आधुनिकता के प्रति सदा है उदार दृष्टिकोण रहा है, पर कैलोरी आधारित भोजन की गणना पर कभी विश्वास रहा ही नहीं। समान कैलोरी होने पर भी देशी घी की तुलना बर्गर से करना मूढ़ता लगी। आयुर्वेद पढ़ा तो तथ्य स्पष्ट हुये, देशी घी पित्त के दोष दूर करता है, बर्गर वात और कफ बढ़ाता है, मोटापा और अन्य बीमारी लेकर आता है। यही भ्रान्ति कोलेस्ट्रॉल की भी है, कड़वे तेल और रिफाइण्ड को समान स्तर पर रखने वाली आधुनिकता, शताब्दियों की भारतीय रसोई परम्परा को असिद्ध करने लगती है, बिना प्रायोगिक और वैज्ञानिक आधार के सामान्य बुद्धि को भरमाने का कार्य करती है।
आयुर्वेद के अनुसार, क्या खाया जा रहा है, यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जो खाया जा रहा है, वह पच रहा है कि नहीं? दो भिन्न प्रकृति के लोगों का एक सा खाने पर भी प्रभाव भिन्न होंगे। यूरोप के ठण्डे देशों में भोजनशैली भारत जैसे गरम देशों की तुलना में सर्वथा भिन्न होगी। इस स्थिति में जब वहाँ के अध्ययन यहाँ के लोगों द्वारा चाव से नकल किये जाते हैं, तो इससे उनका स्वास्थ्य बढ़े न बढ़े, पर यह मूढ़ता देखने वालों में हास्य रस अवश्य बढ़ जाता है।
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| सुबह सुबह भरपेट भोजन, स्वस्थ जीवन |
सिद्धान्त बढ़ा सीधा है, खाना तभी खाना चाहिये जब जठराग्नि तीव्र हो, या जमकर भूख लगे। सुबह का समय कफ का होता है, जैसे जैसे सूर्य चढ़ता है, जठराग्नि बढ़ती है। वाग्भट्ट के अनुसार सूर्योदय के ढाई घंटे के बाद जठराग्नि सर्वाधिक होती है, भोजन उसी के आसपास कर लेना चाहिये। भोजन करने के डेढ़ घंटे बाद तक यह जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। अधिकाधिक भोजन उसी समय कर लेना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि सुबह नाश्ते के स्थान पर सीधे भोजन ही करना चाहिये। कई बार गाँव गया हूँ और पुराने लोगों को ध्यान से देखा है, सब के सब सुबह पूरा भोजन कर घर से निकलते हैं। देखा जाये तो नाश्ते की पद्धति यूरोप से आयातित है, जहाँ पर सूर्य निकलने का ठिकाना नहीं, वह भी कई महीनों तक, जठराग्नि मन्द, वहाँ तो सुबह कम खाना ही अच्छा। रात में भी खाने के पहले मदिरा आदि लेकर ही खाने का पाचन होता है वहाँ। वहाँ की नकल में हम मौसम का कारक भूल गये और सुबह नाश्ता खाने में लग गये।
दोपहर में यदि कुछ खाना हो तो वह सुबह का दो तिहाई और रात को भोजन सुबह का एक तिहाई हो। जिस तरह दिया बुझने के पहले जोर से भड़कता है, सूर्य डूबने के पहले जठराग्नि भी भड़कती है। रात का भोजन सूर्योदय के पहले ही कर लेना अच्छा, उसके अच्छे से पचने की संभावना तब सर्वाधिक है। जैनियों में भले ही जीवहत्या का आधार हो, गाँवों में भले ही प्रकाश न रहने का कारण हो, पर वाग्भट्ट के आयुर्वेदिक सूत्र जठराग्नि के आधार पर सूर्यास्त के पहले भोजन करने को प्रेरित करते हैं। सूर्यास्त के बाद कुछ ग्रहण करना पूर्णतया निषेध नहीं है, दूध सोने के पहले ले सकते हैं, वह अच्छी नींद और पाचन में सहायक भी है। हो सके तो दो बार ही भोजन करें, पर तीन बार से अधिक तो किसी भी स्थिति में नहीं, तीन बार में भी एक बार बहुत हल्का भोजन करें। सुबह का भोजन जितना चाहें ले सकते हैं, जो चाहें ले सकते हैं, सारा पच जाने की संभावनायें तभी प्रबल हैं। दोपहर बाद का जो भी क्रम रखें, नियम बना कर रखें और उसी समय नियमित खायें, शरीर स्वयं को आपके समय के आधार पर ढाल लेता है।
