अथक चिन्तन में नहाया,
सकल तर्कों में सुशोभित,
अनवरत ऊर्जित दिशा की प्रेरणा से,
बहुधा बना व्यक्तित्व मेरा ।
चला जब भी मैं खुशी में गुनगुनाता,
ध्येय की वे सुप्त रागें,
अनबँधे आवेश में आ,
मन तटों से उफनते आनन्द में,
क्षितिज तक लेती हिलोरें ।