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1.1.14

सांस्थानिक समर्थन के उन्नत पक्ष

ब्लॉग के लिये एक आधारभूत ढाँचा तैयार करने और उसके प्रवाह को सुनिश्चित करने के बाद उसके संवर्धन के प्रयास आवश्यक होने चाहिये। ऐसा हो रहा है, पर प्रयास संस्थागत न होकर पूरी तरह से व्यक्तिगत हैं। कुछ ब्लॉगर जिनके अन्दर सहायता करने की प्रवृत्ति रही है, जिन्हें अपने प्रारम्भिक काल में सहायता मिली है, उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति नवागुन्तकों को हर संभव सहायता पहुँचाने की रहती है। यदि यही प्रयास एक सांस्थानिक स्वरूप ले लें तो निश्चय ही ब्लॉग जगत में गुणात्मक परिवर्तन आ जायेंगे।

सामूहिकता और विकास
उत्साहवर्धक, मार्गदर्शक और व्यावसायिक उत्प्रेरक, इन तीन स्तरों को मैं सांस्थानिक समर्थन के उन्नत पक्ष कहता हूँ। उन्नत पक्ष इसलिये क्योंकि इनके होने से ब्लॉग की आयु बढ़ती है। ब्लॉगरों के पिछले दस वर्षों के अनुभव में एक तत्व सदा ही उपस्थित रहा है और उस तत्व ने उनके ब्लॉगिंग के कालखण्ड का निर्धारण किया है। सभी लोग उत्साह के साथ ब्लॉगिंग प्रारम्भ करते हैं, सबके अन्दर अभिव्यक्ति की स्वाभाविक चाह भी होती है, सब चाहते हैं कि पाठक उन्हें पढ़ें भी। प्रारम्भ सदा ही पूरी ऊर्जा के साथ होता है, किसी लम्बी दौड़ की तरह। जैसे जैसे आगे बढ़ते हैं, अपेक्षाओं को समुचित मान नहीं मिल पाता है। संवेदनशील ब्लॉगर इसे एक चुनौती के रूप में लेते हैं और अपने अनुभव का विस्तार करते हैं, विषयगत अध्ययन पर ध्यान देते हैं, अभिव्यक्ति को परिवर्धित करते हैं। कइयों के लिये यह संभव नहीं हो पाता है और तब ये तीन स्तर ब्लॉगिंग के लिये संजीवनी बन जाते हैं।

उत्साहवर्धक की आवश्यकता सबको होती है, शिखर तक पहुँचने में न जाने कितने हाथों का सहारा मिलता है। ब्लॉगजगत में टिप्पणियों को दिये अन्यथा महत्व को लेकर भले ही आलोचकों ने वक्र टिप्पणियाँ की हों, पर मेरे लिये उनका महत्व सदैव विशेष रहा है। प्रारम्भिक पोस्टों में विशेषकर एक एक टिप्पणियों को बड़े ध्यान से पढ़ता था और अभिव्यक्ति के स्तर में किस तरह और सुधार किया जा सकता है, यह जानने के लिये सदा ही लालायित रहता था। संभवतः यही कारण है कि अभी तक उन टिप्पणियों का ऋण कर्तव्य मानकर चुका रहा हूँ। किसी नवागन्तुक के लेख में छिपी भूलों को उजागर करने से कहीं अच्छा होता है उसमें किये गये प्रयास का उत्साहवर्धन करना। उत्साहवर्धन ब्लॉगिंग की अवधि को दुगना कर देता है। साहित्य और ब्लॉगिंग, दोनों में ही मैं भी अधिक अनुभवी नहीं हूँ पर निश्चय ही किसी के प्रयासों को समझना और उनकी प्रशंसा करने को एक मूलभूत कारण अवश्य मानता हूँ, जिसमें ब्लॉगिंग के विकास की अथाह संभावना छिपी है।

मार्गदर्शन उत्साहवर्धन से कहीं अधिक गहरा और व्यवस्थित कार्य है। जहाँ उत्साहवर्धन में किसी व्यक्ति की क्षमताओं का ज्ञान सतही रहता है, मार्गदर्शन में क्षमताओं को सही सही समझना होता है। मार्गदर्शन बड़ा ही व्यक्तिगत कार्य है और वह मार्गदर्शक का समय और ऊर्जा माँगता है। उत्साहवर्धन पीछे से ढकेलने जैसा है, मार्गदर्शन ऊँगली पकड़ कर चलने सा। लिखते रहने की पुकार उत्साहवर्धन है, कुछ विशेष लिखने का परामर्श देना मार्गदर्शन है। उत्साहवर्धन में किसी क्षमता का पूरा दोहन किया जाता है, मार्गदर्शन में क्षमताओं को विशिष्ट व उत्कृष्ट किया जाता है। सांस्थानिक समर्थन का एक अतिविशिष्ट स्तर है, मार्गदर्शन। मार्गदर्शन की क्षमता न केवल विषय के अनुभव से आती है, वरन उसके लिये सामने वाले के व्यक्तित्व का समुचित आकलन भी आवश्यक है।

उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन एक स्थान तक ही ले जा पाते हैं, उसके आगे का पंथ लेखक व ब्लॉगर को स्वयं ही नापना होता है। आगे की खोज नितान्त एकान्त है, उत्कृष्टता के सोपान किसी की प्रतिलिपि बनने में नहीं वरन स्वयं को सत्यता से पूर्ण स्थापित करने में है। पर इस राह में एक बाधा है। जब किसी को अपने श्रम और लगन का समुचित मोल नहीं मिलता है, तब उससे लगने लगता है कि उसके प्रयास व्यर्थ ही जा रहे हैं। पाठक आपको एक प्रतिष्ठित लेखक के रूप में जानने लगें, यह निश्चय ही एक महान उपलब्धि है, पर उपलब्धि का वह भाव शुष्क न रह जाये, इसके लिये आवश्यक है कि आपका कार्य आपकी जीविका में आपका हाथ बटाये।

सुदृढ़ और सक्षम
ब्लॉग लेखन में व्यवसाय की संभावना तो दिखी है, पर बहुत अधिक नहीं। बाजारवाद तो यह कहता है कि माँग यदि अधिक हो तो आपूर्ति को सही मूल्य मिलता है। अच्छा साहित्य सब पढ़ना चाहते हैं, अच्छी पुस्तकों के लिये लोग धनव्यय को सम्मान और मानसिक विकास का अंग मानते हैं। परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर भी लेखकों को बाजार के अनुरूप अर्थप्राप्ति नहीं हो पा रही है। सांस्थानिक समर्थन का सर्वाधिक प्रभावी कार्य उस व्यावसायिक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करना है, जिससे ब्लॉग स्वतः ही गतिमान बना रहे, सदा के लिये। किन्तु जब तक उस स्थिति तक हम नहीं पहुँच जाते हैं, सांस्थानिक समर्थन को बने रहना होगा। यह कालखण्ड एक दशक तक भी हो सकता है, पर उस पथ पर चलते चलते जब हम स्वावलम्बित हो जायेंगे, हमें हिन्दी की सुदृढ़ स्थिति पर गर्व होगा।

