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12.6.21

मिल के साथ आयें हम


मिल के साथ आयें हम,

देश को बचायें हम ।

खो गये जो लब्ध शब्द,

पुनः ढूढ़ लायें हम । 

 

केश हैं खुले हुये, द्रौपदी के आज फिर,

पापियों के वक्ष से रक्त सोख लायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।१।।

 

जंगलों में घूमती, क्यों रहे जनक-सुता,

लांछन लगा रही जो जीभ काट लायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।२।।

 

प्रेम का स्वरूप क्यों, यूँ छिपा छिपा रहे,

ढूढ़ कर स्वयं उसे, हृदय में बसायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।३।।

 

मातृ के स्वरूप को, देख कर हर एक में,

गिर रहे चरित्र-मूल्य, उन्हें फिर उठायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।४।।

 

लाज का जो आवरण, गिर रहा है शीश से,

खुद उठायें, स्वयं ही, हाथ से सजायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।५।।

 

पीछे पीछे रह गयीं, आज सारी नारियाँ,

मार्ग मे हर एक पग, साथ ही बढ़ायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।६।।


रही व्यक्त देवियाँ, शूरता में, ज्ञान में,

हर दिवस यही निनाद जागरण बनायें हम।

मिल के साथ आयें हम ।।७।।

 

पुरुष की है पूर्णता, प्रकृति के उछाह पर,

उठें अर्धविश्व को प्रसन्नतम बनायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।८।।


24.4.16

मातृ-श्रृंगार

टूटने पाये न संस्कृति,
टूटने पाये न गरिमा ।
काल है यह संक्रमण का,
प्रिय सदा यह याद रखना ।।

वृहद था आधार जिसका,
वृक्ष अब वह कट रहा है ।
प्रेम का विस्तार भी अब,
स्वार्थरत हो बट रहा है ।।

चमकती थी कान्ति की 
आभा सतत माँ के नयन से ।
आज फिर वह चमक सारी,
विमुख क्यों है उन्नयन से ।।

आओ माँ का रूप मित्रों,
करें गौरव से सुसज्जित।
नियम माँ के, जो सनातन,
काल चरणों में समर्पित ।।

शत्रुता अपनी भुलाकर,
रक्त का रंग संघनित हो ।
पूर्व की अवहेलना अब,
अडिग अनुशासन जनित हो ।।

आज मिल आग्रह करें, 
यह चाह जीवन की बता दें,
मातृ का श्रृंगार करके,
सार्थक जीवन बिता दें ।

26.10.13

बचपन, भाषा, देश

जीवन के प्रथम दशक में हमारी भाषा, परिवेश का ज्ञान, विचारों की श्रंखलायें आदि अपना आकार ग्रहण करते हैं। यह प्रक्रिया बड़ी ही स्पष्ट है, आकृतियाँ, ध्वनि और संबद्ध वस्तुयें मन में एक के बाद एक सजती जाती हैं। इन वर्षों में हमारी समझ जितनी गहरी होती, ज्ञान का आधार उतना ही सुदृढ़ बनता है। कभी सोचा है कि जब हम बच्चे को एक के स्थान पर दो भाषायें सिखाने लगते हैं, ज्ञान की नींव पर उसका क्या प्रभाव पढ़ता होगा?

किस भाषा को किधर रखूँ मैं
यदि बचपन में हम एक भाषा के स्थान पर दो भाषाओं से लाद देते हैं तो जो ज्ञानार्जन करने में जो समय व मस्तिष्क लगना चाहिये वह अनुवाद करने में निकल जाता है। जब शब्द और उससे संबद्ध अर्थ सीखने का समय होता है तब मस्तिष्क आनुवादिक भ्रम में रहता है कि ज्ञान को किस प्रकार से ग्रहण किया जाये, हिन्दी में या अंग्रेजी में। ज्ञान के प्रवाह में एक स्तर और बढ़ जाने से श्रम बढ़ने लगता है और याद रखने की क्षमता भी आधी रह जाती है। जिस समय एक वस्तु के लिये एक शब्द होना था, एक शब्द सीखने के बाद शब्दों को संकलित कर वाक्य बनाने का समय था, उस समय हम अपना कार्य बढ़ाकर दूसरी भाषा में उसको अनुवाद करवा रहे होते हैं।

पता नहीं इस पर कभी कुछ विचार हुआ है कि नहीं कि नयी भाषा सीखने की सबसे उचित आयु कौन सी है। जब उसकी आवश्यकता पड़ती है तब तो लोग भाषा सीख ही लेते हैं और बहुत ही अच्छी सीखते हैं। यदि विज्ञान आदि पढ़ने के लिये अंग्रेजी सीखनी आवश्यक ही हो चले तो किस अवस्था में अंग्रेजी सीखनी प्रारम्भ करनी चाहिये? विकास की दौड़ में कोई भी पिछड़ना नहीं चाहता है, सबको लगता है अंग्रेजी बचपन से मस्तिष्क मे ठूँस देने से बच्चा सीधे ही अंग्रेजी बोलने लगेगा और कालान्तर में लॉट साहब बन जायेगा। लॉट साहब तो २०-२५ साल में ही बनते हैं, नौकरी भी उसी के बाद ही मिलती है। यह भी एक तथ्य है कि विकसित मस्तिष्क को अंग्रेजी सीखने में ३-४ वर्ष से अधिक समय नहीं लगता है। पर प्रारम्भ के तीन वर्ष जो जगत की समझ विकसित होती है, उसमें दूसरी भाषा ठूँस कर हम क्यों उसके भाषायी मानसिक आकारों को गुड़गोबर करने पर तुले हैं, किस आभासी लाभ के लिये यह व्यग्रता, क्यों यह मूढ़ता?

निम्हान्स के शोधकर्ताओं का भी मत है कि अधिक भाषायें सीखने से मस्तिष्क के सिकुड़ने का भय बना रहता है। हो सकता है कि अधिक भाषायें जान लेने से हम अधिक लोगों को जान पायें, भिन्न संस्कृतियों के विविध पर समझ पायें, पर गहराई में नीचे उतरने के लिये अपनी ही भाषा काम में आती है, शेष भाषा सामाजिकता की सतही आवश्यकतायें पूरी करती हुयी ही दिखती हैं, समझ विस्तारित तो होती है, गहरे उतरने से रह जाती है।

वहीं दूसरी ओर एक भाषा के माध्यम से देश की एकता की परिकल्पना करना भी भारत की विविधता को रास नहीं आया। भाषायी एकीकरण करने के लिये एक भाषा को अन्य पर थोपने के निष्कर्ष बड़े ही दुखमय रहे हैं, सबका अपनी भाषाओं के प्रति लगाव बढ़ा ही है, कम नहीं हुआ। अपितु थोपी जाने वाली भाषा के प्रति दुर्भाव बढ़ा ही है। राज्यों की सीमाओं को भाषायी आधार पर नियत होने में यह भी एक कारण रहा होगा। भाषायें अलगाव का प्रतीक बन गयीं, सबके अपने अस्तित्व का प्रमाण बन गयीं।

