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11.8.26

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त


कर्मबन्ध, संस्कार,

चित्तवृत्ति, क्लेश पार,

उस ओर अकेले बैठ गया,

मेरा परिचय ही निर्विकार।


विषय रमण, झंकृत मन,

सुख साधन पर सतत मनन,

किस आगत के असमंजस में,

पथ सृजन शून्य, जग निर्जन वन।


मति विरुद्ध, भाव क्रुद्ध,

बंध जटिल, कंठ रुद्ध,

आलम्बन के एकाग्र क्षितिज, 

द्वन्द्व आलोड़न से विगत बुद्ध।


शब्द पृथक, पृथक ज्ञान,

अर्थ पृथक, अनुभव प्रधान,

सब सम्मिलित होकर हुये एक,

संयम ने साधे समाधान।


विलग पूर्ण, पूर्ण विलय,

बाधित क्रम, अवगुंठित लय,

जगती प्रवाह, पर स्थिर मन,

स्थिर गति, स्थिर हुआ समय।


न मुक्त रहा, न हुआ युक्त,

किस आकर्षण जीवन प्रयुक्त,

कारक, कर्ता, क्रम डोल रहे,

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त। 

15.7.21

सात चक्र - सरलीकरण

 

योग शब्द युज् धातु से आया है। युज् घातु तीन अर्थों में प्रयुक्त होती है। संस्कृत व्याकरण में लगभग २००० धातुयें हैं जो १० गणों में विभक्त हैं। हर गण का एक विकिरण प्रत्यय होता है जिससे उसके रूप भिन्न होते हैं। युज् धातु भी तीन गणों में है और हर गण में उसका भिन्न अर्थ है। रोचक यह भी है कि सारी धातुयें किसी क्रिया को ही बताती हैं। धातुओं से ही सारे शब्द उत्पत्ति पाते हैं अतः यह तथ्य शब्द के उत्पत्ति के क्रियात्मक मूल को सिद्ध करता है। शब्दों के मूल में जाने से उसमें निहित क्रियायें और सन्निहित गुण पता चलते हैं। उदाहरण के लिये राम शब्द रम् धातु से आया है, अर्थ है रमना, क्रीडा करना, प्रसन्न होना। राम का शाब्दिक अर्थ है, जो हर्षदायक हो। इसी प्रकार जल या अग्नि के लिये प्रयुक्त भिन्न शब्द उनके भिन्न गुणों को व्यक्त करते हैं।


युज् धातु के तीन अर्थ इस प्रकार हैं।

  1. युज् समाधौ (४.७४) - चित्त स्थिर करना, बराबर स्थित होना, समत्व में होना। समाधि (सम आ धा), धा धारणे।
  2. युज् योगे (७.७) - जुड़ना, मिलना, एकत्र करना।
  3. युज् संयमने (१०.३३८) - संयत करना, बाँधना, वश में रखना। संयम (सम् यम), यम उपरमे।

उपरोक्त तीनों ही अर्थ योग प्रक्रिया को समझने में सहायक हैं। ये अर्थ पिछले ब्लाग में वर्णित योगसूत्र और गीता के तीन कथनों को और भी स्पष्ट करते हैं। पहले और दूसरे अर्थ स्थितिबोधक हैं, तीसरा अर्थ प्रक्रियाबोधक हैं। शब्द का अर्थ या अर्थ का मन्तव्य समझने में यदि कोई संशय रहता है तो उसकी धातु का विश्लेषण कर हम तात्पर्य समझ सकते हैं। 


योग के अर्थ, सिद्धान्त और व्यवहार को तो क्रमशः व्याकरण, योगसूत्र और गीता के माध्यम से समझा जा सकता है पर उनको जीवन में प्रयुक्त करने में सतत प्रयत्न करना पड़ता है। अष्टाङ्गयोग की प्रक्रिया और योगेश्वर की व्याख्या अन्ततः उस वर्तमान पर आकर ठहरती है जिसे हमें निभाना होता है। वही हाथ में रहता भी है और कुछ नियन्त्रण में भी। सारे के सारे उपाय, ज्ञान, उपक्रम उसी एक क्षण को निभाने के लिये आपको तैयार करते हैं, जिसे वर्तमान कहा जाता है। जो हो रहा है, यत वर्तते, वह वर्तमान। आने के पहले वह भविष्य था, बीतते ही वह भूत हो जाता है, एक क्षण ही है वर्तमान। विस्तार करना चाहें तो जीवन कम पड़ जायेंगे और संक्षिप्त करें तो एक क्षण में सिमट जाता है सब कुछ। अनुभव अन्ततः यही सिखाता है कि वर्तमान को कैसे निभायें। 


काल बड़ा निर्दयी होता है। वर्तमान के उसी एक क्षण में ही हमें संकुचित कर देता है, न एक क्षण उधर, न एक क्षण इधर। यदि उस क्षण पर भी हमारा नियन्त्रण न रहा तो कुछ भी नियन्त्रण में नहीं रहेगा। यदि कर्तव्य के उस क्षण में हम भूत या भविष्य के विकल्प में उलझे रहे तो कुछ भी नहीं मिलेगा। जो भी हमें तैयारी करनी है, जो भी हमें संस्कार डालने हैं, उसी एक क्षण को निभाने के लिये, जो वर्तमान है। गीता(४.६) में कृष्ण कहते हैं कि मृत्यु के क्षण हमारी मनोदशा हमारा नया जन्म निश्चित कर देती है, अतः अन्तकाल में कृष्ण का स्मरण करना चाहिये। साधकों के सारे जीवन बस इसी तैयारी में निकल जाते हैं कि मृत्यु के क्षण में वह शक्ति और सामर्थ्य रहे कि ईश्वर का स्मरण मन में रह सके।


मृत्यु का क्षण दो जन्मों को विभक्त करता है अतः उस पर प्रयुक्त मनःस्थिति महत्वपूर्ण दिखती है। वर्तमान के क्षण को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखें तो वह भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अगले ही क्षण मन की एक नयी स्थिति होती है, एक नया जन्म होता है। अनुभव के आधार पर वर्तमान के उसी क्षण को निभाने के सरल से कुछ प्रयास करता हूँ। समर्थ नहीं हूँ, बहुधा काल के द्वारा ढकेल दिया जाता हूँ। मानसिक दुर्बलतायें प्रबल हो जाती हैं, जो चाहता हूँ, जो सोचता हूँ, वह नहीं कर पाता हूँ। फिर भी सभी प्रयासों को कोटिबद्ध कर व्यक्त कर रहा हूँ। 


