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10.8.21

ब्लाग यात्रा - ३ (टिप्पणी)


जो लोग ब्लाग लिखते हैं और उसमें रुचि लेते हैं, वे टिप्पणियों के महत्व को भी समझते हैं। उत्साह बढ़ाने में, सृजनात्मकता बनाये रखने में टिप्पणियाँ अमृत सा कार्य करती हैं। यह इस विधा का ही वैशिष्ट्य है कि पाठकों को लेखक से संवाद का अवसर मिलता है।


जब लगभग एक पृष्ठ पर आपने कोई विषय, घटना या कविता रखी हो तो यह स्वाभाविक ही है कि उस पर कहने को बहुत कुछ होगा। कई पक्ष छूटे होंगे, कई पर असहमति होगी, कई पर दृष्टिकोण भिन्न होंगे, कई पर आत्मिक अनुभव भी होंगे। ब्लाग का प्रारूप इन सब पर प्रतिक्रियाओं का अवसर देता है। ब्लाग में संवाद का जो स्वरूप पल्लवित होता है वह बहुधा मूल से कहीं अधिक रोचक और पठनीय होता है।


एक सिंहावलोकन करता हूँ तो लगता है कि यदि पाठक अपना योगदान टिप्पणियों में न देते तो संभवतः ब्लाग का स्तर अतिसामान्य ही रह गया होता।


जब २००९ में ब्लाग से जुड़ा, उस समय पढ़ना और विषय से सम्बद्ध टिप्पणी करना अच्छा लगता था। यह क्रम कुछ माह चला होगा। यद्यपि हिन्दी में गतिमय टाइप कर पाना अपने आप में संघर्ष था पर ब्लाग जगत का एक सामूहिक महाप्रयत्न रहा कि सबने उस बाधा को पार किया। जिनको तनिक भी तकनीक की सहजता थी उन्होंने सबकी सहायता की। दो तीन वर्ष का वह काल टाइप करने की विधियों का संक्रमणकाल कहा जायेगा। अभी तो फिर भी एक स्थायित्व आ गया है। उसके तकनीकी और व्यवहारिक पक्ष पर विस्तृत चर्चा फिर कभी। 


उस समय ब्लाग बहुत अधिक नहीं थे और समय मिल जाता था कि सबको पढ़ सकें। सबको पढ़ना अपने आप में एक संतोष देता था और लगभग सभी पढ़े ब्लागों पर टिप्पणी हो ही जाती थी। लगभग सौ ब्लागों को पढ़ने के क्रम में एक दिन में तीस टिप्पणियाँ तक हो ही जाती थीं। लगभग सब यही करते थे, सब सबका उत्साह बढ़ाते थे। एक अद्भुत सी ऊर्जा व्यापी थी उस समय ब्लागजगत में। किसी ब्लाग पर की हुयी टिप्पणी को भी सहेज कर रखने के क्रम में असम्बद्ध रूप में विचारों के न जाने कितनी लड़ियाँ रखे बैठे हैं हम। कभी समय मिला तो उनको भी ब्लाग का आकार दिया जायेगा।


एक बार लय आने पर पाठक टिप्पणियों से अपने मन की कहने लगे और ब्लाग व्यापकता पाने लगे। अभी तो उतनी लम्बी टिप्पणी नहीं लिख पाता हूँ पर प्रारम्भिक काल में  टिप्पणी बहुधा पर्याप्त लम्बी हो जाती थीं, बड़ी विस्तृत हो जाती थीं। यह देख कर ज्ञानदत्तजी ने कहा कि इस तरह की तीन चार टिप्पणियाँ जोड़कर, संदर्भ, उपसंहार बताकर या एक प्रश्न उठाकर ब्लागपोस्ट बनायी जा सकती है। केवल उत्साहित ही नहीं, उन्होंने आमंत्रित भी किया अपने ब्लाग मानसिक हलचल पर सप्ताह में एक अतिथि पोस्ट लिखने के लिये।


सितम्बर २००९ को पहली पोस्ट लिखी ‘गाय’। पहली पोस्ट का आनन्द व्यक्त नहीं किया जा सकता था। पोस्ट का विषय गायों की मार्मिक स्थिति पर था कि किस प्रकार हम गायों का दूध महत्वपूर्ण तो मानते हैं पर गायों को नहीं। पता नहीं पर इस विषय की गम्भीरता में सृजन के आनन्द की रेख चमक जाती थी। एक विचित्र सी स्थिति थी मन की। यह एक शोध का विषय हो सकता है कि एक पीड़ाजनित विषय पर किये सृजन की संतुष्टि और प्रशंसा का आनन्द क्या विषयगत पीड़ा से अधिक हो सकता है? या तीनों ही साथ साथ रह सकते हैं? जब कविता या लेख पढ़ें तो मन दुखी हो, उसके बाद यह ध्यान आते ही कि यह आपके द्वारा रचित है तब एक संतुष्टि का भाव और जब उसी पर किसी पाठक की टिप्पणी के रूप में प्रशंसा मिले तो आत्मिक आनन्द। औरों की तो कह नहीं सकता पर मेरे लिये नीरवता के परिवेश में तीनों भाव एक साथ रह सकते हैं।