होना यह चाहिये था कि भाषाओं के बीच सेतुबन्ध निर्मित होने थे। भारत में एक ऐसा महाविद्यालय होता जहाँ पर सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य को संरक्षित और पल्लवित करने का अवसर मिलता। सभी भाषाओं के भाषाविद बैठकर अपनी भाषा के प्रभावी पक्षों को उजागर करते, साथ ही साथ अन्य भाषाओं के सुन्दर पक्षों को अपनी भाषा में लेकर आते। अनुवाद का कार्य होता वहाँ पर, संस्कृतियों में एकरूपता आती वहाँ पर। वहाँ पर एक भाषा से दूसरी भाषाओं में अनुवाद की सैद्धान्तिक रूपरेखा बनायी जाती, और यही नहीं, भारतीय भाषाओं को विश्व की अन्य भाषाओं से जोड़ने का कार्य होता।

होना यह चाहिये था कि हर भाषा का एक विश्वविद्यालय उस भाषा बोलने वाले राज्य की राजधानी में रहता, उस भाषा को केन्द्र में रखकर अन्य भाषाभाषियों को उस भाषा का कार्यकारी ज्ञान देने की प्रक्रियायें और पाठ्यक्रम निर्धारित किये जाते।

विश्व से जुड़ना भी हो
होना यह चाहिये था कि हर उस नगर में जहाँ पर बाहर के लोग कार्य करने आते हैं, एक भाषा विद्यालय होता जहाँ पर उन्हें वहाँ की स्थानीय भाषा आवश्यकतानुसार सिखायी जाती। जिनको समय हो उन्हें दिन में और जिनको समय न हो, उन्हें सायं या रात को। जब आसाम का कोई व्यक्ति कर्नाटक में आईएएस में चयनित होकर आता है, उसे कन्नड़ का पूरा ज्ञान दिया जाता है। उसे यह ज्ञान बहुत गहरा इसलिये दिया जाता है क्योंकि उसे राज्य के अन्दर तक जाकर स्थानीय लोगों की भाषा का निवारण करना पड़ता है। सबकी आवश्यकता इतनी वृहद नहीं हो सकती और उनका पाठ्यक्रम उसी के अनुसार कम या अधिक किया जा सकता है।

जहाँ हमारे संपर्क बिन्दु दो परस्पर भाषायें होनी थीं, किसी व्यवस्थित भाषायी प्रारूप के आभार में वह सिकुड़ कर अंग्रेजी मान्य होते जा रहे हैं। अब कितने प्रतिशत व्यक्ति जाकर विदेशों में कार्य करेंगे, जो करेंगे तो वे सीख भी लेंगे और वे सीखते भी हैं। अंग्रेजी ही क्यों आवश्यक हुआ तो चाइनीज़ या मंगोलियन भी सीख लेंगे। पर अंग्रेजी पर आवश्यक महत्व बढ़ाकर हम न केवल अपने नौनिहालों के मानसिक विकास में बाधा बने जा रहे हैं वरन अपनी भारतीय भाषाओं को भूलते जा रहे हैं। जहाँ भी किसी से संवाद की आवश्यकता होती है, लपक कर अंग्रेजी की वैशाखियों पर सवार हो लेते हैं।

जहाँ पर हमें भारतीय भाषाओं के मध्य सेतुबन्ध स्थापित करने थे और अपने देश में करने थे, उनका निर्माण करने के स्थान पर हम अपनी राह इंग्लैण्ड और अमेरिका जाकर बनाने लगते हैं। जहाँ बचपन में एक ही भाषा सिखानी चाहिये, दो दो भाषायें सिखाने लगते हैं। देश में एकता के सूत्र स्थापित करने के लिये एक भाषा थोपने की योजना बनाने लगते हैं।

भारतीय भाषायें यहाँ के जनमानस से सतही रूप से नहीं चिपकी हुयी हैं वरन उसकी जड़ें सांस्कृतिक और धार्मिक पक्षों को छूती हैं। उसे भूल जाने को कहना या उसका प्रयत्न भी करना दुखदायी रहा है, ऐसे ही असफल रहेगा और कटुता भी उत्पन्न करेगा। आपस में बात करने के लिये यदि हमें अंग्रेजी जैसी किसी मध्यस्थ भाषा की सहायता लेनी पड़े तब भी यह हमारे लिये लज्जा का विषय है। सब भाषाओं के प्रति पारस्परिक सम्मान का भाव व तदानुसार सेतुबन्ध बनाने के प्रयास ही भारत का भविष्य है। सेतुबन्ध न केवल हम सबको जोड़कर रखेगा वरन एक मार्ग भी बतायेगा जिससे नदी के दोनों ओर रहने वाले जन उसी एक जल से अपनी आर्थिक़, मानसिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समरसता सींच सकें।

25.8.12

झण्डा ऊँचा रहे हमारा

स्वतन्त्रता दिवस था, सुबह सर ऊँचा कर भारत के झण्डे के सामने राष्ट्रगान का सस्वर पाठ किया था। जब भी राष्ट्रगान बजता है, दृष्टि स्वतः ही झण्डे की ओर चली जाती है। बहती हवा में लहराता झण्डा मन में रोमांच भर देता है, लगता है कि कोई प्रतीक है जो हमें एक देश के सूत्र में बाँधे है, कोई प्रतीक है जो हमें उस संघर्ष की याद दिलाता है जो हमारे पूर्वजों की भेंट थी हम लोगों के लिये, इसलिये कि हम मुक्त गगन में जी सकें। घर वापस आकर कवि प्रदीप के लिखे गीतों पर आधारित एक कार्यक्रम देख रहा था। मन संतुष्ट था, भारत का लोकतन्त्र अपने ६५ वर्ष पूरे कर चुका था।

तभी वाणिज्य विभाग के अधिकारी का फोन आता है कि सर गुवाहटी के लिये ६०० अतिरिक्त टिकट बिक चुके हैं, लगता है कि आज जाने वाली ट्रेन में अतिरिक्त कोच लगाने होंगे। सामान्य दिनों की अपेक्षा संख्या अधिक थी पर कारण विशेष ज्ञात नहीं था, अधीनस्थों को अतिरिक्त कोचों की व्यवस्था सम्बन्धित आवश्यक निर्देश देकर आश्वस्त हो गये। अभी दो घंटे ही और बीते होंगे कि सूचना मिली कि टिकटों की संख्या २००० पार कर चुकी है, स्टेशन पर बहुत भीड़ है और लोग अभी भी टिकट ले रहे हैं। यह निश्चय ही असामान्य था, कोई बात अवश्य थी। उस समय बच्चों के साथ टेबल टेनिस खेल रहा था, जब और जानकारी लेने के लिये मोबाइल पर बात करने लगा तो बच्चों ने इस तरह देखा, मानो कह रहे हों कि आप यहाँ पर भी चालू हो गये।