  1. स्मृतियों को निष्कर्ष दें। राग, द्वेष से उन्हें मुक्त करें। अस्मिता (यह मैंने किया है) से बचें। टालना उचित नहीं हैं, यदि ऐसा किया तो वे पुनः लौटकर आयेंगी। यथासंभव उनकी तीक्ष्णता मन्द करें।
  2. कल्पना सृजनशीलता के लिये तो अच्छी है पर कब वह चिंता के ग्रास में चली जाती है, पता ही नहीं चलता है। कार्यविशेष से ही भविष्य में विचरण करें और शीघ्र ही वर्तमान में लौट आयें। बीच में अपने से प्रश्न अवश्य पूछें कि यह चिंता किस चिन्तन की भटकन है?
  3. कुछ ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं, कुछ पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं या देख रहे हैं तो उस समय और किसी विचार को न आने दें, सप्रयास। मन उकता जाता है, भागता है। ध्यान का तनिक अभ्यास इसमें सहायक होता है। बीच बात में बोलने के क्रम पर संयम रखे। यह इसलिये होता है कि हम सुनते समय सीखने के स्थान पर सोचने लगते हैं और स्वयं को व्यक्त करना चाहते हैं।
  4. किसी कर्म में लगे हो तो तन्मय होकर करें, शत प्रतिशत। एक साथ कई कार्य करने से दोनों से ही न्याय नहीं होता है और मन भटकता है सो अलग। एकाग्रता से समय, ऊर्जा की बचत तो होती ही है, साथ में कार्य की गुणवत्ता भी स्तरीय होती है। सम्यक रूप से निष्पादित कर्म तृप्ति की अनुभूति कराता है, अपने निष्कर्ष को पा जाता है, अन्यथा स्मृतियों में नहीं आता है।
  5. जब विश्राम करने जायें, इतना क्लान्त हो जायें कि मन को भ्रमण करने के लिये कुछ अवसर ही न मिले। निद्रा के हर क्षण में शरीर स्वयं को ऊर्जा से पुनः पूर्ण भरता रहे, प्रतिदिन। दिनभर के अतृप्त क्षण, अतृप्त निष्कर्ष रात्रि में आपको असहाय पा हाहाकार न मचाने पायें, इसके लिये आवश्यक है कि उनको यथासंभव, यथाप्रयास और यथासमय निष्कर्ष पर पहुँचाया जाये।  
  6. जब कुछ करने को न हो, कुछ जानने को न हो, स्मृति और कल्पना में मन आड़ोलित न हो, मन चैतन्य हो, तब शान्त बैठकर स्वयं को ही निहारें। प्रश्नों को पूछें, उत्तरों को ढूढ़ें। यह एकान्त अन्वेषण कई उलझनों को सुलझा देता है। एकान्त न सह पाने की प्रवृत्ति तभी आती है जब हम प्रश्नों से भागना चाहते हैं। हमें यह भय रहता है कि संभावित उत्तर हमको उद्वेलित कर जायेंगे, हमारे तथाकथित स्थिर जीवन को अस्थिर कर जायेंगे। मुझे तो लगता है कि जीवन के सर्वाधिक उत्पादक क्षण वे थे जब हाथ में कुछ करने को नहीं था, मन में कुछ सोचने को नहीं था।


प्रयास करता हूँ कि वर्तमान में जी सकूँ। बहुधा भटकता हूँ पर यथासम्भव वापस लौटने का प्रयत्न करता हूँ।

13.7.21

सात चक्र - व्यवहार


योगसूत्र और गीता में योग की तीन परिभाषायें मिलती हैं।

  1. योगः चित्तवृत्ति निरोधः (योगसूत्र १.२)- योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
  2. समत्वं योग उच्यते (गीता २.४८) - समत्व योग कहलाता है।
  3. योगः कर्मषु कौशलम् (गीता २.५०) - योग कर्मों में कुशलता है।


इसके अतिरिक्त सांख्यदर्शन “पुरुष का प्रकृति से स्वयं को पृथक कर अपने स्वरूप में स्थित होने” को योग कहता है। यह परिभाषा “तब दृष्टा अपने स्वरूप में अवस्थित होता है (तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् - योगसूत्र १.३)” के जैसी ही है। बस प्रकृति से पुरुष(दृष्टा, स्वयं) को पृथक करने की विधि “चित्त की वृत्तियों का निरोध” है। अपने स्वरूप में स्थित होने के बाद आत्मा की क्या स्थिति होती है, उस पर योगसूत्र मौन है। यद्यपि गीता उस स्थिति का भी वर्णन करती है पर वह प्रकरण वर्तमान विषय की परिधि के बाहर है।


उपरोक्त तीन कथन हमें योगपथ पर जीवन निर्वाह करने की विधि बताते हैं। प्रथम कथन उस स्थिति को बताता है जहाँ पर आपको पहुँचना है, वह साध्य है। द्वितीय कथन उस समत्व मनःस्थिति को बताता है जिसमें रह कर साध्य तक पहुँचना है। तृतीय कथन उस मनःस्थिति में किये कर्मों के परिणाम को बताता है, कुशलता को परिभाषित करता है।  तीनों ही कथन एक दूसरे से भिन्न नहीं है। जहाँ प्रथम कथन योग का सैद्धान्तिक पक्ष बताता है, शेष दो कथन योग के व्यवहारिक पक्ष को स्पष्ट करते हैं। समुचित मनःस्थिति से कर्मों में कुशलता आयेगी और दोनों अन्ततः चित्त की वृत्तियों के निरोध में सहायक होंगे।


तीनों कथनों के परस्पर सम्बन्धों का विश्लेषण अत्यन्त रोचक है। पहला तो एक स्पष्ट संदेश है कि कर्मों में प्रवृत्त होना ही पड़ेगा। “सकल पदारथ है जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” बिना कर्म किये मन की अवस्थाओं को निष्पत्ति नहीं मिलेगी। योगपथ पर पलायन की मानसिकता स्वीकार्य नहीं है, वर्तमान का सामना करना होगा, स्मृतियों और कल्पना को भी निभाना होगा, ज्ञान प्राप्त करना होगा और कर्म में प्रवृत्त भी होना होगा।


