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4.1.14

हिन्दी टाइपिंग - स्वेच्छा और अपेक्षा

कम्प्यूटर के लिये इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड
हिन्दी टाइपिंग में हो रहे परिवर्तनों में विशेष रुचि रही है, कारण उसका शून्य से विकसित होते देखते रहना है। कम्प्यूटरों में हिन्दी टाइपिंग की सुविधा ने संभावनाओं के द्वार खोल दिये थे, हिन्दी प्रेमियों ने डिजिटल रूप में इण्टरनेट अदि में न जाने कितना लिखना प्रारम्भ कर दिया था। पहले फॉण्ट की विषमता रही, पर यूनीकोड आने से सबका लिखा सब पढ़ने में सक्षम होते गये। कई तरह के कीबोर्ड आये, अन्ततः इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड के स्वरूप को सीडैक ने आधिकारिक घोषित किया। यह होने के बाद भी हिन्दीजन बाराह और अन्य फोनेटिक टाइपिंग तन्त्रों को सुविधानुसार चाहते रहे। यद्यपि इन्स्क्रिप्ट में गति कहीं अधिक है पर धाराप्रवाह टाइप करने के लिये कीबोर्ड पर अक्षरों की स्थिति का अभ्यास होने में दो सप्ताह का समय लग जाता है। यही कारण है कि सम्प्रति कम्प्यूटर जगत में हिन्दी टाइपिंग इन दो धड़ों में बराबर से बटी है। भारतीय भाषाओं के संदर्भ में इन्स्क्रिप्ट की एकरूपता एक अलग पोस्ट का विषय है।

मोबाइल और टैबलेट के पदार्पण से राह और सुगम हो चली। अब यथारूप टाइप करने के लिये कीबोर्ड स्क्रीन पर ही उपस्थित है, इन्स्क्रिप्ट टाइपिंग के लिये अक्षरों की स्थिति जानने की कोई समस्या नहीं। फिर भी पता नहीं क्यों मोबाइल बनाने वाले नये नये कीपैडों के प्रयोग में क्यों लगे हुये हैं, जो न मानक हैं, जिनका न सिर पैर है, जिनका न टाइप करने वालों में अभ्यास है, जिसके पीछे न कोई तर्क या वैज्ञानिकता ही है? यदि इस तरह के प्रयोग वैकल्पिक होते तो बात अलग थी, लोग श्रेष्ठ को चुनते, शेष को छोड़ देते। पर इन विचित्र कीबोर्डों का एकमात्र की बोर्ड होना और मानक इन्स्क्रिप्ट कीबोर्डों की अनुपस्थिति हिन्दीजनों के धैर्य को सतत टटोलने जैसे विचित्र कार्य हैं।

वर्तमान में एप्पल और एण्ड्रॉयड में इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड को मानक मान लिया गया है। विण्डो फोन अभी भी अधर में अटके हैं, सारी वर्णमाला एक ओर से लिख कर उसे कीबोर्ड का नाम दे दिया। आश्चर्य तब और होता है कि आज से ६ वर्ष पहले विण्डो के एचटीसी फोन पर इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड उपयोग में लाते थे और ३ वर्ष पहले नोकिया के सी३ फोन पर भी उसी कीबोर्ड का उपयोग किया था। अब दोनों कम्पनी एक हो गयीं और मानक इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड को भूल गयीं। पर्याप्त समय हो चुका है और अब तक सबको यह समझ जाना चाहिये कि हिन्दी का मानक कीबोर्ड क्या है। प्रयोग भी बहुत हो चुके हैं, अब ये प्रयोग बन्द कर मानक कीबोर्ड के संवर्धन पर ध्यान दिया जाये।

स्क्रीन कीबोर्डों के लिये संवर्धन के क्या और होना चाहिये, इस पर अपेक्षाओं की सूची लम्बी है। इनमें से कई आंशिक रूप से उपस्थित भी हैं, पर उनको पूरी तरह से उपयोग करने के लिये पूरी सूची का क्रमवार होना आवश्यक है।

