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21.8.13

मन - स्वरूप, कार्य, अवस्थायें

इस बात में तो कोई संशय रहा नहीं कि मानव की भाषा मन की भाषा नहीं है। वाह्य ज्ञान के संकेतों को हम जिस रूप में ग्रहण करते हैं, उन्हें हम कहीं भिन्न रूप में संग्रहित करते हैं। संग्रहण की गुणवत्ता इस बात पर भी निर्भर करती है कि ज्ञान की विचार श्रंखला का पुनरुत्पादन मौलिक का कितना प्रतिशत है। बहुधा ऐसा होता है कि स्मृतियाँ अपने मूल स्वरूप में नहीं रह पाती है, अन्य स्मृतियों के रंग में रंग जाती हैं, अपनी तीव्रता अक्षुण्ण नहीं रख पाती हैं, क्षीण हो जाती हैं।

सारा पढ़ा हुआ याद नहीं रहता, सारा सुना हुआ याद नहीं रहता है। मानव की भाषा एक व्यवस्थित आधार बनाती है जिससे ज्ञान की अस्पष्टता न्यूनतम रहे। इसके अतिरिक्त संवादों में उपस्थित कोलाहल भी मन स्वीकार नहीं करता, केवल सूत्र ही स्मृति में रह जाते हैं, पुनरुत्पादन की प्रक्रिया उन्हीं संचित सूत्रों से प्रारम्भ होती है। इसके अतिरिक्त रूप, रंग, स्पर्श, गंध आदि ज्ञान के अभाषायी अंग ९० प्रतिशत से अधिक है, उनका संग्रहण मन किन आकारों के रूप में करता है, यह भाषा विज्ञान की परिधि से बहुत दूर है।

कौन सी मानवीय भाषा मन के सर्वाधिक निकट है, यह तभी स्थापित हो पायेगा जब मन की कार्यप्रणाली समझ में आ सकेगी, पर कोलाहल का न्यूनतम होना, शब्दों के पदार्थ व भाव से सम्यक व विशिष्ट संबंध, उच्चारण-वर्तनी समरूपता आदि कुछ गुण हैं, जो मन की भाषा के अधिक निकट हैं।

यदि पतंजलि योग सूत्र में वर्णित मन के स्वरूप व कार्यशैली को देखा जाये और उसके आन्तरिक भागों के परस्पर संबंधों पर विचार किया जाये तो विचारों की अनियन्त्रित और अव्यवस्थित सी प्रतीत होने वाली कार्यप्रणाली में एक लय दिखने लगेगी।

अन्तःकरण के चार भाग हैं। मनस, चित्त, बुद्धि और अहं। मनस ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से संकेत एकत्र कर चित्त तक पहुँचाता है और अहं द्वारा कोई निर्णय लिये जाने पर कर्मेन्द्रियों को उसका आदेश देता है। संकेतो और आदेशों का संचरण तन्त्रिकातन्त्र का प्रमुखतम कार्य है। चित्त स्मृतियों का संग्रहण करता है और कोई नया संकेत आने पर उससे संबद्ध तथ्य विचार के रूप में प्रस्तुत करता है। विचारों का अनवरत प्रवाह चित्त का ही कार्य है, सामान्यतः अनियन्त्रित। विचारों को अहं हाँ या ना में स्वीकार व अस्वीकार करता है। तब स्वीकार विचारों से संबद्ध कई और विचार चित्त प्रस्तुत कर देता है। यह अनवरत प्रक्रिया है और नींद में भी स्वप्न के रूप में चलती रहती है।

अहं बस हाँ या ना करता है और शेष कार्य होता रहता है। चित्त अहं की सहायता करता रहता है, अपने संचित स्मृति तरंगों के माध्यम से। जब विचार भँवर की तरह उठते हैं तो उसे चित्त की वृत्ति कहा जाता है। यदि जीवन चित्तवृत्ति के अनुसार बीत रहा है बुद्धि बहुधा कार्यप्रवृत्त नहीं होती है। बुद्धि की आवश्यकता तभी पड़ती है जब अहं प्रश्न पूछता है, या तो कहीं विरोधाभास होता है या अन्दर से कुछ जिज्ञासा होती है। तब कहीं जाकर बुद्धि के द्वारा अपनी भिन्न भिन्न स्मृतियों का विश्लेषण कर, नये सत्य गढ़े जाते हैं और वे चित्त के आवश्यक अंग बन जाते हैं। यही प्रक्रिया चलती रहती है, नयी स्मृतियाँ आती है, पुरानी व हल्की स्मृतियाँ चित्त के सुप्त कक्षों में छिप जाती हैं। जो वस्तु या व्यक्ति हमें भाता है, उसकी स्मृतियाँ अधिक होती है और गाढ़ी भी होती हैं। जो कार्य करना हमें अच्छा लगने लगता है, चित्तवृत्ति का वह पक्ष हमारी प्रवृत्ति बन जाता है।

