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28.9.19

अभ्यास और वैराग्य - १२

सत्य के संदर्भों से शास्त्र भरे पड़े हैं। संभवतः इसलिये क्योंकि इस पर नियमन किये बिना जगत का ताना बाना सम्हाल पाना अत्यधिक कठिन है। सत्य बोलने की प्रवृत्ति विश्वास उत्पन्न करती है, बिना विश्वास समाज की संरचना ढह जायेगी। सत्यनिष्ठा बनी रहेगी तो संबंध सहेजे जाते रहेंगे। सामाजिक संदर्भों में सत्य से बलवती और कोई अभिव्यक्ति नहीं है।

धर्मशास्त्रों के प्रणेताओं ने यह तथ्य भलीभाँति समझा है। मनु, व्यास, चाणक्य आदि ने सत्य को यथासंभव संशयमुक्त किया है,  स्पष्टीकरण देकर। सत्य के अनुप्रयोग में इन सूक्ष्मताओं को नहीं समझा जाये तो हित के स्थान पर अहित हो जायेगा, साधने के स्थान पर अस्थिरता आ जायेगी। सत्य प्रेरित स्थिरता सदैव ही यह आशा बनाये रखती है कि वर्तमान स्थिति कैसी भी हो, उत्थान होगा ही। जब सत्य अपनी पकड़ खो देता है, सारी आशायें अंधकार में प्लावित हो जाती हैं। आइये सत्य की शास्त्रीय थाह लेते हैं।

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् । प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन: (प्रिय सत्य बोलना चाहिये, अप्रिय सत्य या प्रिय असत्य नहीं बोलना चाहिये, यही सनातन धर्म है)। मनुरचित सर्वाधिक प्रचलित श्लोक सत्य को प्रिय-अप्रिय की विमा से जोड़ता है। अप्रियता कष्टकारी है, किञ्चित हिंसात्मक भी। एक सीमा तक स्पष्टवादिता स्वीकार्य होती है, सुधारात्मक हो, अस्तित्व को झिंझोड़े, पर आहत न करे। परिहास करना भी असत्य तब तक नहीं है जब तक वह किसी को आहत न करे, कम से कम सामने वाले के समझने तक। प्रशंसा यदि प्रेरणात्मक हो तो वह प्रिय असत्य भी स्वीकार्य है। प्रशंसा यदि स्वार्थ साधे तो वह ठगने वाली हो जाती है, चाटुकारिता हो जाती है, वह असत्य भी है। 

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः, वृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।धर्मो न वै यत्र च नास्ति सत्यम्, सत्यं न तद्यच्छलनानुविद्धम्। (वह सभा नहीं जहाँ वृद्ध न हो, वह वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न करे, वह धर्म नहीं जो सत्य न कहे, वह सत्य नहीं जिसमें छल हो)। महाभारत के उद्योगपर्व का यह श्लोक सामूहिक निर्णय प्रक्रिया की नींव रखता है। भीष्म और द्रोण सम महारथियों का दुर्योधन की सभा में चुप रहने के ऊपर यह तीक्ष्णतम प्रहार है।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते। (उद्वेग न पैदा करनेवाला, प्रिय और हितकारक सत्यभाषण तथा स्वाध्याय व अभ्यास वाणी का तप कहा जाता है)। यह गीता में कहा गया है। सत्य उपद्रव न पैदा करे, प्रिय और हितकारक हो। सत्य का दम्भ भरने वाले बहुधा स्थिति बिगाड़ते ही हैं। जो सत्य का वास्तविक स्वरूप समझते हैं, वह सत्य को संवेदनात्मकता से व्यक्त करते हैं, सौम्यतापूर्वक, अन्यथा मौन ही रह जाते हैं।

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्। मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्॥ (महात्माओं के मन, वचन और कर्म में समानता पाई जाती है पर दुष्ट व्यक्ति सोचते कुछ और हैं, बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं॥) यद्यपि मन और वाणी में एकरूपता सत्य को परिभाषित करती है, कर्म की एकरूपता उसे महात्मा बना देती है।