मोबाइल का परिवर्धित इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड
पहला है, नोटपैड और कीबोर्ड की स्पष्टता। इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड की एक पंक्ति में १३ अक्षर होते हैं, यदि ये सारे अक्षर मोबाइल  में या टैबलेट में यथारूप डाल देंगे तो चौड़ाई में अक्षरों का आकार बहुत छोटा हो जायेगा और टाइप करने में बहुत कठिनाई भी होगी। साथ ही साथ पाँच पंक्ति का मानक स्वरूप रखेंगे तो कीबोर्ड का आकार बहुत ऊँचा हो जायेगा और तब नोटपैड पर लिखने के लिये कम स्थान मिलेगा। जहाँ एप्पल के इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड में ४ पंक्तियाँ और एक पंक्ति में अधिकतम ११ अक्षर हैं, वहीं एण्ड्रॉयड में ४ पंक्तियाँ और एक पंक्ति में १२ अक्षर हैं। यही नहीं, एक हाथ में पकड़कर अँगूठे से टाइप करने की सुविधा के लिये मोबाइल की चौड़ाई अँगूठे की लम्बाई से अधिक नहीं होना चाहिये। बहुत बड़ी स्क्रीन के चौड़े मोबाइल मुझे संभवतः इसीलिये नहीं सुहाते और मैं अपने ३.५ इंच की स्क्रीन के आईफोन ४एस से अत्यधिक संतुष्ट हूँ। मुझे लगता है कि बहुत बड़ी स्क्रीन का फ़ोन लेने के क्रम में हम एक हाथ से टाइपिंग की सुविधा खो बैठते हैं। अँगूठे भर की लम्बाई में ११ से अधिक अक्षर बहुत छोटे लगते हैं। बताते चलें कि अंग्रेजी वर्णमाला के लिये एक पंक्ति में केवल १० अक्षर होने से उसका कीपैड कहीं अधिक स्पष्ट दिखता है।

जब कीपैड आये तो स्क्रीन में शेष स्थान यथासंभव खाली रहना चाहिये, जिससे लिखा हुया अधिक और स्पष्ट दिखायी पड़े। साथ ही साथ कीपैड और कर्सर के बीच बहुत अधिक दूरी होगी तो लेखन में असुविधा बढ़ती है। यदि कीपैड आने के पश्चात नोटपैड में कम स्थान यदि बचता भी हो तो कर्सर कीपैड के यथासंभव निकट होने से टाइप होने की असुविधा कम की जा सकती है।

बिना शिफ्ट की के टाइपिंग
स्क्रीन कीपैड में एक और सुविधा है जिससे टाइपिंग की गति बढ़ाई जा सकती है। टाइपिंग में शिफ़्ट की जितनी कम दबाई जाये, उतनी अधिक गति बढ़ जाती है। इन्स्क्रिप्ट कीपैड में आधे अक्षर शिफ़्ट की दबा कर ही आते हैं। सामान्य लेखन में शिफ़्ट की के अक्षरों का प्रयोग एक तिहाई ही है। उसे भी और कम किया जा सकता है। यदि क को तनिक अधिक देर दबाये रखें तो ख आ जाता है। यह समय शिफ़्ट की दबाने से थोड़ा कम होता है। इसी प्रकार न को दबाये रखने से हर वर्ग का पाँचवाँ अक्षर आ जाता है और आप बिना अधिक प्रयास के उसे चुन सकते हैं। इसमें न केवल गति बढ़ जाती है, वरन कई अक्षरों को ढूँढ़ने में अधिक प्रयास भी नहीं करना पड़ता है। बहुत दिनों के अभ्यास के बाद ही यह कह रहा हूँ कि इससे टाइपिंग में शिफ़्ट की न केवल हटाई जा सकती है, वरन चार के स्थान पर तीन पंक्तियों में ही हिन्दी वर्णमाला सीमित की जा सकती है। एक अँगूठे से टाइप करने में यदि सुविधा और भी प्रभावी हो जाती है, भ्रम भी कम हो जाता है और गति भी बढ़ जाती है। इस तथ्य पर तनिक और शोध करके हिन्दी टाइपिंग को और भी सुगम और गतिमय बनाया जा सकता है।

