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8.3.14

वात, प्रभाव, प्राणायाम

अत्रेय ऋषि अध्यक्षता कर रहे हैं, आयुर्वेद के ज्ञाता मनीषी बैठे हैं, साथ हैं कई राज्यों के राजवैद्य, विषय है वात और प्रभाव। चरक संहिता के १२वें अध्याय में वर्णित इस प्रकरण ने बरबस ही मन खींच लिया। सामान्य वात के कार्य, वातजनित रोग, कारण, निवारण और प्रकृति के साथ उसकी समानता पर चर्चा थी। तीन कारणों से इसे यहाँ पर रखना आवश्यक समझता हूँ। पहला, रोगों की कुल सूची में ७० प्रतिशत रोग वातजनित है। जोड़ों का दर्द, गठिया, डायबिटीज़, उच्च रक्तचाप, कैंसर और हृदयाघात आदि वातजनित रोग हैं। दूसरा, भारत एक वातप्रधान देश है और यहाँ पर इन रोगों की संख्या अधिक होती है। तीसरा, आयु के अन्तिम पड़ाव में वात अधिक होने लगता है और शरीर में वातजनित रोग प्रस्फुटित होने लगते हैं। इन तीनों कारणों के परिप्रेक्ष्य में वात की समुचित समझ आवश्यक है, जिससे हम अपनी युवावस्था में सावधान रहकर अपने स्वास्थ्य को सँवार सकते हैं और निरोगी रह सकते हैं।

कफ और पित्त की अपेक्षा वात सर्वाधिक सूक्ष्म और गतिशील होती है, यही कारण है कि शरीर के सभी अंग इसके प्रभावक्षेत्र में आ जाते हैं। जब कभी भी वात व्यथित होती है, शरीर के किसी भाग में एकत्र होती रहती है। बार बार वही कारण होने पर वह वहाँ पर बढ़ती जाती है। समय रहते यदि उसे निष्प्रभावी व संतुलित न किया गया तो रोग का रूप ले लेती है। वात की तुलना में कफ और पित्त के प्रभावक्षेत्र सीमित रहते हैं, अतः उसका निदान अपेक्षाकृत सरल रहता है। यही कारण रहा होगा कि वात की चर्चा का महत्व चरकसंहिता के लिये विशेष रहा होगा।

शक्ति भी, आसक्ति भी
पृथ्वी और जल प्रकृति के पोषक तत्व हैं, पौधों में सारा पोषण इन्हीं दोनों तत्वों से आता है। सूर्य और वायु प्रकृति के शोषक तत्व हैं, इन दोनों की सहायता से तत्व धरती से निकल कर पौधों में फल रूप में संचित होते हैं। जो कार्य वायु वाह्य प्रकृति में करती है, वही कार्य शरीर के भीतर भी संपादित करती है। आयुर्वेद की सभा में वाह्य वायु के कार्यों को समझाते हुये शरीर के भीतर वात के महत्व को व्याख्यायित किया गया है। सभा के रोचक प्रसंग में जब राजर्षि वायोर्विद प्रकृति में वायु के महत्व को बता रहे थे तो ऋषि मरीचि ने यह पूछा कि सभा आयुर्वेद और स्वास्थ्य के बारे में है, इसमें प्रकृति की कार्यशैली का क्या महत्व? संभवतः उस प्रश्न का उत्तर ही वात के व्यापक प्रभाव को समझने के लिये आवश्यक है।

राजर्षि वायोर्विद का उत्तर इस प्रकार था। यदि चिकित्सक उस वायु को नहीं समझता, जो शक्ति, खरता, गति और विध्वंसक क्षमता में सर्वाग्रणी है, तो वह अपने रोगी को वात के कुप्रभावों के बारे में रोग आने के पर्याप्त पहले से सचेत नहीं कर पायेगा। साथ ही साथ वायु के प्रकृति संचालन में सामान्य गुण बताकर, वात के उन गुणों को भी बता पायेगा, जो शक्ति, वर्ण, विकास, ज्ञान और आयु के लिये सहायक हैं। भूगोल का यह अध्याय आपको तनिक सरल लग सकता है, पर इसके समानान्तर आप शरीर में भी वात के बारे में सोचेंगे तो यही तुलना अत्यधिक रोचक होती जायेगी। 

वायु के सामान्य लाभप्रद कार्य हैं, पृथ्वी का जीवन व रखरखाव, अग्नि का उद्दीपन, वायु दवाब जनित पृथ्वी की संघनता, बादलों का निर्माण, वर्षा कराना, नदियों का प्रवाह, फलों और फूलों में परिपक्वता, पौधों का विकास, ऋतुयों का संचालन, अन्न की संघनता और शुष्कता। यही वायु जब भड़कती है तो पहाड़ टूटते हैं, पेड़ उखड़ते हैं, समुद्र में तूफ़ान आते हैं, नदियों की दिशा बदलती है, बादलों में गर्जन होता है, आँधी और अतिवृष्टि होती है, आकाल पड़ता है, ऋतुयें भ्रमित होती हैं, पौधों की उत्पादकता क्षीण होती है और विनाश आता है।

इसी प्रकार सामान्य वात शरीर में निम्न कार्य करता है। शरीर के सारे अंगों को कार्यशील रखता है, सारे कर्मों और शब्दों का उद्भवकारक है, मन को नियन्त्रित और निर्देशित करता है, सारे अंगों में समन्वय रखता है, शरीर को संघनित रखता है, सारे ज्ञानेन्द्रियों का मूल वाहक है, सुख और उत्साह का मूल कारक है, पाचक अग्नि को प्रदीप्त रखता है, अधिक कफ और पित्त को सुखाता है, शरीर से मल आदि बाहर निकालता है, शरीर में छोटे बड़े संवहन मार्ग बनाता है, गर्भाशय के आकार और विकास में सहायक है और अन्ततः जीवन होने का सूचक है। जब यह कुपित होता है, तो विभिन्न प्रकार के रोग आते हैं, शारीरिक शक्ति, शरीर का वर्ण, सुख और आयु क्षीण होती है। साथ ही मन विचलित रहता है, अंगों और उनके समन्वय पर कुप्रभाव पड़ता है, गर्भाशय क्षतिग्रस्त होता है, भय, चिन्ता और भ्रम उत्पन्न होते हैं।

वात के कारण और निवारण उनके गुणों में छिपे हुये हैं। वात के गुण रुक्ष, लघु, शीत, दारुण, खर, विशद और शुशिर(खोखला) हैं। अतः निवारण के लिये हमें क्रमशः स्निग्ध, गुरु, ऊष्ण, श्लक्ष्ण, मृदु, पिच्छिल और घन गुणों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे गुणों से युक्त परिवेश, द्रव्य, कार्य, भाव आदि होने से असंतुलित वात का प्रभाव कम हो जाता है। आयुर्वेद में दिनचर्या, ऋतुचर्या, भोजन औषधियों में इन्हीं गुणों की क्रियात्मकता का विशेष ध्यान रखा जाता है और इनका वर्णन हम आगामी कड़ियों में करेंगे।

शरीर के अन्दर वात के भिन्न कर्म पाँच वायु करती हैं। ये वायु हैं, प्राण, समान, व्यान, उदान और अपान। प्राण वायु मस्तिष्क और हृदय के बीच संचालित रहती है, विचारों और इच्छाओं के माध्यम से मन को संचालित करती है। इसका निकलना ही मृत्यु की परिभाषा है। समान वायु पाचन में तत्वों और इन्द्रियों के माध्यम से वाह्य संवेदनायें अवशोषित करती है, पाचन तत्व रक्त में और संवेदन मस्तिष्क में पहुँचाती है। व्यान वायु शरीर में रक्त और अंगों में प्रतिक्रिया पहुँचाती है। उदान वायु किसी कार्य के लिये ऊर्जा एकत्र करती है। अपान वायु सारी क्रियाओं से निकले मल को शरीर से बाहर करती है।

