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5.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १४

पूर्वजों के विषयगत ज्ञान, अनुभव और गहराई से अभिभूत हूँ। जो भी विषय उठाया है उसके साथ पूरा न्याय किया है। मानवीय चिन्तन प्रक्रिया और उस पर आधारित सामाजिक संरचना हमारे पूर्वजों के सशक्त और स्पष्ट हस्ताक्षर थे। जितना समझता हूँ, मूल तक जाता हूँ, उतना ही कृतज्ञ हो जाता हूँ, उनके अद्भुत प्रयासों से, प्रश्न की जटिलता को जीवटता से निपटने की उनकी अतीव उत्कण्ठा से। गर्व का भाव बार बार आता है, अमृतपुत्र होने का भाव बार बार आता है, ज्ञान की अद्वितीय परंपरा हमारी संस्कृति का अमृततत्व है। संस्कृति को नष्ट करने का दुर्स्वप्न लिये दुष्ट संभवतः नहीं जानते हैं कि यही अमरत्व है जो संस्कृति को सुमेरू सा स्थापित किये है। एक बीज भी शेष रहा तो वटवृक्ष स्थापित कर लेगा, जहाँ भी रहे, जैसे भी रहे।

नीतिसार का एक श्लोक सामाजिक व्यवहार में उत्कृष्टता के मानक सहज ही प्रस्तुत कर देता है। मातृवत परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत । आत्मवत सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः ।।(जो व्यक्ति अन्य पुरुष की पत्नी को माता के समान, अन्य के धन को मिट्टी के समान, और अन्य प्राणियों को अपने समान देखता है - वह ज्ञानी है) चारित्रिक उज्जवलता के ये भाव भारतीय जनमानस में ब्रह्मचर्य के महत्व को व्यक्त करते हैं। व्यक्तित्व के औदार्य का बोध शारीरिक क्षुद्रता पर भारी पड़ता है। वैसे ब्रह्मचर्य का शाब्दिक अर्थ ब्रह्म की ओर चलना है, अध्यात्म को आत्मसात करना है, ज्ञानोपार्जन है, पर पतंजलि योग सूत्र में इसे उपस्थ इन्द्रियों के संयम तक ही सीमित रखा गया है, ब्रह्मचर्य आश्रम में पूर्ण पालन और गृहस्थ आश्रम में भी दाम्पत्य तक ही सीमित। व्यभिचार से तो समाज का ताना बाना ही ध्वस्त हो जायेगा।

अपरिग्रह का अर्थ है कि अपनी आवश्यकता से अधिक ग्रहण न करना। न्यूनतम उतना हो जिससे कार्य चल सके। जिनके पास साधन नहीं हैं, उनके पास कम वस्तुओं का होना अपरिग्रह नहीं है। साधन होने के बाद भी न उपयोग करना अपरिग्रह है। आवश्यकता और इच्छा में अन्तर समझना होगा। इच्छायें असीमित होती हैं, सबको पूरा करने की न तो सामर्थ्य होती है और न ही समय। जो वस्तु या विषय जीवन साधने के लिये अनिवार्य हैं, उनका अर्जन तो करना ही होगा। सुविधायें श्रम को कम करती हैं, कोई ऐसी वस्तु जो हमारा समय बचाये, कोई ऐसा विषय जो हमारा संशय दूर करे, ऐसी सुविधाओं को तो प्राप्त करना ही होगा। पर जब एक वस्तु से कार्य चल सकता है तो दूसरी लेना, जब छोटी से काम चल सकता है तो बड़े आकार की लेना, यह सब परिग्रह है।

वस्तुयें या विषय जीवन में अकारण ही न आयें, उनका कोई कारण हो, उनसे हमारी आत्मिक उन्नति या भौतिक अभ्युदय हो। बिना सोचे समझे गृहस्थी बढ़ा लेना, कपड़ों से अल्मारियाँ भर लेना, यह सब अन्यथा है। उन वस्त्रों का भला क्या कार्य जिनको आपने वर्षों से पहना ही नहीं, उनकी क्या उपयोगिता रही, तो फिर आपने खरीदा क्यों। पास में धन है, कोई वस्तु अच्छी लगी और खरीदने का मन कर गया, यह परिग्रह है। इस मानसिकता से बाहर आना अपरिग्रह कहलायेगा। आवश्यकता से अधिक साधन जुटाना मूढ़ता है, परिग्रही मानसिकता है।

