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17.7.21

याद बहुत ही आते पृथु तुम


सभी खिलौने चुप रहते हैं, भोभो भी बैठा है गुमसुम ।

बस सूनापन छाया घर में, याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।

 

पौ फटने की आहट पाकर, रात्रि स्वप्न से पूर्ण बिताकर,

चिड़ियों की चीं चीं सुनते ही, अलसाये कुनमुन जगते ही,

आँखे खुलती और उतरकर, तुरत रसोई जाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१।।

 

जल्दी है बाहर जाने की, प्रात, मनोहर छवि पाने की,

पहुँचे, विद्यालय पहुँचाने, बस बैठाकर, मित्र पुराने,

कॉलोनी की लम्बी सड़कें, रोज सुबह ही नापे पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।२।।

 

ज्ञात तुम्हे अपने सब रस्ते, पथ बतलाते, आगे बढ़ते,

रुक, धरती पर दृष्टि टिकी है, कुछ आवश्यक वस्तु दिखी है,

गोल गोल, चिकने पत्थर भर, संग्रह सतत बढ़ाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।३।।

 

धूप खिले तब वापस आना, ऑन्टी-घर बिस्कुट पा जाना,

सारे घर में दौड़ लगाकर, यदि मौका तो मिट्टी खाकर,

मन स्वतन्त्र, मालिश करवाते, छप छप खेल, नहाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।४।।

 

तुम खाली पृथु व्यस्त सभी हैं, पर तुम पर ही दृष्टि टिकी हैं,

शैतानी, माँ त्रस्त हुयी जब, कैद स्वरूप चढ़ा खिड़की पर,

खिड़की चढ़, जाने वालों को, कूकी जोर, बुलाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।५।।

 

और नहा पापा जब निकले, बैठे पृथु, साधक पूजा में,

लेकर आये स्वयं बिछौना, दीप जलाकर ता ता करना,

पापा संग सारी आरतियाँ, कूका कहकर गाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।६।।

 

यदि घंटी, पृथु दरवाजे पर, दूध लिया, माँ तक पहुँचाकर,

हैं सतर्क, कुछ घट न जाये, घर से न कोई जाने पाये,

घर में कोई, पहने चप्पल, अपनी भी ले आते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।७।।

 

दे थोड़ा विश्राम देह को, उठ जाते फिर से तत्पर हो,

आकर्षक यदि कुछ दिख जाये, बक्सा, कुर्सी, बुद्धि लगाये,

चढ़ सयत्न यदि फोन मिले तो, कान लगा बतियाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।८।।

 

सहज वृत्ति सब छू लेने की, लेकर मुख में चख लेने की,

कहीं ताप तुम पर न आये, बलपूर्वक यदि रोका जाये,

मना करें, पर आँख बचाकर, वहाँ पहुँच ही जाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।९।।

 

सबसे पहले तुमको अर्पित, टहल टहल खाना खाओ नित,

देखी फिर थाली भोजनमय, चढ़कर माँ की गोदी तन्मय,

पेट भरा, पर हर थाली पर, नित अधिकार जमाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१०।।

 

मन में कहीं थकान नहीं है, दूर दूर तक नाम नहीं है,

पट खोलो और अन्दर, बाहर, चढ़ बिस्तर पर, कभी उतरकर,

खेल करो, माँ को प्रयत्न से, बिस्तर से धकियाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।११।।

 

इच्छा मन, विश्राम करे माँ, खटका कुछ, हो तुरत दौड़ना,

खिड़की से कुछ फेंका बाहर, बोल दिया माँ ने डपटाकर,

बाओ कहकर सब लोगों पर, कोमल क्रोध दिखाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१२।।

 

यदि जागो, संग सब जगते हैं, देख रहे, पृथु को तकते हैं,

पर मन में अह्लाद उमड़ता, हृद में प्रेम पूर्ण हो चढ़ता,

टीवी चलता, घूम घूमकर, मोहक नृत्य दिखाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१३।।

 

ऊपर से नीचे अंगों की, ज्ञान परीक्षा होती जब भी,

प्रश्न, तुरत ही उत्तर देकर, सम्मोहित कर देते हो पर,

जब आँखों की बारी आती, आँख बहुत झपकाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१४।।

 

शाम हुयी, फिर बाहर जाना, डूबे सूरज, आँख मिलाना,

देखेंगे चहुँ ओर विविधता, लेकर सबको संग चलने का,

आग्रह करते, विजय हर्ष में, आगे दौड़ लगाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१५।।