पतंजलि योग सूत्र के अनुसार, चित्तवृत्ति ही हमारे लिये सुख या दुख का निर्धारण करती है। यदि कोई घटनाक्रम चित्तवृत्ति के अनुकूल हुआ तो सुख और यदि प्रतिकूल हुआ तो दुख होता है। हम पूर्णतया अपनी स्मृतियों के ही उत्पाद बन जाते हैं। प्रसिद्ध पाश्चात्य वाक्य, मैं हूँ क्योंकि मैं सोचता हूँ, यह इसी मानसिक स्थिति का परिणाम है। योग इस स्थिति को चित्त की परवशता मानता है और इसके परे भी हमारा कोई अस्तित्व है, उसे बताने में आगे बढ़ जाता है। चित्तवृत्ति से बाधित हमारी वास्तविक स्थिति तभी पता चल पायेगी, जब चित्तवृत्ति का निरोध किया जायेगा और तब कहीं जाकर हमें दृष्टा का अनुभव होगा। ४ अध्यायों के १९६ सूत्रों में रत्न सा जड़ित यह ज्ञान अद्भुत है, मन को इतनी गहराई से बताने वाला, अपने आप में एकमात्र।

वहीं दूसरी ओर माण्डूक्य उपनिषद में केवल १२ श्लोक हैं और वह अपने विषय में पूर्ण है। यह हमारे अस्तित्व की उन अवस्थाओं को बताता है जो सृजन की अवस्थाओं की प्रतिलिपि हैं, दिन-रात, जीवन-मरण आदि चक्रों में भी व्याप्त हैं। हमारी उन अवस्थाओं को ऊँ की चार ध्वनियों में कौन सी ध्वनि प्रभावित करती है, इस बारे में बताता है।

माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार हमारे अस्तित्व की चार अवस्थायें होती हैं। जागृत, स्वप्न, सुसुप्त व तुरीय। जागृत अवस्था में हम वाह्य विश्व से क्रियाशील रहते हैं। स्वप्न अवस्था में हम अपने अन्तःकरण के चार भागों तक ही सीमित रहते हैं, इस अवस्था में हमारे मस्तिष्क में क्रियाशीलता पायी जाती है और वही स्वप्नरूप में दिखती है। उस स्थिति के कुछ स्वप्न हमें याद रहते हैं, शेष को याद करने के लिये अतियथार्थवादी अन्य विधियों का सहारा लेते हैं। प्रयोगों के आधार पर कुछ आधुनिक विचारकों का मत है कि स्वप्न की इस स्थिति में समय अपना स्वरूप खो देता है, संभव है कि २ घंटे की घटना का स्वप्न हम २ सेकण्ड में ही देख लें।

तीसरी अवस्था होती है, सुसुप्त। इस अवस्था में हमारे साथ क्या होता है, हमें कुछ भी पता नहीं रहता। प्रयोगों में इस अवस्था को गाढ़ी निद्रा कहा गया है। माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार इस स्थिति में अन्तःकरण के चारों भाग एक हो जाते हैं, उस रूप में, जो हम हैं, विशुद्ध चेतना स्वरूप। इस अवस्था का क्या स्वरूप है, क्या कार्य है, कुछ भी नहीं ज्ञात। संभव है, यह वह स्थिति होती होगी जहाँ पर हम ऐसे दैवीय संकेत पा जाते हों जो चित्तवृत्ति और गहन चिन्तन के माध्यम से आना असंभव हों।