व्यास किसी भी विषय या वस्तु के परिग्रह में ५ प्रकार के दोष बताते हैं। ये ५ दोष हैं, अर्जन, रक्षण, क्षय, संग और हिंसाविषयक। किसी भी वस्तु के अर्जन में साधन, श्रम, समय और धन आदि लगता है अतः इन संसाधनों का उपयोग परम आवश्यक के लिये ही किया जाना बुद्धिमत्ता है। अर्जित वस्तु की रक्षा भी करनी होती है, उसे सम्हाल कर रखना पड़ता है, कोई चुरा न ले, छीन न ले। यह उपक्रम भी कई आवश्यक कार्यों के स्थान पर ही होता है। वस्तु का कालान्तर में क्षय हो जाता है, पुनः उद्योग करना होगा उसको प्राप्त करने का, इसमें दुख भी होता है। उस वस्तु या विषय के साथ रहते रहते उससे लगाव हो जाता है, जो कि आध्यात्मिक उन्नति के लिये ठीक नहीं। सोते जागते आपको उसका ध्यान आता है। किसी भी वस्तु या विषय के साथ लगाव, उसके अर्जन में किसी का छीना हुआ अधिकार और उसके चोरी और क्षय में आये भाव हिंसा विषयक होते हैं। व्यास बताते हैं कि ये ५ दोष देखकर, सोचकर और सम्यक विचारकर, आवश्यकता के अनुसार ही संग्रह करना अपरिग्रह है।

अर्थोपार्जन में अत्यधिक श्रम, साधन और समय लगता है। पंचतन्त्र कहता है कि अर्थार्थी के श्रम का शतांश भी यदि मोक्ष की इच्छा करने वाला लगा दे तो उसे मोक्ष प्राप्त हो जायेगा। अर्जन, रक्षण अपने आप में दोष नहीं है, योगक्षेम तो करना ही होता है, योगक्षेम वहाम्यहम्, पर आवश्यकता से अधिक करने में और बिना किसी हेतु करने में दोष है। अपरिग्रह का अर्थ आलस्य नहीं है, अपरिग्रह किसी भी ओर से आलस्यमूलक नहीं हो सकता है। कोई भी यम या नियम आलस्य करने से हो ही नहीं सकता है, इन सब में प्रयत्न करना होता है। आलस्य से अपरिग्रह संभव ही नहीं है।

शरीर ही नहीं वरन मन और वाणी में भी अपरिग्रह करना चाहिये। अनावश्यक वाणी और विचार, दोनों ही विवाद और विषाद का विषय बन सकते हैं। पश्चिमी जगत में इस समय अपरिग्रह को मिलिमलिस्ट आंदोलन के नाम से व्यापकता से अपनाया जा रहा है। अधिकता अभिशाप बन कर आती है, आपके लिये, आपके साथ रहने वालों के लिये, जीव जन्तुओं के लिये, वातावरण के लिये, पृथ्वी के लिये। अपरिग्रह का सिद्धान्त स्वार्थ के ऊपर परमार्थ को रखने का है, शरीर के ऊपर अध्यात्म को रखने का है।

पतंजलि अपरिग्रह की सिद्धि बताते हैं। अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंबोधः॥२.३९॥ (अपरिग्रह के स्थिर होने पर जन्म जन्मान्तरों का बोध हो जाता है) पहले तो यह समझ नहीं आया पर जब अपरिग्रह के सिद्धान्त को आत्मा को केन्द्रबिन्दु बना कर लगाया तो आत्मा की दृष्टि से तो यह शरीर, मन, इन्द्रियाँ, विषय आदि सभी परिग्रह हैं। इनको उस रूप में स्वीकार भर कर लेने से अपने स्वरूप को जाना जा सकता है और यह भी समझा जा सकता है कि सदियों से हम यह शारीरिक आवरण ओढ़ते आये हैं। यह सबका भान हट जाने से अपनी जन्म जन्मान्तरों की यात्रा स्पष्ट दिखायी पड़ेगी।

अगले ब्लाग में नियम।

1.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १३

यम सामाजिक स्थैर्य पोषित करता है, स्वस्थ समाज विकास का आधार है, सुदृढ़ अवयव शरीर को पुष्ट करते हैं। अध्यात्म उत्तरदायित्व से भागने का नाम नहीं है, प्रयत्नशीलता आवश्यक है योग के हर अंग-उपांग को साधने के लिये। उद्योग करना होता है, सही दृष्टि के साथ, सही ज्ञान के साथ। साथ ही आवश्यक है धैर्य और उत्साह। उत्साह इतना कि जैसे ध्येय अगले क्षण ही मिल जाने वाला हो और धैर्य इतना कि अनन्तकाल तक न भी मिले फिर भी उत्साह लेशमात्र भी कम नहीं हो। बस विश्वास रखें कि विधान अपना कार्य न्यायपूर्वक ही करेगा।

सत्य और अहिंसा के बाद अगला उपांग है, अस्तेय। स्तेय है, अशास्त्रपूर्वकम् द्रव्याणां परतः, अशास्त्रपूर्वक कोई द्रव्य लेना। स्तेय का निषेध और उसकी स्पृहा न करना अस्तेय है। अस्तेय का प्रचलित अर्थ चोरी है और वह अत्यन्त सरलीकृत और सीमित अर्थ है। अस्तेय का स्वरूप उससे कहीं अधिक व्यापक और गहरा है। शास्त्र को सामाजिक और धार्मिक अर्थों में समझना होगा। शास् धातु से शास्त्र शब्द निकला है, अर्थ है शिक्षा देना, शासन करना, आज्ञा देना, निर्देश देना, दण्ड देना, सलाह देना। जिन नियमों से हमारी सामाजिक और आध्यात्मिक व्यवस्था निर्धारित होती है, वे हमारे लिये शास्त्र हैं।

