Showing posts with label स्नेह. Show all posts
Showing posts with label स्नेह. Show all posts

5.2.14

डियर फॉदर

कुछ माह पहले बंगलोर में परेश रावल अभिनीत यह नाटक देखा था, एक टिकट अतिरिक्त था तो प्रशान्त को भी ले गया था। हास्य का पुट लिये और मनोरंजन के थाल में परोसे इस नाटक में संदेश बड़ा ही स्पष्ट था। कभी कभी जो कड़वे सच डाँट कर या उपदेश की भाषा में नहीं समझाये जा सकते हैं, उनके लिये संभवतः यही सर्वाधिक उचित, सार्थक और सशक्त माध्यम है। परेश रावल के अभिनय की कुशलता और भावों के बीच सहज संक्रमण की कलात्मकता ने लम्बे चले इस नाटक में पल भर के लिये अपने स्थान से हिलने नहीं दिया।

समझ आपस की
चार पात्र हैं, पिता, पुत्र, बहू और इंस्पेक्टर। पिता और इंस्पेक्टर का पात्र परेश रावल ने किया है। कहानी बड़ी सीधी है और उसकी आंशिक झलक हर ऐसे परिवार में देखी जा सकती है। पुत्र और बहू दोनों ही नौकरी करते हैं और बहुधा उन्हें सायं घर आते आते देर हो जाती है और थकान भी। पिता वृद्ध हैं, अकेले भी, अपने आप को जितना व्यस्त रख सकते हैं, रखते हैं। घर पर अपना अधिकार समझते हैं और पुत्र और बहू से अपनी आत्मीयता भी। इसी कारण बहुधा वह ऐसी बातें कह देते हैं जो बहू को चुभ सी जाती हैं। उन्हें लगता है कि समाज की मौलिक समझ में पीढ़ियों का अन्तर है, बहू को ससुर की समझ रूढ़िवादी लगती है तो ससुर को बहू की समझ व्यर्थवादी लगती है।

समझ का यही अन्तर हास्य का कारण बनता है। दोनों पक्षों के द्वारा एक दूसरे के तर्कों में से कुतर्क को हटाने से विषय अपने संवादों के माध्यम से स्पष्ट होता जाता है, ससुर और बहू को नहीं वरन दर्शकों को। पति दोनों की इस संवादीय वाणवर्षा में सदा ही बिंधा दिखता है, किसी का पक्ष स्पष्ट रूप से नहीं ले सकता है, किसी बहाने एकान्त ढूँढ लेता है।

इसी बीच पिता बालकनी से गिर कर अस्पताल पहुँच जाते हैं। इस घटना की जाँच करने इंस्पेक्टर आता है और गिरने के सभी पहलुओं का विधिवत अध्ययन करता है, दम्पति का बयान आदि भी लेता है। कहानी गम्भीर होने लगती है। नित्य की बहस तो ठीक थी पर उन्हीं बातों से कोई इंस्पेक्टर कोई आपराधिक निहितार्थ निकालने लगे तो दम्पति का चिन्तित होना स्वाभाविक ही है। यही होता है, पति, पत्नी अपनी बहसों में कटुता के तत्व को न याद रखने की सी बातें करते हैं। इससे यही तर्क कोई पारिवारिक द्वन्द्व न लग विशुद्ध बौद्धिक बहस सी लगने लगते हैं। इंस्पेक्टर इस तथाकथित हृदय परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता है और उन दोनों के ऊपर पिता की सुनियोजित हत्या का आरोप लगाता है।

अपने आप को उस आरोप से बचाने के पक्ष में दिये गये तर्क वस्तुतः उनकी आदर्शवादी सोच को दिखाते थे। व्यवहारिकता और आदर्शवादिता का यह नया अन्तर नाटक को एक और स्तर गहरे ले जाता है और संबंधों को समझने में सहायता करता है। दैवयोग से पिताजी को अस्पताल में होश आ जाता है और वह आकर सच बता देते हैं कि कुछ ठीक करने के प्रयास में फिसल जाने से यह दुर्घटना हुयी है। सुखद अन्त की आस थी पर पिता तब अपनी टीस व्यक्त करते हैं।