नास्ति सत्यात् परं तपः, सत्यं स्वर्गस्य साधनम्, सत्येन धार्यते लोकः।(सत्य से परमं कोई तप नहीं है, सत्य स्वर्ग का साधन है, सत्य से लोक का धारण होता है)। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में सत्य को स्पष्टता से वर्णित किया है।

युधिष्ठिर का सत्य मन से नहीं था क्योंकि वह जानते थे कि द्रोणाचार्य यदि अश्वथामा के बारे में पूँछ रहे थे तो वह उनका पुत्र ही होगा और यह तथ्य युधिष्ठिर जानते थे। मनसा यह असत्य है।

सत्य धर्म के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कहते हैं कि सत्य से धर्म उत्पन्न होता है, दया और दान से धर्म बढ़ता है। क्षमा करने से धर्म स्थिर रहता है और क्रोध करने से नष्ट हो जाता है। मनु ने झूठ बोलने वाले को चोर की तरह माना है, वह अपनी आत्मा का हनन करने वाला चोर है। कहते हैं कि जिनका सत्य सिद्ध हो जाता है, वह कुछ भी कह दें, वह सत्य हो जाता है। पतंजलि सत्य की सिद्धि बताते हैं। सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्(२.३६) (जो वरदान शाप या आशीर्वाद दे, वह सत्य हो जाये या उसे आश्रय मिल जाये)

अगले ब्लाग में अन्य यम देखेंगे।

24.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ११

यम का पक्ष सामाजिक है, नियम व्यक्तिगत पक्ष निरूपित करते हैं। सारे यम नियम किसी न किसी प्रकार से एक दूसरे से संबद्ध हैं। एक उपांग विशेष का पालन दूसरे की अवहेलना नहीं हो सकता है। यदि किसी उपांग के पालन में किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति आये तो अन्य उपांगों में उस परिस्थिति का अनुप्रयोग करके समाधान ढूढ़ा जा सकता है। 

सत्य वाणी का विषय है। वाणी विचारों के सम्प्रेषण हेतु है। बोला हुआ हर वाक्य सत्यता की कसौटी में कसा जाता है। व्यवहार की व्यापकता के कारण इसके अनुपालन में उठने वाले संशय अहिंसा की तुलना में कहीं अधिक हैं। आपके बोले हुये वाक्य कोई कब, कैसे और कहाँ उद्धृत कर दे? किस परिप्रेक्ष्य में कहा गया कौन सा वचन किसी भिन्न परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर दे? अनुपस्थित या मौन रहने से भी जटिलता कम नहीं होने वाली क्योंकि बहुधा मौन शब्दों से अधिक बोलता है। पतंजलि ने सत्य की भी व्याख्या या परिभाषा नहीं दी है। व्यासभाष्य के आधार पर ही सत्य को समुचित रूप से समझा जा सकता है।

जैसा मन में हो, वाणी में वही व्यक्त करना सत्य है। वाणी और मन में यथार्थ होना। यह एक सापेक्षिक परिभाषा है, इसमें मन और वाणी के बीच की सापेक्षिता है। तीन सीमायें स्पष्ट निर्धारित हैं। पहली यह कि मन को पूरा व्यक्त कर देना बाध्यता नहीं है, केवल आवश्यकतानुसार। दूसरी यह कि मन में जो है, वह वाह्य जगत से भी मेल खाये, यह भी आवश्यक नहीं है। एक विषय में कईयों के सत्य भिन्न हो सकते हैं, विषय की समझ भिन्न होने के कारण, उस विषय को जिसने जैसा समझा। तीसरा यह कि वाणी में व्यक्त सत्य आचरण में भी परिलक्षित हो, यह भी आवश्यक नहीं। मन में पूर्ण विश्वास होने के बाद भी वांछित गुण आचरण में उतरने में समय लेते हैं, निर्धारित लक्ष्यों में पहुँचने में समय लगता है।

