इस बात में तो कोई संशय रहा नहीं कि मानव की भाषा मन की भाषा नहीं है। वाह्य ज्ञान के संकेतों को हम जिस रूप में ग्रहण करते हैं, उन्हें हम कहीं भिन्न रूप में संग्रहित करते हैं। संग्रहण की गुणवत्ता इस बात पर भी निर्भर करती है कि ज्ञान की विचार श्रंखला का पुनरुत्पादन मौलिक का कितना प्रतिशत है। बहुधा ऐसा होता है कि स्मृतियाँ अपने मूल स्वरूप में नहीं रह पाती है, अन्य स्मृतियों के रंग में रंग जाती हैं, अपनी तीव्रता अक्षुण्ण नहीं रख पाती हैं, क्षीण हो जाती हैं।
सारा पढ़ा हुआ याद नहीं रहता, सारा सुना हुआ याद नहीं रहता है। मानव की भाषा एक व्यवस्थित आधार बनाती है जिससे ज्ञान की अस्पष्टता न्यूनतम रहे। इसके अतिरिक्त संवादों में उपस्थित कोलाहल भी मन स्वीकार नहीं करता, केवल सूत्र ही स्मृति में रह जाते हैं, पुनरुत्पादन की प्रक्रिया उन्हीं संचित सूत्रों से प्रारम्भ होती है। इसके अतिरिक्त रूप, रंग, स्पर्श, गंध आदि ज्ञान के अभाषायी अंग ९० प्रतिशत से अधिक है, उनका संग्रहण मन किन आकारों के रूप में करता है, यह भाषा विज्ञान की परिधि से बहुत दूर है।
कौन सी मानवीय भाषा मन के सर्वाधिक निकट है, यह तभी स्थापित हो पायेगा जब मन की कार्यप्रणाली समझ में आ सकेगी, पर कोलाहल का न्यूनतम होना, शब्दों के पदार्थ व भाव से सम्यक व विशिष्ट संबंध, उच्चारण-वर्तनी समरूपता आदि कुछ गुण हैं, जो मन की भाषा के अधिक निकट हैं।
यदि पतंजलि योग सूत्र में वर्णित मन के स्वरूप व कार्यशैली को देखा जाये और उसके आन्तरिक भागों के परस्पर संबंधों पर विचार किया जाये तो विचारों की अनियन्त्रित और अव्यवस्थित सी प्रतीत होने वाली कार्यप्रणाली में एक लय दिखने लगेगी।
अन्तःकरण के चार भाग हैं। मनस, चित्त, बुद्धि और अहं। मनस ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से संकेत एकत्र कर चित्त तक पहुँचाता है और अहं द्वारा कोई निर्णय लिये जाने पर कर्मेन्द्रियों को उसका आदेश देता है। संकेतो और आदेशों का संचरण तन्त्रिकातन्त्र का प्रमुखतम कार्य है। चित्त स्मृतियों का संग्रहण करता है और कोई नया संकेत आने पर उससे संबद्ध तथ्य विचार के रूप में प्रस्तुत करता है। विचारों का अनवरत प्रवाह चित्त का ही कार्य है, सामान्यतः अनियन्त्रित। विचारों को अहं हाँ या ना में स्वीकार व अस्वीकार करता है। तब स्वीकार विचारों से संबद्ध कई और विचार चित्त प्रस्तुत कर देता है। यह अनवरत प्रक्रिया है और नींद में भी स्वप्न के रूप में चलती रहती है।
अहं बस हाँ या ना करता है और शेष कार्य होता रहता है। चित्त अहं की सहायता करता रहता है, अपने संचित स्मृति तरंगों के माध्यम से। जब विचार भँवर की तरह उठते हैं तो उसे चित्त की वृत्ति कहा जाता है। यदि जीवन चित्तवृत्ति के अनुसार बीत रहा है बुद्धि बहुधा कार्यप्रवृत्त नहीं होती है। बुद्धि की आवश्यकता तभी पड़ती है जब अहं प्रश्न पूछता है, या तो कहीं विरोधाभास होता है या अन्दर से कुछ जिज्ञासा होती है। तब कहीं जाकर बुद्धि