29.1.11

चोला माटी के हे रे

कुछ विषय ऐसे हैं जिनसे हम भागना चाहते हैं, इसलिये नहीं कि उसमें चिंतन की सम्भावना नहीं हैं या वे पूरी तरह व्यर्थ हैं। संभवतः भय इस बात का होता है कि उस पर विचार करने से हमारे उस विश्वास को चोट पहुँचेगी जिस पर हमारा पूरा का पूरा अस्तित्व टिका है। अस्तित्व स्वयं के होने का, विषय स्वयं के न होने का। जीवन की कार्य-श्रंखला जब यह मान कर तैयार हो रही हो कि हमारा अवसान होना ही नहीं है, अन्त शब्द का उच्चारण मौन उत्पन्न कर देता है, चिन्तन का मौन। यक्ष का आश्चर्य-प्रश्न, यदि कोई सोचने लगता है उस विषय पर तो उस व्यक्ति को आश्चर्य की वस्तु समझा जाता है। मूल विषयों से इस आश्चर्य-प्रश्न के संदर्भों को सरलता से भुला देता है हमारा स्मृति-तन्त्र।

पीप्ली लाइव का एक गीत 'चोला माटी के हे रे' एक ऐसा ही संदर्भ है जो हमें याद ही नहीं रहता है, उस फिल्म में प्रस्तुत भूख, गरीबी और मीडिया की उछलकूदों के सामने। फिल्म देखते समय यही स्मृति-लोप मेरे साथ भी हुआ। यदि इसका संगीत व गायिका नगीन तन्वीर के स्वर विशेष न होते तो संभवतः मैं भी इसे पुनः न सुनता, इसके बोलों को पढ़ने और समझने का प्रयत्न न करता। खड़ी बोली में न होने के कारण, अधिकांश शब्द एक बार में अर्थ नहीं स्पष्ट कर पाते हैं, बस उड़ता उड़ता सा संकेत देकर ही निकल जाते हैं।

यह चोला(शरीर) माटी का है। द्रोण जैसे गुरु, कर्ण जैसे दानी, बाली जैसे वीर और रावण जैसे अभिमानी, सब के सब यहाँ से प्रयाण कर गये। काल किसी को नहीं छोड़ता है, राजा, रंक और भिखारी, कोई भी हो, सबकी बारी आनी है। पगले, हरि का नाम स्मरण कर ले और भव सागर पार कर मुक्त हो जा।

यह दार्शनिक उच्चारण, किसी को भांग व चरस जैसा लगता है जो गरीबी, मजबूरी और अकर्मण्यता के कष्ट को भुला देता है, किसी को प्रथम प्रश्न सा लगता है जिसका उत्तर जीवन की दिशा निर्धारित करता है, किसी को कपोल-कल्पित व अनावश्यक लगता है जिसके बिना भी जीवन जीते हैं सब, किसी को बन्धनकारी लगता है जो हमें कितने ही अचिन्त्य कर्तव्यों के जाल में समेट लेता है।

भले दर्शन से अरुचि हो हमें पर प्रयाण हम सबको करना है, प्रायिकता के सिद्धान्त से जीवन उत्पत्ति के अनुयायियों को भी और ईश्वर की सत्ता के उपासकों को भी। चोला माटी का है, यह एक सत्य है हम सबके लिये। दर्शन-भिन्नता जीवन-शैली का निर्धारण कर देती है, चार्वाक से निष्काम कर्म तक सुविस्तृत फैली। कैसी भी हो जीवन शैली, इस अन्तिम तथ्य पर विचार किये बिना उसे तार्किक क्षेत्र में स्थापित कर पाना असम्भव है।

'आसमां में उड़ने वाले मिट्टी में मिल जायेगा', 'इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल' और 'चोला माटी के हे रे', ये सब गीत हमारा चिन्तन जहाँ पर स्थित कर देना चाहते हैं, वहाँ की ऊष्णता हमें क्यों विचलित कर देती है? धर्म की वीथियों से परे निकल, अपने अन्तरतम के विस्तृत मैदानों में इसका उत्तर पाने का यत्न करना ही है हमे।

गूढ़ प्रश्नों का उत्तर वस्तुनिष्ठ नहीं होता है, हमें खोजना पड़ता है सतत, बार बार मिलान कर देखना पड़ता है अपने जीवन से, बार बार कुछ भाग बदलने पड़ते हैं उस उत्तर के।

माटी का क्या मोल है? साथ ही साथ कौन सी ऐसी मूल्यवान वस्तु है जो माटी से न निकली हो? इन दो तथ्यों के बीच जीवन को स्थापित कर पाना सरल नहीं है। माटी से आकार ले, पुनः उसी में मिल जाने का सुख जनकसुता के एकांगी आत्मविश्वास का पर्याय भी है और असहायता का विकल स्वर भी।

क्या चुनना है और क्यों चुनना है, यह आप समझें अपने जीवन के लिये, कुछ उत्तर निसन्देह बदलेंगे आपके भी। मैं तो एक बार पुनः सुनने चला यह गीत, चोला माटी के हे रे।

कौन सा रहस्य पिरोया है उस अन्तिम आकर्षण में? अनुभवों की यात्रा का परम-विश्राम।


गाना सुन लें, मैने नहीं गाया है।

26.1.11

तानपुरा और जीवन

कभी तानपुरा देखा है? किसी भी संगीत समारोह में, मंच के दोनों ओर, पार्श्व में स्तंभ से खड़े दो वाद्य यन्त्र, साथ में चेहरे पर सपाट सा भाव लिये धीरे धीरे उस पर ऊँगलियाँ फिराते दो वादक। जब तबला, बाँसुरी, हारमोनियम, सरोद आदि वाद्य यन्त्र, सुर-ताल के साथ किये सफल प्रदर्शन का उत्साह एक दूसरे के साथ बाटते हैं, तानपुरे निस्पृह भाव से अपने कार्य में लगे रहते हैं। कभी भी तानपुरे के लिये तालियाँ बजते नहीं सुनी। कभी कभी तो लगता था कि परम्पराओं की बाध्यता में हमने मंच के दोनों ओर दो निर्जीव स्तम्भ खड़े कर रखे हैं, जिनके न होने पर मंचों का आकार कम किया जा सकता था। इस विषय में मेरा ज्ञानबोध अपूर्ण निकला, जब तानपुरे के बारे में जाना, कुछ अपनों सा लगा उसका भी जीवन।

नव ज्ञानबोध का श्रेय जाता है, एक बहुत छोटी पर सरस, आत्मीय और साहित्यिक भेंट को, सन्तोषजी से। प्रतिष्ठित स्थानीय हिन्दी समाचार पत्र के उपसम्पादक हैं, ब्लॉग से जुड़े हैं, संगीत में गहरी रुचि है और मोहक बाँसुरी बजाते हैं। पहले तो उन्होने कुछ पुराने गीत सुनवाये, जो किसी कारणवश फिल्मों में नहीं आ पाये, एक रफी साहब का था, रात के तारों के ऊपर। बाँसुरी बजाने के अनुरोध को स्वीकार करते हुये उन्होने पहले एक इलेक्ट्रॉनिक तानपुरा निकाला, उसे संयोजित किया और तब सायं के दो राग सुनाये, राग यमन और राग भूपाली।

इलेक्ट्रॉनिक तानपुरे ने उत्सुकता को एक नयी दिशा दे दी। यह उनके संगीत के लिये बंगलोर की देन थी। तानपुरे की उपयोगिता पर एक सारगर्भित चर्चा छेड़ते हुये उन्होने जो बताया, प्रयोगसहित, उसे यथावत प्रस्तुत कर रहा हूँ।

बाँसुरी में सुरों के आरोह व अवरोह के मध्य कहाँ पर आकर स्थिर होना है, इसके लिये एक ध्वनि-आधार आवश्यक होता है। वह न होने की स्थिति में स्वरों को भटकने से रोकना अत्यधिक कठिन हो जाता है। जिस आधार पर बाँसुरी बज रही थी, उस आधार पर तानपुरे का नॉब घुमाने पर वातावरण में एक अनुनाद का अनुभव हुआ जो संकेत था कि आप आधार पर वापस आ चुके हैं। यही सिद्धान्त गायकी में भी प्रयुक्त होता है। मुझसे भी उस आधार पर गाने के स्वर स्थिर करने को कहा गया, जब कानों में स्वर गूँजने लगा तब लगा कि यही संयोजन की स्थिति है। थोड़ा सा ऊपर व नीचे करने में कर्कशता उत्पन्न होती है और पता लग जाता है कि स्वरों से भटकाव हो गया है।

हम सबके व्यक्तित्व में एक तानपुरा बसता है, जो एक आधार बनाता है, एक दृष्टिकोण बनाता है, घटनाओं और व्यक्तित्वों को समझने का। उत्थान-पतन, लाभ-हानि आदि द्वन्दों से भरा है हम सबका जीवन पर इन सबके बीच जो विश्राम की निर्द्वन्द स्थिति आती है, वही हमारे तानपुरे की आवृत्ति है। व्यक्तिगत सम्बन्धों में उत्पन्न कर्कशता, जीवन को उन स्वरों में ले जाने के कारण होती है, जो औरों के व्यक्तित्व के तानपुरे के साथ संयोजित नहीं हो पाते हैं। परम्परा को नव विचार नहीं सुहाता, ऊर्जान्वित यौवन को शैथिल्य नहीं सुहाता, सब चाहते हैं कि विश्व के स्वर उनके तानपुरे की आवृत्ति में रहें। 

किसी व्यक्ति के लिये उसके संस्कार ही तानपुरा है, जीवन के सुर उसके ही आसपास घूमते हैं। किसी समाज के लिये उसकी संस्कृति और जनसामान्य की जीवनशैली ही तानपुरा है। किसी देश के लिये शान्ति, विकास और समृद्धि की आस ही तानपुरा है। अमेरिका की व्यक्तिगत कर्मशीलता, जापान का  पारिवारिक अनुशासन, भारत का सामाजिक अध्यात्म ऐसे ही तानपुरे हैं जिसका आधार ले वहाँ के जीवन-गीत निर्मित होते हैं। आप भारत में अमेरिका या अमेरिका में जापान के मूल्य नहीं खोज सकते।

आप माने न माने, आपका जीवन समाज के तानपुरे को बल देता है और उससे प्रभावित भी होता है। आपका हलचलविहीन जीवन भले ही आपको भला न लगे पर वह हर समय उस तानपुरे का सृजन कर रहा होता है जिसकी आवृत्ति पर आने वाली पीढ़ियाँ सुर मिलायेंगी। हमारे पूर्वज जिनका नाम इतिहास की पुस्तकों में नहीं है, हमारे वयोवृद्ध जो उत्पादकता के मानकों पर शून्य हैं, वे जनसामान्य जिनका जीवन विशेष की श्रेणी में नहीं आता है, सबने वह आधार निर्माण किये हैं  जिस पर हम अपने उत्थानों के स्वर सजाते रहते हैं।

अगली बार किसी समारोह में तानपुरों को देखें, स्तम्भवत, उमंगविहीन, तो मन में उनके प्रति अकर्मण्यता के भाव न लायें। वे आधार तैयार कर रहे हैं उन आवृत्तियों का जिन पर श्रेष्ठ मंचीय प्रदर्शन निर्भर करता है।

उन तानपुरों से कितना मिलता जुलता है, हम सबका जीवन।

22.1.11

बकर बकर

कई दिन पहले मोबाइल से अपना पसंदीदा टीवी कार्यक्रम रिकार्ड करने का एयरटेल का विज्ञापन देखा। करीना कपूर बकर बकर करना प्रारम्भ करती है और बात में पता लगता है कि प्रेरणा टीवी के कार्यक्रम से प्राप्त हो रही है।

जितनी बार भी यह बकर बकर जैसा एकालाप देखता हूँ, अच्छा लगता है और हँसी आती है। पता नहीं क्यों? कुछ जाना पहचाना सा लगता है यह प्रलाप।

हम लोग दिन भर जो कुछ भी बोलते रहते हैं यदि उसे बिना किसी अन्तराल के पुनः सुने तो यही लगेगा कि करीना कपूर की बकर बकर तो फिर भी सहनीय है। पर हम स्वयं ऐसा करते हुये भी विज्ञापन देखकर हँसते हैं। केवल गति का ही तो अन्तर है!