दस मिनट में यह पक्का हो गया था कि लोग व्यग्र हैं और पलायन कर रहे हैं। नियत ट्रेन में इतनी क्षमता नहीं है कि वह इतने यात्रियों को ले जा पायेगी। अतिरिक्त कोच लगाने पर भी सबको स्थान नहीं दिया जा सकता था। एक विशेष ट्रेन चलाने का निर्णय लिया गया। सामान्य स्थिति में एक नियत प्रक्रिया के बाद ही ऐसी अनुमति मिलती हैं पर परिस्थितियों की गम्भीरता को देखते हुये तुरन्त ही मौखिक अनुमति मिल गयी। राष्ट्रीय अवकाश था और अधीनस्थों की संख्या अन्य दिनों से कम थी, फिर भी सब स्टेशन पर पहुँच गये थे। स्टेशन पर भीड़ अप्रत्याशित थी और सूचना मिल चुकी थी कि ३००० से अधिक टिकट बिक चुके हैं। व्यवस्था बनाये रखने के लिये सुरक्षा बल पहुँच चुके थे।

जो लोग रेलवे से जुड़े हैं, वे जानते हैं कि इतने कम समय में एक विशेष ट्रेन को चलाना बड़ा ही दुरूह कार्य है। कोचों को एकत्र करना, एक साथ लाकर ट्रेन को स्वरूप देना, ६ घंटे के नियत गहन परीक्षण में देना, इंजन, ड्राइवर और गार्ड आदि की व्यवस्था करना। इन सब कार्यों में कई निर्णय तात्कालिक लेने होते हैं, उस हेतु सारे सम्बन्धित अधिकारी और पर्यवेक्षक अपने कार्यस्थल पर पहुँच चुके थे, कार्य अपनी पूरी गति में था। उधर भीड़ व्यग्र हो रही थी, उन्हें भी बताना आवश्यक था कि उनके लिये एक विशेष ट्रेन चलायी जायेगी। नियत ट्रेन के पहले ही एक विशेष ट्रेन चलाने की घोषणा ने भीड़ को संयत किया, प्लेटफार्म नियत कर उसकी भी उद्घोषणा कर दी गयी। सुरक्षाबलों ने बड़ी ही कुशलता से सबको नियत प्लेटफार्म पर पहुँचाने का कार्य प्रारम्भ किया। धीरे धीरे सारा प्लेटफार्म भर गया, लोग अनुशासित हो विशेष ट्रेन के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

जिस समय संवेदनायें अपने उफान पर हों, समस्या को सीमित मान लेने की भूल नहीं की जा सकती थी। इतनी व्यवस्था करने के बाद भी टिकट बिक्री पर दृष्टि बनी हुयी थी। पहली विशेष ट्रेन जाने में अभी ४ घंटे शेष थे, तभी पता लगा कि टिकट ७००० की संख्या पार कर चुके हैं। निर्णय लेना आवश्यक था, एक और विशेष ट्रेन की अनुमति लेकर उसकी घोषणा कर दी गयी। जब घर में ४ लोगों का खाना बनता हो और सहसा गृहणी को १०० लोगों की व्यवस्था करने को कहा जाये, तो जो स्थिति गृहणी की होती है, वैसी ही हम लोगों की हो रही थी। हाथ में जो भी था, उसे सेवा में लगा दिया गया, पड़ोसी मंडलों और मुख्यालयों से सहायता के लिये गुहार लगायी गयी। वरिष्ठों ने परिस्थितियों को समझा और यथासंभव और त्वरित सहायता की व्यवस्था की। सहायता आनी थी पर उसमें समय लगना था, सामने ७००० की संख्या। बस ईश्वर से यही मना रहे थे कि आज संख्या इससे अधिक न बढ़े, दो विशेष और एक नियमित ट्रेन में ७००० यात्रियों को भेजना संभव था।

ट्रेनों की तैयारी पर और भीड़ की गतिविधियों पर दृष्टि बनी रहे, इस कारण फुट ओवर पुल पर एक स्थान ढूढ़ा गया। वह भीड़ के प्रवाह से थोड़ा अलग था और निर्णय लेने के लिये समुचित। तब तक स्टेशन पर पहुँच चुके मीडिया और अन्य संगठनों की दृष्टि से भी दूर था वह स्थान। एक सुरक्षाकर्मी और एक पर्यवेक्षक के साथ वहाँ पर कोई व्यवधान नहीं था। स्टेशन पर लगातार उद्घोषणा की जा रही थी जिससे भीड़ संयत बनी रहे, सबको यह विश्वास दिलाया जा रहा था कि सबको भेजने की व्यवस्था की जायेगी। इतनी अधिक भीड़ तीन घंटे संयत और अनुशासित बैठी रही, यह अपने आप में स्मरणीय अनुभव था हम सबके लिये।

अन्ततः पहली विशेष ट्रेन आयी, पर उसके पहले निर्णय इस बात का लेना था कि कोचों के दरवाजे पहले से खोलकर लाया जाये या बन्द कर के। दरवाजे खोलकर लाने से लोग चलती ट्रेन में घुसने का प्रयास करते और कुछ अनहोनी होने की संभावना बनी रहती। बन्द कर के लाने से लोग अधीर हो जाते। अन्ततः निर्णय लिया गया कि प्लेटफार्म की ओर दरवाजे बन्द रखे जायेंगे औऱ दूसरी ओर के खुले। हर कोच में एक कर्मचारी रहेगा जो अन्दर से दरवाजा तभी खोलेगा जब सुरक्षाबल बाहर से भीड़ को पंक्तिबद्ध और अनुशासित कर लेंगे। इसमें थोड़ा समय अधिक लगा, कर्मचारी अधिक लगे पर बिना किसी घटना के ट्रेन में यात्री बैठ गये। प्लेटफार्म पर बचे लोगों को अगली ट्रेन तक रुकने को कहा गया। जब ट्रेन सकुशल निकल गयी तभी अन्य यात्रियों को एक अस्थायी जमावड़े से प्लेटफार्म तक आने दिया गया।

डेढ़ घंटे के अन्दर तीन ट्रेन जाने के पश्चात प्लेटफार्म और टिकटघर खाली हो चुका था। आरक्षित यात्रियों समेत लगभग ८५०० यात्रियों को सकुशल भेजने के बाद समय देखा तो रात्रि २ बज चुके थे। हमारा कार्य फिर भी समाप्त नहीं हुआ था, लगभग आधे घंटे दिनभर के कार्य की कमियों पर छोटी चर्चा हुयी, अच्छे कार्य के लिये अधीनस्थों की पीठ थपथपायी गयी। यह मानकर चला जा रहा था कि अगले दिन भी यही प्रवाह बना रहेगा। अन्य मंडलों से आने वाली सहायता के आधार पर अगले दिन की रूपरेखा बनाकर घरों की ओर प्रस्थान किया गया।