 हिन्दी टाइपिंग में अगली सुविधा है, शब्दकोष के अनुसार शब्दों का विकल्प देना। एण्ड्रॉयड फ़ोनों में जैसे ही आप टाइप करना प्रारम्भ करते हैं, कीपैड के ऊपर संभावित शब्दों के विकल्प आ जाते हैं, उनमें से एक को चुनने से टाइपिंग में लगा शेष श्रम बच जाता है। वहीं दूसरी ओर एप्पल में टाइप करते समय केवल एक ही विकल्प आता है जो कर्सर के साथ ही रहता है। यदि उस समय आपने स्पेस दबा दिया तो वह विकल्प चुन लिया जाता है। तुलनात्मक दृष्टि से यह सुविधा कम लगती है पर इसका एक विशेष पक्ष इसे अत्यधिक उपयोगी बना देता है। एप्पल का विकल्प देने वाला तन्त्र आपसे सतत ही सीखता रहता है और उसी के अनुसार विकल्प देता है। कहने का अर्थ है कि आप जितना अधिक टाइप करेंगे, विकल्प प्रस्तुत करने का तन्त्र उतना ही प्रभावी और सटीक होगा। यही नहीं, छोटी मोटी टाइपिंग की भूलें तो वह स्वतः ही ठीक कर देता है, जिससे आप चाह कर भी कोई भूल नहीं कर सकते हैं। एण्ड्रायड में ऊपर की पंक्ति में विकल्प होने से कीपैड की ऊँचाई बढ़ जाती है, जिससे टाइप करने में तनिक असुविधा होने लगती है। साथ ही साथ अधिक विकल्प की स्थिति न केवल भ्रमित करती है वरन गति भी कम कर देती है।

कीपैड को न केवल मानक शब्दकोष का ज्ञान हो, वरन आपके उपयोग के बारे में जानकारी हो। यही विस्तार व्याकरण के क्षेत्र में भी किया जा सकता है। व्याकरण के नियमों को सीखकर वह अगला संभावित शब्द या शब्द श्रंखला भी सुझा सकता है। यही नहीं स्त्रीलिंग-पुल्लिंग, एकवचन-बहुवचन आदि की वाक्य रचनाओं में की गयी सामान्य भूलों को भी पहचान कर सुधारने में वह आपकी सहायता कर सकता है। इस पक्ष पर अधिक शोध नहीं हुआ है, पर इस पर किया गया श्रम हिन्दी टाइपिंग के लिये एक मील का पत्थर सिद्ध होगा।

अगली सुविधा है, लिखा हुआ पढ़ना। कभी कभी लम्बा लेख लिखने के बाद पढ़ने की इच्छा न हो तो उसे सुन पाने की सुविधा होनी चाहिये। यद्यपि एप्पल में बोलने वाली उतनी स्पष्टता से हिन्दी नहीं बोल पाती है, पर सब समझ में आ जाता है और संपादन भी किया जा सकता है। इस सुविधा को विकसित करने के लिये वर्तनी के नियम, उच्चारण और संयुक्ताक्षर प्रमुख हो जाते है। बहुधा लम्बी कहानियों को भी इसी सुविधा का उपयोग कर मैंने सुना है। यही नहीं सुनने के क्रम में अर्धविराम और पूर्णविराम के महत्व को समझने की शक्ति विकसित हो जाती है, जो कि संवाद के लिये अत्यावश्यक है।

इसी सुविधा से सीधे जुड़ी हुयी सुविधा है, बोला हुआ लिखना। कई भाषाओं में यह सुविधा अत्यधिक विकसित है पर हिन्दी में यह अपने विकास की प्रतीक्षा कर रही है। यदि यह पूरी तरह से संभव हो सका, मोबाइल आधुनिक गणेश का अवतार धर लेंगे। इसी प्रकार हाथ का लिखा पढ़ना भी एक क्षेत्र है जिसमें अधिक कार्य की आवश्यकता है। विण्डो में अंग्रेजी भाषा के लिये इस सुविधा के उपयोग के पश्चात हिन्दी में वह अपेक्षा होना स्वाभाविक ही है। इसके अतिरिक्त एक वृहद शब्दकोष और दूसरी भाषाओं में अनुवाद की सुविधा हिन्दी के लिये आगामी और मूलभूत आवश्यकतायें हैं। हमें मानकीकरण की स्वेच्छा से वांछित अपेक्षाओं तक की लम्बी यात्रा अपने ही पैरों पर चलनी है।

9.10.13

वर्धा से कानपुर

स्टेशन पर ट्रेन आने के ३० मिनट पहले पहुँच गया था, ट्रेन अपने समय से ३० मिनट देर से आयी। मेरे पास एक घंटे का समय था, थोड़ी देर पहले जमकर वर्षा हुयी थी, बाहर का वातावरण सुहावना था, प्रतीक्षालय में न बैठकर मैंने प्लेटफ़ार्म की बेंच में बैठकर चारों ओर के दृश्य देखने और उन्हें लिखते रहने का निश्चय किया।