ज्ञानदत्तजी का ब्लाग अत्यन्त पठित और चर्चित था अतः मेरी पोस्ट भी उसी उत्साह से पढ़ी गयी। आशीर्वादात्मक टिप्पणियाँ आयीं जिन्होनें ब्लागजगत में मेरा स्वागत किया पर मुख्यतः टिप्पणियाँ गायों की उस दयनीय दशा पर आयीं जिसे विषय में वर्णित किया गया था। कुछ ने अपने अनुभव  लिखे, कुछ ने समाधान बताये, कुछ ने धर्म को अधिक उत्तरदायी ठहराया, कुछ ने समाज को कोसा। संवाद के जिस स्तर पर सामान्य से विषय को पहुँचना था, ब्लाग और टिप्पणियों के माध्यम से वह वहाँ पहुँच सका। यदि टिप्पणियों में ढूढ़ेगें तो आपको ब्लागजगत के सारे आधारभूत और चर्चित नाम मिल जायेंगें। न केवल वे स्वयं ही बहुत अच्छा लिखते थे अपितु औरों के लिखे को भी संवाद की स्थिति तक पहुँचाते थे।


ब्लाग की प्रारम्भिक स्थिति प्रतिस्पर्धात्मक नहीं थी। जब पाठक बहुत हों, विषय पर्याप्त हों, टिप्पणियों के माध्यम से संवाद सतत हो, तो प्रतिस्पर्धा कैसी? ब्लागजगत एक खुला विस्तृत नभ था जिसके नीचे सबको आश्रय मिला था। सबकी अपनी विशेषसिद्धता थी, सभी महारथी थे। एक नयी विधा के क्षेत्र में वही आया था जिसकी पठन पाठन में रुचि थी, अभिव्यक्ति के लिये जिसके शब्द उत्कण्ठित थे पर पारम्परिक विधाओं को वे इसके लिये अपर्याप्त मानते थे। 


यद्यपि टिप्पणियों का अपना महत्व था। उत्साह, विषय विस्तार और संवाद, तीनों ही इसके माध्यम से बल पाते थे। कुछ समय पश्चात टिप्पणियों की संख्या एक अनकही प्रतिस्पर्धा के प्रतीक रूप में स्थान पाने लगी। ब्लाग बढ़ने लगे और सब पढ़ पाना संभव नहीं हुआ तो टिप्पणियों का पारस्परिक आदान प्रदान प्रारम्भ हुआ। अधिक ब्लाग पढ़ने के प्रयास में और की गयी टिप्पणियों की अधिक संख्या होने से उनकी गुणवत्ता प्रभावित होने लगी। कालान्तर में कई स्थानों पर टिप्पणी उपस्थिति दर्शाने का माध्यम सा बन गयी। अपने इस अर्थोपकर्ष में भले ही टिप्पणी अपना व्यापक पूर्वप्रभाव न लिये हो पर संवाद का माध्यम अवश्य है। आशा है कि सोशल मीडिया के कई नवमाध्यमों के बीच भविष्य में ब्लाग अपना स्थान पुनः पायेगा और वह भी टिप्पणीतन्त्र के प्रभावी होने से।

15.6.21

हनुमानबाहुक - संवाद


शब्द का प्रभाव भिन्न होता है, निर्भर करता है कि वक्ता कौन है, निर्भर करता है कि वक्ता की मनःस्थिति क्या है? गुड़ खाने वाले साधु की कहानी तो सुनी ही होगी। एक माँ अपने पुत्र को लेकर एक साधु के पास जाती है, अधिक गुड़ खाने कारण। साधु सुनते हैं और एक माह बाद आने को कहते हैं। एक माह बाद साधु उस बालक को गुड़ छोड़ देने के लिये समझाते हैं। कालान्तर में गुड़ तो छूट जाता है पर माँ के मन में प्रश्न रह जाता है कि यदि समझाना ही था तो साधु ने पहली बार में ही क्यों नहीं समझा दिया? अगली भेंट में संशय शमित होता है, उत्तर सरल था और कठिन भी। साधु ने कहा कि बेटा उस समय मुझे भी गुड़ से अत्यधिक अनुराग था और जब एक माह के प्रयत्न के बाद मन से भी गुड़ छोड़ सका तब ही इस योग्य हो पाया कि किसी और को समझा सकूँ।


योगसूत्र के साधनपाद(२.३६) में पतंजलि उद्घोष करते हैं कि जिसने सत्य पर संयम किया है, जिसने सत्य का अभ्यास और अनुशीलन किया है, जिसमें सत्य की प्रतिष्ठा हो जाती है, उसके शब्द सत्य की सामर्थ्य रखते हैं, उसका कहा हुआ सच हो जाता है। मन्त्रों का भी यही प्रभाव रहता होगा। काव्यविनोद और गूढ़साधना में लिखे गये शब्दों के प्रभाव में अन्तर तो रहता ही होगा। क्या कारण है कि मेरी बिटिया को पिता की बातें सामान्य लगती हैं और वही बातें जब रतन टाटा के अनुभवों के रूप में कहीं उद्धृत होती हैं तो बिटिया को अभिभूत कर जाती हैं। बिटिया को अपने पिता के प्रति कितना भी स्नेह हो पर रतन टाटा की उपलब्धियों के सामने तो वह कुछ भी नहीं।


