Showing posts with label नींद. Show all posts
Showing posts with label नींद. Show all posts

27.7.13

सोते सोते कहानी सुनाना

पृथु दोपहर में सो चुके थे, उन्हें रात में नींद नहीं आ रही थी। मैं पुस्तक पढ़ रहा था पर शब्द धीरे धीरे बढ़ रहे थे, उसी गति से जितनी गति से पलकों पर नींद का बोझ बढ़ रहा था। श्रीमानजी आकर लेट गये, पुस्तक को देखने लगे, कौन सी है, किसने लिखी है, कब लिखी है, क्या लिखा है, क्यों लिखा है? अब वे स्वयं भी इतनी पुस्तकें डकार जाते हैं कि फ्लिपकार्ट वालों को हमारे घर का पता याद हो गया होगा। मैंने पुस्तक किनारे रख दी, उसके बाद जितना कुछ पढ़ा था, यथासंभव याद करके बतलाने लगा, नींद भी आ रही थी और मस्तिष्क पर जोर भी पड़ रहा था। पुरातन ग्रन्थ लिखने वाले आज की तुलना में बहुत सुलझे हुये थे। जितने भी प्राचीन ग्रन्थ होते थे, उनकी प्रस्तावना में ही, क्या लिखा, क्यों लिखा, किसके लिये लिखा, अन्य से वह किस तरह भिन्न है, क्या आधार ग्रन्थ थे और पढ़ने के पश्चात उसका क्या प्रभाव पड़ेगा, सब कुछ पहले विधिवत लिखते थे, तब कहीं विषयवस्तु पर जाते थे। आजकल तो लोग लिख पहले देते हैं, आप पूरा हल जोत डालिये, जब फल निकल आता है, तब कहीं जाकर पता चलता है कि बीज किसके बोये थे?

शरीर और मन की रही सही ऊर्जा तो प्रश्नों के उत्तर में चली गयी।। अब डर यह था कि कहीं सो गये तो श्रीमानजी टीवी जाकर खोल लेंगे और पता नहीं कब तक देखते रहें? वैसे देर रात टीवी देखने का साहस वह तभी करते हैं, जब मैं घर से बाहर होता हूँ, और इसमें भी उनकी माताजी की मिलीभगत और सहमति रहती है। मेरे घर में रहते उनकी रात में टीवी देखने की संभावना कम ही थी।

एक पैतृक गुण है जिसका पालन हम करते तो हैं, पर आधा ही करते हैं। बचपन में पिताजी सबको सुलाकर ही सोने जाते थे और सबसे पहले उठकर सबको उठाते भी थे। अब अवस्था अधिक होने के कारण और टीवी के रोचक धारावाहिकों के कारण उतना जग नहीं पाते हैं और शीघ्र ही सो जाते हैं, पर अभी भी सुबह सबसे पहले उठने का क्रम बना हुआ है। रात का छोर जो उन्होंने अभी छोड़ दिया है, उसे सम्हाल कर हम पैतृक गुण का निर्वाह कर रहे हैं। हर रात सबको सुलाकर ही सोते हैं, पर बहुधा रात में अधिक पढ़ने या लिखने के कारण सुबह उठने में पीछे रह जाते हैं।

आज लग रहा था कि पृथु मेरे पैतृक गुण को ललकारने बैठे हैं, लग रहा था कि वे मुझे सुलाकर ही सोयंेंगे। सोचा कि क्या किया जाये? यदि प्रश्नों के उत्तर इसी प्रकार देते रहे तो थकान और शीघ्र हो जायेगी, मुझे नींद के झोंके आयेंगे और उन्हें आनन्द और रोचकता के। सोचा कि कुछ सुनाते हैं, संभव है कि सुनते सुनते उन्हें ही नींद आ जाये।