क्योंकि मन वात द्वारा संचालित रहता है और योग का प्रमुख ध्येय मन को नियन्त्रित करना होता है, अतः उसको साधने के लिये योग के अंगों में प्राणायाम का अद्भुत महत्व है। कईयों को लगता होगा कि प्राणायाम मन की एकाग्रता में कैसे सहयोग करता है? कारण उपरिलिखित सूत्रों में ही मिल जाता है। प्राणायाम शरीर में वात के प्रवाह को संतुलित करता है, जिससे वात के कुप्रभाव भी नियन्त्रित होते है। अनियन्त्रित वात के गुण में गतिशीलता भी एक है जो विचारों में जाकर स्थापित हो जाती है और चाह कर भी विचारों का प्रवाह नियन्त्रण में नहीं रहता है। इस प्रकार प्राणायाम ध्यान में अत्यन्त सहायक होता है। पाँचों प्रकार की वायु संतुलित होने से शरीर के अन्य वातजनित रोगों में भी प्राणायाम से अद्भुत लाभ होते हैं। प्राणायाम में वाह्य वायु और आन्तरिक वात में एक तदात्म्य स्थापित होता है जिससे हम प्रकृतिलयता की ओर तनिक और अग्रसर होते हैं।

आश्चर्य नहीं होगा जब, रसोई, योग और आयुर्वेद जैसे न जाने कितने तत्व हमारी जीवनचर्या में पिरोये गये हों, यही अन्तर्निहित एकता हमारी संस्कृति की समग्रता है, श्रेष्ठता है, संघनता है। आगे की पोस्ट में दिनचर्या, ऋतुचर्या और जीवनचर्या के कुछ तत्व।

चित्र साभार - www.kidsgeo.com

5.3.14

रसोई और आयुर्वेद

पहले मुझे लगता था कि आयुर्वेद को अपनाना कितना कठिन होगा, पूरी जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ेगा। अपना जीवन तो फिर भी ढाला जा सकता है, पर रसोई में कोई हस्तक्षेप गृहस्वामी के लिये मँहगा पड़ सकता है। गहरे उतरा, तो पाया कि कितना सरल है आयुर्वेद को अपनाना और किस तरह से भारतीय जीवन के प्रत्येक पक्ष में इसे पहले ही समाहित किया जा चुका है। जीवन जीने में कितनी सरलता से इसे जोड़ दिया गया है, हमारी रसोई से और हमारी जीवन शैली से, हमारे मनीषियों ने।

आयुर्वेद हमारी जीवनशैली, दिनचर्या और ऋतुचर्या में सदियों से पिरो दिया गया है। उससे भी अधिक वह हमारी पारम्परिक रसोई में विद्यमान है। तनिक और ध्यान से विश्लेषित किया तो दिखा कि हमारी रसोई आयुर्वेद की पारम्परिक प्रयोगशालायें हैं, हर घर में एक, हर दिन कार्यरत, और निष्कर्ष हमारा स्वास्थ्य। हमें कभी पता नहीं चला, पर जिस कुशलता से हमारे आयुर्वेद के पुरोधाओं ने इन सूत्रों की वैज्ञानिकता को रसोई में समाहित किया है, वह उपलब्धि आयुर्वेद से भी गहरी है। एक एक पकवान, किसी भी ऋतु का, किसी भी समय का, सबमें आयुर्वेद के सूत्र का आधार। अद्भुत है आयुर्वेद के काल का विस्तार और सन्निहित प्रक्रियाओं की सूक्ष्मता।

भारतीय रसोई या आयुर्वेदीय प्रयोगशाला
पिछले २०-३० वर्ष में भारतीय रसोई में आये बदलावों को छोड़ दें और तब रसोई में आयुर्वेद की स्थापना देखें तो आये बदलाव हमें आधुनिकता की मूर्खतापूर्ण नकल लगेगी। लगेगा कि जिन प्रयोगशालाओं में स्वास्थ्य के प्रयोग सदियों से चल रहे हैं, उनमें किस तरह हमने अवैज्ञानिकता को प्रवेश करने दिया। आइये, वाग्भट्ट के रसोई सम्बन्धित ऐसे ही चार सिद्धान्तों का विश्लेषण करते हैं। 

वाग्भट्ट का पहला सिद्धान्त है कि जिस भोजन को सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श न मिले, वह भोजन नहीं, विष है जो धीरे धीरे हमें ही खा जायेगा। सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श अन्न, शाकादि के बनने में सहायक होता है। इन दोनों की अनुपस्थिति शरीर के प्रति लाभप्रद नहीं मानी गयी है। ऐसा जल भी दूषित माना जाता है। यही कारण रहा होगा कि जैन मतावलम्बी धरती के अन्दर होने वाले उत्पादों को नहीं खाते हैं। सूर्यास्त के पश्चात भोजन पकाने, खाने और संग्रहण भी संभवतः इसी कारण जैन समाज में निषेध हों। हो सकता है कि धूप में सुखाने से उसमें हानिकारक जीवाणु न आते हों। पवन का स्पर्श, संभव है, उसमें ऑक्सीजन और पोषक तत्वों को समाहित कर लेता हो और उसे स्वास्थ्यप्रद बना देता हो। अहिंसा प्रेरित जैनियों की आस्था निराधार तो कदाचित नहीं होगी, और निश्चय ही उसमें वाग्भट्ट के सूत्रों का स्वस्थ संचरण होगा।

वाग्भट्ट का दूसरा सिद्धान्त है कि जिस अन्न को खेत में पकने में अधिक समय लगता है, उसे पकने में उतना ही अधिक समय लगेगा। यहाँ पर गति का सिद्धान्त दिखता है। कहने का आशय है कि किसी भी अन्न में निहित पूर्णपोषकता निकालने के लिये उसे उसी अनुपात में पकाना चाहिये जिस अनुपात में प्रकृति ने उसे पकाया है। खेत में ३ माह में पके अन्न को कम पकाना पड़ेगा, जबकि ९ माह में पके अन्न को उससे कहीं अधिक पकाना पड़ेगा। माटी से पोषक तत्वों का एकत्रीकरण और भोजन के लिये उसका विघटन, ये दोनों एक दूसरे की विपरीत प्रक्रियायें हैं। न हम उसे पल्लवित करने को तीव्र कर सकते हैं और न ही उसे पोषक तत्वों में विघटित करने के लिये शीघ्रता कर सकते हैं। यदि हम ऐसा करते हैं तो हमें खाद्य तो मिलेगा पर उसमें पोषक तत्व नहीं मिलेंगे।

वाग्भट्ट का तीसरा सिद्धान्त है कि भोजन बनने के ४८ मिनट के अन्दर उसको खा लेना चाहिये। जैसे जैसे देर होती है, उसकी पौष्टिकता कम होती जाती है। २४ घंटे के बाद भोजन बासी हो जाता है और पशुओं के खिलाने के योग्य भी नहीं रहता है। बार बार ठण्डा गरम करने की प्रक्रिया में पोषकतत्व अपना मौलिक गुण खो बैठते हैं और विकृति उत्पन्न करते हैं। साथ ही साथ अन्नादि को पीसने के बाद १५ दिन के अन्दर ही उसका उपयोग कर लेना चाहिये, नहीं तो उनमें भी पोषकता का क्षय होने लगता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह बात बड़ी स्वाभाविक लगती है। एक बार पकने या पीसने से किसी भी अन्न के पोषक तत्व अपने सर्वाधिक ग्राह्य रूप में आ जाते हैं। इस समय वातावरण में व्याप्त न जाने कितने जीवाणुओं के लिये यह सुविधाजनक होता होगा कि वे उस पर धावा बोल दें। जैसे जैसे समय बीतता होगा, पके अन्न का मौलिक गुण इन जीवाणुओं के द्वारा परिवर्तित और दूषित होता होगा। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि वाग्भट्ट द्वारा दी इतनी वैज्ञानिक सलाह का हम प्रायः हर दिन उल्लंघन करते हैं।

