15.10.14

चला हूँ देर तक

चला हूँ देर तक, यादें बहुत सी छोड़ आया हूँ 
अनेकों बन्धनों को, राह ही में तोड़ आया हूँ ।। १।।

लगा था, साथ कोई चल रहा है, प्रेम में पाशित ।
अहं की भावना से दूर कोई सहज अनुरागित ।। २।।

लगा था, साथ तेरे जीवनी यूँ बीत जायेगी ।
मदों में तिक्त आशा, मधुर सा संगीत गायेगी ।। ३।।

लगा था, जब कभी भी दुख निमग्ना ज्वार आयेगें ।
तुम्हारे प्यार के अनुभाव सारे उमड़ जायेगें ।। ४।।

लगा था, राह लम्बी, यदि कभी सोना मैं चाहूँगा ।
कहीं निश्चिन्त मैं, तेरी सलोनी गोद पाऊँगा ।। ५।।

अकेला चल रहा था और सक्षम भी था चलने को ।
लगा कुछ और आवश्यक, अभी हृद पूर्ण करने को ।। ६।।

हुआ पर व्यर्थ का आश्रित, व्यर्थ मैं लड़खड़ाया हूँ ।
चला हूँ देर तक, यादें बहुत सी छोड़ आया हूँ ।। ७।।

11.10.14

स्वप्न-सुन्दरी

खड़ी कहीं पर दूर, कल्पना के अनन्त विस्तारों में,
सुख मदिरा में चूर, नियन्त्रित नहीं मनस उद्गारों में,
यौवन से भरपूर , सिमटती नहीं शब्द आकारों में,
स्वप्नकक्ष की अनघ सुन्दरी, जाने कब से बुला रही है ।

पर हूँ मैं असमर्थ मधुरते,
स्वप्नों के सेवक हैं हम सब,
स्वप्नों के महलों में जाकर,
साधिकार नहीं रह सकते ।

हाँ जब वह दिन आयेगा,
स्वप्न रहेंगे शेष नहीं तब,
स्वप्न-भार से मुक्त व्यक्ति,
तब तेरे ही द्वारे आयेगा ।

8.10.14

झूला बन क्यों झूम रहा हूँ

झूला बन क्यों झूम रहा हूँ 

नियत दिशा है, बढ़ते जाना,
ज्ञान-कोष का वृहद खजाना,
किन्तु हृदय की लोलुपता है,
मन में कुछ अनतृप्त व्यथा है ।
भटक रहा मैं, घूम रहा हूँ ।
झूला बनकर झूम रहा हूँ ।।१।।

विजय कहाँ की, उत्सव कैसे,
रुका यहाँ किस आकर्षण से ।
अहं आज क्यों शान्त नहीं है,
आवश्यकता , अन्त नहीं है ।
विजय तुच्छ क्यों चूम रहा हूँ,
झूला बनकर झूम रहा हूँ ।।२।।

ज्ञात नहीं कब तक झूमूँगा,
पद्धति यह कैसे भूलूँगा  ।
सच पूछो तो याद नहीं है,
कब से ऐसे झूम रहा हूँ ।।३।।

4.10.14

समय

मैं टूट रहा प्रतिपल, प्रतिक्षण, वह भाग रहा अपनी गति से,
मैं खड़ा हुआ संवेदित मन, वह टले नहीं निज नियमों से ।
मैं छूट गया इस जीवन में, वह ‘अथक’ निकलता चला गया,
जीवन के सुन्दर स्वप्नों को, वह ‘समय’ रौंदता चला गया ।।१।।

ना ही जाने का स्वर-निनाद, ना ही आने की शहनाई,
है नहीं समय का जन्म कभी, ना बालकपन, ना तरुणाई ।
वह सर्वव्याप्त, वह शान्त सदा, है मन्द अचर गति पायी,
है वही नियामक जीवन का, सब सृष्टि उसी से चल पायी ।।२।।
 
