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19.7.15

सुख-श्रृंगार

आज विचारों में उतराकर, सकल अलंकृत प्यार करूँ मैं ।
कहीं दूर एकान्त बैठकर, तेरा सुख-श्रृंगार करूँ मैं ।।

तृषा-दग्ध हर दृष्टि, मची है उथल-पुथल, तुझको डर है ।
स्वार्थ-तिक्त जग-रीति तुम्हारे पंख काटने को तत्पर है ।।

व्यर्थ तुम क्यों झेलो सब वार,
बसाकर सरस हृदय में प्यार,
सिमटकर बाहों में छिप जा,
तुम्हारे हर दुख का उपचार करूँ मैं ।

आ जा तेरे मुग्ध, सुवासित उपवन को तैयार करूँ मैं ।
तेरा सुख-श्रृंगार करूँ मैं, सकल अलंकृत प्यार करूँ मैं ।

25.10.14

खोज सुख की

प्रेम की पिपास अन्तर्निहित है जो,
घूमते चहुँ ओर उसके कर्म सारे ।
दे सके जो हर किसी को प्रेम तृप्ति,
बिका उसको कौड़ियों के मूल्य जीवन ।।

प्रेम के आनन्द की ही लालसा में,
जी रहे हैं और सतत ही तृप्त करते,
घर को, समाज को,
देश पर बलिदान को,
मनुजता के आवरण में,
प्रेम का प्रतिबिम्ब पाकर,
स्वयं को सन्तुष्ट करते ।।

हुयी निष्फल चेतना में खोज पूरी, 
ढूढ़ते हैं स्रोत वे स्थूल में भी ।
किन्तु मानव यह तुम्हारा कर्म सारा,
क्या हृदय को प्रेम का सुख दे सकेगा ?
क्या कभी तुमने सहज हो चेष्टा की,
या सहज हो, सत्य का प्रारूप समझा ।।

स्रोत सारे, लिया था आधार जिन पर,
देखते तो, तुम्हे भी यह ज्ञात होता ।
स्वयं ही वे प्यास में दुख पी रहे है,
सुखों का उद्गम, भला वो कहाँ पाते ।।