विचार-श्रंखला बह रही है। मन ने जो विचार चुन लिये, उन्हें वाणी मिल गयी। कई अन्य विचार मन से मान न पा सरक जाते हैं अवचेतन के अँधेरों में।

शब्द आते हैं विचारों से। विचारों के प्रवाह की गति होती है और उन विचारों की गुणवत्ता होती है।

कौन है जो विचारों का भाड़ झोंके जा रहा है और मन मस्ती में स्वीकार-अस्वीकार का खेल आनन्दपूर्वक खेल रहा है। कोई जोर है आपका अपने विचारों पर, उनकी गति पर या अपने मन पर?

जब कभी भी इतना साहस व चेतना हुयी कि स्वयं को कटघरे में खड़ा कर प्रश्न कर सकूँ उन विचारों पर जो मन को उलझाये रहे, तो मुख्यतः तीन तरह के उद्गम दिखायी पड़े इन विचारों के।

पहले उन कार्यों से सम्बन्धित जिन्हें आप वर्तमान में ढो रहे हैं।

दूसरे आपके जीवन के किसी कालक्षण से सम्बन्धित रहे हैं और सहसा फुदक कर सामने आ जाते हैं।

तीसरे वे जो आपसे पूर्णतया असम्बद्ध हैं पर सामने आकर आपको भी आश्चर्यचकित कर देते हैं।

पहले दो तो समझ में आते हैं पर तीसरा स्रोत कभी गणित का कठिन प्रश्न हल करने की विधि बता देता है, कभी आपसे एक सुन्दर कविता लिखवा देता है या कभी आपकी किसी गम्भीर समस्या का सरल उत्तर आपके हाथ पर लाकर रख देता है। सहसा, यूरेका।

मन बहका है। यदि आप 'चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ...... अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते', समझते हैं और उस पर अभ्यासरत हैं तो आपके विचारों की गुणवत्ता बनी रहेगी। अच्छों को सहेज कर रखिये और बुरों के बारे में निर्णय ले लीजिये, भले ही मन आपसे कितनी वकालत करे, तभी गुणवत्ता बनी रहेगी।

विचारों के प्रवाह की गति हमारे ज्ञान व सरलता से कम होती है। जीवन आपको ऐसे मोड़ों पर खड़ा कर देगा जहाँ आपको या तो कुछ सीखने को मिलेगा या आपको सरल कर देगा। प्रौढ़ता या परिपक्वता सम्भवतः इसी को कहते हों।

उन मनीषियों को क्या कहेंगे जिनकी चेतना इतनी विकसित है कि हर विचार अन्दर आने से पहले उनसे अनुमति माँगता हो। मेरे विचार तो सुबह शाम मुझे लखेदे रहते हैं।

19.1.11

ओह रे ताल मिले नदी के जल में

किसी स्थान की प्रसिद्धि जिस कारण से होती है, वह कारण ही सबके मन में कौंधता है, जब भी उस स्थान का उल्लेख होता है। यदि पहली बार सुना हो उस स्थान का नाम, तो हो सकता है कि कुछ भी न कौंधे। आपके सामाजिक या व्यावसायिक सन्दर्भों में उस स्थान की प्रसिद्धि के भिन्न भिन्न कारण भी हो सकते हैं। आपको अनेकों सन्दर्भों के एक ऐसे स्थान पर ले चलता हूँ, जो संभवतः आपने पहले न सुने हों, मेरी ही तरह।

रेलवे पृष्ठभूमि में, बरुआ सागर का उल्लेख आने का अर्थ है, उन पत्थरों की खदानें जिन के ऊपर पटरियाँ बिछा कर टनों भारी ट्रेनें धड़धड़ाती हुयी दौड़ती हैं। बहुत दिनों तक वही चित्र उभरकर आता रहा उस स्थान का, कठोर चट्टानों से भरा एक स्थान, रेलपथों का कठोर आधार। किसी भी विषय या स्थान को एक ही सत्य से परिभाषित कर देना उसके साथ घोर अन्याय होता अतः अन्य कोमल पक्षों का वर्णन कर लेखकीय धर्म का निर्वाह करना आवश्यक है।

स्टेशन की सीमाओं से बाहर पग धरते ही, अन्य पक्ष उद्घाटित होते गये, एक के बाद एक। सन 860 में बलुआ पत्थरों से निर्मित "जराई का मठ" प्रतिहार स्थापत्य कला का एक सुन्दर उदाहरण है, खजुराहो के मन्दिरों के पूर्ववर्ती, एक लघु स्वरूप में पूर्वाभास।

बड़े क्षेत्र में फैले कम्पनी बाग के पेड़ों को देखकर, प्रकृति के सम्मोहन में बँधे से बढ़े बरुआ सागर किले की ओर। तीन शताब्दियों पहले राजा उदित सिंह के द्वारा बनवाया किला, लगभग 50-60 मीटर की चढ़ाई के बाद आया मुख्य द्वार। 1744 में मराठों और बुन्देलों के बीच इसी क्षेत्र के आसपास युद्ध हुआ था। किले के द्वार से पूरा क्षेत्र हरी चादर ओढ़े, विश्राम करता हुआ योगी सा लग रहा था।

किले के ऊपर पहुँचकर जो दृश्य देखा, उसे सम्मोहन की पूर्णता कहा जा सकता है। एक विस्तृत झील, जल से लबालब भरी, चलती हवा के संग सिहरन व्यक्त कर बतियाती, झील के बीच बना टापू रहस्यों के निमन्त्रण लिये। तभी हवा का एक झोंका आता है, ठंडा, झील का आमन्त्रण लिये हुये, बस आँख बंद कर दोनों हाथ उठा उस शीतलता को समेट लेने का मन करता है, गहरी साँसों में जितना भी अन्दर ले सकूँ। किले के सबसे ऊपरी कक्ष में यही अनुभव घनीभूत हो जाता है और बस मन करता रहता है कि यहीं पर बैठे रहा जाये, जब तक अनुभव तृप्त न हो जाये।

यही कारण रहा होगा, बरुआ सागर को झाँसी की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का। जब ग्रीष्म में सारा बुन्देलखण्ड अग्नि में धधकता होगा, रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों के विरुद्ध उमड़ी क्रोध की अग्नि को यहीं पर योजनाओं का रूप देती होंगी। स्थानीय निवासियों ने बताया कि किस तरह रानी और उनकी सशस्त्र दासियाँ बैठती थीं इस कक्ष के आसपास।

बहुत लोगों को यह तथ्य ज्ञात न हो कि प्रसिद्ध गीतकार इन्दीवर बरुआ सागर के ही निवासी थे। इस झील का एक महत योगदान रहा है कई दार्शनिक और सौन्दर्यपरक गीतों के सृजन में। सफर, उपकार, पूरब और पश्चिम, सरस्वतीचन्द्र जैसी फिल्मों के गीत लिखने वाले इन्दीवर का जो गीत मुझे सर्वाधिक अभिभूत करता है, स्थानीय निवासी बताते हैं कि वह इसी झील के किनारे बैठकर लिखा गया।

ओह रे ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में......

छोटे से इस गीत में न जाने कितने गहरे भाव छिपे हैं। यह स्थान उन गहरे भावों को बाहर निकाल लेने की क्षमता में डूबा हुआ है, आपको बस खो जाना है झील के विस्तार में, झील की गहराई में। यदि यहाँ पर आ कवि की कविता न फूट जाये तो शब्द आश्चर्य में पड़ जायेंगे।

यह भी बताया गया कि एक पूर्व मुख्यमन्त्री इस प्राकृतिक मुग्धता को समेट लेने बहुधा आते थे। 1982 के एशियाड की कैनोइंग प्रतियोगिताओं के लिये इस झील को भी संभावितों की सूची में रखा गया था।

स्थापत्य, इतिहास, साहित्य और पर्यटन के इतने सुन्दर स्थल को देश के ज्ञान में न ला पाने के लिये पता नहीं किसका दोष है, पर एक बार घूम लेने के बाद आप अपने निर्णय को दोष नहीं देंगे, यह मेरा विश्वास है।
 
हम उत्तर दक्षिण के बीच कितनी बार निकल जाते हैं, बिना रुके। एक बार झाँसी उतर कर घूम आईये बरुआ सागर, बस 24 किमी है, दिनभर में हो जायेगा।

झील पर बैठकर गाया गीत

15.1.11

टाटों पर पैबन्द लगे हैं

सुख की चाह, राह जीवन की, रुद्ध कंठ है, छंद बँधे हैं।
रेशम की तुम बात कर रहे, टाटों पर पैबन्द लगे हैं।

सुख की राह एक होती तो, वही दिशा हम सबकी होती,
सूत्र एक होता यदि सुख का, मन की माला वही पिरोती,
अति सुख में दुख उपजे नित ही, दुखधारा, मन पाथर सा,
अतिशय दुख, स्तब्ध दिख रहा, असुँअन मोती त्यक्त बहा,
क्या पाये, क्या तज दे जीवन, हर चौखट पर द्वन्द सजे हैं।
रेशम की तुम बात कर रहे, टाटों पर पैबन्द लगे हैं।