शास्त्रसम्मत अधिकार को परिभाषित करने के लिये ईशावास्योपनिषद का प्रथम श्लोक समझना होगा। जब यह श्लोक पहली बार पढ़ा था, त्याग और भोग को एक साथ पढ़कर आश्चर्यचकित हो गया, मंत्रमुग्ध हो गया था भारतीय विचारसंतुलन पर। चलिये समझते हैं।
ईशावास्यमिदम् सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत। तेनत्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम॥(इस संसार में जो कुछ है, वह ईश्वर से व्याप्त है, वह ईश्वर का है, उसका त्यागपूर्वक भोग करो, लालच मत करो, यह धन किसका है।) जब कुछ अपना है ही नहीं, तो उस पर अधिकार कैसा, लगाव कैसा, स्पृहा कैसी? 

अब जब यह निश्चित हो गया कि धन किसका है और उसका त्यागपूर्वक भोग करना है, प्रश्न यह उठता है कि उसको प्राप्त कैसे करें? गीता(३.१२) इसका निराकरण कर देती है।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।(यज्ञ करने से देवता तुम्हें वांछित भोग देंगे, प्रदत्त भोग बिना उन्हें चढ़ाये भोग करने वाला निश्चय ही चोर है।) यज्ञ प्राप्य हेतु किये गये समुचित उद्योगकर्म को कहते हैं। कालान्तर में यज्ञ का अर्थ हवन तक ही सीमित रह गया है। यज्ञ शब्द के तीन अर्थ हैं, देवपूजा, दान, संगतिकरण। संगतिकरण का अर्थ है संगठन। अतः यज्ञ का तात्पर्य है, त्याग, बलिदान, शुभ कर्म। परमात्मा के लिये किया कोई भी कर्म यज्ञ है। बिना कर्म के कुछ प्राप्त करना और जिससे प्राप्त किया है उसको धन्यवाद न देना चोरी ही है।

किसी और का धन या द्रव्य लेना तो निश्चय ही अपराध की श्रेणी में आयेगा। अधिकार के साथ कर्तव्य मूलभूत रूप से जुड़े हुये हैं। बिना कुछ किये कुछ अर्जित करने की इच्छा ही करना स्तेय होगा, हस्तगत करना एक अपराध। जो नहीं हैं, उस रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर स्वार्थ सिद्ध करना स्तेय है। आवश्यकता से अधिक संसाधनों का उपयोग करना स्तेय है क्योंकि हमारा अधिकार हमारी आवश्यकता तक ही सीमित है। अन्न या जल व्यर्थ करना स्तेय है। आवश्यकता से अधिक खरीद कर रखना और कालान्तर में व्यर्थ कर देना स्तेय है। 

अधिकारी न होकर भी सुविधाओं का अनुचित उपयोग स्तेय है। हड़पने की बात तो दूर, सरकारी धन का दुरुपयोग तक स्तेय है क्योंकि आपका अधिकार या दायित्व उसके सदुपयोग का था, सर्वजनहिताय का था। कोई वचन देकर, आश्वासन देकर मुकर जाना या भूल जाना स्तेय है। किसी पद पर पहुँचने का भाव, कुछ बन जाने का भाव, बिना किसी योग्यता के, बिना समुचित कर्तव्य के। परिवारवाद, भाईभतीजावाद, चाटुकारितावाद से प्रभावित अन्य का अधिकार हड़प लेना भी स्तेय है। वह व्यक्ति आहत होता है जो उसका अधिकारी था।

प्रकृति, समाज और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव हमें संयमित रखता है, कम से कम यह याद दिलाता रहता है कि हर वस्तु के लिये हम किसी न किसी के प्रति कृतज्ञ अवश्य रहें। इससे अधिकार का भाव क्षीण होता है, यदि वह भाव आये भी तो कम से कम कर्तव्यों के पूर्ण और सम्यक निर्वहन के बाद आये। अपने आप को अधिकारी मान बैठना, दूसरे से श्रेष्ठ मान लेना, प्रतियोगी मानसिकता में दग्ध रहना, ये सब स्तेय को बढ़ावा देते हैं। विनम्रता से अधिक सहायक कोई गुण नहीं है यदि अस्तेय को परिपोषित करना है। अपने को अधिकारी न मानने का भाव, सबकी सेवा में प्रस्तुत रहने का भाव लाना होगा। मुझे चैतन्य महाप्रभु के शब्द झंकृत कर जाते हैं, जब वह कहते हैं, तृणादपि सुनीचेन, तरोरपि सहिष्णुना, अमानिना मानदेन, कीर्तनया सदा हरिः। अद्बुत विनम्रता का भाव है यह।