योग जहाँ एक ओर कर्मों में प्रवृत्त होने के लिये उकसा रहा है वहीं दूसरी ओर उनमें पसर जाने के लिये मना भी कर रहा है। कर्म करिये पर निस्पृह भाव से, सम्यक ज्ञान पाकर, राग-द्वेष के बिना, ममत्व के भाव से विलग और स्वयं को असीमित और कालातीत मानकर। बिना इसके समत्व कहाँ से आयेगा? “शीतोष्ण सुखदुःखदा”, सुख दुख को शीत और ऊष्ण सा ग्रहण करने का भाव, उसी प्रकार सहन करने का भाव। जिस प्रकार हम अत्यधिक सर्दी और गर्मी से विचलित नहीं होते, सहते हैं और अपने कार्यों में लगे रहते हैं, ठीक उसी प्रकार कर्म करने को कहती है गीता। बिना समत्व के कर्मों में कुशलता नहीं आती, संतुलन आवश्यक है। विचलित न हो जायें, निर्णय प्रक्रिया प्रभावित न हो जाये, उसके लिये दृढ़ होना आवश्यक है। बिना सहे, बिना अभ्यास किये, बिना दृढ़ हुये समत्व कहाँ से आयेगा?


योग की व्याख्या में जायेंगे तो वैज्ञानिक रूप से इस प्रक्रिया को समझाया गया है, पर वह उसका सैद्धान्तिक पक्ष है, गीता उसे कर्म में अनुवादित कर उसका व्यवहारिक पक्ष बताती है। योग के अनुसार कोई भी कर्म या विचार अपनी छाप छोड़ जाता है, इसे संस्कार कहते हैं। यह संस्कार कितने गहरे और व्यापक हैं, यह इस पर निर्भर करेगा कि आपने किस संलग्नता और संलिप्तता से उसे निष्पादित किया है। वह आपका अंग बन जाते हैं और आपके भविष्य को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। वह आपके चिन्तन का अंग बन जाते हैं और स्मृति में आने का अधिकार रखते हैं। यथोचित वातावरण में वे संस्कार प्रकट हो जाते हैं। बचपन में मिले अच्छे संस्कार बड़े बड़े प्रलोभनों से बचा लेते हैं, भटकने से बचा लेते हैं। वहीं दूसरी ओर कुसंगति में मिले बुरे संस्कार पापकर्म में प्रवृत्त कर देते हैं।


योग में साध्य स्थिति में पहुँचने के लिये सारे संस्कार क्षीण होना आवश्यक है, अच्छे और बुरे दोनों ही। यदि ऐसा नहीं होता है तो चित्त में वृत्तियाँ उत्पन्न होंगी और आप कर्म में प्रवृत्त होंगे। यदि मान लिया कि समत्व भाव में रहने से नये संस्कार नहीं बन रहे हैं, पर उन संस्कारों का क्या, जो जन्म जन्मान्तर से हमारे सूक्ष्म शरीर में चिपके हैं और हमारे जन्मों का कारण हैं? योग के अनुसार ऋतम्भरा की स्थिति में पहुँचने से उन सारे कर्मबन्धनों का स्वतः ही नाश हो जाता है और हम मुक्त हो जाते हैं। उस समय हम कैवल्य की स्थिति में पहुँच जाते हैं, कैवल्य इसलिये कि उस समय हमारे पास भूत का कोई भार नहीं होता है, हम अपने स्व में स्थित होते हैं।


गीता योग के इसी सिद्धान्त के व्यवहारिक पक्ष को समझाती है। कृष्ण को योगेश्वर इसीलिये कहा जाता है कि उन्हें योग की सूक्ष्मताओं में एक सिद्धहस्तता थी। जीवन में, समाज में, व्यवहार में कैसे योग निभायें, उसे बड़े ही सरल, सुग्राह्य और स्पष्ट रूप से व्याख्यायित करती है गीता। योगसूत्र के सिद्धान्त समझने के बाद गीता पढ़ना आवश्यक है। भक्ति, ज्ञान और कर्ममार्ग की भिन्नता और एकता, दोनों में ही व्यवहारिक सारल्य दिखाती है गीता। कर्मफल के साथ क्या करना है, क्यों करना है, कैसे करना है, किस भाव से करना है? कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म कैसे देखना है? दृष्टिभेद से किस प्रकार सृष्टिभेद हो जाता है? न जाने कितनी गहन सूक्ष्मताओं से भरी है गीता। हर बार पढ़िये और जितनी सामर्थ्य हो, जितनी मन की चेतना हो, उतने रत्न निकाल लाइये।


इस परिप्रक्ष्य में मेरा अनुभव और मेरी प्रार्थना यही है कि योगसूत्र और गीता को साथ साथ पढ़ा जाये। योग के सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पक्ष को साथ साथ समझा जाये। कर्म, ज्ञान और भक्ति को साथ साथ जिया जाये। दृष्टि और सृष्टि के साम्य को सकल विश्व के साथ निभाया जाये।


सात चक्रों में बढ़ने के लिये, काल की कलाओं को समझने के लिये, स्मृति और कल्पना में साम्य बिठाने के लिये, गीता को आत्मसात करने की आवश्यकता है, अपने अनुसार व्यवहार में लाने की आवश्यकता है, प्रक्रियागत सरलीकरण की आवश्यकता है। प्रक्रिया के कुछ पक्ष समझेंगे अगले ब्लाग में।

9.11.19

अभ्यास और वैराग्य - २४

जब एक ही विषय पर धारणा, ध्यान और समाधि क्रमपूर्वक लगे तो उसका पारिभाषिक नाम संयम है। यह लौकिक संयम से तनिक भिन्न है। जब समाधि लगने लगती है तो विषय उत्तरोत्तर सूक्ष्म होते जाते हैं। अनन्त विषय हैं, संयम के लिये, लगभग सारे ही स्थूल और सूक्ष्म विषयों पर, भावों पर, विचारों पर, शब्दों पर, मन्त्रों पर, सब पर ही संयम किया जा सकता है।

संयम का जय होने पर प्रज्ञा का आलोक हो जाता है, विषय प्रकट हो जाते है। ज्ञान से समझ और प्रकाशित हो जाती है। यही समझ समाधि का प्रत्यक्ष है, उससे प्रज्ञा बढ़ती जाती है, समझ की गहराई बढ़ती है। जैसे जैसे संयम स्थिर होता है, प्रज्ञा उतनी ही निर्मल (विशारदी) होती जाती है। यह अनुकूल स्थिति अभ्यास से बनती जाती है। पहले पहले समझ अस्पष्ट होती है, धीरे धीरे स्पष्ट होती जाती है। धारणा के समय विषयगत ज्ञानवृत्तियाँ अपनी अस्पष्टता तजकर समाधि की स्थिति में पूर्ण स्पष्ट हो जाती हैं। 