हमने सबको दोष दिये हैं, गुण का बोझ उठाये फिरते,
पापों का आनन्द समेटे, आदर्शों के तम में घिरते,
मूर्त सहजता घुट घुट मरती, जीवन के विष-नियम तले,
लांछन अन्यायों का सहता, ईश्वर पा अस्तित्व जले,
पूर्ण विश्व अपनी रचना है, उसने बस प्रारम्भ रचे हैं।
रेशम की तुम बात कर रहे, टाटों पर पैबन्द लगे हैं।

ईश्वर से मानव जीवन पा, हमें लगा सब कुछ ले आये,
मुक्त उड़ानें, अनबँध विचरण, हमने अपने गगन बनाये,
नहीं पता था, दसों दिशायें, अनुशासन के तीर चलेंगे,
प्रत्यक्षों से बिखरे दाने, मर्यादा के जाल बिछेंगे,
चारों ओर दिख रही कारा, हर पग में अनुबन्ध लगे हैं।
रेशम की तुम बात कर रहे, टाटों पर पैबन्द लगे हैं।

नहीं पूर्ण आमन्त्रित करती, संयम की कल्पित परिभाषा,
हितकर्मों में बीच मार्ग ही, जग जाती संचित प्रत्याशा,
नेति नेति कर्मों में रचकर जीवन को खो बैठे हम,
नित, समाजकृत महाभँवर में, टूट गये कितने ही क्रम,
स्वप्न सदा ही अलसाये हैं, नहीं कभी स्वच्छन्द जगे हैं
रेशम की तुम बात कर रहे, टाटों पर पैबन्द लगे हैं।

मध्यमार्ग श्रेयस्कर होता, पर हम भी तो बुद्ध नहीं,
आर पार की कर लेने दो, पर जीना अब रुद्ध नहीं,
इस जीवन को ध्वंस कर रहे, परलोकों की सोच रहे,
आशाओं के पंखों पर कीलें हम लाकर ठोंक रहे,
स्वयं देख दर्पण अब हँस लो, रोम रोम में व्यंग पगे हैं
रेशम की तुम बात कर रहे, टाटों पर पैबन्द लगे हैं।

जीवन-नद, कब से तट बैठे, छूकर जल अनुभव करते,
गहराई की समझ समेटे, अपने से डर कर रहते,
डुबा सके तो, भँवर डुबा ले, पर कूदेंगे जीवन में,
लहरों से विचलित क्यों होना, लाख थपेड़े हों उनमें,
जीवन को जीने का आश्रय, जीवित को रस रंग सजे हैं,
रेशम की तुम बात कर रहे, टाटों पर पैबन्द लगे हैं।

12.1.11

सामाजिकता का फैलाव

आपको कितने मित्र चाहिये और किस क्षेत्र में चाहिये? आपके क्षेत्र में मित्र बढ़ाने का सर्वोत्तम माध्यम क्या है? एक मित्र से आप कितने माध्यमों से संपर्क रख सकते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि माध्यमों की अधिकता से हमारे सम्पर्क की गुणवत्ता और मात्रा कम हो गयी हो?

सूचना क्रान्ति ने हमारे मित्रों की उपलब्धता सतत कर दी है, सब के सब मोबाइल फोन पर उपस्थित। उन्हे अपने बारे में जानकारी देने के लिये केवल लिख कर भेजना भर है। भविष्य में सुयोग्य यन्त्र स्वतः ही यह प्रचारित कर दिया करेंगे। पर क्या जानकारी दें हम उससे? यदि आपको लगता है कि आपके मित्र आपकी छीकों के बारे में भी जानने के लिये लालायित रहते हैं तो अवश्य बतायें उन्हें इसके बारे में और भविष्य में तैयार भी रहें उनकी छीकों की गिनती करने के लिये। आपको जो रुचिकर लगता हो, संभवतः औरों को वह न भाये।

सबको यह अच्छा लगता है कि अन्य उन्हें जाने। जान-पहचान का आधार बहुधा एक अभिरुचि होती है जो आपको एक दूसरे के संपर्क में बनाये रखती है। सौन्दर्यबोध एक शाश्वत अभिरुचि है पर उसमें मन लगने और उचटने में अधिक समय नहीं लगता है। हर अभिरुचि का एक सशक्त माध्यम है, कुछ समूह हैं विभिन्न माध्यमों में, लोग जुड़ते हैं, लोग अलग हो जाते हैं, अच्छी चर्चायें होती हैं।

पहुँच बढ़ाने का प्रयास है यह, पर कहाँ पहुँच रहे हैं यह ज्ञात नहीं है हमें। पहुँच बढ़ा रहे हैं, ज्ञान बढ़ा रहे हैं या समय व्यर्थ कर रहे हैं। किसी भी क्षेत्र में बिना समय दिये सार्थकता नहीं निकलती। माध्यमों की बहुलता और फैलाव क्या हमें इतना समय दे पा रहा है जिसमें हम अपनी अभिरुचियाँ पल्लवित कर सकें?

पिछले 5 माह से यह अन्तर्द्वन्द मेरे मन में चल रहा है। ट्विटर, फेसबुक, ऑर्कुट और 5 ब्लॉगों में अपनी पहचान खोलने के बाद भी यह समझ नहीं आ रहा था कि कहाँ जा रहा हूँ और क्या चाह रहा हूँ? इतना फैलाव हो रहा था कि न तो स्वयं को सम्हाल पा रहा था और न ही अभिरुचियों की गुणवत्ता को। फैलाव आपकी ऊर्जा बाँध देता है।

जब नदी का प्रवाह सम्हाला न जा सके तक किनारे की ओर चल देना चाहिये। तेज बहते कई माध्यमों से स्वयं को विलग कर लिया। फेसबुक और ट्विटर बन्द कर दिया। लिंकडेन व अन्य माध्यमों के सारे अनुरोध उत्तरित नहीं किये। ऑर्कुट में साप्ताहिक जाना होता है क्योंकि वहाँ कई संबंधियों के बारे में जानकारी मिलती रहती है। एक ब्लॉग छोड़ शेष निष्क्रिय हैं और संभवतः निकट भविष्य में गतिशील न हो पायें। एक ब्लॉग, गूगल रीडर व बज़ के माध्यम से सारे साहित्यिक सुधीजनों से संपर्क स्थापित है। सप्ताह में दो पोस्ट लिखने में और आप लोगों की पोस्ट पढ़ टिप्पणी करने में ही सारा इण्टरनेटीय समय निकल जाता है।

मेरी सामाजिकता, उसका फैलाव और मित्रों का चयन, सम्प्रति ब्लॉगीय परिवेश में ही भ्रमण करता है। आपका दूर देश जाना होता हो और कोई रोचकता दिखे तो मुझ तक अवश्य पहुँचायें।

उत्सुकता अतीव है, सब जानने की।

पता नहीं क्यों?

8.1.11

हिन्दी कीबोर्ड

जब भी हिन्दी कीबोर्ड का विषय उठता है, कई लोगों के भावनात्मक घाव हरे हो जाते हैं। इस फलते फूलते हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ छूटा छूटा सा लगने लगता है। चाह कर भी वह एकांगी संतुष्टि नहीं मिल पाती है कि हम हिन्दी टंकण में पूर्णतया आत्मनिर्भर व सहज हैं।

अपनी अभिव्यक्तियों से मन गुदगुदाने में सिद्धहस्त अशोक चक्रधर जी भी जब वर्धा में यही प्रश्न लेकर बैठ जायें तो यह बात और गहराने लगती है। किसी भी व्यक्ति के लिये मन में जगे भाव सब तक पहुँचाने के लिये लेखन ही एक मात्र राह है। डायरी में लिखकर रख लेना रचना का निष्कर्ष नहीं है। संप्रेषण के लिये उस रचना को हिन्दी कीबोर्ड से होकर जाना ही होगा। ब्लॉग का विस्तृत परिक्षेत्र, मनभावों की उड़ानों में डूबी रचनायें, इण्टरनेट पर प्रतीक्षारत आपके पाठकों का संसार, बस खटकता है तो हिन्दी कीबोर्डों का लँगड़ापन।

यही एक शब्द है जिसको इण्टरनेट में सर्वाधिक खंगाला है मैंने। लगभग 10 वर्ष पहले, सीडैक के लीप सॉफ्टवेयर को उपयोग में लाकर प्रथम बार अपनी रचनाओं को डिजिटल रूप में समेटना प्रारम्भ किया था। स्क्रीन पर आये कीबोर्ड से एक एक अक्षर को चुनने की श्रमसाधक प्रक्रिया। लगन थी, आत्मीयता थी, श्रम नहीं खला। लगभग दो वर्ष पहले हिन्दी ब्लॉग के बराह स्वरूप के माध्यम से हिन्दी का पुनः टंकण सीखा, अंग्रेजी अक्षरों की वैशाखियों के सहारे, पुनः श्रम और त्रुटियाँ, गति अत्यन्त मन्द। चिन्तन-गति के सम्मुख लेखन-गति नतमस्तक, व्यास उपस्थित पर गणेश की प्रतीक्षा। चाह कर भी, न जाने कितने ब्लॉगों को पढ़कर टिप्पणी न दे पाया, कितने विचार आधे अधूरे रूप ले पड़े रहे। तब आया गूगल ट्रांसइटरेशन, टंकण के साथ शब्द-विकल्पों की उपलब्धता ने त्रुटियों को तो कम कर दिया पर श्रम और गति वही रहे।

कृत्रिम घेरों से परे जाकर श्रेष्ठ तक पहुँचने का मन-हठ, देवनागरी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड तक ले गया। पूर्ण शोध के बाद यही निष्कर्ष निकला कि हिन्दी टंकण का निर्वाण इसी में है। लैपटॉप के कीबोर्ड पर चिपकाने वाले स्टीकरों की अनुपलब्धता से नहीं हारा और प्रिंटिंग प्रेस में जाकर स्तरीय स्टीकर तैयार कराये। अभ्यास में समय लगा और गति धीरे धीरे सहज हुयी। पिछले तीन प्रयोगों की तुलना में लगभग दुगनी गति और शुद्धता से लेखन को संतुष्टि प्राप्त हो रही है।

देवनागरी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड को यदि ध्यान से देखें तो कवर्ग आदि को दो कुंजियों में समेट दिया गया है, वह भी दायीं ओर। सारी मात्रायें बायीं ओर रखी गयी हैं, वह भी एक के ऊपर एक। शेष सब वर्ण बाकी कुंजियों पर व्यवस्थित किये गये हैं। यद्यपि पिछले 10 माह से अभी तक कोई विशेष बाधा नहीं आयी है इस प्रारूप को लेकर पर अशोक चक्रधर जी का यह कहना कि इस कीबोर्ड को और भी कार्यदक्ष बनाया जा सकता है, पूरे विषय को वैज्ञानिक आधार पर समझने को प्रेरित करता है।