वाग्भट्ट का चौथा सिद्धान्त है कि किसी भी कार्य में यदि अधिक गति से किया जाये तो वह वात उत्पन्न करता है। भारत एक वात प्रधान देश है, यहाँ पर ७० प्रतिशत रोग वातजनित, २० प्रतिशत पित्तजनित और १० प्रतिशत कफजनित हैं। कहने का आसय यह है कि हम जीवन में या रसोई में जो भी प्रक्रियायें अपनायें, वे गतिमान न हों और सूक्ष्म न हों। धीरे पीसे आटे में और बिजली की चक्की के तेज पीसे आटे में यही गुण झलकता है। प्रयोग कर के देख लें कि धीरे पिसा आटे की रोटी अधिक समय तक मृदु रहती है, जबकि तेजी से पिसे आटे की रोटी बहुत शीघ्र ही कड़ी हो जाती है। इसी तरह मैदा जैसा सूक्ष्म अन्न वात बढ़ाता है। वही सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया रिफाइण्ड तेल और चीनी के साथ भी होती है, और स्वाभाविक है कि ये दोनों कड़वे तेल और गुड़ की अपेक्षा बहुत अधिक वात बढ़ाते हैं।

आइये देखते हैं कि आधुनिक जीवन शैली ने पिछले २०-३० वर्षों में इन चार सिद्धान्तों की किस तरह से धज्जियाँ उड़ायी हैं और किस तरह से हमारी रसोई आयुर्वेद की प्रयोगशाला से रोगों की प्रयोगशाला बन गयी है। 

हांडी की दाल
प्रेशर कुकर पहले दो सिद्धान्तों का उल्लंघन करता है। प्रेशर कुकर में पकते समय न सूर्य का प्रकाश मिलता है और न पवन का स्पर्श। साथ ही साथ अपने प्रेशर से दाल को तोड़ कर उबाल देता है, दाल को उसके पोषक तत्वों में विघटित नहीं करता है। खेतों में दाल को पकने में ९ माह के आसपास लगता है, तो दूसरे सिद्धान्त के अनुसार उसे अग्नि पर भी देर तक पकाना चाहिये, धीरी आँच में। जिन्हें भी अपने गाँव की तनिक भी याद है उन्हें याद होगा कि प्रेशर कुकर आने के पहले हर घर में माटी की हांडी में दाल बनती थी, धीरे धीरे और अद्भुत स्वादिष्ट। प्रेशर कुकर में पकी दाल में पोषक तत्व मात्र १५ प्रतिशत पाये गये, जबकि माटी की हांडी की दाल में एक भी पोषकतत्व नष्ट नहीं हुआ। जगन्नाथ पुरी में आज भी माटी की हांडी में प्रसाद बनता है। माटी का सोंधापन और तत्वों में शरीर से एकरूपता, उसे इतना उत्कृष्ट पाकपात्र बनाते होंगे। साथ ही साथ प्रेशर कुकर में प्रयुक्त एल्युममिनियम का उपयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त संदिग्ध और हानिकारक है। यह तथ्य जानने के बाद, मेरे घर में दाल और खीर माटी की हांडी में ही बन रही है, स्वाद अद्भुत और पौष्टिकता शत प्रतिशत। 

फ्रिज और ओवेन, पहले और तीसरे सिद्धान्त का उल्लंघन करते हैं। खाद्य को संरक्षित करने के नाम पर बार बार ठंडा गरम कर हम उसमें पौष्टिकता पूरी तरह से निकाल देते हैं और केवल अवशिष्ट खाते है। न केवल हम अपने पाचनतन्त्र का विनाश करने पर तुले हैं, वरन बिजली की अथाह बरबादी और क्लोरोफ्लोरोकार्बन के उत्सर्जन से पर्यावरण को भी क्षति पहुँचा रहे हैं। फ्रिज के ठंडे पानी ने देश में कब्जियत का प्रसार किया है। आवश्यकता इस बात की है कि हम घड़े का उपयोग करें। साथ ही साथ उतना ही बनाये जितना खा सकें। अधिक बनने पर संरक्षित न करें वरन आसपास के पशु पक्षियों को खिला दें। भारत में भोजन बचाकर और उसे अपोषक बनाकर खाने की परम्परा नहीं है। ताजी और गरम रोटी का सुख, स्वास्थ्य और स्वाद, सड़ाकर और बासी आटे से बने पाव और डबलरोटी से कहीं अधिक है।

मिक्सी आदि यन्त्र चौथे नियम को तोड़ते हैं। गति के सिद्धान्त की प्रकृति में उपेक्षा नहीं की जा सकती है। सिलबट्टा आदि में सब कुछ धीरे धीरे पिसता है और आवश्यकता से अधिक सूक्ष्म भी नहीं होता है। मिक्सी आदि में न केवल गति से पिसता है, वरन अतिसूक्ष्म भी हो जाता है, दोनों ही प्रकार से वह वातकारक है। इसी प्रकार पैकेट का आटा और डब्बाबन्द भोजन तीसरे और चौथे सिद्धान्त का उल्लंघन करते हैं। बंगलोर में रहने वाले मेरे कई मित्र बताते हैं कि पैकेट वाले आटे में घर जैसी बात नहीं, उससे पेट तो भरता है, पर संतुष्टि नहीं मिलती है। मुझे अपने गाँव की याद आती है, वहाँ सुबह उठकर दिन भर की आवश्यकता के लिये हाथ से चलने वाली चक्की में आटा पीसने का कार्य हमारी घर का महिलायें करती थीं।

हमारी रसोई में चलती परिपाटियाँ आयुर्वेद के सूत्रों का अमृत निचोड़ होता था, वह भी हर छोटी बड़ी प्रक्रिया में सरलता से सहेजा हुआ। चक्की, सिलबट्टा आदि यन्त्रों से न केवल हमारे स्वाद और स्वास्थ्य की रक्षा होती थी, वरन घर में रहने वाली महिलाओं का समुचित व्यायाम भी हो जाता था। आधुनिक यन्त्रों ने स्वाद, स्वास्थ्य और श्रम के सुन्दर संतुलन को नष्ट कर दिया है, हमें भी मशीन बनाकर रख दिया है। अब न हम पौष्टिक खा पा रहे हैं, न स्वादिष्ट खा पा रहे हैं, न स्वस्थ हैं और न ही सुगढ़।

यथासंभव विकार उत्पन्न करने वाले परिवर्तनों को रसोई से विदा करें और रसोई को पुनः आयुर्वेद की प्रयोगशाला के रूप में सुस्थापित करें। आगामी पोस्ट में कुछ और आयुर्वेदिक तत्व।

चित्र साभार - www.harekrsna.com, www.minmit.com

1.3.14

भोजन और आयुर्वेद

आधुनिकता के प्रति सदा है उदार दृष्टिकोण रहा है, पर कैलोरी आधारित भोजन की गणना पर कभी विश्वास रहा ही नहीं। समान कैलोरी होने पर भी देशी घी की तुलना बर्गर से करना मूढ़ता लगी। आयुर्वेद पढ़ा तो तथ्य स्पष्ट हुये, देशी घी पित्त के दोष दूर करता है, बर्गर वात और कफ बढ़ाता है, मोटापा और अन्य बीमारी लेकर आता है। यही भ्रान्ति कोलेस्ट्रॉल की भी है, कड़वे तेल और रिफाइण्ड को समान स्तर पर रखने वाली आधुनिकता, शताब्दियों की भारतीय रसोई परम्परा को असिद्ध करने लगती है, बिना प्रायोगिक और वैज्ञानिक आधार के सामान्य बुद्धि को भरमाने का कार्य करती है।

आयुर्वेद के अनुसार, क्या खाया जा रहा है, यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जो खाया जा रहा है, वह पच रहा है कि नहीं? दो भिन्न प्रकृति के लोगों का एक सा खाने पर भी  प्रभाव भिन्न होंगे। यूरोप के ठण्डे देशों में भोजनशैली भारत जैसे गरम देशों की तुलना में सर्वथा भिन्न होगी। इस स्थिति में जब वहाँ के अध्ययन यहाँ के लोगों द्वारा चाव से नकल किये जाते हैं, तो इससे उनका स्वास्थ्य बढ़े न बढ़े, पर यह मूढ़ता देखने वालों में हास्य रस अवश्य बढ़ जाता है।