के द्वारा अपनी भिन्न भिन्न स्मृतियों का विश्लेषण कर, नये सत्य गढ़े जाते हैं और वे चित्त के आवश्यक अंग बन जाते हैं। यही प्रक्रिया चलती रहती है, नयी स्मृतियाँ आती है, पुरानी व हल्की स्मृतियाँ चित्त के सुप्त कक्षों में छिप जाती हैं। जो वस्तु या व्यक्ति हमें भाता है, उसकी स्मृतियाँ अधिक होती है और गाढ़ी भी होती हैं। जो कार्य करना हमें अच्छा लगने लगता है, चित्तवृत्ति का वह पक्ष हमारी प्रवृत्ति बन जाता है।
पतंजलि योग सूत्र के अनुसार, चित्तवृत्ति ही हमारे लिये सुख या दुख का निर्धारण करती है। यदि कोई घटनाक्रम चित्तवृत्ति के अनुकूल हुआ तो सुख और यदि प्रतिकूल हुआ तो दुख होता है। हम पूर्णतया अपनी स्मृतियों के ही उत्पाद बन जाते हैं। प्रसिद्ध पाश्चात्य वाक्य, मैं हूँ क्योंकि मैं सोचता हूँ, यह इसी मानसिक स्थिति का परिणाम है। योग इस स्थिति को चित्त की परवशता मानता है और इसके परे भी हमारा कोई अस्तित्व है, उसे बताने में आगे बढ़ जाता है। चित्तवृत्ति से बाधित हमारी वास्तविक स्थिति तभी पता चल पायेगी, जब चित्तवृत्ति का निरोध किया जायेगा और तब कहीं जाकर हमें दृष्टा का अनुभव होगा। ४ अध्यायों के १९६ सूत्रों में रत्न सा जड़ित यह ज्ञान अद्भुत है, मन को इतनी गहराई से बताने वाला, अपने आप में एकमात्र।
वहीं दूसरी ओर माण्डूक्य उपनिषद में केवल १२ श्लोक हैं और वह अपने विषय में पूर्ण है। यह हमारे अस्तित्व की उन अवस्थाओं को बताता है जो सृजन की अवस्थाओं की प्रतिलिपि हैं, दिन-रात, जीवन-मरण आदि चक्रों में भी व्याप्त हैं। हमारी उन अवस्थाओं को ऊँ की चार ध्वनियों में कौन सी ध्वनि प्रभावित करती है, इस बारे में बताता है।
माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार हमारे अस्तित्व की चार अवस्थायें होती हैं। जागृत, स्वप्न, सुसुप्त व तुरीय। जागृत अवस्था में हम वाह्य विश्व से क्रियाशील रहते हैं। स्वप्न अवस्था में हम अपने अन्तःकरण के चार भागों तक ही सीमित रहते हैं, इस अवस्था में हमारे मस्तिष्क में क्रियाशीलता पायी जाती है और वही स्वप्नरूप में दिखती है। उस स्थिति के कुछ स्वप्न हमें याद रहते हैं, शेष को याद करने के लिये अतियथार्थवादी अन्य विधियों का सहारा लेते हैं। प्रयोगों के आधार पर कुछ आधुनिक विचारकों का मत है कि स्वप्न की इस स्थिति में समय अपना स्वरूप खो देता है, संभव है कि २ घंटे की घटना का स्वप्न हम २ सेकण्ड में ही देख लें।
तीसरी अवस्था होती है, सुसुप्त। इस अवस्था में हमारे साथ क्या होता है, हमें कुछ भी पता नहीं रहता। प्रयोगों में इस अवस्था को गाढ़ी निद्रा कहा गया है। माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार इस स्थिति में अन्तःकरण के चारों भाग एक हो जाते हैं, उस रूप में, जो हम हैं, विशुद्ध चेतना स्वरूप। इस अवस्था का क्या स्वरूप है, क्या कार्य है, कुछ भी नहीं ज्ञात। संभव है, यह वह स्थिति होती होगी जहाँ पर हम ऐसे दैवीय संकेत पा जाते हों जो चित्तवृत्ति और गहन चिन्तन के माध्यम से आना असंभव हों।