व्यास प्रदत्त परिभाषा सरलतम है। जैसा देखा है, जैसा सुना है, जैसा अनुमान किया है, जैसा मन में हो, वैसा ही व्यक्त करना है। न न्यून, न अधिक, बस पारदर्शी। मन से यथार्थ होने के बाद भी वाणी का आचरण कैसा हो, तभी वह सत्य माना जायेगा, इसके लिये व्यास कुछ सीमायें रखते हैं। वाणी न ठगने वाली हो, न भ्रान्ति पैदा करे, न ज्ञान से रहित हो, सर्वजन उपकार के लिये हो, दूसरों का अहित न करे, उसके कारण हिंसा न हो। यह सब विचार कर बोले जाने पर वाणी सत्य का स्वरूप लेती है।

बहुत ध्यान से देखें तो सत्य के पालन से सरल और कोई उपाय भी नहीं है, सत्य सरलतम है।असत्य केवल आसानी से खुल जाता है, वरन उसे साधने में प्रयुक्त समय और साधन अन्ततः व्यर्थ हो जाते हैं। हम इतने लोगों से बाते करते हैं, इतने वर्षों तक बोलते रहते हैं कि व्यक्तिविशेष या परिस्थितिविशेष पर बोला हुआ असत्य याद रखना असंभव हो जाता है। हर व्यक्ति के प्रति, हर परिस्थिति के प्रति, स्वार्थ, लाभ या अन्य कारण से, भिन्न बोलना। इसमें अथाह ऊर्जा चली जाती है। मन सदा भ्रमित रहता है, याद रखना पड़ता है कि किसके सम्मुख क्या बोला था। सत्य के साथ यदि छल जुड़ा हो तो वह सत्य नहीं है। जो मन में है, उसे वैसे ही बोल देने में कुछ याद नहीं रखना पड़ता है, विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता है। 

असत्य तब पकड़ा जाता है जब आपके द्वारा की गयी दो विरोधाभासी बातें सबके सामने आती हैं, एक व्यक्ति के समक्ष कुछ और दूसरे के समक्ष कुछ और। चाटुकारिता अल्पकालिक चतुरता भले ही हो जाये पर सत्य के उद्धाटन के बाद वह अत्यधिक वैमनस्यकारी हो जाती है। इसीलिये कहा जाता है कि किसी के अनुपस्थिति में किसी की आलोचना कभी मत कीजिये, साहस हो तो सामने कह दीजिये। किसी व्यक्ति के बारे में आपकी अवधारणा कालान्तर में बदल सकती है, जो आपको अच्छा नहीं लगता था अब अच्छा लगने लगा, तब यह असत्य नहीं कहलायेगा।

मन में कुछ अन्य है, पर परिस्थिति देख कर कुछ अन्य कहना। यथार्थ होने पर भी अपने ज्ञान के अनुरूप बोलना। कुछ और प्रश्न हो, उत्तर कुछ और देना। देखा, सुना और अनुमानित का एक भाग ही बतलाना, अर्धसत्य बतलाना। ये सब असत्य की श्रेणी में आते हैं। वाणी कुछ और बोलती है, शरीर कुछ और बोलता है। देख कर पता चल जाता है। आज भी जैसे ही कोई व्यक्ति कार्यालय में आता है, उसकी भाव भंगिमा का संप्रेषण बहुधा उसके मन का सत्य कह जाता है।

वाणी को बाँधना और मन को साधना कठिन है। जब भी आपके साथ कुछ अप्रिय होता है, कोई आपको दुख पहुँचाता है तो मन में एक विचार श्रंखला चलने लगती है, प्रत्युत्तर की। मन में क्या क्या विद्रूपतायें नहीं आती है? उस समय सत्य का अनुपालन कठिनतम हो जाता है। अच्छा है कि उस समय किसी से संवाद न करें। मन सामान्य स्थिति में आने की प्रतीक्षा करें। जब मन उपद्रव पर उतर आये तो मितभाषी हो जाना ही श्रेयस्कर है। अनियन्त्रित और अमर्यादित वाणी क्या से क्या न करा दे, इस जगत में ?

वाणी का व्यवहार कठिन है पर सत्य से अधिक सहायक और कुछ नहीं। अगले ब्लाग में सत्य को कुछ और व्यावहारिक पक्ष।

18.12.16

भान मुझको, सत्य क्या है

भान मुझको सत्य क्या है ?
सतत सुख का तत्व क्या है ?

