अद्यतन स्थिति ही ज्ञात हो जाती है। पिछले दस दिनों में दो अप्रत्याशित सफलताओं ने खोज-विधियों में और भी सृजनात्मकता ला दी है। मन प्रसन्न तो है पर पूरी तरह से संतुष्ट नहीं। यदि किसी ऐसे पद में होता कि मोबाइल कम्पनियों को धमका कर हिन्दी कीबोर्ड निचोड़ सकता तो धैर्य व प्रतीक्षा को अपनी सतत खोज का आधार न बनाता, पर जब सम्प्रति में भाग्य भी हिन्दी की तरह ही अपुष्ट हो तो व्यग्रता मन के भीतर सम्हाल कर रखनी पड़ेगी।

आपकी भी व्यग्रता भी न बढ़ जाये अतः इन दो सफलताओं के बारे में बता देता हूँ। पहली तो आईफोन, आईपॉड व आईपैड में हिन्दीराइटर के नाम से विकसित ट्रांसलिटरेशन आधारित कीबोर्ड की व्यवस्था और दूसरी ब्लैकबेरी पर पूर्ण हिन्दी कीबोर्ड की उपस्थिति।

एप्पल वैसे तो 37 भाषाओं में कीबोर्ड देने का दम्भ भरते हैं पर उसमें हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं का कोई स्थान नहीं है। सीडैक ने वर्तमान अँग्रेज़ी कीबोर्ड पर आधारित हिन्दी टाइपिंग तन्त्र विकसित किया है। जो लोग बरह में टाइपिंग के अभ्यस्त हैं उन्हें कोई समस्या नहीं आयेगी। अपने घर में आईपॉड पर, मित्र के आईफोन पर और एप्पल स्टोर में आईपैड2 पर टाइप करके देखा, गति तो नहीं पर संतुष्टि मिल गयी। इस कीबोर्ड से लिखा हुआ कट और पेस्ट के माध्यम से ही दूसरे प्रोग्रामों में स्थानान्तरित हो सकता है।

ब्लैकबेरी फोन मोबाइल क्षेत्र में एक सम्मानित स्थान रखता है। व्यस्त नवयुवा और अभ्यस्त व्यवसायी इसका उपयोग अपनी सारी संचार आवश्यकताओं का निराकरण एक जगह पर हो जाने के कारण करते हैं। आपके ईमेल ब्लैकबेरी सर्वर के माध्यम से एसएमएस की तरह ही आपके ब्लैकबेरी में अवतरित होते हैं। कई कम्पनियों के सारे ईमेल इस माध्यम से सुरक्षित आदान प्रदान किये जाते हैं। ब्लैकबेरी की अपनी भी एक संदेश सेवा है जो किसी भी देश में आपको अन्य ब्लैकबेरी धारकों से सम्पर्क में रखती है और वह भी निशुल्क और संभवतः यही कारण उसे व्यस्त जनों के बीच एक आवश्यक व उपयोगी उपकरण बना देता है।

जो विशेषता इसे इतना लोकप्रिय बनाती है उसी ने इसका सर्वाधिक शक्तिशाली और प्रभावी धारक खो दिया। माननीय ओबामा के राष्ट्रपति बनने के पहले तक उनके हाथ में सज्जित रहा ब्लैकबेरी फोन सुरक्षा कारणों से उन्हें उपयोग में नहीं लाने दिया गया।

व्यस्त नवयुवा, अभ्यस्त व्यवसायी और ओबामीय विवशता से समान रूप से दूर होने पर भी ब्लैकबेरी का आकर्षण सदा ही मेरे लिये बना रहा। परिचालन विभाग में आने के बाद एक ऐसे उपकरण की आवश्यकता लगने लगी जिस पर सारे त्वरित-तथ्य किसी शब्द सीमा या नेटीय सीमा के बँधे बिना ही आ जा सके। एक ब्लैकबेरी और उसकी सेवायें ले लीं।

मन में तनिक भी आशा नहीं की थी कि ब्लैकबेरी मोबाइल में हिन्दी पढ़ सकूँगा, लिखना तो बहुत दूर की बात थी। ईमेलों में आने वाले हिन्दी अक्षर डब्बाकार आते थे।

