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16.10.13

शिक्षा के बिसराये सूत्र

टेड पर सर केन रॉबिन्सन के विचार सुन रहा था, शिक्षा पर। विचार सरल थे, सहज थे और सारगर्भित थे। अनुभव जैसे जैसे गाढ़ा होता जाता है, अभिव्यक्ति तरल होती जाती है, श्री रॉबिन्सन को सुनकर यह सिद्धान्त और भी दृढ़ हो चला। यही नहीं, जब कोई ज्ञान तत्व बिना किसी श्रांगारिक कोलाहल के सुनने को मिलता है, वह ग्रहणीयता के तार झंकृत कर देता है। एक स्थान पर खड़े हुये दिये गये २० मिनट के इस आख्यान में दशकों की अनुभव यात्रा का निचोड़ था।

शिक्षा पर विचारणीय दृष्टि
वार्ता का विषय था कि किस तरह शिक्षा की मृत्युघाटी से बाहर निकलें। वर्तमान शिक्षा पद्धति के लिये इतने कठोर शब्द का उपयोग ही उनके अवलोकनों और विश्लेषणों के निष्कर्ष को व्यक्त करता है। साथ ही साथ उस पीड़ा और छटपटाहट को भी दिखाता है जिससे होकर शिक्षा के प्रति संवेदनशील बौद्धिक समाज जी रहा है। उस मात्रा में भले ही न हो, पर शिक्षा पद्धति के विषय में हम सबके अन्दर भी उसी प्रकार की असंतुष्टि पनप रही है।

श्री रॉबिन्सन के अनुसार मानव की शिक्षा पद्धति मानव के मूलभूत गुणों के अनुरूप होनी चाहिये, पर वर्तमान शिक्षा पद्धति इनकी अनदेखी कर रही है। केवल अनदेखी ही नहीं कर रही है वरन उसके विपरीत जा रही है। यदि यही होता रहा तो मानव धीरे धीरे मशीन होता जायेगा, सभ्यता के विस्तृत प्राचीर में एक ईंट। यन्त्रवत से जीवन हो जायेंगे, तन्त्र मानवीय न रहेंगे।

मानव के तीन मूलभूत गुण हैं। पहला है उनकी भिन्नता और विविधता। दूसरा है उनमें निहित उत्सुकता। तीसरा है उनकी सृजनात्मकता। यही तीन गुण उसे मानसिक और बौद्धिक रूप से पूरी तरह से विकसित करते हैं। बिना इन तीन गुणों के मानव स्वयं को पूर्णता से व्यक्त नहीं कर सकता है। एक भी विमा यदि अनुपस्थिति रही तो विकास आंशिक होगा, सर्वपक्षीय नहीं होगा। आइये देखते हैं कि वर्तमान शिक्षा पद्धति किस प्रकार इन तीनों मूलभूत धारणाओं के विपरीत कार्य कर रही है।

कोई दो बच्चे एक जैसे नहीं होते हैं, जन्म से भी नहीं, परिवेश से भी नहीं, भले ही वे सगे भाई या सगी बहनें ही क्यों न हों? सबकी अपनी क्षमता होती है, सबकी अपनी विशिष्टता होती है। फिर भी हमारी शिक्षा पद्धति ऐसी है कि हम सबको एक जैसा ही बनाना चाहते हैं। प्रारम्भ से एक ही विषय पढ़ाते हैं, एक सा ही समझते हैं, फैक्टरी के उत्पाद जैसा। एक जैसी शिक्षा सबके काम नहीं आती है, कुछ को रुचिकर लगती है, कुछ सामाजिक कारणों से लग कर पढ़ते हैं, कुछ माता पिता को दिखाने के लिये पढ़ते हैं, कुछ का मन तनिक भी नहीं लगता है, कुछ पढ़ाई छोड़ ही देते हैं। हमें लगता रहता है कि बच्चों का मन पढ़ाई में क्यों नहीं लग रहा है? उपाय भी सरल ही है, देखिये कि पढ़ाई छोड़ने के बाद किन किन क्षेत्रों में बच्चों का मन लगता, वे सारे विषय पढ़ाये जाये। हर एक के लिये अपनी रुचि के अनुसार पढ़ने को मिले तो समय के पहले पढ़ाई छोड़ देने वालों की संख्या न्यूनतम हो जायेगी।

क्या शिक्षा में यह उत्सुकता पल्लवित होती है?
बच्चे प्राकृतिक रूप से उत्सुक होते है, जिज्ञासु होते हैं। उनकी उत्सुकता को व्यापक आधार या निष्कर्ष देने के स्थान पर हम उसमें ठंडा जल डाल देते हैं। यदि हम उनको यह बता दें कि क्या पढ़ना है तो वे हमसे अच्छा पढ़ सकते हैं। हमारी शिक्षा पद्धति उन्हें सब कुछ घोंट कर पिला देना चाहती है, वह सब कुछ जिसे जानकर हम स्वयं को विद्वान समझने का भ्रम पाले बैठे हैं। आप उन्हें बताये या न बतायें, उनकी उत्सुकता उन्हें वांछित ज्ञान तक ले आयेगी। कितनी ही ऐसी ज्ञान की बाते होती हैं जो बच्चे स्वयं ही सीख जाते हैं। कभी उनके प्रश्नों की दिशा और सृजनात्मकता पर ध्यान दिया है, आप आश्चर्य करने के अतिरिक्त कुछ और कर भी नहीं सकते हैं। उसकी उत्सुकता के लिये हमें उसे उकसाने की आवश्यकता है, उसे दिशा देने की आवश्यकता है, उसे प्रेरित करने की आवश्यकता है। हमें उसे पढ़ाना नहीं है, उसे सीखने के लिये उद्धत करना है, उत्सुकता का उपयोग करने के लिये तैयार करना है। इसके स्थान पर वर्तमान शिक्षा पद्धति ज्ञान ठूँसने में विश्वास रखती है और यह जानने के लिये परीक्षायें लेती रहती है कि ठूँसे हुये ज्ञान को समुचित उगलने का अभ्यास किया कि नहीं किया बच्चों ने?

सृजनात्मकता हमारा सर्वाधिक सशक्त गुण है। आप एक समस्या दस बच्चों को देकर देखिये, सब के सब अपने सृजनात्मक वैशिष्ट्य के अनुसार उसका समाधान ढूँढ़ लेगे। जीवन की समस्या है, ज्ञान की समस्या हो, विकास के सारे अध्याय इसी गुण ने लिखे हैं। इस गुण को उभारने के स्थान पर वर्तमान शिक्षापद्धति सबको समान रूप से उत्तर देने की अपेक्षा रखती है और जो सबसे भिन्न रहता है, वह दौड़ में पिछड़ जाता है। हम मानकीकरण को अपना मूलमन्त्र बनाये बैठे हैं, सबको एक ही तुला से तौलने चले हैं।

जब तक ये तीनों गुण पोषित रहते हैं, बच्चे को अपना महत्व पता चलता रहता है। उसे लगता है कि वह अपने प्रयास से सीख रहा है, न कि शिक्षा पद्धति से बौद्धिक अनुदान पा रहा है। उसे करने का भाव मिलता है, न कि कुछ पा जाने का। आन्तरिक क्रियाशीलता बच्चे को प्रेरित करती है, उकसाती है। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो वह अपना रुझान खो देता है, ठंडा पड़ जाता है। थोपे हुये तत्व व्यक्तित्व को ठेस पहुँचाते हैं, वह उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता है। विविधता बनी रहती है तो कुछ भी थोपा हुआ सा नहीं लगता है, उत्सुकता बनी रहती है तो कुछ थोपा हुआ सा नहीं लगता है, सृजनात्मकता बनी रहती है तो कुछ थोपा हुआ सा नहीं लगता है।

वर्तमान शिक्षा पद्धति को इस दिशा में सोचना होगा। फैक्टरी के स्वरूप में शिक्षा को उत्पाद नहीं बनाया जा सकता। शिक्षक और शिष्य के बीच वैयक्तिक और दीर्घकालिक संबंध और क्रियाशीलता आवश्यक है। एक के बाद एक सारे महान जनों को देख लें, उनके ऊपर किसी शिक्षक की कृपादृष्टि रही है, जिसने ये तीन गुण न केवल समझे, वरन व्यक्तित्व में विकसित कराये। बच्चे को पढ़ाने भर से शिक्षकीय कर्मों की इतिश्री नहीं हो सकती है। एक बच्चे को पढ़ना और तदानुसार गढ़ना, यही एक शिक्षक का मूल कार्य है, यही शिक्षा पद्धति की सार्थकता है। 

26.6.13

बोझ प्रधान देश का बचपन

मुझे लगता है कि बोझ का जितना स्तर अपने देश में है, उतना विश्व के किसी देश में नहीं है। कोई ऐसे तथ्य तो नहीं हैं जिनके आधार पर मैं यह सिद्ध कर पाऊँ, पर लगता है कि यह ही सत्य हैं।

वैसे कहने को तो सारे तथ्य होने के पश्चात भी लोग सत्य स्थापित नहीं कर पाते हैं, तर्क होने के बाद भी कुछ सिद्ध नहीं कर पाते हैं, सिद्ध करने के बाद उसे क्रियान्वित नहीं कर पाते हैं। जिनके पास कुछ भी नहीं होता, उनके पास बस सत्य होता है, वे कह देते हैं और सब मान भी जाते हैं। जब तक गुणीजन उसे असिद्ध कर सकते हैं, वह सत्य बना रहता है। कभी कभी ऐसे सत्य राजनैतिक गरिमा के लिये तो कभी अपने को समझाने के लिये टपकाये जाते हैं।

हम भी इसी तरह का सत्य टपका रहे हैं, कि भारत के बच्चे सर्वाधिक दबे हैं, हर तरह के बोझ से, जीवन के बोझ से। तर्क को उल्टे सिरे से पकड़ते हैं और इसे असिद्ध करने का प्रयास करते हैं। यदि असिद्ध न कर पाये तो तर्क सिद्ध माना जायेगा, स्थापित सत्यों की तरह। जैसा लगता है कि जितनी हमारी सामर्थ्य है, हम असिद्ध करने को बड़ा कठिन मानते हैं और वहाँ तक नहीं पहुँच पाते हैं। चलिये कठिन ही सही, असिद्ध करने का प्रयास करते हैं।

असिद्ध करने का पहला स्तर है, स्वयं का, विशेषकर स्वयं के अनुभव का। यदि हमारा बचपन आनन्द में बीता हो, पढ़ाई का तनिक भी बोझ न पड़ा हो, तो प्रस्तुत सत्य असत्य माना जायेे। बचपन में एक तथ्य बड़ी स्पष्टता से समझ आ गया था कि यदि भविष्य आर्थिक रूप से सुरक्षित चाहिये तो पढ़ते रहना पड़ेगा, न केवल पढ़ना पड़ेगा, वरन अपनी कक्षा की ऊपरी बौद्धिक सतह में टिके रहना पड़ेगा। मन्त्र न केवल समझाया गया वरन पड़ेसियों के कई उदाहरणों के द्वारा सिद्ध भी किया गया। देखो उनको, बचपन में पढ़ने की जगह खेलते रहे, अब जीवन के दुख भोग रहे हैं।

कभी कभी कुछ भय अकारण ही दिखाये जाते हैं, पर यह भय सच था। थोड़ा बड़ा होने पर पता लग गया कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल प्रतियोगियों का प्रतिशत प्रयासरत प्रतियोगियों का पाँच प्रतिशत भी नहीं। प्रथम पाँच में रहना है तो, पुस्तकों को सर पर धरे चलना ही होगा, जागते समय भी, सोते समय भी। भारत में मध्यमवर्ग की बहुलता है और उनकी आर्थिक बचत एक पीढ़ी के परे जा भी नहीं पाती है। यदि कोई नौकरी नहीं मिली तो अगली पीढ़ी निम्न मध्यमवर्ग और उसकी अगली पीढी सीधे गरीबी रेखा के नीचे।

स्थापित व्यवसाय और परम्परागत आर्थिक आधार टूटने के कारण सारे बच्चों को नौकरी के राह पर जूझना स्वाभाविक है। नौकरियों का आश्रय केवल उन्हें ही मिल पाता है जो पढ़ने में और उसे परीक्षाओं में उगल देने में अच्छे होते हैं। शेष जूझते हैं, शेष जीवन। बोझ का बोध रहता ही है, जीवन के पूर्वार्ध में या जीवन के उत्तरार्ध में।

कभी सोचा कि कितना अच्छा होता कि हमारा देश भी विकसित होता, हर गाँव में एक तेल का कुँआ होता, एक सोनी के सामानों की फैक्टरी होती। रुचि और आवश्यकता अनुसार ज्ञान प्राप्तकर हम भी कहीं लग जाते। दुर्भाग्य ही है हमारे देश का कि हम जनसंख्या और भ्रष्टाचार में तो अग्रणी हैं, पर औद्योगिक विकास और अनुशासन में पिछड़े हुये हैं।

विदेशों में बच्चे राज्य के अनमोल उपहार माने जाते हैं, उन पर किसी प्रकार का अत्याचार अपराध की श्रेणी में आता है। स्वास्थ्य और शिक्षा राज्य का कर्तव्य होता है और बड़े होने पर उन्हें अपना व्यवसाय स्थापित करने के लिये पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती है। हमारे यहाँ जिन बच्चों को शिक्षा का आग्रही बोझ नहीं मिल पाता है, हमारा आर्थिक तन्त्र उन्हें और उनके बचपन को बालश्रम के माध्यम से सोख लेता है।

कहते हैं कि संघर्ष व्यर्थ नहीं जाता है, जितना जूझेंगे उतना निखरेंगे। जिन उन्नत क्षेत्रों के लिये हमें अपनी जुझारू क्षमता बचाकर रखनी थी, उनके स्थान पर हम सारी ऊर्जा प्रतियोगी परीक्षाओं की उन पुस्तकों को रटने में और हल करने में लगा देते हैं जिनकी उत्पादकता केवल प्रतियोगी परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने तक ही सीमित रहती है। नौकरी मिल जाने के बाद उनकी उपयोगिता शून्य हो जाती है। हमने ज्ञान के पहाड़ पढ़ डाले, उनका उपयोग अब कुछ भी नहीं, छूछे कीर्तमान स्थापित कर डाले, उनका उपयोग अब कुछ भी नहीं। बौद्धिक उत्कृष्टता के आधार पर तकनीक के जिन क्षेत्रों में हमें आगे होना था, वे हमारे ध्येय में रहे ही नहीं। संभवतः जिस दिन प्रतियोगी परीक्षाओं के बोझ से हमें मुक्ति मिलेगी, उस दिन हम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना हित अहित समझ पायेंगे।

जिस भय को हमने जिया है, जिस तन्त्र का गरल हमने पिया है, उसी में अपने बच्चों को जाते देख मन पीड़ा से कराह उठता है। हृदय कहता है कि उन्हें अपना बचपन सिद्ध करने दो, उड़ना सीख गये तो आकाश से अपना लक्ष्य साझ ही लेगे। बुद्धि कहती है कि इस देश में कहाँ से उड़ पायेगा बच्चा।, उसे अपने कंधों पर आर्थिक सुनिश्चितता और सामाजिक आकांक्षाओं का बोझ जो उठाना है।