जब तुलसीदास कुछ लिखते हैं तो उसका प्रभाव व्यापक होता है। शब्द चक्षुओं से भीतर प्रविष्ट होते हैं और सारे तन्त्र को झंकृत कर जाते हैं। यह अद्भुत अभिव्यंजना उनकी सतत साधना के कारण ही आयी होगी। प्रभाव बौद्धिक स्तर पर नहीं, सब कुछ भेदते हुये आत्मा पर होता है। कुछ तो विशेष कारण होगा कि तुलसीदास के शब्द भारतीय जनमानस के हृदय में गहरे बैठे हैं और परिस्थितियाँ आने पर स्वतः व्यक्त होने लगते हैं। कुछ तो कारण रहा होगा कि तुलसीदास जब किसी घटना का वर्णन करते हैं तो लगता है कि सब कुछ सामने ही घट रहा है। लगता है कि तुलसीदास के माध्यम से देव संवाद करना चाहते हैं, लगता है कि हनुमान संवाद करना चाहते हैं।


हनुमानबाहुक के रचनाकाल में और पीड़ा के उन कालखण्डों में तुलसीदास और हनुमान के बीच का संवाद और मुखर हो गया है। संवाद व्यक्तिगत है, सीधा सीधा। तुलसीदास की अन्य रचनाओं में कई स्थानों पर हनुमान उन्हें प्रेरित करते हुये दिखते हैं, दोनों ही एक दिशा में। हनुमानबाहुक में तुलसीदास हनुमान से सीधा संवाद करते हैं, प्रश्न करते हैं, उलाहना देते हैं। कुछ स्थानों पर श्रीरघुबीर को भी पुकारते हैं। कहीं कहते हैं कि आपके अतिरिक्त तो किसी को भजा भी नहीं, आपको ही सब कुछ माना, फिर भी आप ध्यान नहीं दे रहे हो? कई स्थानों पर आत्मग्लानि में चले जाते हैं, कहते हैं कि आपके उपकार को मैंने भुला दिया इसीलिये यह प्रतिफल पा रहा हूँ। कहीं अपनी भक्ति पर विश्वास आता है तो हनुमान से कृपा करने में विलम्ब का कारण पूछने लगते हैं। कहीं निराश हो बैठ जाते हैं कि यहीं भुगतना था तो मान लेंगे कि कुछ कुकर्म किये होंगे। कहीं विनोदवश उलाहना देते हैं कि आप अब बूढ़े हो चले हो या थक गये हो। 


तुलसीदास को अभिव्यक्ति में इतना मुखर कहीं नहीं देखा है। पीड़ाजनित व्यक्तिगत संवाद में यदि कहीं इसके समानान्तर उदाहरण मिलता है तो वह पीड़ा में डूबे बच्चे का अपनी माँ किया गया संवाद होता है। चोट खाकर भी उसे लगता है कि माँ के होते हुये उसे पीड़ा क्यों हो रही है? माँ पर क्रोध करता है, माँ को पीड़ा आने का कारण मानने लगता है, कोई पुरानी घटना बताता है कि आपने ऐसा कहा था, तभी चोट लगी है। जब हम आपके पुत्र हैं तो हमारी पीड़ा के सारे कारण, निवारण, उच्चारण, सब आप ही है। अपार समर्पण, अपार आश्रय, अपार विश्वास का प्रकटीकरण होता है यह प्रकरण। 


इन संदर्भों में हनुमानबाहुक न स्तुति है, न अर्चना है, न प्रार्थना है और न ही आरती। जब भी मैं पाठ करता हूँ, मेरे हृदय के अनुभवहीन स्पंद मुझे यही बताते हैं कि यह एक पुत्र का अपनी माँ से पीड़ा के घोर क्षणों में किया हुआ संवाद है। पुत्र तुलसीदास का माँ समान पालने वाले हनुमान से किया गया संवाद। “पाल्यो हो बाल जो आखर दू, पितु मातु सों मंगल मोद समूलो”, आनन्द-मंगल के मूल दो अक्षरों (राम) से आपने माता-पिता के समान मेरा पालन किया है। अपनी माँ के जन्म देते ही चले जाने और पिता द्वारा उसको अमंगलकारक मानकर त्यागने के बाद राम और राम की भक्ति ने तुलसीदास को पाला। हनुमान तब से उनके साथ माता-पिता के समान बने रहे।


हनुमानबाहुक के माध्यम से तुलसीदास ने भक्ति की परम्परागत श्रेणियों से परे एक नयी श्रेणी स्थापित की है। तुलसीदास अपनी सामाजिक चेतना के कहीं ऊपर चले गये हैं। वह क्षमता कहाँ है मुझमें जो वातजातं द्वारा संरक्षित तुलसीदास को बौद्धिक रूप से समझने का प्रयास भी कर सकूँ। वायु को कौन समेट पाया है? कभी लगता है कि यदि तुलसीदास को ऐसी पीड़ा न होती तो हनुमानबाहुक जैसी कृति नहीं आ पाती। कभी लगता है कि तुलसीदास अपनी व्यक्तिगत नहीं वरन हम सबकी पीड़ा झेल रहे थे। उनका संवाद उनका अपना व्यक्तिगत नहीं वरन हम सबका साझा और सम्मिलित संवाद था।


पीड़ा का उच्चारण गहरा होता है, आर्तनाद आत्मा से होता है। हम जैसे सामान्यजनों को पीड़ा झकझोर जाती है पर वही पीड़ा तुलसीदास से हनुमानबाहुक जैसी दुर्लभ और सबका कल्याण करने वाली कृति लिखवा जाती है। अपने आराध्य के प्रति जो स्नेहिल भाव तुलसीदीस ने सामाजिक मर्यादावश कहीं और व्यक्त नहीं किये गये, वे उस पीड़ा से द्रवित होकर शब्द पा जाते हैं। वे शब्द जो पीड़ा को सम्हाल लेते हैं, वे शब्द जो हाहाकार को रोक लेते हैं, वे शब्द जो सब सह सकने की शक्ति देते हैं।


