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7.8.22

धर बल, अगले पल चल जीवन


शत पग, रत पग, हत पग जीवन,  

धर बल, अगले पल चल जीवन।


रथ रहे रुके, पथ रहे बद्ध

प्रारम्भ, अन्त से दूर मध्य,

सब जल स्वाहा, बस धूम्र लब्ध,

निश्चेष्ट सहे, क्या करे मनन,

धर बल, अगले पल चल जीवन।


बनकर पसरा वह बली स्वप्न,

चुप चर्म चढ़ा, बन गया मर्म,

सब सुख अवलम्बन गढ़े छद्म,

मन मुक्ति चहे, पोषित बंधन,

धर बल, अगले पल चल जीवन।


ऋण रहा पूर्ण, हर घट रीता,

श्रमसाध्य सकल, उपक्रम बीता,

मन सतत प्रश्न, तब क्या जीता,

भय भ्रमित अनन्तर उत्पीड़न,

धर बल, अगले पल चल जीवन।


जो है प्रवर्त, क्षण प्राप्त वही,

तन मन गतिमयता व्याप्त अभी,

गति ऊर्ध्व अधो अनुपात सधी,

आगत श्वासों का आलम्बन,

धर बल, अगले पल चल जीवन।

15.7.21

सात चक्र - सरलीकरण

 

योग शब्द युज् धातु से आया है। युज् घातु तीन अर्थों में प्रयुक्त होती है। संस्कृत व्याकरण में लगभग २००० धातुयें हैं जो १० गणों में विभक्त हैं। हर गण का एक विकिरण प्रत्यय होता है जिससे उसके रूप भिन्न होते हैं। युज् धातु भी तीन गणों में है और हर गण में उसका भिन्न अर्थ है। रोचक यह भी है कि सारी धातुयें किसी क्रिया को ही बताती हैं। धातुओं से ही सारे शब्द उत्पत्ति पाते हैं अतः यह तथ्य शब्द के उत्पत्ति के क्रियात्मक मूल को सिद्ध करता है। शब्दों के मूल में जाने से उसमें निहित क्रियायें और सन्निहित गुण पता चलते हैं। उदाहरण के लिये राम शब्द रम् धातु से आया है, अर्थ है रमना, क्रीडा करना, प्रसन्न होना। राम का शाब्दिक अर्थ है, जो हर्षदायक हो। इसी प्रकार जल या अग्नि के लिये प्रयुक्त भिन्न शब्द उनके भिन्न गुणों को व्यक्त करते हैं।


युज् धातु के तीन अर्थ इस प्रकार हैं।

  1. युज् समाधौ (४.७४) - चित्त स्थिर करना, बराबर स्थित होना, समत्व में होना। समाधि (सम आ धा), धा धारणे।
  2. युज् योगे (७.७) - जुड़ना, मिलना, एकत्र करना।
  3. युज् संयमने (१०.३३८) - संयत करना, बाँधना, वश में रखना। संयम (सम् यम), यम उपरमे।

उपरोक्त तीनों ही अर्थ योग प्रक्रिया को समझने में सहायक हैं। ये अर्थ पिछले ब्लाग में वर्णित योगसूत्र और गीता के तीन कथनों को और भी स्पष्ट करते हैं। पहले और दूसरे अर्थ स्थितिबोधक हैं, तीसरा अर्थ प्रक्रियाबोधक हैं। शब्द का अर्थ या अर्थ का मन्तव्य समझने में यदि कोई संशय रहता है तो उसकी धातु का विश्लेषण कर हम तात्पर्य समझ सकते हैं। 