सुबह सुबह भरपेट भोजन, स्वस्थ जीवन
सिद्धान्त बढ़ा सीधा है, खाना तभी खाना चाहिये जब जठराग्नि तीव्र हो, या जमकर भूख लगे। सुबह का समय कफ का होता है, जैसे जैसे सूर्य चढ़ता है, जठराग्नि बढ़ती है। वाग्भट्ट के अनुसार सूर्योदय के ढाई घंटे के बाद जठराग्नि सर्वाधिक होती है, भोजन उसी के आसपास कर लेना चाहिये। भोजन करने के डेढ़ घंटे बाद तक यह जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। अधिकाधिक भोजन उसी समय कर लेना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि सुबह नाश्ते के स्थान पर सीधे भोजन ही करना चाहिये। कई बार गाँव गया हूँ और पुराने लोगों को ध्यान से देखा है, सब के सब सुबह पूरा भोजन कर घर से निकलते हैं। देखा जाये तो नाश्ते की पद्धति यूरोप से आयातित है, जहाँ पर सूर्य निकलने का ठिकाना नहीं, वह भी कई महीनों तक, जठराग्नि मन्द, वहाँ तो सुबह कम खाना ही अच्छा। रात में भी खाने के पहले मदिरा आदि लेकर ही खाने का पाचन होता है वहाँ। वहाँ की नकल में हम मौसम का कारक भूल गये और सुबह नाश्ता खाने में लग गये।

दोपहर में यदि कुछ खाना हो तो वह सुबह का दो तिहाई और रात को भोजन सुबह का एक तिहाई हो। जिस तरह दिया बुझने के पहले जोर से भड़कता है, सूर्य डूबने के पहले जठराग्नि भी भड़कती है। रात का भोजन सूर्योदय के पहले ही कर लेना अच्छा, उसके अच्छे से पचने की संभावना तब सर्वाधिक है। जैनियों में भले ही जीवहत्या का आधार हो, गाँवों में भले ही प्रकाश न रहने का कारण हो, पर वाग्भट्ट के आयुर्वेदिक सूत्र जठराग्नि के आधार पर सूर्यास्त के पहले भोजन करने को प्रेरित करते हैं। सूर्यास्त के बाद कुछ ग्रहण करना पूर्णतया निषेध नहीं है, दूध सोने के पहले ले सकते हैं, वह अच्छी नींद और पाचन में सहायक भी है। हो सके तो दो बार ही भोजन करें, पर तीन बार से अधिक तो किसी भी स्थिति में नहीं, तीन बार में भी एक बार बहुत हल्का भोजन करें। सुबह का भोजन जितना चाहें ले सकते हैं, जो चाहें ले सकते हैं, सारा पच जाने की संभावनायें तभी प्रबल हैं। दोपहर बाद का जो भी क्रम रखें, नियम बना कर रखें और उसी समय नियमित खायें, शरीर स्वयं को आपके समय के आधार पर ढाल लेता है।

कई वर्ष पहले अमेरिका में हुआ एक अध्ययन पढ़ा था कि दिन में कई बार खाना चाहिये और हर बार थोड़ा थोड़ा खाना चाहिये। मूढ़ता में कुछ दिन अपनाया भी था, जब पाचन का बाजा बज गया तो छोड़ दिया। अब आयुर्वेद के इस सिद्धान्त के आधार पर सोचता हूँ तो कारण समझ में आता है। वहाँ महीनों सूर्य नहीं निकलने से, सूर्य आधारित जठराग्नि भी अनुपस्थित रहती है, कम रहती है और सम रहती है। इस स्थिति में एक बार में अधिक नहीं खाया जा सकता और कभी भी खाया जा सकता है। उनका अध्ययन उनके लिये उचित है, हमारे लिये विष। हमारे लिये सूर्य आधारित जठराग्नि का समयक्रम है, हम उसी का पालन करें। रोचक तथ्य यह भी है कि सारा जीव जगत, सारे पशु इसी नियम का पालन करते हैं, सुबह ही सुबह भर पेट भोजन कर लेते हैं, सूर्य डूबने के बाद कुछ भी नहीं खाते हैं। उन्हें होने वाले रोग नगण्य हैं और हम कृत्रिमता अपना कर रोगों की सूची पाले हुये हैं। वाग्भट्ट के अनुसार हमें भी प्रकृतिलय होना सीखना चाहिये, सूर्य की गति और क्रम का पालन अपने भोजन में भी करना चाहिये।

यदि पेट में भोजन नहीं पचता है तो वह आँतों में जाकर सड़ता है, जिसे फर्मेन्टेशन कहते हैं। उसी से यूरिक एसिड बनता है, उसी से एलडीएल, वीएलडीएल और ट्राईग्लिसराइड्स आदि घातक रसायन बनते हैं और हृदयाघात और कैंसर जैसे रोगों का कारण बनते हैं। यदि भोजन ढंग से पचता है तो पोषक रसादि बनाता है, शरीर को पुष्ट रखता है। हमारा दुर्भाग्य है कि हमने हर खाद्य में कैलोरी की मात्रा की गणना तो कर ली, पर पेट में कितना पचा, उसका सही गणित नहीं बैठा पाये। सब साधन सुलभ होने के बाद भी बढ़ते रोग हमारी आधुनिक योग्यता की कथा बाँच रहे हैं। आयुर्वेद की सहज सलाह पुनः सशक्त शरीर देने में सक्षम है।

माटी से शरीर में भेजे तत्व में तीन बार पकाना होता है। हर बार अलग तरह से, अलग मात्रा में, अलग प्रकार से। किसी भी खाद्य को पहले सूर्य पकाता है, फिर उसे अग्नि पकाती है और अन्त में जठराग्नि। रसोई में भोजन अच्छे से पकायें और जठराग्नि में पचाने के पहले हर कौर को ३२ बार चबा कर खायें, इससे पाचन और अच्छा हो जाता है। बड़ी पुरानी कहावत है, पानी को खायें और खाने को पियें।

जब भी भोजन करें तो दो विरुद्ध वस्तुयें एक साथ न खायें, ऐसा करने से पेट का पाचन तन्त्र दिग्भ्रमित हो जाता है और अन्ततः कुछ नहीं पचा पाता है, भोजन तब बिना पचे ही आगे बढ़ जाता है। उदाहरणार्थ प्याज के साथ दूध न खायें, उससे त्वचा के ढेरों बीमारियाँ आती हैं। दूध के साथ कटहल के साथ न खायें। कोई खट्टा फल दूध के साथ न खायें, केवल आँवला दूध के साथ खाया जा सकता है। दूध के साथ खट्टा आम न खायें, मीठे आम के साथ खा सकते हैं। शहद और घी न साथ खायें। उड़द की दाल और दही एक साथ न खायें। द्विदल के साथ दही का निषेध है। यदि खा रहे हैं तो उसकी तासीर बदलें। जीरा, अजवाइन से मठ्ठे को छौंक दें और उसमें सेंधा नमक मिला दें।