कुछ लोग स्तेय को दान आदि से ढकने का उपक्रम करते हैं। चोरी का धन दान देना, यह दान नहीं माना जायेगा क्योंकि वह धन उसका तो था ही नहीं। यह करणीय कर्मों में नहीं माना जायेगा। इससे अच्छा होगा कि न चोरी करें, भले ही दान न दे पायें। अच्छा तो होगा कि ऐसा दान न लिया जाये, पर वह धन यदि समाज के कार्यों में लग सके तो विचार हो सकता है, बस यह मानकर कि धन के साथ अधर्म लिपटकर नहीं आ रहा है। सबका अपना अलग कर्माशय हैं, पाप और पुण्य पृथक पृथक प्रभावित करते हैं।

पतंजलि कहते हैं कि अस्तेय की सिद्धि पर रत्न स्वयं उपस्थित हो जाते हैं।(२.३७)

अगले ब्लाग में ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।

28.9.19

अभ्यास और वैराग्य - १२

सत्य के संदर्भों से शास्त्र भरे पड़े हैं। संभवतः इसलिये क्योंकि इस पर नियमन किये बिना जगत का ताना बाना सम्हाल पाना अत्यधिक कठिन है। सत्य बोलने की प्रवृत्ति विश्वास उत्पन्न करती है, बिना विश्वास समाज की संरचना ढह जायेगी। सत्यनिष्ठा बनी रहेगी तो संबंध सहेजे जाते रहेंगे। सामाजिक संदर्भों में सत्य से बलवती और कोई अभिव्यक्ति नहीं है।

धर्मशास्त्रों के प्रणेताओं ने यह तथ्य भलीभाँति समझा है। मनु, व्यास, चाणक्य आदि ने सत्य को यथासंभव संशयमुक्त किया है,  स्पष्टीकरण देकर। सत्य के अनुप्रयोग में इन सूक्ष्मताओं को नहीं समझा जाये तो हित के स्थान पर अहित हो जायेगा, साधने के स्थान पर अस्थिरता आ जायेगी। सत्य प्रेरित स्थिरता सदैव ही यह आशा बनाये रखती है कि वर्तमान स्थिति कैसी भी हो, उत्थान होगा ही। जब सत्य अपनी पकड़ खो देता है, सारी आशायें अंधकार में प्लावित हो जाती हैं। आइये सत्य की शास्त्रीय थाह लेते हैं।

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् । प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन: (प्रिय सत्य बोलना चाहिये, अप्रिय सत्य या प्रिय असत्य नहीं बोलना चाहिये, यही सनातन धर्म है)। मनुरचित सर्वाधिक प्रचलित श्लोक सत्य को प्रिय-अप्रिय की विमा से जोड़ता है। अप्रियता कष्टकारी है, किञ्चित हिंसात्मक भी। एक सीमा तक स्पष्टवादिता स्वीकार्य होती है, सुधारात्मक हो, अस्तित्व को झिंझोड़े, पर आहत न करे। परिहास करना भी असत्य तब तक नहीं है जब तक वह किसी को आहत न करे, कम से कम सामने वाले के समझने तक। प्रशंसा यदि प्रेरणात्मक हो तो वह प्रिय असत्य भी स्वीकार्य है। प्रशंसा यदि स्वार्थ साधे तो वह ठगने वाली हो जाती है, चाटुकारिता हो जाती है, वह असत्य भी है। 

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः, वृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।धर्मो न वै यत्र च नास्ति सत्यम्, सत्यं न तद्यच्छलनानुविद्धम्। (वह सभा नहीं जहाँ वृद्ध न हो, वह वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न करे, वह धर्म नहीं जो सत्य न कहे, वह सत्य नहीं जिसमें छल हो)। महाभारत के उद्योगपर्व का यह श्लोक सामूहिक निर्णय प्रक्रिया की नींव रखता है। भीष्म और द्रोण सम महारथियों का दुर्योधन की सभा में चुप रहने के ऊपर यह तीक्ष्णतम प्रहार है।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते। (उद्वेग न पैदा करनेवाला, प्रिय और हितकारक सत्यभाषण तथा स्वाध्याय व अभ्यास वाणी का तप कहा जाता है)। यह गीता में कहा गया है। सत्य उपद्रव न पैदा करे, प्रिय और हितकारक हो। सत्य का दम्भ भरने वाले बहुधा स्थिति बिगाड़ते ही हैं। जो सत्य का वास्तविक स्वरूप समझते हैं, वह सत्य को संवेदनात्मकता से व्यक्त करते हैं, सौम्यतापूर्वक, अन्यथा मौन ही रह जाते हैं।

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्। मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्॥ (महात्माओं के मन, वचन और कर्म में समानता पाई जाती है पर दुष्ट व्यक्ति सोचते कुछ और हैं, बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं॥) यद्यपि मन और वाणी में एकरूपता सत्य को परिभाषित करती है, कर्म की एकरूपता उसे महात्मा बना देती है।

नास्ति सत्यात् परं तपः, सत्यं स्वर्गस्य साधनम्, सत्येन धार्यते लोकः।(सत्य से परमं कोई तप नहीं है, सत्य स्वर्ग का साधन है, सत्य से लोक का धारण होता है)। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में सत्य को स्पष्टता से वर्णित किया है।