कई वर्ष पहले अमेरिका में हुआ एक अध्ययन पढ़ा था कि दिन में कई बार खाना चाहिये और हर बार थोड़ा थोड़ा खाना चाहिये। मूढ़ता में कुछ दिन अपनाया भी था, जब पाचन का बाजा बज गया तो छोड़ दिया। अब आयुर्वेद के इस सिद्धान्त के आधार पर सोचता हूँ तो कारण समझ में आता है। वहाँ महीनों सूर्य नहीं निकलने से, सूर्य आधारित जठराग्नि भी अनुपस्थित रहती है, कम रहती है और सम रहती है। इस स्थिति में एक बार में अधिक नहीं खाया जा सकता और कभी भी खाया जा सकता है। उनका अध्ययन उनके लिये उचित है, हमारे लिये विष। हमारे लिये सूर्य आधारित जठराग्नि का समयक्रम है, हम उसी का पालन करें। रोचक तथ्य यह भी है कि सारा जीव जगत, सारे पशु इसी नियम का पालन करते हैं, सुबह ही सुबह भर पेट भोजन कर लेते हैं, सूर्य डूबने के बाद कुछ भी नहीं खाते हैं। उन्हें होने वाले रोग नगण्य हैं और हम कृत्रिमता अपना कर रोगों की सूची पाले हुये हैं। वाग्भट्ट के अनुसार हमें भी प्रकृतिलय होना सीखना चाहिये, सूर्य की गति और क्रम का पालन अपने भोजन में भी करना चाहिये।
यदि पेट में भोजन नहीं पचता है तो वह आँतों में जाकर सड़ता है, जिसे फर्मेन्टेशन कहते हैं। उसी से यूरिक एसिड बनता है, उसी से एलडीएल, वीएलडीएल और ट्राईग्लिसराइड्स आदि घातक रसायन बनते हैं और हृदयाघात और कैंसर जैसे रोगों का कारण बनते हैं। यदि भोजन ढंग से पचता है तो पोषक रसादि बनाता है, शरीर को पुष्ट रखता है। हमारा दुर्भाग्य है कि हमने हर खाद्य में कैलोरी की मात्रा की गणना तो कर ली, पर पेट में कितना पचा, उसका सही गणित नहीं बैठा पाये। सब साधन सुलभ होने के बाद भी बढ़ते रोग हमारी आधुनिक योग्यता की कथा बाँच रहे हैं। आयुर्वेद की सहज सलाह पुनः सशक्त शरीर देने में सक्षम है।
माटी से शरीर में भेजे तत्व में तीन बार पकाना होता है। हर बार अलग तरह से, अलग मात्रा में, अलग प्रकार से। किसी भी खाद्य को पहले सूर्य पकाता है, फिर उसे अग्नि पकाती है और अन्त में जठराग्नि। रसोई में भोजन अच्छे से पकायें और जठराग्नि में पचाने के पहले हर कौर को ३२ बार चबा कर खायें, इससे पाचन और अच्छा हो जाता है। बड़ी पुरानी कहावत है, पानी को खायें और खाने को पियें।
जब भी भोजन करें तो दो विरुद्ध वस्तुयें एक साथ न खायें, ऐसा करने से पेट का पाचन तन्त्र दिग्भ्रमित हो जाता है और अन्ततः कुछ नहीं पचा पाता है, भोजन तब बिना पचे ही आगे बढ़ जाता है। उदाहरणार्थ प्याज के साथ दूध न खायें, उससे त्वचा के ढेरों बीमारियाँ आती हैं। दूध के साथ कटहल के साथ न खायें। कोई खट्टा फल दूध के साथ न खायें, केवल आँवला दूध के साथ खाया जा सकता है। दूध के साथ खट्टा आम न खायें, मीठे आम के साथ खा सकते हैं। शहद और घी न साथ खायें। उड़द की दाल और दही एक साथ न खायें। द्विदल के साथ दही का निषेध है। यदि खा रहे हैं तो उसकी तासीर बदलें। जीरा, अजवाइन से मठ्ठे को छौंक दें और उसमें सेंधा नमक मिला दें।
भोजन जब भी करें, सुखासन में खायें। इस आसन में जठराग्नि सर्वाधिक होती है। जब भी सुखासन में बैठते हैं तो रक्त का प्रवाह पैरों को कम हो जाता है और सारा पाचन में उपयोग हो जाता है। बस थाली थोड़ा ऊपर रखें। उकड़ूँ में बैठ कर भी खा सकते हैं, पर वे ही ऐसा करें जो शरीर श्रम अधिक करते हैं। सुबह और दोपहर के भोजन के बाद २० मिनट विश्रांति ले। बायीं ओर करवट लेकर, इससे सूर्य नाड़ी चलने लगती है जिससे पाचन अच्छा है। वैसे तो स्वस्थ व्यक्ति के लिये यह स्वयं ही प्रारम्भ हो जाती है। विश्राम लेने की प्रथा आज भी पुराने शहरों में चल रही है, लोगों को यह आलस्य लग सकता है, पर यह पूरी तरह से आयुर्वेद सम्मत और वैज्ञानिक है। रात के भोजन के बाद दो घंटे तक नहीं सोना है, हो सके तो ५०० कदम टहलें। यदि सुबह के भोजन के बाद विश्रांति और सायं के भोजन के बाद टहलना संभव न हो सके तो दस मिनट तक वज्रासन में बैठ जायें। यह भोजन के बाद कर सकने वाला एक ही आसन है। भोजन करते समय चित्त और मन दोनों ही शान्त रखें। ईश्वर का भजन करें और शान्ति पाठ करें, हड़बड़ी में किया भोजन कुप्रभाव छोड़ता है।
जल और भोजन का मर्म समझना आयुर्वेदीय जीवनशैली का आधार है। अगली पोस्टों में इसी से जुड़े कुछ और रोचक तथ्य।
चित्र साभार - www.flickriver.com






