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13.12.14

कुछ निमन्त्रण

आज कुछ बरसात की बूँदें बरसती और हवा भी,
बह रही उन्मुक्त होकर और कोयल कूजती हैं,
औ’ मदित सा धुन्ध छाना चाहता निर्बाध होकर,
सरसता के इस समय में कमल-कोपल फूटती हैं ।

अब हृदय के द्वार में बजाते शहनाइयाँ है,
जो समय की बाट जोहे, थक गये थे चूर होकर ।

आज कविता बिन बँधे,
गाम्भीर्य की यादें भुला कर,
मस्त लहरों की तरह यूँ,
बहकना ही चाहती है ।

कभी जीवन की सुबह,
जो कल्पना की गोद में थी,
आज पाकर प्यार का,
संसार जीना चाहती है ।

आज यादों की सुनहरी शाम में,
मैने संजोये कुछ निमन्त्रण ।।

15.10.14

चला हूँ देर तक

चला हूँ देर तक, यादें बहुत सी छोड़ आया हूँ 
अनेकों बन्धनों को, राह ही में तोड़ आया हूँ ।। १।।

लगा था, साथ कोई चल रहा है, प्रेम में पाशित ।
अहं की भावना से दूर कोई सहज अनुरागित ।। २।।

लगा था, साथ तेरे जीवनी यूँ बीत जायेगी ।
मदों में तिक्त आशा, मधुर सा संगीत गायेगी ।। ३।।

लगा था, जब कभी भी दुख निमग्ना ज्वार आयेगें ।
तुम्हारे प्यार के अनुभाव सारे उमड़ जायेगें ।। ४।।

लगा था, राह लम्बी, यदि कभी सोना मैं चाहूँगा ।
कहीं निश्चिन्त मैं, तेरी सलोनी गोद पाऊँगा ।। ५।।

अकेला चल रहा था और सक्षम भी था चलने को ।
लगा कुछ और आवश्यक, अभी हृद पूर्ण करने को ।। ६।।

हुआ पर व्यर्थ का आश्रित, व्यर्थ मैं लड़खड़ाया हूँ ।
चला हूँ देर तक, यादें बहुत सी छोड़ आया हूँ ।। ७।।

26.7.14

यादें

हैं अभी तक शेष यादें 

सोचता सब कुछ भुला दूँ,
अग्नि यह भीषण मिटा दूँ 
किन्तु ये जीवित तृषायें,
शान्त जब सारी दिशायें,
रूप दानव सा ग्रहण कर,
चीखतीं अनगिनत यादें ।।

कभी स्थिर हो विचारा,
शमित कर दूँ वेग सारा 
किन्तु जब भी कोशिशें की,
भड़कती हैं और यादें ।।