कितने विश्व यहाँ दिखते हैं
प्लेटफ़ार्म की बेंच पर बैठ कर चारों ओर देखते रहने से आस पास चल रहे ढेरों लघुविश्व दिखने लगते हैं। पहले तो लगता है कि रेलवे प्लेटफ़ार्म पर उपस्थित लोग या तो यात्री हैं या उनकी सुविधा के लिये वहाँ उपस्थित कर्मचारी या सहयोगी सेवा देने वाले। प्रथम दृष्ट्या लगता है कि यात्रियों के चारों ओर ही घूमता होगा प्लेटफ़ार्म का चक्र। यथार्थ पर इस धारणा से कहीं अलग होता है और कहीं अधिक रोचक भी।

जिस प्लेटफार्म पर मैं खड़ा प्रतीक्षा कर रहा था, उसके एक ओर से एक दिशा में और दूसरी ओर से दूसरी दिशा में ट्रेनें जा रही थी। एक के बाद एक ट्रेनें निकल रही थीं, हर दस मिनट में दो ट्रेनें, दोनों दिशाओं से एक एक। पास में ही एक कर्मचारी खड़ा था, उसका कार्य जाती हुयी ट्रेन को ढंग से देखना था और सबकुछ ठीक होने पर गार्ड महोदय को हरी झण्डी दिखाना था। यह बहुत ही अच्छा सुरक्षा उपाय होता है। ट्रेन में ड्राइवर और गार्ड दो सिरों पर तो रहते हैं, पर बीच अवस्थित ७०० मीटर लम्बी ट्रेन मे क्या घट रहा है, इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं रहती है। हर स्टेशन और हर रेलवे फाटक पर यही कर्मचारी उनको सब कुछ ठीक होने की सूचना देते रहते हैं। बरबस ही ध्यान देश की गहराती और गाढ़ी हो चुकी समस्याओं पर चला गया कि काश इन तन्त्रों को भी हर थोड़ी दूरी पर कोई यह बताने के लिये खड़ा किया जाता कि सब कुछ ठीक चल रहा है। कोई भी तन्त्र बनाने के समय हम इतनी छोटी सी पर इतनी प्रभावी बात कैसे भुला देते हैं?

वह कर्मचारी अपने कार्य में मगन था। वह हर डब्बे को ध्यान से देखता था और अन्त में ट्रेन के गार्ड को बड़े ही उत्साह में हरी झण्डी हिलाता था। यह उत्साह और भी बढ़ जाता यदि गार्ड उनके परिचित निकल आते। मैंने इस बात का तनिक भी आभास नहीं दिया था कि मैं भी रेलवे से ही हूँ और यह तथ्य अवलोकन को और अधिक रुचिकर बना रहा था। उस कर्मचारी का उत्साह आनन्द की एक सुखद रेख बन मन में रच बस गया। दो ट्रेनों के बीच के समय के रिक्त को वह अपने साथ खड़े एक कर्मचारी को कोई पुरानी घटना सुना कर बिता रहा था। जिस लगन से उसने अपना दायित्व निभाया और जिस तरह मगन हो उसने अपने मित्र को अपनी घटना सुनायी, उसने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया। यह देख कर मुझे लगा ही नहीं कि एक घंटे के प्रतीक्षा समय में मुझे किसी प्रकार की उलझन होनी चाहिये।

पास में ही एक सास, एक बहू और उसके चार बच्चे बैठे थे। देखने से लगा कि वे भी उसी ट्रेन की प्रतीक्षा में हैं और मुझसे पर्या्प्त पहले से वहाँ विद्यमान हैं। सास के चेहरे पर आधिपत्य झलक रहा था और वह कम बोल रही थी, बहू भी हल्का मुँह बनाये अपनी बात बोले ही जा रही थी। माँ और दादी के बीच चल रहे रासायनिक युद्ध का लाभ उठा बच्चे दोनों ओर पटरियोों में झाँक झाँक कर अपनी उत्सुकता को व्यक्त कर रहे थे। जब भी वे प्लेटफार्म के किनारे पर पहुँचते, दोनों सास बहू युद्धविराम कर बच्चों पर चिल्लाती, कहना न मानने पर झल्लाती और उन्हें उठाकर ले आतीं। युद्ध तो रह रह रुका जा रहा था, पर क्रोध कम नहीं था दोनों के मन में। बहू जब सास से अधिक नहीं जूझ पायी तो उसने अपने सबसे ऊधमी बच्चे के धमक कर अपने क्रोध का स्पष्ट संकेत दे दिया। यही नहीं, उस समय चारों ओर अपनी क्रोध भरी आँखे घुमाकर अश्वमेघ यज्ञ भी कर डाला। मैं अब तक उनके गृहनाट्य पटकथा का आनन्द उठा रहा था, बहू की उस दृष्टि ने मुझे अपना सारा ध्यान अपने आईफोन पर केन्द्रित करने पर विवश कर दिया।

