आज विचारों में उतराकर, सकल अलंकृत प्यार करूँ मैं ।
कहीं दूर एकान्त बैठकर, तेरा सुख-श्रृंगार करूँ मैं ।।
तृषा-दग्ध हर दृष्टि, मची है उथल-पुथल, तुझको डर है ।
स्वार्थ-तिक्त जग-रीति तुम्हारे पंख काटने को तत्पर है ।।
व्यर्थ तुम क्यों झेलो सब वार,
बसाकर सरस हृदय में प्यार,
सिमटकर बाहों में छिप जा,
तुम्हारे हर दुख का उपचार करूँ मैं ।
आ जा तेरे मुग्ध, सुवासित उपवन को तैयार करूँ मैं ।
तेरा सुख-श्रृंगार करूँ मैं, सकल अलंकृत प्यार करूँ मैं ।
कहीं दूर एकान्त बैठकर, तेरा सुख-श्रृंगार करूँ मैं ।।
तृषा-दग्ध हर दृष्टि, मची है उथल-पुथल, तुझको डर है ।
स्वार्थ-तिक्त जग-रीति तुम्हारे पंख काटने को तत्पर है ।।
व्यर्थ तुम क्यों झेलो सब वार,
बसाकर सरस हृदय में प्यार,
सिमटकर बाहों में छिप जा,
तुम्हारे हर दुख का उपचार करूँ मैं ।
आ जा तेरे मुग्ध, सुवासित उपवन को तैयार करूँ मैं ।
तेरा सुख-श्रृंगार करूँ मैं, सकल अलंकृत प्यार करूँ मैं ।