पिता कहते हैं कि मुझे ज्ञात है कि बहू का पक्ष बहुधा ठीक ही रहता है, पर मेरे अन्दर दिन भर किसी से बात न करने के कारण जो एकान्तजनित अकुलाहट रहती है, वही मुझे उद्धत करती है और मैं जानबूझकर कुछ न होते हुये भी बहस करने योग्य तत्व निकाल लेता हूँ। मुझे इस खटपट में अच्छा लगता है, कुछ व्यस्तता का आभास होता है। पिता तब अपने पुत्र से कहते हैं कि तुम्हें याद है कि पिछली बार तुमने मुझे कब स्पर्श किया था। बचपन से बड़े होने तक स्नेह और आशीर्वाद का संचरण स्पर्श से ही तो होता रहा है। इस स्पर्श की अनुपस्थिति यदि अकुलाहट न भरे तो अस्वाभाविक ही है। संभवतः अभी तुम्हें इस तथ्य की आवश्यकता सहज न लगे पर जीवन की साँझ में यह होने लगता है।

नाटक के अंतिम पड़ाव पर पूरा सभागार गहरी स्तब्धता में था, निश्चय ही बहुत लोग यह सोच रहे होंगे कि पिछली बार कब उन्होंने अपने बूढ़े माता पिता को स्पर्श किया होगा? दर्शकों की प्रतिक्रिया देख उत्तर पाना कठिन नहीं था। कई और सोच रहे होंगे कि स्पर्श के स्नेह में पल्लवित हुये वे कब स्वतन्त्र हो गये और स्पर्श की संवेदना को भुला बैठे। आँखें मेरी भी नम थीं, मैं उस समय अपने बूढ़े माता पिता से दो हज़ार किलोमीटर दूर था।

कभी कभी अधिक बुद्धि के कुप्रभाव में हम तर्क से सुख के बड़े बड़े मानक गढ़ देते हैं, जब कि वास्तविक सुख कहीं अधिक सहज और सरल होता है। लोग कहते हैं कि बच्चे और वृद्धों के स्वभाव में कोई अन्तर नहीं होता है। जहाँ तक स्नेह की बात होती है, कोई अन्तर नहीं होता है। अन्तर यदि होता है तो हठ का। बच्चे पर यदि ध्यान न दिया जाये तो वह धरती आसमान एक कर देता है। वृद्ध अपनी बात कहना तो चाहते हैं पर मर्यादाओं को मन में रख बहुधा मौन होकर अपनी पीड़ा पीना सीख लेते हैं, स्पर्श के स्नेह को अकुलाते रहते हैं।

एक बार अपने बूढ़े माता पिता को सस्नेह स्पर्श तो कीजिये, उनकी त्वचा में स्नेहिल कंपन आने लगेगा, उनकी आँखें नम हो चलेंगी, वर्षों का संचित स्नेह प्लावित हो बहने लगेगा, संबंधों के व्याजाल सुलझने लगेंगे, पीढ़ियों के अन्तर मिटने लगेगा। यही नहीं, आप भी अधिक व्यापक अनुभव करने लगेंगे, संभवतः वैसा ही कुछ, जैसा मैं डियर फ़ादर देखने के बाद अनुभव कर रहा था।