योग के अर्थ, सिद्धान्त और व्यवहार को तो क्रमशः व्याकरण, योगसूत्र और गीता के माध्यम से समझा जा सकता है पर उनको जीवन में प्रयुक्त करने में सतत प्रयत्न करना पड़ता है। अष्टाङ्गयोग की प्रक्रिया और योगेश्वर की व्याख्या अन्ततः उस वर्तमान पर आकर ठहरती है जिसे हमें निभाना होता है। वही हाथ में रहता भी है और कुछ नियन्त्रण में भी। सारे के सारे उपाय, ज्ञान, उपक्रम उसी एक क्षण को निभाने के लिये आपको तैयार करते हैं, जिसे वर्तमान कहा जाता है। जो हो रहा है, यत वर्तते, वह वर्तमान। आने के पहले वह भविष्य था, बीतते ही वह भूत हो जाता है, एक क्षण ही है वर्तमान। विस्तार करना चाहें तो जीवन कम पड़ जायेंगे और संक्षिप्त करें तो एक क्षण में सिमट जाता है सब कुछ। अनुभव अन्ततः यही सिखाता है कि वर्तमान को कैसे निभायें। 


काल बड़ा निर्दयी होता है। वर्तमान के उसी एक क्षण में ही हमें संकुचित कर देता है, न एक क्षण उधर, न एक क्षण इधर। यदि उस क्षण पर भी हमारा नियन्त्रण न रहा तो कुछ भी नियन्त्रण में नहीं रहेगा। यदि कर्तव्य के उस क्षण में हम भूत या भविष्य के विकल्प में उलझे रहे तो कुछ भी नहीं मिलेगा। जो भी हमें तैयारी करनी है, जो भी हमें संस्कार डालने हैं, उसी एक क्षण को निभाने के लिये, जो वर्तमान है। गीता(४.६) में कृष्ण कहते हैं कि मृत्यु के क्षण हमारी मनोदशा हमारा नया जन्म निश्चित कर देती है, अतः अन्तकाल में कृष्ण का स्मरण करना चाहिये। साधकों के सारे जीवन बस इसी तैयारी में निकल जाते हैं कि मृत्यु के क्षण में वह शक्ति और सामर्थ्य रहे कि ईश्वर का स्मरण मन में रह सके।


मृत्यु का क्षण दो जन्मों को विभक्त करता है अतः उस पर प्रयुक्त मनःस्थिति महत्वपूर्ण दिखती है। वर्तमान के क्षण को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखें तो वह भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अगले ही क्षण मन की एक नयी स्थिति होती है, एक नया जन्म होता है। अनुभव के आधार पर वर्तमान के उसी क्षण को निभाने के सरल से कुछ प्रयास करता हूँ। समर्थ नहीं हूँ, बहुधा काल के द्वारा ढकेल दिया जाता हूँ। मानसिक दुर्बलतायें प्रबल हो जाती हैं, जो चाहता हूँ, जो सोचता हूँ, वह नहीं कर पाता हूँ। फिर भी सभी प्रयासों को कोटिबद्ध कर व्यक्त कर रहा हूँ। 


