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5.6.21

दीखता स्पष्ट वह नर


(एक ऊँची अट्टालिका में रस्से से लटके और काँच पोंछते हुये श्रमिक पर)


दीखता स्पष्ट वह नर,

बादलों के बीच स्थिर,,

गगन पथ पर अग्रसर वह,

एक रस्से डटा टिककर।


आज नीचे दृष्टि जाकर,

दे रही आनन्द आकर,

सभी चींटी से खड़े है,

स्वप्नसम आकार पाकर।


स्वेद से माथा भिगोता,

कर्म में सब श्रम डुबोता,

देखता प्रतिबिम्ब में जब,

रूप अपना मुग्ध होता।


बादलों के लोक आकर,

आज उनसे शक्ति पाकर,

संग में तुम और हम भी,

दौड़ लेंगे जी लगाकर।


तनी जो अट्टालिकायें,

पद तले निर्मम दबायें,

नाप ली हमने सहज ही,

गर्व की सारी विमायें।


पोंछता है काँच दिनभर,

जा सके निर्बाध दिनकर,

शेष सब नेपथ्य छिपते,

दीखता स्पष्ट वह नर। 

1.11.14

स्वप्न सुनहला

स्वप्न सुनहला देखा मैंने,
सुन्दर चेहरा देखा मैंने ।
मन में संचित चित्रण को,
बन सत्य पिघलते देखा मैंने ।।१।।

आनन्दित जागृत आँखों में,
सुन्दर तेरा रूप सलोना ।
मन की गहरी पर्तों में,
निर्द्वन्द उभरते देखा मैंने ।।२।।

शब्द कभी भी नहीं मिलेंगे,
उपमाओं में नहीं समाना ।
आज कल्पना को फिर से,
हो विकल विचरते देखा मैंने ।।३।।

11.10.14

स्वप्न-सुन्दरी

खड़ी कहीं पर दूर, कल्पना के अनन्त विस्तारों में,
सुख मदिरा में चूर, नियन्त्रित नहीं मनस उद्गारों में,
यौवन से भरपूर , सिमटती नहीं शब्द आकारों में,
स्वप्नकक्ष की अनघ सुन्दरी, जाने कब से बुला रही है ।

पर हूँ मैं असमर्थ मधुरते,
स्वप्नों के सेवक हैं हम सब,
स्वप्नों के महलों में जाकर,
साधिकार नहीं रह सकते ।

हाँ जब वह दिन आयेगा,
स्वप्न रहेंगे शेष नहीं तब,
स्वप्न-भार से मुक्त व्यक्ति,
तब तेरे ही द्वारे आयेगा ।

4.1.12

एक चित्रकार की कहानी

दस वर्ष का बच्चा अपनी माँ से कहे कि उसे तो बस चित्रकार ही बनना है, तो माँ को कुछ अटपटा सा लगेगा, सोचेगी कि डॉक्टर, इन्जीनियर, आईएएस बनने की चाह रखने वालों की दुनिया में उसका बच्चा अलबेला है, पर कोई बात नहीं, बड़े होते होते उसकी समझ विकसित हो जायेगी और वह भी कल्पना की दुनिया से मोहच्युत हो विकास के मानकों की अग्रिम पंक्ति में सम्मिलित हो जायेगा। इसी बात पर पिता के क्रोध करने पर यदि वह बच्चा सब सर झुकाये सुनता रहे और जाते जाते पिता की तनी भृकुटियों का चित्र बना माँ को पहचानने के लिये पकड़ा दे, तो माँ को बच्चे की इच्छा शक्ति बालहठ से कहीं अधिक लगेगी। वह तब अपने बच्चे का संभावित भविष्य एक चित्रकार के रूप सोचना प्रारम्भ तो कर देगी, पर वह चिन्तन संशयात्मक अधिक होगा, निश्चयात्मक कम। बच्चा और बड़ा होकर अपने निर्णय पर अटल रहते हुये एक महाविद्यालय के कला संभाग में पढ़ने लगे, पर एक वर्ष बाद ही जब उसके प्राध्यापक उसे बुलाकर समझायें कि कला तो उसमें जन्मजात है, अब उसे और कला सीखने की आवश्यकता नहीं है, यदि महाविद्यालय में शेष वर्षों का सदुपयोग करना है तो उसे जीविकोपार्जन के लिये विज्ञापन या फोटोग्राफी भी सीख लेनी चाहिये। तब कहीं उसकी माँ अपने बच्चे के भविष्य के प्रति आश्वस्त हुयी होगी और उसे यह विश्वास हो गया होगा कि उसका बच्चा जीवन निर्वाह सकुशल कर पायेगा।

माँ की चिन्ता तो यहीं समाप्त हो जाती है पर क्या आप उसके बाद के लगभग २० वर्षों को नहीं जानना चाहेंगे जो उस बच्चे के स्वप्न को पूर्ण रूप से साकार होने में लगे और जिसका जानना हर उस माँ के लिये आवश्यक है जिनके बच्चे की कला में बहुत अधिक रुचि है या जिनका बच्चा १० वर्ष की उम्र में ही चित्रकार बनने की भीष्म प्रतिज्ञा किये बैठा है। हम सबको ऐसे बाल-निश्चयों को गम्भीरता से लेना होगा क्योंकि स्वयं को दस वर्ष की छोटी अवस्था में समझ पाना और अपने बनाये सपने को जी पाना मन की जीवटता का अद्भुत निरूपण है।