चौथी अवस्था है, तुरीय। निद्रा पर किये गये प्रयोग इस स्थिति से भी अनभिज्ञ हैं, क्योंकि मन वाह्य जगत में क्रियाशील ही नहीं रहता है और अन्तःकरण के संकेत मशीनें ग्रहण नहीं कर पाती हैं। इसे समाधि की स्थिति कहते हैं। माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार इस स्थिति में हमारी चेतना एक समग्र चेतना में पहुँच जाती है और सकल सृष्टि से अपने संबंधों को अनुभव कर पाती है, वह स्थिति जहाँ आप एकाकार हो जाते हैं, उस स्थान पर, जहाँ से हम सब व्यक्त हैं, समय से शून्य, न भूत में, न भविष्य में।

कहते हैं कि तुरीय अवस्था सर्वव्याप्त है, क्योंकि वही एकल सत्य है। हमारे लिये शेष तीन अवस्थाओं के बीच की संधि अवस्था तुरीय के माध्यम से ही होती है। यह कैसे होता है, उसके लिये अध्ययन और अनुभव आवश्यक है। साथ ही साथ आश्चर्य सा प्रतीत होने वाला ज्ञान, जो प्रत्यक्ष या अनुमान से होना असंभव था, किस अवस्था में और किस रूप में हमारे चित्त में प्रकट हो जाता है, इसे भी समझना रोचक है। ज्ञान के अनसुलझे स्रोत की गुत्थी सुलझाना वैज्ञानिकता के लिये बड़ी चुनौती है। यह ज्ञान या ब्रह्मा का ज्ञान कैसे, किस रूप में और किस भाषा में प्रकट हुआ होगा, बड़ा रहस्य है। पर इन दो ग्रन्थों द्वारा प्रदत्त ज्ञान अनुभव किया जा सकता है, यह हमारे मनीषियों का मानवता के लिये आश्वासन है।

हम एक स्थूल भाषा रच कर उसमें अपने अस्तित्व की सूक्ष्मता ठूँसने के प्रयास को बौद्धिक उपलब्धि का उन्नतशिखर माने बैठे हैं और हमारे पूर्वज न केवल तुरीय आदि अवस्थाओं को अनुभव कर सके, वरन उसे सूत्रों के रूप में हमे व्यवस्थित रूप से समझा भी गये। मानवता के लिये इससे अमूल्य उपहार और क्या हो सकता है भला?

17.11.12

शिक्षा - क्या और क्यों ?

शिक्षा का नाम सुनते ही उससे संबद्ध न जाने कितने आकार आँखों के सामने घुमड़ने लगते हैं। कुछ को तो लगता होगा कि बिना शिक्षा सब निरर्थक है, कुछ को लगता होगा कि बिना लिखे पढ़े भी जीवन जिया जा सकता है। एक व्यक्ति बिना शिक्षा के भी समाज में बहुत सहज और उपयोगी बनकर रह लेता है, वहीं दूसरी ओर एक शिक्षित व्यक्ति भी अपने कृत्यों से सामाजिक चरित्र को नकारता सा लगता है। एक अजब सा द्वन्द्व है, प्रकृति का मौलिक गुण है यह द्वन्द्व, शिक्षा में भी दिखायी पड़ेगा। जब भी द्वन्द्व गहराता है, उत्तर या तो मूल में मिलता है या निष्कर्षों में। निष्कर्ष भविष्य की विषयवस्तु है और बहुधा ज्ञात नहीं होती है, पर मूल खोजा जा सकता है, मूल से विश्लेषण किया जा सकता है।

हमें प्राप्त ज्ञान के दो स्रोत हैं, पहला अनौपचारिक शिक्षा, दूसरा औपचारिक शिक्षा। अनौपचारिक शिक्षा हमें घर, समाज, मित्रों आदि से मिलती है और इसके लिये विद्यालय जाने की आवश्यकता नहीं है। दादी, नानी की कहानियों में, बड़ों के संवाद में, संस्कृति के अनुकरण में, त्योहारों में, संस्कारों में, मित्रों के साथ, भ्रमण के समय, यात्राओं में, न जाने कितना कुछ सीखते हैं हम सब। हिसाब लगाने बैठे तो लगेगा कि जितना भी ज्ञान हमारे पास है, वह अनौपचारिक शिक्षा की ही देन है। जहाँ के सामाजिक ढाँचे में प्रश्न पूछने को मर्यादा का उल्लंघन नहीं माना जाता है, जहाँ ज्ञान के लिये उन्मुक्त परिवेश है, वहाँ पर सामान्य व्यक्ति के लिये अनौपचारिक ज्ञान का प्रतिशत ९० से भी अधिक होता है। कपड़े पहनना, बाल काढ़ना, फीते बाँधना, चाय बना लेना आदि न जाने कितने ऐसे कार्य हैं जो हम विद्यालय जाकर नहीं सीखते हैं, देखते हैं और सीखते हैं। भाषा का प्राथमिक ज्ञान अनौपचारिक ही होता है, बच्चा देखता रहता है, सीखता रहता है।