व्यावसायिक उत्प्रेरण ही सांस्थानिक समर्थन के महत प्रयासों का तार्किक निष्कर्ष हो सकता है, तब तक प्रयास की आवश्यकता बनी रहेगी। माता पिता अपने बच्चों को तब तक समर्थन देते रहते हैं, जब तक वे आर्थिक रूप से सक्षम न हो जायें, अपने पैरों पर स्वयं न खड़े हो जायें, अपनी संततियों को समर्थन देने की स्थिति में न पहुँच जायें। हिन्दी के जो पक्ष सक्षम होते जायें, उन्हें विकसित होने के लिये छोड़ दिया जाये। जिन पक्षों को आवश्कता हो, उन पर ध्यान दिया जाये, क्रमवार, एक के बाद एक। अभी जो भी प्रयास हो रहे हैं, उनकी तुलना मैं उस बच्चे से करूँगा जो वयस्क होने का अभिनय कर रहा हो। अभिनय होने तक तो विश्वास बना रहता है, पर जब परिवेश का बोध होता है, यथास्थिति समझ में आ जाती है। 

ब्लॉग लेखन में अधिकतम कितना धन है, इसकी गणना बहुत अधिक कठिन नहीं है। कितनी संभावना है, यह भी कठिन प्रश्न नहीं है। साहित्य के प्रति लगाव नैसर्गिक होता है। सामाजिक ढाँचे में संवाद की प्रमुखता रहती है, मन के भावों को व्यक्त करने में जितना उत्साह होता है, उतना ही उत्साह औरों के भावों को समझने में भी रहता है। हम यदि साहित्य की परम्परागत परिधि में बने रहे तो अपनी संभावनायें सीमित कर बैठेगें। ज्ञान के हर संभावित क्षेत्र में ब्लॉग की अभिव्यक्ति ले जाने के क्रम में न केवल ब्लॉग के लिये व्यावसायिकता के सूत्र मिलने लगेंगे, वरन साहित्य को भी अपना विस्तार दिखने लगेगा। सामान्य जन से जुड़ी विज्ञान की बातें साहित्य का विषय क्यों नहीं हो सकती, इतिहास से समझी गयी शासकों की भूलें साहित्य का अंग क्यों नहीं बन सकतीं। जब हम ज्ञान को विभागों में बाटने लगते हैं, हम यह मान बैठते हैं कि उनमें परस्पर कोई संबंध है ही नहीं, जबकि हमारे मस्तिष्क में ज्ञान का एकीकृत स्वरूप ही रहता है। उसी रूप में सृजन हो, उसी रूप में वह ग्रहण हो, उसी रूप में संवाद हो, वही साहित्य हो।

ब्लॉग को यदि विषयगत विस्तार मिलेगा तो व्यावसायिक संभावनायें स्वतः ही सिद्ध हो जायेंगी। ब्लॉग में अभी जितना भी धन है वह प्रचार के रूप में है, पर ब्लॉगतन्त्र में प्रचार कितना धन बटोर पायेगा, यह एक यक्ष प्रश्न है। वह धन क्या सांस्थानिक समर्थन के लिये या स्वावलम्बन के लिये पर्याप्त होगा, यह भी विचारणीय है। जब प्रचार केन्द्र में हो तो गुणवत्ता से अधिक संख्या महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रचार पर पूर्णतया निर्भर रहने से गुणवत्ता से कैसे समझौते करने होंगे? केन्द्रबिन्दु तब सृजन न होकर पाठकों की रुचि हो जायेगी, बाजारवाद तब गुणवत्ता को प्रभावित करने लगेगा। इन स्थितियों में व्यावसायिक उत्प्रेरक का स्वरूप ऐसा हो जो न केवल आत्मनिर्भर हो, वरन उसकी जड़ें साहित्य की धरती में ही हों, न कि प्रचार के अस्थिर आसमान में।

प्रश्न अनुत्तरित हैं, पर आशान्वित हैं, हिन्दी के सुधीजन और प्रेमीजन उत्तर लेकर अवश्य आयेंगे।

चित्र साभार - www.chumans.comwww.clinicalnutritioncenter.com

28.12.13

सांस्थानिक समर्थन का अर्थ

पिछले दस वर्ष के इतिहास और भविष्य की अपेक्षाओं के संदर्भ में देखता हूँ तो मुझे सांस्थानिक समर्थन का अर्थ ९ स्पष्ट कार्यों या स्तरों में समझ आता है। उसमे प्रथम ६ स्थूल हैं और भिन्न भिन्न रूपों में उपस्थित हैं, पर वे आधार कितने दृढ़ हैं और उन पर कितना निर्भर रहा जा सकता है, यह एक यक्ष प्रश्न है। यदि हिन्दी ब्लॉग के लिये एक व्यापक आधार बनाना है तो हर स्तर को आत्मनिर्भर, स्वतन्त्र और सुदृढ़ बनाना होगा। अन्तिम ३ विरल हैं, ब्लॉग जगत में यत्र तत्र छिटके भी हैं, पर इतने आवश्यक हैं कि प्रत्येक ब्लॉगर उनको चाहता है।  

प्रथम ६ हैं, आधार(प्लेटफ़ार्म), प्रेषक(फीडबर्नर), फीडरीडर, चर्चाकार, संकलक, संग्रहक। अन्तिम ३ हैं, उत्साहवर्धक, मार्गदर्शक, व्यावसायिक उत्प्रेरक। चर्चा के लिये प्रत्येक बिन्दु पर प्रकाश डालना आवश्यक है। हो सकता है कि कोई पक्ष सहज या सरल लगे, पर समग्रता की दृष्टि से उन पर भी विहंगम दृष्टि आवश्यक है।

प्रत्येक आधार है आवश्यक
पहला है आधार या प्लेटफार्म। ब्लॉगर या वर्डप्रेस ऐसे ही दो आधार हैं। उनकी निशुल्क सेवाओं का निश्चय ही बहुत महत्व रहा है और यदि वे न होतीं तो ब्लॉग जगत अपने वर्तमान स्वरूप में न होता। अधिकांश ब्लॉग अभी भी निशुल्क हैं, उन पर उपयोगकर्ताओं को अभिव्यक्ति का अधिकार है। उन पर लिखा हुआ साहित्य और प्रचार की दृष्टि से उनका व्यावसायिक उपयोग सेवा देने वाली कम्पनियों के हाथ में ही है। भला सोचिये, कोई आप पर धन व्यय कर रहा है, कोई न कोई निहितार्थ तो होगा ही। आपका माध्यम आपके नियन्त्रण में है ही नहीं। भगवान न करे, कभी कोई कुदृष्टि हो गयी औऱ आपकी वर्षों की साधना स्वाहा। यह प्रथम पग है और बिना इस पग के कहीं पर भी छलांग लगाना अन्धश्रद्धा है। ऐसा नहीं है कि इस प्लेटफार्म का निर्माण करने में बहुत धन व्यय होगा। थोड़ा बहुत तो निश्चय ही होगा, साइट, सर्वर, सुरक्षा आदि में, पर सांस्थानिक समर्थन के लिये वह अत्यावश्यक भी है।

एक बार लोगों ने अपना ब्लॉग बना लिया, तब प्रेषक या फीडबर्नर का कार्य प्रारम्भ होता है। जब कभी भी आप अपने ब्लॉग पर कुछ नया लिखेंगे, उसे फीडबर्नर तुरन्त ही जान लेता है। ऐसा वह उस प्रक्रिया के रूप में करता है जिसमें सारे ब्लॉगों की स्थिति फीडबर्नर सतत जाँचता रहता हैं और पिछली स्थिति की तुलना में हुये बदलाव को एकत्र करता रहता है। इन कम्पनियों का धन कमाने का अपना कोई साधन नहीं होता है क्योंकि इनका कार्य परोक्ष में चलता है और इन्हें प्रचार का अवसर नहीं मिल पाता है। प्लेटफार्म या फीडरीडर यह कार्य भी करते रहते हैं क्योंकि ऐसा करने से उन तक भी पाठकों का प्रवाह बना रहता है और प्रचार से  होनी वाली आय के लिये प्रचार मिलता है।