प्रश्न अधिक हो जाते हैं तो हनुमानबाहुक के शब्दों में उत्तर ढूढ़ने लगता हूँ। हनुमानबाहुक को तनिक और जानेंगे अगले ब्लाग में। 

8.5.16

सौन्दर्य तेरा

जब खड़ा सौन्दर्य तेरा, मुस्करा करता इशारे,
कल्पनायें रूप की टिकती नहीं हैं, हार जातीं ।
रूप से तेरे सुनयना, विकल होकर प्राण सारे,
हैं तड़पते, काश अब तो प्यार की बरसात आती ।।१।।

दृष्टि से छूकर मुझे, जब नयन दो तेरे निकलते,
छूटते दो बाण मानो प्रेम के गाण्डीव से ।
बिद्ध होकर प्राण मेरे, हर समय रहते तड़पते,
हो सके उपचार अब तो तेरे ही स्पर्श से ।।२।।

रूप का यूँ खिलखिलाना प्रेम की भोली दशा पे,
उठ रही शाश्वत तरंगें अब हृदय में प्रेम की ।
बज उठा संगीत मन में, प्रेम की नव आस से,
गूँजती हैं धुनें अब तो, अनवरत ही प्यार की ।।३।।


24.12.14

याद आती हो

मेरे दिन-रात चाहें, बस तुम्हारी याद में रहना,
सुबह बन गुनगुनाती, रात बनकर गीत गाती हो ।।१।।

नहीं अब है सताती, जीवनी ही स्वप्न में डूबी,
कली सी कुनमुनाती, फूल जैसी मुस्कुराती हो ।।२।।

तुम्हारा पास रहना भी, तुम्हारी याद के जैसा,
कभी तो छेड़ जाती और कभी मन गुदगुदाती हो ।।३।।

जिसे मैं ढूढ़ने निकला, जलाये दीप आशा के,
हृदय के रास्ते में धूप सी तुम फैल जाती हो ।।४।।

अधूरा चाँद अम्बर में, कभी तो पूर्णता पाये,
उसी अनुभूति का विश्वास, अधरों से पिलाती हो ।।५।।

20.12.14

आँख-मिचौनी

फिर आँखों को यूँ फिरा लिया, क्यों आँख-मिचौनी करती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।

भाव पुरातन, शब्द नये हैं, कैसे मन की बात उजागर,
कठिन बहुत भावों की भाषा, शब्द अशक्त रहे जीवन भर ।
आँखों की भाषा मौन बहे, कितने आमन्त्रण कहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।१।।

लज्जा बनकर दीवार खड़ी, तुम सहज और उद्वेलित हम,
कुछ बोलो यदि, जग जानेगा, कैसे वाणी का आलम्बन ।
झपकी, सकुचाती आँखों से, पर प्रणय-प्रश्न बन बहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।२।।

हो सकता आँखें पूछें मैं, कब तक रह सकती एकाकी,
कब तक एकाकी ढोऊँगी, घनघोर व्यथायें जीवन की ।
आँखों से जी भर बात करो, एकान्त कहाँ तुम रहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।३।।

मन प्रेम बसा या मंथन हो, या फिर भटकाता चिंतन हो,
अब आँख मिचौनी छोड़ो भी, क्यों खींच रही हो जीवन को ।
जो छिपा हृदय में बतला दो, क्यों मन उत्कण्ठा सहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।४।।

निःशब्द भाव की कविता हो तू सूर्य रश्मि हो, सविता हो 
जीवन में ऊष्मा भरती हो, कलकल छलछल सी सरिता हो 
मेरे जीवन के शोणित पर शीतल समीर सी बहती हो 
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।५।।

* सिद्धार्थ जी द्वारा समर्पित

29.11.14

आँखों के अभिवादन

लाख चाहकर, बात हृदय की, कहने से हम रह जाते है 
तेरी आँखों के अभिवादन, बात हजारों कह जाते हैं ।।

बहुत चित्रकारों ने सोचा, सुन्दर तेरे चित्र बनाये ,
तेरी आँखों की चंचलता, रंगों से लाकर छिटकायें ।
किन्तु कहाँ, कब रंग मिले थे,
कहीं सभी भंडार छिपे थे,
आवश्यक वे रंग तुम्हारी आँखों में पाये जाते हैं ।
तेरी आँखों के अभिवादन, बात हजारों कह जाते हैं ।।

बहा चलूँ निश्चिन्त, अशंकित, नयनों की सौन्दर्य-धार में,
आकर्षण के द्यूत क्षेत्र में, निज जीवन को सहज हार मैं ।
आशायें टिकती हैं आकर,
आँखें तेरी खुली रहें पर,
सारे जो आधार, तुम्हारे बन्द नयन में छिप जाते हैं ।
तेरी आँखों के अभिवादन, बात हजारों कह जाते हैं ।।

24.9.14

कह जाने दो

मन में दुख का भार उठाये,
अपने बिम्बों में सकुचाये,
भीगी पलकों में आँखों की,
मन के गहरे भाव छिपाये,
कब तक अँसुअन को रोकोगे,
कब तक झूठे बहलाओगे,
कब तक धैर्य भरी मुस्कानें,
अपने अधरों पर लाओगे ?