जब से आईफ़ोन और आईपैड मिनी अद्यतन किया है तब से उसके विशिष्ट पक्ष अधिक नहीं देख पाया था। आईओएस७ से आईफोन पूरी तरह से नया लगने लगा है। वर्ष भर इस नयेपन को जीने के बाद ही नये आईफोन के बारे में सोचा जायेगा और तब तक इसके ही प्रयोग से ही तकनीक में बने रहा जायेगा। फ़ोन आदि करने के अतिरिक्त आईफ़ोन का सर्वाधिक उपयोग ईमेल, फेसबुक और टाइप करने में ही होता है। उसका हिन्दी कीबोर्ड और भी अच्छा हो गया है, अब अधिक समय तक टाइप करने में आनन्द आने लगा है। साथ ही साथ उसमें नोट का पार्श्व रंग पीले के स्थान पर श्वेत कर दिया गया है और लाइनें हटा दी गयी हैं। जिससे वह दिखने में और भी सुन्दर लगने लगा है।

ट्रेन आ गयी, सीट देखी तो किनारे की ऊपर वाली सीट थी। यात्रा के बीच के स्टेशन पर होने के कारण यह कोने की सीट भाग्य में अवतरित हुयी थी, नहीं तो बहुधा अन्दर की ही सीट मिलती रही है। लोगों को भले ही यह सीट थोड़ी अटपटी लगे पर मेरे कुछ मित्रों को यह सीट बड़ी भली लगती है। जब तक चाहिये चुपचाप लेटे रहिये, कोई व्यवधान नहीं, कोई पूछने वाला नहीं। मुझे बस तीन समस्यायें आयी। पहली, नीचे एक महिला के सोते रहने के कारण जब भी बैठने की इच्छा होती तो अन्दर वाली सीटों के मालिकों से पूछना पड़ता था। दूसरी, बार बार उतरने चढ़ने में कष्ट होने के कारण तब तक नीचे नहीं उतरता था जब तक उसके लिये पर्याप्त कार्य एकत्र न हो जाये। तीसरी, ऊपर की सीट में कोई चार्जिंग प्वाइंट नहीं होने से हर बार नीचे वाली सीट से बिजली उधार माँगनी पड़ती है। दो बार ही पूछा होगा, पर नीचे वाली महिला ने ऐसे देखा मानो ४०-५० लाख का होम लोन माँग लिया हो।

कष्टभरी है ऊपरी शैय्या
तीन समस्याओं को यथासंभव साधते हुये मैं स्वयं में व्यस्त हो गया। अन्दर की सीट में ऊपर की ओर एक वृद्ध बैठे थे, निश्चय ही ६० के ऊपर थे, उन्हें हर बार चढ़ने उतरने में कष्ट हो रहा था। चाह कर भी उनकी सहायता नहीं कर पा रहा था। यदि कोई इस तरह से नीचे की सीट माँगता है तो मैं बदलने को तुरन्त तैयार हो जाता हूँ, आज मैं भी किनारे की छत पर टँगा था। अन्दर की ओर दो अन्य युवा जीव नीचे बैठे थे पर उन्हें लगा कि वृद्ध को नीचे की सीट देने से उनके सम्मान को ठेस पहुँच जायेगी। वृद्ध भी सज्जन थे, उन्होंने अधिक ज़ोर नहीं डाला और चुपचाप ऊपर नीचे करने लगे। रात में एक बार उतरते हुये उनका हाथ सरक गया और वे गिर पड़े, बड़ी चोट लगी। फिर भी नीचे बैठे मूढ़ों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन्होंने अपनी नीचे की सीट उन वृद्ध को नहीं दी। यूएन की एक आयी रिपोर्ट में ठीक ही कहा गया है कि वृद्ध लोगों की सुविधा की दृष्टि से भारत का स्थान विश्व में ७३वाँ है। ऐसे दृश्य देख कर यूएन की रिपोर्ट पर अविश्वास भी तो नहीं किया जा सकता है।