एक बार प्लेटफार्म या ब्लॉग पर लिखी लेखक की बात फीडबर्नर की सहायता से पाठक तक पहुँचा दी जाती है तो पाठक को भी अपनी रुचि के विभिन्न ब्लॉगों को सुविधानुसार पढ़ने के लिये एक जगह एकत्र करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य फीडरीडर करता है। कुछ महीने पहले जब गूगल रीडर बन्द हुआ था तो पूरी की पूरी ब्लॉग व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया था। लगा था कि अब कैसे ब्लॉग पढ़े जा सकेंगे, बिना पाठक कैसे लेखकों में उतना ही उत्साह रह पायेगा? वह तो भला हो फीडली का कि हम लगभग पहले की तरह ही लेखन व पठन कर पा रहे हैं। वैकल्पिक व्यवस्था के अन्तर्गत फीडबर्नर नयी पोस्टों की जानकारी ईमेल के माध्यम से भी प्रेषित कर सकता है, पर पाठकों को ईमेल में सैकड़ों अनपढ़े लेखों को रखने की तुलना में एक अलग व्यवस्था भाती है। फीडरीडर में भी आत्मनिर्भरता सांस्थानिक समर्थन का तीसरा स्तर है।

एक बार लेखक और पाठक में संपर्क स्थापित हो जाता है तो लिखने और पढ़ने का प्रवाह बना रहता है। तब लेखक को अधिक पाठक मिले, पाठक को अधिक लेखक मिले, ये निष्कर्ष सहज ही हैैं, ब्लॉग के विकास और विस्तार के लिये। इस स्तर पर चर्चाकार और चर्चामंच अपना कार्य करते हैं। सौभाग्य से हिन्दी ब्लॉग में यह कार्य अच्छे ढंग से चल रहा है। सुधीजन न केवल अच्छे ब्लॉग लिखते और पढ़ते हैं, वरन उन्हें सबके सामने लाते हैं और प्रेरित करते हैं। आज भी चर्चाकारों के माध्यम से हर दिन कुछ न कुछ नये और स्तरीय ब्लॉगों से जुड़ता रहता हूँ और उनको पढ़ता रहता हूँ। यह एक साझा मंच होता है जहाँ पर ब्लॉग नित विकसित होता है। यह अभी तक व्यक्तिगत स्तर पर ही हो रहा है, इस प्रक्रिया को भी सांस्थानिक समर्थन की आवश्यकता है और वह भी व्यापकता में। यह एक पूर्णकालिक कार्य है, ढेर सारे ब्लॉगों को पढ़ना और उनमें से स्तरीय चुनना वर्षों के साहित्यिक अनुभव से ही आता है। अनुभवी चर्चाकारों की उपस्थिति हिन्दी ब्लॉग व साहित्य के लिये शुभ लक्षण है, यह लक्षण और भी घनीभूत हो और साहित्य का स्थायी अंग हो जाये। 

अगला स्तर है संकलक का, चर्चाकारों के सहित हर पाठक को ऐसा मंच चाहिये जहाँ पर हिन्दी ब्लॉग जगत की प्रत्येक पोस्ट के बारे में जाना जा सके। नये लेखकों के लिये यह मंच प्रारम्भिक पड़ाव हो। अपना ब्लॉग बनाने के बाद वे इसमें स्वयं को पंजीकृत कर सकते हैं जिससे वह ब्लॉग पढ़ने वाले सारे पाठकों की दृष्टि में आ सकें। यही नहीं, संकलकों में इस बात की भी जानकारी हो कि कोई पोस्ट कितनी बार पढ़ी गयी, हर बार उसे कितनी देर पढ़ा गया, लेखन के कितने वर्षों के बाद भी उसे पढ़ा जा रहा है। इस तरह के मानकों से कालान्तर में पाठकों को अच्छा साहित्य ढूढ़ने में सहायता मिलेगी। यही नहीं संकलकों में खोज की उन्नत व्यवस्था हो, जिससे किसी भी विषय पर क्या लिखा जा रहा है, कितना लिखा जा रहा है, सब का सब सहज रूप से सामने आ जाये। संकलकों के माध्यम से न केवल नये लेखकों को सहायता मिलेगी वरन हर स्तर पर पाठकों को ब्लॉग जगत को समग्रता से देखने का अवसर भी मिलेगा।

अगला स्तर संग्रहक का है। यह एक व्यापक कार्य है, इस स्तर में अब तब हिन्दी साहित्य में लिखा हुया एक एक शब्द संग्रहित हो। प्रश्न यह उठ सकता है कि क्या संग्रहणीय है, क्या नहीं? इस पर अधिक चर्चा न कर इतिहास की दृष्टि से अधिकाधिक संग्रहित किया जाये। संभव है जो आज संग्रहण योग्य न लगे, हो सकता है वह भविष्य में सर्वाधिक पढ़ा जाये। साहित्य का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है औरर उनसे सीखने के क्रम में सबकुछ संग्रहित किया जाये। डिजिटल रूप में संग्रहण सरल भी है और अधिक समय तक सुरक्षित भी रखा जा सकता है।
   
इस समय देखा जाये तो प्रत्येक स्तर के लिये एक अलग व्यवस्था है। कहीं पर भी कोई क्रम टूटा तो ब्लॉग आंशिक या पूर्ण रूप से प्रभावित हो जायेंगे। कहीं पर भी लगा तनिक सा भी झटका हमें पूरी तरह से हिला जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि ये सारे स्तर एकीकृत हों और हमारे नियन्त्रण में हों। इस परिप्रेक्ष्य में सांस्थानिक समर्थन से मेरा आशय ब्लॉग की व्यवस्था को न केवल और अधिक सुविधाजनक बनाना है, वरन उसे अनिश्चितता से पूर्णतया बाहर लाना है।

इन सारे स्तरों को स्कीकृत करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिये। हमारा एक ही वेबपेज हो, उसी में संबंधित सारे ब्लॉग हों। उसी वेबपेज में हमारी रुचियों के अनुसार फीडरीडर भी हो। फीड भेजे जाने की प्रक्रिया पूर्णतया आन्तरिक हों। संकलक भी उसी पृष्ठ से ही दिख जाये, किसी विषय से संबंधित सारी पठनीय पोस्टें हमारे सम्मुख हों। चर्चा के लिये हम उसी पेज से उन पर अपनी संस्तुति देकर चर्चा के लिये प्रेषित कर सकते हों। एक व्यवस्था के अनुसार विषयानुसार सर्वाधिक संस्तुति की गयी पोस्टें स्वतः ही उसी क्रम में चर्चामंचों में दिखायी पड़ें। इस प्रकार ब्लॉग के लिये एक स्थान पर ही जाना पड़ेगा और वहीं से सारे कार्य सम्पादित हो जाया करेंगे, बिना किसी घर्षण के। 

भारत में न प्रतिभा की कमी है, न धन की और न ही संसाधनों की। हिन्दी के प्रति प्रेम भी हमारा है और उत्तरदायित्व भी हमको ही लेना होगा। स्वयं सक्षम होते हुये भी किसी अन्य पर आश्रित बने रहना और आधार हटने पर सामूहिक विलाप करना हम जैसे प्रतिभावान समाज को शोभा नहीं देता है। हम ब्लॉग व्यवस्था के लिये किसी से भी अच्छा मंच तैयार कर सकते हैं, जो भी सांस्थानिक समर्थन करें, उसे गुणवत्ता और क्रियाशीलता की दृष्टि से उत्कृष्ट बना सकते हैं। पहल तो करनी ही होगी, कहीं ऐसा न हो कि अपेक्षायें हमसे कहीं आगे निकल जायें और हम योगदान के स्थान पर अश्रुदान करने में लगे रहें।