किन्तु सुखक्रम से रहित हूँ,
काल के भ्रम से छलित हूँ,
मुक्ति की इच्छा समेटे,
भुक्ति को विधिवत लपेटे,
क्षुब्धता से तीक्ष्ण पीड़ित,
क्यों बँधा हूँ, क्यों दुखी हूँ ?

डगमगाते पैर क्यों हैं,
डबडबाती दृष्टि क्यों है,
राह सामने दीखती है,
क्रुद्ध होकर चीखती है,
बुद्धि का मत छोड़कर क्यों,
अंध मन-पथ जा रहा हूँ ।।

कठिन है यूँ रुद्ध जीना,
बद्ध पीड़ा, पर कही ना,
सौम्यता के आवरण में,
नित प्रवर्धित जाल मन में,
शब्द कैसे सी सकूँगा,
शान्त कैसे जी सकूँगा ।।

व्यक्त मुख पर कृत्रिमता है,
स्वार्थपूरित मृगतृषा है,
मैं अकेला भटकता हूँ,
प्रेम क्षण-कण ढूँढ़ता हूँ ।
कौन जाने, और कब तक,
सहज होगा चित्त मेरा ।।

नहीं वश में, व्यक्त क्या है ?
भान फिर भी, सत्य क्या है ?

30.8.15

बताता हूँ सत्य गहरा

बताता हूँ सत्य गहरा,
आत्म-क्रोधित और ठहरा,
लगा है जिस पर युगों से,
वेदना का क्रूर पहरा ।

मर्म जाना तथ्य का,
जब कभी भी सत्य का,
जानता जिसको जगत भी,
व्यक्त फिर भी रिक्तता,
नित्य सुनता किन्तु अब तक रहा बहरा,
बताता हूँ सत्य गहरा ।

मैं उसे यदि छोड़ता हूँ,
आत्म-गरिमा तोड़ता हूँ,
काल से अपने हृदय का,
क्षुब्ध नाता जोड़ता हूँ ।
स्याह संग जीवन लगे कैसे सुनहरा,
बताता हूँ सत्य गहरा ।

ध्यान सारा बाँटते हैं,
झूँठ मुझको काटते हैं,
आत्म की अवहेलना के,
तथ्य रह रह डाँटते हैं,
नहीं रखना संग अपने छद्म पहरा,
बताता हूँ सत्य गहरा ।

29.10.14

सत्य सदैव अबल है

मन की दिशा प्रबल है,
तर्क, बुद्धि सब यन्त्र प्राय हैं,
सत्य सदैव अबल है ।

आज समाज कालिमा पर, क्यों श्वेत रिक्तता पोत रहा है,
अनसुलझे उन संदिग्धों को, सत्य बनाकर थोप रहा है ।
किन्तु विरोध विरल है ।
तर्क, बुद्धि सब यन्त्र प्राय हैं, सत्य सदैव अबल है ।।१।।

कुछ विचित्र सिद्धान्त बने हैं, स्रोतों का कुछ पता नहीं है,
धन्य हमारी अन्धभक्तिता, जो होता है वही सही है ।
अब जन पीता छल है ।
तर्क, बुद्धि सब यन्त्र प्राय हैं, सत्य सदैव अबल है ।।२।।

सोचो जीवन का रस जाने कहाँ कहाँ पर शुष्क हो गया,
यन्त्रों के अनुरूप बन गया, अर्थहीन, रसहीन हो गया ।
अन्तः बड़ा विकल है ।
तर्क, बुद्धि सब यन्त्र प्राय हैं, सत्य सदैव अबल है ।।३।।

चिन्तन आवश्यक है मन का, सत्य कोई सिद्धान्त नहीं है,
होगी परिपाटी वह कोई, परख बिना स्वीकार्य नहीं है ।
सत्य सदा उज्जवल है ।
मात्र विचारों की दो लड़ियाँ, शान्ति सुधा प्रतिफल है ।।४।।

25.10.14

खोज सुख की

प्रेम की पिपास अन्तर्निहित है जो,
घूमते चहुँ ओर उसके कर्म सारे ।
दे सके जो हर किसी को प्रेम तृप्ति,
बिका उसको कौड़ियों के मूल्य जीवन ।।

