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28.9.13

अभिव्यक्ति का आकार - ब्लॉग, फेसबुक व ट्विटर

सूत्र - व्यसन या विवशता
अष्टाध्यायी के पृष्ठ पलट रहा था, आश्चर्य कर रहा था कि कैसे इतने छोटे छोटे सूत्रों में पाणिनी ने सारा व्याकरण संकलित कर दिया है। प्रत्येक सूत्र अपने आप में पूर्ण और पूर्णतया अपने स्थान पर। व्याकरण ही नहीं, ज्ञान के लगभग सभी अंग, उपांग सूत्रबद्ध हैं, योगसूत्र, ब्रह्मसूत्र, भक्तिसूत्र, कामसूत्र। श्लोक ले लें, सुभाषित ले लें, दोहे आदि, सब के सब अपने में सिद्ध और सक्षम, व्यक्त करने में समर्थ।

यद्यपि मैं ट्विटर में नहीं हूँ, पर यदि हमारे आदि सृजनकर्ता अपने समय में ट्विटर का उपयोग करते तो उनका प्रत्येक ट्वीट महत्वपूर्ण होता, किसी एक सिद्धान्त के सारे पक्ष व्यक्त करने में।

ज्ञान को संक्षिप्त में कह देना ज्ञानियों का व्यसन था या विवशता? व्यर्थता की परतें हटाने के बाद जो शेष रहता है, वह ज्ञान का मौलिक स्वरूप होता है। ज्ञान को उसके मौलिक स्वरूप में रखना ज्ञानियों का व्यसन था। उस समय लेखन सीमित था, लेखपत्र संरक्षित नहीं रखे जा सकते थे, सुनकर याद रख लेने की परंपरा थी। ज्ञान को इस परिवेश में संरक्षित रखने के लिये उन्हें संक्षिप्ततम रखना ज्ञानियों की विवशता थी।

आइये, तीनों माध्यमों का इस परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करते हैं। विमा आकार की है, सृजन की है, अस्तित्व के काल की हैं।

ट्विटर अभिव्यक्ति का लघुत्तम माध्यम है, आकार में और अस्तित्व के काल में। फेसबुक अभिव्यक्ति का मध्यम माध्यम है, आकार में और अस्तित्व के काल में। ब्लॉग अभिव्यक्ति का वृहद पटल है, आकार में और अस्तित्व के काल में। आपने देखा कि मैंने सृजन की विमा के आधार पर वर्गीकरण नहीं किया है, उसका एक कारण है।

अभिव्यक्ति तथ्यात्मक हो सकती है, सृजनात्मक हो सकती है, विश्लेषणात्मक भी हो सकती है। तथ्यों का आकार बड़ा नहीं होता है, यदि उसमें विश्लेषण न जुड़ा हो। समाचारों को देखिये, यदि विश्लेषण या राय हटा दी जाये तो समाचार पत्र अपने से दसवीं आकार में आ जायेंगे। तथ्यों में सृजनात्मकता नहीं होती है, तथ्य सपाट होते हैं। विश्लेषण या सृजन तर्क श्रंखला या विचार तरंगों के संग चलता है और बहुधा आकार में फैलने लगता है। बहुत कुछ वैदिक संदर्भ ग्रन्थों जैसा।

सृजन पर सदा फैलता ही नहीं रहता है, उसके कुछ निष्कर्ष होते हैं, उसके कुछ सूत्र होते हैं। आदि ऋषियों ने जो सूत्र रूप में ज्ञान प्रस्तुत किया, वह सृजन की पराकाष्ठा थी, ज्ञान का पूर्ण संश्लेषण था। आकार ट्वीट का पर अस्तित्व का काल अनन्त। प्रक्रिया वृहद, आकार में भी, आधार में भी।

वर्तमान ट्वीट जगत अभिव्यक्ति का माध्यम तो है, पर उसमें अपनी कहनी अधिक होती है, सुननी कम। राजनेताओं, अभिनेताओं व अन्य प्रसिद्धात्माओं की गतिविधि को जानने का अच्छा माध्यम है ट्वीट। किसी घटना पर अपने त्वरित और क्षणिक विचार व्यक्त कर निकल लेने का माध्यम है ट्वीट। विचार एकत्र हो जाते है, कोई शोध करे तो उसमें तत्व भी निकाला जा सकता है, पर उसके लिये न किसी के अन्दर धैर्य ही होगा और न ही सामर्थ्य। आजकल किसी विषय पर कितने लोग अनुसरण कर रहे हैं, इसकी भी संख्या जानने का माध्यम है ट्विटर।