घर आया तो दोनों बच्चे गहरी नींद में सो रहे थे, न साथ टेबल टेनिस खेल पाया, न साथ में भोजन ही कर पाया। मेरी भी आँखों में गहरी नींद थी, पर यह सोच रहा था कि जब कल बच्चे पूछेंगे कि देर रात तक स्टेशन पर क्या कर रहे थे, तो क्या उत्तर दूँगा? यदि कहूँगा कि ६५ वर्ष के लोकतन्त्र की दृढ़ता का एक अपवाद देख कर आया हूँ, तो क्या वे इस बात को समझ पायेंगे? एक रेलवे कर्मचारी के रूप में सामने उपस्थित कार्य को सकुशल निभा पाने की उपलब्धि क्या उन्हें सगर्व बता पाऊँगा? पंजाब, सिन्धु, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंग, जो कभी एक वाक्य में पिरोये गये थे, जो राष्ट्रगान के अंग थे, वे आज अपने अपने अलग अर्थ क्यों ढूढ़ने लगे हैं, क्या यह समझा पाऊँगा?

अधिक सोच नहीं पाता हूँ, निढाल हो बिस्तर पर लुढ़क जाता हूँ। जो भी हो, कल फिर गाऊँगा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा।

4.2.12

पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा

एप्पल ने शिक्षा के क्षेत्र में पहल करते हुये आईबुक ऑथर के नाम से एक सुविधा प्रारम्भ की है। इस एप्लीकेशन के माध्यम से आप कोई पुस्तक बड़ी आसानी से लिख सकते हैं और आईट्यून के माध्यम से ईबुक के रूप में बेचकर धन भी कमा सकते हैं। उपन्यास, कविता इत्यादि के अतिरिक्त गणित, विज्ञान जैसे विषयों पर पाठ्य पुस्तक लिखने के लिये कई प्रारूप दिये गये हैं इस सुविधा में। किसी भी अध्याय में लेखन और चित्रों के अतिरिक्त वीडियो, त्रिविमीय दृश्य, पॉवर प्वाइण्ट प्रस्तुति, एक्सेलशीट गणनायें आदि के होने से पढ़ने का अनुभव अलग ही होने वाला है। पुस्तक आप मैकबुक में लिख सकते हैं पर समुचित पढ़ने के लिये आईपैड का विकल्प ही रहेगा। इस माध्यम से एप्पल का प्रयास आईपैड को शिक्षा के आवश्यक अंग के रूप में स्थापित करने का रहेगा।

मेरे अग्रज नीरजजी ने अपने पुत्र को हाईस्कूल के समय नियमित पढ़ाया है और वह प्रचलित कई पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता से संतुष्ट नहीं हैं, उनका कहना है कि पाठ्यपुस्तकों को और अधिक प्रभावी ढंग से लिखा जा सकता है और रोचक बनाया जा सकता है। आईबुक ऑथर के रूप में नीरजजी को रोचक ढंग से पुस्तक लिखने के लिये एक उपहार मिल गया है। यदि वह कोई पुस्तक इसपर लिखेंगे तो वह कैसी लगेगी? इसी उत्सुकता में एक अध्याय लिखकर देखा, वह आईपैड पर कैसा लगेगा यह देखने के लिये एप्पल के स्टोर इमैजिन में गया। खड़ा हुआ आईपैड में वह अध्याय देख रहा था, बगल में एक १४-१५ साल की लड़की अपने माता पिता के साथ आईपैड देख रही थी, उनके बीच की बातचीत, न चाहते हुये भी सुनायी पड़ रही थी।

लड़की किसी तरह यह सिद्ध करने में प्रयासरत थी कि वह आईपैड एक खिलौने के रूप में नहीं लेना चाहती, वरन उसका उपयोग अपनी पढ़ाई में कर अच्छा भविष्य बना सकती है। मैं थोड़ा प्रभावित हुआ, मुझे भारत का भविष्य आशावान लगने लगा। मुझे भारतीय मेधा पर कभी संशय नहीं रहा है, पर अपनी बात खुलकर कह पाने का गुण भारतीय बच्चों में न पाकर निराशा अवश्य होती है, कुछ संकोच के कारण नहीं बोलते हैं, कुछ मर्यादा के लबादे में दबे रहते हैं। वह लड़की जब बोल रही थी, जिज्ञासावश मैं अपना कार्य छोड़ तन्मयता से बस सुने जा रहा था। भारत अपने महत भविष्य में दौड़ लगाने जा रहा था, तभी पिता का एक आश्वासन सुनकर ठिठक गया। पिता बोले, बेटी परीक्षा में पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा।

कुछ जाना पहचाना सा लगता है यह आश्वासन, सबके साथ हुआ होगा जीवन में, बस इस वाक्य में तीन के स्थान पर कोई और संख्या व आईपैड के स्थान पर कोई और वस्तु बदल जाती होगी। आपके साथ बचपन में हुआ होगा और संभव है कि आप अपने बच्चों को यही सूत्र पिला रहे हों, पतिगण अपनी पत्नियों से कुछ ऐसा ही मीठा संवाद बोलते होंगे, पत्नियाँ भी ऐसे गुड़भरे संवादों को सूद समेत चुकाती होंगी, ध्यान से देखें तो हर जगह यही सिद्धान्त पल्लवित हो रहा है। बड़ी गहरी पैठ बना चुका है यह अन्तर्पाश, हर परिवार में।

बचपन से अब तक की दो ही घटनायें याद आती हैं, इस प्रकार के अन्तर्पाश की, क्रिकेट बैट पाने के लिये गणित की किसी परीक्षा में पूरे अंक लाने का लक्ष्य और घड़ी पाने के लिये हाईस्कूल में ससम्मान उत्तीर्ण होने का लक्ष्य। दोनों ही लक्ष्य प्राप्त हुये थे और पिताजी ने दोनों ही वचन पूरे किये, पर उसके बाद से मैं अपने कर्म करता रहा, पिताजी स्वतः ही कुछ न कुछ फल देते रहे, किसी फल विशेष के लिये किसी कर्म विशेष को विवश नहीं किया गया, कोई अन्तर्पाश नहीं रहा।

कर्मफल का सिद्धान्त है, कर्म करने से फल मिलता है, पर जगतीय कर्मफल के सिद्धान्त से थोड़ा अलग है पारिवारिक कर्मफल का सिद्धान्त। जगतीय कर्मफल में सफलता और सफलता की प्रसन्नता अपने आप में फल होता है। पारिवारिक कर्मफल में किसी कार्य की सफलता ही कर्म है, फल पूर्णतया असम्बद्ध होता है। आशाओं और आकांक्षाओं का आदान प्रदान होता है पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में।