संयम का प्रयोग भिन्न भिन्न भूमियों में होता है। भूमियों का स्तर धीरे धीरे बढ़ता जाता है। पिछली सीढ़ी अगले के विनियोग के लिये सहायक होती है। प्रक्रिया है, पहले स्थूल से प्रारम्भ करेंगे, धीरे धीरे सूक्ष्म पर जाते जायेंगे। सीधे ऊपर की सीढ़ी में नहीं पहुँच सकते हैं। ईश्वर की कृपा से यदि किसी ने उत्तर की भूमि को जीत लिया है जो उसे उनसे अधर भूमियों में संयम करने की आवश्यकता नहीं है। उसे निम्न भूमियों का साक्षात्कार करने की आवश्यकता ही नहीं है। जब ईश्वर की कृपा हो गयी और निम्न भूमियों को अन्य विधि से जान लिया है, तो संयम से जानने की क्या आवश्यकता है?

अगली भूमि कौन सी होगी, योग ही अपने आप उसे बता देगा, ज्ञान हो जायेगा। जैसा कि पहले भी चर्चा हो चुकी है, योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते। योग के द्वारा योग जाना जाता है और योग से ही योग आगे बढ़ता है। योग के प्रति जो अप्रमत्त है वह योग में अधिक रमता है। जो भटकता नहीं है, मदमत नहीं होता है, वही देर तक योग में रहता है। हमें ज्ञान से सुख मिलता है, ज्ञान से दृष्टि मिलती है, भटकाव रुक जाता है। ज्ञान का सुख लौकिक सुख से अधिक होता है, पर क्षीण तो वह भी होता है। इसी प्रकार समाधि से प्राप्त ज्ञान का सुख और भी अधिक होता है, पर क्षीणता उसमें भी आती है। बस परमात्मा का सुख बिना क्षीणता के होता है। 

विषयगत समाधि को सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं, क्योंकि इसमें हमें कुछ ज्ञात रहता है। सम्प्रज्ञात समाधि के चार चरण हैं, वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता, ये क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाती है। जैसा कि योग की परिभाषा में कहा गया था कि योग चित्त की वृत्तियाँ का निरोध है, पर सम्प्रज्ञात समाधि में विषय भी रहता है और संबंधित वृत्तियाँ भी। इससे परे असम्प्रज्ञात समाधि होती है, जिसे निर्बीज समाधि भी कहते हैं, इसमें वृत्तियों का अभाव होने लगता है, इसमें सम्प्रज्ञात का अभाव हो जाता है। यह परवैराग्य होने पर होती है।

संयम की प्रक्रिया में चित्त में परिवर्तन आते हैं, इन्हें परिणाम कहते हैं। सर्वार्थता (चंचलता) से एकाग्रता आने के क्रम को समाधि परिणाम कहते हैं। इसमें सर्वार्थता और एकाग्रता का क्रमशः क्षय और उदय होता है। इसमें शान्त होने वाली वृत्ति चंचलता की है और उदित होने वाली वृत्ति एकाग्रता की। जब शान्त होने वाली और उदित होने वाली वृत्ति एक सी या तुल्य हों तो उसे एकाग्रता परिणाम कहते हैं। और अन्ततः जब वृत्तियाँ उठनी बन्द हो जायें तो उसे निरोध परिणाम कहते हैं।

वृत्तियाँ संस्कार को जन्म देती हैं, संस्कार कालान्तर में वृत्तियों को जन्म देते हैं। यह क्रम सतत है क्योंकि संस्कार ही हमारे कर्माशय में एकत्र रहते हैं और उचित समय और वातावरण पाकर प्रस्फुटित होते हैं। निरोध परिणाम के समय जब कोई वृत्ति नहीं है, तब चित्त में क्या होता है? उस समय निरोध संस्कार उत्पन्न होते हैं। प्रश्न उठ सकता है कि यदि वृत्ति नहीं तो संस्कार कैसे? चित्त को वृत्तिरहित क्षणों का बोध रहता है, उसका भी संस्कार पड़ता है। निरोध परिणाम संस्कारों के स्तर पर होता है।

असम्प्रज्ञात समाधि में आये निरोध परिणाम के कारण निरोध संस्कार व्युत्थान संस्कार का स्थान लेते जाते हैं। जब निरोध संस्कार प्रबल होते हैं तो वह प्रशान्तवाहिता की स्थिति होती है। जब समाधि टूटती है तो व्युत्थान संस्कार पुनः आ जाते हैं। यह क्रम चलता रहता है, अभ्यास से, वैराग्य से, कैवल्य की प्राप्ति तक। जब कोई संस्कार शेष नहीं रहते तो मुक्ति है। जब संस्कार नहीं शेष तो वापस इस संसार में आने का कारण नहीं। और जब तक इस संसार में हैं भी, तो निर्लिप्त, विदेह, प्रकृतिलय।
यह संयोग ही रहा कि दो दिन पूर्व कोयम्बटूर जाना हुआ। वहाँ पर ईशा ध्यान केन्द्र में प्राणप्रतिष्ठित ध्यानलिंगम् के समक्ष ध्यान लगाने का अवसर मिला। अद्भुत अनुभव था वह। बाहर प्रांगण में आदियोगी की ध्यानस्थ प्रतिमा निहार कर मंत्रमुग्ध सा खड़ा रहा। अद्भुत शान्ति, अद्भुत सुख, अद्भुत तृप्त शिव समाधिस्थ थे। 

यद्यपि सिद्धियों के बारे में लिखने की पूर्वयोजना थी पर आदियोगी को रमा देखकर वे वृत्तियाँ अवसान पा गयीं। अभ्यास और वैराग्य के प्रकरण को यहीं विराम। शेष फिर कभी।

5.11.19

अभ्यास और वैराग्य - २३

ध्यान के समय ध्येय, ध्याता और ध्यान रहते हैं। ध्येय में भी तीन तत्व रहते हैं, शब्द, प्रत्यय और अर्थ। शब्द उसका नाम है, प्रत्यय उसके बारे में ज्ञान है और अर्थ वह वस्तु या विषय स्वयं। पद शब्द है और पदार्थ उस शब्द का वास्तविक स्वरूप, जो पद को अर्थ दे। लड्डू शब्द है, उसका गोल होना, मीठा होना उसके बारे में ज्ञान है और स्वयं ही लड्डू अर्थ है।