युधिष्ठिर का सत्य मन से नहीं था क्योंकि वह जानते थे कि द्रोणाचार्य यदि अश्वथामा के बारे में पूँछ रहे थे तो वह उनका पुत्र ही होगा और यह तथ्य युधिष्ठिर जानते थे। मनसा यह असत्य है।

सत्य धर्म के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कहते हैं कि सत्य से धर्म उत्पन्न होता है, दया और दान से धर्म बढ़ता है। क्षमा करने से धर्म स्थिर रहता है और क्रोध करने से नष्ट हो जाता है। मनु ने झूठ बोलने वाले को चोर की तरह माना है, वह अपनी आत्मा का हनन करने वाला चोर है। कहते हैं कि जिनका सत्य सिद्ध हो जाता है, वह कुछ भी कह दें, वह सत्य हो जाता है। पतंजलि सत्य की सिद्धि बताते हैं। सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्(२.३६) (जो वरदान शाप या आशीर्वाद दे, वह सत्य हो जाये या उसे आश्रय मिल जाये)

अगले ब्लाग में अन्य यम देखेंगे।

24.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ११

यम का पक्ष सामाजिक है, नियम व्यक्तिगत पक्ष निरूपित करते हैं। सारे यम नियम किसी न किसी प्रकार से एक दूसरे से संबद्ध हैं। एक उपांग विशेष का पालन दूसरे की अवहेलना नहीं हो सकता है। यदि किसी उपांग के पालन में किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति आये तो अन्य उपांगों में उस परिस्थिति का अनुप्रयोग करके समाधान ढूढ़ा जा सकता है। 

सत्य वाणी का विषय है। वाणी विचारों के सम्प्रेषण हेतु है। बोला हुआ हर वाक्य सत्यता की कसौटी में कसा जाता है। व्यवहार की व्यापकता के कारण इसके अनुपालन में उठने वाले संशय अहिंसा की तुलना में कहीं अधिक हैं। आपके बोले हुये वाक्य कोई कब, कैसे और कहाँ उद्धृत कर दे? किस परिप्रेक्ष्य में कहा गया कौन सा वचन किसी भिन्न परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर दे? अनुपस्थित या मौन रहने से भी जटिलता कम नहीं होने वाली क्योंकि बहुधा मौन शब्दों से अधिक बोलता है। पतंजलि ने सत्य की भी व्याख्या या परिभाषा नहीं दी है। व्यासभाष्य के आधार पर ही सत्य को समुचित रूप से समझा जा सकता है।

जैसा मन में हो, वाणी में वही व्यक्त करना सत्य है। वाणी और मन में यथार्थ होना। यह एक सापेक्षिक परिभाषा है, इसमें मन और वाणी के बीच की सापेक्षिता है। तीन सीमायें स्पष्ट निर्धारित हैं। पहली यह कि मन को पूरा व्यक्त कर देना बाध्यता नहीं है, केवल आवश्यकतानुसार। दूसरी यह कि मन में जो है, वह वाह्य जगत से भी मेल खाये, यह भी आवश्यक नहीं है। एक विषय में कईयों के सत्य भिन्न हो सकते हैं, विषय की समझ भिन्न होने के कारण, उस विषय को जिसने जैसा समझा। तीसरा यह कि वाणी में व्यक्त सत्य आचरण में भी परिलक्षित हो, यह भी आवश्यक नहीं। मन में पूर्ण विश्वास होने के बाद भी वांछित गुण आचरण में उतरने में समय लेते हैं, निर्धारित लक्ष्यों में पहुँचने में समय लगता है।

व्यास प्रदत्त परिभाषा सरलतम है। जैसा देखा है, जैसा सुना है, जैसा अनुमान किया है, जैसा मन में हो, वैसा ही व्यक्त करना है। न न्यून, न अधिक, बस पारदर्शी। मन से यथार्थ होने के बाद भी वाणी का आचरण कैसा हो, तभी वह सत्य माना जायेगा, इसके लिये व्यास कुछ सीमायें रखते हैं। वाणी न ठगने वाली हो, न भ्रान्ति पैदा करे, न ज्ञान से रहित हो, सर्वजन उपकार के लिये हो, दूसरों का अहित न करे, उसके कारण हिंसा न हो। यह सब विचार कर बोले जाने पर वाणी सत्य का स्वरूप लेती है।

बहुत ध्यान से देखें तो सत्य के पालन से सरल और कोई उपाय भी नहीं है, सत्य सरलतम है।असत्य केवल आसानी से खुल जाता है, वरन उसे साधने में प्रयुक्त समय और साधन अन्ततः व्यर्थ हो जाते हैं। हम इतने लोगों से बाते करते हैं, इतने वर्षों तक बोलते रहते हैं कि व्यक्तिविशेष या परिस्थितिविशेष पर बोला हुआ असत्य याद रखना असंभव हो जाता है। हर व्यक्ति के प्रति, हर परिस्थिति के प्रति, स्वार्थ, लाभ या अन्य कारण से, भिन्न बोलना। इसमें अथाह ऊर्जा चली जाती है। मन सदा भ्रमित रहता है, याद रखना पड़ता है कि किसके सम्मुख क्या बोला था। सत्य के साथ यदि छल जुड़ा हो तो वह सत्य नहीं है। जो मन में है, उसे वैसे ही बोल देने में कुछ याद नहीं रखना पड़ता है, विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता है। 