खैर, लड़की के पास दो माह का समय है, प्रथम तीन में आकर आईपैड पाने के लिये। भगवान करे, उसका दृढ़निश्चय उसे सफलता दिलाये। इसी बीच मैं नीरजजी को भी बोलता हूँ कि एक स्तरीय पुस्तक लिखना प्रारम्भ कर दें, आने वाली पीढियाँ ढर्रे वाली पुस्तकों के अतिरिक्त अच्छे लेखकों की पुस्तकें पढ़ने को तैयार बैठी हैं। टिम कुक जी का ईमेल लेकर उन्हे भी सूचना देता हूँ कि आप जो शिक्षा को भी संगीत, फोन और लैपटॉप की तरह एक नया स्वरूप दे रहे हैं, उसमें सप्रयास लगे रहिये। भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग। भारत में हर बच्चे के पास होगा आईपैड, क्योंकि अपनी मेधा के बल पर भारत ही प्रथम तीन में सदा बना रहेगा।

21.1.12

भ्रष्ट है, पर अपना है

ठंड और धुंध ने पूरा कब्जा जमाया हुआ है, हवाई जहाज को सूझता नहीं कि कहाँ उतरें, ट्रेनों को अपने सिग्नल उसके नीचे ही आकर दिखते हैं, कार ट्रक के नीचे घुस जाती है, लोग कुछ बोलते हैं तो मुँह से धुँआ धौंकने लगता है। सारा देश रेंग रहा है, कुछ वैसा ही जैसा भ्रष्टाचार ने बना रखा है, लोगों की वेदना है कि कहीं कोई कार्य होता ही नहीं है।

मेरे कई परिचित इस धुंधीय सिद्धान्त को नहीं मानते हैं, वे आइंस्टीन के उपासक हैं, ऊर्जा और भार के सम्बन्ध वाले सिद्धान्त के। उनका कहना है कि जितनी गति से कार्य अपने देश में होता है उतनी गति से कहीं हो ही नहीं सकता है, प्रकाश की गति से, उस गति में धन और ऊर्जा में कोई भेद नहीं, कभी धन ही ऊर्जा हो जाती है, कभी ऊर्जा धन बन जाता है, उस गति में दोनों ही अपना स्वरूप खोकर आइंस्टीन के प्रसिद्ध सूत्र (E=mc²) को सामाजिक जीवन में सिद्ध करने में लग जाते हैं। किसी कार्य के लिये धन लेने के बाद गजब की गुणवत्ता और तीव्रता आ जाती है उस कार्य में, कार्य धार्मिक आस्था से भी गहरे भावों से निपटाये जाने लगते हैं, नियम आदि के द्वन्द्व से परे।

विशेष सिद्धान्त विशेषों के लिये ही होते हैं, आमजन तो अपने लिये सूर्य की सार्वजनिक ऊष्मा पर ही निर्भर हैं। उनके लिये तो उपाय कतार में खड़े अन्तिम व्यक्ति तक पहुँचने चाहिये, जैसा गांधी बाबा ने चाहा। यही कारण रहा होगा कि लोकपाल के विषय ने देश की आशाओं में थोड़ी गर्माहट भर दी, लगने लगा काश देश की भी मकर संक्रान्ति आ जाये, देश का भविष्य-सूर्य उत्तर-पथ-गामी हो जाये। कई महानुभाव जो बंदर-टोपी चढ़ाये इस ठंड और धुंध का आनन्द ले रहे हैं, उन्हें संभवतः यह संक्रान्ति स्वीकार न थी, लोकपाल तुड़ा-मुड़ा, फटा हुआ, महासदन के मध्य, त्यक्त पड़ा पाया गया।

अब लगे हाथों चुनाव भी आ गया। जब भी चुनाव आता है, लगता है कि कतार में खड़े अन्तिम व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार मिलेगा। जिस स्वप्न को उसने पिछले पाँच वर्षों तक धूल धूसरित होते देखा था, उसे पुनः संजोने का समय आ गया है, किसी नये प्रतिनिधि के माध्यम से, स्वच्छ छवि और कर्मठमना प्रतिनिधि के माध्यम से। सत्ता के आसमान और जनता की धरा के मिलन की आशाओं का क्षितिज पाँच वर्ष में एक बार ही आता है, उत्सव मने या कर्तव्य निभाया जाये, सबको यही निश्चित करना होता है।

पता नहीं क्यों इस परिप्रेक्ष्य में एक सच घटना याद आ रही है।

एक अधिकारी निरीक्षण पर थे, स्थानीय पर्यवेक्षक कार्य में बड़ा कुशल था पर उसके विरुद्ध स्थानीय कर्मचारियों ने आकर अधिकारी को बताया कि वह हर कार्य कराने का पैसा लेता है। यद्यपि प्रशासन को उस पर्यवेक्षक से तनिक भी शिकायत न थी, उसके पर्यवेक्षण में सारे प्रशासनिक कार्य अत्यन्त सुचारु रूप से चल रहे थे, फिर भी अधिकारी ने उसे स्थान्तरित करने का मन बना लिया। बस कर्मचारियों से कहा गया कि वही शिकायत लिखित में दे दें। जब बहुत दिनों तक कोई पत्र न आया तो एक कर्मचारी को बुला इस उदासीनता का कारण पूछा गया। जो उत्तर मिला, वही संभवतः हमारा सामाजिक सत्य बन चुका है।

कर्मचारी ने कहा कि साहब यद्यपि शिकायत हमने ही की थी, बस आप उसे समझा दीजिये पर उसे हटाईये मत। वह पर्यवेक्षक थोड़ा भ्रष्ट अवश्य है पर हमसे अत्यन्त अपनत्व रखता है, छोटे बड़े सारे कार्य दौड़ धूप कर करवाता है, दिन रात नहीं देखता, सबका बराबर से ध्यान रखता है....साहब, वह हमारा अपना ही है....

पता नहीं भविष्य किस ओर दिशा बदलेगा, किसी का कोई अपना जीतेगा या भविष्य का सपना जीतेगा, अपनत्व के विस्तृत जाल बुने जा रहे हैं। पता नहीं क्यों मन खटक सा रहा है, कहीं उपरिलिखित घटना सच न हो जाये, कहीं अपनत्व न जीत जाये, कहीं आदर्शों को अगले ५ वर्ष पुनः प्रतीक्षा न करनी पड़ जाये, समझाने भर के चक्कर में एक और अवसर न खो जाये।

14.1.12

रघुबीरजी की कथा

रघुबीरजी अपनी पत्नी के साथ अपने घर की बॉलकनी में बैठकर चाय की चुस्कियों का आनन्द ले रहे हैं, घर सोसाइटी की तीसरी मंजिल में है और रघुबीरजी हैं उस सोसाइटी के सचिव। कर्मठ और जागरूक, अन्दर से कुछ सार्थक कर डालने को उत्सुक, हर दिन विश्व को कुछ नया दे जाने का स्वप्न देखकर ही उठते हैं रघुबीरजी। एक युवा के उत्साह और एक वृद्ध के अनुभव के बीच एक सशक्त अनुपात सँजोये है रघुबीरजी का व्यक्तित्व, प्रौढ़ता को भला इससे अच्छा उपहार क्या मिल सकता है?