  1. स्मृतियों को निष्कर्ष दें। राग, द्वेष से उन्हें मुक्त करें। अस्मिता (यह मैंने किया है) से बचें। टालना उचित नहीं हैं, यदि ऐसा किया तो वे पुनः लौटकर आयेंगी। यथासंभव उनकी तीक्ष्णता मन्द करें।
  2. कल्पना सृजनशीलता के लिये तो अच्छी है पर कब वह चिंता के ग्रास में चली जाती है, पता ही नहीं चलता है। कार्यविशेष से ही भविष्य में विचरण करें और शीघ्र ही वर्तमान में लौट आयें। बीच में अपने से प्रश्न अवश्य पूछें कि यह चिंता किस चिन्तन की भटकन है?
  3. कुछ ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं, कुछ पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं या देख रहे हैं तो उस समय और किसी विचार को न आने दें, सप्रयास। मन उकता जाता है, भागता है। ध्यान का तनिक अभ्यास इसमें सहायक होता है। बीच बात में बोलने के क्रम पर संयम रखे। यह इसलिये होता है कि हम सुनते समय सीखने के स्थान पर सोचने लगते हैं और स्वयं को व्यक्त करना चाहते हैं।
  4. किसी कर्म में लगे हो तो तन्मय होकर करें, शत प्रतिशत। एक साथ कई कार्य करने से दोनों से ही न्याय नहीं होता है और मन भटकता है सो अलग। एकाग्रता से समय, ऊर्जा की बचत तो होती ही है, साथ में कार्य की गुणवत्ता भी स्तरीय होती है। सम्यक रूप से निष्पादित कर्म तृप्ति की अनुभूति कराता है, अपने निष्कर्ष को पा जाता है, अन्यथा स्मृतियों में नहीं आता है।
  5. जब विश्राम करने जायें, इतना क्लान्त हो जायें कि मन को भ्रमण करने के लिये कुछ अवसर ही न मिले। निद्रा के हर क्षण में शरीर स्वयं को ऊर्जा से पुनः पूर्ण भरता रहे, प्रतिदिन। दिनभर के अतृप्त क्षण, अतृप्त निष्कर्ष रात्रि में आपको असहाय पा हाहाकार न मचाने पायें, इसके लिये आवश्यक है कि उनको यथासंभव, यथाप्रयास और यथासमय निष्कर्ष पर पहुँचाया जाये।  
  6. जब कुछ करने को न हो, कुछ जानने को न हो, स्मृति और कल्पना में मन आड़ोलित न हो, मन चैतन्य हो, तब शान्त बैठकर स्वयं को ही निहारें। प्रश्नों को पूछें, उत्तरों को ढूढ़ें। यह एकान्त अन्वेषण कई उलझनों को सुलझा देता है। एकान्त न सह पाने की प्रवृत्ति तभी आती है जब हम प्रश्नों से भागना चाहते हैं। हमें यह भय रहता है कि संभावित उत्तर हमको उद्वेलित कर जायेंगे, हमारे तथाकथित स्थिर जीवन को अस्थिर कर जायेंगे। मुझे तो लगता है कि जीवन के सर्वाधिक उत्पादक क्षण वे थे जब हाथ में कुछ करने को नहीं था, मन में कुछ सोचने को नहीं था।


प्रयास करता हूँ कि वर्तमान में जी सकूँ। बहुधा भटकता हूँ पर यथासम्भव वापस लौटने का प्रयत्न करता हूँ।

31.5.15

वर्तमान

रत विश्व सतत, मन चिन्तन पथ,
जुड़कर खोना या पंथ पृथक,
क्या निहित और क्या रहित, प्रश्न,
आश्रय, आशय, आग्रह शत शत ।।१।।

प्रातः प्रवेश, स्वागत विशेष,
करबद्ध खड़े, जो कार्य शेष,
प्रस्तुत प्रयासरत यथायोग्य,
अब निशा निकट, मन पुनः क्लेश ।।२।।

क्या पास धरें, क्या त्याग करें,
किस संचय से सब भय हर लें,
तन मन भारी, जग लदा व्यर्थ,
गन्तव्य रिक्त, अनुकूल ढलें ।।३।।

क्षण प्राप्त एक, निर्णय अनेक,
गतिमान समय, अनवरत वेग,
जिस दृष्टि दिशा, लगती विशिष्ट,
आगत अदृश्य, फल रहित टेक ।।४।।

आधार मुक्त, मतिद्वार लुप्त,
संकेतों के संसार सुप्त,
प्रश्नों के उत्तर बने प्रश्न,
निष्कर्ष रचयिता स्वयं भुक्त ।।५।।

क्या आयोजन, क्या संयोजन,
किसका नर्तन, किसका मोदन,
कथनी करनी में मुग्ध विश्व,
यदि नहीं प्राप्त, क्यों आरोदन ।।६।।