असत्य तब पकड़ा जाता है जब आपके द्वारा की गयी दो विरोधाभासी बातें सबके सामने आती हैं, एक व्यक्ति के समक्ष कुछ और दूसरे के समक्ष कुछ और। चाटुकारिता अल्पकालिक चतुरता भले ही हो जाये पर सत्य के उद्धाटन के बाद वह अत्यधिक वैमनस्यकारी हो जाती है। इसीलिये कहा जाता है कि किसी के अनुपस्थिति में किसी की आलोचना कभी मत कीजिये, साहस हो तो सामने कह दीजिये। किसी व्यक्ति के बारे में आपकी अवधारणा कालान्तर में बदल सकती है, जो आपको अच्छा नहीं लगता था अब अच्छा लगने लगा, तब यह असत्य नहीं कहलायेगा।

मन में कुछ अन्य है, पर परिस्थिति देख कर कुछ अन्य कहना। यथार्थ होने पर भी अपने ज्ञान के अनुरूप बोलना। कुछ और प्रश्न हो, उत्तर कुछ और देना। देखा, सुना और अनुमानित का एक भाग ही बतलाना, अर्धसत्य बतलाना। ये सब असत्य की श्रेणी में आते हैं। वाणी कुछ और बोलती है, शरीर कुछ और बोलता है। देख कर पता चल जाता है। आज भी जैसे ही कोई व्यक्ति कार्यालय में आता है, उसकी भाव भंगिमा का संप्रेषण बहुधा उसके मन का सत्य कह जाता है।

वाणी को बाँधना और मन को साधना कठिन है। जब भी आपके साथ कुछ अप्रिय होता है, कोई आपको दुख पहुँचाता है तो मन में एक विचार श्रंखला चलने लगती है, प्रत्युत्तर की। मन में क्या क्या विद्रूपतायें नहीं आती है? उस समय सत्य का अनुपालन कठिनतम हो जाता है। अच्छा है कि उस समय किसी से संवाद न करें। मन सामान्य स्थिति में आने की प्रतीक्षा करें। जब मन उपद्रव पर उतर आये तो मितभाषी हो जाना ही श्रेयस्कर है। अनियन्त्रित और अमर्यादित वाणी क्या से क्या न करा दे, इस जगत में ?

वाणी का व्यवहार कठिन है पर सत्य से अधिक सहायक और कुछ नहीं। अगले ब्लाग में सत्य को कुछ और व्यावहारिक पक्ष।

21.9.19

अभ्यास और वैराग्य - १०

एक प्रश्न उठ सकता है कि योग के आठ अंगों में क्या कोई क्रम है, जिसका पालन करना आवश्यक हो? इसी प्रकार क्या दस यम और नियमों में भी कोई क्रम रखा जाना चाहिये? विश्लेषण के लिये अष्टांगों को तीन उपसमूह में व्यवस्थित किया जा सकता है। प्रथम यम और नियम, द्वितीय आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार और तृतीय धारणा, ध्यान और समाधि। तीनों उपसमूह स्वतन्त्र स्तरों पर अभ्यास किये जा सकते हैं। प्रथम का यथासंभव पालन, द्वितीय का नियमित अभ्यास और तृतीय का किंचित प्रयास। बस तृतीय में क्रम तो है पर स्पष्ट रूप से पृथकता नहीं है, धारणा में ध्यान या ध्यान में समाधि कब आ जाती है, पता नहीं चलता है।

प्रारम्भ तो तीनों स्तरों पर करना ही होगा। यदि हम प्रतीक्षा करते रहें कि जब पहला सिद्ध होगा तब ही दूसरा करेंगे और बिना दूसरे के तीसरे के बारे में सोचना ही नहीं है, तब संभवतः हम कभी प्रारम्भ ही न कर पायें। ऐसा भी नहीं है कि हम आसन और प्राणायम से तन और मन पुष्ट करते रहे और यमों और नियमों का निशंक उल्लंघन करते रहें। इससे कोई लाभ नहीं होगा। तीनों एक साथ प्रारम्भ करने होंगे, कालान्तर में ये तीनों एक दूसरे को पुष्ट करते हुये सिद्ध होते जायेंगे।

यम में पहला उपांग है अहिंसा। सब अंगों में यह प्रथम है,  प्रधान है, कठिन है और इसे जीवनपर्यन्त सिद्ध करते रहना होता है। पारिभाषिक और प्रायोगिक स्तर पर अहिंसा को समझने में बहुधा भ्रम की स्थिति हो जाती है। यह विशेष तथ्य अहिंसा को और भी गूढ़ बना देता है। गीता इस विषय में एक ओर संशय उत्पन्न करती है तो निदान भी करती है। संशय यह कि यदि अहिंसा प्रथम सोपान है तो युद्ध क्यों और हिंसा क्यों? निदान यह कि कृष्ण स्वयं यह कहते हैं कि ‘सुख दुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ, ततो युद्धाय युजस्व नैवं पापमवाप्यसि। तात्पर्य यह कि हिंसा करने से पाप तो लगता है पर योग की स्थिति में रह कर युद्ध करोगे तो पाप नहीं लगेगा, समेकृत्वा की स्थिति में रह कर युद्ध।