रघुबीरजी के जीवन में तीन विश्व बसते हैं, तीनों विश्व शताब्दियों के अन्तर में स्थापित, तीनों का मोह बराबरी से समाया हुआ उनके हृदय में, किसको किसके ऊपर प्राथमिकता दें यह निर्णय करना बहुधा उनके लिये ही कठिन हो जाता है। एक विश्व शारीरिक, एक मानसिक और एक आध्यात्मिक है उनके लिये, इन तीन अवयवों की क्षुधापूर्ति की संतुष्टि उनके मुखमंडल से स्पष्ट झलकती है।

पहला और शारीरिक विश्व उनके व्यवसाय का है। उन्नत तकनीकी शिक्षा, मौलिक शोध और सतत श्रम का प्रतीक है उनका व्यवसाय। जीवकोपार्जन के इस स्रोत को सम्यक रूप से सजाकर अब उन्हें अपने शेष दो विश्वों के लिये पर्याप्त समय मिलने लगा है। इस कारण उन्हें बहुधा विदेश यात्रा करनी पड़ती है। तकनीक, वाणिज्य और वैश्विक परिप्रेक्ष्य उनके प्रथम विश्व के अंग हैं और समयरेखा में सबसे आगे खड़े हैं।

दूसरा और मानसिक विश्व उनकी पर्यावरणीय चेतना का है। इस चेतना के कारण वह सोसाइटी के सचिव हुये या सोसाइटी के सचिव होने के बाद उनकी पर्यावरणीय कुण्डलनी जागृत हुयी, ठीक ठीक कहना कठिन है पर उनके पर्यावरणीय प्रयोगों की चाह ने सोसाइटी में कई बार उत्सुकता, भय और सुख की त्रिवेणी बहायी है। नये प्रयोग के बारे में सोचना, उसे क्रमशः कार्यान्वित करना और उसमें आने वाली बाधाओं को झेलना, किसी गठबन्धन सरकार चलाने से कम कठिन नहीं है। अपने परिवेश में घटनाओं का संलिप्त साक्षी बनना उनके दूसरे विश्व का केन्द्रबिन्दु है और समयरेखा में मध्य में अवस्थित है।

तीसरा और आध्यात्मिक विश्व उनके गाँव व संस्कृति की जड़ों से जुड़ाव का है। जिन गलियों में पले बढ़े, जहाँ शिक्षा ली, जिन सांस्कृतिक आधारों में जीवन को समझने की बुद्धि दी और जहाँ जाकर छिप जाने की चाह व्यग्रता के हर पहले क्षण में होती हो, वह उनके जीवन के रिक्त क्षणों से बन्धन बन जुड़ सा गया है। सभ्यता के मानकों में भले ही वह विश्व समुन्नत न हो पर रघुबीरजी के जीवन का स्थायी स्तम्भ है वह विश्व, समयरेखा के आखिरी छोर पर त्यक्त सा।

रघुबीरजी के जीवन में आनन्द बहुत ही कम होता यदि एक भी विश्व उनके जीवन से अनुपस्थित होता। आनन्द इसलिये क्योंकि उन्हें तीनों विश्वों के श्रेष्ठतम तत्व प्राप्त हैं। पहले विश्व के प्रेम की कमी तीसरे विश्व से, तीसरे विश्व के धन और तकनीक की कमी पहले विश्व से, दूसरे विश्व के आलस्य और विरोध से जूझने की शक्ति तीसरे विश्व से और समाधान पहले विश्व से, सब के सब एक दूसरे के प्रेरक और पूरक। तीन विश्वों में एक साथ रहने से उनकी दृष्टि इतनी परिपक्व हो चली है कि उन्हें तीनों की सम्भावित दिशा और उसे बदलने के उपाय स्पष्ट दिखायी देते हैं।

रघुबीरजी के जीवन का यही उजला पक्ष उनकी अधीरता का एकल स्रोत है। समयरेखा में तीन विश्वों की उपस्थिति इतनी दूर दूर है कि उन्हें एक साथ ला पाने की अधीरता बहुधा उनके प्रयासों से अधिक बलवती हो जाती है। अपनी समग्र समझ सबको समझा पाना उनकी ऊर्जा को सर्वाधिक निचोड़ने वाला कार्य है, भाषा और तर्कसूत्र एक विश्व से दूसरे तक पहुँचते पहुँचते अपनी सामर्थ्य खो देते हैं। यही अधीरता रघुबीरजी की कथा का रोचक पक्ष है।

रघुबीरजी थोड़ी थोड़ी मात्रा में हम सबके भीतर विद्यमान हैं, देश तो रघुबीरजी के व्यक्तित्व का भौगोलिक रूपान्तरण ही है, रघुबीरजी के तीनों विश्व इस देश में भी बसते हैं। रघुबीरजी का आनन्द हम सबका आनन्द है और रघुबीरजी की कथा हम सबकी कथा। उनकी हर घटना में आप अपना मन डाल कर देखिये, संभव है कि उनकी कथा आपकी दवा बन जाये।

खैर, रघुबीरजी को बॉलकनी से एक कूड़े का ढेर दिखता है, बिजली के दो खंभों के बीच.......

(रघुबीरजी मेरे लिये एक पात्र नहीं वरन देश और समाज समझने के नेत्र हैं, यह श्रंखला यथासंभव समाज में व्याप्त रोचकता का अनुसरण करने का प्रयास करेगी)

24.8.11

प्रार्थना

इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो न।

9.4.11

टिक टिक, टप टप

रात आधी बीतने को है, चिन्तन पर विचारों के ज्वार ने अधिकार कर लिया है, ऐसी परवशता देखकर निद्रा भी रूठ कर चली गयी है, आँख गड़ गयी है छत पर लटके हुये पंखे पर, जिसके एक ब्लेड पर सतत चलते रहने से एक ओर ही कालापन उभर आया है। जो आगे रहकर जूझता है, सब कालिमा उसे ही ओढ़नी पड़ती है, समाज का नियम है, पंखा भी निभा रहा है। यह अधिक देख नहीं पाता हूँ, करवट बदल लेता हूँ, पंखे की हवा लेने वाले भी तो यही करते हैं।