उपरोक्त कहे सत्य को असिद्ध करने के जितने भी तर्क एकत्र करता हूँ, मन उतना ही भारी हो जाता है। काश मेरा कथन असिद्ध हो जाये, आज नहीं तो कल, देश के बच्चे भी शिक्षा और आर्थिक तन्त्र के बीच बैल की तरह जुते न दिखायी दें। 

23.3.13

चलो, ज्ञान लूट आयें

शिक्षा जब सुविधाभोगी हो जाये और बड़े नगरों से बाहर न निकलना चाहे, तब सब क्या करेंगे? वही करेंगे जो हममें से बहुत लोग करते आये है। हम भी बड़े नगर पहुँच जायेंगे, वहीं रहेंगे, वहीं पढ़ेंगे और नौकरी लेकर आसपास ही बस जायेंगे। थोड़े सम्पन्न लोग तो बस अपने बच्चों की अच्छी पढ़ाई के लिये नगर में आ बसते हैं। अध्यापकों को भी सुविधा हो जाती है, वहीं पढ़ा लेते हैं, ट्यूशन देते हैं और जीवन बिता देते हैं। यही प्रक्रिया कई दशक चली होगी और आज स्थिति यह है कि किसी भी राज्य में एक या दो नगर ही शिक्षा के केन्द्र बन गये हैं, शेष स्थानों पर शैक्षणिक सूखा पड़ा है। विकास की तरह ही शिक्षा भी सुविधा में बैठी हुयी है।

इस तथ्य से मेरा कोई व्यक्तिगत झगड़ा नहीं है। हो भी क्यों, हम भी शिक्षा के इसी सुविधापूर्ण मार्ग से आये हैं। अच्छी बात तो यह है कि हर राज्य में कम से कम दो नगर तो ऐसे हैं, ज़ीरो बटे सन्नाटा तो नहीं है। समस्या पर यह है कि इन शैक्षणिक नगरों के अतिरिक्त भी देश का विस्तार है। सब नगर की ओर पलायन नहीं कर सकते हैं, कई कारण रहते है जो शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण हैं। हर छोटे स्थान पर सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय हैं, कुछ ग़ैर सरकारी भी हैं। शिक्षक भी हैं, पर सदा ही इस जुगत में रहते हैं कि विकास के आसपास ही रहा जाये, वहाँ संभावनायें अधिक रहती हैं। कुल मिला कर कहा जाये विद्यालय होने पर भी स्तर अच्छा नहीं है, शिक्षक होने पर भी पूरो मनोयोग से अध्यापन नहीं होता है।

समस्या गहरी तो है पर स्पष्ट है। यदि कुछ अस्पष्ट है तो वह है छात्रों का भविष्य और समस्या का हल।अध्यापकों का महत्व बहुत गहरा होता है हमारे भविष्य पथ पर। बहुधा देखा गया है कि जिस विषय के समर्पित अध्यापक मिल जाते हैं, उस विषय के प्रति एक नैसर्गिक आकर्षण उत्पन्न हो जाता है और वही विषय साथ बना रहता है, प्रतियोगी परीक्षाओं में भी। शिक्षा के प्रति घोर अनिक्षा विद्यालय के वातावरण पर निर्भर करती है। कभी कभी विषय विशेष के प्रति घोर वितृष्णा का भाव उस विषय से संबद्ध अध्यापक व पाठन शैली से आता है। कई बार लगता है कि यदि वह विषय अच्छे से पढाया गया होता तो संभवतः उसमें भी अच्छा किया जा सकता था।

आज भी आप अपने चारों ओर गिनती कर के देख लें, हर १०० सफल व्यक्तियों में अधिकांश छोटे और मध्यम नगरों से ही होंगे, हो सकता है कि कुछ वर्षों के लिये वे शैक्षणिक नगरों में भी रहे हों। जो विशेष बात उन सब में उपस्थित होगी, वह है कोई न कोई ऐसा व्यक्ति जिसने शिक्षा के प्रति न केवल प्रोत्साहित किया वरन जिज्ञासा को सतत जलाये रखा। वह व्यक्ति अध्यापक के रूप में हो सकता है, अभिभावक के रूप में हो सकता है, शुभचिन्तक के रूप में हो सकता है। पर यह तथ्य भी उतना ही सच है कि छोटे नगर में जो पौधे पनप नहीं पाये, उसके पीछे शिक्षा व्यवस्था का निर्मम उपहास छिपा है, चाहे वह विद्यालय में न्यूनतम सुविधाओं का आभाव हो या अध्यापकों की अन्यमनस्कता।

क्या इसका अर्थ यह हुआ कि शिक्षा और विकास के केन्द्रीकरण में छोटे नगरों और दूरस्थ गाँवों का भविष्य शून्य है? हमारे और आपके मन में निराशा के भाव जग सकते हैं, पर सुगाता मित्रा जी इससे सहमत नहीं हैं। सुगाता मित्रा जी पिछले १४ वर्षों से शिक्षा में नये प्रयोग करने के लिये जाने जाते हैं और उन्हें वर्ष २०१२ के लिये टेड की ओर से सर्वश्रेष्ठ वार्ता का पुरस्कार भी मिला है। शिक्षाविद होते हुये भी बड़ी ही सरलता से प्रयोगों में माध्यम से निष्कर्षों पर पहुँचना और उसे उतनी ही सहजता से प्रस्तुत कर देना, यह उनके हस्ताक्षर हैं।

१९९९ में उनकी प्रयोगधर्मिता प्रारम्भ हुयी, यह समझने के लिये कि जहाँ पर अध्यापक नहीं हैं, क्या वहाँ पर भी शिक्षा पैर पसार सकती है। विकास की धार को छोटे नगरों की ओर मोड़ना एक महत कार्य है और कई दशकों की योजना और क्रियान्वयन के बाद ही वह संभव है। तो क्या अध्यापकों के बिना भी ज्ञानयज्ञ चल सकता है? यदि हाँ तो उसका स्वरूप क्या होगा? ऐसे ही एक क्षेत्र में उनके द्वारा किया गया पहला प्रयोग बड़ा ही सफल रहा।

प्रयोग बड़ा ही सरल था, नाम था 'होल इन द वाल'। खिड़की पर एक कम्प्यूटर, माउस के स्थान पर एक छोटा सा ट्रैक पैड, सतत बिजली व इण्टरनेट। कोई अध्यापक नहीं, कोई रोकने वाला नहीं, कोई टोकने वाला नहीं, जिसको सीखना हो कभी भी आकर सीख सकता है। दो माह बाद बच्चों की योग्यता पुनः परखी जाती है, उनके अन्दर आयी प्रगति लगभग उतनी ही होती है जितनी किसी अच्छे विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे की। सुगाता मित्रा जी का उत्साह तनिक और बढ़ा, प्रयोग का क्षेत्र भाषा सीखने के लिये रखा और वह भी तमिलनाडु के धुर ग्रामीण परिवेश में। न केवल बच्चे अंग्रेजी सीख गये, वरन अंग्रेजों से अधिक अंग्रेजियत की शैली में सीख गये। यही नहीं बायोटेकनोलॉजी जैसे दुरुह विषय पर भी बिना किसी वाह्य सहायता के कामचलाऊ ज्ञान प्राप्त कर लिया बच्चों ने। बच्चों ने स्वयं ही वह सब कर दिखाया जिसका पूरा श्रेय हम शिक्षा व्यवस्था को दे बैठते हैं।

ज्ञान कहाँ से आया, जिज्ञासा से, स्रोत से, समूह में आदान-प्रदान से, देखकर सीखने से। निश्चय ही सारे के सारे कारक रहे होंगे और साथ में उन्मुक्त वातावरण भी रहा होगा, जहाँ कोई परीक्षा का भय नहीं, नौकरी पाने की विवशता नहीं, कोई प्रत्याशा नहीं, कोई शुल्क नहीं, बस ज्ञान बिखरा पड़ा है, जितना लूट सको लूट लो।

तो क्या अध्यापक की आवश्यकता ही नहीं है? सुगाता मित्रा जी किसी प्रसिद्ध लेखक का उद्धरण देते हैं, कि यदि कोई अध्यापक मशीन से विस्थापित हो सकता है तो उसे हो जाना चाहिये। बड़े गहरे अर्थ हैं इस वाक्य के। उसे तनिक ठिठक कर समझना होगा। ज्ञान सहज उपलब्ध हो, बच्चे में जिज्ञासा हो, तो ज्ञानार्जन बड़ा ही सरल है। सामाजिक परिवेश में देखें तो न जाने कितना कुछ बच्चा देखकर ही सीखता है। जो वह जानना चाहता है, गूगल पर देखकर खोज ही लेगा। तब अध्यापक का क्या कार्य है और वह कहाँ से प्रारम्भ होता है और उसकी अनुपस्थिति में वह कार्य कोई और कर सकता है?

प्रयोग जितने प्रभावी हैं, निष्कर्ष उतने ही स्पष्ट। पहला, जहाँ पर अध्यापक नहीं भी हैं, वहाँ भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है, इस प्रकार की व्यवस्था से ज्ञान का प्रवाह अबाधित चल सकता है। दूसरा, अध्यापक के आभाव में गाँव का कोई बड़ा और समझदार व्यक्ति जिज्ञासा, उत्साह और सामूहिक भागीदारी का वातावरण बनाकर ज्ञानार्जन की प्रक्रिया बनाये रख सकता है। तीसरा, माना ज्ञानार्जन का कार्य बिना अध्यापक चल सकता है, पर जो दिशादर्शन और नये क्षेत्रों को बच्चों से परिचित कराने का कार्य है, उस विमा को हर अध्यापक को बनाये रखना है। ज्ञान की तृष्णा अपने लिये माध्यमों के बादल ढूढ़ ही लेगी, अध्यापक को तो स्वाती नक्षत्र की बूँद बनकर अपनी महत्ता बनाये रखनी होगी।

तो भले ही विकास के शैक्षणिक विस्तार में हमारा क्षेत्र न आता हो, पर हमें सीखने से कोई नहीं रोक पायेगा, देर सबेर कोई सिखाने वाला आ जायेगा, 'होल इन द वाल' के रूप में।

28.11.12

शिक्षा - एक वार्तालाप

यह तब प्रारम्भ हुआ जब दशहरा के तुरन्त बाद बच्चों को अपने गृहकार्य की याद आयी। बच्चे घबराये से कार्य करने बैठ गये। पिछली रात के आनन्दमयी उन्माद में डूबे बच्चों को सहसा इतने मनोयोग से काम करते देखना बड़ा रोचक लग रहा था। फोटो खींच कर उसे फ़ेसबुक में डाल दिया। जो प्रतिक्रियायें आयीं, उसमें सबसे आलोचनात्मक और हृदयस्पर्शी आलोक की थी। वार्तालाप शिक्षा के प्रति समाज के दृष्टिकोण का एक संक्षिप्त रूप है, हिन्दी में अनुवाद भाव संरक्षित रखते हुये किया गया है।(आलोक चित्रकार हैं, मोहित बड़ी कम्पनी में कार्यरत हैं, दीप्ति सियोल में शिक्षण में हैं और प्रवीण रेलवे की सरकारी नौकरी में)

आलोक - मुझे छुट्टी के समय पर बच्चों को गृहकार्य से लादने की बात समझ ही नहीं आती है। क्या विद्यालयों और शिक्षकों को ज्ञात भी है कि छुट्टियों का अर्थ और महत्व क्या होता है? यदि बच्चे छुट्टियों में इस तरह जूझते रहेंगे, तो वे कभी कार्य को उस अवस्था से अलग करके नहीं देख पायेंगे जिसमें वे इस तनाव वाली पढ़ाई से उन्मुक्त होकर प्रकृति देखें, मित्रों और सम्बन्धियों से मिलें और उन सब चीजों को जाने जो इतना गृहकार्य देने वाले विद्यालयों में नहीं पढ़ायी जाती हैं। यह चित्र मुझे बहुत पीड़ा दे रहा है, पुस्तक पर रखा पेपरवेट मानो उनकी उन्मुक्तता पर रखा एक बड़ा सा भार है। यह सब होते हुये भी वे सबकी अपेक्षाओं के प्रति समर्पित हैं।

प्रवीण - मैं पूरी तरह से समहत हूँ, क्या बच्चों को इस तरह तनाव में रखने की आवश्यकता थी? कल रात तक ये धमाचौकड़ी मचा रहे थे। इन्होंने कल रावण बनाया, उसे रंगा, उसमें पटाखे भरे और यह सब मोहल्ले के सब बच्चों के साथ किया। आज सुबह से ये बिल्कुल बदले दिख रहे हैं, इनकी छुट्टियाँ समाप्त होने से पहले ही समाप्त हो गयी हैं।

आलोक - प्रवीण, यह सच में दुख की बात है और मुझे क्रोधित भी करती है। कुछ दिन पहले एक डॉकूमेन्ट्ररी बनाने वाले युगल ने मुझसे पूछा था कि मेरे अनुसार क्रूरतम हिंसा क्या है? "एक बच्चे की बात न सुनना, उसके कुछ बोलने का आदर न करना, यही हिंसा का क्रूरतम स्वरूप है।" मैंने कहा। तब उन्होने मुझसे शिक्षातन्त्र के बारे में पूछा। मेरा उत्तर इस प्रकार था "मुझे यह सोचकर आश्चर्य होता है कि क्या होगा यदि सारे विद्यालय एक वर्ष के लिये बन्द कर दिये जायें। यदि विश्व तब भी यदि चलता रहता है तो हमें विद्यालयों की आवश्यकता ही नहीं है। तब अधिक उन्मुक्त और बुद्धिमान होंगे। बस अभी और आज ही बन्द कर देते हैं सारे विद्यालय, स्थिति भयावह है।"

प्रवीण - सच है, इस शिक्षातन्त्र को नहीं ज्ञात है कि वे कितने स्टीव जाब्स, बिल गेट्स, रामानुजम और आइन्स्टीन का गला बचपन में ही घोंट दे रहे हैं।

दीप्ति - यह चर्चा बहुत अच्छी है पर मैं तनिक अलग सोचती हूँ। कल्पना करें कि यदि आप दोनों ने पढ़ाई नहीं की होती तो आज क्या कर रहे होते? मुझे तो कुछ भी सम्मानजनक व्यवसाय नहीं दिखता है, सिवाय व्यापार के। और व्यापार में भी यदि आप अम्बानी नहीं हैं तो आपको कोई नहीं पूछता है। निश्चय ही हमारे समय में परवरिश के आयाम बदल रहे हैं पर मुझे फिर भी संशय है कि ऐसी परिस्थितियों में भी हम अपने माता पिता से भिन्न कोई निर्णय लेते।

प्रवीण - दीप्ति, यह एक वृहद विषय है और आलोक के कथन को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में लेना होगा। बच्चों के लिये सीखना किसी ने मना नहीं किया, श्रेष्ठता प्राप्त करना भी मना नहीं है। सर्वाधिक चिन्ता का विषय है वह पद्धति जिसके माध्यम से शिक्षा दी जाती है। यह प्राकृतिक विकास और सीखना बाधित करती है।