गीता के अतिरिक्त महाभारत जैसे युद्धकाव्य में अन्य स्थानों पर भी अहिंसा को सर्वाधिक वांछित गुण बताया गया है। प्रथमदृष्टया यह विरोधाभास लग सकता है पर व्यास के द्वारा योगसूत्र के भाष्य से निष्कर्ष व्यवस्थित हो जायेंगे। 

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः 
(अहिंसा परम धर्म है, वही परम आत्मसंयम है, वही परम दान है, और वही परम तप है।)
अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम् अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम् 
(अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा ही परम फल है, वह परम मित्र है, और वही परम सुख है)

योगसूत्र(२.३०) में तो पतंजलि ने अहिंसा को एक यम बतला दिया पर उन्होंने अहिंसा की कोई परिभाषा नहीं दी है। पर उसी सूत्र के व्यासभाष्य में अहिंसा को परिभाषित किया गया है। बहुधा यह माना जाता है कि किसी को दुख देना हिंसा है, पर ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता तो चोर को पकड़ना, शत्रु से अपनी रक्षा करना, आततायियों से जनसामान्य को बचाना, यह सब हिंसा के श्रेणी में आ जायेगा। सारे आराध्य, राम, कृष्ण, शिव, हनुमान योग के प्रथम उपांग के उल्लंघन में लिप्त पाये जायेंगे।

व्यास की परिभाषा इस प्रकार है। पूरी तरह से, मनसा वाचा और कर्मणा, हर समय, हर परिस्थतियों में, सबके प्रति अनभिद्रोह का भाव अहिसा है। अनभिद्रोह अर्थात अभिद्रोह न होना। अभिद्रोह - चारों ओर से द्रोह। द्रोह द्रुह धातु से बना है जिसका अर्थ है, घृणा करना, हानि पहुँचाने का अवसर देखना, षड़यन्त्र करना, उपद्रव करना। परदोषदर्शन भी द्रोह है, हिंसा है। इसलिये अहिंसा को केवल दूसरों को दुख न देने की दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। अहिंसा का भाव कर्ता के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा,  न कि सामने वाले के दृष्टिकोण से। आपने किसी के भले के लिये कुछ सलाह दी, सामने वाले को अच्छा नहीं लगा, तो क्या यह हिंसा हो जायेगी? बच्चों को हम सदैव दृढ़ता से समझाते हैं, उनके भले के लिये ही। यदि किसी दुष्ट ने सज्जन के प्रति दुर्व्यवहार किया और सज्जन ने उसे उदारमना हो सह लिया। इसमें यदि सज्जन को दुख नहीं हुआ तो क्या वह हिंसा नहीं होगी? यदि कोई दुकानदार बड़े प्यार से बात करके अपने ग्राहक छल कर रहा है, तो क्या ग्राहक को दुख नहीं होने के कारण यह हिंसा के श्रेणी में नहीं आयेगा? 

अन्याय को बढ़ावा देना, विपरीत बातों को प्रश्रय देना, ये कालान्तर में समाज का अहित करते हैं, हिंसा बढ़ाते हैं। इनका प्रतिकार तो करना ही होगा। अपनी रक्षा का उपक्रम, अन्याय का प्रतिकार, परित्राणाय साधूनाम, विनाशाय दुष्कृताम् ,इन सबको हिंसा की श्रेणी में नहीं लिया जा सकता है। पर प्रतिकार भी उचित मात्रा में होना चाहिये, सामने वाले को सुधारने के क्रम में। यदि प्रतिकार भी आवश्यकता से अधिक हो गया तो संभवतः वह भी हिंसा की श्रेणी में आ जाये। दूसरी ओर यदि हम अहिंसा को शाब्दिक अर्थों में ही लपेटे रहें, अन्याय होता देखें और मुँह मोड़कर चल दें तो वह भी हिंसा में हमारी सहभागिता होगी। ये दोनों ही अति उचित नहीं है।

इस आधार पर विवेचन कर जिस अहिंसा का पालन हम करते हैं वह अहिंसा आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। अहिंसा को यमनियमादि का आधार बताया गया है। यम नियम अहिंसामूलक है। उनसे अहिंसा और परिशुद्ध होती है। अहिंसा की सिद्धि अन्त में होती है। और जब अहिंसा की सिद्धि होती है तो पतंजलि कहते हैं।

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः(२.३५)(अहिंसा की दृढ़ स्थिति होने पर उस योगी के निकट सब प्राणी वैर का त्याग कर देते हैं।) कथाओं में पढ़ते हैं कि ऋषियों के आश्रमों में सारे मृगों में वैर का अभाव दिखता है। अद्भुत प्रभाव है अहिंसा का, व्यापक सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्थायित्व देती है अहिंसा।