भोजन जब भी करें, सुखासन में खायें। इस आसन में जठराग्नि सर्वाधिक होती है। जब भी सुखासन में बैठते हैं तो रक्त का प्रवाह पैरों को कम हो जाता है और सारा पाचन में उपयोग हो जाता है। बस थाली थोड़ा ऊपर रखें। उकड़ूँ में बैठ कर भी खा सकते हैं, पर वे ही ऐसा करें जो शरीर श्रम अधिक करते हैं। सुबह और दोपहर के भोजन के बाद २० मिनट विश्रांति ले। बायीं ओर करवट लेकर, इससे सूर्य नाड़ी चलने लगती है जिससे पाचन अच्छा है। वैसे तो स्वस्थ व्यक्ति के लिये यह स्वयं ही प्रारम्भ हो जाती है। विश्राम लेने की प्रथा आज भी पुराने शहरों में चल रही है, लोगों को यह आलस्य लग सकता है, पर यह पूरी तरह से आयुर्वेद सम्मत और वैज्ञानिक है। रात के भोजन के बाद दो घंटे तक नहीं सोना है, हो सके तो ५०० कदम टहलें। यदि सुबह के भोजन के बाद विश्रांति और सायं के भोजन के बाद टहलना संभव न हो सके तो दस मिनट तक वज्रासन में बैठ जायें। यह भोजन के बाद कर सकने वाला एक ही आसन है। भोजन करते समय चित्त और मन दोनों ही शान्त रखें। ईश्वर का भजन करें और शान्ति पाठ करें, हड़बड़ी में किया भोजन कुप्रभाव छोड़ता है।

जल और भोजन का मर्म समझना आयुर्वेदीय जीवनशैली का आधार है। अगली पोस्टों में इसी से जुड़े कुछ और रोचक तथ्य।

चित्र साभार - www.flickriver.com

26.2.14

जल और आयुर्वेद

जल और भोजन, दो ऐसे तत्व हैं, जो हम ग्रहण करते हैं और इनको आयुर्वेद के सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है। बहुधा जल पीने में हम प्यास को ही प्रेरक मानते हैं, जब प्यास लगी, पानी पी लिया। कब पीना, कितना पीना, कैसे पीना, इस पर कई प्रचलित मान्यतायें हैं जिन्हें सार्वभौमिक मान लिया जाता है, पर गुण और प्रकृति के अनुसार जल के प्रभाव का सम्यक ज्ञान लाभकारी है।

जलं जीवनम्
जल सभी रसों का उत्पादक है, पाचन प्रक्रिया में भोजन से जो पोषक तत्व सोखे जाते हैं, उन्हें रस कहते हैं, रसों से ही रक्त आदि का निर्माण होता है। जल वैसे तो जिसमें मिलाकर पिया जाता है, उसी के गुण ले लेता है, पर इसके अपने ६ गुण भी हैं, शीत, शुचि, शिव, मृष्ट, विमल, लघु। धरती पर आया जल वर्षा का ही होता है, समुद्र से वाष्पित जल अन्य जल स्रोतों से वाष्पित जल की तुलना में अधिक क्षारीय होता है। वर्षाकाल का प्रथम जल और अन्य ऋतु में बरसा जल नहीं पीना चाहिये। बहता जल पीने योग्य होता है, पहाड़ों और पत्थरों से गिरने से जल की अशुद्धियाँ बहुत कम हो जाती हैं। स्थिर जल के स्रोतों में वही जल श्रेष्ठ होता है जिसे सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श मिलता रहे। यदि जल मधुर है तो त्रिदोषशामक, लघु और पथ्य होता है। क्षारीय है तो कफवात शामक, पर पित्त को बढ़ाता है। कषाय हो तो कफपित्त शामक, पर वात को बढ़ाता है।

हर स्थान से निकलने वाली नदियों के जल में कोई न कोई स्थानीय दोष होता है, उसका भी वर्णन वागभट्ट ने ५वें अध्याय में किया है। गौड़, मालवा और कोंकण क्षेत्र से निकलने वाली नदियों में अर्शरोग(बवासीर), महेन्द्र पर्वत ले निकलने वाली नदियों में उदररोग व श्लीपदरोग(हाथीपाँव), सह्याद्रि और विन्ध्य से निकलने वाली नदियों में पाण्डुरोग(एनीमिया) और शिरोरोग, पारियात्र(हिन्दुकुश) पर्वत से निकलने वाला जल त्रिदोष शामक, बल, पौरुष, शक्ति को उत्पन्न करने वाला होता है। इन स्थानों पर रहने वालों लोगों में इस जल से सात्म्य हो जाता है, पर बाहर से आये लोगों में रोग होने की संभावना बनी रहती है।

मन्दाग्नि, गुल्म, पाण्डु, उदररोग, अतिसार, अर्श और ग्रहणी रोग के लोगों को जल कम पीना चाहिये। स्वस्थ मनुष्य को भी अधिक जल नहीं पीना चाहिये, किन्तु ग्रीष्म और शरद में अधिक जल पिया जा सकता है। सामान्यतः शीतल जल का निषेध है, पर मदात्यय(मदिरा से होने वाले विकार), शरीर की ग्लानि, मूर्छा, वमन, परिश्रमजन्य थकावट, भ्रम, प्यास की वृद्धि, शरीर की ऊष्णता, आहार विहार जन्य दाह, रक्तपित्त और विषभक्षण जन्य विकार, इन सबके लिये शीतल जल पीना चाहिये। उष्ण जल,  अग्निदीपक, पाचक, कण्ठशोधक, पचने में लघु, उष्ण, वस्ति का शोधक होता है। दक्षिण भारत के कई स्थानों पर भोजन के साथ गुनगुना पानी देते हैं, संभवतः उनकी परम्पराओं में यही गुण और सूत्र रहे होंगे। शीतल जल ६ घंटे में, गर्म कर ठंडा किया ३ घंटे में और गुनगुना जल १ घंटे में पच जाता है। गर्म कर ठंडे किय जल कफकारक नहीं होता है।

९० प्रतिशत रोगों का कारण हमारा पेट है। पेट में भोजन और जल ही जाते हैं। कितना भोजन किया, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि कितने प्रतिशत भोजन पचा। समुचित पाचन ही स्वास्थ्य का साधन है। कोई भी अन्न पहले सूर्य के प्रकाश में पकता है, उसके बाद रसोई में अग्नि की आँच में पकता है और अन्त में आमाशय में भी जठराग्नि में पचता है। पेट में भोजन जाते ही जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है और तब तक रहती है, जब तक भोजन पच नहीं जाता है। श्रमशील व्यक्ति में एक घंटा, सामान्य व्यक्ति में डेढ़ घंटा और ठंडे स्थानों में रहने वालों के पेट में दो घंटे तक यह जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। इस समय यदि पेट में जल गया तो वह जठराग्नि को मन्द या ठण्डा कर देगा और भोजन अपच रह जायेगा। यही अपचा भोजन सारे रोगों की जड़ है, डकार से लेकर, एसिडिटी, मोटापा, रक्त अम्लता, जोड़ों का दर्द, हृदयाघात और कैंसर जैसे भीषण रोग इसके कारण होते हैं। यदि भोजन ठीक से पच गया तो कभी कोई रोग हो ही नहीं सकते हैं। भोजन के बाद वात बढ़ना संकेत है, उसे उपेक्षित न करें, वात सूक्ष्म होती है और हर अंग प्रभावित करने में सक्षम भी।

यही कारण है कि भोजन के तुरन्त बाद पिये जल को विष माना गया है। भोजन के एक घंटे पहले और डेढ़ घंटे बाद तक जल नहीं पीना चाहिये। भोजन के पहले पिया जल शरीर को कृशकाय बनाता है और बाद में पिया जल शरीर में स्थूलता लाता है। भोजन करते समय, भोजन अटकने पर एक दो घूँट जल लिया जा सकता है। दो अन्नों के सन्धिस्थान(रोटी और चावल के बीच में) पर भी एक दो घूँट जल लाभदायक होता है क्योंकि दोनों अन्नों के लिये भिन्न एन्जाइमों का स्राव होता है। यदि भोजन के साथ कुछ तरल लेना हो तो सुबह फलों का रस, दोपहर में छाछ और रात में दूध लिया जा सकता है। यद्यपि इनमें भी पर्याप्त जल होता है पर जल जिसमें मिलता है, उसके गुण ले लेता है।