मोहित - मेरा अनुभव दोनों तरह का रहा है, पश्चिमी भी और भारतीय भी। कक्षा ५ तक कान्वेन्ट में पढ़ा हूँ। जिस कक्षा में पढ़ते थे, एक सप्ताह में वहाँ उतने ही घंटों का गृहकार्य दिया जाता था। जैसे कक्षा ४ में केवल ४ घंटा। सप्ताह में ५ दिन पढ़ाई, अर्थात दिन में ४८ मिनट। सप्ताहान्त में कोई गृहकार्य नहीं। ६ से १२ तक स्थानीय विद्यालय में पढ़ा, अंक और स्थान आ जाने से प्रतियोगिता बढ़ गयी, अधिक पढ़ना पड़ा। अब लग रहा है कि प्रतियोगिता प्राइमरी में भी पहुँच गयी है, जिसने बच्चों के ऊपर बोझ बढ़ा दिया है। फिर भी विश्व फलक पर विश्वास से कह सकता हूँ कि हमारे विद्यार्थी कहीं अच्छे हैं।

आलोक - मोहित, तुम्हारे अवलोकनों से मैं पूर्णतया सहमत हूँ। हमें संतुलन बनाना होता है। हम इतनी तेजी से बदल रहे हैं, हमारे बच्चे न जाने कितने स्रोतों से जान रहे हैं, हमसे अच्छा जान रहे हैं। तो क्या हम उस अनुसार पढ़ाने की अपनी पद्धतियाँ बदल रहे हैं या तीन दशक पुराना पाठ्यक्रम पढ़ाकर उसमें ही जूझने को कहते रहते हैं। मुझे पढ़ाने का जितना भी अनुभव मिला, मैनें अभिभावकों से पूछा कि वे किसका स्वप्न जी रहे हैं? बच्चों से भी यही प्रश्न पूछा, पर उत्तर में सदा ही निराशा हाथ लगी। विडम्बना ही है कि जो बच्चे अपना स्वप्न जीना चाहते हैं तो सब उन्हें विद्रोही और नालायक कहने लगते हैं। उससे भी बड़ी बिडम्बना पर यह है कि जब वही बच्चे अच्छा कर स्वयं को स्थापित करते हैं तो सारा श्रेय वही माता पिता ले लेते हैं। यही हमारे जीवनचरित्र को उजागर करता है। बदलाव के साथ बदलते रहना सबको आता भी नहीं है। हो सकता है कि मैं कुछ अधिक कह गया हूँ, पर यह भावावेश व्यक्त करना आवश्यक था।

प्रवीण - हमारे शिक्षातन्त्र में बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। मोहित को दोनों पद्धतियों का श्रेष्ठ मिला है, मैं कई उदाहरण जानता हूँ जिनको दोनों पद्धतियों के दोष ही मिले। शिक्षा एक हवाई जहाज की उड़ान जैसी हो, पर्याप्त ईंधन भी रहे ऊँचाई पर जाने के लिये और कोई अतिरिक्त भार भी न रहे ढोने के लिये, उन्मुक्त उड़ाने हों।

यहाँ वार्तालाप भले ही विश्राम पा गया हो पर विचार आयाम में आ गये, प्रवाह बहने लगा। स्वाभाविक भी है, कई प्रवाह मिलेंगे तो कुछ सार्थक धार आयेगी, नदी बनेगी, आने वाली पीढ़ियों रूपी खेतों को लहलहायेगी।

24.11.12

शिक्षा - रिक्त आकाश

आलोक का कहना है कि यदि एक वर्ष के लिये शिक्षा व्यवस्था को विराम दे दिया जाये, सारे विद्यालय बन्द कर दिये जायें तो विश्व के स्वास्थ्य पर कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं है, यह भी संभव है कि कुछ उत्साहपूर्ण निष्कर्ष सामने आ जायें। आलोक चित्रकार हैं और सृजन और मुक्ति के मार्ग के उपासक हैं, उनके लिये बच्चों पर कुछ भी थोपना उनके सम्मान और अधिकार पर कैंची चलाने जैसा है। एक सीमा तक मैं भी उनसे सहमत हूँ, अर्थतन्त्र से प्रभावित शिक्षातन्त्र की बाध्यतायें हमारी राह सीमित कर देती हैं, लगता है कि हम हाँके जा रहे हैं, हम उस राह जाना चाहें, न चाहें। यदि किसी बच्चे को अपनी प्रतिभानुसार व्यवसाय या कार्य चुनने और उसके माध्यम से सम्मानित जीवन जीने के अवसर ही न हों तो कहानी वहीं समाप्त हो जाती है। इस अवस्था को परिभाषित करने के लिये बाजार प्रभावित जीवकों को कोई सम्मानपूर्ण शब्द भले ही मिल जाये, पर ठेठ भाषा में उसे हाँकना ही कहा जायेगा।

शिक्षा पद्धति पर आलोक के चरम विचारों का कारण वर्तमान शिक्षा में विद्यमान वे तत्व हैं जो सृजनात्मकता को कुंठित करते हैं और बच्चों को अर्थव्यवस्था में प्रयुक्त ईंधन के रूप में झोंक देने के लिये तत्पर बैठे हैं। निश्चय ही यह व्याप्त निराशा का बड़ा कारण है, पर मेरे लिये और भी कारण हैं जिन पर विशेषकर हमारे देश को ध्यान देने की महत आवश्यकता है। चलिये शिक्षा के तीनों उद्देश्यों की दशा देख लें अपने देश में।

पहले उद्देश्य को ही लें, प्रकृति के रहस्यों को समझना और नये तन्त्रों का सृजन। भारतीयों की गिनती विश्व के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्कों में होती है, अनुसंधान और शोध का एक सुदृढ़ तन्त्र भर स्थापित करना था, प्रतिभा पलायन रुक जाता। जहाँ पर प्रतिभाओं को समुचित सामाजिक और आर्थिक सम्मान नहीं मिलता है, उन्हें रोकना कठिन हो जाता है। यद्यपि कई क्षेत्रों में हमें लाभ मिल रहा है पर तकनीक के वे अग्रतम क्षेत्र जो अर्थतन्त्र को प्रभावित कर रहे हैं, वहाँ हम एक देश के रूप में शून्य हैं। हमने प्रतिभायें तो दे दीं, उनके योग्य वातावरण न बना पाये देश में।

दूसरे उद्देश्य को देखें, स्थापित तन्त्रों को साधना। स्थापित तन्त्रों की बात करें तो स्थिति और भी भयावह है। विकास के आधारभूत अवयव हम तैयार ही नहीं कर पाये, जो तन्त्र हमें साधने थे, उन्हें कैसे क्रियान्वित किया जाये, यह जानने के लिये हम प्रथम अवसर पाते ही विदेशयात्रा कर आते हैं, उनके प्रयोगों की अधकचरी नकल उतारने के लिये। सड़क, बिजली, संचार, न जाने कितने ही क्षेत्र हैं जो, न तो देश के हर भाग में स्थापित कर पाये हैं और न ही समग्र रूप से स्थापित करने की योजना ही है। विकास के मानक बस कुछ गिने चुने नगरों में स्थापित कर हम विजयोत्सव मनाने बैठ गये। शिक्षित जन और शिक्षा की दिशा, उजाड़ हुये शेष देश को क्यों नहीं सुखद स्वरूप दे पा रहे हैं?

तीसरा उद्देश्य है स्वयं को समझना और समाज में सहजीवन और आनन्द को प्रेरित करना। पहले जब शिक्षित लोग कहीं पहुँचते थे तो लगता था कि अब व्यवस्था भी आ जायेगी, बातें समझदारी की होंगी और समस्या को कोई न कोई समाधान मिल जायेगा। पढ़े लिखे का तात्पर्य होता था कि जो सबको साथ लेकर चले, जो सबके अन्दर स्थापित अन्तरों को स्वीकार कर उनमें अन्तर्निहित की समानता को साथ ला सके। जो भी कारण रहा हो, जो भी बाध्यतायें रही हों, शिक्षित का वह स्वरूप नहीं दिखता है। शिक्षित वर्तमान में उस आर्थिक आत्मनिर्भरता का पर्याय बन गया है जिसे समाज में किसी से कोई संवाद स्थापित करने का मन नहीं है, थोड़े ठेठ शब्दों में कहा जाये तो स्वार्थपरक भविष्य का एक माध्यम बन गयी है शिक्षा। यदि यह प्रभाव पड़ रहा है शिक्षा का समाज पर तो शिक्षा निश्चय ही अपनी राह से भटकी है।

अध्यात्म की अपेक्षा करना, कुछ अधिक ही हो जायेगा शिक्षातन्त्र के लिये। निरपेक्ष घोषित हो चुके देश में सांस्कृतिक शिक्षा भी भिन्न भिन्न रंगों में रंगी हैं और पाठ्यक्रम का अंग नहीं है। फिर भी एक ऐसी शिक्षा की आशा करना जिससे समाज सधे और व्यक्ति प्रसन्न रहना सीखे, एक शिक्षातन्त्र के लिये प्रारम्भिक पग है। जब वह भी न मिले और समाज विघटन की ओर अग्रसर हो तो शिक्षातन्त्र पर प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है।

मैं यह नहीं कहता कि समाज के सब दोषों के लिये शिक्षातन्त्र ही दोषी है, बहुत कारक हैं, समाज की गतिमयता में आये विकार का ठीकरा शिक्षा पर ही नहीं फोड़ा जा सकता है। जो भी कारण हो, जितने भी कारण हों, सबको शिक्षा के माध्यम से सुधारा अवश्य जा सकता है। इसलिये वर्तमान में यदि स्तर गिरता जा रहा है तो इसका तात्पर्य यह अवश्य है कि कम से कम शिक्षा से सुधार के स्वर नहीं उठ रहे हैं। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि कोई भी तन्त्र यदि अपने आप पर छोड़ दिया जाये तो उसमें विकार आने लगते हैं, यही मनुष्यों में भी लागू होती है, यह बस ज्ञान का अंश है जो उसे साधे रहता है। ज्ञान ही वह एकल सूत्र है जो तन्त्रों का क्षय रोकता है।

समाज में भी आत्मसंशोधन के गुण होते हैं, जब कोई विकार समाज में प्रवेश पाता है, कहीं दूसरी और एक संशोधनात्मक प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है जो अन्ततः उस विकार को ठीक करती है। कभी कभी समाज का सम्मिलित ज्ञान उस विकार को समझ लेता है, कभी उसे स्पष्ट रूप से समझाने के लिये किसी समाज सुधारक या महापुरुष को जन्म लेना पड़ता है। शिक्षित समाजों में यह संशोधन स्वतः होता रहता है। समाज को साधने और पुनः उसे निर्मल रुप में लाने के लिये शिक्षा सदा ही एक आधारभूत उपहार रहा है मानवता के लिये।

कहीं कुछ गहरा रिक्त स्थान है जो भरा जाना शेष है, समझा जाना शेष है। आलोक का प्रस्ताव मुझे मेरे उस डॉक्टर की याद दिलाता है, जिन्होने एक एलर्जी का कारण पता लगाने के लिये न जाने कितने प्रकार के खाने पर रोक लगा दी थी। मेरे प्रकरण में एलर्जी पता चल गयी थी, निदान भी हो गया था। शिक्षा में क्या यह संभव है?

21.11.12

शिक्षा - अर्थ व समाज

औपचारिक व अनौपचारिक शिक्षा का स्वरूप तथा शिक्षा के उद्देश्यों की समझ ही पर्याप्त न होगी यदि हम उसे आधुनिक अर्थतन्त्र और समाज की गतिमयता से न जोड़ें। जो भी संपर्कसूत्र हैं और जिन सिद्धांतों पर शिक्षा, अर्थ और समाज संवाद स्थापित किये हुये हैं, उन पर गहनता से विचार की आवश्यकता है। यदि इन बिन्दुओं का समुचित विश्लेषण किया जा सके तो उन परस्पर प्रभावों को उभारा जा सकता है जो वांछित हैं और उन पर नियन्त्रण गाँठा जा सकता है जो सबके लिये हानिप्रद हैं। विश्लेषण हेतु विषय केवल औपचारिक शिक्षा तक ही सीमित रखा जायेगा।

शिक्षा के तीन उद्देश्य मात्र बौद्धिक कल्पनाशीलता में नहीं जी सकते हैं। उन्हें भौतिक धरातल में लाने के लिये एक तन्त्र स्थापित करना होता है, साधन आवश्यक हैं, समाज को प्रतिभागिता भी आवश्यक है, जिनको लाभ मिल रहा है और जो लाभ पहुँचा रहे हैं, दोनों के लिये। शिक्षा से समाज की अपनी अपेक्षायें हैं, विद्यार्थियों के अपने सपने हैं, शिक्षातन्त्र कहाँ तक इन दोनों को साथ साथ निभा पा रहा है, अर्थतन्त्र का स्वरूप किस तरह इस पूरी रचना को अस्थिर कर रहा है, ये सब बड़े ही रोचक बिन्दु हैं, इन सबको पृथकता से और भलीभाँति समझ कर ही शिक्षा पर कुछ साधिकार कहा जा सकता है।

भले ही विश्व के समस्त तन्त्रों को रचने और चलाने में शिक्षा का सहयोग रहता है, पर शिक्षा के लिये स्थापित तन्त्र में भी तीन प्रमुख विमायें हैं। शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षा-सामग्री। शिक्षक के लिये शिक्षण एक व्यवसाय है, उसे अपना घर चलाना है, साथ ही साथ उनके ऊपर बच्चों के भविष्य का महत उत्तरदायित्व है। यदि गुणवत्ता न साधी जायेगी तो पूरी की पूरी पीढी हाथ से निकल जाने का भय है। गुणवत्ता साधने के लिये योग्य और कुशल शिक्षकों को लाना होगा, एक विषय जो सीधे सीधे समाज के आर्थिक पक्ष से जुड़ा है।

बच्चे के लिये भविष्य में धन कमाने के अतिरिक्त स्वयं को स्थापित करने की चाह अधिक महत्वपूर्ण है, उसके स्वप्न और अभिरुचि के अनुसार चल सकने की चाह, समाज को सार्थक योगदान दे सकने की चाह। शिक्षा सामग्री जहाँ एक ओर समाज की दिशा निर्धारित करती है वहीं दूसरी ओर शेष विश्व तन्त्रों को भी पोषित करने में सहायक है।

अब अर्थतन्त्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो पूरा विश्व माँग और आपूर्ति के चक्र पर चलता है। जिसकी माँग अधिक उसका मूल्य अधिक, जिसका मूल्य अधिक उस ओर सबका झुकाव अधिक, अधिक झुकाव अधिक आपूर्ति लाता है, अधिक आपूर्ति मूल्य कम कर देती है, तब झुकाव भी कम हो जाता है, तब आपूर्ति कम हो जाती है और माँग बढ़ जाती है। यही चक्र चलता रहता है, अर्थतन्त्र घूमता रहता है। किसी भी व्यवसाय के दो पक्ष शिक्षा से पोषित होते हैं, एक है तकनीक, दूसरे हैं प्रशिक्षित कर्मचारी। जिसकी माँग अधिक होती है, उससे सम्बन्धित तकनीक में अनुसंधान और उसमें शिक्षित युवा, दोनों ही उफान पर पहुँच जाते हैं। उस क्षेत्र में अधिक अवसर और धन, और उसके प्रति समाज का रुझान।जिन क्षेत्रों से माँग नहीं आती है पर संभावनाओं से भरे हुये है, उन क्षेत्रों का कोई नामलेवा भी नहीं है।