अन्तिम ३ स्तरों पर चर्चा अगली पोस्ट में।

चित्र साभार - www.oxy.edu

25.12.13

हिन्दी ब्लॉग और सांस्थानिक समर्थन

आज से दस वर्ष पहले आलोकजी ने पहला हिन्दी ब्लॉग नौ दो ग्यारह बनाया था। तब संभवतः किसी को अनुमान नहीं होगा कि डायरीनुमा ढाँचे में स्वयं को इण्टरनेट पर व्यक्त करने वाला यह माध्यम इतना व्यापक, सशक्त और लोकप्रिय होकर उभरेगा। अभावों से प्रारम्भ हुयी यात्रा संभावनाओं का स्रोत बन जायेगी, यह किसने सोचा था? हिन्दी ब्लॉग न केवल पल्लवित हो रहा है, वरन लाखों रचनाकारों के लिये एक आधारभूत मंच तैयार कर रहा है, जिस पर भविष्य के साहित्यिक विस्तार मंचित होंगे, भाषायी आकार संचित होंगे। अंग्रेजी की तुलना में देखा जाये तो हिन्दी ब्लॉगिंग अभी भी विस्तारशील है, पर उसका कारण हिन्दी रचनाकारों में उत्साह व प्रतिभा की कमी नहीं है। जैसे जैसे कम्प्यूटर और इण्टरनेट हिन्दी जनमानस को उपलब्ध होता जायेगा, हिन्दी ब्लॉगिंग का आकार बढ़ता जायेगा।

संख्या के पश्चात गुणवत्ता की सुध लेनी होती है। यह सत्य है कि गुणवत्ता के लिये प्रतिभा के साथ सतत श्रम की आवश्यकता होती है, श्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ आने में समय लेती हैं। इसके लिये आवश्यक है कि लोग ब्लॉगिंग में बने रहें। पहले वर्ष के बाद ही लगभग १५ प्रतिशत लोग ब्लॉगिंग छोड़ देते हैं, जो बने रहते हैं उन्हें रस आने लगता है। ब्लॉगिंग में रोचकता बनाये रखने के लिये सृजनात्मकता भी चाहिये और विषयात्मक गहराई भी, यही दो पक्ष गुणवत्ता के वाहक बनते हैं। गुणवत्ता से भरी अभिव्यक्तियाँ न केवल स्वयं को संतुष्ट करती हैं, वरन पाठकों को भी वांछित आहार देती हैं, एक बार नहीं, बार बार। मुझे आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता तब होती है जब आज से चार वर्ष पूर्व लिखे गये किसी लेख पर पाठक की टिप्पणी आ जाती है। यहीं ब्लॉगिंग का सशक्त पक्ष है, यही ब्लॉगिंग का सौन्दर्य भी है, नहीं तो कौन चार वर्ष पुराने समाचार पत्रों या पत्रिकाओं को पढ़ता है, और न केवल पढ़ता है वरन लेखक को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराता है।
 
कुछ ब्लॉगरों को जब मैं कहता हूँ कि उनकी कोई पोस्ट संग्रहणीय हैं तो वे बहुधा सकुचा जाते हैं। उन्हें लगता है कि स्वान्तः सुखाय के लिये लिखी गयी पोस्ट को इतना मान क्यों? विनम्रता एक अच्छा गुण है पर वह साहित्यिक प्रभातों को प्रकाश फैलाने देने में सकुचाने क्यों लगता है। प्रतिभा अपना आकार, प्रभावक्षेत्र और कालक्षेत्र स्वयं निर्धारित करती है, रचनाकार को उसे विनम्र भाव से ही फैलने देना चाहिये। स्वान्तः सुखाय में यदि तुलसीदास भी सकुचाये रहते तो रामचरितमानस का अमृत कोटि कोटि कण्ठों में कैसे पहुँचता? हमने जो भी साहित्य पढ़ा है, वह इसलिये संभव हो सका कि हमारे पूर्वजों ने केवल संग्रहणीय लिखा वरन उसे आगामी पीढ़ियों के लिये संग्रहित रखा। हमारा भी दायित्व बनता है कि हम भी आगामी पीढ़ियों के लिये पढ़ी जा सकने योग्य गुणवत्ता बनाये और साथ ही साथ यह प्रयास भी करें कि ज्ञानसंग्रह यथारूप बना रहे।

स्वप्न बड़े हैं, अड़े खड़े हैं
कुछ लोगों को संशय हो सकता है कि जो भी हिन्दी ब्लॉगों में लिखा जा रहा है, वह स्तरीय नहीं है। माना जा सकता है कि स्थापित मानकों पर पहुँचने के लिये वर्षों लग जायेंगे। यह भी माना जा सकता है कि ब्लॉग के माध्यम से सबको लेखन का अधिकार मिल जाने से कोई भी अपने मन की कह सकता है, बिना स्तर पर ध्यान दिये। किन्तु यह प्रक्रिया तो सदा से होती आयी है। जब ब्लॉग नहीं भी होते थे तब भी ढेरों ऐसी पुस्तकें प्रकाशित होती थीं जिन्हें लेखक के अतिरिक्त कोई पढ़ता भी नहीं था। कोई पुस्तक पठनीय है या नहीं, इसके पीछे अनुभवी संपादकों का संचित ज्ञान और विवेकपूर्ण निर्णय रहा करते थे। पुस्तकालय में शोभायमान और अपना एकान्तवास झेल रही ऐसी पुस्तकों से कहीं अधिक व्यावहारिक है ब्लॉग में व्यक्त किसी नवल किशोर का प्रयास, जिसके माध्यम से वह शब्दों में स्वयं को ढूँढता है।

जैसा भी हो, जो भी है, उसी स्तर के आगे सोचना प्रारम्भ करना है और प्रवाह की मात्रा और गति बनाये रखनी है। आने वाले दशकों में लोग आश्चर्य करेंगे कि किस तरह से हिन्दी ब्लॉगिंग ने लाखों की संख्या में साहित्यकारों का निर्माण किया है, किस तरह से हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या बढ़ायी है, किस प्रकार से लेखन ली गुणवत्ता बढ़ाने में सहयोग दिया है और किस प्रकार से साहित्योत्तर अन्यान्य विषयों को हिन्दी से जोड़ा है। यदि इस स्वप्न को साकार करने की इच्छा को फलीभूत होते देखना है तो हमें निकट भविष्य की कम, दूरस्थ भविष्य की संरचना सजानी होगी। दूरस्थ भविष्य, जिसमें लाखों की संख्या में साहित्यकार होंगे, करोड़ों की संख्या में पाठक होंगे, सैकड़ों की संख्या में विषय होंगे, विषयवस्तु इतनी स्तरीय कि उन पर शोधकार्य किया जा सके। यदि वह दूरस्थ भविष्य पाना है तो ब्लॉग के माध्यम को न केवल स्वीकारना होगा वरन उसके हर पक्ष को सशक्त करना होगा। यह महतकर्म वैयक्तिक स्तर पर संभव नहीं है, इसमें संस्थागत प्रयास लगेंगे, और इन प्रयासों को कोई नाम देना हो तो उसे सांस्थानिक समर्थन कहा जायेगा। वर्धा में भी सांस्थानिक समर्थन पर प्रारम्भिक चर्चा हुयी थी।