 

मित्र सभी होकर एकत्रित, मिलते, जुलते हैं चित परिचित,

खेलो, गेंद उठाकर दौड़ो, पत्थर फेंको, पत्ते तोड़ो,

और कभी यदि दिखती गाड़ी, चढ़ने को चिल्लाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१६।।

 

चलती गाड़ी, मन्त्रमुग्ध पृथु, मुख पर छिटकी है सावन ऋतु,

उत्सुकता मन मोर देखकर, मधुरिम स्मृति वहीं छोड़कर,

शीश नवाते नित मन्दिर में, कर प्रदक्षिणा आते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१७।।

 

दिन भर ऊधम, माँ गोदी में, रात हुयी, सो जाते पृथु तुम,

शान्तचित्त, निस्पृह सोते हो, बुद्ध-वदन बन जाते पृथु तुम ।

याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१८।।


27.12.14

पृथु जीवन के प्रथम वर्ष पर

पृथु, जीवन के प्रथम वर्ष पर,
नहीं समझ में आता, क्या दूँ ?

नहीं रुके, घुटनों के राही,
घर के चारों कोनो में ही,
तुमने ढूँढ़ लिये जग अपने,
जिज्ञासा से पूर्ण हृदय में,
जाने कितनी ऊर्जा संचित,
कैसे रह जाऊँ फिर वंचित,
सुख-वर्षा, मैं भी कुछ पा लूँ,
नहीं समझ में आता, क्या दूँ ?

भोली मुसकी, मधुर, मनोहर,
या चीखों से, या फिर रोकर,
हठ पूरे, फिर माँ गोदी में,
बह स्वप्नों से पूर्ण नदी में,
डरते, हँसते, कभी भूख से,
होंठ दुग्ध पीने वश हिलते,
देख सहजता, हृदय बसा लूँ,
नहीं समझ में आता, क्या दूँ ?

कृत्य तुम्हारे, हर्ष परोसें,
नन्हे, कोमल, मृदुल करों से,
बरसायी कितनी ही खुशियाँ,
चंचलता में डूबी अँखियाँ,
देखूँ, सुख-सागर मिल जाये,
मीठी बोली जिधर बुलाये,
समय-चक्र उस ओर बढ़ा दूँ,
नहीं समझ में आता, क्या दूँ ?

(पृथु के एक वर्ष होने पर लिखी थी, १३ वर्ष बाद आज भी लगता है कि जैसे कल की बात हो)

1.2.14

हंगर गेम्स

अंग्रेजी फिल्में कल्पनाशीलता के लिये देखता हूँ। पर कौन सी देखनी है, इस पर प्रयोग नहीं करता हूँ, संस्तुतियों पर ही देखता हूँ। ऐसी ही एक फिल्म देखी, हंगर गेम्स। शाब्दिक अर्थ है, भूख के खेल। कहने को तो यह विश्व भूख से गतिमान है, यदि भूख न होती तो संभवतः विश्व में इतनी गतिशीलता भी न होती। भूख अपने आयाम बढ़ाती जाती है, इच्छाओं में परिवर्धित होती जाती है और रचा जाने लगता है, एक रंग बिरंगा विश्व।

तीन भाग लिखे हैं, सूजैन कॉलिन्स ने। दो भागों पर फिल्में बन चुकी हैं, २०१२ और २०१३ में, तीसरे भाग पर २०१४ में फिल्म बन रही है। दोनों फिल्में बहुत लम्बी हैं, लगभग ढाई घंटे की। दोनों चली भी बहुत हैं, १५० सप्ताह से अधिक। पहली फिल्म टीवी पर देखी थी, दूसरी फिल्म दिखाने के लिये पृथु हमें मॉल ले गये, इस शर्त पर कि जहाँ कहीं पर भी कहानी में अटकेंगे, उन्हें बताना पड़ेगा। पृथु तीनों भाग पढ़ चुके थे, देवला को ढंग से समझा चुके थे और आंशिक रूप से हमें बताने का प्रयास भी कर चुके थे। समयाभाव था या ध्यान कहीं और था, सुनने के बाद भी कहानी समझ में आयी ही नहीं। यह संभवतः पहली फिल्म थी मेरे लिये जिसे हम संशयमना थे कि समझ आयेगी या नहीं? हमारी श्रीमतीजी हमारे साथ खड़े रहने के धर्म को निभाने के लिये हमारे साथ चल दीं, यद्यपि उनका मन 'गोरी तेरे प्यार में' देखने का था। 