जनसंख्या का बड़ा वर्ग ऐसा है जो कि कभी विद्यालय गया ही नहीं। यही अनौपचारिक शिक्षा है जिसके बल पर वह अपना जीवन ससम्मान व्यतीत कर रहा है। हम उन्हें अशिक्षित मानते हैं, पर वे अपना भला बुरा हमसे बेहतर समझते हैं, कहीं बेहतर, निश्चय ही इसी अनौपचारिक शिक्षा का प्रताप है। आज भी गाँव जाना होता है तो वहाँ के बुजुर्ग जिन्होने अपने पूर्वजों से रामचरितमानस सुनी थी, इतना सटीक दोहा उद्धृत कर बैठते हैं जो परिस्थितियों पर शत प्रतिशत सही बैठता है। एक परम्परा है गीता और रामचरितमानस के पाठ की, अनौपचारिक शिक्षा के वाहक हैं ये ग्रन्थ, सदियों से ज्ञान का प्रकाशपुंज वहाँ भी फैलाये हुये हैं, जहाँ पर शिक्षातन्त्र पूर्णतया ध्वस्त है।

औपचारिक शिक्षा फिर भी आवश्यक है। आज जो संस्कृति में सहज प्राप्त है, वह कभी न कभी तो औपचारिक शिक्षा का एक भाग रहा होगा। अनौपचारिक शिक्षा श्रुति के आधार पर चलती है, उसे यदि औपचारिक शिक्षा का सहयोग नहीं मिलेगा तो कालान्तर में वह विकृत होने लगेगी। न जाने कितने ऐसे चिकित्सीय उपाय हैं जो कार्य तो करते हैं पर उनका कारण लुप्त सा हो गया है, औपचारिक शिक्षा के अभाव में।

यदि सुचारु रूप से किसी भी विषय का अध्ययन नहीं किया जायेगा तो उसमें सन्निहित रहस्य खोजे जाने से रहे। विकास का प्रथम चरण है, रहस्यों को समझना। तत्पश्चात उसे ज्ञान के रूप में सहेज कर रखना औपचारिक शिक्षा का कार्य है। क्रमिक विकास के लिये अवलोकनों और निष्कर्षों को लिपिबद्ध करना आवश्यक है, इससे पढने में भी सरलता होती है और उस पर और कार्य करने में भी। किसी भी विषय का विधिवत ज्ञान देने के लिये विद्यालय आवश्यक हैं। कहने को तो मात्र १० प्रतिशत ही ज्ञान शेष रहता है पर इसमें विकास और भविष्य के वो तार जुड़े होते हैं जिन्हें नकारना भविष्य को नकारने जैसा है। औपचारिक शिक्षा भले ही मात्रा में अधिक न हो पर जीवन की गुणवत्ता साधने के लिये अनमोल है। सिद्धान्त समझ में आते ही घटनाओं का समझना और समझाना सरल हो जाता है, कारण और प्रभाव स्पष्ट से दिखने लगते हैं तब।

किसी भी समाज में औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा अलग राह नहीं चलती हैं। औपचारिक शिक्षा में शिक्षित परिवार के बच्चे कितनी ही चीजें अनौपचारिक रूप से सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता है, हर पीढ़ी ज्ञान का सामान्य स्तर बढ़ता रहता है। जिन परिवारों में कोई एक व्यवसाय कई पीढ़ियों से किया जा रहा है, उससे संबद्ध ज्ञान परिवार में इतनी प्रचुर मात्रा में आ जाता है कि उनके सामने औपचारिक शिक्षा में शिक्षित संस्थान भी कान्तिहीन रहते हैं। व्यापारी का पुत्र व्यापारी, राजनेता का पुत्र राजनेता, किसान का पुत्र किसान, यदि कोई अपना पैतृक व्यवसाय अपनाना चाहे तो उसे न जाने कितना ज्ञान अनौपचारिक रूप से मिल जाता है। पढ़ा लिखा समाज बनाने के लिये सदियों का सतत श्रम लगता है।