श्रम-बिन्दु समय की बेदी पर, हैं जीवन-पथ में सुधाधार,
प्रत्येक कदम कर निर्धारित, हे मानव, तो है सुख अपार ।
यदि शेष बचे इस जीवन का, हो जाये हर पल श्वेत-धवल,
वह क्षमाशील कर देगा तुझको हर बाधा के सेतु पार ।।३।।

1.10.14

मनस अब स्थिर होता है

हमारे जीवन का बिखराव,
दिखाता हमें अनेकों राह 
छीनता जीवन का सारल्य,
दिलाकर अन्धकार का स्याह ।।१।।

टूटती है विकल्प की प्यास,
मनस अब स्थिर होता है 
व्यर्थ कुछ दिखते नहीं प्रयास,
मनस अब स्थिर होता है ।।२।।

27.9.14

शान्ति प्रतीक्षित

स्थिरता तो प्राप्य नहीं अब,
मन अशान्ति को स्वतः सुलभ है ।
धरो हाथ पर हाथ नहीं अब,
शान्ति प्रयत्नों का प्रतिफल है ।।१।।

थोड़ी ऊर्जा यदि रहती है,
हलचल का विस्तार बढ़ाती ।
पर स्थिरता, जो अभीप्सित,
क्यों आने में समय लगाती ।।२।।

रहता चिन्तित मैं जीवन का,
यह सीधा सा प्रश्न कठिन है ।
पर विचित्र लगती है दुनिया,
जो अशान्ति के सम्मुख नत है ।।३।।

अब समाज उस राह चला है,
मन उलझा है, स्याह घना है ।
शान्त जनों को पर समाज यह,
रसविहीन, विपरीत बना है ।।४।।

ज्ञान सदा ही शान्त, व्यवस्थित,
जो हलचल है सत्य नहीं है ।
पर झूठे सिद्धान्त विचरते,
दूषित हो मन-वायु बही है ।।५।।

पर समाज का यह प्रपंच औ’,
नियमों का भीषण आडम्बर ।
शान्ति,मुक्ति कैसे मिल जाये,
कैसे विजय मिलेगी मन पर ।।६।।

बाहर लहरें, भीषण दर्शन,
अन्तः सागर का स्थिर पर ।
मन में हाहाकार भयंकर,
रहते क्यों पर कर्म-शून्य नर ।।७।।

कब तक जीवन, उल्टी धारा,
बहता जाये मूक, अलक्षित ।
मुक्त दिशायें, पथ पाने को,
क्यों प्रयास रह जायें सीमित ।।८।।

तर्क यही मन में आते हैें,
फिर भी जाने क्यों लगता है ।
शान्ति स्वप्न में पाकर भी मन,
कोलाहल में क्यों जगता है ।।९।।

शान्ति, मुक्ति सब श्वेत कथन से,
लगते चिन्तन में, जीवन में ।
किन्तु प्रयत्नों से पाना है,
कर प्रहार मन के शासन में ।।१०।।

24.9.14

कह जाने दो

मन में दुख का भार उठाये,
अपने बिम्बों में सकुचाये,
भीगी पलकों में आँखों की,
मन के गहरे भाव छिपाये,
कब तक अँसुअन को रोकोगे,
कब तक झूठे बहलाओगे,
कब तक धैर्य भरी मुस्कानें,
अपने अधरों पर लाओगे ?

अँसुअन को अब बह जाने दो,
कहते हैं जो, कह जाने दो ।

20.9.14

जीवन गाथा

उदित हुआ जीवन, नूतन मन
उद्वेगित, उत्साह भरा तन ।
भावनायें परिशुद्ध हृदय की,
आस भरी जीवन की गगरी ।।१।।

यात्रा बढ़ती, थी सुखद राह,
ऊर्जस्वित जीवन का प्रवाह ।
विस्तार सिमटते, पग बढ़ते,
मन-निश्चय हम पूरा करते ।।२।।

मदमाती वेला उत्सव की,
झूमे मन, देह, सफलता थी ।
रुक एक छाँह विश्राम करें,
फिर से मन में उत्साह भरें ।।३।।