अँसुअन को अब बह जाने दो,
कहते हैं जो, कह जाने दो ।

21.6.14

मन किससे बातें करता है

ना जानू मैं अन्तरतम में,
अवचेतन की सुप्त तहों में,
अनचीन्हा, अनजाना अब तक,
कौन छिपा सा रहता है ?
मन किससे बातें करता है ?

भले-बुरे का ज्ञान कराये,
असमंजस में राह दिखाये,
इस जीवन के निर्णय लेकर,
जो भविष्य-पथ रचता है ।
मन किससे बातें करता है ?

पीड़ा का आवेग, व्यग्रता,
भावों का उद्वेग उमड़ता,
भीषण आँधी, पर भूधर सा,
अचल, अवस्थित रहता है ।
मन किससे बातें करता है ?

निद्रा के एकान्त महल में,
चुपके से, हौले से आकर,
भावों की मनमानी क्रीड़ा,
स्वप्न-पटों से तकता है ।
मन किससे बातें करता है ?

2.3.13

टा डा डा डिग्डिगा

जब टीवी पर किसी कार्यक्रम की भड़भड़ से मन भागता है, प्रचारों की विचाररहित, भावनात्मक और बहुधा ललचाने वाली अभिव्यक्तियों से मन खीझता है तो इच्छा होती है कि तुरन्त ही चैनल बदल कर उस कार्यक्रम को दण्ड दिया जाये। जब अगला कार्यक्रम भी बिना किसी कार्य और क्रम के हो तो बस यही लगता है कि कहीं तो एक ढंग का चैनल तो हो जिस पर बैठ कर एक आधा घंटा बिताया जा सकता सके। जब पीड़ा ऐसे घनीभूत होती है तो ईश्वर भी सुन लेता है। डीडी भारती के रूप में एक चैनल है जिसमें संगीत और संस्कृति को प्राथमिकता दी जाती है और बिना अधिक लाग लपेट के कार्यक्रमों का निर्माण और प्रस्तुतीकरण होता है। अधिकांश कार्यक्रम बहुत पहले से रिकॉर्डेड होते हैं पर देखने में पर्याप्त संतुष्टि मिलती है। प्रचारों के कोलाहल की अनुपस्थिति इस चैनल को और भी आकर्षक बना देती है।

ऐसे ही एक दिन डीडी भारती में उस्ताद आमिर खान की गायकी के बारे में एक कार्यक्रम आ रहा था। इन्दौर घराने से प्रारम्भ उनकी गायकी में ध्रुपद, खयाल, तराना, विलम्बित ताल, मेरुखंड, तान, राग आदि विषयों के बारे में बताया जा रहा था। कई बिन्दु समझ में न आने पर भी एक आनन्द आ रहा था, एक क्षण के लिये भी सामने से हट नहीं पाया। ऐसा लग रहा था कि कोई मेरुदण्ड सीधा कर बैठा योगी ध्यानस्थ हो, अध्यात्म में डुबकी लगा अपने ईश से संवाद स्थापित कर रहा हो। संगीत का ऐसा उद्दात्त और गहन स्वरूप देख कर रोमांचित होने के अतिरिक्त मन को कुछ सूझता ही नहीं था। अभी जब यह आलेख लिख रहा हूँ, पार्श्व में राग बसन्त बहार चल रही है, लगता है कोई आपके हृदय के गहन तलों से सीधा संबंध सजा रहा हो।

अध्यात्म आधारित संगीत वही प्रभाव उत्पन्न कर रहा था जहाँ से उसके मूल जुड़े हुये थे। स्वर शब्दों से बँधे नहीं थे या कहें कि शब्द थे ही नहीं, मात्र ध्वनियाँ, अक्षरों के आस पास, लहराती हुयी। ईश्वर से संवाद की भाषा में कोई शब्द मिला ही नहीं। शब्द रहते तो कोई आकार उभरता, वह आकार हमें भौतिक जगत की किसी वस्तु से जोड़ देता, हमें तब अध्यात्म के स्वर समझने के लिये निम्नतर आधार लेना होता, संवाद अपना मान खो बैठता। शब्दों से कोई बैर नहीं है संगीत का, पर शब्दों की सीमायें हैं। सीमायें शब्द भी नहीं वरन उसके अर्थ हैं जो हम सबके मन में भिन्न प्रभाव उपजाते हैं। अर्थ हमें सीमित कर देते हैं। संगीत यदि ईश्वर से जुड़ने का मार्ग है तो शब्दों की बाध्यता वह मार्ग बाधित नहीं कर सकती।

संगीत और अध्यात्म का विषय तो बहुत पहुँचे लोगों का विषय हो जाता है, पर ध्वनियाँ से हमारा संबंध जन्म से ही है। प्रथम स्वर शब्द नहीं होते हैं, वह तो मूल ध्वनियाँ होती हैं जो दो जगत को जोड़ती हैं। धीरे धीरे हम शब्द सीखते जाते हैं, जगत से जुड़ते जाते हैं, सीमित होते जाते हैं और स्वयं से बहुत दूर भी। शब्द विज्ञानी कहते हैं कि शब्दों का उद्भव भी ध्वनियों से ही हुआ है। धातु का जुड़ाव ध्वनियों से ही है। मूल धातु से और शब्द निकले और भाषा बनकर पसर गये, पर जड़ों में वहीं ध्वनियाँ हैं जो वह भाव आने पर पहली बार प्रकट हुयी होंगी। यदि भाषा और शब्दों का मूल हमारे अन्दर है तो मन के अनजाने भावों को व्यक्त करने में स्थापित शब्दों का सहारा क्यों? अपने जीवन में ऐसी ही दसियों ध्वनियाँ याद आ जायेंगी जिनका कोई शाब्दिक अर्थ नहीं पर वे भावों के अध्याय व्यक्त करने में सक्षम होती हैं।