ध्यान के समय हम ध्येय के बारे में प्रत्यय की एकतानता करते हैं। समाधि में यही इतनी गहरी हो जाती है कि उस स्थिति में शेष कुछ न होकर मात्र अर्थ ही रह जाता है। तब न ध्येय रहता है, न शब्द, न प्रत्यय, न ध्याता। न इस बात का भान कि ज्ञान हो रहा, न इस बात का भान कि ध्यान हो रहा है, न उस बात का भान कि मैं ध्यान कर रहा हूँ। सब मिलकर अर्थ में लीन हो जाते हैं। यह समझने में तनिक कठिन लगता है क्योंकि हमारी लौकिक समझ ज्ञान के पर्यन्त नहीं जा पाती है। 

एक लौकिक उदाहरण लेते हैं। जब हम कोई फिल्म देख रहे होते हैं तो कभी कभी किसी पात्र के साथ स्वयं को इतना जोड़ लेते हैं कि उसके भाव हमारे भाव हो जाते हैं। यदि वह कष्ट में होता है तो हमें कष्ट होने लगता है, यदि वह हँसता है तो हम हँस देते हैं। यह वही समाधि की स्थिति है, न फिल्म, न अभिनेता, न हाल, न कुर्सी, न यह भान कि फिल्म देखी जा रही है। न अभिनेता का नाम, न उसका अन्य ज्ञान। बस उसका अर्थ, उसका भाव प्रस्फुट हो जाता है। संभवतः यही आधार रहा होगा जिस पर कश्मीर के उद्भट विद्वान अभिनवगुप्त ने यह सिद्ध किया कि नाट्यशास्त्र में रस की उत्पत्ति चित्त में ही होती है। जिसके कारण रस उत्पन्न होता है, वे बस उद्दीपन मात्र हैं।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥३.३॥ सूत्र का एक एक शब्द समाधि का वर्णन कर रहा है। तत् एव अर्थ मात्र निर्भासं स्वरूपशून्यम् इव समाधिः। तत् अर्थात ध्यान की स्थिति में, अर्थ मात्र निर्भासं अर्थात केवल अर्थ का भान, स्वरूपशून्यं अर्थात न स्वयं का ज्ञान, न वस्तु के स्वरूप का ज्ञान। कहा जाता है कि ईश्वर सत, चित और आनन्द स्वरूप है। यदि हम ईश्वर के आनन्द स्वरूप पर धारणा करते हैं, किसी चित्र के माध्यम से या अर्चविग्रह पर देशबंध करके। आँख बन्द करके ध्यान में उतर जाते हैं। ध्यान की स्थिति में ईश्वर के आनन्द स्वरूप के बारे में जो भी हमारा ज्ञान है, उसी के विचार स्मृतिवृत्ति के माध्यम से चित्त में आने लगेंगे, कोई अन्य वृत्ति नहीं। ध्यान करते करते जब केवल ईश्वरीय आनन्द शेष रह जाये और कुछ न रहे, तब समाधि होती है। उस आनन्द का प्रत्ययात्मक स्वरूप प्रत्यक्षात्मक स्वरूप में बदल जाये, ध्येय के स्वभाव से सब प्रकाशित हो जाते, वह समाधि है।

शब्द नहीं रहा, ज्ञान भी नहीं रहा, बस अर्थ रहा। मुझे ज्ञान हो रहा है, इस बात का ज्ञान भी न रहा, अर्थ के अतिरिक्त कुछ और न रहा, अर्थ मात्र निर्भास रहा। ध्याता और ध्यान का बोध नहीं रहा। ध्येय में शब्द का और उसके ज्ञान का भी ज्ञान न रहा है, सब अर्थ में लीन हो गया।

कई व्याख्या हैं। परमात्मा के आनन्द स्वरूप का ध्यान, अभी तीनों हैं, परमात्मा, आनन्द स्वरूप और ध्यान। जब केवल आनन्द रह जाता है, कुछ और नहीं, तो समाधि है। गवेषणा की दृष्टि से देखें, तो समाधि में खोज समाप्त हो जाती है। ध्यान में गवेषणा चलती रहती है, मन में उसके चित्र बनते रहते हैं, प्रत्ययात्मकता बनी रहती है, यह ऐसा होगा, वैसा होगा, यह आकार होगा इत्यादि। जब वह वस्तु प्रत्यक्ष मिल जाती है तो गवेषणा समाप्त हो गयी, यह स्वरूपशून्य की परिभाषा है। स्वरूपशून्य की दो और परिभाषा भी हैं, ध्याता के स्वरूप से शून्य और ध्यान के स्वरूप से शून्य। व्यास किन्तु प्रत्ययात्मक स्वरूप से शून्य होने की बात करते हैं। क्या था, कैसा था, उन सबसे शून्य हो जाना। जब वस्तु आ जायेगी, प्रत्यक्ष हो जायेगा, तब समाधि है। ध्येय स्वभाव आवेश को समाधि कहते हैं। समाधि पिछले ७ अंगों का प्रतिफल है।

धारणा, ध्यान और समाधि की यात्रा को यदि समग्र रूप से देखें तो यह एक प्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष की यात्रा है। धारणा में जो प्रत्यक्ष था वह अन्य वृत्तियों, अन्य प्रत्ययों से आच्छादित था। जब ध्यान के द्वारा अन्य वृत्तियों को हटाया और उसी के बारे में ज्ञानवृत्तियों को समेटा तो शेष सब आच्छादन हट कर वस्तु का परिपूर्ण प्रत्यक्ष हुआ, यह समाधि की स्थिति है।

समाधि की अनुभूतित इस परिभाषा को जानने से, वस्तुओं और उनके ज्ञान के बारे में कुछ तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं। पहला यह कि सारा घटनाक्रम चित्त में हो रहा है और समाधि आने पर अर्थ चित्त में ही प्रस्फुटित होता है। हम इन्द्रियों से वस्तु का प्रत्यक्ष अवश्य करते हैं पर उसकी संरचना और स्वरूप चित्त में ही बनता है। रस आदि भी चित्त में ही उदित होते हैं। देखा जाये तो एक पूरा का पूरा वही संसार बसता है चित्त में भी। यत्मुण्डे तत्ब्रह्माण्डे, इस पर व्याख्या फिर कभी। जो हम जानते नहीं, वह हमारे लिये हैं भी नहीं। उसी वस्तु को बाहर देखने से उसको उन सबसे जोड़कर देखते हैं जो कि उससे मुख्यतः असम्बद्ध हैं। उन्हीं वस्तुओं को धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम से देखते हैं तो वह दर्शन सम्यक परिप्रक्ष्य में होता है, संबंध अर्थपूर्ण होता है, सही दृष्टा के परिप्रेक्ष्य में होता है।

दूसरा तथ्य यह कि जानने की सीमा से भी आगे है, होने की सीमा। ज्ञान से विज्ञान की यात्रा। विषय में समाधिस्थ होकर इतना उतर जाते हैं कि उस समय केवल अर्थ रहता है, केवल विषय रहता है, केवल वस्तु रहती है, ज्ञान की इससे परे भला और क्या सीमा होगी?