22.1.14

मॉन्टे कार्लो और माँ के स्वेटर

बचपन में माँ के हाथ के बने स्वेटर पहनता था। उनकी बुनाई सारे मुहल्ले में सराही जाती थी। लगभग हर जाड़े में हाथ का बुना एक नया स्वेटर मिल जाता था। तीन साल से अधिक पुराना स्वेटर या तो छोटे भाई को मिलता था या घर आने वाली नाउन या धोबन को दे दिया जाता। उन स्वेटरों की गरमाहट अब तक याद है, लाल इमली की ऊन लाती थी माँ, रंग गाढ़े, डिजाइन बिल्कुल नयी, हर वर्ष। पहन कर मैं भी मॉडल की तरह इठलाया घूमता था। हर छोटी बड़ी लड़की जिसे भी स्वेटर बनाने में रुचि होती, रोकती और बड़े ध्यान से स्वेटर की डिजाइन समझती। उन ५-१० मिनटों में मैं लजाया सा चुपचाप खड़ा रहता, अन्दर ही अन्दर लगता कि माँ ने कहाँ फँसा दिया, पर इस तरह पकड़े जाना और ध्यान दिये जाना मन ही मन अच्छा लगता था।

घर में पहने जाने वाले ही नहीं वरन विद्यालय के भी स्वेटर माँ के बुने रहते थे। रंग तनिक अलग रहते थे, अन्य सबसे चटख भी रहते थे, पर चल जाते थे। उस समय विद्यालय के वेष में रंगों को लेकर इतना कठोरता नहीं थी, अध्यापक थोड़ा अलग स्वेटर सह लेते थे। वैसे लाल रंग के नियत स्वेटर के स्थान पर विद्यालय में मैरून से लेकर गहरे गुलाबी तक के सारे रंग चल जाते थे। उस समय तक संभवतः वेष बेचने वालों की व्यावसायिकता ने विद्यालयों में पैर नहीं पसारे थे। माँ तब भी नहीं मानती थी, उसे सादे स्वेटर बनाना संभवतः अपनी प्रतिभा की अवहेलना लगती हो। वह कोई न कोई भारी भरकम डिजाइन स्वेटर में डाल देती थी। बहुधा तो पकड़े नहीं जाते थे, पर कई बार भय बना रहता था। कई बार स्वतः ही विशेष न दिखने का हठ किया तो ऐसी डिजाइन डाली कि जो दूर से सादी पर पास से विशिष्ट लगे।

जब घर में मुहल्ले की कई महिलायें यह जानने आती कि बुनाई के फन्दे कैसे डाले जायें तो उनकी बातें कुछ समझ में न आतीं। तीन सीधे डाल के दो उल्टे डालना, तीसरी सिलाई से यह डिजाइन बनाना इत्यादि। ऐसा लगता कि महिलाओं की कोई महान वैज्ञानिक कार्यशाला चल रही हो। हमको तो बस पहनने में और दिखाने में आनन्द, कैसे बना उसकी तकनीक से भला हमें क्या? मन के कोने में पर एक उत्सुकता बनी रहती कि कैसे दो सिलाई के माध्यम से इतना सुन्दर और अच्छा स्वेटर  बन जाता है?

नयी पीढ़ी पर पुरानी लगन
स्पष्ट याद है, ८ साल का था, मुहल्ले के पास की दुकान में एक हाथ से चलाने वाली मशीन आयी थी, जिससे स्वेटर बुना जा सकता था। अपने मित्र की सहायता से और उसके साथ ही देखने गया था कि वह मशीन कैसे कार्य करती है? जिस गति से वह ऊन की एक पूरी पंक्ति बुन देती थी, देख कर बड़ा ही आश्चर्य हुआ। रंग बदल कर सादी डिजाइन भी डाल सकती थी वह मशीन। बाल उत्सुकता में उस मशीन को चलाने वाले कारीगर से पूछा कि एक स्वेटर कितने दिन में बना देगी यह मशीन? एक दिन, यह सुनकर मन बैठ गया। मेरी माँ को तो धीरे धीरे बुनते लगभग एक माह से अधिक लग जाता है। अपना स्वेटर दिखा कर कहा कि इस तरह की कठिन डिजाइन बना पायेगी यह मशीन? नहीं, यह मशीन तो नहीं बना पायेगी, पर और बड़ी मशीने अवश्य बना सकती हैं। आधे हारे और आधे जीते घर लौटे, तब मेरे लिये माँ के बनाये हुये स्वेटर से अधिक उस पर बनी डिजाइन विशिष्ट हो गयी।