प्रेम के आनन्द की ही लालसा में,
जी रहे हैं और सतत ही तृप्त करते,
घर को, समाज को,
देश पर बलिदान को,
मनुजता के आवरण में,
प्रेम का प्रतिबिम्ब पाकर,
स्वयं को सन्तुष्ट करते ।।

हुयी निष्फल चेतना में खोज पूरी, 
ढूढ़ते हैं स्रोत वे स्थूल में भी ।
किन्तु मानव यह तुम्हारा कर्म सारा,
क्या हृदय को प्रेम का सुख दे सकेगा ?
क्या कभी तुमने सहज हो चेष्टा की,
या सहज हो, सत्य का प्रारूप समझा ।।

स्रोत सारे, लिया था आधार जिन पर,
देखते तो, तुम्हे भी यह ज्ञात होता ।
स्वयं ही वे प्यास में दुख पी रहे है,
सुखों का उद्गम, भला वो कहाँ पाते ।।

19.4.14

जीवनी अलमस्त हो

मगन हो अपने विचारों के किनारों में,
जीवनी अलमस्त हो चुपचाप बहती जा रही थी ।
कहीं पर गाम्भीर्य की गहराइयों का,
और उत्श्रंखल विनोदों का कहीं मिश्रण बनी थी ।
कहीं पर हो संकुचित व्यवधान से,
और समतल में कहीं विस्तार की जननी बनी थी ।
वक्रता के थे किनारे इस जगत में,
काटती रहती उन्हें, उस वक्रता से रहित करती ।
मार्ग के सब अनुभवों का रस समेटे,
हो बड़ी निश्चिन्त वह जीवन समर में जा रही थी ।

किन्तु तब नियमित कलापों से व्यथित हो,
मनदशा रसहीनता को अग्रसर थी ।
इस असत भू के हृदय में सत्य क्या है,
मनस सागर में दबी इच्छा प्रबल थी ।।

व्यक्ति का जीवन विरह है,
इस विरह का सत्य क्या है ?
सतत मानव से विलग उस,
तत्व का अस्तित्व क्या है ?
शान्त सब जीवन बिताते,
किन्तु उसमें सत्व क्या है ?
अन्ध जीवन की दशा पर,
सत्य का वक्तव्य क्या है ?

ज्ञान की हैं कठिन राहें,
तर्क के कंकड़ बिछे हैं,
पथ प्रदर्शक भी नहीं है,
सत्य-चिन्तन चिर असम्भव ।

इन विचारों के प्रचण्डित धुन्ध में,
जीवनी भी पन्थ अपना खो रही है ।
बहु-प्रतीक्षित सत्य भी यदि सरल न हो,
तो मुझे उस सत्य की इच्छा नहीं है ।।

जीवनी अलमस्त हो चुपचाप बहना चाहती है ।
चित्र साभार - freehdw.com

18.1.14

सत्य जो है

हम कहेंगे, तुम कहोगे, तथ्य जो है,
तभी निकलेगा हृदय से, सत्य जो है।

रंग पक्षों के चढ़ाये घूमना था,
क्यों बताओ सूर्य का शासन चुना था?