तीसरा तथ्य यह कि समाधि अन्त नहीं वरन प्रत्यक्ष का प्रारम्भ है, ज्ञान का प्रारम्भ है। समझने की ऐसी प्रक्रिया है जो सघन है, सान्ध्रित है, सम्पूर्ण है। इस प्रक्रिया से स्थूल, सूक्ष्म, आत्म आदि विषयों का परिचय होता है, प्रज्ञा आती है, ज्ञान से समझ और भी प्रकाशित हो जाती है, अस्पष्टता से स्पष्टता आ जाती है। अन्त में जब प्रत्ययात्मकता की परिपक्वता आती है, कुछ और जानना शेष नहीं रहता है, तब परवैराग्य के आने पर ऋतम्भरा प्रज्ञा आती है, सत्य को प्रभासित करने वाली प्रज्ञा।

सही ज्ञान का प्रस्फुटन हमें सही कर्म करने को प्रेरित करता है। योगः कर्मषु कौशलम्। जो अधिक जानता है वह अधिक कुशल भी है।


अगले ब्लाग में संयम की प्रक्रिया।

29.10.19

अभ्यास और वैराग्य - २१

बहिरंग अंतरंग का आधार है। प्रत्याहार बहिरंग की परिधि है। यह मन की सामान्य स्थिति हो जाती है, जहाँ पर भी मन गया, वहाँ से लौट कर वापस आ जाता है। देखा जाये तो एकाग्रता की स्थिति प्राणायाम से ही प्रारम्भ हो जाती है। यम, नियम व आसन के माध्यम से शरीर में और प्राणायाम व प्रत्याहार के माध्यम से मन में एक लयता सी आने लगती है। धारणा, ध्यान और समाधि किस तरह से एक दूसरे से भिन्न हैं और किस तरह से एक है?

धारणा, ध्यान और समाधि को संयम के नाम से भी जाना जाता है। यह एक पारिभाषिक शब्द है और इसका लौकिक शब्द संयम से संबंध नहीं है। प्रारम्भ की स्थिति में धारणा की मात्रा अधिक रहती है, पर अभ्यास होते होते, धारणा से चलकर ध्यान की स्थिति आती है और कब ध्यान से समाधिस्थ हो जाते हैं, यह ज्ञात नहीं रहता है। 

देश में बंध होना ही चित्त की धारणा है। चित्त को एक स्थान (देश) पर स्थिर करने का स्थूल साधन है धारणा। शरीर का कोई भी स्थान लिया जा सकता है। नाभिचक्र, हृदयपुंडरीक, मूर्द्धज्योति, नासिकाग्र, जिह्वाग्र आदि देश पर चित्त का बंध होना या वाह्य विषय में चित्त का वृत्तिमात्र के द्वारा बंध होना। बाहर के शब्दादि या मूर्तिादि वाह्य देश हैं। जहाँ पर चित्त बन्ध है, बस उसी की वृत्ति और प्रत्याहार के माध्यम से इन्द्रियसमूहों का अपने विषय न ग्रहण करना। प्रत्याहारमूलक धारणा ही समाधि की अंगभूत धारणा है। यह प्राणायाम के समय की साँसों पर की गयी एकाग्रता से भिन्न भी है और परिष्कृत भी।

धारणाओं में षटचक्र, ज्योति, मूर्ति या नाद की धारणायें प्रमुख हैं। चित्त उसी पर स्थापित कर दिया जाता है और जैसे ही चित्त की कहीं और वृत्ति होती है, चित्त स्वयं को पुनः वहीं स्थिर कर देता है। प्रारम्भ में यह यह अत्यन्त न्यून अन्तराल में टूटता है, पर धीरे धीरे अभ्यास से धारणा का समय बढ़ाया जा सकता है। किसी दिये की जलती लौ पर धारणा की जा सकती है, अर्चविग्रह पर की जा सकती है, ओंकार पर की जा सकती है, किसी मन्त्र पर की जा सकती है। उद्देश्य एक ही है कि चित्त को बारम्बार वहीं पर ले आना, कहीं भी भटके, सप्रयास वहीं पर ले आना।

शरीर के अंगों पर धारणा करने से एक संवेदना की अनुभूति होती है। यह अनुभूति परिचायक है कि धारणा कार्यशील है। कभी हृदयस्थल पर करने से हृदयगति बढ़ने लगे और असहज सा लगे तो उसे वहीं छोड़ देना चाहिये, कहीं और धारणा लगानी चाहिये। यदि नहीं समझ आये कि कहाँ करना उचित होगा तो परीक्षण कर लें, जहाँ एकाग्रता सिद्ध हो, वहीं पर धारणा का अभ्यास प्रारम्भ कर दें। त्राटक क्रिया धारणा ही है, मैंने स्वयं एक साधक को त्राटक के द्वारा चम्मच को टेढ़ा करते देखा है। योग के विषय में यह चमत्कार उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, धारणा का प्रयोजन ध्यान को साधना है, पर एकाग्रता और स्वास्थ्य की दृष्टि से धारणा फिर भी फलमयी है। धारणा प्रत्यक्ष करनी होती है, इसमें चिन्तन नहीं होता है, ज्ञानात्मकता का इसमें अभाव रहना चाहिये, आँख बन्द कर चिन्तन नहीं करना है इसमें। शरीर के जिस अंग पर धारणा कर रहे हैं, उस पर संवेदना बनी रहनी चाहिये। चिन्तन प्रारम्भ होते ही वह ध्यान का प्रारम्भ हो जाता है। धारणा तो बस एक ही वृत्ति है, बार बार, उसी देश पर, एक बिन्दु पर, स्थिर सी, पुनरपि, सतत, यथासंभव।