चौथी अवस्था है, तुरीय। निद्रा पर किये गये प्रयोग इस स्थिति से भी अनभिज्ञ हैं, क्योंकि मन वाह्य जगत में क्रियाशील ही नहीं रहता है और अन्तःकरण के संकेत मशीनें ग्रहण नहीं कर पाती हैं। इसे समाधि की स्थिति कहते हैं। माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार इस स्थिति में हमारी चेतना एक समग्र चेतना में पहुँच जाती है और सकल सृष्टि से अपने संबंधों को अनुभव कर पाती है, वह स्थिति जहाँ आप एकाकार हो जाते हैं, उस स्थान पर, जहाँ से हम सब व्यक्त हैं, समय से शून्य, न भूत में, न भविष्य में।
कहते हैं कि तुरीय अवस्था सर्वव्याप्त है, क्योंकि वही एकल सत्य है। हमारे लिये शेष तीन अवस्थाओं के बीच की संधि अवस्था तुरीय के माध्यम से ही होती है। यह कैसे होता है, उसके लिये अध्ययन और अनुभव आवश्यक है। साथ ही साथ आश्चर्य सा प्रतीत होने वाला ज्ञान, जो प्रत्यक्ष या अनुमान से होना असंभव था, किस अवस्था में और किस रूप में हमारे चित्त में प्रकट हो जाता है, इसे भी समझना रोचक है। ज्ञान के अनसुलझे स्रोत की गुत्थी सुलझाना वैज्ञानिकता के लिये बड़ी चुनौती है। यह ज्ञान या ब्रह्मा का ज्ञान कैसे, किस रूप में और किस भाषा में प्रकट हुआ होगा, बड़ा रहस्य है। पर इन दो ग्रन्थों द्वारा प्रदत्त ज्ञान अनुभव किया जा सकता है, यह हमारे मनीषियों का मानवता के लिये आश्वासन है।
हम एक स्थूल भाषा रच कर उसमें अपने अस्तित्व की सूक्ष्मता ठूँसने के प्रयास को बौद्धिक उपलब्धि का उन्नतशिखर माने बैठे हैं और हमारे पूर्वज न केवल तुरीय आदि अवस्थाओं को अनुभव कर सके, वरन उसे सूत्रों के रूप में हमे व्यवस्थित रूप से समझा भी गये। मानवता के लिये इससे अमूल्य उपहार और क्या हो सकता है भला?
सारा पढ़ा हुआ याद नहीं रहता, सारा सुना हुआ याद नहीं रहता है। मानव की भाषा एक व्यवस्थित आधार बनाती है जिससे ज्ञान की अस्पष्टता न्यूनतम रहे। इसके अतिरिक्त संवादों में उपस्थित कोलाहल भी मन स्वीकार नहीं करता, केवल सूत्र ही स्मृति में रह जाते हैं, पुनरुत्पादन की प्रक्रिया उन्हीं संचित सूत्रों से प्रारम्भ होती है। इसके अतिरिक्त रूप, रंग, स्पर्श, गंध आदि ज्ञान के अभाषायी अंग ९० प्रतिशत से अधिक है, उनका संग्रहण मन किन आकारों के रूप में करता है, यह भाषा विज्ञान की परिधि से बहुत दूर है।
कौन सी मानवीय भाषा मन के सर्वाधिक निकट है, यह तभी स्थापित हो पायेगा जब मन की कार्यप्रणाली समझ में आ सकेगी, पर कोलाहल का न्यूनतम होना, शब्दों के पदार्थ व भाव से सम्यक व विशिष्ट संबंध, उच्चारण-वर्तनी समरूपता आदि कुछ गुण हैं, जो मन की भाषा के अधिक निकट हैं।
यदि पतंजलि योग सूत्र में वर्णित मन के स्वरूप व कार्यशैली को देखा जाये और उसके आन्तरिक भागों के परस्पर संबंधों पर विचार किया जाये तो विचारों की अनियन्त्रित और अव्यवस्थित सी प्रतीत होने वाली कार्यप्रणाली में एक लय दिखने लगेगी।