शिक्षक क्या गुणवत्ता दे पा रहे हैं, बच्चों की क्या आकाक्षायें हैं, समाज क्या चाहता है और अर्थतन्त्र के वाहक हमें कहाँ लिये जा रहे हैं, इन चारों पाटों में हमारी शिक्षा व्यवस्था पिसी हुयी है। इन चारों की खिचड़ी हमारी शिक्षा सामग्री में दिखायी पड़ती है, कम या अधिक। जब भी बाजार की अर्थव्यवस्था अपना आधिपत्य जमाने लगती है, शिक्षाव्यवस्था धन उत्पन्न करने वाली मशीन का बड़ा अंग बन कर रह जाती है, उसमें पिसते शिक्षार्थी और हताश होते अभिभावक भी उसकी धुरी में घूमने लगते हैं। जब वह क्षेत्र सहसा झटक जाता है, जब उसमें अवसर सिकुड़ जाते है, संसाधन अतिरिक्त हो जाते हैं, तब सब के सब नैराश्य में डुबकी लगाने लगते हैं।

शिक्षातन्त्र की अर्थतन्त्र पर इतनी निर्भरता उचित नहीं है। इसके तीन पक्ष बहुत ही घातक हैं। पहला तो अर्थतन्त्र केवल तकनीकी शिक्षा को सहारा देगा क्योंकि तकनीक अर्थतन्त्र को सहारा देती है। थोड़ी बहुत दिशा प्रबन्धन व वित्तीय शिक्षा को भी मिल जायेगी, पर ये तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र हैं, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को कौन सहारा देगा तब? दूसरा घातक पक्ष यह होगा कि जब धन लगेगा तो वह फीस के रुप में वसूला भी जायेगा, सक्षम शिक्षा प्राप्त कर लेंगे और निर्धन अक्षम अशिक्षित रह जायेंगे। धन केवल धन को पोषित करेगा, जन को नहीं। तीसरा घातक पक्ष होगा, उन विषयों को लुप्त होना जिनमें किसी भी व्यवसाय में लाभ देने की क्षमता नहीं है, इतिहास, साहित्य आदि जैसे कितने ही विषय अपना अस्तित्व खो बैठेंगे तब।

शिक्षातन्त्र की अर्थतन्त्र पर निर्भरता शून्य भी नहीं की जा सकती है, यदि यह हुआ तो सब कल्पनाशीलता में खो जायेंगे, कर्मशीलता अपवाद हो जायेगी समाज में तब। सम्पर्कसूत्र बनाये रखना आवश्यक है जिससे शिक्षा न केवल अपने उद्देश्यों में सफल होती रहे, वरन शिक्षकों और शिक्षार्थियों के पास पर्याप्त आर्थिक कारण रहें किसी विषय को चुनने के लिये। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का कुप्रभाव कम हो जाता है जब अर्थव्यवस्था का विस्तार बढ़ता है। तब एक क्षेत्र में आयी उठापटक अर्थव्यवस्था, समाज और शिक्षा को अधिक प्रभावित नहीं करती है। शिक्षा का कोई क्षेत्र, कोई भी अभिरुचि ऐसी न रह जाये जिसमें जीवन यापन की संभावना कम हो।

एक बात तो तय है कि सब कुछ बाजार की अर्थव्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। शिक्षाव्यवस्था के त्यक्त पक्षों में शक्ति लाने का कार्य सरकार का है। सुदृढ़ और सार्वभौमिक आधारभूत शैक्षणिक सुविधायें, सबको शिक्षा, निशुल्क शिक्षा, योग्य और कर्मठ शिक्षकों का चयन, शिक्षकों को यथानुरूप अच्छा वेतन, अर्थव्यवस्था का शिक्षा के अन्य अंगों में विस्तार, ये सब कार्य ऐसे हैं जो शिक्षा को सशक्त करने में सक्षम हैं। ऊर्जा व्यर्थ न हो, व्यक्ति समर्थ हों, यही तो अर्थ है अच्छे शिक्षातन्त्र का। क्या छूट गया तब और कौन सा आकाश रिक्त रह गया, यह मननीय बिन्दु अगली पोस्ट में।

17.11.12

शिक्षा - क्या और क्यों ?

शिक्षा का नाम सुनते ही उससे संबद्ध न जाने कितने आकार आँखों के सामने घुमड़ने लगते हैं। कुछ को तो लगता होगा कि बिना शिक्षा सब निरर्थक है, कुछ को लगता होगा कि बिना लिखे पढ़े भी जीवन जिया जा सकता है। एक व्यक्ति बिना शिक्षा के भी समाज में बहुत सहज और उपयोगी बनकर रह लेता है, वहीं दूसरी ओर एक शिक्षित व्यक्ति भी अपने कृत्यों से सामाजिक चरित्र को नकारता सा लगता है। एक अजब सा द्वन्द्व है, प्रकृति का मौलिक गुण है यह द्वन्द्व, शिक्षा में भी दिखायी पड़ेगा। जब भी द्वन्द्व गहराता है, उत्तर या तो मूल में मिलता है या निष्कर्षों में। निष्कर्ष भविष्य की विषयवस्तु है और बहुधा ज्ञात नहीं होती है, पर मूल खोजा जा सकता है, मूल से विश्लेषण किया जा सकता है।

हमें प्राप्त ज्ञान के दो स्रोत हैं, पहला अनौपचारिक शिक्षा, दूसरा औपचारिक शिक्षा। अनौपचारिक शिक्षा हमें घर, समाज, मित्रों आदि से मिलती है और इसके लिये विद्यालय जाने की आवश्यकता नहीं है। दादी, नानी की कहानियों में, बड़ों के संवाद में, संस्कृति के अनुकरण में, त्योहारों में, संस्कारों में, मित्रों के साथ, भ्रमण के समय, यात्राओं में, न जाने कितना कुछ सीखते हैं हम सब। हिसाब लगाने बैठे तो लगेगा कि जितना भी ज्ञान हमारे पास है, वह अनौपचारिक शिक्षा की ही देन है। जहाँ के सामाजिक ढाँचे में प्रश्न पूछने को मर्यादा का उल्लंघन नहीं माना जाता है, जहाँ ज्ञान के लिये उन्मुक्त परिवेश है, वहाँ पर सामान्य व्यक्ति के लिये अनौपचारिक ज्ञान का प्रतिशत ९० से भी अधिक होता है। कपड़े पहनना, बाल काढ़ना, फीते बाँधना, चाय बना लेना आदि न जाने कितने ऐसे कार्य हैं जो हम विद्यालय जाकर नहीं सीखते हैं, देखते हैं और सीखते हैं। भाषा का प्राथमिक ज्ञान अनौपचारिक ही होता है, बच्चा देखता रहता है, सीखता रहता है।

जनसंख्या का बड़ा वर्ग ऐसा है जो कि कभी विद्यालय गया ही नहीं। यही अनौपचारिक शिक्षा है जिसके बल पर वह अपना जीवन ससम्मान व्यतीत कर रहा है। हम उन्हें अशिक्षित मानते हैं, पर वे अपना भला बुरा हमसे बेहतर समझते हैं, कहीं बेहतर, निश्चय ही इसी अनौपचारिक शिक्षा का प्रताप है। आज भी गाँव जाना होता है तो वहाँ के बुजुर्ग जिन्होने अपने पूर्वजों से रामचरितमानस सुनी थी, इतना सटीक दोहा उद्धृत कर बैठते हैं जो परिस्थितियों पर शत प्रतिशत सही बैठता है। एक परम्परा है गीता और रामचरितमानस के पाठ की, अनौपचारिक शिक्षा के वाहक हैं ये ग्रन्थ, सदियों से ज्ञान का प्रकाशपुंज वहाँ भी फैलाये हुये हैं, जहाँ पर शिक्षातन्त्र पूर्णतया ध्वस्त है।

औपचारिक शिक्षा फिर भी आवश्यक है। आज जो संस्कृति में सहज प्राप्त है, वह कभी न कभी तो औपचारिक शिक्षा का एक भाग रहा होगा। अनौपचारिक शिक्षा श्रुति के आधार पर चलती है, उसे यदि औपचारिक शिक्षा का सहयोग नहीं मिलेगा तो कालान्तर में वह विकृत होने लगेगी। न जाने कितने ऐसे चिकित्सीय उपाय हैं जो कार्य तो करते हैं पर उनका कारण लुप्त सा हो गया है, औपचारिक शिक्षा के अभाव में।

यदि सुचारु रूप से किसी भी विषय का अध्ययन नहीं किया जायेगा तो उसमें सन्निहित रहस्य खोजे जाने से रहे। विकास का प्रथम चरण है, रहस्यों को समझना। तत्पश्चात उसे ज्ञान के रूप में सहेज कर रखना औपचारिक शिक्षा का कार्य है। क्रमिक विकास के लिये अवलोकनों और निष्कर्षों को लिपिबद्ध करना आवश्यक है, इससे पढने में भी सरलता होती है और उस पर और कार्य करने में भी। किसी भी विषय का विधिवत ज्ञान देने के लिये विद्यालय आवश्यक हैं। कहने को तो मात्र १० प्रतिशत ही ज्ञान शेष रहता है पर इसमें विकास और भविष्य के वो तार जुड़े होते हैं जिन्हें नकारना भविष्य को नकारने जैसा है। औपचारिक शिक्षा भले ही मात्रा में अधिक न हो पर जीवन की गुणवत्ता साधने के लिये अनमोल है। सिद्धान्त समझ में आते ही घटनाओं का समझना और समझाना सरल हो जाता है, कारण और प्रभाव स्पष्ट से दिखने लगते हैं तब।

किसी भी समाज में औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा अलग राह नहीं चलती हैं। औपचारिक शिक्षा में शिक्षित परिवार के बच्चे कितनी ही चीजें अनौपचारिक रूप से सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता है, हर पीढ़ी ज्ञान का सामान्य स्तर बढ़ता रहता है। जिन परिवारों में कोई एक व्यवसाय कई पीढ़ियों से किया जा रहा है, उससे संबद्ध ज्ञान परिवार में इतनी प्रचुर मात्रा में आ जाता है कि उनके सामने औपचारिक शिक्षा में शिक्षित संस्थान भी कान्तिहीन रहते हैं। व्यापारी का पुत्र व्यापारी, राजनेता का पुत्र राजनेता, किसान का पुत्र किसान, यदि कोई अपना पैतृक व्यवसाय अपनाना चाहे तो उसे न जाने कितना ज्ञान अनौपचारिक रूप से मिल जाता है। पढ़ा लिखा समाज बनाने के लिये सदियों का सतत श्रम लगता है।

इस परिप्रेक्ष्य में शिक्षा के उद्देश्यों को शिक्षा के स्वरूप से जोड़कर सही तालमेल बिठा लेना ही अच्छे शिक्षातन्त्र का कार्य है। पद्धतियाँ भिन्न दिशाओं में न भागें, कुछ वर्षों में व्यर्थ न हो जायें, कुछ ऐसा न करें जिसकी आवश्यकता ही न हो और कुछ महत्वपूर्ण छूट भी न जाये। तो एक अच्छे शिक्षातन्त्र का सही आकलन करने के लिये, उन उद्देश्यों को भी समझना होगा, जिनके लिये शिक्षा आवश्यक है।

मुझे तो शिक्षा के बस तीन प्रमुख उद्देश्य समझ आते हैं। पहला तो प्रकृति के रहस्यों को समझना, उसके सिद्धान्तों का विश्लेषण करना और उस पर आधारित विज्ञान के माध्यम से जीवन को और अधिक सुख-सुविधायें प्रदान करना। इस वर्ग में शोध आदि प्रमुख हैं और सदा से होते भी आये हैं। विज्ञान के अविष्कार बहुधा चमत्कृत करने वाले होते हैं, हमारी कल्पनाशक्ति इस उद्देश्य के लिये राह निर्माण करती है, ऐसी राह जिसमें विश्व के प्रखरतम मस्तिष्क चलते हैं, ऐसी राह जो मानवता के लिये बहुत अधिक उपयोगी रही है, ऐसी राह जिससे लगभग सभी लोग लाभान्वित और प्रभावित होते हैं। पर इस राह में अग्रणी चलने वालों की संख्या बहुत कम होती है, लाखों में एक, ये लोग नये तन्त्र रचते हैं।

दूसरा उद्देश्य है विश्व के तन्त्र को साधे रहना। मानव को सहजीवन में बड़ा रस आया है, समाज का स्वरूप भिन्न भिन्न हो सकता है पर हर समाज में सहजीवन ही प्रधान है। प्रकृति ने भी यथासंभव सहयोग किया है, इस मानवीय प्रयास में। जीवन के लिये अन्न, जल आदि, उनका उत्पादन, रखरखाव व वितरण। वस्तुओं का व्यापार, नगरों का निर्माण, संचार के साधन, और जो कुछ भी आवश्यक है साथ रहने के लिये, सुख के साथ। तन्त्र को साधना सरल कार्य नहीं हैं, तकनीक और विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है इसमें, उसके लिये समुचित शिक्षा की। कालान्तर में नयी तकनीक और नये प्रयोगों से तन्त्र परिवर्धित और परिमार्जित होता है, जीवन चलता रहता है। इस वर्ग में कर्मठ व्यक्तित्वों की आवश्यकता होती है। इसमें ही सर्वाधिक लोग लगते हैं। संसाधनों और आय का वितरण किस प्रकार हो, किस व्यवसाय को कितनी प्राथमिकता मिले, यह बहस का विषय हो सकता है। इसमें शिक्षा का स्तर विशेष होता है और ये लोग तन्त्र साधते हैं।

तीसरा उद्देश्य है स्वयं को समझना। स्वयं को समझना सहजीवन के उन पहलुओं को समझने की प्रक्रिया है जो समाज के रूप में सबको जानना आवश्यक है। क्या हमें सुख देता है, क्या हमें दुख, कौन सा सुख शाश्वत है, कौन सा क्षणिक, ऐसे बहुत से प्रश्न हैं, जिसके लिये हमें स्वयं को जानना आवश्यक हो जाता है। आत्म का आकार समझने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि यदि स्वयं को जान लिया तो कुछ जानना शेष नहीं रहता है। साहित्य, संगीत, कला आदि ऐसे क्षेत्र हैं जो मानव को सुख देते हैं, इनका सृजन सुख देता है। इस वर्ग में सब लोग ही आते हैं, बिना इस शिक्षा के शान्ति और समृद्धि संभव नहीं है।

क्या अपेक्षित था, क्या हो रहा है? शिक्षा का स्वरूप और उद्देश्य क्या एक दूसरे को समझ पा रहे हैं? अर्थतन्त्र और शिक्षातन्त्र किस दिशा भाग रहे हैं, एक दूसरे साथ दे पा रहे हैं या नहीं, बहुत समझना शेष है, अगली पोस्ट में।