आईआईटी कानपुर के दो प्रोफेसर श्री प्रियेन्द्र देशवाल व श्री कल्याणमय देब ने इस विषय पर एक शोध पत्र प्रस्तुत किया है जिसमें हिन्दी कीबोर्डों के वैज्ञानिक आधार पर गहन चर्चा की गयी है। श्री देशवाल कम्प्यूटर विभाग से है और श्री देब जिनके साथ कार्य करने का अवसर मुझे भी प्राप्त है, ऑप्टीमाइजेशन के विशेषज्ञ हैं।

चार प्रमुख आधार हैं कीबोर्ड का प्रारूप निर्धारित करने के, प्रयास न्यूनतम हो, गति अधिकतम हो, त्रुटियाँ न्यूनतम हों और सीखने में सरलतम हो। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु 6 मानदण्ड हैं जिनको अलग अलग गणितीय महत्व देकर, उनके योगांक को प्रारूप की गुणवत्ता का सूचक माना जाता है। यह 6 मापदण्ड हैं, सारी उँगलियों में बराबर का कार्य वितरण, शिफ्ट आदि कुंजी का कम से कम प्रयोग, दोनों हाथों का बारी बारी से प्रयोग, एक हाथ की ऊँगलियों का बारी बारी से प्रयोग, दो लगातार कुंजी के बीच कम दूरी और दो लगातार कुंजियों के बीच सही दिशा। शोधपत्र यह सिद्ध करता है कि एक श्रेष्ठतर कार्यदक्ष हिन्दी कीबोर्ड की परिकल्पना संभव है, अशोक चक्रधर जी से सहमत होते हुये।
 
आप में से बहुतों को लगेगा कि अभी जिस विधि से हिन्दी टाइप कर रहे हैं, वही सुविधाजनक है। यदि आप वर्तमान में देवनागरी इन्स्क्रिप्ट से नहीं टाइप कर रहे हैं तो आप टंकण के चारों प्रमुख आधारों पर औंधे मुँह गिरने के लिये तैयार रहिये।

हमें चिन्ता है, यदि आपकी चिन्तन-गति लेखन वहन न कर पाये, यदि आप की टिप्पणियाँ समयाभाव में सब तक पहुँच न पायें, यदि 20% अधिक गति से टाइप न कर पाने की स्थिति में आपकी हर पाँचवी पुस्तक या ब्लॉग दिन का सबेरा न देख पाये।

हमारी चिन्ताओं को अपने प्रयासों से ढक लें, साहित्य संवर्धन में एक शब्द का भी योगदान कम न हो आपकी ओर से। लँगड़े उपायों को छोड़कर देवनागरी इन्स्क्रिप्ट से टाइपिंग प्रारम्भ कर दें, स्टीकर हम भिजवा देंगे, अशोक चक्रधर जी के नाम पर। 

5.1.11

आईटी की पीड़ा

पिछले दो दशक अपनी उन्नति के गर्व में मदमाये खड़े हैं। आईटी ने विश्व को अपरिवर्तनीय दिशा दे दी है, अब चाह कर भी कोई पुरानी राहों पर लौटकर न जा पायेगा। बलात ही सही, सबको बढ़ना तो पड़ेगा ही। इस बदलाव को स्वप्नोत्तर प्रत्यक्ष रूप देने में भारतीय युवाओं की क्षमताओं और प्रयत्नों का विशेष योगदान रहा है। कूट भाषा में अपने आदेशों को लिखकर, उनके माध्यम से बड़े बड़े संयन्त्रों को चला लेने का सहज-कर्म प्रतिदिन विस्तार पा रहा है। नित नये क्षेत्र इस परिधि में सिमटते जा रहे हैं। जो व्यवसाय आईटी से दूर हैं, उन्हें प्रबन्ध-गुरु हेय दृष्टि से देख रहे हैं। जिस प्रकार रात में शारीरिक थकान को विश्राम मिलता है, अमेरिका की रातों में भारतीय प्रतिभायें कार्य कर उनका प्रभात विघ्नविहीन करने में लगी रहती हैं। व्यावसायिक उन्मत्तता ने रात-दिन के व पूर्व-पश्चिम के अन्तर को मिटा डालने की कसम सी खा ली है।

इस उद्देश्य के लिये पूरी की पूरी सेनाओं का गठन हो रहा है, विश्वविजय की रणभेरी रह रह कर सुनायी पड़ती है प्रतिदिन। बंगलोर इस विश्वविजयी अभियान का प्रमुख गढ़ है। इस क्षेत्र से सम्बन्धित कुछ अन्य तथ्यों को बंगलोर में रह कर ही समझ पाया हूँ। 15 वर्ष पहले आईटी को सिविल सेवा के लिये छोड़ देने से यह अनुभव प्रत्यक्ष नहीं रहा पर यदि इस क्षेत्र में रहता तो उस पीड़ा को और ढंग से व्यक्त कर पाता जिसके स्वर कभी इस नगर के बाहर नहीं निकल पाते हैं।

पहला तो नये प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षित करने में लगभग एक वर्ष का समय लगता है। दूसरा, अधिक पैसों के लिये कम्पनी छोड़कर आने जाने वालों की संख्या भी अधिक रहती है। तीसरा, किसी नये कार्य को प्राप्त करने के लिये और प्रथम दिन से ही उसका निष्पादन करने के लिये हर समय अतिरिक्त सॉफ्टवेयर इन्जीनियरों की संख्या रखनी पड़ती है। यह तीन कारक हैं किसी भी सॉफ्टवेयर कम्पनी में आवश्यकता से अधिक व्यक्ति होने के। अब इस स्थिति में, किसी भी समय लगभग 10% इन्जीनियरों के पास कोई भी कार्य नहीं रहता है। इसे "बेन्च स्ट्रेन्थ" के नाम से भी जाना जाता है। कार्यालय उन्हे आना पड़ता है, बिना किसी कार्य के, कुछ भी आकर पढ़िये, कुछ भी आकर करिये। कुछ दिन ही ठीक लगता है यह हल्कापन। व्यस्तता के चरम से कुछ न कर पाने की यह स्थिति असहनीय मानसिक तनाव लाती है। मनोरोग और आध्यात्म के रूप में इस मानसिक तनाव की दिशा ढूढ़ते देखा है इन युवाओं को।

यहाँ सरकारी वेतनमानों से बहुत अलग, वेतन प्रदर्शन पर निर्भर होता है। सॉफ्टवेयर कम्पनियों का वैश्विक स्वरूप विदेशों में कार्य करने के कई अवसर भी देता है। एक होड़ सी मची रहती है बाहर जाने की, गलाकाट प्रतियोगिता आगे निकलने के लिये। 24 घंटे कार्य करने की लगन और स्वास्थ्य व परिवार को भुलाकर कम्प्यूटरीय भाषा में डूबे रहने का क्रम और असाधारण व्यक्तित्वों को निर्मित करती यह जीवन शैली।

वेतन बहुत अधिक होने से घर, गाड़ी, धन आदि जीवन के अवयव 35 वर्ष का होते होते आ जाते हैं। अब कोई क्या करे, और धनार्जन? सरकारी सेवाओं में रिटायरमेन्ट का अर्थ होता है, इतना धन जिससे जीवन के इन अवयवों का अर्जन हो सके। अब 35 वर्ष के बाद क्या करे सॉफ्टवेयर इन्जीनियर? यहाँ से कई राहें निकलती देखी हैं। प्रतिभावान प्रोग्रामर सॉफ्टवेयर के निर्माण के किसी विशेष अंग के आधार पर अपनी अलग कम्पनी खोल लेते हैं, अपनी कम्पनी के स्वामी। प्रतिभावान प्रबन्धक अपने अर्जित धन से नया व्यवसाय डाल देते हैं। शेष सॉफ्टवेयर निर्माण के कार्य में यथावत लगे रहते हैं, बिना किसी विशेष प्रेरणा के। जीवन को गति में जीने की लत, एक अवस्था के बाद रिक्तता उत्पन्न करने लगती है विचारों में।

पीड़ा के स्वर, भले ही प्रगति के महानाद में छिप जायें, भले ही धन की अधिकता में विलीन से हो जायें हैं और भले ही कूट भाषा की शक्ति के मद में अनुभव न हों, पर हैं यथार्थ। उसे झेलकर देश की गरिमा को उन्नत करने में लगे युवा हमारे अपने हैं। हम भी इसे समझें और इस व्यवसाय से जुड़े अपने परिचितों और सम्बन्धियों को वह मानसिक दृढ़ता प्रदान करें जिसकी स्पष्ट माँग वे हमसे नहीं करते हैं।

1.1.11

मायके जाने का सुख

आप पढ़ना प्रारम्भ करें, उसके पहले ही मैं आपको पूर्वाग्रह से मुक्त कर देना चाहता हूँ। आप इसमें अपनी कथा ढूढ़ने का प्रयास न करें और मेरे सुखों की संवेदनाओं को पूर्ण रस लेकर पढ़ें। किसी भी प्रकार की परिस्थितिजन्य समानता संयोगमात्र ही है।

मायके जाना एक सामाजिक सत्य है और एक वर्ष में बार बार जाना उस सत्य की प्राण प्रतिष्ठा। पति महत्वपूर्ण है पर बिना मायके जाये सब अपूर्ण है। कहते हैं वियोगी श्रंगार रस, संयोगी श्रंगार रस से अधिक रसदायक होता है, बस इस सत्य को रह रह कर सिद्ध करने का प्रयास भर है, मायके जाना। कृष्ण के द्वारिका चले जाने का बदला सारी नारियाँ कलियुग में इस रूप में और इस मात्रा में लेंगी, यदि इसका जरा भी भान होता तो कृष्ण दयावश गोकुल में ही बस गये होते। अब जो बीत गयी, सो बीत गयी।

पुरुष हृदय कठोर होता है, नारी मन कोमल। यह सीधा सा तथ्य हमारे पूर्वज सोच लिये होते तो कभी भी उल्टे नियम नहीं बनाते और तब विवाह के पश्चात लड़के को लड़की के घर रहना पड़ता। तब मायके जाने की समस्या भी कम होती, वर्ष में बस एक बार जाने से काम चल जाता और बार बार नये बहाने बनाने में बुद्धि भी नहीं लगानी पड़ती। अपने घर में बिटिया को मान मिलता और दहेज की समस्या भी नहीं होती। लड़की को भी नये घर के सबके स्वादानुसार खाना बनाना न सीखना पड़ता। यदि खाना बनाना भी न आता तब भी कोई समस्या नहीं थी, माँ और बहनें तो होती ही सहयोग के लिये हैं। सास-बहू की खटपट के कितने ही दुखद अध्याय लिखे जाने से बच जाते। कोई बात नहीं, ऐतिहासिक भूलें कैसी भी हो, अब परम्परायें बन चुकी हैं, निर्वाह तो करना ही पड़ेगा।