मूढ़ से मुण्डी हिलाते, हाँ या ना,
सीखनी थी मध्य की अवधारणा।

गुण रहे आधार, चिन्तन-मूल के,
तब नहीं हम व्यक्ति को यूँ पूजते।

भय सताये, प्रीति आकुल, भ्रम-मना,
मिल रही है सत्य को बस सान्त्वना।

मन बहे निष्पक्ष हो, निर्भय बहे,
तार झंकृत, स्वरित लहरीमय बहे।

नियत कर निष्कर्ष, बाँधे तर्क शत,
बुद्धिरथ दौड़ा रहे, आश्वस्त मत।

हो सके तो सत्य को भी बाँट लो,
यथासुविधा, हो सके तो छाँट लो।

या तो फिर निर्णय करो, मिल बैठ कर,
तथ्य के आधार, गहरे पैठ कर।

त्यक्त संशय, धारणा, मन व्यक्त हो,
जूझना, जब तक न एकल सत्य हो। 

साधनारत बुद्धि का उत्पाद जग को चाहिये,
एक सम्मिलित सार्थक संवाद जग को चाहिये।

कहें पीड़ा और की हम, कथ्य जो है,
आज सब मिलकर कहेंगे, सत्य जो है।

5.12.12

संस्कृति बुलाती है

मानव अपनी जड़ों से जुड़ना चाहता है, उसे अच्छा लगता है कि वह अपने इतिहास को जाने, उसे अच्छा लगता है यह जानना कि अपने पूर्वजों की तुलना में उनका जीवन कैसे बीत रहा है। हो सकता है कि इतिहास का कोई प्रायोगिक उपयोग न हो, हो सकता है कि इतिहास केवल तथ्यात्मक हो और उससे भविष्य में कोई लाभ न मिले। जो भी हो हमें फिर भी उनके बारे में जानना अच्छा लगता है, रोचकता भी रहती है।

बड़ा स्वाभाविक भी है यह व्यवहार, हम सब कुछ ऐसा करना चाहते हैं कि हमारे न रहने पर भी हमारा नाम यहाँ बना रहे। यह चाह न केवल हमें कुछ विशिष्ट करने को उकसाती है, वरन अपनी गतिविधियों को लिपिबद्ध करने को प्रेरित करती है। हम अपने बारे में सूचनायें न केवल लिखित रूप में संरक्षित करते हैं, वरन भवनों, किलों, सिक्कों आदि के रूप में भी छोड़ जाते हैं। घटनायें होती हैं, उनके कारण होते हैं, कहानियाँ बनती हैं, उनके कई पक्ष उद्धाटित होते हैं। इन सबका सम्मिलित स्वरूप इतिहास का निर्माण करते हैं। विशिष्ट लोग या विशिष्ट घटनायें या विशिष्ट शिक्षा, बस यही शेष रह जाता है, अन्यथा सारे जनों की सारी घटनायें कौन लिखेगा और कौन पढ़ेगा?

जहाँ एक ओर इतिहास गढ़ने की स्वाभाविक इच्छा हमारे अन्दर है, वहीं दूसरी ओर इतिहास पढ़ने की भी इच्छा सतत बनी रहती है। इतिहास के माध्यम से हम उन स्वाभाविक समानताओं को ढूढ़ने का प्रयास करते हैं जो हमें अपने पूर्वजों से जोड़े रहती है। यही वो सूत्र हैं जो संस्कृति का निर्माण करते हैं। ये सूत्र आचार, विचार, प्रतीकों के रूप में हो सकते हैं। ये सूत्र जितने गाढ़े होते हैं हम अपने आधार से उतना ही जुड़ा पाते हैं, अपने जीवन को उतना ही सार्थक मानते हैं।

हम भारतीय बहुत भाग्यवान है कि हमारे पीछे संस्कृति के इतने विशाल आधार हैं, ज्ञात इतिहास की पचासों शताब्दियाँ हैं। इतिहास की सत्यता पर भले ही संशय के कितने ही बादल छाये हों पर फिर भी एक वृहद इतिहास उपस्थित तो है। देर सबेर संशय के बादल छट जायेंगे और हम सत्य स्पष्ट देख पायेंगे। तब तक विशाल संस्कृति की उपस्थिति ही हमारे लिये गर्व का विषय है।

प्राचीन इतिहास को समझने में अभी और समय लगेगा, अभी और प्रयास लगेंगे, पर यह एक स्थापित सत्य है कि अंग्रेजों ने भारतीयों पर अपना शासन अधिक समय तक बनाये रखने के लिये बहुत ही कुटिल नीति के अन्तर्गत कार्य किया। सामरिक श्रेष्ठता ही पर्याप्त नहीं होती है शासन के लिये, उसमें सदा ही विद्रोह की संभावना बनी रहती है। सांस्कृतिक श्रेष्ठता ही लम्बे शासन का आधार हो सकती है। अंग्रेजों ने यहाँ की जीवनशैली देखकर यह तो बहुत शीघ्र ही समझ लिया था कि स्वयं को सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ सिद्ध कर पाना उनकी रचनात्मक क्षमताओं के बस की बात नहीं थी। तब केवल एक ही हल था, विध्वंसात्मक, वह भी शासित की संस्कृति के लिये।