14.11.12

शिक्षा - आधारभूत निर्णय

भारतीय मानसिकता में शिक्षा सदा ही महत्व का विषय रही है। माता पिता अब भी अपने बच्चों की शिक्षा में किया हुआ निवेश सर्वोत्तम निवेश मानते हैं। कम इच्छाओं में जी लेंगे, भूखे सो लेंगे पर बच्चों को पढ़ायेगे। शिक्षा सर्वोपरि है और सबको लगता भी है कि योग्य होगा तो कुछ न कुछ बन ही जायेगा। निश्चय ही पढ़ाई में अच्छे निकलने वाले कुछ न कुछ बन ही जाते हैं, जो कुछ बन नहीं पाते हैं उनके लिये तो सारी शिक्षापद्धति श्रमसाध्य कार्य सी ही बीतती है।

कितना ही अच्छा होता कि जो भी किसी स्तर तक पढ़ पाता उसे उस स्तर के अनुरूप समुचित व्यवसाय मिल जाता। कितना अच्छा होता कि शिक्षा में पाये अंक आपकी भविष्य की रूपरेखा नियत कर देते। शिक्षा योग्यता का एक मानकीकरण कर देती। शिक्षा एक अलग कार्य है, प्रतियोगिता एक अलग कार्य हैं और धनार्जन और जीवन यापन एक और नितान्त अलग कार्य। इन सबमें उतनी ही सततता और समानता है जितनी किन्ही दो मनुष्यों में स्वभाववश हो सकती है।

जीवन एक मिलता है, उसे कई भागों में पृथक कर जीने में उसकी सततता और आनन्द बाधित होता है। एक भाग में अर्जित लाभ या हानि अगले भाग को जब बहुत अधिक प्रभावित नहीं करते हैं तो लगता है कि वर्तमान में अधिक श्रम क्यों करना, अगले भाग की तैयारी कर लें। वर्तमान को तज भविष्य को साध लेने की जुगत, जीवन बस इसी तैयारी में बीत जाता है। बचपन से ही प्रतियोगिता में आगे निकलने वाले घोड़े बनने तैयार होने लगते हैं, युवावस्था धनोपार्जन के लिये संघर्ष में निकल जाती है, प्रौढ़ावस्था बच्चों के लिये सुरक्षित भविष्य निर्माण करने में। अन्त आते आते बस एक प्रश्न ही मुख्य हो जाता है, क्या अच्छा जीवन जीने के लिये इतना सब पढ़ना, संघर्षों से इतना लड़ना और स्वयं को बैल सा इतने वर्षों तक रगड़ना आवश्यक था?

प्रश्न का उत्तर भिन्न हो सकता है, पर प्रश्न बिना पूछे ही जीवन निकल जाये, यह जीवन का अपमान है। न्यूनतम कितनी शिक्षा आवश्यक हैं, प्रतियोगिताओं में कितना संघर्ष उचित है, प्रतियोगिताओं के लिये किये ज्ञानार्जन का उपयोग जीवन यापन में और तन्त्र के लिये कितना हो रहा है, यह समझना भी आवश्यक है। जिन नौकरियों में कक्षा दस पास से भी अधिक की योग्यता आवश्यक न हो, उनके लिये नियत प्रतियोगिता परीक्षा में यदि परास्नातक कक्षाओं के प्रश्न योग्य प्रतिभागियों का निर्धारण करें तो यह शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं पर बहुत बड़े प्रश्न उठाते हैं। साथ ही साथ हमको यह सोचने पर विवश करते हैं कि कोई भी शिक्षा और सामाजिक जीवन के संबंध और उपयोगिता को समझ भी पा रहा है?

जब मस्तिष्क पर अधिक जोर डालने की इच्छा नहीं होती है तो सब बाजार की अर्थव्यवस्था के मत्थे मढ़ दिया जाता है, जब निर्णयों में नियन्त्रण का साहस नहीं होता है तो बाजार के उत्पात को मौन रह स्वीकार कर लिया जाता है। समग्र दृष्टिकोण की अनुपस्थिति, जीवन के हर चरण को पृथकता से देखने की सुविधा, यही प्रश्न हैं जो मूल-शूल हैं। इनको बिना निकाले शिक्षा में कोई विकास संभव नहीं है। जीवन संघर्ष, अनुशासन और संकीर्ण कठिन राहों में चलने का पर्याय बन जायेगा, जीवन जीना क्या होता है, बस मृत्यु के कुछ दिन पहले ही समझ आ पायेगा।

शिक्षाविद इस प्रश्न को बड़े ही मर्यादित ढंग से उठाते हैं, मैं तनिक ठेठ शैली में पूछ लेता हूँ। जब घर से कहीं जाने के लिये निकलते हैं तो उसी के अनुसार मार्ग नियत करते हैं, ऐसा तो नहीं करते हैं कि किसी भी दिशा में निकल लें और आगे जाने के बाद जहाँ भी पहुँचे उसे अपना ध्येय-स्थान मानकर वहीं जीने लगें। हो सकता है कि पढ़ने में अटपटा लगे पर वर्तमान शिक्षा व्यवस्था कुछ यही स्वरूप ले चुकी है। सबको एक बड़े मैदान तक हाँक कर पहुँचा दिया जाता है, आगे लड़ लो, जो आगे निकल सके तो निकल ले, डार्विन को एक प्रयोगक्षेत्र बना कर दे दिया है, अपने न सिद्ध होने वाले सिद्धान्त सिद्ध करने के लिये।

यदि संघर्ष और शक्ति ही श्रेष्ठता के मानक होते तो अभी भी हम घोड़े की पीठ पर बैठ कर तलवारों से युद्धकर रहे होते। सहजीवन और विकास के प्रति हमारी स्वाभाविक ललक हमें डार्विन के सिद्धान्त की दूसरी दिशा में ले जाती है। प्रचुर संसाधन की मानसिकता और धरती में जीने वालों को डार्विन का सिद्धान्त एक मज़ाक़ सा लगता है। जब सबके लिये जीवन यापन का मूलभूत सिद्धान्त ले हम सहजीवन की दिशा उद्धत हुये हैं तो ऊर्जा और जीवन का इस तरह पृथक पृथक हो व्यर्थ हो जाना हमें किस तरह स्वीकार हो सकता है?

जीवन को एकल और समग्र रूप देने के बाद, उसमें शिक्षा, योग्यता, जीवन यापन के साधन और सुखमय जीवन, सब के एक पंक्ति में खड़े हो जाते हैं, एक दूसरे से पोषित और संबद्ध, जिसमें न एक दिन व्यर्थ हो, न एक कर्म। जिसमें यह ध्येय छिपा हो, कि जीवन को किस तरह श्रेष्ठता के मानकों पर खरा उतारना है। हमारा यही आधारभूत निर्णय हो कि जीवन का समग्र स्वरूप क्या हो, शेष सब स्वतः स्थापित हो जायेगा जीवन में। जीवन को और समाज को इस स्वरूप में समझने के बाद शिक्षा के स्पष्ट उद्देश्य क्या हों, वह अगली पोस्ट में।

10.11.12

शिक्षा - व्यर्थ संभावनायें

जिस समय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, एक आशंका सी रहती थी कि होगा कि नहीं, यदि होगा तो कितने वर्षों में। तैयारी करने वाले प्रतिभागियों में जिससे भी मिलते थे, एक उत्सुकता रहती थी, यह जानने की कि कौन कितने वर्षों से तैयारी कर रहा है? तैयारी का कुछ भाग दिल्ली में और कुछ इलाहाबाद में किया था, आपको यह तथ्य जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ लोग १० वर्षों से तैयारी कर रहे थे। एक अजब सी आशावादिता व्याप्त थी वातावरण में कि आने वाला वर्ष सुखद निष्कर्ष लेकर आयेगा, पिछले वर्षों के श्रम में बस कुछ और जोड़ दें इस बार, थोड़ा भाग्य साथ दे दे इस बार, कुछ पढ़ा हुआ आ जाये इस बार।

एक नशे की गोली ही है कि ८-१० साल तक कुछ सूझता नहीं है। कई लोग इस तथ्य को शीघ्र समझ लेते हैं और कोई अन्य मार्ग ढूढ़ने लगते हैं, पर देश की शीर्षस्थ सेवाओं में पहुँचने का स्वप्न ऐसा है कि प्रतियोगी १० वर्ष स्वप्न में ही बिता डालते हैं। लाखों लोग परीक्षा देते हैं और उसमें से चार पाँच सौ ही लिये जाते हैं। जिनके चार प्रयास हो जाते हैं, वे प्रादेशिक सेवाओं की तैयारी में लग जाते हैं क्योंकि उसमें प्रयास अधिक मिलते हैं, उसके बाद कुछ और सीमित विकल्प, अन्त में सब तरह के ज्ञान में संतृप्त युवक अपनी प्रौढ़ता के प्रवेश होते होते कोई अध्यापन का कार्य कर लेते हैं और अपनी आर्थिक स्थिति गृहस्थी चलाने योग्य बना लेते हैं।

मेरा उद्देश्य न तो सिविल सेवाओं की महत्ता को दर्शाना है, न ही कोई करुण कथा सुना संवेदनायें विकसित करनी है और न ही लाखों युवाओं के व्यर्थ हुये वर्षों के बारे में कोई आँकड़े रखने है। सक्षम और मेधायुक्त युवाशक्ति का इस तरह व्यर्थ हो जाना करोड़ों करोड़ के घोटाले से कम नहीं और जिसका पूरा ठीकरा नौकरीपरक शिक्षा व्यवस्था पर ही फूटता है। किसी एक पर दोष नहीं मढ़ा जा सकता है और देखा जाये तो सब के सब दोषी। १० वर्षों के संघर्ष में लुप्त हुयी संभावनायें, इसकी तैयारी के प्रति उद्दात्त आकर्षण, अन्य क्षेत्रों में विकास न हो पाना, अपने उद्यम लगाने वालों की कमी और न जाने कितने ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर सबको ढूढ़ने हैं।

संघर्ष आवश्यक है, उतना जिससे क्षमतायें विकसित हों, उतना जिससे विकास हो, स्वस्थ प्रतियोगिता हो। संघर्ष इतना अधिक भी न हो जितना मुगलिया सल्तनत में था, पुत्रों में जो जीता वह राजा, जो हारा वह या तो कालकोठरी में या ईश्वर के पास। संघर्ष इतना कम भी न हो कि सब सुविधा बैठे बैठे ही मिल जाये, धनाड्य परिवारों की नकारा संततियों की तरह।

यह तो अच्छा हुआ कि सिविल सेवाओं के समकक्ष और कई क्षेत्र खुल गये, जैसे आईटी और प्रबन्धन, डॉक्टर और इन्जीनियर पहले से ही थे, जिन्हें देश में स्थिरता और मान नहीं मिला वे विदेश चले गये। अब संभवतः लोग दस वर्ष प्रतीक्षा नहीं करते होंगे, सिविल सेवाओं के लिये और यह भी संभव है कि बहुत लोग वैकल्पिक व्यवस्था करके ही सिविल सेवाओं की तैयारी करते होंगे। विकल्पों के विस्तार से व्यर्थ हुयी ऊर्जा निश्चय ही कम हुयी होगी पर अभी भी लाखों वर्ष जो हर वर्ष व्यर्थ होते हैं, उसका निदान नहीं हैं।

कहते हैं कि कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता है, हर प्रयास में मनुष्य कुछ न कुछ सीखता ही है। सीखने के स्तर तक तो संघर्ष करके पढ़ना अच्छा है पर ८-१० वर्ष तक वही पाठ्यक्रम इस आस में पढ़ते रहना कि अगली बार भाग्य साथ देगा, समय को व्यर्थ करने से अधिक कुछ भी नहीं।

बिन्दु स्पष्ट है। एक ओर संभावनाओं का जल स्थिर है, अपने बहे जाने की राह देख रहा है, वहीं दूसरी ओर मैदानों में सूखा पड़ा है। कितने ही क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें आवश्यकता है ऊर्जावान युवाओं की, जो आकर कुछ नया कर जायें, संभावनाओं का जल वहाँ पहुँचे तो वहाँ भी ऐश्वर्य लहलहा उठे। कितने ही क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ गुणवत्ता शापित है, अन्य देश लाभान्वित हो रहे हैं, हमारे देश के बाजार पर अधिकार करते जा रहे हैं, वहाँ हमारी युवा ऊर्जा क्यों नहीं पहुँच पाती है। शिक्षा का ही क्षेत्र ले लीजिये जहाँ स्तरीय अध्यापकों की नितान्त आवश्यकता है, पर वहाँ पर भी इतना कम पैसा मिलता है कि व्यक्ति एक सम्मानित जीवन यापन के बारे में सोच ही नहीं सकता है। नवीन उद्यम, नवीन तकनीक, सब के सब क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें हम अपने पैर पसार ही नहीं पा रहे हैं, ललचाये से शेष विश्व की ओर निहारने में लगे रहते हैं।

दूसरी ओर संभावनाओं को जल बस उन्हीं क्षेत्रों में बहना चाहता है जो पहले से ही सिंचित हैं। असिंचित क्षेत्रों में जाने से जल का अस्तित्व मिट जाने का भय होता है। भले ही कितना ही जल अपनी लम्बी यात्रा के पश्चात खारे सागर में जाकर समा जाये पर उसका उपयोग हम शेष धरा को सिंचित करने में नहीं कर पाते हैं।

दोष किस पर मढ़ें, अभिभावकों को भी दोष नहीं दे सकते, जो मार्ग कभी बने ही नहीं उन पर वे अपने बच्चों को चलने के लिये कैसे कह दें? कुछ तो हो आश्वस्त होने के लिये। शिक्षा पद्धति भी क्या करे, उसका ध्यान ज्ञान से अधिक इस बात पर लगा रहता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के योग्य बच्चे कैसे बने? रट रटकर प्रतियोगी परीक्षाओं में उगल देने वाले युवाओं से भी क्या आशा करें कि वे नव-उद्यम का मोल समझें, उस नव-उद्यम का जिसके बारे में उन्हें कभी तैयार ही नहीं किया गया है।

एक ओर सारे जगत की चमक है और शेष जगत अँधियारा। क्या कोई उपाय है जिसमें कुछ भी प्रयास व्यर्थ न जायें, प्राप्त शिक्षा व्यर्थ न जाये, झूठी आशा में निकल गये इतने वर्ष व्यर्थ न जायें? क्या आधारभूत ढांचा निर्माण हो जिसमें देश की युवा ऊर्जा सहज बहे और समुचित बहे, सारे असिंचित क्षेत्र सिंचित हों। व्यर्थ संभावनायें, बाढ़ के जल के समान अस्थिरता ला सकती हैं और यह मूल्य उन प्रयासों में लगे मूल्य से कहीं अधिक होगा जो जो इन व्यर्थ हो रही संभावनाओं को एक स्थायी दिशा देने में लगेगा।