विवाह करते समय यह आवश्यक है कि लड़की कोई न कोई पढ़ाई करती रहे, अपने मायके के विश्वविद्यालय में। इससे जब कभी भी मन हो, मायके आने की स्वतन्त्रता और अवसर मिलता रहेगा, पढ़ाई जैसा महत्वपूर्ण विषय जो है। विवाह के बाद मायके पक्ष के अन्य सम्बन्ध और प्रगाढ़ हो जाते हैं। चचेरे-ममेरे-मौसेरे रिश्तों की तीन-चार पर्तें जीवन्त हो जाती हैं, बिना उनके उत्सवों में जाये काम नहीं चलेगा, चाहे अन्नप्राशन ही क्यों न हो। विवाह आदि महत उत्सवों के चारों अवसरों पर जाना बनता है, कहीं बुरा मान गये तो।
  
बच्चे आदि होने के बाद, उनके पालन सम्बन्धी विषयों पर विशेष सलाह लेने का क्रम मायके जाने का योग बनाता रहता है। दो बच्चों में लगभग 7 वर्ष इस प्रकार निकल जाते हैं। अब इतनी बार आने जाने में बच्चों को भी नानी का घर सुहाने लगता है, मान लिया आपकी तो इच्छा नहीं है पर बच्चों का क्या करें, उनके लिये ही चले जाते हैं।

इस दौड़ धूप से थोड़ी बहुत स्थिरता यदि मिल पाती है तो उसमें विद्यालयों के अनुशासन का विशेष योगदान है। यदि उपस्थिति का इतना महत्व न दिया जाता तो मायके में एक ट्यूटर रख बच्चों की पढ़ाई की भरपाई तो की ही जा सकती थी। छुट्टियाँ होने के तीन दिन पहले से ही पैकिंग प्रारम्भ हो जाती है जिससे कि बिना समय व्यर्थ किये हुये प्रस्थान किया जा सके और अधिकतम समय ननिहाल में मिल सके बच्चों को।

मायके के संदर्भों में बुद्धि को कल्पना के विस्तृत आयाम मिल ही जाते हैं, जहाँ चाह, वहाँ राह। श्रीमतीजी की बुद्धि का विकास और पति की तपस्या, यह दो सुदृढ़ पहलू हैं, मायकेगमन के।

पहले दिन से ही भटकन, सब प्रकार की। क्या कहाँ रख कर चली गयी हैं? इसी बहाने मोबाइल पर कई बार बात होने से संवाद जैसी स्थिति बनी रहती है और यह संदेश भी जाता है कि बिना आपके जीवन कितना कठिन है। सतीश पंचम जी की खाना बनाने की व्यथा और होटलों में जाकर खाने का क्रम, तपस्या को चिन्तनप्रधान बना देते हैं। पहले तो टेलीविजन देखने को ही नहीं मिलता था, अब यह समझ में नहीं आता है कि क्या देखें, क्या न देखें? सास-बहूनुमा कथा-भँवरों से बाहर भी टेलीविजन की सार्थकता है, केवल इसी समय समझा और देखा जा सकता है।

समय की उपलब्धता और निरीक्षणों की अधिकता में प्रशासनिक कार्य गति पकड़ लेता है, आत्मसंतुष्टि का एक और अध्याय। लम्बी यात्राओं में नये विचार और लेखन, फलस्वरूप यह पोस्ट।

पोस्ट की पूर्वतरंगों से करुणामयी हो, श्रीमतीजी 20 दिन के स्थान पर 15 दिनों में ही वापस आ गयी हैं, कल, वर्ष के अन्तिम क्षणों में। मायके जाने के सुख को पुनः एक बार विश्राम और अगले एक वर्ष तक मायके न जाने के वचन जैसी कुछ उद्घोषणा। "कोई मैके को दे दो संदेश, पिया का घर प्यारा लगे।" 

अब यह पोस्ट डालने की इच्छा तो नहीं रही पर जब लिख ही ली है तो सुख बाँट लेते हैं। 

29.12.10

तड़प, उत्साह, प्रश्न, निष्कर्ष और लेखन

यदि यह एक टिप्पणी नहीं आती तो संभवतः तड़प, उत्साह, परिपक्वता, प्रश्न और निष्कर्ष जैसे शब्द मुँह बाये न खड़े होते। साहित्य का विषय जब विषयों से परे जा इन शब्दों में ठिठक जाता है, रोचकता अपने चरम पर पहुँच जाती है। ऐसे में उस पर कुछ न कहना मानसिक प्रवाह की अवहेलना करना सा होता।

कप्पा अधिवेशन के तीसरे स्तम्भ का परिचय नहीं दे पाया था, भूल मेरी ही थी, शीर्षक की झनझनाहट उस भूल का कारण थी। कप्पा अधिवेशन का आयोजन अनिल महाजन जी के भारत आगमन के उपलक्ष्य में ही किया गया था। तीन उन्मत्त साहित्य प्रेमियों का यूँ मिल जाना एक सुयोग ही था। मैं जो अवलोकन न कर पाया, उस पर टिप्पणी कर पोस्ट को पूर्णता प्रदान करने की महत कृपा की है। अनिल महाजन जी भी मेरे वरिष्ठ रहे हैं। पहले वह टिप्पणी पढ़ लें।

पोस्ट जोरदार है। नीरज का यह परिचय, मेरे ख्याल से बहुत उपयुक्त है। उसकी तड़प, उत्साह, दोनों घुले मिले हैं। तड़प छेड़ो तो उत्साह भड़कता है। उत्साह कुरेदो तो अनुभव, तड़प निकल निकल आते हैं। साहित्यकार का इससे अच्छा परिचय, लक्षण क्या हो सकता है। नीरज को हिन्दी के झरोखे तक ले जाने के लिये धन्यवाद। इससे उपयुक्त क्या हो सकता था, मुझे भी नहीं मालूम। अब झक मारकर वे और लिखेंगे और हमें पढ़ने को मिलेगा अलग से।

बात आगे बढ़ाने की कोशिश करता हूँ। परिपक्व लेखन हम किसे माने? जो समाधान दे, निष्कर्ष दे या जो प्रश्नों को सचित्र सामने ला रखता जाये। जो समाधान, निष्कर्ष देगा, उसने तो सब समझ लिया। उसे सिर्फ यही लगेगा न, कि मुझसे मार्गदर्शन लो। प्रश्नों की उलझन, प्रक्रिया जो ऊर्जा, जो आनन्द देती है, वह समाधानों में नहीं। अज्ञेय, मुक्तिबोध में प्रश्नों की छटपटाहट दिखती है, चित्र दिखते हैं, राह दिखती है, पर अन्त नहीं, समाधान नहीं। पर, इसका अर्थ यह भी कतई नहीं कि साहित्य सिर्फ यथातथता है या फिर इतिवृत्तात्मक है। नहीं, मेरे जैसे पाठक यह भी नहीं मान पायेंगे। उनके लिये तो प्रश्नों के झगड़े ही लेखन है। जीवन का अनुभव सिर्फ प्रश्न है और उन प्रश्नों को उकेर कर सामने रख देना ही संभवतः लेखन है। परिपक्वता तो मानसिक कयास है। हाँ यदि, पाठक कितनी जल्दी से तदात्म्य बना ले, यह कसौटी है, तो बात अलग है, क्योंकि तब दुनिया का लिखा प्रत्येक वाक्य किसी न किसी को भाता जरूर है और अपने जीवन के धुँधले चित्र(विचारी या अविचारी) वहाँ उसे दिख जाते हैं। वह उसके लिये अपना बन जाता है, साहित्य बन जाता है। कितना परिपक्व, वह सुधीजन जाने, हम तो ठहरे निपठ।
इति
अनिल

ब्लॉग जगत में इस तड़प और उत्साह का मिश्रण देखने को तरसते रहते हैं हम। आकाशीय बिजलियों की भाँति चमक कर पुनः छिप जाते हैं बादल के पीछे अपने सुरक्षा कवचों में। कहीं कोई बखेड़ा न खड़ा कर दे हमारी स्पष्टवादिता।

साहित्य में प्रश्न उठें या उत्तर मिलें या हो कोई उपनिषदों जैसा प्रश्नोत्तरी स्वरूप, पूर्वपक्ष, प्रतिपक्ष और निष्कर्ष। जीवन भर प्यास जगाना या प्यासों को अमृत चखाना। हमें क्या अच्छा लगता है, वह प्रश्न जो हमारा चिन्तन प्रवाह बढ़ायें या वह निष्कर्ष जो सागर सी स्थिरता मन में लाये।

प्रश्न अनिल महाजन जी के हैं, चर्चा ब्लॉग पर है, संवाद का मूक दर्शक बन ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा में स्थित मैं, तड़प और उत्साह की साधना में रत।

25.12.10

कब लिखोगे ? मरने के बाद ?

यह झंकृत कर देने वाला शीर्षक न रखता, यदि सुना न होता। लिख कर रखा होगा किसी ने, बोलने के पहले, लिखने, न लिखने के बारे में यह उद्गार। बिना अनुभव यह संभवतः लिखा भी न गया होगा। आप पढ़कर व्यथित न हों, मैं सुनकर हो चुका हूँ, सब बताता हूँ।

अनेकों विचार हैं, अनुभवों के अम्बार हैं, प्रकरणों के आगार हैं आपके मन में। किसलिये? व्यक्त करने के लिये और व्यक्त करेंगे भी। पर क्या करें, समय नहीं है, घर-बार है, व्यापार है, दिनभर की नौकरी है, समस्याओं की गठरी है। सब निपटा लें, तब लिखेंगे। पर मान लीजिये, न लिख पाये तो? तब क्या करेंगे? गाना गायेंगे।

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, 
हमें जिस बोझ ने मारा, सम्हालो तुम, कि हम निकले।

यह सब मैं आपको पहले से इसलिये बताये दे रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि जब आप नीरज जी से मिलेंगे तो यही उत्तर देंगे। पहले तो आपका उत्तर सुनकर वह ठहाका मारकर हँसेंगे, आप भी गब्बरसिंह के सामने वाली कालिया की फँसी हुयी हँसी में मुस्कराने लगेंगे। तब सहसा आपके कानों में यह शीर्षक सुनायी देगा, व्यंगात्मक क्रूरता में। कब लिखोगे ? मरने के बाद ?