भगवान भी संभवतः धैर्य ही परखता है, ब्लैकबेरी का नया ओएस 6 आया, उसमें भारतीय भाषाओं के लिये समर्थन था। अब टिप्पणियाँ पढ़ने व उन्हें वहीं से ही प्रकाशित करने का कार्य भी होने लगा। इस पूरे समय मैं अपने साथ नोकिया का सी-3 मोबाइल लेकर चलता रहा और उसमें लेखन भी करता रहा। यह जीवनशैली पाँच दिन ही चली होगी कि ब्लैकबेरी में एक और लघु अपडेट आ गयी, अब हमें हिन्दी टंकण का अधिकार मिल गया है। कीबोर्ड इन्स्क्रिप्ट से थोड़ा अलग है पर लेखन का कार्य फिर भी बहुत अच्छे से निपटाया जा सकता है।

मन प्रसन्न है कि हिन्दी में प्रगति हो रही है, इस पोस्ट का बड़ा हिस्सा इसी मोबाइल से लिखा है। धीरे धीरे ही सही पर यह स्पष्ट हो रहा है, मोबाइल निर्माताओं को, कि बिना भारतीय भाषाओं के समर्थन के कोई भी मोबाइल सारे भारत को नहीं लुभा पायेगा। हम पुनः खोज में लगते हैं, मोहि कहाँ विश्राम?

30.3.11

नोकिया C3 और हिन्दी कीबोर्ड

पिछले चार महीनों में जितनी भी बार सामान खरीदने मॉल जाता था, प्रदत्त सूची निपटाने के बाद आधे घंटे के लिये सरक लेता था, एक मोबाइल की दुकान में, यूनीवर सेल के शो रूम में। यहाँ पर यह सुविधा है कि आप किसी भी मॉडल को विधिवत चलाकर देख सकते हैं। यहीं आकर ही मेरी मोबाइल सम्बन्धी अभिरुचि को एक प्रायोगिक आधार मिलता रहा है। हर नये मोबाइल की विशेषताओं को भलीभाँति समझने का अवसर यहाँ मिल जाता है। प्रायोगिक ज्ञान सदा ही इण्टरनेटीय सूचनाओं से अधिक पैना होता है।

यहीं पर ही मुझे एक मोबाइल दिखा, नोकिया का C3 मॉडल। आकर्षण था हिन्दी का कीबोर्ड और वह भी भौतिक। अंग्रेजी के अक्षरों के साथ ही हिन्दी के अक्षर उसमें व्यवस्थित थे, लगभग इन्सक्रिप्ट ले आउट में। हाथ में लेकर जब उसमें लिखना प्रारम्भ किया तो और भी रुचिकर लगा। अभी तक मेरे पास जो दो मोबाइल थे, उनमें स्क्रीन वाला ही कीबोर्ड था अतः यह अनुभव सर्वथा नया था। लैपटॉप में इन्सक्रिप्ट में टाइप करते करते अक्षरों का स्थान समझने में कठिनाई नहीं हुयी। मन अटक गया उसमें।

मेरे सामने अपने दोनों मोबाइलों के साथ इसकी तुलना करने का मार्ग नहीं सूझ रहा था। मेरे पीछे कई और ग्राहक प्रतीक्षा कर रहे थे, उस मोबाइल पर अपने अपने हाथ चलाने के लिये। मेरी दुविधा को भाँप कर सेल्समानव बोले कि सर सप्ताहान्त में भीड़ रहती है, कार्यदिवस में आपको समुचित समय मिलेगा। अब कार्यालय से आने के बाद और बैडमिन्टन खेलने के पहले एक घंटे का समय मिलता है परिवार के साथ बैठने का, उसे इस कार्य के लिये दे देना संभव नहीं था मेरे लिये। सेल्समानव ने तब सलाह दी कि सप्ताहन्त में सुबह ही आ जाये तो लगभग 2 घंटे का समय मिल जायेगा, भीड़ बढ़ने के पहले।