माँ स्वेटर बनाती रही और मैं पहनता रहा, नौकरी मिलने तक। याद है, पहली बार प्रशिक्षण में जाने के पहले एक स्वेटर खरीदा था, बाहर से, बाहर ही पहनने के लिये। तब भी पास में शेष दो तीन स्वेटर माँ के बुने हुये ही थे। दो वर्ष बाद विवाह नियत हो गया, तनिक और सुगढ़ दिखने के लिये दो और स्वेटर खरीदे, मॉन्टे कार्लो के, १५०० का एक। पतली ऊन के और चिकने दिखने वाले दो स्वेटरों ने मोटी ऊन के और तनिक खुरदुरे दिखने वाले माँ के हाथ के बने स्वेटरों का स्थान ले लिया। उस समय विवाह के लिये और भी कपड़े लिये गये थे, उसी झोंक में मैंने ध्यान भी नहीं दिया कि ये स्वेटर माँ के बनाये स्वेटरों से लगभग तीन गुना मँहगे थे। साथ ही इस पर भी ध्यान नहीं गया कि माँ को क्या लगा होगा? माँ ने भी सोचा होगा कि फैशन कर लेने दो, अपने मन का पहन लेने दो।

मॉन्टे कार्लो के स्वेटरों ने बाहर का क्षेत्र सम्हाल लिया। घर में पहन कर उन्हें गन्दा नहीं किया जा सकता था अतः घर में माँ के बने स्वेटर ही चलते रहे, एक आधा और एक पूरा। गरमाहट पूरी रहती थी, पर मैने भी ध्यान देना बन्द कर दिया कि माँ अब उनमें कोई डिजाइन नहीं बनाती थी, स्वेटर सादे ही रहते थे। स्वाभाविक ही है, सादे स्वेटरों की डिजाइन तो कोई देखता भी नहीं है, बचपन का उत्साह और ध्यानाकर्षण का आनन्द उन विशिष्ट स्वेटरों के साथ जीवन से चला गया। मेरे छोटे भाई बहनों ने भी बड़े होते होते, मेरी देखा देखी मॉन्टे कार्लो अपना लिया, पर माँ उनके लिये भी सादे स्वेटर बनाती रही। 

माँ का उत्साह पुनः जागा जब मेरे दोनों बच्चे हुये। याद है, पृथु और देवला के होने पर, पहली ठंड आने तक दोनों के लिये पाँच स्वेटर तैयार थे, डिजाइन के साथ। यद्यपि संबंधीगण बने बनाये स्वेटर दे गये थे, पर गरमाहट के लिये उन्हें उनकी दादी के बनाये ही स्वेटर पहनाये। माँ का ऊन खरीद कर लाने और डिजाइन निर्धारित करने में जो उत्साह और क्रम दिखायी दिया, मुझे मेरे बचपन का यादें दिला गया। पता नहीं क्या कारण था, वह उत्साह ८-१० वर्षों से अधिक नहीं चल सका, क्योंकि मेरे बच्चों को दादी के हाथ के बने स्वेटर चुभने लगे। हमने भी अधिक जोर नहीं डाला, माँ ने फिर उसे समझ लिया, कुछ नहीं कहा।