जहाँ एक ओर ज्योति, षटचक्र, मूर्ति आदि एक बिन्दु या देश में स्थित हैं, नाद एक देश में स्थित हुआ नहीं लगता है। तो चित्त कहाँ धारण करें? चिंनाद, शंखनाद, घंटानाद आदि नाद केन्द्रित होते होते शरीर में किसी एक बिन्दु विशेष में गूँजते हैं। वही बिन्दु देश बंध हो जाता है। 

धारणा के विषय में पूरा चक्र सिद्धान्त प्रचलित है। साधक अनुभव से बतलाते हैं कि भिन्न चक्रों पर धारणा करने से शरीर पर भिन्न प्रभाव पड़ता है, विशेष भाव उमड़ते हैं। कहते हैं कि यथासंभव अपने स्वभाव के अनुसार ऊपर के चक्रों पर धारणा करें, नीचे के चक्रों पर धारणा करने से लोभ, मोह आदि के रूप में छिपे संस्कार भड़क सकते हैं। मूलाधार से प्रारम्भ कर सुषुम्ना तक कुंडलिनी नामक धारा की धारणा से एक एक चक्र ऊपर उठना होता है। आश्चर्य ही है कि वृत्तिमात्र से चित्त स्थिर करने भर से शारीरिक और मानसिक परिवर्तन प्रस्फुटित होने लगते हैं। एक एक भाव से ऊपर उठते हुये चित्त की ऊपरी स्थिति पर पहुँचने का विज्ञान है यह।

धारणा चित्त का वृत्तिमात्र के द्वारा बन्ध है, बार बार वृत्ति उसी पर हो, चित्त वहीं पर लगे। धारणा को विस्तृत रूप से और पृथक रूप से समझना इसलिये आवश्यक है क्योंकि बहुधा इसे ध्यान और समाधि से अन्तर्मिश्रित करके जोड़ा जाता है और सबको ही ध्यान कह दिया जाता है। यह प्रक्रिया सिद्ध होना ध्यान में उतरने में अत्यन्त सहायक है। प्रक्रिया के रूप में, प्रभाव के रूप में और क्रमिक विकास के रूप में धारणा, ध्यान और समाधि भिन्न हैं, उन्हें यथास्थान व्याख्यायित किया जायेगा।

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26.10.19

अभ्यास और वैराग्य - २०

पाँचवा बहिरंग प्रत्याहार है। हरण न होने देने का भाव। प्रति आ हृ, प्रति और आ उपसर्ग हैं, प्रति अर्थात विपरीत, आ अर्थात पूरी तरह, हृ धातु का अर्थ है हरण करना। हरण किसका, इन्द्रियों का, हरण किसके द्वारा, विषयों के द्वारा। शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श आदि विषय हैं इन इन्द्रियों के। कान से सुनना, शब्द। आँख से देखना, रूप। जिह्वा से चखना, रस। नाक से सूँघना, गंध। त्वचा से छूना, स्पर्श। पाँच विषय अपने प्रकारान्तर लिये हुये हैं, असीमित मात्रा में हैं, प्रचुर मात्रा में हैं, सहज उपलब्ध हैं, प्रकृति को गतिमान किये हुये हैं, विविधता बनाये हुये हैं। प्रकृति के पाँच तत्वों का सीधा संबंध इन विषयों से है। शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श क्रमशः आकाश, अग्नि, जल, पृथ्वी और वायु से संबद्ध हैं।

विषय इतने प्रबल होते हैं कि हर लेते हैं। विषय, इन्द्रिय और मन के संबंध के बारे में व्यास भाष्य में लिखते हैं कि संबंध अयस्कान्तमणि(चुम्बक) और लोहे के समान है। विषय चुम्बक, इन्द्रिय लोहा। इन्द्रिय चुम्बक, मन लोहा। निकटता के आने से इनका प्रभाव पड़ता है। जब विषय पास होगा या उपस्थित होगा तो इन्द्रियाँ खिंची चली आयेंगी। आसक्ति यदि अधिक गहरी हो तो खिचाव और उत्कट हो जाता है, बलवान हो जाता है। जब इन्द्रिय किसी विषय में प्रवृत्त होती है तो मन भी स्वतः खिंचा चला जाता है, स्वतः सहयोग भी करने लगता है, पहुँचने का प्रयास करता है, साधन जुटाने लगता है। 

इस कार्यशैली को समझने के लिये एक सटीक उदाहरण रथ का है। शरीर रथ है, आत्मा रथी, बुद्धि सारथी, मन वल्गा या लगाम, इन्द्रियाँ अश्व, विषय अश्वपथ। रथ जिस ओर जाता है, जिस ओर उसकी प्रवृत्ति होती है, उसी से यह स्पष्ट हो जाता है कि रथ अश्व संचालित कर रहे हैं या रथी? विवेक नियन्त्रण में है कि मन या इन्द्रिय? रथी भोक्ता है, अपनी इच्छा करे या इन्द्रियों से सहमत हो। जन सामान्य को देख कर तो यही लगता है कि पथ निर्धारित कर रहे हैं कि रथ किस ओर जायेगा। माया का पथजाल प्रकृति को गतिमय किये हुये है। प्रवृत्ति दिशाहीन, असम्यक और अनियन्त्रित है।

प्रत्याहार का अर्थ है, इन्द्रियों का अपने विषय से असम्प्रयोग एवं इन्द्रियों का चित्त के स्वरूप के जैसे हो जाना। प्रश्न यह उठता है कि वाह्य इन्द्रियाँ तो वैसे भी मन के विषय को नहीं जानती है। मन अन्तःकरण है, मन में होने वाली गतिविधियों को जानना या समझ पाना इन्द्रियों के लिये असंभव है, मन सूक्ष्म हैं, इन्द्रियाँ स्थूल। इन्द्रियाँ न ही चित्त की वृत्तियों को समझ सकती है। इसका अर्थ तब यही होगा कि जहाँ मन लगा रहेगा, इन्द्रियाँ उसके विरूद्ध नहीं जायें, मन के कार्य में बाधा नहीं उत्पन्न करें। मन के कार्यों में सहमति हो, अपने विषयों में प्रवृत्त होने की अभिलाषा न हो। जहाँ मन रुक जाये वहाँ सारी इन्द्रिय भी रुक जायें, जहाँ मन चले वहाँ सारी इन्द्रिय प्रवृत्त हो जायें, सहयोग करें। व्यास भाष्य में रानी मक्खी का उदाहरण देते हैं। जहाँ रानी मक्खी जाती है, सारी अन्य मक्खियाँ उसका अनुसरण करती हैं, जहाँ वह बैठ जाती है, सब बैठ जाती हैं।