मिलन का दिन नियत हुआ, सामान की सूची को प्रतीक्षा में रखा गया, हाथ में तीन मोबाइल और मैं शो रूम में अकेला। डोपोड डी600, एलजी जीएस290 और नोकिया C3 के बीच मुझे उनकी हिन्दी सम्बन्धित विशेषताओं का निर्णय लेना था।
सर्वप्रथम टाइपिंग की गति पर तुलना की। नोकिया मे टाइपिंग की गति बहुत अधिक थी और कारण था भौतिक कीबोर्ड, यद्यपि पहले थोड़ा अटपटा लगा पर 5 मिनट में ही टाइपिंग ने गति पकड़ ली। एलजी में बड़ा स्क्रीन कीबोर्ड होने से गति तो ठीक आयी पर त्रुटियों की संभावना बनी रही, कीबोर्ड की चौड़ाई अधिक होने से अंगूठों को प्रयास अधिक करना पड़ा। एलजी में गति नोकिया की तुलना में लगभग 60% ही रही। विण्डो मोबाइल में स्टाइलस के कारण टाइपिंग बहुत धीरे हुयी क्योंकि बहुत ध्यान से टाइप करना पड़ा। केवल एक बिन्दु से टाइप करने के कारण संयुक्ताक्षरों में अधिक कठिनाई हुयी। नोकिया की तुलना में गति 40% ही रही।

विण्डो मोबाइल में कीबोर्ड का आकार सबसे छोटा था, लिखने का स्थान कहीं अधिक था। एलजी में कीबोर्ड बहुत बड़ा था, लिखने का स्थान छोटा था। नोकिया में कीबोर्ड स्क्रीन पर न होने के कारण कोई अन्तर नहीं पड़ा। कीबोर्ड, स्क्रीन और फोन्ट का आकार सबसे अच्छा नोकिया में मिला।

चलती हुयी गाड़ी में व बाहर के प्रकाश में नोकिया से ही टाइपिंग की जा सकती थी, अन्य दो से यह करना संभव ही नहीं था।

एलजी में 1000 अक्षरों की, नोकिया में 3000 अक्षरों की व विण्डो मोबाइल में कोई भी सीमा नहीं थी।

बैटरी जीवन नोकिया का सर्वोत्तम मिला, लगभग तीन दिन तक। विण्डो मोबाइल को एक दिन के बाद ही चार्ज करना पड़ा।

नोकिया में वाई फाई की सुविधा थी, अन्य दोनों में जीपीआरएस के माध्यम से ही इण्टरनेट देखा जा सकता था।

लैपटॉप से समन्वय में विण्डो मोबाइल सबसे अच्छा था पर नोकिया को ओवी सूट के माध्यम से जोड़कर समन्वय करना सम्भव पाया। एलजी में समन्वय सम्बन्धी कई समस्यायें आयीं।

ऑफिस डॉकूमेन्ट्स विण्डो मोबाइल में पढ़े और सम्पादित किये जा सकते थे। नोकिया व एलजी में यह सुविधा नहीं थी।

मेसैज भेजने, फोन करने आदि आवश्यक मोबाइल कार्यों के लिये नोकिया सबसे अच्छा पाया। शेष दोनों में इन्हीं कार्यों के लिये बहुत अधिक प्रयास करना पड़ा।

इस समय विण्डो मोबाइल रु 10000 का, एलजी रु 6000 का व नोकिया रु 5700 का है।

तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात नोकिया C3 ने बहुत प्रभावित किया और अन्ततः एक और हिन्दी कीबोर्ड वाला मोबाइल मैंने खरीद लिया।

पिछले 20 दिनों से नोकिया उपयोग में ला रहा हूँ और पिछली दो पोस्टें उस पर ही लिखी हैं, वह भी घर से बाहर, लैपटॉप से दूर। अब लगता है कि भौतिक कीबोर्ड में रम गये हैं और स्क्रीन कीबोर्ड में पुनः टाइप करने में उतनी गति न आ पाये। विण्डो फोन के प्रति प्रेम व निष्ठा अभी भी उतनी ही है जितनी कि सम्प्रति हिन्दी के प्रति है। अब प्रतीक्षा और बढ़ गयी है नोकिया और विण्डो फोन के उस मोबाइल की जिसमें नोकिया C3 की तरह ही इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड हो, बड़ा हो तो और भी अच्छा।

मेरी यही सलाह है कि इस समय नोकिया C3 ही सर्वोत्तम हिन्दी मोबाइल है, हम ब्लॉगरों के लिये।

8.1.11

हिन्दी कीबोर्ड

जब भी हिन्दी कीबोर्ड का विषय उठता है, कई लोगों के भावनात्मक घाव हरे हो जाते हैं। इस फलते फूलते हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ छूटा छूटा सा लगने लगता है। चाह कर भी वह एकांगी संतुष्टि नहीं मिल पाती है कि हम हिन्दी टंकण में पूर्णतया आत्मनिर्भर व सहज हैं।

