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12.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १६

हमारे पूर्वजों को मनुष्य का अस्तित्व, उसका समाज में स्थान, जीवन का उद्देश्य आदि सभी विषयों का वैज्ञानिक ज्ञान था। बहुतों को लगता होगा कि वेद, उपनिषद आदि उपदेश मात्र हैं और इनका वैज्ञानिक आधार नहीं है। एक व्याख्यान सुन रहा था जिसमें बताया गया है कि उपनिषदों में लगभग ३५० प्रश्न हैं। इन सबका प्रमुख उद्देश्य स्वयं को जानने का है। प्रश्नपंक्ति की दिशा स्पष्ट है, सृष्टि का प्रारम्भ ही जिज्ञासा से हुआ, ब्रह्मा को ज्ञात ही नहीं था कि वह कौन हैं, कहाँ पर हैं और किसलिये हैं आये हैं? वेद का अर्थ ही जानना है, विद् धातु से आया है यह शब्द। जिज्ञासा का शमन है वेद का प्राकट्यीकरण। एक बार स्वयं को हर प्रकार से जान लिया तब यह निष्कर्ष निकालना अत्यन्त सरल हो जाता है कि हमसे क्या अपेक्षित है और वह क्यों अपेक्षित है? योग एक निष्कर्ष ग्रन्थ है, एक प्रक्रिया का निष्कर्ष जो आपको आप तक ले जायेगी, आपको स्वरूप तक ले जायेगी। उस यात्रा के लिये जिस अष्टांग योग का निरूपण किया गया है, उसका एक एक अंग और उपांग अपने अन्दर एक सामर्थ्य समाये है, अकेले ही गंतव्य तक ले जाने की।

सन्तोष एक अद्भुत गुण है। एक  दृष्टान्त के द्वारा, एक शास्त्रोक्ति के द्वारा इसकी महत्ता को वर्णित किया गया है। “ जैसे काँटे से बचने के लिये समस्त भूतल को चमड़े से नहीं ढका जा सकता किन्तु जूते पहने जा सकते हैं, ठीक वैसे ही ‘समस्त काम्य विषय पाकर सुखी होऊँ’ ऐसी इच्छा से सुख नहीं हो सकता, पर सन्तोष के द्वारा हो सकता है”। ययाति ने कहा है, कामना उपभोग से शमित नहीं होती है वरन हविषा डालने से अग्नि की तरह और बढ़ती है। तभी तो कहा गया है, सन्तोष एव पुरुषस्य परम निधानम्। जिसके पास सन्तोष है, उसके पास सब कुछ है। “चाह गयी चिन्ता गयी, मनवा बेपरवाह, जिनको कुछ नहीं चाहिये, वे शाहं के शाह”। जगत की आपाधापी से परे एक अद्भुत सी शान्ति है इस गुण को हर पल जीने वालों में, इस गुण को सिद्ध करने वालों में।

सन्तोष को व्यास अत्यन्त सरल शब्दों में व्याख्यायित करते हैं। सन्निहित साधन से अधिक की अनुपादित्सा। सन्निहित का अर्थ है, सब प्रकार से व्यवस्थित हित। जितने साधन आवश्यक हैं या उपस्थित हैं। अनुपादित्सा का अर्थ है, प्राप्त न करने की इच्छा। जितने साधन जीवन में उपस्थित हैं उससे अधिक प्राप्त न करने की इच्छा। जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है। कहना सरल है, करना कठिन। हमारे प्रयत्न होते हैं कुछ पाने के लिये। जितना प्रयास था, जितना अभीप्सित था, यदि उतना नहीं मिल पाता है तो कुछ अधूरा सा लगता है। अब दो विकल्प हैं, जितना मिल गया है, उसमें तुष्ट रहें, उपयोग करें या जो नहीं मिला उस पर दुखी होयें, असन्तुष्ट रहें। पहला विकल्प तो रखना ही है, पर दूसरे विकल्प को तनिक परिवर्धित करना होगा। बहुधा फल हमारे हाथ में नहीं होते है, कई कारक हैं सफलता के। ज्ञान की अल्पता, कर्म की न्यूनता, कर्ता की योग्यता, फल की अपरिपक्वता, प्रारब्ध की प्रतीक्षा या विधि का अन्य विधान। कई कारण हो सकते हैं, तो उसमें क्षोभ क्यों होना, दुखी क्यों होना। कर्म पुनः होंगे, प्रयास गुरुतर होंगे, फल तो मिलेगा ही, उत्साह और धैर्य, अदम्य उत्साह और अनन्त धैर्य।