इसी बीच बंगलोर आ जाने से हमें भी स्वेटर पहने ४ वर्ष से अधिक हो गया है। भरे जाड़े में घर न जाकर माँ पिता को बंगलोर ही बुला लेते हैं और उन्हें उत्तर भारत की कड़कड़ाती ठंड से एक दो माह के लिये तनिक दूर रखने में सहायता कर देते हैं। इसी बीच, दो वर्ष पहले एक बिल्ली पाली थी, अवसर पाकर उसने मेरे दो स्वेटर कुतर डाले थे, एक मॉन्टे कार्लो का, दूसरा माँ का बुना। अभी मेरे पास माँ का बुना कोई स्वेटर नहीं है।

इस बार जब माँ आयीं तो उनके हाथ में फिर से वही पुरानी प्रसन्नता थी, हाथ में सिलाई और झोले में ऊन का गोला। मेरा भतीजा दो वर्ष का हो गया है, उसके लिये स्वेटर बुनने में लगी थी माँ। बालिश्त और अंगुल से उसकी माप लेकर आयी थी, जाते जाते लगभग पूरा बन गया था वह स्वेटर। वही पुराने चटख रंग, डिजाइन के प्रति वही उत्सुकता। इस बार एक और बात हुयी। श्रीमतीजी तो बाहर के बने स्वेटरों से आसक्ति रखती हैं, पर पहली बार मेरी बिटिया ने अपनी दादी की स्वेटर बुनायी की प्रक्रिया को उत्सुकता से देखा और संभवतः कुछ सीखा भी। माँ के आँखों की ललक देखते ही बनती थी। ६६ वर्ष की अवस्था, आँखों में एक चश्मा, हाथ में दो सिलाई, मन में चलती फन्दों की गणना। पिछले ४२ वर्षों में भले ही फैशन के कुछ अन्तराल आ गये हों, पर माँ के हाथ कभी रुके नहीं, सिलाई और ऊन उनके हाथों का अभिन्न अंग बना रहा।

फिर से माँ के हाथ का बना स्वेटर पहनने का मन कर रहा है। यह ठंड तो बंगलोर में ही निकल गयी। काश अगली नवम्बर में ठंडा स्थान हो और शरीर पर माँ में हाथ का बना, स्नेह की गरमाहट से भरा, डिजाइन वाला मोटा स्वेटर। बाय बाय, मॉन्टे कार्लो।

चित्र साभार - www.stockphotopro.com

15.5.13

दुआ सबकी मिल गयी, अच्छा हुआ

एक माह पहले जन्मदिन पर ढेरों बधाइयाँ आयी थीं, मन सुख से प्लावित हो गया था। आँखें बन्द की तो बस यही शब्द बह चले। यद्यपि फेसबुक पर इसे डाल चुका था, पर बिना ब्लॉग में स्थान पाये, बिना सुधीजनों का स्नेह पाये, रचना अपनी पूर्णता नहीं पा पाती है।

दुआ सबकी मिल गयी, अच्छा हुआ,
चिहुँकता हर बार मन, बच्चा हुआ,
कुछ सफेदी उम्र तो ले आयी है,
हाल फिर भी जो हुआ, सच्चा हुआ।

दिन वही है, बस बरसता प्यार है,
इन्द्रधनुषी सा लगे संसार है,
मूक बहता, छद्म, दुविधा से परे,
उमड़ता है, नेह का व्यापार है।

लाज आती, कोई आँखों पर धरे,
शब्द मधुरिम कर्णछिद्रों में ढरे,
कुटिल मन की गाँठ, दुखती क्षुद्रता, 
कोई तत्पर, विहँस बाँहों में भरे। 

नित्य निद्रा में अकेला, किन्तु अब,
स्वप्न में भी संग चले आयेंगे सब,
आज होगा एक जलसा देखना,
छन्द छलकें, हृदय मिल जायेंगे जब।

मैॆ रखूँगा साथ, इस विश्वास को,
प्रेमपोषित इस अनूठी प्यास को,
कल सबेरा पूर्णतः उन्नत खिले,
साध लूँगा प्रकृति की हर साँस को।