अपनी अभिव्यक्तियों से मन गुदगुदाने में सिद्धहस्त अशोक चक्रधर जी भी जब वर्धा में यही प्रश्न लेकर बैठ जायें तो यह बात और गहराने लगती है। किसी भी व्यक्ति के लिये मन में जगे भाव सब तक पहुँचाने के लिये लेखन ही एक मात्र राह है। डायरी में लिखकर रख लेना रचना का निष्कर्ष नहीं है। संप्रेषण के लिये उस रचना को हिन्दी कीबोर्ड से होकर जाना ही होगा। ब्लॉग का विस्तृत परिक्षेत्र, मनभावों की उड़ानों में डूबी रचनायें, इण्टरनेट पर प्रतीक्षारत आपके पाठकों का संसार, बस खटकता है तो हिन्दी कीबोर्डों का लँगड़ापन।

यही एक शब्द है जिसको इण्टरनेट में सर्वाधिक खंगाला है मैंने। लगभग 10 वर्ष पहले, सीडैक के लीप सॉफ्टवेयर को उपयोग में लाकर प्रथम बार अपनी रचनाओं को डिजिटल रूप में समेटना प्रारम्भ किया था। स्क्रीन पर आये कीबोर्ड से एक एक अक्षर को चुनने की श्रमसाधक प्रक्रिया। लगन थी, आत्मीयता थी, श्रम नहीं खला। लगभग दो वर्ष पहले हिन्दी ब्लॉग के बराह स्वरूप के माध्यम से हिन्दी का पुनः टंकण सीखा, अंग्रेजी अक्षरों की वैशाखियों के सहारे, पुनः श्रम और त्रुटियाँ, गति अत्यन्त मन्द। चिन्तन-गति के सम्मुख लेखन-गति नतमस्तक, व्यास उपस्थित पर गणेश की प्रतीक्षा। चाह कर भी, न जाने कितने ब्लॉगों को पढ़कर टिप्पणी न दे पाया, कितने विचार आधे अधूरे रूप ले पड़े रहे। तब आया गूगल ट्रांसइटरेशन, टंकण के साथ शब्द-विकल्पों की उपलब्धता ने त्रुटियों को तो कम कर दिया पर श्रम और गति वही रहे।

कृत्रिम घेरों से परे जाकर श्रेष्ठ तक पहुँचने का मन-हठ, देवनागरी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड तक ले गया। पूर्ण शोध के बाद यही निष्कर्ष निकला कि हिन्दी टंकण का निर्वाण इसी में है। लैपटॉप के कीबोर्ड पर चिपकाने वाले स्टीकरों की अनुपलब्धता से नहीं हारा और प्रिंटिंग प्रेस में जाकर स्तरीय स्टीकर तैयार कराये। अभ्यास में समय लगा और गति धीरे धीरे सहज हुयी। पिछले तीन प्रयोगों की तुलना में लगभग दुगनी गति और शुद्धता से लेखन को संतुष्टि प्राप्त हो रही है।

देवनागरी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड को यदि ध्यान से देखें तो कवर्ग आदि को दो कुंजियों में समेट दिया गया है, वह भी दायीं ओर। सारी मात्रायें बायीं ओर रखी गयी हैं, वह भी एक के ऊपर एक। शेष सब वर्ण बाकी कुंजियों पर व्यवस्थित किये गये हैं। यद्यपि पिछले 10 माह से अभी तक कोई विशेष बाधा नहीं आयी है इस प्रारूप को लेकर पर अशोक चक्रधर जी का यह कहना कि इस कीबोर्ड को और भी कार्यदक्ष बनाया जा सकता है, पूरे विषय को वैज्ञानिक आधार पर समझने को प्रेरित करता है।

आईआईटी कानपुर के दो प्रोफेसर श्री प्रियेन्द्र देशवाल व श्री कल्याणमय देब ने इस विषय पर एक शोध पत्र प्रस्तुत किया है जिसमें हिन्दी कीबोर्डों के वैज्ञानिक आधार पर गहन चर्चा की गयी है। श्री देशवाल कम्प्यूटर विभाग से है और श्री देब जिनके साथ कार्य करने का अवसर मुझे भी प्राप्त है, ऑप्टीमाइजेशन के विशेषज्ञ हैं।