क्या करें, अभी तक कानों में झनझना रहा है, यह वाक्य। पता नहीं कितनों वर्षों की नींद से उठाकर खड़ा कर दिया हो, एक एक चिन्तन-तन्तु पूरी तरह झिंझोड़कर। जेपी नगर के कप्पा रेस्टॉरेन्ट में गले के अन्दर गयी और कप में रह गयी कॉफी की भी नींद उड़ गयी होगी, यह सुनकर।

विषय परिचय पहले हो गया, अब सूत्रधार के बारे में भी संक्षिप्त परिचय दे देता हूँ। मुझसे 8 वर्ष बड़े हैं, विद्यालय में, आई आई टी में मेरे वरिष्ठ रहे हैं, हिन्दी  व अंग्रेजी में एकरूप सिद्धहस्तता, पता नहीं कितना साहित्य डकार चुके हैं, अब निकालने की प्रक्रिया में हैं। एक पुस्तक लिख चुके हैं, शीर्षक है, "कुछ अलग : सब हैं खिसके, कुछ ज्यादा खिसके"। पता नहीं कितनी और पुस्तकें लिख डालेंगे, पता नहीं कितना और खिसका डालेंगे।

संदेश स्पष्ट है, पूरी तरह। जितना कुछ आपने सोच रखा है, उस पुस्तक की प्रस्तावना तो आज ही लिख दें, पर यह पोस्ट पढ़ने के बाद।

कप्पा अधिवेशन के तीन मुख्य बिन्दु इस प्रकार थे।

पहला, लिखना प्रारम्भ कर दीजिये, प्रवाह अपने आप बन जाता है। टूथपेस्ट बहुत दिन से उपयोग में न लायें तो वह भी कड़ा हो जाता है, साधारण दबाव में नहीं निकलता है, अधिक शक्ति लगानी पड़ेगी। विचार भी पड़े पड़े कड़े हो जाते हैं, प्रयास कर के निकालिये, लिखना प्रारम्भ करिये।

दूसरा, जीवन को फैलाते अवश्य रहें और आवश्यक भी है वह, सर्वार्जन के लिये, पर एक समय के बाद जीवन को समेटने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर देनी चाहिये, जीवन को सरल कर देना चाहिये। यही साहित्य में भी होता है, परिपक्व लेखन प्रश्न कम उठाता है, निष्कर्ष अधिक बताता है, जीवन के अनुभवों को निचोड़कर अभिव्यक्ति की तरलता में।

तीसरा, ज्ञान, दर्शन, तर्क, संदेश कितने भी भारी हों, पाठकों के हृदय में उतारे जा सकते हैं, मनोरंजन के माध्यम से। आपका कठिनतम ज्ञान भी सरलतम भाषा में पगा हो, मन का रंजन हो, मन को आकर्षित करने वाले तत्व हों। मनोरंजन को इस महत कार्य के माध्यम के रूप में प्रयोग करने के स्थान पर मनोरंजन की नग्नता परोसना, उस तरलता को व्यर्थ कर देने जैसा है।

तो आमन्त्रण है,
जिन्हें सत्संग का इच्छा है नीरज जी से,
कप्पा या कॉफी हॉउस में,
पर,
बिल आप भरेंगे,
हम साथ में रहेंगे,
बस ज्ञान प्राप्त करेंगे,
हमें भी कुछ पुस्तकें पूरी करनी हैं,
जीवन निकलने से पहले।

22.12.10

किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार

न जाने कितनी बार आपको ऐसा लगा होगा कि कोई ऐसा ही गीत है जो बस आपके लिये लिखा गया है। उन्मत्त सुख के अवसरों पर, विदारणीय दुख की घड़ियों में, आपके द्वारा सुने जा रहे गीत आपसे बातें करने लगते हैं। गीतों में निहित मूल भाव, उनके कारण और प्रभाव आपसे पहले का परिचय रखते हुये से दिखते हैं।

मुझे कई गीत बहुत भाते हैं, जब भी सुनता हूँ, साथ में गाने लगता हूँ, बहुधा परिवेश भूल जाता हूँ। पता नहीं कि शब्द अच्छे लगते हैं या भाव या संगीत या स्वयं का गाना। कभी कभी जब विचार भटकाने लगते हैं अन्धे कूप में तो वहाँ इन्हीं गीतों की प्रतिध्वनियाँ सुनायी पड़ने लगती हैं, मैं पुनः गुनगुनाने लगता हूँ और बाहर निकल आता हूँ अपनी भँवरों से। जब गाना बन्द करता हूँ तब सब समझ जाते हैं कि अब बात की जा सकती है श्रीमानजी से।

साहित्य की पवित्रता भंग न होने देने वालों के लिये फिल्मी गीतों को साहित्य न मानना एक हठ हो सकता है, पर पता नहीं क्यों भावों का गहरापन आपको इन गीतों के सतरंगी स्वरूप को स्वीकार करने को बाध्य कर देगा। ऐसा लगने लगेगा कि बिना अनुभव की तीक्ष्णता के ऐसे उद्गार निकलना असम्भव है। कल्पना की राह जहाँ समाप्त हो जाती है, वहाँ से प्रारम्भ होता होगा इन गीतों के सृजन का क्रम, अनुभव की तीक्ष्णता में। आपके सामने कईयों ऐसे गीत आ चुके होंगे जिनको बार बार आप याद करते होंगे गुनगुना कर, हर बार वही विशुद्ध भाव।

गीतों में पूरा का पूरा साहित्य बसा है, कवियों ने लिखा है, आप उन्हें मान्यता प्राप्त कवि न माने, न सही। सूर का सौन्दर्य, तुलसी की संवेदना, निराला की फक्कड़ी, दिनकर का ओज, पन्त की सुकुमारता, महादेवी की पीड़ा, नागार्जुन की बेबाकी भले ही उनकी साहित्यिक साधना में न हो, भले ही उनकी प्रतिभा धनोपार्जन और जीविकोपार्जन में तिक्त रही हो, भले ही गीतों के सीमित स्वरूप ने उनके भावों की जलधार को रूद्ध कर दिया हो, पर जो भी उनकी लेखनी से बहा है भावों का नीर बहाने के लिये पर्याप्त है।

फिल्मों की अपनी साहित्यिक सीमायें हैं। गीत व कहानी लेखन फिल्म के अंग अवश्य हैं पर संप्रेषण के एक मात्र आधार नहीं। व्यावसायिक कारणों से जनसाधारण के लिये बनायी गयी फिल्मों में आप भले ही सान्ध्र साहित्यिक अनुभव न पा पायें, पर गीतों के रूप में कवि बहुधा ही सुधीजनों को जीवन दर्शन के गहरे पाठ सुनाते आये हैं। उससे अधिक की आस करना, माध्यम की व्यावसायिक उपयोगिता को सीमाओं से अधिक खीचने जैसा हो संभवतः।

कभी मन में टीस तो अवश्य उठती होगी कि इतने सशक्त माध्यम का प्रयोग साहित्य संवर्धन के लिये उतना नहीं हो पा रहा है जितना मनोरंजन के लिये। हिन्दी की कई कविताओं को फिल्मों ने अपनाया है पर जिस स्तर के प्रयोग लोकसंगीत के लेकर हुये हैं फिल्मों में, हिन्दी की कवितायें उस अपनत्व से अछूती रही हैं अब तक। संभव है कि हिन्दी शब्दों की क्लिष्टता बाधक हो सकती है, पर साहित्य को जनप्रचार में भी अपनी धार बचा के तो रखनी ही है। संभव है कि फिल्मकारों को लगे कि यह गीत सब लोगों तक नहीं पहुँच पायेंगे, पर साहित्य का अमृत उस माध्यम को असाधारण अमरत्व भी दे जायेगा, व्यवसायिकता की राहों से परे।

आवश्यकता है तो जनमानस को समझने वाले एक प्रयोगधर्मी फिल्मकार की, साहित्य के अमृत को सरलता से शब्दों में ढाल कर पिलाने वाले कवि की, लोक संगीत के थापों में उस शब्द-संरचना को पिरोने वाले संगीतकार की और सबके अधरों पर उसे सजा देने वाले गायक की। आज भी चाहिये न जाने कितने राजकपूर, शैलेन्द्र, शंकर-जयकिशन और मुकेश।

फिल्मों के माध्यम से साहित्य संवर्धन का प्रवाह वही कालजयी गीत बहायेंगे।

"किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार" जैसा कोई गीत।

गाता हूँ, खो जाता हूँ, आप खोना चाहेंगे इसमें?

18.12.10

उफ, तेल का कुआँ न हुआ

कई बार घोर कर्मवादी मनुष्य भाग्य को किंचित भी श्रेय नहीं देते हैं, न किसी सुख के लिये और न किसी दुख के लिये भी। बहुत चाहा कि उनके पौरुषेय चिन्तन से प्रभावित होकर स्वयं को ही अपना स्वामी मान लें। दो तीन दिन तक तो कृत्रिम चिन्तन चढ़ा रहता हैं, पर असहायता की पहली ही बारिश में वह रंग उतर जाता है और तब स्वयं से अधिक भाग्य पर विश्वास होने लगता है।

कोई तो कारण रहा होगा कि हमारे पास तेल का कुआँ न हुआ, जन्म के समय एक तिकोनी चढ्ढी ही मिली पहनने को। जीवन के कितने मोड़ लाज छिपाते छिपाते पार किये। तेल का कुआँ होता तो, उफ, क्यों न हुआ तेल का कुआँ?

कुछ दिन पहले मॉल में घूमते हुये "सैमसंग गैलेक्सी टैब" पर दृष्टि गड़ी। 7 इंच स्क्रीन का टचपैड। मन बस वहीं पसर गया, पीछे खड़े व्यक्ति को लगभग आधे घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ी, उस पर हाथ चलाने के लिये। मोबाइल और लैपटॉप का संकर अवतार लग रहा था वह। मूल्य 37000 रु मात्र। पूरे जोड़ घटाने कर डाले, कि कहीं से कोई तो राह निकले, पर हर राह में दिख रहे थे श्रीमतीजी के आग्नेय नेत्र। आग्नेय नेत्रों को केवल स्वर्ण-आभूषणों से ही द्रवित किया जा सकता था। इस दुगने खर्च के विचार मात्र से आशाओं ने सर झुका लिया और आह निकली, उफ, तेल का कुआँ न हुआ।

कारों में रुचि नहीं है, नहीं तो यही आह बड़ी लम्बी होती और कुओँ की आवश्यकता बहुवचन में पहुँच जाती।

भारत में जन्म के लिये लाइसेन्स काटने के पहले भगवान को ज्ञात तो अवश्य होगा कि यह तड़पेगा बहुत। मन और मस्तिष्क तो बहुत तेज चलेंगे पर साथ देने के लिये कुछ और न रहेगा। थोड़े दिन बाद स्वतः ही सबसे हार मान जायेगा और भाग्य पर विश्वास करने लगेगा। मरने के पहले लोक, परलोक, सन्तोष की बड़ी बड़ी बातें करेगा पर अगले जन्म के लिये भारत देश नहीं, अरब देश का टिकट माँगेगा।