अब तक तो हमें लगता था कि दोनों बच्चे पॉपकार्न और नैचो खाने ही मल्टीप्लेक्स में जाते हैं, इस बार स्थितियाँ पलट थीं। इस बार उन्हें फ़िल्म देखने, समझने और फिर समझाने में पूरी रुचि थी, पॉपकार्न और नाचो का सहारा हमको और श्रीमतीजी को था। सोचा नहीं था पर हॉल पूरा भरा मिला। कभी कभी लगता है कि या तो यहाँ के बच्चों की वैश्विक चेतना पर्याप्त विकसित है या यहाँ के नववयस्कों को अभी तक बाल साहित्य में रुचि है। यह भी संभव है कि हम जैसे अध्ययनशील अभिभावकों से ही आधा हॉल भरा हो।

हंगर गेम्स
जैसे ही फ़िल्म प्रारम्भ हुयी, पृथु ने भी कमेन्ट्री प्रारम्भ कर दी। उन्हें लगा कि प्रारम्भ में ही विस्तृत पात्र परिचय देने से हमें समझने में सरलता होगी। पास बैठे लोग हमारी ओर मुड़कर ऐसे देखने लगे कि जैसे हम पहली बार ही कोई अंग्रेज़ी फ़िल्म देखने आ रहे हों। अटपटा लगा कि जैसे किसी ने हमारी वर्षों की आंग्ल-तपस्या पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया हो। माना कि यूपी बोर्ड में पढ़े हैं, माना कि लहराती हुयी अंग्रेजी नहीं बघार पाते, माना कि एक एक शब्द न समझ आता हो, पर भावार्थ समझ कर कथा प्रवाह समझने की क्षमता हम भी रखते हैं। हमने पृथु से कहा कि जब कठिनाई होगी तो पूछ लेंगे। हम आँख, कान और ध्यान फैलाकर फ़िल्म देखने में लग गये।

अंग्रेजी फिल्मकारों के साहस को सराहना होगा कि फिल्म की कहानी को उभारने के लिये परिस्थितियों की जो उर्वरा भूमि बनानी होती है, वह पहले पाँच मिनटों में ही बना देते हैं, बात पचे या न पचे। अब काल्पनिकता के लिये इतिहास पर फिल्में तो बनायी नहीं जा सकतीं, तो भविष्य की संरचना की जाती है। युद्ध और तकनीक, दो ऐसे सूत्र हैं जिससे कोई भी काल्पनिक परिस्थिति बनायी जा सकती है। इसमें भी यही होता है। एक दैवीय आपदा के पश्चात १२ निर्धन नगर और उनकी धनाढ़्य राजधानी बचती है। तकनीक की दृष्टि से समाज अत्यधिक उन्नत है फिर भी कार्य मानवीय श्रम से सम्पादित होते हैं, इसका स्पष्ट कारण फ़िल्म में नहीं दिखा।

खेलक्षेत्र में संघर्ष
जो भी हो, वहाँ एक विचित्र प्रथा है। कई वर्ष पहले वहाँ एक विद्रोह हुआ था, जो १३वें नगर ने किया था और उसमें वह नगर तथाकथित रूप से नष्ट हो गया था। वैसा विद्रोह पुनः न हो इसके लिये एक वार्षिक खेल का आयोजन होता है, जिन्हें हंगर गेम्स कहा जाता है। इन खेलों में हर नगर से १२ से १८ वर्ष के बीच के एक लड़के और एक लड़की को लॉटरी के माध्यम से चुना जाता है, इन्हें ट्रिब्यूट या आहुति कहा जाता है। इन्हें एक बड़े से खेलक्षेत्र में छोड़ दिया जाता है, जहाँ पर औरों को मारकर किसी एक को विजयी होकर निकलना होता है। सारे का सारा दृश्य सारे नगरों में सीधा दिखाया जाता है, जिसमें रोचकता के साथ साथ चेतावनी भी रहती है। जो भी जीतता है, उसका सारे नगरों में भ्रमण और सत्कार होता है।