28.3.12

नकल का अधिकार

'भैया, पास न भयेन तो बप्पा बहुतै मारी' अर्थ था कि भैया, यदि परीक्षा में पास न हो पाये तो पिताजी बहुत पिटायी करेंगे। १८ साल का युवा, कक्षा १२, मार्च का महीना और आँखों का भय शत प्रतिशत प्राकृतिक। नाम का अधिक महत्व नहीं है क्योंकि आप मस्तिष्क पर थोड़ा सा भी जोर डालेंगे तो पड़ोस के किसी न किसी युवा का नाम आपके मन में कौंध जायेगा। पिता क्यों पीटेगें, क्योंकि उनका यह दृढ़ विश्वास है कि विद्यालय जाने के नाम पर लड़के मटरगस्ती करते रहते हैं क्योंकि पढ़ाई और अनुशासन रहा ही नहीं, कितना अच्छा होता कि लड़का घर में खेती आदि में पिताजी का हाथ बटाता।

लड़का भी क्या करे, परिश्रम तो बहुत किया है उसने। अब कुछ विषय ऐसे हैं जो समझ में आते ही नहीं हैं। अध्यापक ने वर्षभर कुछ पढ़ाया ही नहीं है, जब स्थानीय परीक्षा होती थी तो जुगत लगाकर पास कर दिया जाता था, बोर्ड की परीक्षाओं में पेपर बाहर वाले ही बनाते हैं और जाँचते भी बाहर ही हैं। यदि जो आता है, वह लिख दिया तो फेल होना तय है। फेल हो गये तो पिताजी को अपनी बात सिद्ध करने का अवसर मिल जायेगा और अगले साल से खेती करनी पड़ेगी।

किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है, उस युवा की व्यथा कथा। जिन्हें हिन्दी फिल्में देखने का समुचित अनुभव है, उन्हें सुखान्त की आशा अन्त तक बँधी रहती है और बस एक बार दर्शक के मन में यह घर कर जाये कि पात्र निर्दोष है तो सुखान्त के लिये पात्र कुछ भी कर डाले, वह क्षम्य होता है।

अब एक ओर जीवन भर खेतों में खटना, वहीं दूसरी ओर थोड़ी बहुत नकल कर पास हो जाना और कालेज इत्यादि में नगरीय जीवन का आनन्द उठाना, युवा को निर्णय लेने में कोई कठिनाई नहीं हो रही थी। ऐसे निर्णयों को सहारा देने के लिये मन दौड़ा दौड़ा आता है, पूरी की पूरी तर्क श्रंखला के साथ।

अब देखिये कुछ दिन पहले तक स्वकेन्द्र परीक्षा होती थी अर्थात अपने ही विद्यालयों में बोर्ड की परीक्षा। जहाँ पूरे विद्यालय की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी हो वहाँ पर छात्रों को येन केन प्रकारेण उत्तीर्ण कराना तो बनता है। कैसे भी हो बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सभी छात्र उत्तीर्ण हो जाते थे, ससम्मान की आस किसी को नहीं रहती थी क्योंकि सम्मान तो पहले ही गिरवी रखा जा चुका होता था। पता नहीं किस अधिकारी का निर्णय था कि परकेन्द्र परीक्षा ली जाये। किसी प्रतिद्वन्दी विद्यालय में जाकर सुविधानुसार प्रश्नपत्र हल करना तो दूर, सर हिलाना भी संभव नहीं रहता था। जहाँ कमरे में एक निरीक्षक होता था, वहाँ दो दो लग जाते थे। पता नहीं बिना पढ़े बच्चों को इस तरह से सताने में ईश्वर उन अध्यापकों को क्या आनन्द देता होगा।

स्वकेन्द्र हो या परकेन्द्र, नकल तो करनी आवश्यक ही थी। जब नकल न कर के पास होना सर्वथा असम्भव हो, तो नकल कर के पास होने का प्रयास तो किया ही जा सकता था। पकड़े जाने पर अनुत्तीर्ण कर दिये जाते हैं, पर बचने पर उत्तीर्ण होने की संभावना थी। प्रायिकता के इस सिद्धान्त पर और प्रयास सफल न होने पर भी अनुत्तीर्ण ही होने के निष्कर्षों ने नकल को दशकों तक छात्रों के बीच जीवन्त और लोकप्रिय बनाये रखा।

इस सर्वजनहिताय सिद्धान्त को तो तब झटका लगा था जब किसी मंत्री को छात्रों का यह सुख देखा नहीं गया। जो कार्य वर्ष भर की पढ़ाई करने में अक्षम थी, वह वर्षान्त की नकल करा देती थी। एक नकल अध्यादेश लाया गया जिसमें नकल करते छात्रों को सीधे जेल भेजे जाने का प्रावधान था। कितना बड़ा अन्याय, जिस अपराध के लिये पूरे शिक्षा तन्त्र को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिये, उसके लिये एक निरीह से छात्र को दण्ड देने के प्रावधान रखा गया। एक दो वर्ष पूरी युवाशक्ति सहमी सहमी रही, उत्तीर्ण छात्रों का प्रतिशत ३० के भी नीचे चला गया, घोर कलियुग, दो तिहाई युवाशक्ति नकारा। प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, नयी सरकार आयीं, छात्रों को उनका मौलिक अधिकार ससम्मान वापस कर दिया गया।

हमारे होनहार पात्र के लिये अब प्रश्न यह नहीं था कि नकल करना उचित है कि अनुचित या नकल करने का अवसर मिलेगा कि नहीं, प्रश्न इस बात का था कि नकल की किन विधियों को प्रयोग में लाकर उत्तीर्ण हुआ जा सकता था और वह भी, कम से कम प्रयास में, श्रम को भी सोच समझ कर बहाने का दायित्व जो था उन पर। या कहें कि क्या जुगत लगाने से नकल के लिये बनायी जाने वाली पुर्चियों की संख्या न्यूनतम हो और उसमें किस तरह अधिकतम सामग्री डाली जा सके।

अब कहीं जाकर हमको समझ में आया कि हमसे किस प्रकार की सहायता की अपेक्षा की जा रही थी।

3.3.12

परीक्षा की विधियाँ

कुछ लोग होते हैं जिन्हें परीक्षा का तनिक भी भय नहीं होता है, अंक भले ही कितने आयें। मार्च-अप्रैल की नीरवता में डूबी गर्म दुपहरियों में यही लोग रोचकता बनाये रखते हैं। हमारे एक चचेरे भाई को बड़ी संवेदना रहती थी हम सबसे, पहले तो ये बताते थे कि कौन सा प्रश्न फँस रहा है, जब उससे भी संतोष न होता तो एक पूरा का पूरा संभावित प्रश्नपत्र बनाते और पकड़ा देते। उनका दावा रहता था कि कम से कम ८० प्रतिशत उससे ही फँसेगा। कौन से प्रश्न फँसने वाले हैं उसके लिये पिछले प्रश्नपत्रों की विवेचना और अध्यापक की मनःस्थिति, इन दोनों का सहारा विद्यार्थी कई दशकों से ले रहे हैं। कई दयालु अध्यापक पाठ्यपुस्तक के ही प्रश्न उतार देते हैं, कई अतिदयालु अध्यापक उदाहरणों को ही प्रश्न बना देते हैं और कई महादयालु अध्यापक पिछले प्रश्नपत्र में से ही अधिकतर प्रश्न उतार देते थे। अध्यापक और छात्र के संबंध में दया आना स्वाभाविक है, दयालु संस्कृति बनाये जो रखनी है।

अपनी इसी रुचि के कारण हमारे चचेरे भाई तो बहुत बड़े प्रोफेसर हो गये, उन्हें विद्यार्थियों के ये हथकण्डे भलीभाँति ज्ञात होंगे और निश्चय ही वह अपना प्रश्नपत्र थोड़ा हटकर बनाते होंगे। अध्यापकों को यह तथ्य ज्ञात है कि विद्यार्थी पाठ्यक्रम विमर्श से अधिक प्रश्नपत्र विमर्श करते हैं, जितना समय सीखने में लगना चाहिये उससे कहीं अधिक यह सिद्ध करने में लगता है कि कितना सीखा। अध्यापक सहज चिंतक होते हैं, चिंतक प्रयोगधर्मी होते हैं, यह बात अलग है कि विद्यालयों में उन्हें इन प्रयोगों की छूट नहीं मिलती है। बड़े संस्थानों में स्थिति थोड़ी बेहतर हैं और अध्यापकों को परीक्षा की विधियाँ निश्चित करने की स्वतन्त्रता रहती है। उनके लिये भी यही दो प्रश्न मन में रहते होंगे कि परीक्षा की विधि ऐसी हो जिससे विद्यार्थी सारा पाठ्यक्रम पढ़ने को बाध्य हो, और इस तरह पढ़ें जिससे विषय स्पष्ट रूप से उन्हें समझ आये और अन्ततः लम्बे समय तक मस्तिष्क में बना रहे।

पढ़ाई में नियमितता से अधिक अचूक अस्त्र कुछ भी नहीं है। यदि नियमतता है तो बड़ा और कठिन पाठ्यक्रम भी ग्राह्य हो जाता है। औचक परीक्षा एक ऐसी विधि है जो विद्यार्थी को नियमित रहने को बाध्य कर देती है, नित्य कक्षा में आना, विषय को समझना और गृहकार्य ढंग से करना। कक्षा में अन्तिम २० मिनट में वर्तमान विषय से संबंधित एक प्रश्न ही पर्याप्त होता है, इसके लिये। आईआईटी में जिन विषयों में औचक परीक्षा की विधि अपनायी गयी थी, वे विषय अभी भी स्पष्ट हैं मनसपटल पर। प्रबन्धन संस्थानों में नियमितता बनाये रखने के लिये केस स्टडी का सहारा लिया जाता है। वास्तविक जीवन की एक घटना को पढ़ने, समझने और पढ़े हुये सिद्धान्त प्रयुक्त करने को कहा जाता है, उस पर चर्चा होती है और अंक निर्धारित किये जाते हैं।

विषय का गहन ज्ञान परखने के लिये कई प्रोफेसर एक एक प्रश्न सभी विद्यार्थियों को पकड़ा देते हैं, साथ में देते हैं एक दिन या एक सप्ताह का समय। ये प्रश्न बहुधा शोध की विषय से संबद्ध होते हैं और इनका कोई एक उत्तर नहीं होता है। विषय की समझ जितनी अधिक होती है, आप उतना ही अधिक दूर तक उस प्रश्न को सुलझा सकते हैं। इसके लिये विद्यार्थियों की संख्या कम होनी चाहिये क्योंकि एक छोटे विषय से संबद्ध शोधगत प्रश्न बहुत अधिक नहीं होते हैं। दूसरी विधि बड़े प्रोजेक्ट की है जिसमें विद्यार्थी को कई पुस्तकों से पढ़कर शोध करना पड़ता है। जब कई पुस्तकों से पढ़कर लिखना होता है तो विषय अपने आप मस्तिष्क में उतरता जाता है। इन दो विधियों में परीक्षा की व्यग्रता के स्थान पर ज्ञान का विस्तार होता है, जो शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य भी है।

जहाँ पर परीक्षा लेना आवश्यक है, वहाँ भी प्रोफेसर सार्थक प्रयोग करते दिख जाते हैं। परीक्षा कक्षों में किताब ले जाने की छूट इसका एक उदाहरण है। जब वास्तविक जीवन में पुस्तकों और संदर्भों से सहायता लेने की छूट रहती है तो परीक्षा के समय उस सुविधा से क्यों वंचित रहा जाये। पुस्तकों को ले जाने की छूट से तैयारी करते समय विषय के मौलिक सिद्धान्तों को ढंग से समझने का समय मिलता है क्योंकि केवल याद रखने वाली चीजें तो कभी भी पुस्तक से देखी जा सकती हैं। आवश्यक पर पूरा ध्यान और अनावश्यक से पूरी मुक्ति इस विधि की विशेषता है। एक दूसरी विधि में प्रोफेसर ने अन्तिम के ५ मिनट एक दूसरे से बात करने की पूरी छूट दे दी थी। इस समय में एक दूसरे से बात करके छोटी भूलों को सुधारने का पूरा समय मिल जाता है पर पूरा उत्तर पुनः लिखने का समय नहीं मिलता है। यह छूट कई अवसरों पर बहुत काम की सिद्ध होती है।

एक विधि, जिसने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया और जिसमें विद्यार्थी और अध्यापक के उद्देश्यों को पूर्ण निष्कर्ष मिलते हैं। अध्यापक का उद्देश्य होता है कि विद्यार्थी पूरा विषय ढंग से पढ़े, विद्यार्थी का उद्देश्य होता है कि उसे अधिकतम अंक मिलें। अध्यापक ने निश्चय किया कि वह आपसे बस १० मिनट के लिये बात करेंगे, ३ प्रश्न पूछेंगे, उन अध्यायों पर जिन पर आप स्वयं को सहज अनुभव करते हों। लिखित से अधिक प्रभावी होती है मौखिक परीक्षा। १० मिनट के साक्षात्कार के बाद आपको आपके ग्रेड बता दिये जायेंगे। यदि आप संतुष्ट न हों तो आपको थोड़ी और तैयारी के बाद पुनः आने को कहा जायेगा और पुनः वही प्रक्रिया, और यह तब तक होता रहेगा जब तक विद्यार्थी अपने ग्रेड से संतुष्ट न हो जाये। लगभग एक तिहाई ने एक बार में ही 'ए' ग्रेड प्राप्त किया, शेष दो तिहाई को दो या अधिक बार यह प्रक्रिया अपनानी पड़ी। एक विद्यार्थी ने ५ बार साक्षात्कार दिया और अन्ततः 'ए' लाया। सबको 'ए' मिला और सबने उसके लिये यथोचित श्रम लगाया। यद्यपि प्रशासन को यह रास नहीं आया पर उसके पास भी किसी का भी 'ए' ग्रेड नकारने का कारण भी नहीं था, सबको वह विषय ढंग से आता था।

छोटी कक्षाओं के लिये अंक के स्थान पर ग्रेड देना, परीक्षा की व्यग्रता घटाने का एक अच्छा प्रयास है। विद्यालयों में कक्षाओं के अतिरिक्त वास्तविक जीवन से भी सीखने पर यथोचित बल दिया जा रहा है। बाहर घूमने ले जाना, खिलौने के माध्यम से समझाना और अन्य रोचक विधियों से सिखाना, ये सब प्रयोगधर्मिता के सशक्त उदाहरण हैं। इसी रोचकता के बीच बच्चे का स्तर परख लिया जाये और उसे आगे बढ़ने दिया जाये। जब परीक्षा का बोझ कम होगा और मस्तिष्क में कुछ स्थान खाली रहेगा, तभी सृजनता और नवीनता व्यक्तित्व का निर्माण कर पायेंगी।