ऐसा ही एक ध्वनि स्वरूप याद आता है, बचपन का। हम सब लोग मिलकर खेलते थे, जीतने के बाद गाते थे, टा डा डा डिग्डिगा। बचपन की यादें जुड़ी हैं इससे। कोई पूछे कि इसका शाब्दिक अर्थ क्या होता है तो बताना कठिन होगा पर इसका क्रियात्मक अर्थ है, हर्ष, उल्लास और मदमस्त होकर किया गया विजय नृत्य। ये शब्द विजय नृत्य के समय तब तक गाये जाते हैं, जब तक आप थक न जायें और हारने वाले आपसे पक न जायें।

पता नहीं कब और कैसे यह प्रारम्भ हुआ था पर मोहल्ले के लड़के इसी तरह से विजयोत्सव मनाते थे। गिल्ली डंडा हो, कंचा हो, गोल दौड़ हो, लूडो हो, शतरंज हो, ताश हो, हर प्रकार के छोटे बड़े खेलों में जीता हुआ दल इन शब्दों का उद्घोष करता था। आदत ऐसी उतर गयी है मन में कि अभी भी जब बच्चों को किसी खेल में हराते हैं, हम उसी तरह से गाने और नाचने लगते हैं। बच्चों को अटपटा लगता है क्योंकि इस तरह का कभी देखा नहीं, बच्चों को रोचक भी लगता है क्योंकि इसमें भाव पूरी तरह से उतर भी आते हैं। शब्दों का कोई अर्थ नहीं पर प्रभाव पूर्ण।

कहते हैं कि खेल में हार जीत तो होती रहती है, उसे खेल की तरह से लेना चाहिये, उसे सुख दुख से नहीं जोड़ना चाहिये। हम भी सहमत हैं, हार के समय सुखी नहीं होते हैं और जीत के समय दुखी नहीं होते हैं। पर ऐसी जीत का क्या लाभ जिसमें जीतने वाला उत्सव न मनाये और हारने वाला झेंपे नहीं। विजयनृत्य होता था हम लोगों का और दस पन्द्रह मिनट तक चलता था। पार्श में रहता था, टा डा डा डिग्डिगा। विजेता का हारने वाले से पूर्ण संवाद स्थापित हो जाता था, बिना एक भी सीखा हुआ शब्द उच्चारित करे हुये, बिना अर्थयुक्त शब्द उच्चारित किये हुये। आनन्द का इससे विशुद्ध, मूल और प्राकृतिक स्वरूप किसी और ध्वनि में नहीं मिला आज तक।

धीरे धीरे बड़े होते जा रहे हैं हम लोग और जीवन से टा डा डा डिग्डिगा लुप्त होता जा रहा है। हम शब्दों और उनके परिचित अर्थों में स्वयं को सीमित किये बैठे हैं। आज ऊब से बचने के प्रयास में संगीत और अध्यात्म के उस संवाद से परिचय और प्रगाढ़ हुआ जहाँ शब्दों का कोई कार्य नहीं। अम्मा शब्द से प्रारम्भ जीवन, टा डा डा डिग्डिगा में बीता लड़कपन और अब ख़याल के ध्वन्यात्मक संसार में डूब कर विश्वास हो चला है कि जीवन के न जाने कितने मौलिक स्वर अभी भी हृदय में बंद हैं, बाहर आने को आतुर हैं। आपका भी कोई टा डा डा डिग्डिगा है जीवन में?

17.3.12

आज जी भर देख लेते

हम हृदय का उमड़ता आवेग कुछ पल रोक लेते,
समय यदि कुछ ठहर जाता, आज जी भर देख लेते।

तुम न ऐसे मुस्कराती, सकपका पलकें झपाती,
ना फुलाकर गाल अपने, सलोनी सूरत बनाती।
थे गये रम,
क्या करें हम,
यूँ ही गुपचुप बह गये थे,
आज जी भर देख लेते।१।

छिपा हाथों बीच आँखें, ना मुझे यूँ देख जाती,
सर झुकाकर तुम न केशों के किनारे मुँह छिपाती।
तुम हृदय में,
इसी लय में,
और कितना सह गये थे,
आज जी भर देख लेते।२।

तुम न ऐसे खिलखिलाती, ना मेरे मन को लुभाती,
कुछ बताना चाहकर भी, तुम न यूँ मन को छिपाती।
नहीं हाँ की,
बात मन की,
बिन कहे ही कह गये थे,
आज जी भर देख लेते।३।

ना एकाकी इस हृदय में, याद अपनी छोड़ जाती,
बढ़ी जाती जीवनी यूँ, बीच पथ न मोड़ जाती।
जो था कहना,
और कितना,
बोलने से रह गये थे,
आज जी भर देख लेते।४।