इसमें आधुनिक रियलिटी शो के भी अवयव हैं और मिस यूनिवर्स जैसे आयोजनों के भी। सरकार द्वारा आयोजित बिग बॉस सा लगता है यह खेल जिसमें घर के स्थान पर जीवन से निष्कासित हो जाते हैं प्रतिभागी। जहाँ एक के अतिरिक्त शेष सभी प्रतिभागियों की मृत्यु सुनिश्चित हो, प्रतिभागियों की चयन प्रक्रिया अपने आप में एक पीड़ादायक अनुभव है। खेलक्षेत्र में वीरता और क्रूरता, जीत के पश्चात विजेता का ऐश्वर्य और विजेता के प्रति अन्य नगरों में घृणा का एक भाव, इस फ़िल्म में सभी रसों को भरने का प्रबंध कर जाते हैं।

निर्धनों को उनकी मूल समस्या से ध्यान बटाने के लिये मनोरंजन, नये नायकों का निर्माण आदि ऐसे उपाय हैं जो किसी न किसी रूप में वर्तमान में भी देखे जा सकते हैं। ऐसे उपायों के आयोजनों से न केवल उनकी वास्तविक पीड़ा ढकती होगी वरन विद्रोह के स्वर भी सिमट जाते होंगे। वास्तविकता से ध्यान हटाने के लिये काल्पनिकता में उलझाये रखने के उपक्रम एक दर्दनिवारक की तरह हैं, जब तक रहेंगे, पीड़ा का भास नहीं होगा। 

हंगर गेम्स के माध्यम से तन्त्र का अंग होना, विजेता बनकर भ्रमण के समय जनमानस की भावनाओं को समझना, शासकों की इस कुटिल मानसिकता को समझना और उससे स्वयं को और औरों को बाहर निकालना, ये सारे तत्व इन फ़िल्मों की कहानी को जीवन्त बनाये रखते हैं। कथाक्रम कैसे करवट लेता है, इसकी रोचकता ही इसे वर्तमान की एक सफलतम फ़िल्म बनाती है।

कहाँ मैं सोचकर गया था कि फ़िल्म समझ में आयेगी या नहीं, कहाँ एक पल भर के लिये भी स्क्रीन से आँख हटाने का समय ही नहीं मिला। कल्पनाशीलता इस स्तर की कि मैं अभी से इसके तीसरे भाग की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। कब आयेगा? कहते हैं कि अक्टूबर तक, हाँ जब आइफोन ६ आयेगा। अरे, इतनी अधिक कल्पनाशीलता और अधैर्य भी ठीक नहीं। वर्तमान में तो पृथु को बहुत धन्यवाद, इतनी अच्छी फ़िल्म बताने, समझाने और दिखाने के लिये।

चित्र साभार - www.dragoart.comwww.forbes.com

27.7.13

सोते सोते कहानी सुनाना

पृथु दोपहर में सो चुके थे, उन्हें रात में नींद नहीं आ रही थी। मैं पुस्तक पढ़ रहा था पर शब्द धीरे धीरे बढ़ रहे थे, उसी गति से जितनी गति से पलकों पर नींद का बोझ बढ़ रहा था। श्रीमानजी आकर लेट गये, पुस्तक को देखने लगे, कौन सी है, किसने लिखी है, कब लिखी है, क्या लिखा है, क्यों लिखा है? अब वे स्वयं भी इतनी पुस्तकें डकार जाते हैं कि फ्लिपकार्ट वालों को हमारे घर का पता याद हो गया होगा। मैंने पुस्तक किनारे रख दी, उसके बाद जितना कुछ पढ़ा था, यथासंभव याद करके बतलाने लगा, नींद भी आ रही थी और मस्तिष्क पर जोर भी पड़ रहा था। पुरातन ग्रन्थ लिखने वाले आज की तुलना में बहुत सुलझे हुये थे। जितने भी प्राचीन ग्रन्थ होते थे, उनकी प्रस्तावना में ही, क्या लिखा, क्यों लिखा, किसके लिये लिखा, अन्य से वह किस तरह भिन्न है, क्या आधार ग्रन्थ थे और पढ़ने के पश्चात उसका क्या प्रभाव पड़ेगा, सब कुछ पहले विधिवत लिखते थे, तब कहीं विषयवस्तु पर जाते थे। आजकल तो लोग लिख पहले देते हैं, आप पूरा हल जोत डालिये, जब फल निकल आता है, तब कहीं जाकर पता चलता है कि बीज किसके बोये थे?