आगामी आँधी का प्रवेग,
पर काल क्षितिज में छिपा एक ।
थी नहीं कोई चिन्ता दिखती,
निश्चिन्त आस मन में रहती ।।४।।

स्वप्नपूर्ण मन, सोये थे हम,
आयी आँधी, वेग प्रबलतम ।
राह लुप्त, राही सब भटके,
सकल ओर भीषणतम तम थे ।।५।।

जीवन का अस्तित्व कष्टमय,
स्थिर सब, बहता रहता भय ।
दिशा भ्रमित मन, लक्ष्य भूलता,
काल रुका स्तब्ध घूरता ।।६।।

बीती रात, संग दुख बीते,
हुआ प्रभात, सूर्य रण जीते ।
वेग शान्त होता मारुत का,
सकल दिख रही पूर्ण व्यवस्था ।।७।।

प्यास बुझाती बूँदें बरसीं,
मन की सब आशायें हरषीं ।
तब भूल सहज कल का प्रकरण,
कर लक्ष्य दिशा बढ़ गये चरण ।।८।।

17.9.14

आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ

नहीं और कुछ ज्ञात मुझे, पाता प्रियतम, सुध खोता हूँ 
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।

फूल सदृश लगते काँटे,
श्रृंगारित तुमको कर पाता ।
आँसू भी अमृत बन जाते,
तेरी पीड़ा यदि पी जाता ।
तेरा मन कूजे उत्श्रंखल, मैं व्यथा अनवरत ढोता हूँ ।
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।१।।

प्रेम नहीं व्यापार-जगत,
इसमें देना ही देना है ।
हृदय-तरी, प्रियतम शोभित,
फिर बड़े यत्न से खेना है ।
सींच रहा मन-भावों से, मैं बीज प्रेम के बोता हूँ ।
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।२।।

त्याग, समर्पण में जीवन,
थक सकता है, खो सकता है ।
प्रत्याशा या अभिलाषा,
मन अकुलाये, हो सकता है ।
हो न प्राप्त अधिकारों को, यह आशा हृदय सँजोता हूँ ।
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।३।।

13.9.14

हृदय को तुम भा रही हो

प्रणय की और प्रेरणा की
मूर्ति बनती जा रही हो ।
पंथ की छाया बनी हो,
हृदय को तुम भा रही हो ।।

कोई आकर पूछ ले परिचय तुम्हारा,
जीवनी में पिरोकर अस्तित्व सारा । 
प्रेम की अभिव्यक्ति को, तुम कर्म-सुर में गा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।१।।

ओट में मन-कल्पना की, और सिमटकर,
रही अब तक स्वप्न-महलों से निकल कर ।
पास आकर, स्वप्न-जल-तल में डुबोती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।२।।

बिसारे अस्तित्व का क्रन्दन भुलाने,
प्रेम-पूरित राग फिर से गुनगुनाने ।
प्रतीक्षित थी, आस-पूरित, जीवनी बन आ रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।३।।

छेड़ती उन्माद से मन की तहों को,
सरसता बिन बीत जाती जीवनी को ।
मधुर सी कविता बनाकर, बाँचती तुम जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।४।।

स्वार्थ-पूरित पंक और तुम कमल-दल सी,
खिल रही निश्चिन्त, जीवन में उमड़ती ।
मुस्कराती,प्रेम की, आकृति बनाती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।५।।

सहजता चहुँ ओर डूबी प्रचुर मद में,
आत्म-केन्द्रित जनों से परिपूर्ण जग में ।
अहम्‌ तजकर, प्रेम के, अनुरूप ढलती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।६।।

उमंगों से रिक्त, सूने उपवनों में,
चेतना यदि सुप्त, एकाकी क्षणों में ।
चहकती तुम, प्रेम-पोषित, हृदय को बहका रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।७।।

सोचता हूँ, और मेरा क्या अभीप्सित,
प्रश्न का विस्तार यदि होता असीमित ।
उत्तरों की डोर पकड़े, क्षितिज तक ले जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।८।।