परीक्षायें भार न लगें, ज्ञान का उपहार लगें।

25.2.12

परीक्षा

परीक्षा श्रेष्ठता सिद्ध करने की विधि है, श्रेष्ठ होने की अनिवार्यता नहीं है। यह दर्शन का वाक्य नहीं, हम सबके दैनिक अनुभव की विषयवस्तु है। उदाहरणों की बहुतायत है, जो जीवन में श्रेष्ठ रहे और जो परीक्षा में श्रेष्ठ घोषित किये गये, उनके बीच कभी किसी प्रकार का तार्किक संबंध रहा ही नहीं है। कारण दो ही हो सकते हैं, या तो जिस पाठ्यक्रम पर परीक्षा होती है, वह बड़ा छिछला है, या तो परीक्षा की विधि में दोष है। तुरन्त ही निष्कर्ष पर पहुँच कर कुछ असिद्ध करने की व्यग्रता में नहीं हूँ, क्योंकि स्वयं भी परीक्षा की पद्धति का प्रतिफल हूँ।

क्या परीक्षा आवश्यक है? हाँ और नहीं भी। जब संसाधनों की माँग अधिक हो और आपूर्ति कम तो वह संसाधन किसे मिले, उसके लिये प्रतियोगिता होती है। प्रतियोगिता बहुधा धन की होती है, जिसके पास अधिक धन, उसके पास अधिक संसाधन। इसी प्रकार जब किसी नौकरी के लिये अधिक लोग आवेदन करते हैं तो सुयोग्य पात्र का निर्धारण करने के लिये भी प्रतियोगिता होती है, जो धन के स्थान पर ज्ञान पर आधारित होती है। यही प्रतियोगिता परीक्षा का उद्गम बिन्दु है। यह एक अलग विषय है कि परीक्षा में परखे गये ज्ञान में और नौकरी में काम आने वाले ज्ञान में जमीन आसमान का अन्तर होता है। जब संसाधन अधिकता में होते हैं, तब प्रतियोगिता होती ही नहीं है, परीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं।

निर्धन समाज में संसाधन कम होते हैं, उनके लिये प्रतियोगिता अधिक होती है, परीक्षा एक के बाद आती रहती है, संघर्ष में बीतता है जीवन। हर छोटी छोटी चीज के लिये जूझना जब नियति हो, तब परीक्षा जीवन का अनिवार्य अंग बन कर हम सबसे चिपक जाता है। अरब के देशों के लिये परीक्षा का कोई महत्व नहीं, पश्चिमी धनाड्य देशों में भी परीक्षा होती हैं पर उनका स्वरूप इतना संघर्षमय तो नहीं ही रहता होगा जैसा अपने देश में है।

यह मानसिकता बहुत गहरे उतरी है, हमारी शिक्षा पद्धति में। यदि हम कल्पना करें कि विद्यालय में कोई परीक्षा न हो, सबको उत्तीर्ण कर दिया जाये, सबको अपने योग्य नौकरी चुनने का अधिकार हो, कोई प्रतियोगिता नहीं, सब अपना जीवन जियें, अपनी रुचि के अनुसार, आनन्द में। बहुत लोग यह बात पचा नहीं पायेंगे। मान मिले न मिले पर यह स्वप्न रह रह कर आता ही रहेगा, क्योंकि यही मेरे लिये किसी सभ्य और सुसंस्कृत समाज की आदर्श स्थिति है। आप कह सकते हैं कि यदि प्रतियोगिता नहीं रहेगी तो लोग पढ़ेगे नहीं, विज्ञान, साहित्य, तकनीकी आदि विकसित ही नहीं होंगी, हम असभ्य के असभ्य रह जायेंगे। आपके इस तर्क से मैं तुरन्त सहमत हो जाऊँगा, पर पाठ्यक्रम और परीक्षा की विधि का विश्लेषण करने के बाद।

हमारी ७० प्रतिशत बौद्धिक क्षमता समाज से प्राप्त अनौपचारिक शिक्षा से विकसित होती है, शेष ३० प्रतिशत औपचारिक शिक्षा में भी दो तिहाई क्षमता हमारी जिज्ञासा से आती है। मात्र १० प्रतिशत क्षमता नियमित अध्यापन से आती है। इसी १० प्रतिशत को विकसित करने के लिये हमारी शिक्षा पद्धति कटिबद्ध है। पूरी पठनीय सामग्री को एक वर्षीय १०-१२ पाठ्यक्रमों में बाटना, हर वर्ष परीक्षा, सब विषयों का प्रारम्भिक ज्ञान, हर बार कुछ और नया। जितना पढ़ना पड़ता है उसका केवल १० प्रतिशत ही स्मृति में रह पाता है, स्मृति में उपस्थित आधा ज्ञान ही किसी काम का होता है। कुल मिला कर जितना ज्ञान आवश्यक है उसका २० गुना हमें हजम करना पड़ता है औपचारिक शिक्षा के माध्यम से। हर पीढियों में यह मात्रा बढ़ती जाती है, क्योंकि हर विषय के पुरोधा अपने विषय के प्रति छात्रों को आकर्षित करने के लिये विषय से संबंधित तकनीकियाँ और विशिष्ट ज्ञान पाठ्यक्रम में ठूस देना चाहते हैं। गणित के जो सवाल हम कक्षा १२ में करते थे, उसे कक्षा ९ में देखकर हमारे होश उड़ गये। आने वाले समय में आवश्यक औपचारिक ज्ञान से ३० गुना बच्चे को घोटना पड़े, और वह भी मात्र १० प्रतिशत कुल बौद्धिक क्षमता विकसित करने के लिये, तो कोई आश्चर्य नहीं है, अपने बच्चों को सुपरमैन की उपाधि देना तब आपके लिये अधिक सरल होगा।

जब पाठ्यक्रम की मात्रा अधिक होगी, तो परीक्षा का भार भी उतना ही होगा। अब आयें परीक्षा की विधि पर। क्या परीक्षा यह निश्चित कर पाती है कि सब पाठ्यक्रम पढ़ डाला गया है और ढंग से समझ में आ गया है? क्या परीक्षा के प्रश्नपत्र का प्रारूप यह जानने के लिये होता है कि आपको क्या आता है या क्या नहीं आता है? परीक्षा हो जाने के बाद कितना रह पाता है दिमाग में? इन तीनों प्रश्नों का उत्तर ढूढ़ने में हमें वे राहें मिल जायेंगी, जिन पर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को चलते देखना चाहते हैं। अपने शैक्षणिक जीवन में परीक्षा की कई विधियों से साक्षात्कार हुआ, जिसके विषय में एक अलग पोस्ट में लिखूँगा। कोई तो कारण होगा कि परीक्षा का नाम सुन जितना पसीना और कँपकपी लोगों को आती है, उतना जून की गर्मी व दिसम्बर की सर्दी में भी नहीं आती होगी।

यदि प्रतियोगी परीक्षाओं को भी देखें तो उनमें नियत ज्ञान का स्तर, उस नौकरी में वांछित ज्ञान के स्तर से बहुत अधिक होता है। रेलवे में परास्नातकों को पत्थर ढोते हुये देखता हूँ तो देश के भविष्य के बारे कुछ बोल पाना कठिन सा लगने लगता है। हर क्षेत्र में यही स्थिति है, पढ़े अधिक हैं पर उनका महत्व नहीं है। संभवतः परीक्षा पद्धति को सही स्वरूप में देख पाना और उसे ज्ञान और उपयोगिता के अनुसार प्रयोग में ला पाना हमारे भविष्य को तय करेगा।

परीक्षा पद्धति हमारी शिक्षा व्यवस्था के लिये परीक्षा की घड़ी है।

4.2.12

पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा

एप्पल ने शिक्षा के क्षेत्र में पहल करते हुये आईबुक ऑथर के नाम से एक सुविधा प्रारम्भ की है। इस एप्लीकेशन के माध्यम से आप कोई पुस्तक बड़ी आसानी से लिख सकते हैं और आईट्यून के माध्यम से ईबुक के रूप में बेचकर धन भी कमा सकते हैं। उपन्यास, कविता इत्यादि के अतिरिक्त गणित, विज्ञान जैसे विषयों पर पाठ्य पुस्तक लिखने के लिये कई प्रारूप दिये गये हैं इस सुविधा में। किसी भी अध्याय में लेखन और चित्रों के अतिरिक्त वीडियो, त्रिविमीय दृश्य, पॉवर प्वाइण्ट प्रस्तुति, एक्सेलशीट गणनायें आदि के होने से पढ़ने का अनुभव अलग ही होने वाला है। पुस्तक आप मैकबुक में लिख सकते हैं पर समुचित पढ़ने के लिये आईपैड का विकल्प ही रहेगा। इस माध्यम से एप्पल का प्रयास आईपैड को शिक्षा के आवश्यक अंग के रूप में स्थापित करने का रहेगा।

मेरे अग्रज नीरजजी ने अपने पुत्र को हाईस्कूल के समय नियमित पढ़ाया है और वह प्रचलित कई पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता से संतुष्ट नहीं हैं, उनका कहना है कि पाठ्यपुस्तकों को और अधिक प्रभावी ढंग से लिखा जा सकता है और रोचक बनाया जा सकता है। आईबुक ऑथर के रूप में नीरजजी को रोचक ढंग से पुस्तक लिखने के लिये एक उपहार मिल गया है। यदि वह कोई पुस्तक इसपर लिखेंगे तो वह कैसी लगेगी? इसी उत्सुकता में एक अध्याय लिखकर देखा, वह आईपैड पर कैसा लगेगा यह देखने के लिये एप्पल के स्टोर इमैजिन में गया। खड़ा हुआ आईपैड में वह अध्याय देख रहा था, बगल में एक १४-१५ साल की लड़की अपने माता पिता के साथ आईपैड देख रही थी, उनके बीच की बातचीत, न चाहते हुये भी सुनायी पड़ रही थी।

लड़की किसी तरह यह सिद्ध करने में प्रयासरत थी कि वह आईपैड एक खिलौने के रूप में नहीं लेना चाहती, वरन उसका उपयोग अपनी पढ़ाई में कर अच्छा भविष्य बना सकती है। मैं थोड़ा प्रभावित हुआ, मुझे भारत का भविष्य आशावान लगने लगा। मुझे भारतीय मेधा पर कभी संशय नहीं रहा है, पर अपनी बात खुलकर कह पाने का गुण भारतीय बच्चों में न पाकर निराशा अवश्य होती है, कुछ संकोच के कारण नहीं बोलते हैं, कुछ मर्यादा के लबादे में दबे रहते हैं। वह लड़की जब बोल रही थी, जिज्ञासावश मैं अपना कार्य छोड़ तन्मयता से बस सुने जा रहा था। भारत अपने महत भविष्य में दौड़ लगाने जा रहा था, तभी पिता का एक आश्वासन सुनकर ठिठक गया। पिता बोले, बेटी परीक्षा में पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा।

कुछ जाना पहचाना सा लगता है यह आश्वासन, सबके साथ हुआ होगा जीवन में, बस इस वाक्य में तीन के स्थान पर कोई और संख्या व आईपैड के स्थान पर कोई और वस्तु बदल जाती होगी। आपके साथ बचपन में हुआ होगा और संभव है कि आप अपने बच्चों को यही सूत्र पिला रहे हों, पतिगण अपनी पत्नियों से कुछ ऐसा ही मीठा संवाद बोलते होंगे, पत्नियाँ भी ऐसे गुड़भरे संवादों को सूद समेत चुकाती होंगी, ध्यान से देखें तो हर जगह यही सिद्धान्त पल्लवित हो रहा है। बड़ी गहरी पैठ बना चुका है यह अन्तर्पाश, हर परिवार में।

बचपन से अब तक की दो ही घटनायें याद आती हैं, इस प्रकार के अन्तर्पाश की, क्रिकेट बैट पाने के लिये गणित की किसी परीक्षा में पूरे अंक लाने का लक्ष्य और घड़ी पाने के लिये हाईस्कूल में ससम्मान उत्तीर्ण होने का लक्ष्य। दोनों ही लक्ष्य प्राप्त हुये थे और पिताजी ने दोनों ही वचन पूरे किये, पर उसके बाद से मैं अपने कर्म करता रहा, पिताजी स्वतः ही कुछ न कुछ फल देते रहे, किसी फल विशेष के लिये किसी कर्म विशेष को विवश नहीं किया गया, कोई अन्तर्पाश नहीं रहा।

कर्मफल का सिद्धान्त है, कर्म करने से फल मिलता है, पर जगतीय कर्मफल के सिद्धान्त से थोड़ा अलग है पारिवारिक कर्मफल का सिद्धान्त। जगतीय कर्मफल में सफलता और सफलता की प्रसन्नता अपने आप में फल होता है। पारिवारिक कर्मफल में किसी कार्य की सफलता ही कर्म है, फल पूर्णतया असम्बद्ध होता है। आशाओं और आकांक्षाओं का आदान प्रदान होता है पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में।

खैर, लड़की के पास दो माह का समय है, प्रथम तीन में आकर आईपैड पाने के लिये। भगवान करे, उसका दृढ़निश्चय उसे सफलता दिलाये। इसी बीच मैं नीरजजी को भी बोलता हूँ कि एक स्तरीय पुस्तक लिखना प्रारम्भ कर दें, आने वाली पीढियाँ ढर्रे वाली पुस्तकों के अतिरिक्त अच्छे लेखकों की पुस्तकें पढ़ने को तैयार बैठी हैं। टिम कुक जी का ईमेल लेकर उन्हे भी सूचना देता हूँ कि आप जो शिक्षा को भी संगीत, फोन और लैपटॉप की तरह एक नया स्वरूप दे रहे हैं, उसमें सप्रयास लगे रहिये। भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग। भारत में हर बच्चे के पास होगा आईपैड, क्योंकि अपनी मेधा के बल पर भारत ही प्रथम तीन में सदा बना रहेगा।

23.11.11

चेतन भगत और शिक्षा व्यवस्था

चेतन भगत की नयी पुस्तक रिवॉल्यूशन २०२० कल ही समाप्त की, पढ़कर आनन्द आ गया। शिक्षा व्यवस्था पर एक करारा व्यंग है यह उपन्यास। शिक्षा से क्या आशा थी और क्या निष्कर्ष सामने आ रहे हैं, बड़े सलीके से समझाया गया है, इस उपन्यास में।

इसके पहले कि हम कहानी और विषय की चर्चा करें, चेतन भगत के बारे में जान लें, लेखकीय मनःस्थिति समझने के लिये। बिना जाने कहानी और विषय का आनन्द अधूरा रह जायेगा।

चेतन भगत का जीवन, यदि सही अर्थों में समझा जाये, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को समझने के लिये एक सशक्त उदाहरण है। अपने जीवन के साथ हुये अनुभवों को बहुत ही प्रभावी ढंग से व्यक्त भी किया है उन्होंने। फ़ाइव प्वाइण्ट समवन में आईआईटी का जीवन, नाइट एट कॉल सेन्टर में आधुनिक युवा का जीवन, थ्री मिस्टेक ऑफ़ माई लाइफ़ में तैयारी कर रहे विद्यार्थी का जीवन, टू स्टेट में आईआईएम का जीवन और इस पुस्तक में शिक्षा व्यवस्था का जीवन। हर पुस्तक में एक विशेष पक्ष पर प्रकाश डाला गया है, या संक्षेप में कहें कि शिक्षा व्यवस्था के आसपास ही घूम रही है उनकी उपन्यास यात्रा।