कई बार इस विषय पर चर्चा की है कि किस तरह से रेलवे में वयोवृद्ध यात्रियों को स्वतः ही नीचे की सीट दी जा सके। रेलवे में यह व्यवस्था वांछनीय तो है पर उसका क्रियान्वयन उतना ही कठिन है। चर्चा के निष्कर्ष इस प्रकार हैं। जैसे ही टिकट बिकने प्रारम्भ होते हैं, उपलब्धता के अनुसार सीटों का आवंटन प्रारम्भ हो जाता है। हर आरक्षित टिकट पर एक सीट नम्बर होता है और आवंटन एक ओर से प्रारम्भ होता है। उस समय इस बात का ध्यान अवश्य रखा जाता है कि एक टिकट पर सभी व्यक्तियों को एक साथ रखा जाये। जब अधिकतम सीटें भर जाती हैं तो फुटकर स्थान एक के बाद एक भरते जाते हैं और उसमें प्रारम्भिक चरणों की तुलना में सुविधाओं का ध्यान रखना संभव नहीं होता है। किसी के टिकट निरस्त कराने से छूटे स्थान भी इसी तरह अस्त व्यस्त बँटते हैं।

समाधान तब संभव है, जब प्रारम्भ में मात्र आरक्षण दिया जाये, सीट नम्बर न बताया जाये, जैसा कि प्रथम वातानुकूलित श्रेणी में होता है। ट्रेन चलने के नियत समय पहले सभी मानवीय सुविधाओं को ध्यान में रखकर सीटों का आवंटन किया जा सकता है। ठीक इसी तरह का सीट आवंटन हवाई यात्राओं में भी होता है। इसमें समस्या बस इतनी है कि अन्तिम समय में सबके लिये अपना सीट नम्बर पता करने में और उसके अनुसार अपनी नियत सीट में बैठने में अव्यवस्था फैलने का डर है। वर्तमान में पहले से सारी सीटें नियत रहने से अन्तिम समय में अव्यवस्था न्यूनतम रहती है और केवल प्रतीक्षारत यात्री अपने टिकट की स्थिति जानने को उत्सुक रहते हैं। व्यवस्था में परिवर्तन और आईटी और मोबाइल के समुचित उपयोग से शीघ्र ही ऐसी समस्याओं का समाधान होगा, ऐसी भविष्य से आशा है।

रात में यात्रा का पहला भोजन था जो ट्रेन से मँगाया था, एक रोटी से अधिक नहीं खा सका, शेष छोड़ दिया। नागपुर से कुछ केले ले लिये थे जिनसे क्षुधा भी शान्त हुयी और ऊर्जा भी मिली। थोड़ा प्रयास करते तो यात्रा के बीच के स्टेशनों पर परिचितों के घर से भोजन आ सकता था, पर संकोचवश उनसे कह न सका। रात में शीघ्र ही सो जाने से झाँसी में प्रातः नींद खुल गयी, खिड़की से ही अपने पुराने स्टेशन को देखता रहा। तब जिन कार्यों का प्रस्ताव भेजा था, सब आधारभूत निर्माण पूरा हो चुका था। दो दिन पहले ही झाँसी कानपुर का विद्युतीकरण भी सम्पन्न हुआ था, अब झाँसी में इंजन बदलने में व्यर्थ हुआ समय कम हो जायेगा। बड़ा अच्छा लग रहा था, प्रभात का समय और सच हुये स्वप्न।

उन स्वप्नों को तब झटका लगा जब ट्रेन कानपुर पहुँच रही थी। कूड़े के वही ढेर और नगरीय अव्यवस्था। सब सुधर गये, तुम न सुधरे कानपुर।

6.3.13

अलग अलग कीबोर्ड

मेरी प्रतीक्षा को निराशा मिली। यद्यपि मैं लगभग डेढ़ वर्ष पहले से ही आईफ़ोन में हिन्दी कीबोर्ड का उपयोग कर रहा हूँ पर विण्डो व एण्ड्रायड फ़ोनों में हिन्दी के कीबोर्डों का स्वरूप कैसा होगा, यह उत्सुकता मन में  लिये डेढ़ वर्ष से प्रतीक्षा कर रहा था। यदि इन दोनों फ़ोनों में हिन्दी कीबोर्ड पहले आ गये होते तो संभव था कि कुछ पैसे बचाने के लिये मैं आईफ़ोन का उपयोग न कर के इनमें से किसी एक के अच्छे मॉडल का उपयोग कर रहा होता। मेरे लिये आईफ़ोन ख़रीदने का प्राथमिक कारण उस पर हिन्दी कीबोर्ड का आना था, यदि उसने भी देर की होती तो एप्पल से जान पहचान ही न हुयी होती। आज एक नहीं, चार और एप्पल उत्पाद ले चुका हूँ और बहुत संतुष्ट भी हूँ। सीधा सा हिसाब था, एप्पल ने हिन्दी का सम्मान किया, इस कारण मेरा परिचय बढ़ा और अब प्यार हो गया है, इसकी गुणवत्ता से। संभवत एप्पल को ज्ञात था कि मुझ तक पहुँचने का मार्ग हिन्दी से होकर जाता है।