एक इन्द्रिय को रोकने के उपक्रम में हो सकता है कि कोई अन्य इन्द्रिय अपने विषय के प्रति आकृष्ट हो रही हो। मन एक से हटा पर दूसरे सें लग जाता है। अब उसको रोकने का उपक्रम और उतना ही प्रयास। पर प्रत्याहार में मन के रोकने पर सब रुक जाती हैं और मन के चलने पर सब चलने लगती हैं। एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय। स्रोत वही है, मन। सब वहीं से संचालित होता है। एक सहज प्रश्न उठ सकता है कि यदि सब मन से ही संचालित होता है, यदि प्रत्याहार करने से ही सारी इन्द्रियाँ वश में आ जाती हैं तो यम, नियम आदि करने का क्या उपयोग? सीधे ही मन को साधें। सिद्धान्त सरल है, व्यवहार कठिन। प्रक्रिया यदि क्रमिक विकास से आये तो ही प्रभावकारी होती है। अर्जुन कहते भी हैं कि चंचलं हि मनः कृष्णः। मन इतना चंचल है कि यह बलपूर्वक हर लेता है और इसे निग्रह कर पाना वायु स्थिर कर पाने से भी अधिक दुष्कर है। कृष्ण का उत्तर था, अभ्यास और वैराग्य। प्रत्याहार एक वैराग्य सी स्थिति है, उसके पीछे अभ्यास की साधना का होना तो आवश्यक है।

पत्थर में एक चोट करने से मूर्ति का स्वरूप नहीं आता है। सहस्रों छोटी बड़ी चोटें करनी पड़ती हैं। मन भी एक बार दृढ़ निश्चय करने से सहम कर नहीं बैठ जाता है। वह उद्दण्ड है और ऊर्जित भी, उसे सारी इन्द्रियों का समर्थन प्राप्त है, वह आपके नियन्त्रण से कब ओझल हो जायेगा, आपको पता भी नहीं चलेगा। मन में जमें हुये संस्कारों को प्रतिदिन क्षीण करना पड़ता है। मन के मैल को प्रतिदिन धोना पड़ता है। काम, क्रोध लोभ, मोह, मद और मत्सर से प्रतिदिन जूझना पड़ता है। एक एक इन्द्रिय को प्रतिदिन समझाना पड़ता है कि आपका पथ रथी के समग्र हित में नहीं है, आपका पथ अल्पकालिक भोग की अभिव्यक्ति है। रथी का हित दीर्घकालिक व्यवस्थाओं में है, संरचनाओं में है, धारण में है, धर्म में है। इन्द्रिय को रोकने का एक क्रम मन को यही संदेश देता है और विषयों के बारे में जो संस्कार बने हुये है, उसे तनिक क्षीण कर जाता है। दिनचर्या का यही सुकार्य है, यही महती उपयोग है। दिनचर्या को हम ऐसे उत्कृष्ट लघु कार्यों से भर दें कि अन्यत्र विचरण का समय ही न हो। एक ऐसा उद्देश्य सामने दिखता रहे कि इन्द्रिय विषय उसके सामने क्षुद्रता से लगें। दिनचर्या सीढ़ी सी है, एक जैसी, हर दिन। यह तो कुछ वर्ष बाद ही पता चलता है कि हम किस ऊँचाई तक पहुँच गये।

प्रत्याहार की सिद्धि से इन्द्रियों की परमवश्यता हो जाती है, इन्द्रियाँ पूरी तरह से नियन्त्रण में आ जाती हैं। प्रत्याहार से काम क्रोध लोभ मोह मद और मत्सर , ये ६ शत्रु नष्ट होते है। मान्यता यह है कि प्रत्याहार का प्रयोग ध्यानकाल में ही होता है क्योंकि व्यवहार काल में तो इन्द्रियाँ अपने विषयों के संपर्क में रहेंगी ही। पर भाष्य कहता है कि इसका प्रयोग ध्यानकाल में तो होता ही है पर व्यवहार काल में भी होता है, पूरे समय।

५ स्तर बताये गये हैं, प्रत्याहार के। प्रथम स्तर है, व्यसन न होना। व्यसन है बार बार विषय पर मन पहुँच जाना, जिसके बिना रहा न जाये। यदि वह न मिले तो अन्य क्रम बाधित हो जाये। किसी अन्य के लिये निर्धारित समय या संसाधन हो पर उसी व्यसन वाले कर्म में लग जाये। नियमित कार्य बाधित होने लगें। मोबाइल देखने में इतना लग गये खाना बनाना भूल गये। चाय नहीं मिली तो दिन भारी लगने लगा। व्यसन न होना इन्द्रियजय है, प्रथम स्तर का प्रत्याहार है। यदि मिले तो ठीक, न मिले तो ठीक, अन्य कर्मों में कोई बाधा नहीं। अहानिकारक विषयों से संयोग दूसरे स्तर का प्रत्याहार है, इन्द्रियजय है। विपरीत न हो, अति न हो, सीमा में रहे, शास्त्रसम्मत हो, यह भी इन्द्रियजय है। तीसरे स्तर का इन्द्रियजय है, विषय आदि से स्वेच्छा से सम्प्रयोग कर पाना। इच्छानुसार प्राथमिकता निर्धारित कर पाना, यदि कुछ महत्वपूर्ण हाथ में है तो अन्य विषयों को टाल पाना, जो निर्धारित किया है उसमें उद्धत हो पाना।

इन तीन स्तरों में इन्द्रियजय में राग, द्वेष, सुख, दुख के भाव भरे हो सकते हैं, पर उनमें किसी एक न एक विमा में इन्द्रियजय किया गया है। चतुर्थ स्तर में राग, द्वेष, सुख, दुख के भाव के बिना ही विषयादि का सेवन। यह कठिन स्तर है पर क्रमिक है। पंचम स्तर है, विषय संयोग शून्यता, विषयों का सेवन ही नहीं करना। यह प्रत्याहार की उच्चतम स्थिति है। जैगीषव्य ऋषि इसे चित्त की एकाग्रता आने के कारण आयी अप्रवृत्ति कहते हैं। मन में प्रछन्न लौल्य रहता है कि चलो आज देखते हैं मन नियन्त्रण में है कि नहीं? हम साधना के किस स्तर पर पहुँच गये हैं? इस स्तर में यह भी नहीं करना है। यही परमवश्यता है, यही प्रत्याहार है।

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