पानी कैसे पियें? पानी को घूँट भर भर कर पानी पियें, जैसे गरम दूध पीते हैं। मुँह में क्षार बनता है, लगभग एक लाख ग्रन्थियाँ हैं और एक दिन में कई लीटर तक लार बनती है। पेट में अम्ल बनता है, जो पाचन में ही सहायक होता है। कहते हैं कि यदि पेट सामान्य रहे तो १०० वर्ष तक निरोग जिया जा सकता है। घूँट घूँट पिये पानी से अधिक लार अन्दर जायेगी जो पेट की अम्लता को शमित करेगी। तेज गति से पीने से भी अम्लता कम होगी पर उतनी मात्रा में नहीं। पशुओं को देखें कि वे भी ऐसे ही पीते हैं, चिड़िया बूँद बूँद पीती है, कुत्ता चाट चाट कर पीता है। लार विश्व की सबसे अच्छी औषधि है, इसको अन्दर जाते रहना आवश्यक है। पशुओं को देखिये, वे तो चाट कर अपने घाव तक ठीक लेते हैं। त्वचा के कई रोगों के लिये सुबह की लार अमृतसम है। जो लोग पान मसाला, गुटका, तम्बाकू आदि खाकर थूकते रहते हैं, उनसे बढ़ा अभागा कोई नहीं। एक ही स्थिति में थूक सकते हैं, जब कफ अधिक बढ़ा हो। तो पान खाने वाले क्या करें? पान बिना कत्था और सुपारी के साथ खायें और अन्दर ले लें। पान पित्त और कफ का नाशक है, चूना वात नाशक है, तो यह संयोग तीनों दोषों का निवारण करता है, पर पान देशी हो, तनिक कसैले स्वाद वाला।

पानी कैसा पियें? शीतल जल तो कभी न पियें, सामान्य तापमान का ही पियें, गुनगुना पानी पियें। पेट में ठंडा पानी जाने से शरीर का तापमान कम होता है और पेट में ऊष्मा पहुँचाने के लिये सारा रक्त पेट की ओर बहता है तो शरीर अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं करता है। अधिक ठंडा पीने वालों को कब्ज की भी समस्या रहती है, क्योंकि ठंडे पानी का पृष्ठतनाव(सर्फेस टेंशन) अधिक रहता है, उससे आँतें संकुचित हो जाती है और मल का प्रवाह रोकती है।

सुबह उठते ही पानी पियें, बिना कुल्ला किये हुये, इसे ऊषापान कहते हैं। यदि ताँबे के बर्तन में रात भर का रखा जल हो तो अच्छा, नहीं तो जल गुनगुना कर लें। मात्रा लगभग एक लीटर, घँूट घूँट कर और धीरे धीरे। रात भर सोते समय सारी क्रियायें शिथिल हो जाती हैं, पर लार बनने की प्रक्रिया चलती रहती है, ब्रह्ममुहूर्त में बनी लार सर्वोत्तम होती है। इस लार का उपयोग चिकित्सा के लिये भी होता है। डायबिटीज के रोगियों के घाव ठीक करने में यह लार बड़ी उपयोगी होती है। चश्मे उतारने के लिये सुबह की लार आँखों में लगाने से अद्भुत लाभ हैं। लार में वह सब कुछ है जो माटी में है, जो शरीर में है, यही कारण है कि त्वचा में लगे दाग आदि भी इस लार से चले जाते हैं।

पानी खड़े होकर कभी न पियें, सदा ही बैठकर पियें, कहते हैं कि खड़े होकर जल पीने से गठिया आदि रोग हो जाते हैं। भार के अनुसार पानी पीना चाहिये। अपने वजन को दस से भाग देकर उसमें दो घटा दें, उतना लीटर पानी एक दिन में पिये, ७० किलो के व्यक्ति के लिये ५ लीटर। प्यास एक वेग भी है, कभी न रोकें, शरीर में जल की कमी होते ही वह रक्त से वह कमी पूरी करने लगता है।

जल जीवन है और जीवन का यह रूप जानना आवश्यक है। अगली पोस्ट में भोजन और आयुर्वेद।

चित्र साभार - www.h2o2.com

22.2.14

कफ, वात, पित्त

कफ, वात और पित्त, ये तीन तत्व हैं जो शरीर में होते है और कार्यरत रहते हैं। कहने को तो इनको और भी विभाजित किया जा सकता था, पर ये तत्व भौतिक दृष्टि से दिखते भी हैं और गुण की दृष्टि से परिभाषित भी किये जा सकते हैं। शरीर की क्रियाशीलता में हम इनका अनुभव कर सकते हैं। कफ का अनुभव हमें अधिक ठंड में होता है। पित्त नित ही हमारे पाचन में सहयोग करता है। वात हमारे वेगों और तन्त्रिका संकेतों को संचालित करता है। यही कारण रहा होगा कि शरीर को विश्लेषित करने के लिये इनको आयुर्वेद में आधार माना गया है।

जीवन जीना प्रकृति चक्र का अंग होना है। प्रकृति के पाँच तत्वों से मिल कर ही बने हैं, कफ, पित्त और वात। कफ में धरती और जल है, पित्त में अग्नि और जल है, वात में वायु है, इन तत्वों की अनुपस्थिति आकाश है। प्रकृति में जिस प्रकार ये संतुलन में रहते हैं, हमारे शरीर में भी इन्हें संतुलन प्रिय है। जिस अनुपात में यह संतुलन शरीर में रहता है, वह हमारे शरीर की प्रकृति है। कुछ में कफ, कुछ में पित्त, कुछ में वायु या कुछ में इनके भिन्न अनुपात प्रबल होते हैं। यह संतुलित स्थिति हमारा शारीरिक ढाँचा, मानसिक स्थिरता और बौद्धिक व्यवहार निर्धारित करती है। यही संतुलन स्वास्थ्य परिभाषित करता है। प्रकृति से हमारे सतत पारस्परिक संबंधों में ये तीन तत्व घटते बढ़ते रहते हैं। किसी भी एक तत्व का शरीर में अधिक होना ही प्रकृति से हमारे घर्षण का कारण है। यही घर्षण रोग का कारण है। जब तक जीवनशैली या औषधियों से संतुलन की स्थिति में वापस पहुँचकर घर्षण कम किया जा सकता है, रोग साध्य रहता है। जब यह असंतुलन असाध्य हो जाता है, शरीर प्रकृति चक्र से बाहर आ जाता है, प्राण शरीर त्याग देते हैं।

वाग्भट्ट कृत अष्टांगहृदयं के प्रथम अध्याय में ही इन तीन तत्वों के गुण परिभाषित हैं। कौन सा या कौन से तत्व प्रभावी है, यह शरीर की बनावट, मानसिक स्थिति और बौद्धिकता से स्पष्ट हो जाता है। जहाँ वात के प्रभाव वाला मन से सतत चंचल होगा, वहीं कफ के प्रभाव वाला सौम्य और स्थिर होगा। इनके गुणों को समझ लेने से किस वस्तु, मौसम, क्रिया और भाव का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, उसके सैद्धान्तिक आधार स्पष्ट हो जाते हैं।

कफ के गुण हैं, स्निग्ध(चिकना), शीत, गुरु(भारी), मन्द, श्लक्ष्ण(खारापन के साथ चिकना), मृत्स्न(मिट्टी की तरह गन्ध वाला), स्थिर। ये गुण धरती और जल के सम्मिलित गुण हैं। जहाँ पर भी इनमें से एक या अधिक गुण कारण या प्रभाव में दिखेंगे, उसमें कफ की उपस्थिति मानी जायेगी। शीत है तो वह कफ बढ़ायेगा। यदि कफ अधिक है तो वह भारीपन या मन्द स्वाभाव लायेगा।

पित्त के गुण हैं, सस्नेह(तैलीय), तीक्ष्ण, ऊष्ण, लघु, विस्त्र(मृत शरीर की गन्ध सा), सर(बहने वाला), द्रव। ये गुण अग्नि और जल को परिभाषित करते हैं, कारण से भी या प्रभाव से भी। जिसे पसीना अधिक आता हो, उसमें ऊष्ण गुण है, वह पित्त के प्रभाव में है। ऐसे ही तीक्ष्ण गन्ध वाले पदार्थ पित्त बढ़ाते हैं।

