दस वर्ष का बच्चा अपनी माँ से कहे कि उसे तो बस चित्रकार ही बनना है, तो माँ को कुछ अटपटा सा लगेगा, सोचेगी कि डॉक्टर, इन्जीनियर, आईएएस बनने की चाह रखने वालों की दुनिया में उसका बच्चा अलबेला है, पर कोई बात नहीं, बड़े होते होते उसकी समझ विकसित हो जायेगी और वह भी कल्पना की दुनिया से मोहच्युत हो विकास के मानकों की अग्रिम पंक्ति में सम्मिलित हो जायेगा। इसी बात पर पिता के क्रोध करने पर यदि वह बच्चा सब सर झुकाये सुनता रहे और जाते जाते पिता की तनी भृकुटियों का चित्र बना माँ को पहचानने के लिये पकड़ा दे, तो माँ को बच्चे की इच्छा शक्ति बालहठ से कहीं अधिक लगेगी। वह तब अपने बच्चे का संभावित भविष्य एक चित्रकार के रूप सोचना प्रारम्भ तो कर देगी, पर वह चिन्तन संशयात्मक अधिक होगा, निश्चयात्मक कम। बच्चा और बड़ा होकर अपने निर्णय पर अटल रहते हुये एक महाविद्यालय के कला संभाग में पढ़ने लगे, पर एक वर्ष बाद ही जब उसके प्राध्यापक उसे बुलाकर समझायें कि कला तो उसमें जन्मजात है, अब उसे और कला सीखने की आवश्यकता नहीं है, यदि महाविद्यालय में शेष वर्षों का सदुपयोग करना है तो उसे जीविकोपार्जन के लिये विज्ञापन या फोटोग्राफी भी सीख लेनी चाहिये। तब कहीं उसकी माँ अपने बच्चे के भविष्य के प्रति आश्वस्त हुयी होगी और उसे यह विश्वास हो गया होगा कि उसका बच्चा जीवन निर्वाह सकुशल कर पायेगा।
माँ की चिन्ता तो यहीं समाप्त हो जाती है पर क्या आप उसके बाद के लगभग २० वर्षों को नहीं जानना चाहेंगे जो उस बच्चे के स्वप्न को पूर्ण रूप से साकार होने में लगे और जिसका जानना हर उस माँ के लिये आवश्यक है जिनके बच्चे की कला में बहुत अधिक रुचि है या जिनका बच्चा १० वर्ष की उम्र में ही चित्रकार बनने की भीष्म प्रतिज्ञा किये बैठा है। हम सबको ऐसे बाल-निश्चयों को गम्भीरता से लेना होगा क्योंकि स्वयं को दस वर्ष की छोटी अवस्था में समझ पाना और अपने बनाये सपने को जी पाना मन की जीवटता का अद्भुत निरूपण है।
जो अच्छा लगे वह कर पाना बहुत कठिन है। अपने जैसे बहुतों को जानता भी हूँ जो औरों से अपनी तुलना करते करते जीवन व्यर्थ कर डालते हैं और जब तक समझ में आता है तब तक बहुत देर हो जाती है, सपनों को साकार करने में। समाज जिसे महत्व देता है, वही लबादा ओढ़ लेते हैं हम लोग, दम घुट जाये किसे परवाह। जो हैं, वह बन कर जी पाना ही सर्वाधिक सुख देता है। वह सुख अनुभव तो नहीं किया जा सकता है पर सबके लिये अनुकरणीय बन जाता है। जीवटता की कठिन राह से निकल आने के बाद तो हम उनसे प्रभावित होते हैं पर उनको किन परिस्थितियों ने प्रभावित किया और किस प्रकार अनजाने और विशेष जीवन को जीते हुये उन्होने अपने सपनों को निभाया है, यह जानना भी आवश्यक है।
हाँ, इस परिप्रेक्ष्य में फिर आते हैं उस कहानी पर। चित्रकला नियमित रूप से जुड़ी रहती है उससे पर पढ़ाई करने के बाद पहली नौकरी एक बहुराष्ट्रीय विज्ञापन कम्पनी में करने जाता है वह। चित्रों में अपनी आशा स्थापित करने वाला बच्चा अपनी सृजनात्मकता कम्पनी के उत्पाद बिकवाने के लिये और आमजन के अन्दर उसकी आवश्यकता के सपने जगाने में लगाने लगता है। कला का उपयोग साबुन, कोला, तेल या चॉकलेट बेचने के लिये। मैं भले ही ऐसे विज्ञापनों का धुर विरोधी न हूँ पर दस वर्ष की अवस्था में जिस बच्चे ने ब्रश से अपनी कल्पना उकेरने का सपना पाला हो उसके लिये यह एक स्थायी निष्कर्ष नहीं हो सकता था, भले ही कितना पैसा उसे मिल रहा हो। लोग इसे प्रतिभा का व्यावसायिक उपयोग मान सकते हैं, पर मन की संतुष्टि के सम्मुख धन का क्या मोल? अन्ततः विज्ञापन के व्यूह से बाहर आ जाता है वह।
फोटोग्राफी में महारत और दूसरी कम्पनी में नौकरी, एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी से बड़ा कार्य मिलता है, भारत के बच्चों के बारे में फोटोग्राफ-श्रंखला बनाने का। जहाँ एक ओर हमारे नित के जीवन में एक ही जगह पड़े रहने से और कृत्रिमता ओढ़ लेने से संवेदना का अकाल पड़ जाता है, उसको ईश्वर प्रदत्त अवसर मिलता है, पूरा देश घूमने का और बच्चों के चेहरों में जीवन के भाव पढ़ने का। सड़कों में, गरीबी में, भूख में, उत्साह में, उन्माद में, खेल में, बालश्रम मे, शापित, शोषित, हर ओर बच्चों के भाव, संवेदनाओं की उर्वरा भूमि देखने का अवसर, देश के भविष्य को पढ़ने का अवसर। हर यात्रा में चित्रकला को संवेदना का ग्रास मिलने लगता है।
जीवन बढ़ता है, चित्रकला अधिक के लिये उकेरने लगती है, गौड़ से मूल स्थान पाना चाहती है जीवन में। धीरे धीरे सारी व्यस्ततायें चित्रकला के मौलिक व्यसन के लिये सिमटती जाती हैं। दिन में, रात में, भीड़ में, एकान्त में, हर समय कल्पनाओं के घुमड़ते बादल रंग और आकार में ढल जाना चाहते हैं। अपना सपना देखने के २५ वर्ष बाद उसे अपनी चित्रकला का एकान्त मिलता है, मन के बाँध अपने सारे द्वार खोल देने को तत्पर हैं, प्रवाह अनवरत बने रहना चाहता है।
माँ बेटे के सपने को वास्तविकता बनते हुये देखती है, विश्वास के साथ, अभिमान के साथ। इस चित्रकार की सफल कहानी उन माँओं को विचलित नहीं करेगी जिनके बच्चे ऐसी ही भीष्म प्रतिज्ञायें करने को तत्पर बैठे हैं।
(मेरे मित्र की जीवन कथा है यह, २५ वर्ष बाद हम मिले, मेरे हाथ में कलम उसके हाथ में ब्रश, मैं बद्ध वह निर्बन्ध, मैं अपने सपनों का सेवक वह अपने सपनों का राजा)