7.1.12

स्नेह से ध्येय तक

छात्रावास में आज अनुराग का दूसरा दिन है। कल जब पिता जी उसे यहाँ छोड़कर गये थे, तब से अनुराग को अजीब सी बेचैनी हो रही थी। अपने दस वर्ष के जीवन में अनुराग ने घर ही तो देखा था, अनुराग को लगातार उसी घर की याद आ रही थी।

दो महीने पहले पाँचवी कक्षा में उसके अच्छे अंक आये थे। उसके पिता जी अपने शहर के एक प्रबुद्ध व्यक्ति से मिलने गये थे जहाँ पर अनुराग के भविष्य के बारे में भी बातें हुयी थीं। वहाँ से आने के बाद अनुराग के पिता जी ने उसके बाहर जाकर पढ़ने के लिये भूमिका बांधनी चालू कर दी थी। अनुराग ने पिता जी को कई बार माँ से कहते सुना था "अपने शहर में कोई अच्छा विद्यालय नहीं है, अनुराग का भविष्य यहाँ बिगड़ जायेगा। अपने यहाँ लोग बनते ही क्या हैं, कुछ गुण्डे बनते हैं, कुछ चोर बनते हैं। अगर हमको अनुराग का भविष्य बनाना है तो उसे यहाँ से निकाल कर बाहर पढ़ाना पड़ेगा।"

इस तरह धीरे धीरे प्रस्तावना बनने लगी। माँ का विरोध भी भविष्य की उज्जवल आशा के सामने फीका पड़ने लगा, लेकिन माँ का प्यार अनुराग के प्रति और भी बढ़ने लगा। अनुराग के सामने छात्रावास के अच्छे अच्छे खाके खींचे जाने लगे, नया शहर घूमने को मिलेगा, ढेर सारे मित्र मिलेंगे, घूमने इत्यादि की स्वतन्त्रता रहेगी और न जाने क्या क्या बताया गया अनुराग को मानसिक रूप से तैयार करने के लिये।

लेकिन आज अनुराग दुःखी था। उसे घर की बहुत याद आ रही थी, किसी से बात करने की इच्छा नहीं हो रही थी। कल की रात पहली बार अनुराग अपने घर के बाहर सोया था और जागते ही अपने घर की छवि न पाकर अनुराग का मन भारी हो गया। कभी-कभी उसे अपने माता पिता पर क्रोध आता था, प्यारे प्यारे छोटे भाई बहनों का चेहरा रह रह कर आँखों के सामने घूम जाता था। अभी अनुराग के अन्दर वह क्षमता नहीं आयी थी कि वह अपने आप को समझा सके। बुद्धि इतनी विकसित नहीं हुयी थी कि भविष्य के आँगन में वर्तमान की छवि देख पाता। विचारों का आयाम केवल घर की चहारदीवारी तक ही सीमित था, घर के सामने सारी दुनिया का विस्तार नगण्य था।

ऐसी मानसिक उथल पुथल में घंटों निकल गये। अनुराग उठा, तैयार हुआ, विद्यालय गया। कक्षा में अध्यापक उसे मुँह हिलाते हुये गूँगे से प्रतीत हो रहे थे। साथ में बैठा हुआ छात्र अपने मामा की कार के बारे में बता रहा था लेकिन अनुराग से उचित मान न पाकर वह दूसरी तरफ मुड़ गया। मध्यान्तर में अनुराग भोजनालय में खाना खाने गया और फिर अनमना सा विद्यालय के सामने वाले प्रांगण में आकर चुपचाप बैठ गया। "क्या नाम है तुम्हारा, बच्चे?" आवाज सुनकर अनुराग चौंका। "अनुराग.....शर्मा" मुड़कर देखा तो एक दाढ़ी वाले सज्जन खड़े थे। वेशभूषा से विद्यालय के अध्यापक प्रतीत हो रहे थे।