वात के गुण हैं, रुक्ष, लघु, शीत, खर, सूक्ष्म, गतिमयता। ये सारे गुण वायु में भी पाये जाते हैं। यदि वात अधिक होगा त्वचा रुक्ष होगी। यदि मानसिक तनाव अधिक होगा तो विचारों की गतिमयता के कारण वात बढ़ेगा।

यही नहीं, दिन में, ऋतु में, क्रिया में, शरीर में इन तीनों तत्वों की प्रधानता बदलती रहती है। दिन के प्रारम्भ में कफ, मध्य में पित्त और अन्त में वात प्रधान हो जाता है। बचपन में कफ, युवावस्था में पित्त और वृद्धावस्था में वात प्रधान हो जाता है। पाचन के प्रारम्भ में कफ, मध्य में पित्त और अन्त में वात प्रधान हो जाता है। शरीर के ऊपरी भाग में कफ, मध्य में पित्त और नीचे में वात प्रधान हो जाता है। इसी प्रकार ग्रीष्म के चार माह वातप्रधान, वर्षा के चार माह पित्तप्रधान और शीत के चार माह व कफप्रधान होते हैं।

क्रियाओं को देखें तो उनमें भी यही गुण स्पष्ट दिखते है। सोने में इन्द्रियाँ स्थिर होती हैं तो कफ बढ़ता है। व्यायाम से शरीर संकुचित होता है तो लघु गुण के कारण वात और पित्त बढ़ता है। अधिक चिन्तित रहने से वात बढ़ता है। धूप में निकलने से ऊष्णता के कारण पित्त बढ़ता है। भावों में भी इन गुणों के मूल छिपे हैं। स्पर्श, रूप, रस, रंग, गंध में भी इन तीन गुणों के वर्धन या शमन के गुण छिपे हैं। रॉक संगीत या शास्त्रीय संगीत सुनने में ये तत्व भिन्न रूप से प्रभावित होते हैं।

जहाँ कफ संतुलन लाता है, कल्पनाशीलता लाता है, सृजन लाता है, वहीं इसकी अधिकता क्रोध और आक्रामकता लाती है। जहाँ पित्त शरीर का ताप नियन्त्रण करता है, ऊर्जा देता है, वहीं इसकी अधिकता ज्वर लाती है। जहाँ वात शरीर को गतिमय बनाता है, वेगों और तंत्रिकातन्त्र के संवेगों को संचालित करता है, वहीं दूसरी ओर इसकी अधिकता मानसिक असंतुलन का कारण बनती है।

हर प्रकार के खाद्य को आयुर्वेद में इसी आधार पर विश्लेषित किया गया है। क्या लेने से कौन सा तत्व शरीर में बढ़ता है और कौन सा तत्व शमित होता है, इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। भोजन के माध्यम से ही किस तरह से बदलाव लाकर हम अपने मौलिक संतुलन की स्थिति में वापस जा सकते हैं। इसी सिद्धान्त को आगे बढ़ाते हुये, उन्हीं के आधार पर रोगों की चिकित्सा भी की जाती है। औषधियों में वह तीव्रता रहती है कि किसी तत्व की कमी या अधिकता को शीघ्रता से दूर किया जा सके।

इस आधार पर शरीर, काल, भाव और अन्य द्रव्यों की प्रकृति का वर्गीकरण एक वैज्ञानिक आधार है और वाग्भट्ट द्वारा कई दशकों की प्रायोगिक प्रक्रियाओं के बाद सिद्ध और लिपिबद्ध किया गया है। वाग्भट्ट ने ७००० श्लोकों में इसकी न केवल विस्तृत व्याख्या की है वरन औषधियों को बनाने की विधियों को वर्णित भी किया है। यही कारण है कि वाग्भट्ट की कृति के ऊपर १० से भी अधिक टीकायें लिखी जा चुकी और आयुर्वेद के आचार्यों में उसमें लिखे एक एक सूत्र के लिये निर्विवादित सम्मान है। ऐसी अद्भुत कृति को आंशिक रूप से भी पढ़ सकना मेरे मन में भारतीय मनीषियों और आयुर्वेद के लिये अभूतपूर्व कृतज्ञता का भाव संचारित करता है।

अब मुझे समझ में आ रहा है कि देशी विधियों के प्रभाव के पीछे आयुर्वेद सम्मत वाग्भट्ट के सूत्रों का सशक्त वैज्ञानिक आधार है। हमारे पूर्वज जो नियम परम्परा से निभाते आ रहे हैं, उसके पीछे आयुर्वेद का व्यापक प्रसार है। कालान्तर में पराधीनता के पाशों में हमें नियम तो याद रहे पर उनका वैज्ञानिक आधार लुप्त हो गया। आवश्यकता है उसे पूर्णविश्वास से अपनाने की।

आगे की कड़ियों में इसको विस्तारित करते व्यावहारिक उपाय।

12.2.14

वाग्भट्ट

जीवन जब रजत जयन्ती पर पहुँचता है, घरवालों को पुत्र पुत्रियों के विवाह की चिन्ता सताने लगती है। उन्हे भय रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि वह अपना जीवन साथी स्वतः ही चुन लें। उनके चुनाव में घरवालों का नियन्त्रण रहे, न रहे। इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति के लिये जब युवावस्था अपनी रजत जयन्ती मनाने लगती है, उसे अपने स्वास्थ्य की चिन्ता सताने लगती है। लगता है कि कहीं इसके बाद स्वास्थ्य नियन्त्रण में रहे, न रहे। व्यक्ति खानपान को लेकर तनिक संयमित हो जाता है, लोगों की बतायी हुयी स्वास्थ्य संबंधी सलाहों पर अनायास ही ध्यान देने लगता है।

ऐसा ही कुछ मन में चलने लगा है। जो भी बचपन से सीखा है, जो भी चिकित्सा विज्ञान की सामर्थ्य है, वे सभी ज्ञात है, पर फिर भी मन कुछ व्यवस्थित समझने को आतुर है। एक वैज्ञानिक जीवन शैली, जिसमें स्वास्थ्य को समग्रता से देखा जाये। कोई रोग हो तो लक्षणों के आधार पर चिकित्सा की जा सकती है। किन्तु प्रयास का स्तर रोगों को न आने देने का हो, तब अध्ययन गहरे उतरता है। बुजुर्गों का स्वास्थ्य बड़ा सुदृढ़ दिखा तो उनकी बतायी बातों में स्वतः ही रुचि आने लगी। शुद्ध खानपान और अधिक प्राकृतिक जीवनशैली निश्चय ही एक स्पष्ट कारण लगता था, पर उसके पीछे कोई वैज्ञानिक सोच रही होगी, इसका भान नहीं था। बचपन में बड़े लोग सलाह देते थे कि सुबह उठकर पानी पीना चाहिये, खाने के बाद पानी नहीं पीना चाहिये, रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये आदि आदि। उस समय तक इन सलाहें को उनके अनुभव का निष्कर्ष मान स्वीकार करते रहे। लाभ होता रहा तो उसकी वैज्ञानिकता खंगालने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। 

रोग संबंधी अध्ययन तो फिर भी विश्लेषण के वैज्ञानिक मार्ग से होकर आते हैं, पत्र पत्रिकाओं में निकलने वाले स्वास्थ्य संबंधी अध्ययन अब बेमानी लगते हैं, किसी कम्पनी विशेष के स्वार्थ से प्रेरित लगते हैं, किसी कारण विशेष से प्रायोजित लगते हैं। यदि ऐसा न होता तो क्यों एक ही विषय के बारे में परस्पर विरोधाभासी अध्ययन प्रकाशित होते। इन अध्ययनों की गुणवत्ता कोई सत्यापित भी नहीं करता है, किन परिस्थितियों में, किस देश के लोगों पर वह अध्ययन हुआ, इसकी वैज्ञानिकता सदैव ही संदेह के घेरे में रही है। सिद्धान्त और सार्वभौमिकता के अभाव में फुटकर में प्रकाशित अध्ययन रद्दी में फुटकर के भाव ही बिकते रहे हैं।