चार प्रमुख आधार हैं कीबोर्ड का प्रारूप निर्धारित करने के, प्रयास न्यूनतम हो, गति अधिकतम हो, त्रुटियाँ न्यूनतम हों और सीखने में सरलतम हो। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु 6 मानदण्ड हैं जिनको अलग अलग गणितीय महत्व देकर, उनके योगांक को प्रारूप की गुणवत्ता का सूचक माना जाता है। यह 6 मापदण्ड हैं, सारी उँगलियों में बराबर का कार्य वितरण, शिफ्ट आदि कुंजी का कम से कम प्रयोग, दोनों हाथों का बारी बारी से प्रयोग, एक हाथ की ऊँगलियों का बारी बारी से प्रयोग, दो लगातार कुंजी के बीच कम दूरी और दो लगातार कुंजियों के बीच सही दिशा। शोधपत्र यह सिद्ध करता है कि एक श्रेष्ठतर कार्यदक्ष हिन्दी कीबोर्ड की परिकल्पना संभव है, अशोक चक्रधर जी से सहमत होते हुये।
 
आप में से बहुतों को लगेगा कि अभी जिस विधि से हिन्दी टाइप कर रहे हैं, वही सुविधाजनक है। यदि आप वर्तमान में देवनागरी इन्स्क्रिप्ट से नहीं टाइप कर रहे हैं तो आप टंकण के चारों प्रमुख आधारों पर औंधे मुँह गिरने के लिये तैयार रहिये।

हमें चिन्ता है, यदि आपकी चिन्तन-गति लेखन वहन न कर पाये, यदि आप की टिप्पणियाँ समयाभाव में सब तक पहुँच न पायें, यदि 20% अधिक गति से टाइप न कर पाने की स्थिति में आपकी हर पाँचवी पुस्तक या ब्लॉग दिन का सबेरा न देख पाये।

हमारी चिन्ताओं को अपने प्रयासों से ढक लें, साहित्य संवर्धन में एक शब्द का भी योगदान कम न हो आपकी ओर से। लँगड़े उपायों को छोड़कर देवनागरी इन्स्क्रिप्ट से टाइपिंग प्रारम्भ कर दें, स्टीकर हम भिजवा देंगे, अशोक चक्रधर जी के नाम पर। 

21.8.10

मेरे प्रिय - मोबाइल और हिन्दी

मोबाइल फोन शहीद होने की अनेक विधियों में एक और जोड़ने का न तो मेरा उद्देश्य था और न ही उसे पैटेन्ट कराने का मन है। मनुष्यों के साथ रहते रहते मोबाइल फोन भी जन्म-मृत्यु के चक्र से बिना भयभीत हुये अपने कर्म में रत रहते हैं। हमारे तीन वर्षों के दिन-रात के साथी को, जिन्हे श्रीमतीजी सौत के नाम से भी बुलाती थीं और जो बिल गेट्स के विन्डो-मोबाइल परिवार से थे, सदैव ही इस बात का गर्व रहेगा कि उन्होने अपने प्राण हमारे हाथों में कर्मरत हो त्यागे, न कि फैशन की दौड़ में हारने के बाद किन्ही पुरानी अल्मारियों में त्यक्तमना हो। आइये स्मृति में दो मिनट का मौन रख लें।

बैडमिन्टन में पूर्णतया श्रम-निमग्न होने के पश्चात कोर्ट से बाहर आता हूँ, फोन बजते हैं, वार्तालाप में डूब जाने के समय पता ही नहीं चलता है कि कान के ऊपर बालों से टपकती स्वेद की बूँदें फोन के मेमोरी स्लॉट से अन्दर जा रही हैं। दो मिनट के बाद वार्तालाप सहसा रुद्ध होने पर जब तक भूल का भान होता, स्वेद का खारापन मोबाइल फोन की चेतना को लील चुका था। यद्यपि अभी उन्हें चेतना में लाने का श्रम चल रहा है पर आशायें अतिक्षीण हैं।

प्रियतम मोबाइल के जाने का दुख, मोबाइल न होने से विश्व से सम्पर्क टूट जाने का दुख और शीघ्र ही नया मोबाइल लेने में आने वाले आर्थिक भार का दुख, तीनों ही दुख मेरे स्वेद में घुलमिल कर टपक रहे थे। आँसू नहीं थे पर घर आकर बिटिया ने बोल ही दिया कि खेल में हार जाने से रोना नहीं चाहिये।