तात्कालिकता के कारण हमें न पाने का दुख बहुत बड़ा लगने लगता है। कुछ वर्षों बाद बहुधा वही घटना एक मनोरंजक स्मृति बन जाती है। यदि इस अनुभव से कुछ ग्रहण करना हो तो कल्पनाशीलता को भविष्य में ले जाकर वर्तमान के बारे में सोचें, तात्कालिकता प्लावित दुख उतर जायेगा। सोचें कि आज से ५ वर्ष बाद इस घटना का क्या मोल? सोचें कि पारिवारिक और सामाजिक जुड़ाव में, वृहद परिप्रेक्ष्य में व्यक्तिगत न्यूनताओं का क्या मोल? सोचें कि इतने बड़े विश्व में एक घटना, सिन्धु में बिन्दु सी। संकुचित मन विस्तार पाते ही सहज होने लगता है। औदार्य और आर्जवता, ये दो परिप्रेक्ष्य सदा ही सहायक हैं। औदार्य घटना को बड़े परिप्रेक्ष्य में रखने के लिये। आर्जवता स्वयं को सरलता और सहजता में रखने के लिये। यदि अपने आप को सरल कर ले तो शंकर सम कैसा भी गरल भी पी जायेंगे।    

हम सबको बहुधा लगता है कि हमारी योग्यता के अनुसार हमें फल नहीं मिले, हमारी क्षमता के अनुसार हमें पद नहीं मिले, यदि हम रहते तो कहीं अच्छा करते, जितना हमने दिया उतना नहीं मिला। परिप्रेक्ष्य पुनः बदलें। जितना प्राप्त है, पर्याप्त है। औदार्य और आर्जवता। जो है, उसमें सुखी रहें, जो नहीं है, वह नहीं है, उसमें दुखी क्यों होना? यदि किसी को देखकर असन्तोष की भावना आती है तो अन्य को देखकर संतोष का भी भाव उठे। तुलना से बहुत हानि होती है, यदि हम ऊपर देखते हैं, यदि नीचे देखते हुये चलें तो मन करूणा से भर जाता है, आभार से भर जाता है।

असन्तोष की भावना ही आपको और करने को प्रेरित करती है। वह बस प्रेरित करे, दुखी न करे। उत्साह भरे, नैराश्य न बने। वहीं दूसरी ओर सन्तोष का भाव भी अकर्मण्यता को प्रेरित न करे। प्रयत्नशीलता तो बनी रहे, आलस्य और संतोष में प्रयत्नों का अंतर है। एक कर्म न करने दे तो दूसरी कर्मफल न मिलने पर भी न थकने दे।

अस्तेय, अपरिग्रह और संतोष में क्रमिक विकास की स्पष्ट झलक है पर सूक्ष्म भिन्नता भी है। अस्तेय अधिकार से अधिक न पाने की इच्छा है। अपरिग्रह आवश्यकता से अधिक न पाने की इच्छा है। संतोष फल से अधिक न पाने की इच्छा है। अधिकार, आवश्यकता और फल के अन्तर को क्रमशः विकसित करता है इनका आचरण, एक दूसरे को प्रेरित और पोषित करता हुआ। अधिकार से फल की यह समझ श्रीकृष्ण की प्रख्यात घोषणा में भी बसती है, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (कर्म में आपका अधिकार है, फल में नहीं।)

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11.5.13

ब्लॉग व्यवस्था, तृप्त अवस्था

गूगल रीडर में बढ़ते बढ़ते ब्लॉगों की संख्या ६५० के पार पहुँच गयी। तकनीक और न्यूनतम जीवन शैली विषयक लगभग ५० ब्लॉग निकाल दें, तब भी हिन्दी से जुड़े लगभग ६०० ब्लॉगों की बड़ी सूची का होना यदि कुछ इंगित करता है, तो वह अन्तर जिसे हर दिन पूरा करने के लिये कुछ न कुछ नया पढ़ते रहना आवश्यक हो जाता है। पढ़ने वाले ब्लॉगों की संख्या चाह कर भी कम नहीं कर पा रहा हूँ, यह भी इंगित करता है कि अच्छे बुरे ब्लॉगों में अन्तर की समझ भी विकसित होना शेष है, मेरे साहित्यिक पथ में। पिछले ४ वर्षों में जो भी रोचक लगता गया, सूची में स्थान पाता गया। कई और श्रेष्ठ ब्लॉगों को सूची में होना था, पर दुर्भाग्य ही कहा जायेगा मेरा कि उनसे परिचय न हो सका अब तक। संचित और अपेक्षित के बीच का अन्तर इस क्रम में तीसरा है, जो इतने ब्लॉग होने के बाद भी सूची को अपूर्ण ही रखे हुये है।

