30.7.14

हमको तो तुम भा जाते हो

जीवन-जल को वाष्प बना कर,
बादल बन कर छा जाते हो ।
रहो कहीं भी छिपे छिपे से,
हमको तो तुम भा जाते हो ।।

अस्तित्वों के युद्ध कभी, निर्मम होकर हमने जीते थे,
हृदय-कक्ष फिर भी जीवन के, आत्म-दग्ध सूने, रीते थे ।
सुप्त हृदय में, सुख तरंग का, स्पन्दन तुम दे जाते हो ।
रहो कहीं भी छिपे छिपे से, हमको तो तुम भा जाते हो ।।१।।

समय कहाँ था, जीवन का जो, लुप्त हुआ सौन्दर्य बढ़ाते,
कैसे शुष्कित सम्बन्धों से, जीवन में सुख लेकर आते ।
त्यक्त, प्रतीक्षित फुलवारी में, सुन्दर पुष्प खिला जाते हो ।
रहो कहीं भी छिपे छिपे से, हमको तो तुम भा जाते हो ।।२।।

अभी प्राप्त जो धन, गरिमा है, कहाँ हमारे साथ रहेगी,
आशाआें की डोर कहाँ तक, स्वार्थ-पूर्ति के वार सहेगी ।
जहाँ साथ सब छोड़ गये, तुम चित-परिचित से आ जाते हो ।
रहो कहीं भी छिपे छिपे से, हमको तो तुम भा जाते हो ।।३।।

26.7.14

यादें

हैं अभी तक शेष यादें ।

सोचता सब कुछ भुला दूँ,
अग्नि यह भीषण मिटा दूँ ।
किन्तु ये जीवित तृषायें,
शान्त जब सारी दिशायें,
रूप दानव सा ग्रहण कर,
चीखतीं अनगिनत यादें ।।

कभी स्थिर हो विचारा,
शमित कर दूँ वेग सारा ।
किन्तु जब भी कोशिशें की,
भड़कती हैं और यादें ।।

23.7.14

रंग कहाँ से लाऊँ

तेरे जीवन को बहलाने,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ?
कैसे तेरा रूप सजाऊँ ?

नहीं सूझते विषय लुप्त हैं,
जागृत थे जो स्वप्न, सुप्त हैं,
कैसे मन के भाव जगाऊँ,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ।।१।।

बिखर गये जो सूत्रबद्ध थे,
अनुपस्थित हो गये शब्द वे,
कैसे तुझ पर छन्द बनाऊँ,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ।।२।।

अस्थिर है मन भाग रहा है,
तुझ पर जो अनुराग रहा है,
कैसे फिर से उसे जगाऊँ,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ।।३।।

जीवन में कुछ खुशियाँ लाने,
तुझको अपना हाल बताने,
तेरे पास कहाँ से आऊँ,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ।।४।।

19.7.14

प्रेम और प्राप्ति

स्वतः तृप्ति है, प्रेम शब्द में प्यास नहीं है,
मात्र कर्म है, फल की कोई आस नहीं है,
प्रेम साम्य है, कभी कोई आराध्य नहीं है,
सदा मुक्त है, अधिकारों को साध्य नहीं है ।

यदि कभी भी प्रेम का विन्यास लभ हो जटिलता को,
सत्य मानो प्राप्ति की इच्छा जगी है, अनबुझी है ।
प्राप्ति का उद्योग यूँ ही मधुरता को जकड़ता है,
प्रेम तो उन्मुक्तता है, व्यथा शासित तम नहीं है ।।

प्रेम का निष्कर्ष सुख है,
वेदना का विष नहीं है ।
अमरता का वर मिला है,
काल से शापित नहीं है ।।

16.7.14

है अभी दिन शेष अर्जुन

है अभी दिन शेष अर्जुन,
लक्ष्य कर संधान अर्जुन ।

सूर्य भी डूबा नहीं है,
शत्रु भी तेरा यहीं है,
शौर्य के दीपक जला दे, विजय की हुंकार भी सुन ।
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।१।।

सही की चाहे गलत की,
पार्थ तुमने प्रतिज्ञा की,
अगर निश्चय कर लिया तो, लक्ष्य का एक मार्ग भी चुन ।
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।२।।

व्यर्थ का नैराश्य तजकर,
असीमित आवेश भरकर,
करो तर्पित सिन्धु भ्रम के, व्यथाआें के तार मत बुन ।
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।३।।

सूर्य मेघों में छिपा था,
काल तेरे हित रुका था,
जीवनी जब तक रहेगी, रहेगा दिन शेष अर्जुन ।
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।४।।

12.7.14

क्या नियत हो?