शरीर और मन की रही सही ऊर्जा तो प्रश्नों के उत्तर में चली गयी।। अब डर यह था कि कहीं सो गये तो श्रीमानजी टीवी जाकर खोल लेंगे और पता नहीं कब तक देखते रहें? वैसे देर रात टीवी देखने का साहस वह तभी करते हैं, जब मैं घर से बाहर होता हूँ, और इसमें भी उनकी माताजी की मिलीभगत और सहमति रहती है। मेरे घर में रहते उनकी रात में टीवी देखने की संभावना कम ही थी।

एक पैतृक गुण है जिसका पालन हम करते तो हैं, पर आधा ही करते हैं। बचपन में पिताजी सबको सुलाकर ही सोने जाते थे और सबसे पहले उठकर सबको उठाते भी थे। अब अवस्था अधिक होने के कारण और टीवी के रोचक धारावाहिकों के कारण उतना जग नहीं पाते हैं और शीघ्र ही सो जाते हैं, पर अभी भी सुबह सबसे पहले उठने का क्रम बना हुआ है। रात का छोर जो उन्होंने अभी छोड़ दिया है, उसे सम्हाल कर हम पैतृक गुण का निर्वाह कर रहे हैं। हर रात सबको सुलाकर ही सोते हैं, पर बहुधा रात में अधिक पढ़ने या लिखने के कारण सुबह उठने में पीछे रह जाते हैं।

आज लग रहा था कि पृथु मेरे पैतृक गुण को ललकारने बैठे हैं, लग रहा था कि वे मुझे सुलाकर ही सोयंेंगे। सोचा कि क्या किया जाये? यदि प्रश्नों के उत्तर इसी प्रकार देते रहे तो थकान और शीघ्र हो जायेगी, मुझे नींद के झोंके आयेंगे और उन्हें आनन्द और रोचकता के। सोचा कि कुछ सुनाते हैं, संभव है कि सुनते सुनते उन्हें ही नींद आ जाये।

बताना प्रारम्भ किया कि हम बचपन में क्या करते थे। आज के समय से कैसी परिस्थितियाँ भिन्न थीं, कुछ ३० वर्ष पहले तक। बताया कि कैसे हमारे घरों में हमारे अध्यापक मिलने आते थे और हमारी शैक्षणिक प्रगति के बारे में विस्तृत चर्चा करते थे। यहाँ तक तो सब ठीक ही चल रहा था, मन में स्पष्ट था कि क्या बता रहे हैं? इसके बाद से कुछ अर्धचेतन सी स्थिति हो गयी। पता नहीं कब और कैसे बात छात्रावास तक पहुँच गयी, पता नहीं कैसे बात वहाँ के भोजन आदि के बारे में होने लगी।

उस समय पृथु के कान निश्चय ही खड़े होंगे, क्योंकि जिस तरह से अर्धचेतन मानसिक अवस्था में मैं छात्रावास के उत्पात और उद्दण्डता की घटनायें बताता जा रहा था, उन्हें इतना मसाला मिला जा रहा था कि उसे छोड़ देना किसी खजाने को छोड़ देने जैसा था। उस समझ तो समझ नहीं आया कि कितना कुछ बता गया। अगले दिन ही पता चल पाया कि लगभग पाँच घटनायें बता गया था, उद्दण्डता और अनुशासनहीनता की, कुछ एकल और कुछ समूह में की गयीं।

मुझे तो ज्ञात नहीं था कि मैं क्या कह गया, पर उसे एक एक शब्द और हर घटना का विस्तृत विवरण और चित्रण याद रहा। अगले दिन जब श्रीमतीजी ने कहा कि १५ वर्ष के विवाह के कालखण्ड में भी ये घटनायें आपने नहीं बतायीं। अब उन्हें क्या बतायें कि सब कुछ उद्घाटित करने भी बाद भी जो घटनायें मन में दबी रहीं, कल की अर्धचेतन अवस्था में कैसे बह निकलीं। उन्हें लगा कि अभी भी कुछ रहस्य शेष हैं, मेरे व्यक्तित्व में। उन्हें समझाया, कि कुछ भी शेष नहीं है अब, आप हमें मानसिक रूप से पूरी तरह से निचोड़ चुकी हैं। वह समझदार हैं, वह शीघ्र ही समझ गयीं।

जब तक पूरा हानिचक्र समझ में आता, देवला को भी सारी घटनायें ज्ञात हो चली थीं, वह ऐसे देख रही थी कि अनुशासन की जकड़न में इतनी अनुशासनहीनता छिपी होगी। हे भगवान, इससे अच्छा था कि रात में पहले ही सो जाता। पर उससे भी बड़ा आघात सहना विधि ने भाग्य में लिख दिया था।