दूत बनकर आयी कष्टों को मिटाने,
किन्तु उपजे विरह का संकट हटाने ।
अब सनातन-संगिनी बन, साथ चलती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।९।।

10.9.14

संबंधों के पथ

बड़े अजब संबंधों के पथ,
पल में गदगद, पल में लथपथ,
सारा तो संसार वही है,
दिन वैसा है, रात वही है,
धरती वैसी, वही नील नभ
वही रहे हम, बदले थे कब,
यह रहस्य पर समझ न आये,
कोई यह गुत्थी सुलझाये,
हम भी हतप्रभ, तुम भी हतप्रभ, 
मन ने चाहा, सुधर गया सब।

6.9.14

मातृत्व

मिलता रहता अन्न धरा से,
जल बन जीवन-अमृत बरसे,
फल बोझों से झुकते तरुवर,
प्राण-वायु और औषधि पाकर,
खातेपीते इस धरती परहम जीतेसुख से रहते हैं 
प्यार भरा वात्सल्य सततमातृत्व इसी को कहते हैं ।।१।।

नील-जलधि काबहती नद का,
ऊपर फैले विस्तृत नभ का,
रसरंगों से लदे हुये वन,
आश्रय धरतीआश्रित हैं हम,
हिम आच्छादित शैलमध्य मेंसुन्दर झरने बहते हैं 
छिटकाती सौन्दर्य पूर्णमातृत्व इसी को कहते हैं ।।२।।

प्राप्त तत्व सारे आवश्यक,
तनमन हित सौन्दर्य-प्रदायक,
माणिकमोतीसोनाचाँदी,
रत्नाभूषण ला दे जाती,
मन हुलसाती सोंधी माटीजीवन बन पुष्प महकते हैं 
लाकर देती श्रृंगार विविधमातृत्व इसी को कहते हैं ।।३।।

3.9.14

मर्यादा-पाश

मन मूर्छित, निष्प्राण सत्य है,
मर्यादा से बिंधा कथ्य है  ।
कह देता था, सहता हूँ अब,
तथ्यों की पीड़ा मर्मान्तक ।
आहत हृदय, व्यग्र चिन्तन-पथ,
दिशाशून्य हो गया सूर्य-रथ ।
क्यों जिजीविषा सुप्तप्राय है, मन-तरंग बाधित क्यों है ।
आग्रह है यदि सत्य-साधना, संशय प्रतिपादित क्यों है ।।१।।

जीवन-व्यवधानों में आकर,
प्राकृत अपना वेग भुलाकर,
क्यों उत्श्रृंखल जीवन-शैली,
सुविधा-मैदानों में फैली ।
समुचाती क्यों समुचित निष्ठा,
डर जाती क्यों आत्म-प्रतिष्ठा ।
दर्शनयुत सम्प्राण-चेतना, मर्यादा-शापित क्यों है ।
आग्रह है यदि सत्य-साधना, संशय प्रतिपादित क्यों है ।।२।।

कह जाते सारे शुभ-चिन्तक,
धैर्य धरो, हो शान्त पूर्ववत ।
समय अभी बन आँधी उड़ता,
पुनः सुखों की पूर्ण प्रचुरता ।
आगत आशा, व्यग्र हृदय, मन,
नीरवता में डूबा चेतन,
सुप्त नहीं हो सकता लेकिन जगना पीड़ासित क्यों है ।
आग्रह है यदि सत्य-साधना, संशय प्रतिपादित क्यों है ।।३।।

नहीं तथ्य लगता यह रुचिकर,
दुख आलोड़ित इन अधरों पर,
खिंच भी जाये यदि सुखरेखा,
सत्य रहे फिर भी अनदेखा ।
कृत्रिम व्यवस्था, सत्य वेदना,
किसके हित सारी संरचना ।
तम-शासित अनुचित तथ्यों में जीवन अनुशासित क्यों है ।
आग्रह है यदि सत्य-साधना, संशय प्रतिपादित क्यों है ।।४।।