अब देखिये यहाँ पर कुछ सार्थक पाने में जीवन का तेल निकल आता हैं और हमारे अरबी बान्धव थोड़ा तेल निकाल निकाल कर जीवन भर सब कुछ पाते रहते हैं। हम लोग बरेली के बाज़ार में झुमका ढूढ़ने में एक पूरा गाना बना देते हैं और किसी शेख ने खालिस चाँदी की कार बनवायी है अपने बरेली के बाज़ार जाने के लिये। वहाँ जन्म लेने वालों के बच्चों के मन में परीक्षा का भूत कभी नहीं मँडराता होगा। एक तेल के कुआँ न होने से न जाने हमारे विद्यार्थियों को मन्दिरों में कितनी प्रार्थनायें और बजरंग बली को कितनी हनुमान चालीसा चढ़ानी पड़ती हैं। किसी को अरब में पैदा किया, हमें अरबों के बीच छोड़ दिया।

हमारे भी जलवे होते, क्या होता जो अधिक न पढ़ पाते। अधिक पढ़ लेने से बुद्धिभ्रम हो जाते हैं। तब एकांगी चाह रहती, जिस किसी की भी चाह रहती।

क्या भगवन, किसी को कुयेँ में तेल दिया, किसी को गाल में तिल दिया और हमें भाग्य में ताला। यह तो अन्याय हुआ प्रभु, अब तो ताली बजाना छोड़ भाग्य की ताली फेंक दो, सब ब्लॉगर बन्धु हँस रहे हैं।

चलिये आप सहमत नहीं हो रहे हैं तो मान लेते हैं कि भाग्य नहीं होता है।

पर उसे जो भी कह लें, होता बड़ा विचित्र है, उफ, तेल का कुआँ न हुआ।

15.12.10

गो गोवा

पर्यटन एक विशुद्ध मानसिक अनुभव है। मन में धारणा बन जाती है कि हमारे सुख की कोई न कोई कुंजी उस स्थान पर छिपी होगी जो वहाँ जाने से मिल जायेगी। अब तो घूमने जाना ही है, सब जाते हैं। अब अकेले जाकर क्या करेंगे, सपत्नीक जाना चाहिये। अभी बच्चे छोटे हैं, नैपकिन बदलने में ही पूरा समय चला जायेगा। अब बच्चों का विद्यालय छूट जायेगा, पढ़ाई कैसे छोड़ सकते हैं। अब छुट्टी के समय वहाँ बड़ी भीड़ हो जाती है, वह स्थान उतना आनन्ददायक नहीं रहता है। कुछ नहीं तो कार्यालय में कार्य निकल आता है। 

एक सहयोगी अधिकारी की विदेश यात्रा के कारण अतिरिक्त भार से लादे गये हम छुट्टी की माँग न कर पाये । बच्चों की छुट्टियाँ भी समाप्तप्राय थीं। "आपकी कैसी नौकरी है", यह सुनने का मन बना चुके थे, तभी ईश्वर कृपादृष्टि बरसा देते हैं और हम बच्चों का विद्यालय खुलने के मात्र चार दिन पहले स्वयं को गोवा जाने वाली ट्रेन में बैठा पाते हैं।

सीधी ट्रेन पहले निकल जाने के कारण हम पहले हुबली पहुँचे। वहाँ से गोवा के लिये जिस ट्रेन में बैठे, वह दिन में थी। पश्चिमी घाट को चीर कर निकलती ट्रेन, दोनों ओर बड़ी बड़ी पहाड़ियाँ, 37 किमी की दूरी में ही 1200 मीटर की ऊँचाई खोती पटरियाँ, बीच में दूधसागर का जलप्रपात, कई माह तक बादलों से आच्छादित रहने वाला कैसल रॉक का स्टेशन और हरी परत से लपेटा गया हमारी खिड़की का दृश्यपटल, सभी हमारी यात्रा को सफल बनाने के लिये ईश्वर के ही आदेशों का पालन कर रहे थे।

मानसून पूर्ण कर्तव्य निभा कर विदा ले चुका है। छुटपुट बादल अब अपना कार्य समेट कर पर्यटकों को आने का निमन्त्रण दे रहे हैं, सागर की शीतलता को छील कर उतार लाती पवन हल्की सिरहन ले आती है। पर्यटन की योजनायें बनने लगी हैं। मैं जितना अधिक घूमता हूँ, उतनी अधिक मेरी धारणा बल पा रही है कि हमारे बांग्लाभाषी मानुष ही सबसे उत्साही पर्यटक हैं। वैष्णोदेवी से लेकर कन्याकुमारी तक, जहाँ कहीं भी गया, सदैव ही उनको सपरिवार और सामूहिक घूमने में व्यस्त देखा।

सभी स्थानों को छूकर दौड़ने भागने से घूमने का आनन्द जाता रहता है अतः समय और रुचि लेकर ही स्थानों को देखा। पुराने चर्चों व संग्रहालयों में जाकर अपने पर्यटक धर्म का निर्वाह करने के बाद चार और कार्य किये। ये थे पैरासेलिंग, स्पीड बोटिंग, क्रूज़ और बिग फुट के दर्शन। पैरासेलिंग में बोट में लगी रस्सी के सहारे पैराशूट ऊपर उठता है, बहुत ही सधे हुये ढंग से, बिना झटके के। एक ऊँचाई पर पहुँच कर नीचे के दृश्य सम्मोहनकारी लगते हैं। सबको ही यह अनुभव लेने की सलाह है। स्पीड बोटिंग में लहरों के ऊपर से हवा में उठकर जब बोट पानी में सपाट गिरती है, मन धक्क से रह जाता है। समुद्र की सतह पर टकराने की ध्वनि इतनी कठोर होगी, यह नहीं सोचा था। क्रूज़ में गोवा की उत्श्रंखलता का चित्रण नृत्य व संगीत के माध्यम से हुआ। सूत्रधार ने चेताया कि बिना नाचे आपको क्रूज़ का आनन्द नहीं मिलेगा। हम सबने भी सूत्रधार को निराश नहीं किया। बिग फुट गोवा की संस्कृति, इतिहास व रहन सहन का सुन्दर प्रस्तुतीकरण है।

पाँच नगरीय आबादियों के अतिरिक्त पूरा गोवा प्रकृति की विस्तृत गोद में बच्चे जैसा खेलता हुआ लगता है । भगवान करे इस बच्चे को आधुनिकता की नज़र न लगे।

सुबह सुबह जल्दी उठकर 50 मीटर की दूरी पर स्थित कोल्वा बीच पर निकल जाते थे। विस्तार व एकान्त में लहरों की अठखेलियाँ हमें खेलने को आमन्त्रित करती थीं। हम लहरों से खेलने लगते, पर समय बीतते यह लगने लगता कि लहरें अभी भी उतनी ही उत्साहित हैं जितनी 2 घंटे पहले। गम्भीर सागर किनारों पर आकर पृथ्वी को छूने के लिये मगन हो नाचने लगता है। 26 बीचों में फैला गोवा का सौन्दर्य आपको आमन्त्रित कर रहा है।


अब सोचना कैसागो गोवा।

11.12.10

करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी

आओ तुम जीवन प्रांगण में,
छाओ बन आह्लाद हृदय में,
उत्सुक है मन, बाट जोहता,
नहीं अकेले जगत सोहता,
तृषा पूर्ण, हैं रिक्तिक यादें,
आशान्वित बस समय बिता दें,
टूटेगी सुनसान उदासी,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।1।

अलसायी, झपकी, नम पलकें,
प्रेमजनित मधु छल-छल छलके,
स्वप्नचित्त, अधसोयी, हँसती,
जाने किस आकर्षण-रस की,
स्रोत बनी, कर ओत-प्रोत मन,
शमन नहीं हो सकने का क्रम,
रह-रह फिर आत्मा अकुलाती,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।2।

कोमल, कमल सरीखी आँखें,
प्रेम-पंक, उतराते जाते,
आश्रय बिन आधार अवस्थित,
मूक बने खिंचते, आकर्षित,
कहाँ दृष्टि-संचार समझते,
नैन क्षितिजवत तकते-तकते,
जाने कितनी रैन बिता दी,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।3।

सुप्तप्राय मन, व्यथा विरह की,
किन्तु लगा मैं अनायास ही,
आमन्त्रित यादों में रमने,
स्वप्नों के महके उपवन में,
आँखों में आकर्ष भरे तुम,
यौवन चंचल रूप धरे तुम,
बाँह पसारे पास बुलाती,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।4।

प्रात, निशा सब शान्त खड़े हैं,
आशाओं में बीत गये हैं,
देखो जीवन के कितने दिन,
मेघ नहीं क्यों बरसे रिमझिम,
आगन्तुक बनसुख सावन में,
इस याचक का मान बढ़ाने,
आती तुम, अमृत बरसाती,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।5।


विवाह निश्चित होने के कुछ दिनों बाद ही यह कविता फूटी थी और अभी भी अधरों पर आ जाती है, गुनगुनाती हुयी, स्मृतियाँ लिये हुये। हाँ, आज विवाह को 12 वर्ष भी हो गये।

8.12.10

इस्मत आपा के नाम

मेरी दादी मुझे स्वर्ग में मिली थी, मेरे जन्म लेने के पहले, प्यारी सी, दुग्ध धवल, प्रेममयी, बिल्कुल वैसी ही जैसी अभी भी पिताजी की कोमल स्मृतियों में आती हैं, बिल्कुल वैसी ही जैसी पिताजी बताते बताते सब भूल जाते हैं। दादी के पास मेरे हिस्से की जितनी भी कहानियाँ थीं, पिताजी ही सुन चुके थे अपने बचपन में। गर्मियों में छत में सोने के पहले, तारों को निहारते निहारते, कभी कभी पिताजी उन्ही कहानियों के एकान्त जंगल में ले जाते थे, मैं चलता जाता सप्रयास ऊँगली पकड़े, मन में उत्सुकता, बस एक क्षण का विराम-प्रश्न 'फिर क्या हुआ', पुनः पगडंडियाँ, अन्ततः स्वप्न-उपवन में जाकर समाप्त होती थीं सारी की सारी यात्रायें। अब मैं पिता होकर भी कहानी नहीं सुना पाता हूँ बच्चों को, बिस्तर पर लेटते ही नींद पहले मुझे घेर लेती है। एक ऋण सा चिपका हुआ है यह भाव।

कहानी सुनाना एक कला है, अभिनय है, शब्दों को आरोह-अवरोह में उतराने का रोमांच है, सहसा रुककर गति पकड़ लेने की नाटकीयता है, सुनने वाले को निहित भावों के प्रवाह में मुग्ध कर बहा ले जाने का उपक्रम है, ज्ञान है, अनुभव है, संतुष्टि है। बच्चों को नित्य एक कहानी सुनाने के इतने लाभ।