आयुर्वेद अब भी जीवित है, समग्र जीवनशैली
यह तो अच्छा है कि सदियों के ठहराव और उपेक्षा के बाद भी आयुर्वेद के तन्तु हमारे समाज में आज भी विद्यमान हैं। आयुर्वेद का सबसे सुखद पक्ष यह है कि इसमें स्वास्थ्य को समग्रता से देखा और समझा जाता है। दिनचर्या, ऋतुचर्या, जीवनचर्या न केवल वाह्य प्रकृति के अनुसार संचालित होती है वरन आपकी आन्तरिक प्रकृति के अनुसार और भी विशिष्ट होती जाती है। रोग आने की प्रतीक्षा किये बिना यदि स्वास्थ्य पर ध्यान देना है तो आयुर्वेद के सिद्धान्तों को समझना पड़ेगा। यदि स्वयं पर इतना विश्वास है कि रोग आने पर निपटा जा सकता है और तब तक अनियन्त्रित और अव्यस्थित जीवनशैली निभायी जा सकती है, तो वे आयुर्वेद के सिद्धान्त समझने का मानसिक श्रम त्याग सकते हैं।

युवावस्था तो ऊर्जा से भरपूर होती है, शरीर में जो खाते हैं, पच जाता है, शरीर से जो चाहते हैं, निभ जाता है। युवावस्था की रजत जयन्ती आने के पहले संकेत मिलना प्रारम्भ हो जाते हैं, हम बहुधा उन्हें टाल जाते हैं। जिस तरह से भयावह रोगों ने युवावस्था में भी सेंध लगायी है, लगता है समग्र स्वास्थ्य को समझने के प्रयास हमें पर्याप्त पहले से प्रारम्भ कर देना चाहिये। संभवतः यही भाव मन में रहे होंगे जब कई बार अल्पकालिक बिगड़े स्वास्थ्य ने इस दिशा में सोचने को प्रेरित किया। विशेष बल सिद्धान्तों को समझने में दिया गया, भले ही वह धीरे धीरे समझ में आयें। निष्कर्षो से भी अधिक महत्वपूर्ण कारणों में उतरना था, एक बार कारण समझ आ जाते हैं, निष्कर्ष स्वतः सिद्ध हो जाते हैं।

एक भय और था और उसके लिये संभवतः हम लोगों की अंग्रेजी शिक्षा दोषी है। पहले लगा कि पता नहीं आयुर्वेद सामान्य भाषा में समझ आयेगा या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अधकचरा ज्ञान पाकर, स्वयं और आयुर्वेद, दोनों से ही अविश्वास कर बैठें। अपनी संस्कृति से जुड़े विषयों को न पढ़ने वालों में दोनों तरह के लोग हैं। जिन्हें मैकालियत पर अधिक विश्वास रहा है, उनकी मानसिकता तो समझी जा सकती है, पर जो अपनी संस्कृति के सशक्त पक्षों पर आस्था रखते हैं, वे भी उसे एक बन्द धर्मग्रन्थ की तरह पूजा की अल्मारी में सजाये रहते हैं। संभवतः दूसरी श्रेणी में आने के कारण स्वयं पर आयुर्वेद न समझ पाने का भय लग रहा था। वह भय न केवल निर्मूल सिद्ध हुआ वरन स्वयं की संस्कृति से प्रगाढ़ता बढ़ा गया। संस्कृति के पक्ष इतने सरल और वैज्ञानिक हैं कि उनके पढ़ने के साथ ही उनसे संबंधित फैलायी भ्रांतियाँ अपने आकार खोने लगती हैं और लगने लगता है कि किन मूढ़ों के कहने पर इतने दिनों तक हम अपने ज्ञानकोष से छिटके छिटके फिरते रहे।

कई स्रोतों से किये ज्ञानार्जन में भले ही भिन्नता दिखती हो,  पर कालान्तर में वह ज्ञान एकल होने लगता है, वह एक रूप में पिघलने लगता है। हमारी प्रकृति ही ऐसी है कि हम एक सत्य को दो रूपों में नहीं पचा सकते, वह किसी न किसी रूप में एक हो जायेगा। जितना भी जटिल ज्ञान अर्जित किया हो, जितना भी विस्तृत अनुभव रहा हो, अन्ततः वह एक सहज रूप ले लेता है। यही सिद्धान्त स्वास्थ्य में भी लागू होता है। रोग के कारणों में उतरते ही, हम उन सिद्धान्तों को समझने लगते हैं जिनके पालन से रोग कभी विकसित ही न हो सकें। अन्ततः खानपान की प्रारम्भिक क्रिया पर ही स्वास्थ्य के आधार टिके पाये जाते हैं। प्रकृति जिन सिद्धान्तों का मान रखती है, वही सिद्धान्त हमारे स्वास्थ्य का आधार भी है। कारणों के स्रोत पर आगे बढ़ते हमें जो सूत्र मिलते हैं, वे प्रकृति की क्रियाशैली की ओर इंगित करते हैं। यदि प्रकृति के सिद्धान्त सूत्र हम जीवनशैली में अपना लें तो हम स्वास्थ्य के सुदृढ़ आधार पा सकेंगे।

प्रकृति और स्वास्थ्य के इस संबंध की गहराई और स्पष्ट तब हुयी जब आयुर्वेद के मौलिक सिद्धान्त पढ़े। चरक, सुश्रुत, निघंटु और वाग्भट्ट आयुर्वेद के चार स्तम्भ हैं। चरक के वृहद और पाण्डित्यपूर्ण कार्य को उनके शिष्य वाग्भट्ट ने प्रायोगिक आधार देकर स्थापित किया। वर्षों के अध्ययन के पश्चात जो निष्कर्ष आये, वही हमारी संस्कृति में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बस गये। कई पीढ़ियों को तो ज्ञात ही नहीं कि प्राचीन काल से पालन करते आ रहे कई नियमों का आधार वाग्भट्ट के सूत्र ही हैं। दिनचर्या, ऋतुचर्या, भोजनचर्या, त्रिदोष आदि के सिद्धान्त सरल नियमों के रूप में हमारे समाज में रच बस गये हैं। मैं पहले आश्चर्य करता था कि बचपन में सीखे स्वास्थ्य संबंधी सूत्र कहाँ से आये, क्या उनका कोई शास्त्रीय आधार है कि नहीं? जैसे जैसे वाग्भट्ट का कार्य पढ़ता गया, बचपन में सीखे गये सारे सूत्र एक के बाद एक दिखते गये। छोटी से छोटी सीख हो, कुछ निषेध हो, कुछ विशेष हो, सबका स्थान वाग्भट्ट के सूत्रों में मिल गया।

आयुर्वेद के बारे में जो कठिनता का आवरण चढ़ा हुआ है, वह धीरे धीरे हटता गया। आयुर्वेद का आधार स्वयं को, प्रकृति को और दोनों के परस्पर संबंधों को समझने से प्रारम्भ होता है। प्रकृति के सिद्धान्त न केवल दर्शन का विषय हैं, वरन स्वास्थ्य के प्राथमिक सूत्र भी हैं। हो भी क्यों न, शरीर भी तो प्रकृति का ही तो अंग है। भोजनचर्या, दिनचर्या और ऋतुचर्या आयुर्वेद की समग्रता और व्यापकता को स्थापित करते हैं। आप भी ध्यान दें, स्वास्थ्य संबंधी सलाहें जो हमें अपने बुज़ुर्गों से मिली है, उसका कोई न कोई संंपर्कसूत्र हमें वाग्भट्ट के कार्य में मिल जायेंगे।

आने वाली पोस्टों में आयुर्वेद के सिद्धान्तों में तनिक और गहरे उतरेंगे।

चित्र साभार - www.gayatripharma.com