कई नवागंतुक बहुत अच्छा लिखते हैं। कई उदाहरण देखे हैं जिसमें प्रारम्भिक किरणों की झिलमिलाहट एक आशा के सूर्य का आभास देती है। उनको पढ़ना इसलिये अच्छा लगता है कि उनके लेखन की चमक में कभी अपना अँधेरा भी दिख जाता है। उनका लेखन पथ निश्चय ही हिन्दी साहित्य का राजमार्ग बनने की क्षमता रखता है और बनेगा भी, पर यदि थकान, निराशा और उपेक्षा उन्हें उनके पथ से डिगने न दे। उनके लेखन पर उत्साह के दो शब्द कहने वाला सदा कोई न कोई रहे अवश्य, विशेषकर तब, जब रात हो, एकान्त हो और विचारों का अँधेरा घुप्प हो। इसके अतिरिक्त बहुत से ऐसे लेखक और कवि हैं, जिन्हें परिचय के चौराहे मिले ही नहीं, जिन्हें कोई स्थापित ठिकाना दिखा नहीं। उन्होंने लिखा, पर समुचित मान न पाकर उनका उत्साह हिन्दी साहित्य में स्थिर न रह पाया और उन्होने अपनी ऊर्जा के लिये कोई और अभिरुचि खोज ली। अपनी आलोचनात्मक तीक्ष्णता के बाद भी हमारी उन तक न पहुँच पाने की असमर्थता एक और अन्तर प्रस्थापित कर देती है, जिसके उस पार हमारा उत्थान सुनिश्चित है।

किसी मित्र को अंग्रेजी में लिखते हुये पाता हूँ तो उन्हें हिन्दी में लिखने का आग्रह करने से नहीं चूकता हूँ। लगता है कि यही विचार, यही चिन्तनशीलता यदि हिन्दी को अपना माध्यम बना लेगी ,तो मेरे जैसे न जाने कितने हिन्दीभाषी जो अच्छे लेखन की राह तकते हैं, तृप्त हो जायेंगे। उन्हें भी लगता होगा कि हिन्दी का विस्तार क्षेत्र उतना वृहद नहीं, आर्थिक संभावनायें उतनी सुदृढ़ नहीं, जो उत्साह बनाये रखने में समर्थ हों, क्षमतायें दोहित करने में समर्थ हों। उल्टा जब मुझे वे लोग अंग्रेजी में लिखने को प्रेरित करते हैं तो बस मुस्करा कर रह जाता हूँ। दासता की खनक और ममता का आग्रह, यह अन्तर उन्हें समझा पाने में लगने वाले प्रयास को एक मुस्कराहट से ही व्यक्त कर देता हूँ।

निश्चय ही अभी जो स्थिति है उसमें जितने लोग इण्टरनेट पर पढ़ते हैं, उसमें अंग्रेजी जानने वालों की संख्या बहुत अधिक है। यही कारण हो सकता है कि अंग्रेजी में लिखना अधिक आकर्षक लगे, अधिक प्रभावित करे। जिस गति से इण्टरनेट का विस्तार हो रहा है, आने वाले दिनों में हिन्दी पाठकों की इतनी संख्या तैयार हो जायेगी कि लेखकों को पर्याप्त रूप से पढ़े जाने का बोध होने लगेगा। हर एक नये लेखक के रूप में एक नया पाठक मिल रहा है ब्लॉग जगत को, अतः नये लेखकों का स्वागत उन्मुक्त रूप से किया जाना चाहिये।

गूगल रीडर बन्द होने की सूचना के बाद से ही मन में भय बैठ गया है कि एक अच्छे मेले के आभाव में लेखकों और पाठकों का संपर्क और कम हो जायेगा। १ जुलाई के बाद क्या सारी फीड वैसे ही सुरक्षित रह पायेगी जैसी अभी तक है। कई अन्य सेवाप्रदाताओं ने यह आश्वासन तो दिया है कि सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा, पर तकनीक से अपरिचित न जाने कितने लेखक और पाठक अपना संपर्क खो देंगे, यह भय अभी भी है। मन में विचार आया कि कम से कम उन श्रेष्ठ ब्लॉगों को चिन्हित तो कर लूँ जिन्हें नियमित पढ़ते रहना हुआ है और यदि आवश्यकता पड़ी तो उन्हें पुनः एक एक करके अपनी नयी सूची में डाल लूँगा। इस कार्य को करने में तीन चार दिन अवश्य लग गये पर उस अनुभव में जो तथ्य सामने आये, उन्होंने मुझे एक पाठक के रूप में अन्दर तक हिला कर रख दिया है।