यह सब कुछ याद नहीं आता, यदि "इस्मत आपा के नाम" नहीं देखा होता। प्रस्तावना में नसीरुद्दीन शाह ने जब बताया कि आपको आज बस तीन कहानी सुनायी जायेंगी, इस्मत चुगताई की, वैसी ही जैसी लेखिका ने लिखी, बिना किसी नाटकीय रूपान्तरण के, एक बार में एक ही कलाकार के द्वारा और बिल्कुल वैसे ही जैसे आपकी दादी माँ सुनाती थीं। रंगमंच में यह विधा एक नया प्रयोग है, दायित्व गुरुतर हो जाता है तब कलाकार पर, अपने दर्शकों को बच्चों की तरह बाँधे रहने का। दादी माँ की जगह लेने के लिये, पता नहीं कितना वैचारिक संक्रमण किया गया होगा, संप्रेषण में।


पहली कहानी "छुईमई" हीबा शाह ने, दूसरी कहानी "मुगल बच्चे" रत्ना पाठक शाह ने और तीसरी कहानी "घरवाली" स्वयं नसीरुद्दीन शाह ने सुनायी। कुल 80 मिनट तक बिना पलकें झपकाये हजारों दर्शकगण कहानी सुनते रहे, सारी संचित ऊर्जा अन्ततः तालियों की अनवरत गड़गड़ाहट में व्यक्त हुयी।
    
नसीरुद्दीन शाह जैसे रंगमच के सिद्धहस्त कलाकारों के लिये हर शब्द जैसे अपने आप में अभिनय की अभिव्यक्ति है। व्यावसायिक सिनेमा से कहीं दूर, अभिनय की उपासना में रत इस परिवार के लिये भारतीय लेखकों की साहित्यिक क्षमता और संप्रेषणीयता को सबके सम्मुख लाना एक हठ है, भारतीयता के सशक्त पक्षों को उजागर करने का। उस यज्ञ की इन तीन आहुतियों की सुगन्ध अभी भी मन में बसी हुयी है।

इस्मत चुगताई (1915-1991) संभवतः भारत की सर्वाधिक दिलेर लेखिका रही हैं। विवादों ने उन्हें जी भर कर घेरा, उन पर फूहड़ लिखने का मुकदमा चलाया गया, मुस्लिम समाज के सत्यों को बेढंगे ढंग से उछालने का आरोप लगाया गया, पर निर्भीकता से जीवनपर्यन्त अपना लेखन जारी रख उन्होने भारतीय समाज के उस उदार पक्ष को सत्यापित और स्थापित कर दिया जहाँ पर एक महिला को भी सत्य कहने की छूट मिलती है। अन्य कहानियाँ भी पढ़ी हैं मैंने, मानवीय दृष्टिकोण को थोड़ी उदारता दी जाये तो ऐसा कुछ भी नहीं है उन कहानियों में जो कि निन्दनीय हो या फूहड़ता की संज्ञा लिये हो।

कहानी बनाना सरलतम है, हम सभी बनाते रहते हैं। कहानी लिखना कठिन है, सामाजिक और मानसिक पक्षों की समझ आनी चाहिये उसके लिये। कहानी सुनाना तो भावों की प्रवाहमयी गंगा बहाना है।

दादी, सुन रही हो ना।

4.12.10

7 लेखक, 36 पुस्तकें, एक सूत्र

एक लेखक की कई पुस्तकें एक सूत्रीय विचारधारा व्यक्त करती हुयी लग सकती हैं। दो लेखकों की पुस्तकों में भी कुछ न कुछ साम्य निकल ही आता है, तीन लेखकों में यही समानता उत्तरोत्तर कम होती जाती है, पर जब लगातार 7 लेखकों की लगभग 36 पुस्तकों में एक ही सिद्धान्त रह रह कर उभरे तब सन्देह होने लगता है, ईश्वर की योजना पर। वही प्रारूप, वही योजना, वही सन्देश, कहाँ ले जाने का षड़यन्त्र रच रहे हो, हे प्रभु। मान लिया कि पढ़ने में रुचि है, पर उसका यह अर्थ तो नहीं कि अब पुस्तकों के माध्यम से वही बात बार बार संप्रेषित करते रहोगे !

मेरे जीवन की जिज्ञासा आपकी भी बनकर न रह जाये अतः पहले ही आगाह कर देना चाहता हूँ इस पोस्ट के माध्यम से। पहला तो यह कि कितनी भी रोचक हों, इनमें से किसी भी लेखक की सारी पुस्तकें न पढ़ें, यह लेखक के विचारों को आपके मन में सान्ध्र नहीं होने देगा। दूसरा यह कि इन 7 लेखकों में से किन्ही दो या तीन लेखकों को न पढ़ें, यह उस विचार को आपके मन में धधकने से बचा लेगा। पिछले तीन वर्षों में 36 पुस्तकें पढ़, हम यह दोनों भूल कर बैठे हैं, आप न करें अतः शीघ्रातिशीघ्र आगाह कर अपनी आत्मीयता प्रदर्शित कर रहे हैं।

सर्वप्रथम तो सन्दर्भार्थ उन पुस्तकों का विवरण यहाँ पर दे रहा हूँ।
लेखक
पुस्तकें
रॉबिन शर्मा
'द मोन्क व्हू सोल्ड हिज़ फेरारी' से 'द ग्रेटनेस गाइड' तक 9 पुस्तकें
मार्शल गोल्ड स्मिथ
मोज़ो
रहोन्डा बर्न
सीक्रेट
पॉलो कोल्हो
'द एलकेमिस्ट' से 'विनर स्टैंड एलोन' तक 14 पुस्तकें
जेम्स रेडफील्ड
'द सेलेस्टाइन प्रोफेसी' से 'द सीक्रेट ऑफ सम्भाला' तक 4 पुस्तकें
ब्रायन वीज़
'मैनी लाइफ, मैनी मास्टर्स' से 'मेडीटेशन' तक 6 पुस्तकें
वेद व्यास
श्रीमद भगवतगीता

भगवतगीता को छोड़कर सारी पुस्तकें अंग्रेजी में पढ़ीं, अंग्रेजी सीखने में हुये कष्ट का मूल्य अधिभार सहित वसूल जो करना है। साथ ही सारी पुस्तकें मेरे शुभचिन्तकों द्वारा भिन्न भिन्न कालखण्डों में सुझायी गयीं। पढ़ना जिस क्रम में हुआ, उस क्रम में लेखकों को न रख विचार सूत्र के क्रम में व्यवस्थित किया है। सभी पुस्तकें अपने प्रस्तुत पक्ष में पूर्ण हैं और चिन्तन की जो भावी राहें खोल जाती हैं, उसे आगे ले जाने का कार्य अन्य पुस्तकें करती हैं। सभी पुस्तकों का विवरण एक साथ देने का उद्देश्य उस विचार सूत्र को उद्घाटित करना है जो उसे तार्किकता के निष्कर्ष तक ले जाने में सक्षम है। सार यह है।

वैचारिक विश्व भौतिक विश्व से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि आपकी वैचारिक प्रक्रिया भौतिक जगत बदल देने की क्षमता रखती है। वैचारिक दृढ़निश्चय से आप कुछ भी कर सकने में सक्षम हैं। अतः आपकी मनःस्थिति का उपयोग परिवेश में उत्साह और प्रसन्नता भरने के लिये किया जाना चाहिये, इसके निष्कर्ष आश्चर्यजनक होते हैं। विचारों का एक अपना जगत है, आप जो सोचते हैं वह विचारजगत से अपने जैसे अन्य विचारों को आकर्षित कर लेता है जिससे उस विषय में आपके विचार प्रवाह को बल मिलता है। नकारात्मक विचार अपने जैसा प्रभाव आकर्षित करते हैं। आप यदि भयग्रस्त हैं तो आपके विरोधी को उस विचार से मानसिक बल मिलेगा आपको और सताने का, आपकी आशंकायें इसी कारण से सच होने लगती हैं। नकारात्मक विचारों को सकारात्मकता से पाट दें। आपका दृढ़निश्चय जितना घनीभूत होता जाता है, परिस्थितियाँ उतनी ही अनुकूल होती जाती हैं, कई बार तो आपको विश्वास ही नहीं होता कि सारा विश्व आपके विचारानुसार कार्यप्रवृत्त है। आपका जीवन, आपका विश्व आपके विचारों से ही निर्धारित है, सृजनात्मक शक्तियाँ प्रचुर मात्रा में अपना आशीर्वाद लुटाने को व्यग्र हैं। मृत्यु के समय की यह विचार स्थिति आपका अगला जीवन, आपका परिवेश और यहाँ तक कि आपके सम्बन्धियों का भी निर्धारण करती है। आप माने न माने, आप जिनसे अत्यधिक प्रेम करते हैं या अत्यधिक घृणा करते हैं, वह आपके अगले जीवन में आपके संग उपस्थित रहने वाले हैं। आपके जीवन की अनुत्तरित विशेष घटनायें आपके आगामी जीवन में कुछ न कुछ प्रभाव लिये उपस्थित रहती हैं। अतः विचारों को महत्तम मानें और पूरा ध्यान रखें उनकी गुणवत्ता पर।

इतनी पुस्तकों को कुछ शब्दों में व्यक्त करना कठिन है, पर भारतीय दर्शन के वेत्ताओं को यह विचार सूत्र बहुत ही जाना पहचाना लगता है। भगवतगीता को घर की मुर्गी दाल बराबर समझने की मानसिकता उस समय वाष्पित हो जायेगी जब शेष 35 पुस्तकों के निष्कर्ष आपको भगवतगीता पुनः समझने को उत्प्रेरित करेंगे। इन पुस्तकों को पढ़ने का श्रेष्ठतम लाभ भगवतगीता में मेरी आस्था का पुनः दृढ़ होना है।

आपको पुनः चेतावनी दे रहा हूँ, एक तो इतना व्यस्त रहें कि पुस्तकों की दुकान जाने का समय न मिले। यदि मिले भी तो आप याद कर के इन पुस्तकों को न खरीदे। यदि लोभ संवरण न कर पायें तो घर में लाकर बस सजाने के लिये रख दीजिये। अन्ततः इतने भौतिक प्रपंच पल्लवित कर लीजिये कि पढ़ने का समय न मिले। फिर भी यदि आप नहीं माने और पढ़ ही लिया तो आपके अन्दर आये परिवर्तन का दोष मुझे मत दीजियेगा क्योंकि वह विचार भौतिक जगत से अधिक ठोस होगा।

(निशान्त के द्वारा अंग्रेजी के कई श्रेष्ठ विचारों को हिन्दी में अनुवाद कर प्रस्तुत करने का एक महत कार्य हो रहा है, उन जैसे अन्य प्रयासों को समर्पित है यह पोस्ट।)