हिन्दी के साथ दुर्भाग्य यह रहा है कि उसे प्रेम तो व्यापक मिला है, सदा मिला है, भावनात्मक मिला है। किन्तु जो ढाँचा विस्तार और विकास के लिये तैयार होना था, उसे यह मान कर प्रमुखता नहीं दी गयी कि जब इतने बोलने वाले हैं तो स्वतः ही यह भाषा विकसित हो चलेगी। ऐसा पर है नहीं, यदि ऐसा होता तो दशा चिन्तनीय न होती। मेरा यह स्थिर विचार है कि बिना सांस्थानिक ढाँचे के हिन्दी अपने सुदृढ़ व सुगढ़ आकार में नहीं आ सकती है। पारम्परिक ढाँचे पारम्परिक माध्यमों के लिये तो ठीक थे पर ब्लॉग के प्रवाह को सम्हालने के लिये एक विशेष और सुव्यवस्थित ढाँचा चाहिये, एक ढाँचा जो कई दिशाओं से आने वाले महत प्रवाह को अपने में समेट सके।

शत द्वार हमारे घर में हों
हिन्दी ब्लॉग का सौभाग्य यह भी है कि इसमें न जाने कितनी दिशाओं से लोग आ रहे हैं। अभिव्यक्ति की क्षमता हर ओर छिटकी है, यही नहीं पाठक भी नये विषयों को पढ़ना चाहता है, अपना ज्ञानवर्धन विभिन्न विमाओं में ले जाना चाहता है। सोचिये कितना ही अच्छा होगा कि कोई वैज्ञानिक अपने विषय की विशेष विमा ब्लॉगिंग के माध्यम से व्यक्त करेगा, कितना ही अच्छा होगा कि कोई खिलाड़ी, कोई घुमक्कड़, कोई प्रशासक, कोई संगीतज्ञ ब्लॉग के माध्यम का आधार लेकर पाठक के लिये नयापन लेकर आयेगा। यही नहीं ब्लॉगिंग सीखने का भी माध्यम बनकर उभर रहा है। लोगों का इस प्रकार जुटना सबके लिये लाभप्रद रहेगा।   

हमें न केवल नये विषयों को समाहित करना है, वरन उनको विस्तारित और गुणवत्तापूर्ण करने के लिये भी करने के लिये प्रेरित करना है। केवल साहित्य तक ही केन्द्रित न रह जाये हिन्दी का विस्तार, ज्ञान के सभी नये क्षेत्रों को समझने और व्यक्त करने की क्षमता हो हिन्दी में। इसके लिये ब्लॉग सा माध्यम सहज ही मिला जा रहा हो तो उसे छोड़ना नहीं चाहिये, वरन त्वरित अपनाना चाहिये।

हमने जिस स्तर पर सफलता को पूजा है, उसे जितना मान दिया है, उसका शतांश भी यदि संघर्ष और असफलता के ऊपर  खपाया होता तो हमारे पास प्रतिभाओं का समुद्र होता। सांस्थानिक समर्थन न केवल सफलता को उभारेगी वरन संघर्ष को सहलायेगी और असफलता को पुनः उठ खड़ा होने के लिये प्रेरित भी करेगी। हमें सफल तो दिखते हैं पर असफल नहीं। यह उपक्रम सफल की चर्चा का न होकर उस असफलता के विश्लेषण का हो जिसके माध्यम से लाखों को जोड़ा जा सके।

कभी कभी सांस्थानिक समर्थन के नाम पर बड़े और सक्षम संस्थान एक लाठी का सहारा टिका कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। इस बात में संशय न हो कि प्रभाव प्रयास से लेशमात्र भी अधिक नहीं होगा। व्यापक प्रभाव की अपेक्षा है तो प्रयास भी वृहद हों। ऐसा नहीं है कि कोई आधार ही उपस्थित नहीं है, पर जो है वह निश्चय ही अपर्याप्त और अस्थिर है।

आने वाली कड़ियों में इस बात की चर्चा करेंगे कि सांस्थानिक समर्थन का आकार, आधार और रूपरेखा क्या हो। यह विषय हम सबको न केवल प्रिय है वरन हमारी ब्लॉगिंग के भविष्य की रीढ़ भी है। चलें, अपनी राह समझने के क्रम में थोड़ा और चलें।

20.3.13

गूगलम् - इदं न मम्

पिछला सप्ताह गूगल के नाम रहा। वैसे तो गूगल का मान कम न था हमारे जीवन में, कई रूपों में उपयोग करते हैं और आगे भी संभवतः करते ही रहेंगे। जीमेल, रीडर और ब्लॉगर, इन तीनों उत्पाद के सहारे इण्टरनेट के समाचार रखते हैं और जितनी संभव हो, उपस्थिति भी बनाये रखते हैं। सब सहज ही चल रहा था, जीवन अपनी लय में मगन था, पर पिछले सप्ताह के घटनाक्रम ने पहली बार इस बात का बलात अनुभव कराया है कि गूगल कितना प्रभाव रखता है, हम सबके जीवन में। यदि गूगल तनिक व्यवसायीमना हो जाये तो हम सबकी क्या दुर्गति हो सकती है, इसकी अनुभूति पहली बार ही हुयी।

एक दिन सुबह उठा तो देखा कि गूगल रीडर में एक सूचना थी कि १ जुलाई २०१३ से गूगल रीडर की सेवायें बन्द हो जायेंगी। मन धक से रह गया, दो विचार आये, पहला कि अब मेरा क्या होगा और दूसरा कि गूगल ने ऐसा क्यों किया? गूगल के बारे में तो बाद में भी सोचा जा सकता था, पर अपने लगभग ६०० से भी अधिक फीड्स की चिन्ता होने लगी कि अब कैसे पढ़ने को मिलेगा ब्लॉगजगत का लेखन। जितने भी ब्लॉगों पर टिप्पणियाँ करता हूँ और जिन पर नहीं कर पाता हूँ, सारे गूगल रीडर के द्वारा ही पढ़ता हूँ। सुविधानुसार पढने के लिये एक अलग स्थान रहता है। जब समय रहता है, मोबाइल में भी पढ़ कर टिप्पणी दे देता हूँ। साथ ही साथ ईमेल में सब्स्क्राइब न करने से ईमेल भी खाली रहता है। गूगल की इस घोषणा से लगा कि कहीं कुछ ढह रहा है और दोषी गूगलजी हैं। थोड़ा विचार और किया तो पाया कि तथ्य कुछ और ही थे। गूगल की कार्यपद्धति तनिक स्पष्ट रूप से समझनी होगी और वे तथ्य भी जानने होंगे जिसके कारण ये सेवायें बन्द हो रही हैं।

जब गूगल ने अक्टूबर १२ में फीडबर्नर की एपीआई बन्द कर दी तो उससे संबंधित गूगर रीडर में होने वाले प्रचार भी बन्द हो गये थे। उसके पहले गूगल रीडर की हर फीड के पहले या बाद में विषय से संबंधित कोई न कोई प्रचार रहता था। प्रचार से होने वाली आय ही गूगल रीडर को जीवित रखे थी। ५ माह पहले प्रचार बन्द हो गये तो संकेत मिल गया था कि अब गूगल रीडर भी बन्द होने वाला है। प्रचार का व्यवधान भले ही हमारा ध्यान बँटाता है पर वही रीडर का प्राण भी था। संभवतः गूगल रीडर के लिये वह मॉडल आर्थिक रूप से हानिप्रद हो, पर गूगल खोज, जीमेल, यूट्यूब और ब्लॉगर में होने वाले प्रचार ही गूगल की आय को साधन हैं। प्रचार उद्योग में माध्यम की पहुँच और उपभोक्ता से संबंधित जानकारी सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है और दोनों ही गूगल के पास अधिकतम मात्रा में है भी।

तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि जितनी भी निशुल्क सेवायें चल रही हैं, उनका भी अन्त गूगलरीडर की तरह हो सकता है। पाठक वर्ग के लिये ब्लॉगर और जीमेल ही मुख्य सेवायें हैं और उन पर विचार आवश्यक है। इस तथ्य को समझना होगा कि गूगल परमार्थ में तो कार्य कर नहीं रहा है, उसका पूरा आधार सीधे प्रचार के आर्थिक पक्ष पर टिका है या उन उपभोक्ता संबंधी सूचनाओं पर टिका है जो आपने निशुल्क सेवा लेते समय गूगल को बता दी है। अब उसे किसी सेवा में उतना प्रचार न मिलता हो या आपके बारे में और आपकी स्पष्ट अभिरुचियों के बारे में सारी सूचनायें उन्हें प्राप्त हो गयी हों तो संभव है कि भविष्य में कोई निशुल्क सेवा समाप्त भी हो जाये। एण्ड्रॉयड और गूगल ग्लास जैसे क्षेत्र, जहाँ पर अधिक धन है और अधिक बौद्धिक क्षमताओं की आवश्यकता है, गूगल के लिये अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। ऐसे और कई क्षेत्रों का सशक्तीकरण निशुल्क सेवाओं को बन्द करके भी किया जा सकता है।

तो क्या भविष्य है, हम सबके लिये। हमें निशुल्क सेवाओं ने कभी सोचने के लिये बाध्य ही नहीं किया था अब तक। पहले गूगल रीडर के किये जाने वाले कार्यों और उपस्थित विकल्पों को समझ लें। हमें यदि कोई ऐसी साइट या ब्लॉग अच्छा लगता है तो हम चाहते हैं कि उसमें होने वाले बदलाव हमें सूचित किये जायें। यह सूचना या तो ईमेल के माध्यम से पायी जा सकती है या फीड रीडर के माध्यम से। फीडबर्नर जैसी सेवाओं के माध्यम से किसी भी साइट या ब्लॉग में होने वाले बदलाव को जाना जाता है और उन्हें एक जगह एकत्र किया जाता है। ऐसा ही संकलन का कार्य गूगल रीडर कर रहा था, अन्यथा अपने ६०० ब्लॉगों में होने वाले बदलावों के लिये ६०० साइट पर जाकर देखना पड़े तो वह किसी के लिये भी संभव नहीं है।

किसी भी ब्लॉग को इस विधि से पढ़ने के लिये हमें दो सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है, फीड का पता लगाने के लिये फीडबर्नर जैसी सेवायें और संकलन कर पढ़ने के लिये गूगल रीडर जैसी सेवायें। याद रहे कि फीडबर्नर भी गूगल के अधिकार में है और बहुत संभव है कि भविष्य में उसकी भी सेवायें बन्द हो जायें। यदि विकल्प ढूढ़ना है तो अभी से ही दोनों का विकल्प ढूढ़ना चाहिये, न कि केवल गूगल रीडर का। जो लोग इस सुविधा में पड़े हैं कि हमारे पास तो ईमेल आ जाता है, उन्हें भी सोचना होगा। संभव है कि भविष्य में कुछ और पैसा बचाने के लिये हर ब्लॉग से संबंधित सैकड़ों निशुल्क ईमेल करने से भी गूगल मना कर दे। तब हम पूर्ण रूप से असहाय होंगे और हिन्दी के विकास के स्वप्न, जो हम बड़ी मात्रा में पाल चुके हैं, उन पर भी व्यवहारिक चिन्तन का समय आ जायेगा। अभी कई अलग प्रतीत होने वाली सेवायें गूगल रीडर के संकलन को ही नये रूप में प्रस्तुत करती आयीं हैं, गूगल रीडर बन्द होने के बाद क्या वे स्वतन्त्र रूप से कार्य कर पायेंगी यह तथ्य भी विकल्पों पर निर्णय लेने के समय उपयोगी होगा।

संभव है कि अभी कोई उपाय मिल जाये जो कुछ वर्ष हमें और खींच ले। प्रवाह रुक जाने का विचार भी पीड़ा में तिक्त होगा, उस पर सोचना भी नहीं है, उत्तर तो निकालने ही होंगे। यह भी हो सकता है कि आने वाली सेवायें सशुल्क भी हो जायें, फिर भी एक निर्भरता तो बनी ही रहेगी गूगल और अन्य तन्त्रों पर। क्यों न हिन्दी के लिये हम एक ऐसा स्थानीय आधार निर्माण करें जो हमारी आवश्यकताओं को निभाने में सक्षम हो, जिसके तले न केवल सारे ब्लॉग आ जायें वरन हिन्दी के और पक्ष भी पल्लवित हों। कविताकोष, गद्यकोष, शब्दकोष आदि के साथ एक विस्तृत आधार मिले। कठिनाईयों में ही संभावनाओं के बीज बसते हैं। प्रयास करें, भले ही उसकी सेवायें सशुल्क हो। भविष्य में धन उतना ही व्यय होगा पर हिन्दी के विकास के लिये हमें कभी औरों का मुँह न ताकना पड़ेगा। सोचिये आप भी, हम भी तीन माह के लिये सोचते हैं। विकल्पों पर प्रयोग कर रहे हैं, निष्कर्ष अवश्य बतायेंगे।

19.10.11

आनन्द मनाओ हिन्दी री

पिछला एक माह परिवर्तन का माह रहा है मेरे लिये, स्वनिर्मित आवरणों से बाहर आकर कुछ नया स्वीकार करने का समय। स्थिरता की अकुलाहट परिवर्तन का संकेत है पर बिना चरम पर पहुँचे उस अकुलाहट में वह शक्ति नहीं होती जो परिवर्तन को स्थिर रख सके, अगली अकुलाहट तक। मन संतुष्ट नहीं रहता है, सदा ही परिवर्तनशील, सदा उसकी सुनेगे तो भटक जायेंगे, अकुलाहट तक तो रुकना होगा। विकल्प की उपस्थिति, उसकी आवश्यकता और उसे स्वयं में समाहित कर पाने की क्षमता परिवर्तन के संकेत हैं, यदि वे संकेत मिलने लगें तो आवरण हटा कर बाहर आया जा सकता है।

एक माह पहले मैक पर जाने के बाद से समय बड़ा गतिशील रहा है, पहले मेरे लिये, फिर एप्पल के लिये और अब हिन्दी के लिये। नये परिवेश को समझने के साथ साथ प्रशासनिक व साहित्यिक गतिशीलता बनाये रखना कहीं अधिक ऊर्जा माँगती है। आत्मीयों का प्रयाण, पहले हिमांशुजी, फिर स्टीव जॉब, मन को विचलित और दृष्टि को दार्शनिक रखने वाली घटनायें थीं। नये एप्पल आईफोन के साथ में आईओएस५ और आईक्लाउड का आगमन नयी संभावनाओं से पूर्ण था, पिछला सप्ताह उन संभावनाओं को खोजने और उस पर आधारित कार्यशैली की रूपरेखा बनाने में निकल गया।

ऐसा नहीं है कि एप्पल हर कार्य को सबसे पहले कर लेने हड़बड़ी में रहता हो, यद्यपि कई नयी तकनीकों व उत्पादों का श्रेय उसे जाता है। जिस बात के लिये उसे निश्चयात्मक श्रेय मिलना चाहिये, वह है उसकी अनुकरणीय गुणवत्ता और उत्पादों को सरलतम और गहनतम बना देने का विश्वास। मैकिन्टॉस, आईपॉड, आईफोन, आईपैड, मैकबुकएयर, सब के सब अपने क्षेत्रों के अनुकरणीय मानक हैं। आईओएस५ और आईक्लाउड के माध्यम से वही कार्य क्लॉउड कम्प्यूटिंग के क्षेत्र में भी किया गया है। आईओएस५ में अन्य तत्वों के अतिरिक्त आईक्लाउड ऐसा तत्व है जो क्लॉउड कम्प्यूटिंग के आगामी मानक तय करेगा।