६०० की सूची में लगभग १२५ ब्लॉग ऐसे मिले जिसमें पिछले एक वर्ष से कुछ भी नहीं लिखा गया है। उनमें लगभग २५ ऐसे थे जो नये डोमेन में चले गये और लेखन की सततता बनाये हुये हैं। १०० ब्लॉग या कहें कि लगभग २० प्रतिशत ब्लॉग ऐसे थे जो निष्क्रिय हो चले। उनमें कई नाम ऐसे थे जो यदि बने रहते तो निश्चय ही साहित्य को लाभान्वित करते। उन्होने क्यों लिखना बन्द किया, उसके क्या विस्तृत कारण थे, इसके मूल में जाना कई चर्चाओं को जन्म दे देगा, पर यह तथ्य गहरे भेदता है कि ३ वर्ष में यदि स्थापित २० प्रतिशत ब्लॉग निष्क्रिय हो जायेंगे तो इस क्षेत्र में स्थापित लेखन का क्षरण लगभग ७ प्रतिशत प्रतिवर्ष हो जायेगा। मैं उन ब्लॉगों की बात ही नहीं कर रहा हूँ जो प्रारम्भिक वर्ष में ही अस्त हो जाते हैं, उनका प्रतिशत तो कहीं अधिक होगा। संभव है कि आधे से अधिक लोग प्रथम वर्ष में ही ब्लॉग छोड़कर चल देते हों।

फिर भी पिछले दो माह में न जाने कितने ब्लॉगों को उनके तीन-चार वर्ष पूरे होने की बधाई दे चुका हूँ, वे सारे ब्लॉग के प्रकाशित स्तम्भ हैं। जो उससे भी अधिक समय से लिख रहे हैं और अब तक नीरसता और एंकातता को प्राप्त नहीं हुये हैं, उनके हाथ में ही साहित्य का भविष्य सुरक्षित है, वही लोग हैं जो ब्लॉग को साहित्य से जोड़ देंगे। तब संभवतः साहित्यकार का बनना ब्लॉग जैसे व्यापक और सूक्ष्म स्तर से भी हो सकेगा। जहाँ इतने प्रवाह किसी धारा के लिये सुरक्षित रहेंगे, वह प्रवाहमयी धार दर्शनीय होगी।

इस प्रवाहमयी तन्त्र में जो ब्लॉग अपने आप को बचाये रहना चाहते हैं, उन्हें धैर्यपूर्वक लिखते रहना पड़ेगा, पहले तीन वर्ष, फिर पाँच वर्ष, फिर न जाने कितना और। हर सप्ताह दो पोस्ट, यदि दो संभव न हो तो कम से कम एक तो निश्चय ही। तब सूची से जो १२५ ब्लॉग अपना लेखन खो चुके हैं, वैसा पुनः नहीं होगा। संभव है कि तीन वर्षों बाद जब मैं पुनः समीक्षा करने बैठूँ तो सभी अच्छे ब्लॉग नियमित मिलें।

मुझे न जाने कितने अन्तर पाटने हैं, पर यदि अन्तर पाटने के पहले से दूसरा किनारा साथ छोड़कर चला जायेगा तो वह अन्तर कभी नहीं पट पायेगा, प्यास बढ़ती ही जायेगी। नये लेखक एक ओर से किनारा भरेंगे, पुराने लेखक दूसरे छोर को स्थापित रखेंगे, उसके बाद जो समतल तैयार होगा, उसमें सबके लिये स्थान होगा। मैं सारे निष्क्रिय ब्लॉगों को एक फोल्डर में एकत्र करके रख रहा हूँ, आशा है कि उसमें से कुछ दिनों के बाद नयी पोस्टें आनी प्रारम्भ हो जायेगीं। इन १२५ ब्लॉगों की कमी नये लेखक पूरी करेंगे अतः आने वाले दिनों में कई ब्लॉग संकलकों को मथ कर पढ़ने का प्रयास करूँगा।

पता नहीं यह क्रम कब तक चलेगा? ब्लॉग से मन भरने का प्रश्न ही नहीं, यह एक तृप्त व्यवस्था है, बस चलते रहें प्रवाह के साथ, जहाँ तक संभव हो सके।