ऐसा नहीं है कि विण्डो व एण्ड्रायड फ़ोनों ने हिन्दी के महत्व को समझा नहीं। समुचित समझा पर बड़े देर से समझा। बस कुछ सप्ताह पहले ही दोनों के हिन्दी कीबोर्ड आ गये। पर अब दोनों के हिन्दी कीबोर्डों को देख कर लग रहा है कि दोनों ने ही अपनी सुविधानुसार कीबोर्ड बना दिया, बिना अधिक विश्लेषण किये हुये। इस निर्णय से न हिन्दी टाइप करने वालों का कोई लाभ होने वाला है और न ही इन दोनों कम्पनियों को हिन्दी के इस बाज़ार में कोई सफलता मिलने वाली है। मेरा आशय किसी पर कटाक्ष करने का नहीं है या आलोचना में उद्धत होने का नहीं है, पर हिन्दी कीबोर्ड के उद्भव में भिन्न भिन्न राग सुना रहे लोगों को यह बताने का है कि बिना मानकीकरण न आपका भला होगा और न ही हिन्दी का। और साथ ही साथ मेरे लिये भी भविष्य में आईफ़ोन छोड़ पाने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जायेगी।

विज्ञ कह सकते हैं कि भले ही विण्डो में हिन्दी कीबोर्ड अभी आया हो पर एण्ड्रायड में तो लगभग एक वर्ष से हिन्दी कीबोर्ड है। निश्चय ही हिन्दी कीबोर्ड था, पर वह वाह्य एप्स के रूप में था, तनिक छोटे आकार का था और उपयोग में बहुत ही कष्टकर। जब कभी भी उससे टाइप करने का प्रयास किया, प्रवाह बाधित रहा, कारण निश्चय ही उनका वाह्य आरोपित होना होगा, हर बार ओएस की दीवार भेद कर जाने और वापस आने में समय तो लगता ही है। न ही उससे प्रभावित हुआ जा सकता था और न ही उससे लम्बे समय तक टाइप किया जा सकता है। यद्यपि अभी भी गूगल हिन्दी इनपुट के नाम से जो एप्स आया है, वह भी वाह्य एप्स के रूप में ही आया है, पर गूगल के द्वारा तैयार होने पर उसका समन्वय ओएस से कहीं गहरा होगा, तनिक तीव्र होगी उसकी गति औरों की तुलना में। प्रसन्नता तब और अधिक होती जब ओएस के अगले संस्करण में हिन्दी के कीबोर्ड को सम्मिलित किया गया होता।

जब नोकिया का सी३ फ़ोन उपयोग में लाता था तो उसमें एक वाह्य हिन्दी कीबोर्ड था। लगा था कि नोकिया के पास यह तकनीक होने के कारण विण्डो के नये फ़ोनों में पहले दिन से ही हिन्दी आयेगी। ऐसा नहीं हुआ, कई बार जाकर उसमें हिन्दी खोजी तो नहीं मिली। बड़ा दुख भी हुआ और आश्चर्य भी। जब विण्डो ५ के फ़ोन से आईरॉन का हिन्दी कीबोर्ड उपस्थित था, नोकिया सी३ में हिन्दी की बोर्ड उपस्थित था तो विण्डो के नये फ़ोनों में उनका होना स्वाभाविक ही था। अच्छा हुआ विण्डो फ़ोनों में ओएस स्तर हिन्दी कीबोर्ड आ गया है पर उसका भी अवतरण प्रभावित नहीं कर पाया।