क्लॉउड कम्प्यूटिंग अपनी सूचनाओं और प्रोग्रामों को इण्टरनेट पर रखने व वहीं से सम्पादित करने का नाम है। मूलतः दो लाभ हैं इसके, पहला तो आपकी सूचनायें सुरक्षित रहती हैं, इण्टरनेट पर जो कि आप कहीं से भी देख सकते हैं और साझा कर सकते हैं। दूसरा लाभ उन लोगों के लिये है जो मोबाइल और कम्प्यूटर, दोनों पर सहजता से कार्य करते हैं और उन्हें दोनों के ही बीच एक सततता की आवश्यकता होती है। कई स्थूल विधियाँ हैं, या तो आप याद रखें कि कहाँ पर क्या सहेजा है और उसे हर बार विभक्तता से प्रारम्भ करें, या आप अपना सारा कार्य बस इण्टरनेट पर ही निपटायें, या एक पेन ड्राइव के माध्यम से अपनी सूचनायें स्थानान्तरित करते रहें। उपरोक्त विधियाँ आपका कार्य तो कर देंगी पर अनावश्यक ऊर्जा भी निचोड़ लेंगी।

अब आईक्लाउड की सूक्ष्म प्रक्रिया देखिये, मैं अपने आईपॉड में एक अनुस्मारक लगाता हूँ, वाहन में, कार्यालय आते समय। कार्यालय आकर बैठकों में व्यस्त हो जाता हूँ, आकर लैपटॉप पर देखता हूँ, तो वही अनुस्मारक उपस्थित रहता है उसमें। सायं बैठकर बारिश में कविता की कुछ पंक्तियाँ लिखता हूँ लैपटॉप पर, अगली सुबह एयरपोर्ट जाते समय झमाझम होती बारिश में आधी पंक्तियों को पूरी करने की प्रेरणा मिलती है, आईपॉड पर स्वतः आ चुकी कविता पर लिखना प्रारम्भ कर देता हूँ। जितनी सूक्ष्मता से सततता बनी रहती है, उतनी ही विधि की गुणवत्ता होती है। प्रयोग कर के देखा, एक अनुस्मारक को मोबाइल से लैपटॉप पर पहुँचने में केवल १६ सेकण्ड लगे, अविश्वसनीय!

आईक्लाउड मेरे लिये संभवतः अर्धोपयोगी ही रहता यदि आईओएस५ में हिन्दी न आती। हिन्दी कीबोर्ड, अन्तर्निहित शब्दकोष और आईक्लाउड ने मेरी मैकबुक एयर और मेरे आईपॉड में न केवल प्रेरणात्मक ऊर्जा भर दी वरन उनको सृजनात्मकता से अन्तर्बद्ध कर दिया है। अब न कभी कोई विचार छूट पायेगा कहीं, कोई प्रयास न व्यर्थ जायेगा कहीं, बनी रहेगी उत्पादक सततता सभी अवयवों के बीच। आपने यदि अब तक अनुमान लगा लिया हो कि यह नया आईफोन खरीदने की बौद्धिक प्रस्तावना बनायी जा रही है, तो आप मेधा अब तक गतिशील है।

आईफोन की उमड़ती इच्छाओं के अब चाहें जो भी निष्कर्ष हों, पर हिन्दी लेखन के लिये निसन्देह एक उत्सवीय क्षण आया है, वह भी इतनी प्रतीक्षा के पश्चात, भरपूर प्रसन्न होने के लिये, मुदित हो मगन होने के लिये।

आनन्द मनाओ हिन्दी री..

7.9.11

हिन्दी उत्थान और सहजता

घर में 'सब' चैनल के कार्यक्रम अधिक चलते हैं, हल्के फुल्के रहते हैं, परिवार के साथ बैठ कर देखे जा सकते हैं, बच्चों को भी सुहाते हैं, भारतीय परिवेश की सामान्य जीवनशैली पर आधारित होते हैं, स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करते हैं और कृत्रिमता से कोसों दूर होते हैं। मनोरंजन का अर्थ ही है कि आपके मन के कोमल भावों को गुदगुदाया जाये, कभी किसी परिस्थिति द्वारा, कभी किसी चरित्र के हाव भाव द्वारा, कभी किसी उहापोह से, कभी हास्य से, कभी बलवती आशाओं से, कभी क्षणिक निराशाओं से।

हो सकता है कि कभी हास्य का कोई रूप आपको थोड़ा हीन लगे पर संदर्भों के प्रवाह में वह भी मनोरंजन बनकर बह जाता हो, बिना कोई विशेष क्षोभ उत्पन्न किये हुये। ऐसा ही कुछ मुझे भी खटकता है, सामान्य हास्य नहीं लगता है। कुछ धारावाहिकों में एक ऐसा चरित्र दिखाया जाता है जो बड़ी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी बोलता है, छोटी बातों को भारी भरकम शब्दों से व्यक्त करता है, औरों को वह समझ में नहीं आता है, तब कोई समझदार सा लगने वाला चरित्र उसे सरल हिन्दी या अंग्रेजी में बता देता है, अन्य हँस देते हैं। आपके सामने वह हास्य और विनोद समझ कर परोस दिया जाता है।

धीरे धीरे यह धारणा बनायी जा रही है कि हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो संवाद और संप्रेषण योग्य नहीं है, जो वैज्ञानिक नहीं है, जो आधुनिक नहीं हैं। किसी तार्किक आधार की अनुपस्थिति में भी यह हल्का सा लगने वाला परिहास ही उस धारणा को स्थायी रूप देने लगता है। 

सरल भव, सहज भव
अति उत्साही हिन्दी-बुद्धिजीवियों को अपने संश्लिष्ट ज्ञान से हिन्दी को पीड़ा पहुँचाते हुये देखता हूँ, सरल से शब्दों को क्लिष्टता के आवरण से ढाँकते हुये देखता हूँ, शब्दों के अन्दर ही क्रियात्मकता और इतिहास ठूँस देने का प्रयास करते हुये देखता हूँ। उपर्युक्त कारणों से जब हिन्दी का मजाक उड़ाया जाता है, तो क्रोध भी आता है और दुख भी होता है। क्रिकेट और रेलगाड़ी जैसे सरल शब्दों पर किये गये अनुप्रयोग इस मूढ़ता के जीवन्त उदाहरण हैं, समझ में नहीं आता है कि वे भाषा का भला कर रहे हैं या उपहास कर रहे हैं। आप ही बताईये कि 'माइक्रोसॉफ्ट' को हिन्दी में 'अतिनरम' क्यों लिखा जाये?