जो अच्छा लगे वह कर पाना बहुत कठिन है। अपने जैसे बहुतों को जानता भी हूँ जो औरों से अपनी तुलना करते करते जीवन व्यर्थ कर डालते हैं और जब तक समझ में आता है तब तक बहुत देर हो जाती है, सपनों को साकार करने में। समाज जिसे महत्व देता है, वही लबादा ओढ़ लेते हैं हम लोग, दम घुट जाये किसे परवाह। जो हैं, वह बन कर जी पाना ही सर्वाधिक सुख देता है। वह सुख अनुभव तो नहीं किया जा सकता है पर सबके लिये अनुकरणीय बन जाता है। जीवटता की कठिन राह से निकल आने के बाद तो हम उनसे प्रभावित होते हैं पर उनको किन परिस्थितियों ने प्रभावित किया और किस प्रकार अनजाने और विशेष जीवन को जीते हुये उन्होने अपने सपनों को निभाया है, यह जानना भी आवश्यक है।

हाँ, इस परिप्रेक्ष्य में फिर आते हैं उस कहानी पर। चित्रकला नियमित रूप से जुड़ी रहती है उससे पर पढ़ाई करने के बाद पहली नौकरी एक बहुराष्ट्रीय विज्ञापन कम्पनी में करने जाता है वह। चित्रों में अपनी आशा स्थापित करने वाला बच्चा अपनी सृजनात्मकता कम्पनी के उत्पाद बिकवाने के लिये और आमजन के अन्दर उसकी आवश्यकता के सपने जगाने में लगाने लगता है। कला का उपयोग साबुन, कोला, तेल या चॉकलेट बेचने के लिये। मैं भले ही ऐसे विज्ञापनों का धुर विरोधी न हूँ पर दस वर्ष की अवस्था में जिस बच्चे ने ब्रश से अपनी कल्पना उकेरने का सपना पाला हो उसके लिये यह एक स्थायी निष्कर्ष नहीं हो सकता था, भले ही कितना पैसा उसे मिल रहा हो। लोग इसे प्रतिभा का व्यावसायिक उपयोग मान सकते हैं, पर मन की संतुष्टि के सम्मुख धन का क्या मोल? अन्ततः विज्ञापन के व्यूह से बाहर आ जाता है वह।

फोटोग्राफी में महारत और दूसरी कम्पनी में नौकरी, एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी से बड़ा कार्य मिलता है, भारत के बच्चों के बारे में फोटोग्राफ-श्रंखला बनाने का। जहाँ एक ओर हमारे नित के जीवन में एक ही जगह पड़े रहने से और कृत्रिमता ओढ़ लेने से संवेदना का अकाल पड़ जाता है, उसको ईश्वर प्रदत्त अवसर मिलता है, पूरा देश घूमने का और बच्चों के चेहरों में जीवन के भाव पढ़ने का। सड़कों में, गरीबी में, भूख में, उत्साह में, उन्माद में, खेल में, बालश्रम मे, शापित, शोषित, हर ओर बच्चों के भाव, संवेदनाओं की उर्वरा भूमि देखने का अवसर, देश के भविष्य को पढ़ने का अवसर। हर यात्रा में चित्रकला को संवेदना का ग्रास मिलने लगता है।

जीवन बढ़ता है, चित्रकला अधिक के लिये उकेरने लगती है, गौड़ से मूल स्थान पाना चाहती है जीवन में। धीरे धीरे सारी व्यस्ततायें चित्रकला के मौलिक व्यसन के लिये सिमटती जाती हैं। दिन में, रात में, भीड़ में, एकान्त में, हर समय कल्पनाओं के घुमड़ते बादल रंग और आकार में ढल जाना चाहते हैं। अपना सपना देखने के २५ वर्ष बाद उसे अपनी चित्रकला का एकान्त मिलता है, मन के बाँध अपने सारे द्वार खोल देने को तत्पर हैं, प्रवाह अनवरत बने रहना चाहता है।

माँ बेटे के सपने को वास्तविकता बनते हुये देखती है, विश्वास के साथ, अभिमान के साथ। इस चित्रकार की सफल कहानी उन माँओं को विचलित नहीं करेगी जिनके बच्चे ऐसी ही भीष्म प्रतिज्ञायें करने को तत्पर बैठे हैं।

(मेरे मित्र की जीवन कथा है यह, २५ वर्ष बाद हम मिले, मेरे हाथ में कलम उसके हाथ में ब्रश, मैं बद्ध वह निर्बन्ध, मैं अपने सपनों का सेवक वह अपने सपनों का राजा)