बताना प्रारम्भ किया कि हम बचपन में क्या करते थे। आज के समय से कैसी परिस्थितियाँ भिन्न थीं, कुछ ३० वर्ष पहले तक। बताया कि कैसे हमारे घरों में हमारे अध्यापक मिलने आते थे और हमारी शैक्षणिक प्रगति के बारे में विस्तृत चर्चा करते थे। यहाँ तक तो सब ठीक ही चल रहा था, मन में स्पष्ट था कि क्या बता रहे हैं? इसके बाद से कुछ अर्धचेतन सी स्थिति हो गयी। पता नहीं कब और कैसे बात छात्रावास तक पहुँच गयी, पता नहीं कैसे बात वहाँ के भोजन आदि के बारे में होने लगी।

उस समय पृथु के कान निश्चय ही खड़े होंगे, क्योंकि जिस तरह से अर्धचेतन मानसिक अवस्था में मैं छात्रावास के उत्पात और उद्दण्डता की घटनायें बताता जा रहा था, उन्हें इतना मसाला मिला जा रहा था कि उसे छोड़ देना किसी खजाने को छोड़ देने जैसा था। उस समझ तो समझ नहीं आया कि कितना कुछ बता गया। अगले दिन ही पता चल पाया कि लगभग पाँच घटनायें बता गया था, उद्दण्डता और अनुशासनहीनता की, कुछ एकल और कुछ समूह में की गयीं।

मुझे तो ज्ञात नहीं था कि मैं क्या कह गया, पर उसे एक एक शब्द और हर घटना का विस्तृत विवरण और चित्रण याद रहा। अगले दिन जब श्रीमतीजी ने कहा कि १५ वर्ष के विवाह के कालखण्ड में भी ये घटनायें आपने नहीं बतायीं। अब उन्हें क्या बतायें कि सब कुछ उद्घाटित करने भी बाद भी जो घटनायें मन में दबी रहीं, कल की अर्धचेतन अवस्था में कैसे बह निकलीं। उन्हें लगा कि अभी भी कुछ रहस्य शेष हैं, मेरे व्यक्तित्व में। उन्हें समझाया, कि कुछ भी शेष नहीं है अब, आप हमें मानसिक रूप से पूरी तरह से निचोड़ चुकी हैं। वह समझदार हैं, वह शीघ्र ही समझ गयीं।

जब तक पूरा हानिचक्र समझ में आता, देवला को भी सारी घटनायें ज्ञात हो चली थीं, वह ऐसे देख रही थी कि अनुशासन की जकड़न में इतनी अनुशासनहीनता छिपी होगी। हे भगवान, इससे अच्छा था कि रात में पहले ही सो जाता। पर उससे भी बड़ा आघात सहना विधि ने भाग्य में लिख दिया था।

दो माह पहले पिताजी ने, मेरे बचपन की चार-पाँच घटनायें पृथु को बतायी थीं। वह अब तक पृथु के ऊपर ऋण के रूप में चढ़ी थीं। आज पृथु के पास मेरी चार-पाँच घटनायें भी थीं और ऋण चुकाने का पूरा अवसर भी था। वह उस समय अपने दादाजी से ही बतिया रहे थे और जब तक उन्हें रोक पाता, वह अपना कार्य कर चुके थे। आज हम पूरे पारदर्शी थे, एक पीढ़ी ऊपर से एक पीढ़ी नीचे तक। ऐसा लग रहा था कि कल रात को हमारा ही नार्को टेस्ट हो गया था। बस इतनी ही प्रार्थना कर पाये कि, भैया कॉलोनी के अपने मित्रों को मत बताना, नहीं तो बहुत धुल जायेगी।

अब आगे से सावधानी रखनी है कि यदि नींद आ रही हो और पृथु या देवला कुछ कहानी आदि सुनने आ जायें तो उठकर मुँह पर पानी के छींटे मार आयेंगे, उससे भी काम नहीं चलेगा तो कॉफी पी आयेंगे और भूलकर भी वार्ता को छात्रावास नहीं ले जायेंगे। सोते सोते कहानी सुनाने में इस बार तो हमारी कहानी बन गयी है।