अगली बार इस तरह की मूढ़ता सुने तो विरोध अवश्य करे और प्रयास कर उन्हें सही शब्द भी बतायें। जो अवधारणायें नयी हैं, उनसे सम्बद्ध शब्द अन्य भाषाओं से लेते रहना चाहिये, उन अवधारणाओं के स्थानीय विकास के लिये। अंग्रेजी भी तो न जाने कितनी भाषाओं के शब्दों से भरी पड़ी है। बिना हलचल भाषाओं को भी स्वास्थ्य प्राप्त ही नहीं हो सकता, सजा कर रख दीजिये किसी जीवित प्राणी कोकुछ ही दिनों में कृशकाय हो जायेगा। हम अपनी माँदों से बाहर निकलेंप्रयोगों के खेल खेलेंनये शब्दों के खेल खेलेंसरलता आयेगी भाषा में, जनप्रियता आयेगी भाषा में, संभवतः वही भाषा का स्वास्थ्य भी होगा।

यह भी उचित नहीं होगा कि जिसका जैसा मन हो वह हिन्दी में अनुप्रयोग करे और हिन्दी में जो शब्द प्रचलित है उन्हें भी अन्य भाषाओं से बदल दे। अपनी तिजोरी देखने के पहले औरों से भीख माँगने की आदत, जो कई अन्य क्षेत्रों में है, हिन्दी में न लायी जाये। जिस देश में 12% जन भी अंग्रेजी नहीं समझते हैं, उन्हें नये अंग्रेजी शब्द याद कराने से अधिक सरल होगा उपस्थित हिन्दी शब्दों को अधिक उपयोग में लाना। जब अन्य भारतीय भाषाओं में उन शब्दों का प्रयोग हो रहा हो तो अंग्रेजी शब्द आयातित करना बौद्धिक भ्रष्टाचार सा लगता है। कई तथाकथित प्रबुद्ध हिन्दी समाचार पत्र इस प्रवृत्ति के पोषक बने हुये हैं।

हो सकता है कि हिन्दी उत्थान पर यह पोस्ट आपको उपदेशात्मक लगे, हिन्दी जैसे व्यक्तिगत विषयों पर टीका टिप्पणी करने जैसी लगे, क्रोध भी आये, पर इस पर विचार अवश्य हो कि क्या हिन्दी भाषा इस प्रकार के हास्य का विषय हो सकती है?

चित्र साभार - lalitdotcom.blogspot.com

13.11.10

भाषायी उत्पात और अंग्रेजी बंदर

Vishwanath in 2008
श्री विश्वनाथजी
पूर्वज तमिलनाडु से केरल गये, पिता महाराष्ट्र में, शिक्षा राजस्थान में, नौकरी पहले बिहार में शेष कर्नाटक में, निजी व्यवसाय अंग्रेजी में और ब्लॉगिंग हिन्दी में। पालक्काड तमिल, मलयालम, मराठी, कन्नड, हिन्दी और अंग्रेजी। कोई पहेली नहीं है पर आश्चर्य अवश्य है। आप सब उन्हें जानते भी हैं, श्री विश्वनाथजी। जहाँ भाषायी समस्या पर कोई भी चर्चा मात्र दस मिनट में धुँआ छोड़ देती हो, इस व्यक्तित्व को आप क्या नाम देंगे? निश्चय ही भारतीयता कहेंगे।

पर कितने भारतीय ऐसे हैं, जो स्वतः ही श्री विश्वनाथजी जैसे भाषाविद बनना चाहेंगे? बिना परिस्थितियों के संभवतः कोई भी नहीं। दूसरी भाषा भी जबरिया सिखायी जाती है हम सबको। जब इस भारतीयता के भाषायी स्वरूप को काढ़ा बनाकर पिलाने की तैयारी की जाती है, आरोपित भाषा नीति के माध्यम से, देश के अधिनायकों द्वारा, राजनैतिक दल बन जाते हैं, विष वमन प्रारम्भ हो जाता है, भाषायी उत्पात मचता है और पूरी रोटी हजम कर जाता है, अंग्रेजी बंदर।

पिछले एक वर्ष से कन्नड़ सीख रहा हूँ, गति बहुत धीमी है, कारण अंग्रेजी का पूर्व ज्ञान। दो दिन पहले बाल कटवाने गया था, एक युवक जो 2 माह पूर्व फैजाबाद से वहाँ आया था, कामचलाऊ कन्नड़ बोल रहा था। वहीं दूसरी ओर एक स्थानीय युवक जिसने मेरे बाल काटे, समझने योग्य हिन्दी में मुझसे बतिया रहा था।

कार्यालय में प्रशासनिक कार्य तो अंग्रेजी में निपटाना पड़ता है पर आगन्तुक स्थानीय निवासियों से दो शब्द कन्नड़ के बोलते ही जो भाषायी और भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित होता है, समस्याओं के समाधान में संजीवनी का कार्य करता है। अंग्रेजी में वह आत्मीयता कहाँ? सार्वजनिक सभाओं में मंत्री जी के व अन्य भाषणों में केवल शब्दों को पकड़ता हूँ, पूरा भाव स्पष्ट सा बिछ जाता है मस्तिष्क-पटल पर। एक प्रशासनिक सेवा के मित्र ने मेरी इस योग्यता की व्याख्या करते हुये बताया कि कन्नड़ और संस्कृत में लगभग 85% समानता है, कहीं कोई शब्द न सूझे तो संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग कर दें। किया भी, नीर, औषधि आदि।

तेजाब फिल्म के एक गाने 'एक दो तीन चार....' ने पूरे दक्षिण भारत को 13 तक की गिनती सिखा दी। अमिताभ बच्चन की फिल्मों का चाव यहाँ सर चढ़कर बोलता है। यहाँ के मुस्लिमों की दक्खिणी हिन्दी बहुत लाभदायक होती है, नवागुन्तकों को। भाषायी वृक्ष भावानात्मक सम्बन्धों से पल्लवित होते दिखा हर ओर, धीरे धीरे। इस वृक्ष को पल्लवित होते रहने दें, बिना किसी सरकारी आरोपण के, भाषायी फल मधुरतम खिलेंगे।

प्रश्न उठता है कि तब प्रशासनिक कार्य कैसे होंगे, विज्ञान कैसे बढ़ेगा? आईये गूगल का उदाहरण देखें, हर भाषा को समाहित कर रखा है अपने में, किसी भी साइट को आप अपनी भाषा में देख सकते हैं, भले ही टूटी फूटी क्यों न हो, अर्थ संप्रेषण तो हो ही जाता है। राज्यों को अपना सारा राजकीय कार्य स्थानीय भाषा में ही करने दिया जाये। इससे आमजन की पहुँच और विश्वास, दोनों ही बढ़ेगा, प्रशासन पर। प्रादेशिक सम्बन्धों के विषय जो कि कुल कार्य का 5% भी नहीं होता है, या तो कम्प्यूटरीकरण से अनुवाद कर किया जाये या अनुवादकों की सहायता से। तकनीक उपस्थित है तो जनमानस पर अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा का बोझ क्यों लादा जाये।

त्रिभाषायी समाधान का बौद्धिक अन्धापन, बच्चों पर लादी गयी अब तक की क्रूरतम विधा होगी। भाषा का माध्यम स्थानीय हो, सारा ज्ञान उसमें ही दिया जाये। अपने बच्चों को हिन्दी अंग्रेजी अनुवाद के दलदल में नित्य जूझते देखता हूँ तो कल्पना करता हूँ कि विषयों के मौलिक ज्ञान के समतल में कब तक आ पायेगें देश के कर्णधार। विश्व का ज्ञान उसके अंग्रेजी अर्थ तक सिमट कर रह गया है। एक बार समझ विकसित होने पर आवश्यकतानुसार अंग्रेजी सहित किसी भी भाषा का ज्ञान दिया जा सकता है। भविष्य में आवश्यकता उसकी भी नहीं पड़नी चाहिये यदि हम मात्र वैज्ञानिक शब्दकोष ही सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा संस्कृत में विकसित कर लें।

भाषायी उत्पात पर व्यर्थ हुयी ऊर्जा को देश के विकास व अपनी भाषायी संस्कृति हेतु तो बचाकर रखना ही होगा। 


भाषा है तो हम हैं।