(काश, कुछ यात्रायें थोड़ी और लम्बी होतीं। १४ घंटे की रेलयात्रा, बीच में ढेरों अशाब्दिक संवाद और निष्कर्ष ये उद्गार। बस अभिषेक की पीड़ासित रेलयात्राओं से सहमत न हुआ, तो यह बताना पड़ा। विवाह के पहले की कविता है। तब बस मन को लिखना आता था, कहना तो अभी तक नहीं सीख पाये।)

9.11.11

संदेश और कोलाहल

कभी किसी को भारी भीड़ में दूर खड़े अपने मित्र से कुछ कहते सुना है, अपना संदेश पहुँचाने के लिये बहुत ऊँचे स्वर में बोलना पड़ता है, बहुत अधिक ऊर्जा लगानी पड़ती है। वहीं रात के घुप्प अँधेरे में झींगुर तक के संवाद भी स्पष्ट सुनायी पड़ते हैं। रात में घर की शान्ति और भी गहरा जाती है जब सहसा बिजली चली जाती और सारे विद्युत उपकरण अपनी अपनी आवाज़ निकालना बन्द कर देते हैं। पार्श्व में न जाने कितना कोलाहल होता रहता है, हमें पता ही नहीं चलता है, न जाने कितने संदेश छिप जाते हैं इस कोलाहल में, हमें पता ही नहीं चलता है। जीवन के सभी क्षेत्रों में संदेश और कोलाहल को पृथक पृथक कर ग्रहण कर लेने की क्षमता हमारे विकास की गति निर्धारित करती है। 

किसी ब्लॉग में पोस्ट ही मूल संदेश है, शेष कोलाहल। यदि संवाद व संचार स्पष्ट रखना है तो, संदेश को पूरा महत्व देना होगा। जब आधे से अधिक वेबसाइट तरह तरह की अन्य सूचनाओं से भरी हो तो मूल संदेश छिप जाता है। शुद्ध पठन का आनन्द पाने के लिये एकाग्रता आवश्यक है और वेबसाइट पर उपस्थित अन्य सामग्री उस एकाग्रता में विघ्न डालती है। अच्छा तो यही है कि वेबसाइट का डिजाइन सरलतम हो, जो अपेक्षित हो, केवल वही रहे, शेष सब अन्त में रहे, पर बहुधा लोग अपने बारे में अधिक सूचना देने का लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं। आप यह मान कर चलिये कि आप की वेबसाइट पर आने वाला पाठक केवल आपका लिखा पढ़ने आता है, न कि आपके बारे में या आपकी पुरानी पोस्टों को। यदि आपका लिखा रुचिकर लगता है तो ही पाठक आपके बारे में अन्य सूचनायें भी जानना चाहेगा और तब वेबसाइट के अन्त में जाना उसे खलेगा नहीं। अधिक सामग्री व फ्लैश अवयवों से भरी वेबसाइटें न केवल खुलने में अधिक समय लेती हैं वरन अधिक बैटरी भी खाती हैं। अतः आपके ब्लॉग पर पाठक की एकाग्रता बनाये रखने की दृष्टि से यह अत्यन्त आवश्यक है कि वेबसाइट का लेआउट व रूपरेखा सरलतम रखी जाये।

यह सिद्धान्त मैं अपने ब्लॉग पर तो लगा सकता हूँ पर औरों पर नहीं। अच्छी लगने वाली पर कोलाहल से भरी ऐसी वेबसाइटों पर एक नयी विधि का प्रयोग करता हूँ, रीडर का प्रयोग। सफारी ब्राउज़र में उपलब्ध इस सुविधा में पठनीय सामग्री स्वतः ही एक पुस्तक के पृष्ठ के रूप में आ जाती है, बिना किसी अन्य सामग्री के। इस तरह पढ़ने में न केवल समय बचता है वरन एकाग्रता भी बनी रहती है। सफारी के मोबाइल संस्करण में भी यह सुविधा उपस्थित होने से वही अनुभव आईफोन में भी बना रहता है। गूगल क्रोम में इस तरह के दो प्रोग्राम हैं पर वाह्य एक्सटेंशन होने के कारण उनमें समय अधिक लगता है।

किसी वेबसाइट पर सूचना का प्रस्तुतीकरण किस प्रकार किया जाये जिससे कि अधिकाधिक लोगों को उसका लाभ सरलता से मिल पाये, यह एक सतत शोध का विषय है। विज्ञापनों के बारे में प्रयुक्त सिद्धान्त इसमें और भी गहनता से लागू होते हैं, कारण सूचना पाने की प्रक्रिया का बहुत कुछ पाठक पर निर्भर होना है। यदि प्रस्तुतीकरण स्तरीय होगा तो पाठक उस वेबसाइट पर और रुकेगा। अधिक सूचना होने पर उसे व्यवस्थित करना भी एक बड़ा कार्य हो जाता है। कितनी सूचियाँ हों, कितने पृष्ठ हों, वे किस क्रम में व्यवस्थित हों और उनका आपस में क्या सम्बन्ध हो, ये सब इस बात को ध्यान में रखकर निश्चित होते हैं कि पाठक का श्रम न्यूनतम हो और उसकी सहायता अधिकतम। उत्पाद या कम्पनी की वेबसाइट तो थोड़ी जटिल तो हो भी सकती है पर ब्लॉग भी उतना जटिल बनाया जाये, इस पर सहमत होना कठिन है।