18.6.11

स्वप्न मेरे

स्वप्न देखने में कोई प्रतिबन्ध नहीं है। वास्तविकता कितना ही द्रवित कर दे, सुधार के उपाय मृगतृष्णावत कितना भी छकाते रहें, पाँच वर्ष पहले किये गये वादों की ठसक भले ही कितनी पोपली हो गयी हो, किलो भर के समाचारपत्र कितना ही अपराधपूरित हो जायें, भविष्य के चमकीले स्वप्न देखने का अधिकार हमसे कोई नहीं छीन सकता है, देखते रहे हैं और देखते रहेंगे। कोई कह सकता है कि संविधान के अनुच्छेद 14 में सबको समानता का अधिकार है और जब कोई भी स्वप्न देखने योग्य बचा ही नहीं तब आप क्यों अपनी नींद में व्यवधान डाल रहे हैं? संविधान का विधान सर माथे, पर क्या करें आँख बन्द होते ही स्वप्न तैरने लगते हैं।

स्वप्न सदा ही बड़े होते हैं, हर अनुपात में। अथाह सम्पदा, पूर्ण सत्ता, राजाओं की भांति, 'यदि होता किन्नर नरेश मैं' कविता जैसा स्वप्न। सामान्य जीवन के सामान्य से विषयों को स्वप्न देखने के लिये चुनना स्वप्नशीलता का अपमान है। राह चलते किसी को प्यार से दो शब्द कह देना स्वप्न का विषय नहीं हो सकता है, पति-पत्नी के प्रेम का स्थायित्व स्वप्न का विषय नहीं हो सकता है, एक सरल या सहज सी जीवनी स्वप्न का विषय नहीं हो सकती है, स्वप्न तो ऐश्वर्य में मदमाये होते हैं, स्वप्न तो प्राप्ति के उद्योग में अकुलाये होते हैं।

मैं अपने स्वप्नों के बारे में सोचता हूँ। पता नहीं, पर मुझे इतने भारी स्वप्न आते ही नहीं हैं? बड़ा प्रयास करता हूँ कि कोई बड़ा सा स्वप्न आये, गहरी साँस भरता हूँ, आकाश की विशालता से एकीकार होता हूँ, पर जब आँख बन्द करता हूँ तो आते हैं वही, हल्के फुल्के से स्वप्न। मेरे स्वप्नों में एक हल्का फुल्का सा प्रफुल्लित बचपन होता है, प्रेमपगा परिवार होता है, कर्मनिरत दिन का उजाला होता है और शान्ति में सकुचायी निश्चिन्त सी रात्रि होती है। इसके बाहर जाने में ऐसा लगता है कि जीवन सीमित सा हो जायेगा।

जटिलताओं का भय मेरे चिन्तन का उत्प्रेरक है, यदि सब सरल व सहज हो जाये तो संभवतः मुझे चिन्तन की आवश्यकता ही न पड़े। प्रक्रियाओं के भारीपन में मुझे न जाने कितने जीवन बलिदान होते से दिखते हैं। व्यवस्था जब सरलता में गरलता घोलने लगती है, मन उखड़ सा जाता है। कभी क्रमों और उपक्रमों से सजी व्यवस्था देखकर हाँफने लगता हूँ, कभी मन ही मन गुनगुनाने लगता हूँ, 'आह भरकर गालियाँ दो, पेट भरकर बददुआ'। उन जटिलताओं का ऑक्टोपस कहीं जकड़ न ले, इसी भय से तुरन्त ही सोचना प्रारम्भ कर देता हूँ। यदि लगता है कि कुछ योगदान कर सकता हूँ तो उस पर और चिन्तन कर लेता हूँ। यही मेरे स्वप्नों की विषयवस्तु हो गयी है, बस प्रक्रियायें सरल हों, राजनीति जन-उत्थान को प्राथमिकता दे, लोक-व्यवहार बिना लाग लपेट के सीधा सा हो, सर्वे भवन्तु सुखिनः वाले स्वप्न।

आप सब भी संभवतः यही चाहते होंगे कि हर जगह पारदर्शिता हो, कहीं शोषण न हो, व्यवस्थायें सरल हों, कोई किसी कार्य को करवाने के लिये पैसा न मांगे। बहुत देशों में जीवन का स्तर इन्हीं छोटी छोटी चीजों से ऊँचा होता गया। हम दुनिया भर की बुद्धि लिये बैठे हैं पर छोटी छोटी चीजों को न अपनाने से विकास-कक्ष के बाहर बैठे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। चाह हम सबकी भी उसी राह की है जो समतल हो। किसी ने कभी उस पर स्वार्थ की कीलें बिखेरी होंगी, एक कील हमें चुभती है और हम क्रोध में आने वालों के लिये कीलें बिखरेना प्रारम्भ कर देते हैं। एक राह जो सुख दे सकती थी, दुखभरी हो जाती है। 

मेरे गहनतम स्वप्नों में मुझे कोई झुका सा दिखता है, उन्हीं समतल राहों में, पास जाकर देखता हूँ चेहरा स्पष्ट नहीं दिखता है, पर उसके हाथ में एक थैला है जिसमें वह राह में पड़ी कीलें समेट रहा है, मैं साथ देने को आगे बढ़ता हूँ, वह कहता है बेटा संभल के, चुभ जायेंगी।

मेरा स्वप्न टूट जाता है।