हम जिस ट्वीट्स को देख रहे हैं और जिसकी बात कर रहे हैं, वह तथ्य का स्वरूप है, प्राथमिक है, सृजन और विश्लेषण में न्यून है। हमारे पूर्वज ट्वीट के स्वरूप में जिस ज्ञान को हमें दे गये हैं, उसमें सृजन और विश्लेषण अधिकतम है।

मैं 'शून्य से शून्य तक' के सिद्धान्त का मानने वाला हूँ और वही सिद्धान्त यहाँ पर भी सटीक बैठता है। जन्म से मृत्यु तक का मार्ग शून्य से शून्य तक रहता है। सारी प्रकृति इस सिद्धान्त पर चलती है, उद्भव होता है, विकास होता है और अन्त हो जाता है। उद्भव से अन्त तक या कहें शून्य से शून्य तक की इस यात्रा में हर वस्तु अपना आकार गढ़ती है, अपना काल निर्धारित करती है। अभिव्यक्ति भी उनमें से एक है। एक विचार जन्म लेता है, आकार पाता है, विस्तार पाता है, संश्लेषित होता है, निष्कर्ष रूप धरता है और सिद्धान्त के रूप में अभिव्यक्ति क्षेत्र से विलीन हो जाता है। यदि इस सिद्धान्त के आधार पर चर्चा करें तो ट्वीट उतनी निष्प्रभ नहीं लगेंगी।

एक सूत्र जो रहा समाहित
समाचारों की मात्र तथ्यात्मक फुटकर निकाल दी जाये और साहित्य की दृष्टि से देखा जाये कि अभिव्यक्ति के माध्यमों का क्या मोल है? अभिव्यक्ति का प्रारम्भ तथ्यात्मक ट्वीट से हो सकता है, कई तथ्य मिलकर विचारों का झुरमुट बनता है जो फेसबुक की पोस्ट का आकार ले सकता है। ऐसे कई फेसबुकीय अभिव्यक्तियाँ विश्लेषणात्मक सृजनात्मकता के माध्यम से एक ब्लॉग के रूप में संघनित की जा सकती हैं, संप्रेषण को सुपाच्य रखने के लिये ब्लॉग के आकार में विस्तारित की जा सकती हैं। कोई संदर्भ ग्रन्थ लिखने की सामर्थ्य हो तो अभिव्यक्ति का आकार और भी बढ़ाया जा सकता है, संबद्ध विषयों को उससे जोड़ा जा सकता है।

अभिव्यक्ति का कार्य पर अपना विस्तार पाकर समाप्त नहीं हो जाता है। ज्ञान के निष्कर्षों को और मथना होता है, शाब्दिक कोलाहल के परे मर्म तक पहुँचना होता है। मर्म जब मथते मथते गाढ़ा हो जाये तो फेसबुकीय आकार में कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया में बढ़ते बढ़ते जब मर्म में सत्य या सिद्धान्त दिखने लगे तो वह सूत्र रूप में संघनित हो जाता है। ज्ञान की पराकाष्ठा और आकार ट्वीट का। विचार से प्रारम्भ हुये एक ट्वीट से, सिद्धान्त तक विकसित हुये एक ट्वीट तक।

अभिव्यक्ति के रहस्य को माध्यमों में खोजना और उसे भिन्न कोष्ठकों में बाँट देना, अभिव्यक्ति की सततता और एकलयता के साथ अन्याय है। सृजनात्मकता अपना आकार भी ढूँढ लेती है, अपना आधार भी। तीनों माध्यम न भिन्न हैं, न एक दूसरे के प्रेरक हैं, न एक दूसरे के पूरक हैं। तीनों ही अभिव्यक्ति की तीन शारीरिक अवस्थायें हैं जो शून्य से शून्य तक पहुँच जाती है, जो प्रकृति की गति पर चली जाती है।

(हिन्दी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा में 'ब्लॉग, फेसबुक व ट्विटर' के विषय पर व्यक्त मत)