अन्य सूचनाओं के कोलाहल में संदेश की तीव्रता नष्ट हो जाने की संभावना बनी रहती है। यदि हम उल्टा चलें कि ब्लॉग व पोस्ट के शीर्षक के अतिरिक्त और क्या हो पोस्ट में, संभवतः परिचय, सदस्यता की विधि, पाठकगण और पुरानी पोस्टें। ब्लॉग में इनके अतिरिक्त कुछ भी होना कोलाहल की श्रेणी में आता है, प्रमुख संदेश को निष्प्रभावी बनाता हुआ। बड़े बड़े चित्र देखने में सबको अच्छे लग सकते हैं, प्राकृतिक दृश्य, अपना जीवन कथ्य, स्वयं की दर्जनों फ़ोटो, पुस्तकों की सूची और समाचार पत्रों में छपी कतरनें, ये सब निसंदेह व्यक्तित्व और अभिरुचियों के बारे एक निश्चयात्मक संदेश भेजते हैं, पर उनकी उपस्थिति प्रमुख संदेश को धुँधला कर देती है।

गूगल रीडर की फीड व सफारी की रीडर सुविधा इसी कोलाहल को प्रमुख संदेश से हटाकर, प्रस्तुत करने का कार्य करते हैं। यह भी एक अकाट्य तथ्य है कि गूगल महाराज की आय मूलतः विज्ञापनों के माध्यम से होती है और ब्लॉग के माध्यम से आय करने वालों के लिये विज्ञापनों का आधार लेना आवश्यक हो जाता है, पर विज्ञापन-जन्य कोलाहल प्रमुख संदेश को निस्तेज कर देते हैं।

मेरा विज्ञापनों से कोई बैर नहीं है, पर बिना विज्ञापनों की होर्डिंग का नगर, बिना विज्ञापनों का समाचार पत्र, बिना विज्ञापनों का टीवी कार्यक्रम और बिना विज्ञापनों का ब्लॉग न केवल अभिव्यक्ति के प्रभावी माध्यम होंगे अपितु नैसर्गिक और प्राकृतिक संप्रेषणीयता से परिपूर्ण भी होंगे।

आईये, अभिव्यक्ति का भी सरलीकरण कर लें, संदेश रहे, कोलाहल नहीं।

19.8.11

चेहरों का संवाद

बंगलोर में जहाँ मेरा निवास है, उससे बस 50 मीटर की दूरी पर ही है फ्रीडम पार्क। एक पुराना कारागार था, बदल कर स्वतन्त्रता सेनानियों की स्मृति में पार्क बना दिया गया। पार्क को बनाते समय एक बड़ा भाग छोड़ दिया गया जहाँ पर लोग धरना प्रदर्शन कर सकें। यहीं से नित्य आना जाना होता है क्योंकि यह स्थान कार्यालय जाने की राह में पड़ता है। सुबह टहलने और आगन्तुकों को घुमाने में भी यह स्थान प्रयोग में आता है।

लगभग हर तीसरे दिन यहाँ पर लोगों का जमावड़ा दिखता है। कभी पढ़े लिखे, कभी किसान, कभी आँगनवाड़ी वाले, कभी शिक्षक, कभी वकील, और न जाने कितने लोग, समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुये। सुबह से एकत्र होते है, सायं तक वापस चले जाते हैं। पुलिस और ट्रैफिक की व्यवस्था सुदृढ़ रहती है, बस थोड़ी भीड़ अधिक होने पर वाहन की गति कम हो जाती है।

इतना समय या उत्साह कभी नहीं रह पाता है कि उनकी समस्याओं को सुना और समझा जा सके। उन विषयों को समस्यायें खड़े करने वाले और उन्हें सहने वाले समझें, मैं तो धीरे से पढ़ लेता हूँ कि बैनर आदि में क्या लिखा है, यदि नहीं समझ में आता है तो अपने चालक महोदय से पूछ लेते हैं कि कौन लोग हैं और किन माँगों को मनवाने आये हैं। अब तो चालक महोदय हमारे पूछने से पहले ही विस्तार से बता देते हैं।

इस प्रकार समस्याकोश का सृजन होने के साथ साथ, प्रदर्शनकारियों के चेहरों से क्या भाव टपक रहे होते हैं, उनका अवलोकन कर लेता हूँ। कवियों और उनकी रचनाओं में रुचि है अतः वह स्थान पार होते होते मात्र एक या दो पंक्तियाँ ही मन में आ पाती हैं।

कभी व्यवस्था से निराश भाव दिखते है,

जग को बनाने वाले, क्या तेरे मन में समायी,
तूने काहे को दुनिया बनायी?

कभी व्यवस्था का उपहास उड़ाते से भाव दिखते है,

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था,
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम--गुलिस्तां क्या होगा?

कभी व्यवस्था के प्रति आक्रोश के भाव दिखते हैं,

गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही 
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ।

पिछले तीन दिनों से यहाँ से निकल रहा हूँ, लोग बहुत हैं, युवा बहुत हैं, उनके भी चेहरे के भाव पढ़ने का प्रयास करता हूँ। किन्तु पुराने तीन भावों से मिलती जुलती नहीं दिखती हैं वे आँखें। मन सोच में पड़ा हुआ था। आज ध्यान से देखा तो और स्पष्ट हुआ, सहसा राम प्रसाद बिस्मिल का लिखा याद आ गया। हाँ, उनकी आँखें बोल रही थीं,

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।