कुछ माह पहले बंगलोर में परेश रावल अभिनीत यह नाटक देखा था, एक टिकट अतिरिक्त था तो प्रशान्त को भी ले गया था। हास्य का पुट लिये और मनोरंजन के थाल में परोसे इस नाटक में संदेश बड़ा ही स्पष्ट था। कभी कभी जो कड़वे सच डाँट कर या उपदेश की भाषा में नहीं समझाये जा सकते हैं, उनके लिये संभवतः यही सर्वाधिक उचित, सार्थक और सशक्त माध्यम है। परेश रावल के अभिनय की कुशलता और भावों के बीच सहज संक्रमण की कलात्मकता ने लम्बे चले इस नाटक में पल भर के लिये अपने स्थान से हिलने नहीं दिया।
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समझ आपस की |
चार पात्र हैं, पिता, पुत्र, बहू और इंस्पेक्टर। पिता और इंस्पेक्टर का पात्र परेश रावल ने किया है। कहानी बड़ी सीधी है और उसकी आंशिक झलक हर ऐसे परिवार में देखी जा सकती है। पुत्र और बहू दोनों ही नौकरी करते हैं और बहुधा उन्हें सायं घर आते आते देर हो जाती है और थकान भी। पिता वृद्ध हैं, अकेले भी, अपने आप को जितना व्यस्त रख सकते हैं, रखते हैं। घर पर अपना अधिकार समझते हैं और पुत्र और बहू से अपनी आत्मीयता भी। इसी कारण बहुधा वह ऐसी बातें कह देते हैं जो बहू को चुभ सी जाती हैं। उन्हें लगता है कि समाज की मौलिक समझ में पीढ़ियों का अन्तर है, बहू को ससुर की समझ रूढ़िवादी लगती है तो ससुर को बहू की समझ व्यर्थवादी लगती है।
समझ का यही अन्तर हास्य का कारण बनता है। दोनों पक्षों के द्वारा एक दूसरे के तर्कों में से कुतर्क को हटाने से विषय अपने संवादों के माध्यम से स्पष्ट होता जाता है, ससुर और बहू को नहीं वरन दर्शकों को। पति दोनों की इस संवादीय वाणवर्षा में सदा ही बिंधा दिखता है, किसी का पक्ष स्पष्ट रूप से नहीं ले सकता है, किसी बहाने एकान्त ढूँढ लेता है।
इसी बीच पिता बालकनी से गिर कर अस्पताल पहुँच जाते हैं। इस घटना की जाँच करने इंस्पेक्टर आता है और गिरने के सभी पहलुओं का विधिवत अध्ययन करता है, दम्पति का बयान आदि भी लेता है। कहानी गम्भीर होने लगती है। नित्य की बहस तो ठीक थी पर उन्हीं बातों से कोई इंस्पेक्टर कोई आपराधिक निहितार्थ निकालने लगे तो दम्पति का चिन्तित होना स्वाभाविक ही है। यही होता है, पति, पत्नी अपनी बहसों में कटुता के तत्व को न याद रखने की सी बातें करते हैं। इससे यही तर्क कोई पारिवारिक द्वन्द्व न लग विशुद्ध बौद्धिक बहस सी लगने लगते हैं। इंस्पेक्टर इस तथाकथित हृदय परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता है और उन दोनों के ऊपर पिता की सुनियोजित हत्या का आरोप लगाता है।
अपने आप को उस आरोप से बचाने के पक्ष में दिये गये तर्क वस्तुतः उनकी आदर्शवादी सोच को दिखाते थे। व्यवहारिकता और आदर्शवादिता का यह नया अन्तर नाटक को एक और स्तर गहरे ले जाता है और संबंधों को समझने में सहायता करता है। दैवयोग से पिताजी को अस्पताल में होश आ जाता है और वह आकर सच बता देते हैं कि कुछ ठीक करने के प्रयास में फिसल जाने से यह दुर्घटना हुयी है। सुखद अन्त की आस थी पर पिता तब अपनी टीस व्यक्त करते हैं।
पिता कहते हैं कि मुझे ज्ञात है कि बहू का पक्ष बहुधा ठीक ही रहता है, पर मेरे अन्दर दिन भर किसी से बात न करने के कारण जो एकान्तजनित अकुलाहट रहती है, वही मुझे उद्धत करती है और मैं जानबूझकर कुछ न होते हुये भी बहस करने योग्य तत्व निकाल लेता हूँ। मुझे इस खटपट में अच्छा लगता है, कुछ व्यस्तता का आभास होता है। पिता तब अपने पुत्र से कहते हैं कि तुम्हें याद है कि पिछली बार तुमने मुझे कब स्पर्श किया था। बचपन से बड़े होने तक स्नेह और आशीर्वाद का संचरण स्पर्श से ही तो होता रहा है। इस स्पर्श की अनुपस्थिति यदि अकुलाहट न भरे तो अस्वाभाविक ही है। संभवतः अभी तुम्हें इस तथ्य की आवश्यकता सहज न लगे पर जीवन की साँझ में यह होने लगता है।
नाटक के अंतिम पड़ाव पर पूरा सभागार गहरी स्तब्धता में था, निश्चय ही बहुत लोग यह सोच रहे होंगे कि पिछली बार कब उन्होंने अपने बूढ़े माता पिता को स्पर्श किया होगा? दर्शकों की प्रतिक्रिया देख उत्तर पाना कठिन नहीं था। कई और सोच रहे होंगे कि स्पर्श के स्नेह में पल्लवित हुये वे कब स्वतन्त्र हो गये और स्पर्श की संवेदना को भुला बैठे। आँखें मेरी भी नम थीं, मैं उस समय अपने बूढ़े माता पिता से दो हज़ार किलोमीटर दूर था।
कभी कभी अधिक बुद्धि के कुप्रभाव में हम तर्क से सुख के बड़े बड़े मानक गढ़ देते हैं, जब कि वास्तविक सुख कहीं अधिक सहज और सरल होता है। लोग कहते हैं कि बच्चे और वृद्धों के स्वभाव में कोई अन्तर नहीं होता है। जहाँ तक स्नेह की बात होती है, कोई अन्तर नहीं होता है। अन्तर यदि होता है तो हठ का। बच्चे पर यदि ध्यान न दिया जाये तो वह धरती आसमान एक कर देता है। वृद्ध अपनी बात कहना तो चाहते हैं पर मर्यादाओं को मन में रख बहुधा मौन होकर अपनी पीड़ा पीना सीख लेते हैं, स्पर्श के स्नेह को अकुलाते रहते हैं।
एक बार अपने बूढ़े माता पिता को सस्नेह स्पर्श तो कीजिये, उनकी त्वचा में स्नेहिल कंपन आने लगेगा, उनकी आँखें नम हो चलेंगी, वर्षों का संचित स्नेह प्लावित हो बहने लगेगा, संबंधों के व्याजाल सुलझने लगेंगे, पीढ़ियों के अन्तर मिटने लगेगा। यही नहीं, आप भी अधिक व्यापक अनुभव करने लगेंगे, संभवतः वैसा ही कुछ, जैसा मैं डियर फ़ादर देखने के बाद अनुभव कर रहा था।