30.5.12

लिखना नहीं, दिखना बन्द हो गया था

फेसबुक से विदा लिये ३ महीने और ट्विटर को देखे ३० महीने हो गये थे, जीवन आनन्द में चल रहा था, लिखने के लिये पर्याप्त समय मिल रहा था, एक सप्ताह की दो पोस्टें के लिये और कितना समय चाहिये भला? हम तो फेसबुक को लगभग भूल ही चुके थे, पर फेसबुक रह रहकर हमें कोंचने की तैयारी में था। यद्यपि फेसबुक बन्द करने के समय के आसपास ही पाठकों की संख्या में थोड़ी कमी आयी थी, पर उसका कारण हम गूगल महाराज के बदलशील व्यवहार को देकर स्वयं मानसिक रूप से हल्के हो लिये थे।

सबसे पहले एक मित्र का फोन आया, कहा कि यार अच्छा लिखते थे, बन्द काहे कर दिया? हम सन्न, हम सोचे बैठे थे कि ईमेल के माध्यम से किये सब्सक्रिप्शन में कुछ गड़बड़ हुयी होगी, उन्हें वह सुधारने की सलाह दे बैठे। बाद में पता लगा कि वे फेसबुक से ही हमें पढ़ लेते थे, ईमेल खोलने में आलस्य लगता था उन्हें। कहीं हम उन्हें तकनीक में अनाड़ी न समझ बैठें, इस डर से ईमेल की सलाह पर हामी तो भर गये पर उस पर अमल नहीं किया।

घर गये तो वहाँ पर भी दो परिचित मिले, घूम फिर कर बात अभिरुचियों की आयी। उन्होने कहा कि लेखन अच्छी अभिरुचि है और उसके बाद दो तीन पुरानी पोस्टों पर चर्चा करने लगे। हमारा माथा ठनका, उसके बाद भी बहुत कुछ लिखा था, उसके विषय क्यों नहीं उठाये, मर्यादावश उनकी पसन्द पर ही चर्चा को सीमित रखा। बाद में ज्ञात हुआ कि उन तक भी फीड फेसबुक से ही पहुँचती थी।

कुछ दिन पहले बंगलोर में रहने वाले और मेरे विद्यालय में पढ़े लगभग ४० लोगों का एक मिलन आयोजित किया था अपने घर में। पता लगा कि उसमें से बहुत से लोग ऐसे थे जो ब्लॉगजगत के सक्रिय पाठक थे, लिखते नहीं थे, टिप्पणी भी नहीं करते थे, पर पोस्टें कोई नहीं छोड़ते थे। उनमें से कुछ आकर कहने लगे कि भैया, जब व्यस्तता थोड़ी कम हो जाये तो लेखन पुनः आरम्भ कर दीजियेगा, आपका लिखा कुछ अपना जैसा लगता है। स्नेहिल प्रशंसा में लजा जाना बनता था, सो लजा गये, पर हमें यह हजम नहीं हुआ कि हमने लेखन बन्द कर दिया है। अतिथियों को यह कहना कि वे गलत हैं, यह तुरन्त खायी हुयी खीर के स्वाद को कसैला करने के लिये पर्याप्त था, अतः उन्हें नहीं टोका।

इन तीन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाठकों का एक वर्ग जो विशुद्ध पाठकीय रस के लिये पढ़ता है, पिछले ३ महीनों से हमें पढ़ नहीं पा रहा है। टिप्पणी करने वाले सुधीजन और ब्लॉगों के मालिक अभी भी जुड़े हुये थे, ईमेल या गूगल रीडर के माध्यम से। शेष लोग फेसबुक में प्राप्त लिंक के सहारे पढ़ते थे, हमारे फेसबुक से मुँह मोड़ लेने के कारण वे न चाहते हुये भी हमसे मुँह मोड़ चुके थे। समझ मे तब स्पष्ट आया कि फेसबुक अकेले ही १०० के लगभग पाठक निगल चुका है।

क्या करें तब, अपने आनन्द में बैठे रहना एक उपाय था। चिन्तन के जिस सुलझे हुये स्वरूप में फेसबुक को छोड़ा था, उसे पुनः स्वीकार करने से अहम पर आँच आने का खतरा था। सहेजे समय को बलिदान कर पुनः पहुँच बढ़ाने के लिये गँवा देना हर दृष्टि से अटपटा था। बहुत से ऐसे प्रश्न थे, जिसके निष्कर्ष हानि और लाभ के रूप में ज्ञात तो थे पर किसी एक ओर बैठ जाने की स्पष्टता का आभाव चिन्तन में छाया हुआ था।