दुख तो फिर भी रहा उपस्थित,
मन झेला पीड़ा संभावित ।
कह देता तो कुछ दुख घटता,
बन्द गुफा का प्रस्तर हटता ।
हो जाते बस कुछ जन आहत,
क्यों रहते पर पथ में बाधक ।
यथासत्य रोधित करने हित, मानव उत्साहित क्यों है ।
आग्रह है यदि सत्य-साधना, संशय प्रतिपादित क्यों है ।।५।।

जीवन स्थिर है नियम तले,
उस पर समाज-व्यवहार पले ।
एक वृहद भवन का ढाँचा सा,
पर अन्तर में सन्नाटा सा ।
हर रजनी दिन को खा जाती,
तम की कारा बढ़ती जाती ।
है सुख की चाह चिरन्तन यदि तो मन दुख से प्लावित क्यों है ।
आग्रह है यदि सत्य-साधना, संशय प्रतिपादित क्यों है ।।६।।

30.8.14

शुभकामनायें

तेरे पथ का हर एक चरण,
गुजरे मधुवन की गुञ्जन में ।
तेरे जीवन की लब्ध पंक्ति,
हरदम भीगी हो चन्दन में ।।१।।

नवहृदय कक्ष की हर धड़कन,
जीवन-सुर की झंकार बने ।
यश-दीप दिशाआें में तेरा,
सौन्दर्य युक्त श्रृंगार बने ।।२।।

लावण्य तुम्हारे जीवन के,
रस-रागों का उत्प्रेरक हो ।
भावों की यह तरल भूमि,
आकर्षण का आधार बने ।।३।।

27.8.14

कुछ हो वहाँ?

एक क्रम है, एक भ्रम है,
क्या पता, हम हैं कहां?
तरल सी पायी सरलता,
नियति बहते हम यहाँ।
प्रकृति कहती, मानते हैं,
परिधि अपनी जानते हैं,
लब्ध जितना, व्यक्त जितना
लुप्त उतना, त्यक्त उतना,
इसी क्रम में, इसी भ्रम में,
दृष्टि नभ, कुछ हो वहाँ?

23.8.14

जीतना अनिवार्य था

हृदय को यदि सालता हो रुक्ष सा व्यक्तिव मेरा,
आँख के उल्लास में यदि शुष्क आँसू दीखते हों,
जीवनी का वाद यदि अपवाद की संज्ञा लिये हो,
सत्य कहता मैं नहीं, वह भूत मेरा दृष्टिगत था ।

बना था निर्मोह, निर्मम, रौंदता आया अभी तक ।
क्रोध का आवेग उठता, यदि कहीं रोका गया पथ ।

सफलता की वेदना में, जूझता हर कार्य  था ।
आत्म की बोली लगी थी, जीतना अनिवार्य था ।

20.8.14

सूरज डूबा जाता है

अब जागा उत्साह हृदय में, रंग अब जीवन का भाता है,
पर सूरज क्यों आज समय से पहले डूबा जाता है ।

चढ़ा लड़कपन, खेल रहा था,
बचपन का उन्माद भरा था ।
मन, विवेक पर हावी होती,
नवयौवन की उत्श्रंखलता ।
बीत गया पर जीवन में, वह समय नहीं दोहराता है ।
देखो सूरज आज समय से पहले डूबा जाता है ।।१।।

प्रश्नोत्तर में बीता यौवन,
दर्शन, दिशा प्राप्त करके मन ।
अब अँगड़ाई लेकर जागा,
तोड़ निराशा के शत-बन्धन ।
लक्ष्य और मन जोड़ सके, वह शक्ति-सेतु ढह जाता है ।
देखो सूरज आज समय से पहले डूबा जाता है ।।२।।

जीवन पद्धतियों से लड़ने,
अपनी सीमाआें से बढ़ने ।
चलें कँटीली कुछ राहों पर,
निज भविष्य की गाथा गढ़ने ।
लगता क्यों अब जीवन मन का साथ नहीं दे पाता है ।
देखो सूरज आज समय से पहले डूबा जाता है ।।३।।