जब भी मैं कहता हूँ कि हिन्दी का कीबोर्ड ओएस के स्तर पर होना चाहिये तो मेरा संकेत दो लाभों की ओर है। पहला तो इससे कीबोर्ड की गति बढ़ जाती है, उसका अन्य एप्स से समन्वय गाढ़ा हो जाता है, टाइपिंग निर्बाध गति से होती है और किसी समस्या की संभावना भी नहीं होती है। दूसरा, ओएस के अपग्रेड होने पर कीबोर्ड भी स्वतः ही अपग्रेड हो जाता है और एप्स के अलग से अपग्रेड होने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती है। यही कारण है कि ओएस में ही कीबोर्ड का होना अधिक लाभदायक है और साथ ही साथ अधिक प्रभावी भी।

कहने को तो गूगल हिन्दी इनपुट में फ़ोनेटिक व्यवस्था भी है, यही कि आप अंग्रेज़ी में टाइप करें और वह स्वतः ही बदल कर हिन्दी में बदल जायेगा। पहले भी बारहा के उपयोग से लैपटॉप पर हिन्दी बहुत दिनों तक टाइप भी की है, पर गति धीमी होने के कारण और हिन्दी शब्दों को अंग्रेज़ी की बैसाखी पहनाने के कारण उसका त्याग कर दिया। उसके स्थान पर हर लैपटॉप में उपस्थित देवनागरी इन्स्क्रिप्ट में टाइप करना सीखना प्रारम्भ में तनिक कठिन लगा पर एक सप्ताह में ही गति आ गयी। कहने का आशय यह कि फ़ोनेटिक टाइपिंग का उपयोग तब तक नहीं करना चाहिये जब तक कोई सीधा साधन उपस्थित हो।

आइये तीन प्रमुख मोबाइल उत्पादकों का हिन्दी कीबोर्ड से संबंधित असंबद्धता देखें। एक तथ्य तो स्पष्ट दिख रहा है कि कोई एक उत्पाद आपने ले लिया और उस पर हिन्दी टाइपिंग करते हुये रम गये तो भविष्य में कोई अन्य मोबाइल ख़रीदने का साहस नहीं कर पायेंगे, एक में ही अटक कर रह जायेंगे। तीनों में हिन्दी कीबोर्ड के भिन्न भिन्न प्रकार आपके लिये बाधा बनकर खड़े रहेंगे। दूसरा, यदि आप लैपटॉप पर देवनागरी इन्स्क्रिप्ट में टाइप करते हैं तो आपको विण्डो या एण्ड्रायड में टाइप करने के लिये एक अतिरिक्त और सर्वथा भिन्न प्रारूप समझना पड़ेगा। दों भिन्न प्रारूपों में भ्रम की संभावना सदा ही बनी रहेगी। आपको बताते चलें कि देवनागरी इन्स्क्रिप्ट प्रारूप ही भारतीय मानक है और हर लैपटॉप में उपस्थित भी।

जब मैंने कहा था कि प्रतीक्षा ने निराश किया है, तब मेरा आशय प्रमुख मोबाइल उत्पादकों के द्वारा भिन्न दिशाओं में भागा जाना था। अभी ब्लैकबेरी १० का पदार्पण होना है पर उसके इतिहास को देख कर यह लगता नहीं है कि वह भी हिन्दी कीबोर्ड के क्षेत्र में अपना राग नहीं अलापेगी।

पिछले ७ वर्षों से मेरा मार्ग अब तक देवनागरी इन्स्क्रिप्ट प्रारूप से होकर आया है, आईफ़ोन के अतिरिक्त अन्य सबने लगभग यह सिद्ध कर दिया है कि चाहे मानक कीबोर्ड जायें भाड़ में पर वे अपने तरीक़े से भारतीयों से हिन्दी टाइप करवायेंगे। यदि ऐसा है तो बड़ा ही कठिन हो जायेगा, तीन चार भिन्न प्रकार के कीबोर्डों से तो हिन्दी में भी नये वर्ग खड़े हो जायेंगे। इतने वर्षों के प्रयास के बाद कम से कम हिन्दी के कीबोर्ड आ रहे हैं, पर उनका भी क्या लाभ जो मानक न हों और उपयोगकर्ता को नये प्रकार से सीखने को विवश करें।

पता नहीं कि नये प्रारूप के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है या सुविधा है वर्णमाला को एक क्रम में सजा देने की। सबको यह तो लगता है कि बिना हिन्दी कीबोर्ड उनका विकास और फैलाव बाधित रहेगा पर किस प्रकार से उसे प्रस्तुत करना है, इस पर कोई समुचित विचार नहीं हुआ है। मेरा केवल एक ही विनम्र अनुरोध है कि कृपा कर मानक देवनागरी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड को ही साथ लेकर चले।