निर्णय इसका करना था कि मेरे हठ की शक्ति अधिक है या मुझ पर पाठकों के अधिकार की तीव्रता। निर्णय इसका करना था कि लेखन जो स्वान्तः सुखाय होता था, वह अपना स्वरूप रख पायेगा या पाठकों के अनुरूप विवश हो जायेगा। निर्णय इसका करना था कि पूर्व निर्णयों का मान रखा जाये या अतिरिक्त तथ्य जान कर निर्णय संशोधित किये जायें। निर्णय इसका करना था कि त्यक्त को पुनः अपनाना था या एकान्त में आत्ममुग्धता की वंशी बजाना था।

क्या कोई और तरीका है, ब्लॉग सब तक पहुँचाने का? क्या ब्लॉग के साथ सारी सामाजिकता पुनः ओढ़नी पड़ेगी? प्रश्न किसी विस्तृत आकाश में न ले जाकर पुनः फेसबुक की ओर वापस लिये जा रहा था। जुकरबर्गजी, आप नजरअन्दाज नहीं किये जा सकते हैं, हमारे परिचित और पाठकगण आपके माध्यम से ही मुझे जानना चाहते हैं। आपके बारे में मेरे पूर्व विचार न भी बदलें पर अपनों के सम्पर्क में बने रहने के लिये मुझे आपकी छत में रहने से कोई परहेज नहीं है।

पर इस बार ट्विटर की चूँ चूँ भी साथ में रहेगी हमारे। जब दिखना है तो ढंग से और हर रंग से दिखा जायेगा।

22.2.12

फेसबुक, आपको भी धन्यवाद और विदा

नकारात्मकता से सदा ही बचना चाहता हूँ, बहुत प्रयास करता हूँ कि किसे ऐसे विषय पर न लिखूँ जिसमें पक्ष और विपक्ष के कई पाले बना कर विवाद हो, विवाद में ऊर्जा व्यर्थ हो, ऊर्जा जो कहीं और लगायी जा सकती थी, सकारात्मक दिशा में। जीवन में प्रयोगों का महत्व है, प्रयोगों से ही कुछ नया संभव भी है, प्रयोगों में प्राप्त अनुभव और भी महत्वपूर्ण होते हैं और विषयवस्तु की उपादेयता के बारे में औरों को आगाह करने में सहायक भी।

ऐसा ही एक प्रयोग फेसबुक के साथ किया था, कुछ माह पहले, सम्पर्क लगभग २५० के साथ, कई पुराने मित्र और परिवार के सदस्य, उपयोग मूलतः अपने पोस्ट का लिंक देने के लिये, साथ ही साथ कुछ रोचक पढ़ लेने का उपक्रम। बस इसी भाव से फेसबुक में गया था, वह भी किसी के यह कहने पर कि फेसबुक में साहित्य का भविष्य है। अनुभव यदि कटु नहीं रहा तो उत्साहजनक भी नहीं रहा, कुछ दिनों पहले अपना खाता बन्द कर दिया है, पूरा विचार किया, अपनी न्यूनतम और अनिवार्य की श्रेणी में उसे बैठा नहीं पाया। इसके पहले दो माह का साथ ट्विटर के साथ भी था पर वह चूँ चूँ भी निरर्थक ही लगी। अब रही सही उपस्थिति अपने ब्लॉग के साथ ही बची है, वह चलती रहेगी।

हर निर्णय का आधार होता है, आधार स्पष्ट हो तो व्यक्त भी किया जा सकता है। आधार के तीन सम्पर्क बिन्दु थे, समय, साहित्य और सामाजिकता। इन तीनों बिन्दुओं पर कितना कुछ रिस रहा था और कितना रस मिल रहा था, यह अनुभव हर व्यक्ति के लिये भिन्न हो सकता है, पर विश्लेषण हेतु विषय का उठना आवश्यक है।

पहला है सामाजिकता। यह फेसबुक का सुदृढ़ पक्ष है। अपने कई परिचितों के बारे में जाना, वे कहाँ रह रहे हैं, क्या कर रहे हैं, कुछ चित्र उनके परिवारों के, कुछ घूमने के, कुछ त्योहार के, कुछ मित्रों के साथ, जन्मदिन और वैवाहिक वर्षगाँठ की शुभकामनायें। वैसे तो जिन मित्रों और संबंधियों को जानना आवश्यक था, वे तो फेसबुक से पहले भी सम्पर्क में थे। फेसबुक के माध्यम से उनके बारे में कुछ और जान गये। कुछ और लोगों से भी परिचय बढ़ा पर उसका आधार साहित्यिक न हो विशुद्ध जान पहचान का ही रहा, वह भी किसी तीसरे पक्ष के माध्यम से। संबंधों को महत्व देने वालों के लिये, संबंधों की संख्या से कहीं अधिक, उनकी गुणवत्ता पर विश्वास होता है। फेसबुक में संबंधों का प्रवाहमयी संसार तो मिला पर जब उसकी अभिव्यक्ति में गाढ़ेपन की गहराई ढूढ़ी तो छिछलेपन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं पाया।

