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21.6.15

आँखों की भाषा

कितने स्वप्न सँजों रखे हैं,
कब से सोयी है अभिलाषा,
चुपके चुपके कह जाती है,
आँखों से आँखों की भाषा । १।

ज्ञात नहीं मैं कहाँ खड़ा हूँ,
आकर्षण का घना कुहासा,
मन्त्रमुग्ध पर खींच रही है,
आँखों से आँखों की भाषा । २।

जाने कब से आस लगाये,
आँखें तकता है मन प्यासा,
फिर भी प्यास बढ़ा जाती है,
आँखों से आँखों की भाषा । ३।

तुम पर निर्भर स्वप्न सलोने,
तुम पर निर्भर सारी आशा,
कब देगी पहला आमन्त्रण,
आँखों से आँखों की भाषा । ४।

20.12.14

आँख-मिचौनी

फिर आँखों को यूँ फिरा लिया, क्यों आँख-मिचौनी करती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।

भाव पुरातन, शब्द नये हैं, कैसे मन की बात उजागर,
कठिन बहुत भावों की भाषा, शब्द अशक्त रहे जीवन भर ।
आँखों की भाषा मौन बहे, कितने आमन्त्रण कहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।१।।

लज्जा बनकर दीवार खड़ी, तुम सहज और उद्वेलित हम,
कुछ बोलो यदि, जग जानेगा, कैसे वाणी का आलम्बन ।
झपकी, सकुचाती आँखों से, पर प्रणय-प्रश्न बन बहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।२।।

हो सकता आँखें पूछें मैं, कब तक रह सकती एकाकी,
कब तक एकाकी ढोऊँगी, घनघोर व्यथायें जीवन की ।
आँखों से जी भर बात करो, एकान्त कहाँ तुम रहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।३।।

मन प्रेम बसा या मंथन हो, या फिर भटकाता चिंतन हो,
अब आँख मिचौनी छोड़ो भी, क्यों खींच रही हो जीवन को ।
जो छिपा हृदय में बतला दो, क्यों मन उत्कण्ठा सहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।४।।

निःशब्द भाव की कविता हो तू सूर्य रश्मि हो, सविता हो 
जीवन में ऊष्मा भरती हो, कलकल छलछल सी सरिता हो 
मेरे जीवन के शोणित पर शीतल समीर सी बहती हो 
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।५।।

* सिद्धार्थ जी द्वारा समर्पित

29.11.14

आँखों के अभिवादन

लाख चाहकर, बात हृदय की, कहने से हम रह जाते है 
तेरी आँखों के अभिवादन, बात हजारों कह जाते हैं ।।

बहुत चित्रकारों ने सोचा, सुन्दर तेरे चित्र बनाये ,
तेरी आँखों की चंचलता, रंगों से लाकर छिटकायें ।
किन्तु कहाँ, कब रंग मिले थे,
कहीं सभी भंडार छिपे थे,
आवश्यक वे रंग तुम्हारी आँखों में पाये जाते हैं ।
तेरी आँखों के अभिवादन, बात हजारों कह जाते हैं ।।

बहा चलूँ निश्चिन्त, अशंकित, नयनों की सौन्दर्य-धार में,
आकर्षण के द्यूत क्षेत्र में, निज जीवन को सहज हार मैं ।
आशायें टिकती हैं आकर,
आँखें तेरी खुली रहें पर,
सारे जो आधार, तुम्हारे बन्द नयन में छिप जाते हैं ।
तेरी आँखों के अभिवादन, बात हजारों कह जाते हैं ।।