ध्येय जीवन का नियत करना स्वयं,
और यह भी नियत करना,
ध्येय में बँध कर रहूँ,
या रहूँ उन्मुक्त सा।

पैर धरती पर बँधे हों,
या गगन को छू सकें, वो पंख हो,
बँधा जीवन आश्रितों की राह में,
या जगत से मौन हो अभिव्यक्तियाँ। 

9.7.14

तुम्हारा परिचय


व्यथा से मुक्त, तेज से पूर्ण,
विजय से मुखमंडल उद्दीप्त ।
नेत्र में अंधकार असहाय,
निश्चय ज्वाला जले प्रदीप्त ।।१।।

भुजायें महाबली उद्दात्त,
कार्य में सकल ओर विस्तीर्ण ।
समय की तालों पर झंकार,
सफलता नाचे सुखद असीम ।।२।।

सदा ही अनुपेक्षित व्यक्तित्व,
विचारों में मेधा का शौर्य ।
वाक्‌ में मधुरस के उद्गार,
तर्कों में अकाट्य सिरमौर्य ।।३।।        

तुम्हारी चाल गजों सी मस्त,
शिराओं में सिंहों का वेग ।
क्रोध में मेघों का गर्जन,
सदा ही स्थिर रहे विवेक ।।४।।

सदा ही प्रेम सुधा से पूर्ण,
तुम्हारे हृदयों के आगार ।
लुटाते रहते सुख की धार,
न जाने क्या होता व्यापार ।।५।।

प्रश्नों का विस्तृत उत्तर,
तुम्हारे जीवन का हर कार्य ।
व्यथा के उन मोड़ों का तोड़,
जहाँ पर झुकना है अनिवार्य ।।६।।

5.7.14

आँखों के आँसू


विधि के हाथ रचे जीवन का, भार उठाये हाथों में,
आहों का उच्छ्‌वास रोककर, फूली, उखड़ी साँसों में ।
कष्ट हृदय-बल तोड़ रहा, रह शान्त वेदना सहते हैं,
आँखों से पर बह आँसू दो, कई और कहानी कहते हैं ।।१।।

है बाढ़, मड़ैया डूब रही, पुनिया शंकित, चुपचाप खड़ी,
बहता जाता जल वेगवान, कंपित मन, स्थिर हुये प्राण ।
भर आयीं पर आँखें रो रो, याद रहा, बस हुये वर्ष दो,
था निगल गया एक चक्रवात, मेरे नन्हे से कान्हू को ।।२।।

गंगू के खेतों में सूखा, आस वाष्पित, जीवन रूखा,
क्षुब्ध हृदय, विधि का प्रहार, देखे नभ, कोसे बार बार ।
तब जल आँखों में आयेगा, और प्रश्न यही कर जायेगा,
कैसे साहू का कर्ज पटा, बेटी का ब्याह रचायेगा ।।३।।

पुत्र शहीद हुआ सीमा पर, दुख में डूबे थे गंगाधर,
पुत्र गया था माता के हित, गर्वयुक्त था मन जो आहत ।
पर बेटे की सुध धुँधलाये, भीगी आँखें, कौन बताये,
कैसे बीते पुत्रवधू का, खड़ा शेष जीवन मुँह बाये ।।४।।

राधे तपता, जलता ज्वर में, अकुलाता रह रह अन्तर में,
तन की पीड़ा सब गयी भूल, उठता मन में एक प्रश्न-शूल ।
दृगजल बहता, कह जायेगा, यदि नहीं दिहाड़ी पायेगा,
कैसे कल चावल-भात बिना, बच्चों की भूख मिटायेगा ।।५।।

2.7.14

कल्पना


उत्कर्षों को छूती इच्छा,
मात्र कल्पना का आच्छादन ।
निष्कर्षों से शून्य धरातल,
जाने तुमसे क्या पाना है ?

बन्द नयन में मेरे तेरी,
छिपी हुयी है रूप-धरोहर ।
मन में तेरा पूरा चित्रण,
सच में लेकिन क्या जाना है ?