"क्यों, घर की याद आ रही है ना?" प्रश्न सुनकर अनुराग सकते में आ गया। "हाँ...नहीं नहीं" अनुराग हकलाते हुये बोला। अनुराग खड़ा हो गया और अब वह अध्यापक के साथ खड़े एक और छात्र को देख सकता था, जिसके सर पर हाथ रखकर अध्यापक बोले "इसका नाम रोहित है। यह भी तुम्हारी तरह कल ही आया है, यह भी रो रहा था, तुम भी रो रहे थे। सोचा कि तुम दोनों को मिला देते हैं। दोनों मिलकर आँसू बहाना।"

अनुराग का दुःख कम हुआ और यह बात सुनकर अनुराग की अध्यापक के प्रति आत्मीयता भी बढ़ी।

"नमस्ते" गलती याद आते ही अनुराग बोला।

"नमस्ते" फिर तीनों किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े थे।

अनुराग बचपन से ही शर्मीली प्रवृत्ति का था। कक्षा में उत्तर देने के अलावा उसे इधर उधर की बातें बनाना नहीं आता था। उसे अब समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले? अध्यापक वहीं बैठ गये, अभी मध्यान्तर समाप्त होने में पर्याप्त समय था, वह दोनों भी सामने बैठ गये।

"तुम्हारे माता पिता अच्छे नहीं हैं, देखो तुम लोगों को अकेले ही छोड़ दिया। तुमसे प्यार नहीं करते।" अध्यापक धीरे से मुस्कराते हुये बोले।

आश्चर्य हो रहा था अनुराग को। इन अध्यापक को उसके मन की बात कैसे पता चली? कुछ उत्तर नहीं सूझा अनुराग को। नहीं भी नहीं कर सकता था क्योंकि सचमुच यही सोच रहा था। हाँ कह कर वह अपने माता पिता के प्यार को झुठलाना नहीं चाहता था।

रोहित बोल पड़ा "नहीं नहीं, हमारे मम्मी पापा तो हमें बहुत चाहते हैं, उन्होने तो हमें बड़ा बनने के लिये यहाँ भेजा है।"

अनुराग ने सोचा, अरे, यही तो उसको भी बताया गया है।

"बड़ा बनने के लिये क्या करना पड़ता है?" अध्यापक बोले।

"पढ़ना पड़ता है" अनुराग बोल उठा।

उसके बाद अध्यापक ने दोनों के घरों के बारे में पूछा, तभी मध्यान्तर की घंटी बज गयी। सब लोग अपनी अपनी कक्षा में चले गये। रोहित और अनुराग अलग अलग वर्गों में थे।

"पढ़ना पड़ता है।" यह वाक्य अनुराग के दिमाग में गूंज रहा था। "तो घर में ही पढ़ लेते" प्रश्नोत्तर अनुराग के मन में पूछे जाने लगे। "नहीं नहीं अपने शहर में पढ़ाई अच्छी नहीं है" पिता जी ने कहा था। "माँ मुझे चाहती है तो भेज क्यों दिया" प्रश्न कौंधा। "नहीं नहीं, माँ तो दुखी थी, जब मैं छात्रावास आ रहा था" अनुराग नें मन को फिर समझाया।

अनुराग न अपने दुःख को कम कर सकता था और न ही दुःख का भार अपने घर वालों पर डाल सकता था। उसे जो ध्येय की प्रतिमा दिखायी गयी है उस पर उसको अपना जीवन खड़ा करना था। लेकिन प्रेम का उमड़ता हुआ बवंडर उसे बार बार दुःखी कर देता था। इस ध्येय और प्रेम के विरोधाभास ने अनुराग के मस्तिष्क को अचानक काफी परिपक्व कर दिया था। अब अनुराग यह जानता था कि अभी तक जो पारिवारिक स्नेह की नींव पर उसके जीवन का भवन निर्मित था उस भवन को ध्येय की ऊँचाईयों तक पहुँचाना ही उसका परम कर्तव्य है।