जिसकी टीस सर्वाधिक होती है, वही बात रह रहकर निकलती है, संभवतः यही चेतन भगत के साथ हो रहा है। पहले आईआईटी से इन्जीनियरिंग, उसके बाद आईआईएम से मैनेजमेन्ट, उसके बाद बैंक में नौकरी, सब के सब एक दूसरे से पूर्णतया असम्बद्ध। इस पर भी जब संतुष्टि नहीं मिली और मन में कुछ सृजन करने की टीस बनी रही तो लेखन में उतरकर पुस्तकें लिखना प्रारम्भ किया, सृजन की टीस बड़ी सशक्त जो होती है। कई लोग कह सकते हैं कि जब लिखना ही था तो देश का इतना पैसा क्यों बर्बाद किया। कई कहेंगे कि यही क्या कम है उन्हें एक ऐसा कार्य मिल गया है जिसमें उनका मन रम रहा है। विवाद चलता रहेगा पर यह तथ्य को स्वीकार करना होगा कि कहीं न कहीं बहुत बड़ा अंध स्याह गलियारा है शिक्षा व्यवस्था में जहाँ किसी को यह नहीं ज्ञात है कि वह क्या चाहता है जीवन में, समाज क्या चाहता है उसकी शिक्षा से और जिन राहों को पकड़ कर युवा बढ़ा जा रहा है, वह किन निष्कर्षों पर जाकर समाप्त होने वाली हैं। इस व्यवस्था की टीस उसके भुक्तभोगी से अधिक कौन समझेगा, वही टीस रह रहकर प्रस्फुटित हो रही है, उनके लेखन में।

कहानी में तीन प्रमुख पात्र हैं, गोपाल, राघव और आरती। गोपाल गरीब है, बिना पढ़े और अच्छी नौकरी पाये अपनी गरीबी से उबरने का कोई मार्ग नहीं दिखता है उसे। अभावों से भरे बचपन में बिताया समय धन के प्रति कितना आकर्षण उत्पन्न कर देता है, उसके चरित्र से समझा जा सकता है। शिक्षा उस पर थोप दी जाती है, बलात। राघव मध्यम परिवार से है, पढ़ने में अच्छा है पर उसे जीवन में कुछ सार्थक कर गुजरने की चाह है। आईआईटी से उत्तीर्ण होने के बाद भी उसे पत्रकार का कार्य अच्छा लगता है, समाज के भ्रष्टाचार से लड़ने का कार्य। आरती धनाड्य परिवार से है, शिक्षा उसके लिये अपने बन्धनों से मुक्त होने का माध्यम भर है।

वाराणसी की पृष्ठभूमि है, तीनों की कहानी में प्रेमत्रिकोण, आरती कभी बौद्धिकता के प्रति तो कभी स्थायी जीवन के प्रति आकर्षित होती है। तीनों के जीवन में उतार चढ़ाव के बीच कहानी की रोचकता बनी रहती है। कहानी का अन्त बताकर आपकी उत्सुकता का अन्त कर देना मेरा उद्देश्य नहीं है पर चेतन भगत ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि इस पुस्तक पर भी एक बहुत अच्छी फिल्म बनायी जा सकती है।

कहानी की गुदगुदी शान्त होने के बाद जो प्रश्न आपके सामने आकर खड़े हो जाते हैं, वे चेतन भगत के अपने प्रश्न हैं, वे हमारे और हमारे बच्चों के प्रश्न हैं, वे हमारी शिक्षा व्यवस्थता के अधूरे अस्तित्व के प्रश्न हैं।

प्रश्न सीधे और सरल से हैं, क्या शिक्षा हम सबके लिये एक सुरक्षित भविष्य की आधारशिला है या शिक्षा हम सबके लिये वह पाने का माध्यम है जो हमें सच में पाना चाहिये।

मैं आपको यह नहीं बताऊँगा कि मैं क्या चाहता था शिक्षा से और क्या हो गया? पर एक प्रश्न आप स्वयं से अवश्य पूछें कि आज आप अधिक विवश हैं या आपके द्वारा प्राप्त शिक्षा। चेतन भगत तो आज अपने मन के कार्य में आनन्दित हैं, सारी शिक्षा व्यवस्था को धता बताने के बाद।

8.6.11

पाँच किलो का बालक, दस किलो का बस्ता

भाग्य अच्छा रहा जीवन भर कि कभी भारी बस्ता नहीं उठाना पड़ा। इसी देश में ही पढ़े हैं और पूरे 18 वर्ष पढ़े हैं। कक्षा 5 तक स्थानीय विद्यालय में पढ़े, जहाँ उत्तीर्ण होने के लिये उपस्थिति ही अपने आप में पर्याप्त थी, कुछ अधिक ज्ञान बटोर लेना शिक्षा व्यवस्था पर किये गये महत उपकार की श्रेणी में आ जाता था। न कभी भी बोझ डाला गया, न कभी भी सारी पुस्तकें बस्ते में भरकर ले जाने का उत्साह ही रहा। हर विषय की एक पुस्तक, एक कॉपी, उसी में कक्षाकार्य, उसी में गृहकार्य। कक्षा 6 से 12 तक छात्रावास में रहकर पढ़े, ऊपर छात्रावास और नीचे विद्यालय। मध्यान्तर तक की चार पुस्तकें हाथ में ही पकड़कर पहुँच जाते थे, यदि किसी पुस्तक की आवश्यकता पड़ती भी थी तो एक मिनट के अन्दर ही दौड़कर ले आते थे। छात्रावासियों के इस भाग्य पर अन्य ईर्ष्या करते थे। आईआईटी में भी जेब में एक ही कागज रहता था, नोट्स उतारने के लिये जो वापस आकर नत्थी कर दिया जाता था सम्बद्ध विषय की फाइल में। भला हो आई टी का, नौकरी में भी कभी कोई फाइल इत्यादि को लाद कर नहीं चलना पड़ा है, अधिकतम 10-12 पन्नों का ही बोझ उठाया है, निर्देश व निरीक्षण बिन्दु मोबाइल पर ही लिख लेने का अभ्यास हो गया है।

अब कभी कभी अभिभावक के रूप में कक्षाध्यापकों से भेंट करने जाता हूँ तो लौटते समय प्रेमवश पुत्र महोदय का बस्ता उठा लेता हूँ। जब जीवन में कभी भी बस्ता उठाने का अभ्यास न किया हो तो बस्ते को उठाकर बाहर तक आने में ही माँसपेशियाँ ढीली पड़ने लगती हैं। हमसे आधे वज़न के पुत्र महोदय जब बोलते हैं कि आप इतनी जल्दी थक गये और आज तो इस बैठक के कारण दो पुस्तकें कम लाये हैं, तब अपने ऊपर क्षोभ होने लगता है कि क्यों हमने जीवन भर अभ्यास नहीं किया, दस किलो का बस्ता उठाते रहने का।

देश के भावी कर्णधारों को कल देश का भी बोझ उठाना है, जिस स्वरूप में देश निखर रहा है बोझ गुरुतम ही होता जायेगा। यदि अभी से अभ्यास नहीं करेंगे तो कैसे सम्हालेंगे? जब तक हर विषय में चार कॉपी और चार पुस्तकें न हो, कैसे लगेगा कि बालक पढ़ाई में जुटा हुआ है, सकल विश्व का ज्ञान अपनी साँसों में भर लेने को आतुर है। जब हम सब अपने मानसिक और भौतिक परिवेश को इतना दूषित और अवशोषित करके जा रहे हैं तो निश्चय ही आने वाली पीढ़ियों को बैल बनकर कार्य करना पड़ेगा, शारीरिक व मानसिक रूप से सुदृढ़ होना पड़ेगा। देश की शिक्षा व्यवस्था प्रारम्भ से ही नौनिहालों को सुदृढ़ बनाने के कार्य में लगी हुयी है। भारी बस्ते निसन्देह आधुनिक विश्व के निर्माण की नींव हैं।

आगे झुका हुआ मानव आदिम युग की याद दिलाता है, सीधे खड़ा मानव विकास का प्रतीक है। आज भी व्यक्ति रह रहकर पुरानी संस्कृतियों में झुकने का प्रयास कर रहा है। पीठ पर धरे भारी बस्ते बच्चों को विकास की राह पर ही सीधा खड़ा रखेंगे, आदिम मानव की तरह झुकने तो कदापि नहीं देंगे। रीढ़ की हड़्डी के प्राकृतिक झुकाव को हर संभव रोकने का प्रयास करेगा भारी बस्ता।

कहते हैं कि बड़े बड़े एथलीट जब किसी दौड़ की तैयारी करते हैं तो अभ्यास के समय अपने शरीर और पैरों पर भार बाँध लेते हैं। कारण यह कि जब सचमुच की प्रतियोगिता हो तो उन्हें शरीर हल्का प्रतीत हो। इसी प्रकार 17-18 वर्षों के भार-अभ्यास के बाद जब विद्यार्थी समाज में आयेंगे तो उन्हें भी उड़ने जैसा अनुभव होगा। इस प्रतियोगी और गलाकाट सामाजिक परिवेश में इससे सुदृढ़ तैयारी और क्या होगी भला?

हम सब रेलवे स्टेशन जाते हैं, कुली न मिलने पर हमारी साँस फूलने लगती है, कुली मिलने पर जेब की धौंकनी चलने लगती है। यदि अभी से बच्चों का दस किलो का भार उठाने का अभ्यास रहेगा तो भविष्य में बीस किलो के सूटकेस उठाने में कोई कठिनाई नहीं आयेगी। गाँधी और विनोबा के देश में स्वाबलम्बन का पाठ पढ़ाता है दस किलो का बस्ता। मेरा सुझाव है कि कुछ विषय और पुस्तकें और बढ़ा देना चाहिये। पढ़ाई हो न हो, अधिक याद रहे न रहे पर किसी न किसी दिन माँ सरस्वती को छात्रों पर दया आयेगी, इतना विद्या ढोना व्यर्थ न जायेगा तब।

आज बचपन की एक कविता याद आ गयी, कवि का नाम याद नहीं रहा। कुछ इस तरह से थी।

आज देखो हो गया बालक कितना सस्ता,
पाँच किलो का खुद है, दस किलो का बस्ता।

17.11.10

मा पलायनम्

दोपहर के बाद कार्यालय में अधिक कार्य नहीं था अतः निरीक्षण करने निकल गया, टिकट चेकिंग पर। बाहर निकलते रहने से सम्पूर्ण कार्यपरिवेश का व्यवहारिक ज्ञान बना रहता है। सयत्न आप भले ही कुछ न करें पर स्वयं ही कमियाँ दिख जाती हैं और देर सबेर व्यवस्थित भी हो जाती हैं। पैसेंजर ट्रेन में दल बल के साथ चढ़ने से कोई भगदड़ जैसी नहीं मचती है यहाँ, सब यथासम्भव टिकट लेकर चढ़ते हैं। उत्तर भारत में अंग्रेजों से लड़ने का नशा अभी उतरा नहीं है। अब उनके प्रतीकों से लड़ने के क्रम में बहुत से साहसी युवा व स्वयंसिद्ध क्रान्तिकारी ट्रेन का टिकट नहीं लेते हैं। दक्षिण भारत में यह संख्या बहुत कम है अतः टिकट चेकिंग अभियान बड़े शान्तिपूर्वक निपट जाते हैं।

बिना टिकट यात्री पूरा प्रयास अवश्य करते हैं कि वे आपकी बात किसी ऊँचे पहुँच वाले अपने परिचित से करा दें अतः पकड़े जाने के तुरन्त बाद  ही मोबाइल पर व्यग्रता से ऊँगलियाँ चलाने लगते हैं, यद्यपि लगभग हर समय वे प्रयास निष्प्रभावी ही रहते हैं। दूर से 13-14 साल के दो बच्चों को देखता हूँ, अपने विद्यालय की ड्रेस मे, पकड़े जाने के बाद भी चुपचाप से खड़े हुये। कुछ खटकता है, अगले स्टेशन पर अपने साथ उन्हें भी उतार लेने को कह देता हूँ। हमारे मुख्य टिकट निरीक्षक श्री अकबर, अनुभव के आधार पर बच्चों से दो तीन प्रश्न पूछने के बाद, उनसे उनके अभिभावकों का फोन नम्बर माँगते हैं। फोन नम्बर देने में थोड़ी ना नुकुर के बाद जब अभिभावकों से बात होती है तो अभिभावक दौड़े आते हैं और जो बताते हैं वह हम सबके लिये एक कड़वा सत्य है।

दोनों बच्चों के पिछली परीक्षा में कम अंक आने से घर में डाँट पड़ती है। घर की डाँट और विद्यालय के प्रतियोगी वातावरण से क्षुब्ध बच्चे इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि उन्हें न विद्यालय समझ पा रहा है और न ही घर वाले। दोनों बच्चे आपस में बात करते हैं जिससे उनकी क्षुब्ध मनःस्थिति गहराने लगती है। परिस्थितियों का कोई निष्कर्ष न आते देख दोनों भाग जाने का निश्चय करते हैं। शिमोगा भागने की योजना थी, वहाँ जाकर क्या करना था उसका निश्चय नहीं किया था। अन्ततः उनके अभिवावकों को समझा दिया जाता है, उन्हे भी अपनी भूल का भान होता है।

मैं घर आ जाता हूँ और धन्यवाद देता हूँ ईश्वर को कि मेरे हाथों एक पुण्य करा दिया।

पर क्यों कोई बच्चा अपने परिवेश से क्षुब्ध हो? जो पढ़ाई का बोझ सह नहीं पाते हैं, क्यों सब कुछ छोड़ भागने को विवश हों? क्या इतना पढ़ाना ठीक है जिसका जीवन में कोई उपयोग ही न हो? शिक्षा पद्धति घुड़दौड़ बना कर रख दी गयी है, जो दौड़ नहीं सकते हैं उसमें जीवन से भाग जाने का सोचने लगते हैं। ग्रन्थीय पाठ्यक्रम पढ़कर जीवन में उसका कुछ उपयोग न होते देख, सारा का सारा शिक्षातन्त्र व्यर्थ का धुआँ छोड़ता इंजिन जैसा लगने लगता है, कोई गति नहीं।

रटने के बाद उसे परीक्षाओं में उगल देना श्रेष्ठता के पारम्परिक मानक हो सकते हैं पर इतिहास में विचारकों ने इस तथ्य को घातक बताया है। उद्देश्य ज्ञानार्जन हो, अंकार्जन न हो। रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वभारती इसका एक प्रयास मात्र था। चेन्नई में किड्स सेन्ट्रल और उसके जैसे अन्य कई विद्यालय हैं, जो बच्चों के लिये तनावरहित और समग्र शिक्षा के पक्षधर हैं और वह भी व्यवहारिक ज्ञान और प्रफुल्लित वातावरण के माध्यम से। बच्चों के लिये विशेषकर पर सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति  के यही गुण हों, समग्रता, व्यवहारिकता, ऊर्जा और मौलिकता।

अभिभावक यह तथ्य समझें और विद्यालय इसको कार्यान्वित करें। बच्चों का बचपन व भविष्य हम सबकी धरोहर है। जीवन जीने के लिये है, पलायन के लिये नहीं।

मा पलायनम्।