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30.11.13

क्या बोलूँ मैं

मैं,
बैठकर आनन्द से,
वाद के विवाद से,
उमड़ते अनुनाद से,
ज्ञान को सुलझा रहा हूँ,

सीखता हूँ,
सीखने की लालसा है,
व्यस्तता है इसी की,
और कारण भी यही,
कुछ बोल नहीं पा रहा हूँ । 

22.5.13

स्वयं से भागते, हम लोग

कभी सोचा है कि व्यक्ति को सबसे अधिक भड़भड़ाहट कब होती है, सर्वाधिक मन कब ऊबता है, कौन सा समय वह शीघ्रातिशीघ्र बिता देना चाहता है? उत्तर अधिक कठिन नहीं होगा, यदि जीवन के भारी कष्टों को सूची से हटा दिया जाये तो सबसे अधिक कष्ट में व्यक्ति तब होता है जब वह एकान्त में होता है, शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से।

कभी सोचा है कि व्यक्ति स्वयं से इतना क्यों भागता है? एकान्त काटने को दौड़ता है। कुछ तो कारण होगा कि हम स्वयं को ही नहीं झेल पाते हैं।

कहीं पढ़ भी रहा था कि जेल में यदि किसी व्यक्ति को कठिनतम दण्ड दिया जाता है तो उसे एकान्त में रख देते हैं, तनहाई कही जाती है वह। वह एकान्त ऐसा होता है जहाँ बन्दी का मानसिक संतुलन तक बिगड़ जाता है। क्या एकान्त में रहना हमारी प्रकृति के विरुद्ध है? व्यक्ति को स्वयं से भय क्यों?

ये सारे प्रश्न ऐसे हैं जो उठते तो हर एक के मन में हैं, पर उनका उत्तर पाना उतना ही कष्टकर होता है जितना एकान्त में समय बिताना। कोई इसे मन का खेल मानता है, कोई सामाजिकता को दोष देता है, कोई इस पर कुछ कहना ही नहीं चाहता है। एकान्त सदा ही दोषपूर्ण माना जाता है, जो लोग किसी और से घुलते मिलते नहीं, उन्हें संशय और विस्मय की दृष्टि से देखा जाता है, विचित्र प्राणी की तरह।

माना कि एकान्त भयावह है, माना कि एकान्त असामाजिक है, पर अपने से पूर्णतया विमुख हो जाता कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? अपने से भागने का गुण कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? आश्रयों के हटते ही भरभरा कर ढहने लगता है हमारा जीवन। माना कि सहजीवन ही हमारी राह है, पर स्वयं को समझने और समझाने से क्यों विमुख हो जाते हैं हम? एकान्त को भयानक मानने वाली यह मानसिकता इतने गहरे धँसी है हम सबके अन्दर कि हम स्वयं से ही भागने लगे हैं।

यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की दीवार भी है, यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की सुलझन का प्रारम्भ भी है। पूर्व की संस्कृति में यह प्रश्न सदा से ही पूछा जाता रहा है, पश्चिम में यह प्रश्न सदा ही प्यासा रहा है। हमारा जीवनक्रम स्वयं को समझने से प्रारम्भ होता है और सहजीवन तक जाता है, पाश्चात्य सहजीवन को प्रमुखता से रख इस प्रश्न पर ठंडी राख उड़ेल देता है। जीवन दोनों संस्कृतियों में पल रहे हैं, एक पद्धति में अन्त तक स्पष्ट दिशा दिखती है, दूसरी पद्धति पगडंडियों के समाप्त होते ही भ्रमित हो जाती है। मैं जितना एकान्त में डूबता हूँ, उतना ही प्राच्य हो जाता हूँ, जितना सबके संग जीने लगता हूँ उतना ही पाश्चात्य का रंग धारण कर लेता हूँ। मैं बहुधा मुहाने पर खड़ा रहता हूँ, इस प्रश्न के कुछ इस पार, इस प्रश्न से कुछ उस पार।

स्वयं को जानना है तो स्वयं से जूझना भी पड़ेगा। कोई इसे भले ही अध्यात्म मान कर बुढ़ापे के लिये छोड़ दे, पर यह प्रश्न मुँह बाये एक न एक दिन खड़ा अवश्य हो जायेगा। कह देने भर से कि इन सबके बिना भी काम चल जायेगा, ये प्रश्न टलने वाले नहीं, उत्तर तो पाना ही पड़ेगा।

एक दूसरे को देखकर तो सब ही जीवन पार कर लेते हैं, पर क्या दूसरे का जीवन ही हमारा भी मानक हो जाये? क्या वे पद्धतियाँ जो किसी एक के लिये सुन्दर ढंग से चलती हैं, क्या दूसरे के ऊपर भी उतना ही प्रभावी हो सकती हैं? ऐसा नहीं है कि सारे लोग भेड़चाल में ही चलते हैं, कुछ अपनी राह स्थापित करते हैं, अपने मानक स्वयं स्थापित करते हैं। भौतिक सफलतायें अपना स्थान बनाती हैं, विकास होता रहता है, पर स्वयं को समझने का प्रश्न कार्य और उद्देश्यों की भीड़ में खोया ही सा रहता है।

अपने हृदय पर हाथ रखिये और पूछिये कि स्वयं से पहली बार वार्तालाप कब किया था, तब पता चलेगा कि तीन या चार दशक तो इस प्रश्न को पहली बार आने में ही निकल जाते हैं। जब तक प्रश्नोत्तरी तनिक रोचक होती है, आधा जीवन बीता हुआ सा लगता है। लगता है कि हम सदा ही स्वयं से भागते रहे, स्वयं का सामना करने से कतराते रहे।

एक परम स्नेही मित्र ने दर्शननिमग्न वार्तालाप के बीच एक दिन बड़े ही दुर्लभ वाक्य कहे, उनका कहना था कि जीवन में यदि किसी एक चीज को जानना आवश्यक है, तो वह स्वयं को। स्वयं को जानने के लिये मन को जानना आवश्यक है, आत्म मन से ही व्यक्त होता है।

बात सच भी है, हम सुख को ढूढ़ते रहते हैं। कहते हैं जो मन के अनुकूल है, वही सुख है। यदि हम मन को नहीं समझ पाये तब सुख को क्या समझ पायेंगे? बिना मन को जाने सुख की परिभाषायें बनाते रहते हैं, उस पर प्रयोग करते रहते हैं। मन को नयापन चाहिये तो उसे नयापन ला लाकर देते रहते हैं, पर बात तो मन के माध्यम से स्वयं को समझने की थी।

जो भी कारण हो, जो भी निदान हो, हम स्वयं से भागे लोग हैं, सदा ही बाहर अपना ठिकाना ढूढ़ते रहते हैं, व्यग्र हो। स्वयं में स्थिर होना सीख लें, तो जहाँ ठहर जायें, गाँव वहीं बन जाये हमारा, जहाँ रम जायें, वहीं राम हो जायें। यदि कहीं टिकना सीखना हो मुझे, तो स्वयं में ही, वर्तमान में ही, तात्कालिक परिवेश में ही।