ऐसे अवसरों की कल्पना थी और घर में एक अतिरिक्त मोबाइल रहता था पर अपनों पर होने वाली आसक्ति और विश्वास में हम बाकी आधार छोड़ इतना आगे निकल आते हैं कि हमें अतिरिक्ततायें भार लगने लगती हैं। पिछले माह भाई को वह मोबाइल दे हम भी भारमुक्त हो गये थे।

रात्रि के 9 बजे दो जन मॉल पहुँचते हैं, सेल्समानव भी अचम्भित क्योंकि मोबाइल हड़बड़ी में खरीदने की वस्तु नहीं। बड़ा ही योग्य युवक। पूछा किस रेन्ज में और किन विशेषताओं के साथ? हमने डायलॉग मारा कि रेन्ज की समस्या नहीं पर उसमें हिन्दी कीबोर्ड होना चाहिये। श्रीमती जी मन में यह सोचकर मुस्करा रहीं थी कि निकट भविष्य में उनका डायलॉग भी कुछ ऐसा ही होने वाला है। रेन्ज की समस्या नहीं पर उसमें डायमण्ड होना चाहिये।

मोबाइल पर लिये निर्णय पर बहस कुछ ऐसी थी।
  1. विन्डो मोबाइल के पुराने मॉडल लेने का प्रश्न नहीं। विन्डो फोन 7 आने में देर है पर उसमें भारतीय भाषाओं के कीबोर्ड का प्रावधान नहीं है। आइरॉन केवल विण्डो मोबाइल 6.1 तक ही हिन्दी कीबोर्ड उपलब्ध कराते हैं।
  2. आईफोन ने 37 भाषाओं के कीबोर्ड दिये हैं पर भारतीय भाषाओं को इस लायक न समझ कर भारत का दम्भयुक्त उपहास किया है।
  3. एन्ड्रायड फोन नये हैं। गूगल ने जो प्रयास सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने में किये हैं, उन्हें इन फोनों में आते आते समय लगेगा।
  4. सिम्बियानयुक्त नोकिया के फोनों में भी हिन्दी कीबोर्ड के दर्शन नहीं हुये। मैं ट्रान्सइटरेशन के पक्ष में नहीं हूँ।

हम लगभग निराश हो चले थे कि आज का चौथा दुख मोबाइल में हिन्दीहीन हो जाने का होगा, तभी सेल्समानव को एक मॉडल याद आया LG GS290। उसमें उन्होने हिन्दी अंग्रेजी शब्दकोष देखा था। उस मॉडल को जब हमने परखा तो उसमें हिन्दी कीबोर्ड उपस्थित था, यूनीकोड से युक्त।

मेरे चारों दुख वाष्पित हो गये और आँखों में आह्लाद का नीर उमड़ आया। आह्लाद उस समय और खिल गया जब उसका मूल्य 6000 ही पाया। हिन्दी कीबोर्ड के लिये 30000 के खर्चे का मन बना चुके हम, लगभग 24000 की बचत पर आनन्दित थे। अब इस पूरे घटनाक्रम को आप दैवयोग न कहेंगे तो क्या कहेंगे?

पर क्रोध की एक रेखा मन में बनी है अब तक।

मोबाइल जगत के धुरन्धर, भारतीय भाषाओं की दम्भयुक्त उपेक्षा कर रहे हैं और हम अपने सॉफ्टवेयरीय दास्यभाव में फूले नहीं समा रहे हैं। भारत एक भाषाप्रधान देश है तो क्या एक भी भारतीय लाल नहीं है जो इस सुविधा को विकसित कर सके? क्या सरकारों में इतना दम नहीं कि मना कर दे मोबाइल बेचने वालों को जब तक उनमें सारी भारतीय भाषाओं के लिये स्थान न हो? क्या हम अपनी भाषा को रोमन में लिख लिख कर अपने भाषा प्रेम का प्रदर्शन करते रहेंगे। कीबोर्ड के अभाव में यदि हम रोमन में लिख रहे हैं तो क्या यह अभाव हमारे देश की बौद्धिक सम्पदाओं के अनुरूप है?

मुझे उस दिन की प्रतीक्षा है जब हम अपनी विन्डो में बैठ अपना एप्पल खायेंगे।