कभी बैठ एकान्त जगह,
तू हँसती है, मैं सुनता हूँ ।
इन स्वप्नों के अर्धसत्य को,
कब तक यूँ ही झुठलाना है ?

अथक कल्पना, अतुल समन्वय,
मन भावों की कोमल रचना ।
इस प्रतिमा में लेकिन जाने,
कैसा रंग चढ़ाना है ?

28.6.14

व्यर्थ ही

शान्त, तृप्त, कर्मालु, व्यवस्थित,
मन की मृगतृष्णा से दूर ।
ऐसा एक व्यक्तित्व जगा लूँ,
अब तो मेरा ध्येय यही है ।।१।।

व्यर्थ तृषा की बलिवेदी पर,
और समय का अर्पण करना ।
अन्त्य क्षुधा कर ले परिपूरित,
द्विजजन का सिद्धान्त यही है ।।२।।

व्यर्थ शब्द के मकर जाल मे,
जीवन का सारल्य फँसाना ।
शब्द-खोज तज अर्थ समझ ले,
न्यून श्रमेच्छुक मार्ग यही है ।।३।।

व्यर्थ कष्ट की आशंका से,
कर्म-पुण्य क्यों करूँ तिरोहित ।
स्वेद बिन्दु के उजले मोती,
जीवन का श्रृंगार यही है ।।४।।

व्यर्थ सुखों की अभिलाषा में,
अंधकूप में घुसते जाना ।
मदिरा का सुख छोड़ क्षणिक जो,
जीवन जल का पान सही है ।।५।।

24.6.14

अपेक्षा

दो खुशी के पल मिलें,
तो मुक्त हो बाँहें खिलें ।
सत्य है इन ही पलों के,
हेतु जीवन जी रहा है ।।१।।

अपेक्षित तो बहुत कुछ है,
दृष्टि में पर्याप्त सुख है ।
किन्तु यह निष्ठुर व्यवस्था,
भाग अपना माँगती है ।।२।।

क्यों नियम के शासनों में,
रूढ़ियों के तम घनों में ।
मुक्ति की उत्कट तृषा में,
घुट गयी स्वच्छन्दता है ।।३।।

शक्ति से है, दोष ऊर्जित,
अहम्‌ में सारल्य अर्पित ।
काल ही निर्णय करेगा,
लोक जिस पथ जा रहा है ।।४।।

व्यर्थ ही सब लड़ रहे हैं,
घट क्षुधा के भर रहे हैं ।
पर खुशी की पौध केवल,
प्रेम के जल की पिपासी ।।५।।

21.6.14

मन किससे बातें करता है

ना जानू मैं अन्तरतम में,
अवचेतन की सुप्त तहों में,
अनचीन्हा, अनजाना अब तक,
कौन छिपा सा रहता है ?
मन किससे बातें करता है ?

भले-बुरे का ज्ञान कराये,
असमंजस में राह दिखाये,
इस जीवन के निर्णय लेकर,
जो भविष्य-पथ रचता है ।
मन किससे बातें करता है ?

पीड़ा का आवेग, व्यग्रता,
भावों का उद्वेग उमड़ता,
भीषण आँधी, पर भूधर सा,
अचल, अवस्थित रहता है ।
मन किससे बातें करता है ?

निद्रा के एकान्त महल में,
चुपके से, हौले से आकर,
भावों की मनमानी क्रीड़ा,
स्वप्न-पटों से तकता है ।
मन किससे बातें करता है ?

17.6.14

फुटबाल, पिताजी, एक और पीढ़ी

जब क्रिकेट, बैडमिन्टन और स्वीमिंग नहीं करता था, तब भी फुटबॉल खेलता था। गृहनगर के स्टेडियम में फुटबॉल नियमित रूप से होती थी। उस समय अन्य खेल हम खिलाड़ियों को मँहगे पड़ जाते थे। फुटबॉल की व्यवस्था खेल अधिकारी कर देते थे और हम २२ खिलाड़ी संतुष्ट हो जाते थे। किस खेल में कौन अच्छा है, इस बात से खिलाड़ियों को क्या लेना देना। मनोरंजन और स्वास्थ्य फुटबॉल से बना रहता था, उसके बाद कोई भी खेल खिलवा लीजिये। संभवतः फुटबॉल का ही जीवन में यह योगदान रहा है कि शरीर अभी भी स्वस्थ है और अन्य खेल खेलने में सक्षम भी।