दो माह पहले पिताजी ने, मेरे बचपन की चार-पाँच घटनायें पृथु को बतायी थीं। वह अब तक पृथु के ऊपर ऋण के रूप में चढ़ी थीं। आज पृथु के पास मेरी चार-पाँच घटनायें भी थीं और ऋण चुकाने का पूरा अवसर भी था। वह उस समय अपने दादाजी से ही बतिया रहे थे और जब तक उन्हें रोक पाता, वह अपना कार्य कर चुके थे। आज हम पूरे पारदर्शी थे, एक पीढ़ी ऊपर से एक पीढ़ी नीचे तक। ऐसा लग रहा था कि कल रात को हमारा ही नार्को टेस्ट हो गया था। बस इतनी ही प्रार्थना कर पाये कि, भैया कॉलोनी के अपने मित्रों को मत बताना, नहीं तो बहुत धुल जायेगी।

अब आगे से सावधानी रखनी है कि यदि नींद आ रही हो और पृथु या देवला कुछ कहानी आदि सुनने आ जायें तो उठकर मुँह पर पानी के छींटे मार आयेंगे, उससे भी काम नहीं चलेगा तो कॉफी पी आयेंगे और भूलकर भी वार्ता को छात्रावास नहीं ले जायेंगे। सोते सोते कहानी सुनाने में इस बार तो हमारी कहानी बन गयी है।

2.10.10

तुलसी वाला राम, सूरदास का श्याम


जितनी बार भी राम का चरित्र पढ़ा है जीवन में, आँखें नम हुयी हैं। कल मेरे राम को घर दे दिया मेरे देशवासियों ने, कृतज्ञतावश पुनः अश्रु बह चले। धार्मिक उन्माद के इस कालखण्ड में भी सदैव ही मेरे राम मुझे दिखते रहे हैं, त्याग में, मर्यादा में, शालीनता में, चारित्रिक मूल्यों में। पृथु(पुत्र जी) के बाल्यकाल में मुझे तुलसी वाले राम और सूरदास के श्याम अभिभूत कर गये थे और लेखनी मुखरित हो चली थी।


मन्त्र-मुग्ध मन, कंपित यौवन, सुख, कौतूहल मिश्रित जीवन ।

ठुमक ठुमक जब पृथु तुम भागे, पीछे लख फिर ज्यों मुस्काते ।

हृद धड़के, ज्यों ज्यों बढ़ते पग, बाँह विहग-पख, उड़ जाते नभ ।

विस्मृत जगत, हृदय अह्लादित, छन्द उमड़ते, रस आच्छादित ।।

तेरे मृदुल कलापों से मैं, यदि कविता का हार बनाऊँ ।

मन भाये पर, तुलसी वाला राम कहाँ से लाऊँ ।।१।।


सुन्दर गीतों में बसता जो, बाजत पैजनियों वाला वो ।

छन्दों का सौन्दर्य स्रोत बन, तुलसी का जीवन-आश्वासन ।

अति अनन्द वह दशरथ-नन्दन, ब्रम्हविदों का मन जिसमें रम ।

कोमल सा मुखारविन्दु जो, कौशल्या-सुत आकर्षक वो ।

कविता का श्रृंगार-पूर्ण-अभिराम कहाँ से लाऊँ ।

मन भाये पर, तुलसी वाला राम कहाँ से लाऊँ ।।२।।

 

चुपके चुपके मिट्टी खाना, पकड़ गये तो आँख चुराना ।

हर भोजन में अर्ध्य तुम्हारा, चोट लगी तो धा कर मारा ।

भो भो पीछे दौड़ लगाते, आँख झपा तुम आँख बताते ।

कुछ भी यदि मन को भा जाये, दे दो कह उत्पात मचाये ।।

तेरे प्यारे प्यारे सारे कृत्यों से यदि छन्द बनाऊँ ।

मन भाये पर, सूरदास का श्याम कहाँ से लाऊँ ।।३।।

 

घुटनहिं फिरे सकल घर आँगन, ब्रजनन्दन को डोरी बाँधन ।

दौड़ यशोदा पीछे पीछे, कान्हा सूरदास मन रीझे ।

दधि, माखन और दूध चुराये, खात स्वयं, संग गोप खिलाये ।

फोड़ गगारी, दौड़त कानन, चढ़त कदम्ब, मचे धम-ऊधम ।।

ब्रज के ग्वाल-ग्वालिनों का सुखधाम कहाँ से लाऊँ ।

मन भाये पर, सूरदास का श्याम कहाँ से लाऊँ ।।४।।