नहीं ज्ञात क्या, खटके नित नित,
नहीं ज्ञात क्या, भार हृदय का,
चिन्तन पथिक, शिथिल शंकित मन,
देखो कहाँ नहीं मैं भटका ?
विस्तार विविध, निस्तार विविध,
मन साधे सुलझन अथक आस,
जब तन्त्र खींचते, अधोवृत्ति,
तब शान्त समेटे प्रकट हृास,
देखे, समझे, जाने, परखे,
कितने मत, कितने दर्शन नव,
कुछ प्रश्नों पर स्तब्ध मौन,
कुछ व्यर्थ सतत पंछी कलरव।
सबकी विशिष्ट जीवन शैली,
शत सदियों की प्रज्ञा संचित,
कुछ तथ्य रहे संदर्भहीन,
कुछ तर्क व्यवस्था से वंचित।
मुक्त विचारों के संग्रह से,
ऊर्जस्वित मन, नहीं बद्धता,
मुक्ति आस है, नहीं अपेक्षित,
आचारों की रुग्ण रुद्धता।
ज्ञान-धूप से तप्त जगत में,
छाँह सलोनी, तृप्त करे जो,
प्रश्नों के इस उहापोह में,
उत्तर के आधार धरे हो।
घूम चुका, फिर वहीं आ गया,
उत्तर रीते, प्रश्न अधिक ले,
देखा, कुछ भी समझ न पाया,
जाँचा, परखा, हर प्रकार से।
सहज, सरल जीवन का तर्पण,
सम्बन्धों का व्यर्थ विखंडन,
क्यों पीड़ा का महिमामंडन,
क्यों संरचना और जटिलतम ।
कंपित, विचलित और अचम्भित,
सुख का क्या यह मार्ग चुना है,
उलझन को सब ओर लपेटे,
कैसा जीवन जाल बुना है ।
नवविधान रचने से अच्छा,
समाधान में गति आनी थी,
जीवन और विकट कर बैठे,
हमें समस्या सुलझानी थी।
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