करवट बदलने पर आज दबा हुआ हाथ असहज अनुभव कर रहा है, बाहर निकलना चाहता है। जानता हूँ कि समय के ढलान में दूसरा हाथ भी यही नौटंकी करेगा, पुनः पीठ के बल लेट जाता हूँ, फिर वही पंखा, आँख जोर से भींच लेता हूँ, संभवतः उसमें बचे हुये खारेपन को प्रत्युत्तर सा कुछ अनुभव हो जाये। पहले तो लगता था कि आँख बन्द होना ही नींद होता है, आज तो पुतलियाँ बन्द आँखों में भी मचल रही हैं, कभी बायें तो कभी दायें। कुछ स्थिर हुयी आँखें तो कान जग गये। घड़ी का स्वर, टिक टिक, समय भाग रहा है, केवल टिक टिक का शब्द रह रहकर सुनाई दे रहा है। अन्य दिन तो  यह थकान के पीछे छिप जाता था। आज थकान गौड़ हो गयी है, विचारों ने उसका अपहरण कर लिया है। आज टिक टिक पर ध्यान लग गया है।

विज्ञान पर क्रोध आ रहा है, समय का नपना तो बना दिया पर समय को अपना नहीं बनाया। दीवार पर चुपचाप जड़वत पड़ी घड़ी, सूर्यरथ से प्रेरणा ले कर्तव्यनिष्ठावश चलती रहती, अन्तर में कैसी चोट खाती रहती है, टिक टिक, टिक टिक, टिक टिक। सबको समय बताने वालों के हृदय भी ऐसे ही अनुनाद करते होंगे। नहीं नहीं, मुझे तो इस समय समयशून्य होना है, मुझे नहीं सुनना कोई भी स्वर जिससे समय का बोध हो, अपने होने का बोध हो। विज्ञान ने समय तो बताया पर अनवरत सी टिक टिक जोड़ दी जीवन में। अब कल ही जाकर डिजिटल घड़ी लूँगा, विज्ञान के माध्यम से ही विज्ञान का कोलाहल मिटाना पड़ेगा, शिवम् भूत्वा शिवम् यजेत।

शिवत्व का आरोहण और मन में समाधान आ जाने से धीरे धीरे टिक टिक स्वर विलुप्त हो गया। नींद तो फिर भी नहीं आयी, रात्रि के अन्य संकेत सो गये थे, पर पूर्ण स्तब्धता तो फिर भी नहीं थी, कुछ तो स्वर आ रहा था। ध्यान से सुना, टप टप, टप टप, टप टप। हाँ नल खुला था, नहीं नहीं ढीला था। यूँ ही टप टप बहता रहा तो न जाने कितना पानी बह जायेगा, कावेरी का पानी। कुछ कार्य करने की प्रेरणा हुयी। उठा, नल बन्द किया, जल देख प्यास लगना शाश्वत परम्परा है प्रकृति की, जल पीते समय आँखों को गिलास का गोल किनारा सम्मोहित करने लगा। जल की शीतलता और पात्र का सम्मोहन, शरीर के अंग ढीले पड़ने लगे। जाकर लेट गया, मन शान्त सा होता गया, धीरे धीरे, धीरे।

एक संतोष था मन में, यदि नल न बंद करता तो न जाने कितना जल बह जाता, वह जल जो जीवन देता है, न जाने कितनों को। शान्ति मिली, मन की अग्नि बुझने सी लगी, नल तो बन्द करना ही होगा, दिन मे भी वही किया और रात में भी।

मुझे तो टप टप सुनायी पड़ता है, आपको सुनायी पड़ रहा है?  ध्यान से सुनिये आप भी, जहाँ भी टिक टिक सुनायी पड़े, जायें और तुरंत नयी डिजिटल घड़ी ले आयें, तकनीक अपना लें। टप टप सुनायी दे तो नल को कस कर बन्द कर दें, एक बूँद भी न टपके। 

देश के सन्दर्भों में देखेंगे तो न जाने कितना टिकटिकीय कोलाहल उत्पन्न कर दिया है विकास के नाम पर, न जाने कितने नल खोल दिये हैं धनलोलुपों ने और देश की सम्पदा बही जा रही है, न जाने कितने जुझारू पंखो के ऊपर कालिमा पोत दी है जिससे वे कुछ चेष्टा ही न कर सकें।

न टिक टिक सहन हो, न टप टप, न मूढ़ बकर, न व्यर्थ बूँद भर, निश्चय तो करें। पंखा चले, कालिमा लगे तो लगे।

वह एक प्रयासरत है, हम सब भी प्रयासरत हों, तब जाकर देश चैन से सो पायेगा।

29.9.10

नखरे सहने का गुण

कुछ लोगों की सहनशक्ति अद्भुत होती है। उनका अन्तस्थल इतना गहरा होता है कि छोटी मोटी हलचल कहाँ खो जाती है, पता ही नहीं चलता है। वाक्यों की बौछार हो या समस्या का प्रहार, मुखमण्डल में प्रखर साम्य स्थापित। उनसे इतना सीखता रहा जीवन भर कि अब तो दर्पण के सामने खड़े होकर स्वयं को पहचान नहीं पाता हूँ। जीवन जीने में वह गुण अधिक प्रयोग हुआ हो या न हुआ हो पर एक क्षेत्र में यह गुण सघनता से उपयोग में आया है, वह है नखरे सहने में। अब तो बड़े बड़े नखरे पचा ले जाता हूँ, बिना तनिक भी विचलित हुये। 

सहजीवन की एक कला है, यह नखरे सहने का गुण। कभी बच्चों के, कभी उनकी माँ के, कभी समाज के कर्णधारों के, कभी यशदीप के तारों के। यह अपार सहनशक्ति यदि जल बन सागर में प्रवाहित हो जाये तो केवल मनु ही पुनः बचेंगे, वह भी हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, भीगे नयनों से प्रलय-प्रवाह देखते हुये। 

जब तक हमारी नखरे सहने की कुल क्षमता, नखरे करने वालों की क्रियाशीलता से अधिक रहती है, परिवेश में शान्ति बनी रहती है। जैसे ही सहनशक्ति क्षरित होने लगती है, हुड़दंग मचने लगता है। दो कार वाले सम्पन्न जीव, बेकार सी बात के लिये, साधिकार द्वन्दयुद्ध में उद्धृत दिखाई दे जायेंगे। परिवेशीय संतुलन का यह विशेष गुण शान्तिप्रिय जनों की अन्तिम आशा है, जीवन में स्थायित्व बनाये रखने के लिये। अभ्यास मात्र से यह गुण कितना भी बढ़ाया जा सकता है। अपने अपने जीवन में झाँककर देखिये तो आपको यह तथ्य सिद्ध होता दिख जायेगा।