12.11.11

सोने के पहले

बच्चों की नींद अधिक होती है, दोनों बच्चे मेरे सोने के पहले सो जाते हैं और मेरे उठने के बाद उठते हैं। जब बिटिया पूछती है कि आप सोते क्यों नहीं और इतनी मेहनत क्यों करते रहते हो? बस यही कहता हूँ कि बड़े होने पर नींद कम हो जाती है, इतनी सोने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, आप लोगों को बढ़ना है, हम लोगों को जितना बढ़ना था, हम लोग बढ़ चुके हैं। बच्चों को तो नियत समय पर सुला देते हैं, कुछ ही मिनटों में नींद आ जाती है उनकी आँखों में, मुक्त भाव से सोते रहते हैं, सपनों में लहराते, मुस्कराते, विचारों से कोई बैर नहीं, विचारों से जूझना नहीं पड़ता हैं उन्हें।

पर मेरे लिये परिस्थितियाँ भिन्न हैं। घड़ी देखकर सोने की आदत धीरे धीरे जा रही है। नियत समय आते ही नींद स्वतः आ जाये, अब शरीर की वह स्थिति नहीं रह गयी है। बिना थकान यदि लेट जाता हूँ तो विचार लखेदने लगते हैं, शेष बची ऊर्जा जब इस प्रकार विचारों में बहने लगती है तो शरीर निढाल होकर निद्रा में समा जाता है। आयु अपने रंग दिखा रही है, नींद की मात्रा घटती जा रही है। जैसे नदी में जल कम होने से नदी का पाट सिकुड़ने लगने लगता है, नींद का कम होना जीवन प्रवाह के क्षीण होने का संकेत है। अब विचारों की अनचाही उठापटक से बचने के लिये कितनी देर से सोने जाया जाये, किस गति से नींद कम होती जा रही है, न स्वयं को ज्ञात है, न समय बताने वाली घड़ी को।

जब समय की जगह थकान ही नींद का निर्धारण करना चाहती है तो वही सही। अपनी आदतें बदल रहा हूँ, अब बैठा बैठा कार्य करता रहता हूँ, जब थकान आँखों में चढ़ने लगती है तो उसे संकेत मानकर सोने चला जाता हूँ। जाते समय बस एक बार घड़ी अवश्य देखता हूँ, पुरानी आदत जो पड़ी है। पहले घड़ी से आज्ञा जैसी लेता था, अब उसे सूचित करता हूँ। हर रात घड़ी मुँह बना लेती है, तरह तरह का, रूठ जाती है, पर शरीर ने थकने का समय बदल दिया, मैं क्या करूँ?

क्या अब सोने के पहले विचारों ने आना बन्द कर दिया है? जब बिना थकान ही सोने का यत्न करता था, तब यह समस्या बनी रहती थी, कभी एक विचार पर नींद आती थी तो कभी दूसरे विचार पर। जब से थकान पर आधारित सोने का समय निश्चित किया है, सोने के पहले आने वाले विचार और गहरे होते जा रहे हैं। कुछ नियत विचारसूत्र आते हैं, बार बार। सारे अंगों के निष्क्रियता में उतरने के बाद लगता है कि आप कुछ हैं, इन सबसे अलग। कभी लगता है इतने बड़े विश्व में आपका होना न होना कोई महत्व नहीं रखता है, आप नींद में जा रहे हैं पर विश्व फिर भी क्रियारत है।

हर रात सोने के पहले लगता है कि शरीर का इस प्रकार निढाल होकर लुढ़क जाना, एक अन्तिम निष्कर्ष का संकेत भी है, पर उसके पहले पूर्णतया थक जाना आवश्यक है, जीवन को पूरा जीने के पश्चात ही। हमें पता ही नहीं चल पाता है और हम उतर जाते हैं नींद के अंध जगत में, जगती हुयी दुनिया से बहुत दूर। एक दिन यह नींद स्थायी हो जानी है, नियत समय पर सोने की आदत तो वैसे ही छोड़ चुके है। एक दिन जब शरीर थक जायेगा, सब छोड़कर चुपचाप सो जायेंगे, बस जाते जाते घड़ी को सूचित कर जायेंगे।