९० मिनट कैसे एक फुटबॉल के पीछे दौड़ते भागते निकल जाते थे? समय का पता ही नहीं चलता था, अँधेरा होता था, फुटबॉल दिखनी बन्द होती थी तब कहीं जाकर खेल बन्द होता था। एक फुफेरे भाई यूनीवर्सिटी के लिये खेलते थे, जब भी टूर्नामेन्ट खेल कर आते थे, उनकी १० नम्बर वाली शॉर्ट चिरौरी करके माँग लिया करता था। उसे पहनकर खेलने में मैराडोना जैसा अनुभव होता था। फुटबॉल पैरों में चिपके, न चिपके, दौड़ उसी गति से लगाते थे और कई बार गोल तक पहुँच जाने में सफल भी हो जाते थे। गर्मियों की छुट्टियों में दोपहर को लेटे लेटे इसी बात की प्रतीक्षा रहती थी कि कब सायं हो और कब खेलने निकलें। खेलने आने वालों की कभी कमी नहीं रहती थी, आज भी सबके नाम और चेहरे स्पष्ट रूप से याद हैं। भले ही सब अपने अपने व्यवसायों में व्यस्त हैं पर जब भी घर जाना होता है, फुटबॉल के उस समय की चर्चा अवश्य होती है। सबके मन में उस समय की विशेष स्मृतियाँ आज भी विद्यमान हैं।

मैदान अच्छा नहीं था और गिरने की स्थिति में खरोंच आदि नित्यरूप से लगती थीं। पैरों में सामने वाले के जूते से लगे कई घाव आज भी लगे हैं। कुहनी की चोट, पैर की मोच, गिरते समय कन्धे पर लगे झटके और घर पहुँच कर उन सब चोटों को माँ से छिपाने के लिये सामान्य दिखने का क्रम, उन स्मृतियों में एक विशेष अनुभूति आज भी हो आती है। मूक राणा सांगा बने रहते थे, डर लगा रहता था कि कहीं यह सब देख कर खेल बन्द न करवा दिया जाये। भले ही हम कितना अभिनय कर लें पर माँ को सब पता चल जाता था, यदि लँगड़ाना छिपा भी ले गये तो भी कई बार छोटा भाई ही पोल खोल देता था। चोट पर हल्दी चूने लेपना, हल्दी का दूध, रात की गाढ़ी नींद और अगले दिन फिर से खेलने के लिये शत प्रतिशत प्रस्तुत। फुटबॉल का उन्माद इस तरह व्यापा रहता था कि कहीं बाहर जाने के नाम पर भाँति भाँति के बहाने बनाने में दिन निकल जाता था।

१९८६ का समय था, उस वर्ष दसवीं बोर्ड की परीक्षा देकर गर्मी की छुट्टी पर घर आया था। १९८२ के एशियाड में टीवी लेने की पिताजी की इच्छा १९८६ में फलीभूत हुयी। अवसर था फुटबॉल के वर्ल्डकप का। मेरी उम्र १४ वर्ष की थी, पर फुटबॉल के प्रति उत्सुकता परिपूर्ण थी। पिताजी को भी बहुत रुचि थी, हमने साथ बैठ कर सारे मैच देखे थे। उसके बाद से आज तक कोई भी वर्ल्डकप छोड़ा नहीं है, यद्यपि हर बार स्थान बदलता रहा है। इस वर्ष बनारस में आने के बाद पिताजी के साथ बनारस में ही वर्ल्डकप देखने की योजना थी। पिताजी का स्वास्थ्य अचानक से बिगड़ा, कानपुर में ऑपरेशन कराना पड़ा। यद्यपि स्वास्थ्य लाभ कर सामान्य होने के पश्चात उनको बनारस में लेकर आयेंगे, पर उस बीच प्रथम सप्ताह के मैच साथ साथ देखने से छूट जायेंगे।