इस परिप्रेक्ष्य में शिक्षा के उद्देश्यों को शिक्षा के स्वरूप से जोड़कर सही तालमेल बिठा लेना ही अच्छे शिक्षातन्त्र का कार्य है। पद्धतियाँ भिन्न दिशाओं में न भागें, कुछ वर्षों में व्यर्थ न हो जायें, कुछ ऐसा न करें जिसकी आवश्यकता ही न हो और कुछ महत्वपूर्ण छूट भी न जाये। तो एक अच्छे शिक्षातन्त्र का सही आकलन करने के लिये, उन उद्देश्यों को भी समझना होगा, जिनके लिये शिक्षा आवश्यक है।

मुझे तो शिक्षा के बस तीन प्रमुख उद्देश्य समझ आते हैं। पहला तो प्रकृति के रहस्यों को समझना, उसके सिद्धान्तों का विश्लेषण करना और उस पर आधारित विज्ञान के माध्यम से जीवन को और अधिक सुख-सुविधायें प्रदान करना। इस वर्ग में शोध आदि प्रमुख हैं और सदा से होते भी आये हैं। विज्ञान के अविष्कार बहुधा चमत्कृत करने वाले होते हैं, हमारी कल्पनाशक्ति इस उद्देश्य के लिये राह निर्माण करती है, ऐसी राह जिसमें विश्व के प्रखरतम मस्तिष्क चलते हैं, ऐसी राह जो मानवता के लिये बहुत अधिक उपयोगी रही है, ऐसी राह जिससे लगभग सभी लोग लाभान्वित और प्रभावित होते हैं। पर इस राह में अग्रणी चलने वालों की संख्या बहुत कम होती है, लाखों में एक, ये लोग नये तन्त्र रचते हैं।

दूसरा उद्देश्य है विश्व के तन्त्र को साधे रहना। मानव को सहजीवन में बड़ा रस आया है, समाज का स्वरूप भिन्न भिन्न हो सकता है पर हर समाज में सहजीवन ही प्रधान है। प्रकृति ने भी यथासंभव सहयोग किया है, इस मानवीय प्रयास में। जीवन के लिये अन्न, जल आदि, उनका उत्पादन, रखरखाव व वितरण। वस्तुओं का व्यापार, नगरों का निर्माण, संचार के साधन, और जो कुछ भी आवश्यक है साथ रहने के लिये, सुख के साथ। तन्त्र को साधना सरल कार्य नहीं हैं, तकनीक और विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है इसमें, उसके लिये समुचित शिक्षा की। कालान्तर में नयी तकनीक और नये प्रयोगों से तन्त्र परिवर्धित और परिमार्जित होता है, जीवन चलता रहता है। इस वर्ग में कर्मठ व्यक्तित्वों की आवश्यकता होती है। इसमें ही सर्वाधिक लोग लगते हैं। संसाधनों और आय का वितरण किस प्रकार हो, किस व्यवसाय को कितनी प्राथमिकता मिले, यह बहस का विषय हो सकता है। इसमें शिक्षा का स्तर विशेष होता है और ये लोग तन्त्र साधते हैं।

तीसरा उद्देश्य है स्वयं को समझना। स्वयं को समझना सहजीवन के उन पहलुओं को समझने की प्रक्रिया है जो समाज के रूप में सबको जानना आवश्यक है। क्या हमें सुख देता है, क्या हमें दुख, कौन सा सुख शाश्वत है, कौन सा क्षणिक, ऐसे बहुत से प्रश्न हैं, जिसके लिये हमें स्वयं को जानना आवश्यक हो जाता है। आत्म का आकार समझने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि यदि स्वयं को जान लिया तो कुछ जानना शेष नहीं रहता है। साहित्य, संगीत, कला आदि ऐसे क्षेत्र हैं जो मानव को सुख देते हैं, इनका सृजन सुख देता है। इस वर्ग में सब लोग ही आते हैं, बिना इस शिक्षा के शान्ति और समृद्धि संभव नहीं है।

क्या अपेक्षित था, क्या हो रहा है? शिक्षा का स्वरूप और उद्देश्य क्या एक दूसरे को समझ पा रहे हैं? अर्थतन्त्र और शिक्षातन्त्र किस दिशा भाग रहे हैं, एक दूसरे साथ दे पा रहे हैं या नहीं, बहुत समझना शेष है, अगली पोस्ट में।