अन्तःकरण के चार भाग हैं। मनस, चित्त, बुद्धि और अहं। मनस ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से संकेत एकत्र कर चित्त तक पहुँचाता है और अहं द्वारा कोई निर्णय लिये जाने पर कर्मेन्द्रियों को उसका आदेश देता है। संकेतो और आदेशों का संचरण तन्त्रिकातन्त्र का प्रमुखतम कार्य है। चित्त स्मृतियों का संग्रहण करता है और कोई नया संकेत आने पर उससे संबद्ध तथ्य विचार के रूप में प्रस्तुत करता है। विचारों का अनवरत प्रवाह चित्त का ही कार्य है, सामान्यतः अनियन्त्रित। विचारों को अहं हाँ या ना में स्वीकार व अस्वीकार करता है। तब स्वीकार विचारों से संबद्ध कई और विचार चित्त प्रस्तुत कर देता है। यह अनवरत प्रक्रिया है और नींद में भी स्वप्न के रूप में चलती रहती है।
अहं बस हाँ या ना करता है और शेष कार्य होता रहता है। चित्त अहं की सहायता करता रहता है, अपने संचित स्मृति तरंगों के माध्यम से। जब विचार भँवर की तरह उठते हैं तो उसे चित्त की वृत्ति कहा जाता है। यदि जीवन चित्तवृत्ति के अनुसार बीत रहा है बुद्धि बहुधा कार्यप्रवृत्त नहीं होती है। बुद्धि की आवश्यकता तभी पड़ती है जब अहं प्रश्न पूछता है, या तो कहीं विरोधाभास होता है या अन्दर से कुछ जिज्ञासा होती है। तब कहीं जाकर बुद्धि के द्वारा अपनी भिन्न भिन्न स्मृतियों का विश्लेषण कर, नये सत्य गढ़े जाते हैं और वे चित्त के आवश्यक अंग बन जाते हैं। यही प्रक्रिया चलती रहती है, नयी स्मृतियाँ आती है, पुरानी व हल्की स्मृतियाँ चित्त के सुप्त कक्षों में छिप जाती हैं। जो वस्तु या व्यक्ति हमें भाता है, उसकी स्मृतियाँ अधिक होती है और गाढ़ी भी होती हैं। जो कार्य करना हमें अच्छा लगने लगता है, चित्तवृत्ति का वह पक्ष हमारी प्रवृत्ति बन जाता है।
पतंजलि योग सूत्र के अनुसार, चित्तवृत्ति ही हमारे लिये सुख या दुख का निर्धारण करती है। यदि कोई घटनाक्रम चित्तवृत्ति के अनुकूल हुआ तो सुख और यदि प्रतिकूल हुआ तो दुख होता है। हम पूर्णतया अपनी स्मृतियों के ही उत्पाद बन जाते हैं। प्रसिद्ध पाश्चात्य वाक्य, मैं हूँ क्योंकि मैं सोचता हूँ, यह इसी मानसिक स्थिति का परिणाम है। योग इस स्थिति को चित्त की परवशता मानता है और इसके परे भी हमारा कोई अस्तित्व है, उसे बताने में आगे बढ़ जाता है। चित्तवृत्ति से बाधित हमारी वास्तविक स्थिति तभी पता चल पायेगी, जब चित्तवृत्ति का निरोध किया जायेगा और तब कहीं जाकर हमें दृष्टा का अनुभव होगा। ४ अध्यायों के १९६ सूत्रों में रत्न सा जड़ित यह ज्ञान अद्भुत है, मन को इतनी गहराई से बताने वाला, अपने आप में एकमात्र।
वहीं दूसरी ओर माण्डूक्य उपनिषद में केवल १२ श्लोक हैं और वह अपने विषय में पूर्ण है। यह हमारे अस्तित्व की उन अवस्थाओं को बताता है जो सृजन की अवस्थाओं की प्रतिलिपि हैं, दिन-रात, जीवन-मरण आदि चक्रों में भी व्याप्त हैं। हमारी उन अवस्थाओं को ऊँ की चार ध्वनियों में कौन सी ध्वनि प्रभावित करती है, इस बारे में बताता है।
माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार हमारे अस्तित्व की चार अवस्थायें होती हैं। जागृत, स्वप्न, सुसुप्त व तुरीय। जागृत अवस्था में हम वाह्य विश्व से क्रियाशील रहते हैं। स्वप्न अवस्था में हम अपने अन्तःकरण के चार भागों तक ही सीमित रहते हैं, इस अवस्था में हमारे मस्तिष्क में क्रियाशीलता पायी जाती है और वही स्वप्नरूप में दिखती है। उस स्थिति के कुछ स्वप्न हमें याद रहते हैं, शेष को याद करने के लिये अतियथार्थवादी अन्य विधियों का सहारा लेते हैं। प्रयोगों के आधार पर कुछ आधुनिक विचारकों का मत है कि स्वप्न की इस स्थिति में समय अपना स्वरूप खो देता है, संभव है कि २ घंटे की घटना का स्वप्न हम २ सेकण्ड में ही देख लें।
तीसरी अवस्था होती है, सुसुप्त। इस अवस्था में हमारे साथ क्या होता है, हमें कुछ भी पता नहीं रहता। प्रयोगों में इस अवस्था को गाढ़ी निद्रा कहा गया है। माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार इस स्थिति में अन्तःकरण के चारों भाग एक हो जाते हैं, उस रूप में, जो हम हैं, विशुद्ध चेतना स्वरूप। इस अवस्था का क्या स्वरूप है, क्या कार्य है, कुछ भी नहीं ज्ञात। संभव है, यह वह स्थिति होती होगी जहाँ पर हम ऐसे दैवीय संकेत पा जाते हों जो चित्तवृत्ति और गहन चिन्तन के माध्यम से आना असंभव हों।
चौथी अवस्था है, तुरीय। निद्रा पर किये गये प्रयोग इस स्थिति से भी अनभिज्ञ हैं, क्योंकि मन वाह्य जगत में क्रियाशील ही नहीं रहता है और अन्तःकरण के संकेत मशीनें ग्रहण नहीं कर पाती हैं। इसे समाधि की स्थिति कहते हैं। माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार इस स्थिति में हमारी चेतना एक समग्र चेतना में पहुँच जाती है और सकल सृष्टि से अपने संबंधों को अनुभव कर पाती है, वह स्थिति जहाँ आप एकाकार हो जाते हैं, उस स्थान पर, जहाँ से हम सब व्यक्त हैं, समय से शून्य, न भूत में, न भविष्य में।
कहते हैं कि तुरीय अवस्था सर्वव्याप्त है, क्योंकि वही एकल सत्य है। हमारे लिये शेष तीन अवस्थाओं के बीच की संधि अवस्था तुरीय के माध्यम से ही होती है। यह कैसे होता है, उसके लिये अध्ययन और अनुभव आवश्यक है। साथ ही साथ आश्चर्य सा प्रतीत होने वाला ज्ञान, जो प्रत्यक्ष या अनुमान से होना असंभव था, किस अवस्था में और किस रूप में हमारे चित्त में प्रकट हो जाता है, इसे भी समझना रोचक है। ज्ञान के अनसुलझे स्रोत की गुत्थी सुलझाना वैज्ञानिकता के लिये बड़ी चुनौती है। यह ज्ञान या ब्रह्मा का ज्ञान कैसे, किस रूप में और किस भाषा में प्रकट हुआ होगा, बड़ा रहस्य है। पर इन दो ग्रन्थों द्वारा प्रदत्त ज्ञान अनुभव किया जा सकता है, यह हमारे मनीषियों का मानवता के लिये आश्वासन है।
हम एक स्थूल भाषा रच कर उसमें अपने अस्तित्व की सूक्ष्मता ठूँसने के प्रयास को बौद्धिक उपलब्धि का उन्नतशिखर माने बैठे हैं और हमारे पूर्वज न केवल तुरीय आदि अवस्थाओं को अनुभव कर सके, वरन उसे सूत्रों के रूप में हमे व्यवस्थित रूप से समझा भी गये। मानवता के लिये इससे अमूल्य उपहार और क्या हो सकता है भला?