१९८६ में मैं १४ वर्ष का था, आज २८ वर्षों के बाद मेरा पुत्र १४ वर्षों का हो गया है। उसकी भी फुटबॉल में उतनी ही रुचि है, जितनी मेरी रही है। पिताजी के घर आने के बाद तीन पीढ़ियाँ एक साथ बैठकर मैच देखेंगी। पिताजी और पुत्रजी दोनों ही ब्रॉजील के समर्थक हैं, हमारा मन १९८६ से ही जर्मनी के साथ रहा है। अभी चार दिन के ही मैच निकले हैं, घर में उत्साह और उत्सुकता चरम पर है। बिटिया और श्रीमतीजी के कार्यक्रमों के समय पर पहला मैच आता है, उस समय थोड़ा जूझना पड़ता है, पर मैच देखने को मिल जाता है। शेष दो मैच देर रात में आते हैं, टाटा स्काई प्लस की कृपा से उनकी रिकॉर्डिंग हो जाती है, वे अगले दिन देख लिये जाते हैं। कोई बहुत ही महत्वपूर्ण मैच जिसमें रात भर की प्रतीक्षा करना संभव न हो, उसे रात में ही देखने की पूर्व और पूर्ण व्यवस्था कर ली जाती है। जो रिकॉर्डेड मैच अगले दिन देखें जाते हैं, उनके बारे में नियम बनाया हुआ है कि उनका निष्कर्ष क्या हुआ, न कोई इण्टरनेट पर देखेगा, न ही किसी को बतायेगा। 

याद है, ४ वर्ष पहले लगभग इसी समय अपना ब्लॉग प्रारम्भ किया था और फुटबॉल के ऊपर एक आलेख लिखा भी था। भारत में भले ही फुटबॉल को क्रिकेट जैसी लोकप्रियता न मिल पायी हो, पर मेरे मन में फुटबॉल आज भी प्रथम स्थान पर अवस्थित है। फुटबॉल देखना जितना रुचिकर है, खेलना उतना कठिन। खेला हूँ, इसलिये कह सकता हूँ कि किसी का खेल जितना सरल और प्राकृतिक दिखता है, उसके पीछे उतनी ही श्रम और समय लगा होता है। कोई खिलाड़ी किसी को पास देता है, पास दूसरे खिलाड़ियों के ठीक पैर पर पहुँचता है। दूसरा खिलाड़ी उसे बिना छिटकाये अपने नियन्त्रण में ले लेता है। तेज़ और ऊँचे पास तो नियन्त्रण की दृष्टि से और भी कठिन होते हैं।

आज भी प्रश्न तीन S का ही है, गति(Speed), सहनशक्ति(Stamina) और कुशलता(Skill़) । यूरोपीय टीमें गति और सहनशक्ति के लिये जानी जाती रही हैं, लैटिन अमेरिका की टीमें अपनी कुशलता के लिये विख्यात हैं। पिछले वर्ल्डकप में तो गति की जीत हुयी थी। इस वर्ल्डकप में यूरोपीय और लैटिन अमेरिका की खेल शैलियों का अन्तर सिमटता जा रहा है। छोटे पासों की गति और लम्बे पासों की सटीकता हर टीमों के द्वारा अपनायी जा रही हैं। जैसे जैसे वर्ल्डकप अपने पट खोलेगा, टीमों की तकनीक के बारे में और भी पता चलेगा।

हॉलैंड ने पिछले वर्ल्डकप फ़ाइनल में मिली हार का भरपूर बदला लिया है। अभी तक ११ मैच हो चुके हैं, विशेष तथ्य यह है कि सारे के सारे मैच निष्कर्षपूर्ण रहे हैं, कोई भी बराबरी पर नहीं छूटे हैं। आज जर्मनी और पुर्तगाल का मैच है, मेरा मन जर्मनी के साथ है, अब देखना है क्या होता है? मेरी २८ साल की वर्ल्डकपीय यात्रा में जर्मनी भले ही अधिक बार न जीता हो, पर उसने हर बार जान लगाकर खेल खेला है और खेल के स्तर को हर बार बढ़ाया है। जिस प्रकार से विश्व में फुटबॉल का वातावरण बना हुआ है, उससे फुटबॉल की लोकप्रियता का अनुमान हो जाता है। मन में दबी इच्छा तो यह भी है कि वर्ल्डकप में कभी मुझे अपने देश की टीम को देखने का अवसर मिले। तब सच कहता हूँ कि उसके आगे किसी और देश की तकनीक अच्छी नहीं लगेगी। इस बार तो जर्मनी के साथ हैं।