नखरे सहने का गुण पर इतना परमहंसीय भी नहीं है। प्रेम के समय नखरों को क्षमता से अधिक सहन करने का क्रम अन्ततः किसी विस्फोट के रूप में निकलता है। नेताओं के नखरे पाँच वर्षों बाद सड़कों पर निरीह खड़े दिखते हैं। नखरे न केवल सह लेना चाहिये वरन उसे पचा भी ले जाना चाहिये, सदा के लिये। जो नहीं पचा पाते हैं, विकारग्रस्त होने लगते हैं, धीरे धीरे। इस गुण को या तो कभी न अपनायें या अपनायें तो उस पर कोई सीमा न रखें। बस सहते जायें नखरे उनके, एक के बाद एक, निर्विकार हो।

नखरे सहने के गुण में प्रवीणता पाने के लिये नखरे करने वालों की भी मनोस्थिति समझना आवश्यक है। अपने एक गुण के आधार पर पूरा व्यक्तित्व ढेलने के प्रयास को नखरे के रूप में मान्यता प्राप्त है। यदि प्रेमी बहुत सुन्दर हो तो उसके विचार, उसके परिवार, उसके बनाये अचार, सभी की प्रशंसा आपका कर्तव्य है। एक भी क्षेत्र में बरती कोताही का प्रभाव व्यापक और त्वरित होता है। यदि कोई बड़ा नेता बन गया, किसी भी कारण से, तो उसके व्यवहार का अनुकरण और उसके प्रति बौद्धिक समर्पण दोनों ही आपके लिये आवश्यक है। व्यक्तित्व के प्रति पूर्ण समर्पण ही नखरे सह लेने की योग्यता का आधार स्तम्भ है।

आत्मज्ञान जहाँ एक ओर आपकी सहनशक्ति बढ़ाता है वहीं दूसरे पक्ष की क्रियाशीलता कम भी करता है। भारत में आत्मज्ञानी साधुओं और गृहस्थों की अधिक संख्या, विश्वशान्ति के प्रति हमारी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं।

नखरे सहने में और मूर्खता करने में कुछ तो अन्तर हो। नखरे सहते सहते स्वयं ही कश्मीर बना लेना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? नखरे सहने की राह सदा ही मूर्खता के गड्ढों से बचा कर रखें, हम सब। कभी न कभी तो दो टूक उत्तर का भी स्थान हो हमारे वचनों में।

11.8.10

मेरे देश का मानचित्र कौन बनायेगा

बड़े घर की समस्या यह है कि सबको अपने अपने कमरे चाहिये होते हैं। मुझे तो पहली बार अपना कमरा आईआईटी के तीसरे वर्ष में जाकर मिला था अतः मेरा अनुभव इस समस्या के बारे में कम ही था। पृथु और देवला अभी तक एक कमरे मे ही थे। देवला की सहेलियों की गुड़िया-प्राधान्य बातों से व्यथित हो, पृथु ने अलग कमरे की माँग रख दी। एक अतिरिक्त कमरा था, अतः दे दिया गया।

पृथु को अलग कमरा क्या मिला, देवला ने विद्रोह कर दिया। जिन सुविधाओं पर अब तक दोनों का साझा अधिकार था, उनमें से कुछ के लिये अब उसे चिचौरी करनी पड़ सकती थी। अब घर में सबसे अधिक मुखर वही है, तर्क दे तर्क, पीछे पड़ी रही। पहले तो हम टालते रहे। उसके बाद तथ्यों में उलझाने का प्रयास किया। बातचीत तो कितनी भी लम्बी खींची जा सकती है। हम लोगों के टालमटोलू रवैये से उकता कर वह कागज और पेन लायी, घर का मानचित्र बनाया और सबके कमरे पुनः निर्धारित कर दिये। मुझे सबसे बड़ा विरोधी मान सबसे छोटा और कम सुविधाओं वाला कमरा दिया गया। अब इस विषय पर कमेटी व सब कमेटी बनाये बिना ही हमें ऐसा समाधान निकालना पड़ा जिससे समस्या अन्ततः हल हो गयी। इस विषय में मेरा अनुभव भी थोड़ा और बढ़ गया।

मेरा देश भी बड़ा है, सबके अपने अपने कमरे हैं। अब घर के हर कमरे में यदि एक दरवाज़ा बना दिया जाये बाहर जाने के लिये तो घर का स्वरूप कैसा होगा। कश्मीर अपना दरवाज़ा खोलकर बैठा है, उत्तरपूर्व अपना दरवाज़ा खोलकर बैठा है। सूराख और सेंधें तो दसियों लगी हैं। घर के अन्दर कमरों में बैठे लोगों ने अपना स्वातन्त्र्य घोषित कर दिया है। नक्सल अपना मानचित्र बनाये बैठे हैं। मुम्बई के मानचित्र को कोई अपना बता चुका है। कोई जाति विशेष, धर्म विशेष के कमरों का प्रतिनिधि बना बैठा है देश के सबसे बड़े कमरे में। देश को कब्जा कर लेने की प्रक्रिया चल रही है, देश के मानचित्र में अपने प्रभुत्व की रेखायें खींच रहे हैं कुछ ठेकेदार, यह भी नहीं जान पा रहे हैं कि अब उससे रक्त की धार बहने लगी है। देश की चीत्कार नहीं सुन पा रहे हैं, संभव है कि उसकी मृत्यु का संकेत भी न समझ पायें ये रक्तपिपासु।
 
इतनी ढेर सारी क्षेत्रीय समस्यायें देख कर तो लगता है कि समस्यायें भी मदिरा की भाँति होती हैं। जितनी पुरानी, उतना नशे में डूबी। यदि तुरन्त सुलझ गयीं तो क्या आनन्द? सारा देश इसी नशे में आकण्ठ डूबा है।

मेरे घर का छोटा सा विवाद, बिटिया की सुलझाने की इच्छा व दृढ़विश्वास, समाधान एक मानचित्र के रूप में आ गया।

मेरे घर का मानचित्र तो बिटिया बना लाई, मेरे देश का मानचित्र कौन बनायेगा?

आह्वान है उनसे जिनके हाथ में कुछ लिख देने की क्षमता है, आह्वान है उनसे जिनकी वाणी का प्रभाव अंगुलिमालीय मानसिकतायें बदल सकता है, आह्वान है उनसे जो इतिहास के पन्नों में न खो जाने की चाह रखते हैं, आह्वान है उनसे जिनकी दृष्टि देश का खण्डित स्वरूप देखकर पथरा जाती है और आह्वान है उनसे जो मूक दर्शक हैं इस अलगाववादी तांडव के। आप सब में देश का मानचित्र बना देने और उसे सबके अस्तित्व में बसा देने की क्षमता है।

का चुप साधि रहा बलवाना।
   
मेरा विश्वास है कि मेरा नैराश्य मेरी मृत्यु तक जीवित नहीं रहेगा क्योंकि यदि मेरी बिटिया में घर का मानचित्र बनाकर मेरे सम्मुख रख देने का साहस है तो वह और उसके सरीखे अनेक बच्चे कल हमारे हाथों से निर्णय का अधिकार छीनकर देश का मानचित्र भी बना देंगे।