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17.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ९

यम और नियम कुल दस गुण हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यम कहलाते हैं। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान नियम हैं। यम निषेधपरक हैं, नियम विधिपरक। यम में हम अपनी उन प्रवृत्तियों को रोकते हैं जो हमें अस्थिर करती हैं। हम एक स्तर ऊपर उठ जाते हैं, संभवतः इसलिये कि बात आगे न बढ़े, अस्थिरता न बढ़े। नियम में हम उन गुणों को विकसित करते हैं जिससे हमें यम स्थिर रखने हेतु कुछ और मानसिक बल मिलता है। नियम से यम और भी नियमित हो जाते हैं।

मन साधने के लिये यह आवश्यक है कि शरीर सधे, परिवार सधे, समाज सधे। यदि ऐसा नहीं होगा तो मन वहीं लगा रहेगा। यदि समाज स्थिर नहीं रहेगा तो मन कैसे स्थिर रहेगा। इनको साधते साधते पर हम इतना खो जाते हैं कि मन साधने का प्रारम्भिक लक्ष्य भूल जाते हैं, नये पथ में रथ बढ़ा देते हैं। परिवार और समाज संबंधों का विस्तृत आकाश है, उसमें यदि सब मनमानी पर उतर आयेंगे तो अव्यवस्था पसर जायेगी। सुचारु व्यवस्था हेतु न्यूनतम आवश्यकतायें तो हमें माननी ही होंगी। सहजीवन के धर्म मानने होंगे।

धर्म वर्तमान का संभवतः सर्वाधिक शापित शब्द है, कोई इसका अर्थ समझना ही नहीं चाहता। इस शब्द को बहुधा कठघरे में उन शब्दों के साथ खड़ा कर दिया जाता है जिन पर हम अपनी दुर्गति और अवनति के आरोप थोपते आये होते हैं। संस्कृत की धृज् धातु से धर्म शब्द बना है, अर्थ है धारण करना। धार्यते इति धर्मः। जो समाज को धारण करे, आधार दे, स्थिरता दे, आश्रय दे, वह धर्म है। धर्म जोड़ने का कार्य करता है, तोड़ने का नहीं। धर्म की गति न्यायवत है, अन्यायवत नहीं। 

मित्र से बात हो रही थी। धर्म के नाम पर प्रचलित कई कुरीतियाँ, रूढ़ियाँ, और विक्षेपों से वह आहत हो जाते हैं। यह सब होते हुये धर्म को किस प्रकार समझा जाये, स्वीकार किया जाये। क्या माना जाये, क्या न माना जाये। धर्म के विषय में अपना दिशायन्त्र तब क्या हो भला? पशोपेश है कि संस्कृति की धरोहर न छोड़ते बनती है और न ही सहर्ष स्वीकार हो पाती है। 

जब डोर उलझ जाये तो सिरे ढूढ़ने होते हैं। मूल समझने से विकार का आकार और प्रकार सब समझ आ जाता है। क्या धर्म है और क्या नहीं, इस विषय पर सदा मनु द्वारा बताये धर्म के लक्षणों को ही स्मरण करने से भ्रम अवगलित हो जाता है। 

मनु धर्म के दस लक्षण बताते हैं। दशकम् धर्म लक्षणम् - धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्यम्, और अक्रोध। यदि कोई विचार, कृत्य, व्यक्ति आदि इन लक्षणों के विपरीत वर्ताव करता है तो वह धर्मसम्मत नहीं है। कर्मकाण्ड और पद्धतियाँ धर्म के लिङ्ग या चिन्ह तो हो सकते हैं पर मूल यही दस लक्षण ही होंगे। इससे स्पष्ट कोई और प्रमाण या परीक्षा हो ही नहीं सकती। यही नैतिकता भी है, वह जो आगे ले जाये। ‘नी’ धातु ‘ले जाने’ के अर्थ में आती है, नेता, नायक, नौका आदि।

ध्यान से देखे तो यम और नियम में वर्णित दस गुण और मनु द्वारा नियत धर्म के दस लक्षण लगभग एक ही हैं। अर्थ स्पष्ट है, यम और नियम का पालन सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक स्थायित्व देता है। संभवतः योग पथ में बढ़ने के लिये इससे सशक्त आधार और कुछ हो भी नहीं सकता है। 

यम यदि वाह्य साम्य स्थापित करता है तो नियम आन्तरिक साम्य। यम और नियम का क्रम अत्यन्त महत्वपूर्ण है, हम बाहर से अन्दर की ओर बढ़ रहे हैं। आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से हम और भी अन्दर तक जाते जायेंगे। अन्दर जानना आवश्यक है योग के लिये। जिसको जानना है, उसी के माध्यम से जानना है। मन को जानना है, मन के माध्यम से जानना। योग यही है, कठिन इसीलिये है, समय इसीलिये लगता है, इसीलिये मन की वृत्तियों को रोकना है अन्यथा न मन देख पायेगा और न मन दिख पायेगा। अन्दर देखने से मन की अन्य गति सीमित हो जाती है, तब बस दृष्टा और मन।

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