फिर क्या था, शासित और शापित भारतीय समाज की संस्कृति पर चौतरफा प्रहार प्रारम्भ हो गये। इतिहास को हर ओर से कुतरा गया, राम और कृष्ण के चरित्रों को कपोल कल्पना बताना प्रारम्भ किया गया और वेद आदि ग्रन्थों को चरवाहों का गाना। अपने आक्रमण को सही ठहराने के लिये आर्यों के आक्रमण के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया गया। आर्य और द्रविड के दो रूप दिखा भिन्नताओं को भारतीय समाज को छिन्न करने का आधार बनाये जाना लगा। जो भी कारक हो सकते थे फूट डालने के, भिन्नतायें उजागर करने के, सबको बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया। पर्याप्त सफल भी रहे अंग्रेज, अपने अन्धभक्त तैयार करने में, अंग्रेजों के द्वारा रचित इतिहास हम भारतीय बहुत दिनों तक सच मानते भी रहे।

स्वतन्त्रता मिलने के पश्चात हम अपने उस अस्तित्व को स्वस्थ करने में व्यस्त हो गये जो अंग्रेजों की अधाधुंध लूट और फूट के कारण खोखला हो चुका था। संस्कृति के विषय पर बहुत अधिक मनन करने का अवसर ही नहीं मिला हमें। संस्कृति के बीज भले ही कुछ समय के लिये दबा दिये जायें पर उनके स्वयं पनप उठने की अपार शक्ति होती है। जिन सूत्रों ने पचासों शताब्दियों का इतिहास देखा हो, न जाने कितनी सभ्यताओं को अपने में समाहित होते देखा हो, वे स्वयं को सुस्थापित करने की क्षमता भी रखते हैं।

पिछले दो वर्षों से मुझे भारतीय बौद्धिकता इस दिशा में जाती हुयी दिखायी भी पड़ रही है। पाश्चात्य की चकाचौंध तो सबके जीवन में आती है, प्रभावित करती है पर बहुत अधिक दिनों तक टिक नहीं पाती है, अन्ततः व्यक्ति अपनी जड़ों की ओर लौट कर आता है। हिन्दी के बारे में तो ठीक से नहीं कह सकता हूँ पर पिछले दो वर्षों में न जाने कितनी ही अंग्रेजी पुस्तकें देख रहा हूँ, जो भारतीय लेखकों ने लिखी हैं और सब की सब अपनी जड़ों को खोजने का प्रयास करती हुयी। न केवल वे मौलिक शोध कर रहे हैं, वरन यथासंभव वैज्ञानिक विधियों का आधार भी ले रहे हैं।

मैं पुस्तकें देखने नियमित जाता हूँ, वहीं से मुझे बौद्धिकता की दिशा समझने में सरलता भी होती है, हर सप्ताह कौन सी नयी पुस्तकें आयी हैं, यह जानने की उत्सुकता बनी रहती है। चाहे अश्विन सांघी की 'चाणक्या चैंट' या 'कृष्णा की' हो, अमीष त्रिपाठी की 'इम्मोर्टल ऑफ मेलुहा' या 'सीक्रेट ऑफ नागाज़' हो, रजत पिल्लई की 'चन्द्रगुप्त' हो, नीलान्जन चौधरी की 'बाली एण्ड द ओसियन ऑफ मिल्क' हो, अशोक बन्कर की 'सन्स ऑफ सीता' हो, आनन्द नीलकण्ठन की 'असुरा' हो, स्टीफेन नैप की 'सीक्रेट टीचिंग ऑफ वेदा' हो, सारी की सारी पुस्तकें संस्कृति के किसी न किसी पक्ष को खोजती है।

ये सारी पुस्तकें पढ़ने की प्रक्रिया में हूँ, ये रोचक भी हैं और तथ्यात्मक भी। आप भी पढ़िये, तनिक ध्यान से सुनिये भी, संस्कृति बुलाती है।