दोष वातावरण का है, जहाँ स्वयं को व्यक्त करने की होड़ लगी हो, सम्पर्कों की संख्या चर्चित होने के मानक हों, औरों की अभिव्यक्ति का अवमूल्यन केवल लाइक बटन दबा कर हो जाता हो, वहाँ संबंधों के प्रगाढ़ होने की अपेक्षा करना बेईमानी है। संबंधों को पल्लवित करने के लिये समय देना पड़ता है, लगभग बराबर का, स्वयं की अभिव्यक्ति में दिया समय औरों द्वारा अभिव्यक्त को पढ़ने में दिये समय से कम ही रहे। इस वातावरण में ऊपर ऊपर तैरने को आनन्द तो बना रहा पर गहरे उतर कुछ संतुष्टि जैसा कुछ भी अर्जित नहीं हुआ।

दूसरा है समय। जहाँ पर गतिविधियों की झड़ी लगी हो, वहाँ कितना समय सर्र से निकल जाता है, पता ही नहीं चलता है। कई लोगों को जानता हूँ जो सुबह उठकर मुँह धोने के पहले फेसबुक देखते हैं। दिन में कई बार फेसबुक में कुछ न कुछ देखने में समय स्वाहा करने की लत लग जाती है सबको। संभवतः यही कारण है कई संस्थानों में फेसबुक पर रोक लगा दी गयी है। एकाग्रता नहीं रह पाती है, जब भी कुछ सोचने का समय आता है, मन में फेसबुक की घटनायें घूम जाती हैं। भरी भीड़ में परिवेश से त्यक्त युवा बहुधा फेसबुक में विचरते पाये जाते हैं। मेरा भी पर्याप्त समय फेसबुक चुराता रहा, जो पिछले कई दिनों से मुझे पूरी तरह से मिल रहा है।

तीसरा है साहित्य। साहित्य की दृष्टि से अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम ब्लॉग ही है। ट्विटर के १५० अक्षरों में केवल चूँ चूँ ही की जा सकती है। आप अपने होने, न होने, खोने, पाने की सूचना तो दे सकते हैं पर साहित्य सा कुछ लिख नहीं सकते हैं। फेसबुक में भी जहाँ सामाजिकता प्रधान वातावरण हो, वहाँ साहित्य गौड़ हो जाता है। वैसे तो ब्लॉग भी साहित्य का गहरा प्रारूप नहीं है, पाँच छै पैराग्राफ में बड़ी कठिनता से एक विषय समेटा जा सकता है, पर वर्तमान में यही साहित्य की न्यूनतम अभिव्यक्ति और ग्रहण करने की ईकाई है। जहाँ लाखों उदीयमान साहित्यकारों के योगदान से साहित्य सृजन के स्वप्न देखे जा रहे हों, वहाँ अभिव्यक्ति के लिये ब्लॉग से छोटी ईकाईयों का स्थान नहीं है।

पाठक ढूढ़ने का श्रम लेखक को करना होता है, उसी तरह अच्छे लेखक को ढूढ़ने का श्रम पाठक को भी करना पड़ता है। माध्यमों की अधिकता ध्यान बाटती है, अभिव्यक्ति का कूड़ा एकत्र करती है। छोटी चीजें से कुछ बड़ा बन पाने में संशय है, रेत से पिरामिड नहीं बनते, उनके लिये बड़े पत्थरों की आवश्यकता होती है। महाग्रन्थों का युग नहीं रहा पर कम से कम ब्लॉग की ईकाई से सबका योगदान बनाये रखा जा सकता है। साहित्य संवर्धन तो तभी होगा, जब अधिक लोग लिखें, अधिक लोग पढ़ें, लोग अच्छा लिखें, लोग अच्छा पढ़ें, अधिक समय तक रुचि बनी रहे, जब समय मिले तब साहित्य ही पढ़ें, बस में, ट्रेन में, हर जगह। फेसबुक सामाजिकता संवर्धित कर सकता है, साहित्य नहीं।

फेसबुक, आपको भी धन्यवाद और विदा।