न आदि ज्ञात, न अन्त ज्ञात,
न अन्तरमन का द्वन्द्व ज्ञात,
यदि ज्ञात अभी, बस वर्तमान,
एक साँस उतरती रन्ध्र ज्ञात ।।७।।

16.8.14

जीवन बहता है, बहने दो

मन कहता हैवह कहने दो,
जीवन बहता हैबहने दो 

आज व्यर्थ की चिन्ताओं से,
पंथ स्वयं का मत रोको 
जीकर देखो तो वर्तमान,
संगीत मधुर हैमत टोको 
रमणीयों में मन रमने दो,
जीवन बहता हैबहने दो ।। १।।

मनस-विकल्पों के दलदल में,
उलझा लेना सहजसरल है 
क्या पाओगे चिन्तन में,
जो जीवन मेंकल थाकल है 
ऐसी भावुकता रहने दो,
जीवन बहता हैबहने दो ।। २।।

घटनायें बहती नियतिबद्ध,
क्यों तोड़ रहे हो इस क्रम को 
हम नहीं नियन्ता जीवन के,
तो व्यर्थ अकारण इस मन को,
क्यों तिक्त व्यथायें सहने दो,
जीवन बहता हैबहने दो ।। ३।।

तर्क-वितर्कों के कुण्डों में,
जीवन कइयों जल जायेंगे 
रहे निरर्थक बुद्धि-यज्ञ,
निष्कर्ष नहीं मिल पायेंगे 
चहुँ ओर सरसता रहने दो,
जीवन बहता हैबहने दो ।। ४।।

7.6.14

प्रयास तुम्हारा

उलझा दी हर डोर, हमें जो बाँध रही थी,
छिन्नित संस्कृति वहीं जहाँ से साध रही थी ।
देखो फूहड़ता छितराकर बिखरायी है,
निशा-शून्यता विहँस स्वयं पर इठलायी है ।

जाओ इतिहासों के अब अध्याय खोज लो,
नालंदा और तक्षशिला, पर्याय खोज लो ।
सपनों और अपनों में झूल रहा जीवन है,
आत्म-प्रेम के वैभव का उन्माद चरम है ।

यदि ला पाना कहीं दूर से समाधान तुम,
तब रच लेना मेरे जीवन का विधान तुम ।
औरों की क्या कहें, स्वयं पर नहीं आस्था,
विश्व भरेगा दंभ तुम्हारे हर प्रयास का ।

14.12.13

लुटे जुटे से

लुटे तभी थे, 
और आज भी, 
लुटे जा रहे।

जो जीते थे, 
अब रीते हैं,
जीत रहे जो,
वे भी भर भर,
मन में, मनभर,
अधिकारों को,
घुटे जा रहे।

दूल्हा, दुल्हन,
अपनी धुन में,
हम सब दर्शक,
बेगाने से,
बने बराती, 
जुटे जा रहे।

23.11.13

अपरिग्रह - जन्मों का

आपने अनावश्यक वस्तुओं का त्याग कर दिया। आप उससे एक स्तर और ऊपर चले गये, आपके अस्तित्व ने अपना केन्द्र अपनी आत्मा तक सीमित कर लिया। किन्तु क्या ऐसा करने से आपका अपरिग्रह पूर्ण हो गया, क्या सिद्धान्त वहीं पर रुक जाता है, क्या वहीं पर अध्यात्म अपने निष्कर्ष पा गया?

पूर्णतः नहीं। शरीर तो रहेगा, मन भी रहेगा। शरीर की आवश्यकतायें आप चिन्तनपूर्ण जीवनशैली के माध्यम से कम कर सकते हैं, पर मन का क्या? पतंजलि योगसूत्र का दूसरा सूत्र ही कहता है, योगः चित्तवृत्ति निरोधः, योग चित्त की वृत्ति का निरोध है। मन को कैसे सम्हालें, अर्जुन तक को मन चंचल लगा, जो बलपूर्वक खींच कर बहा ले जाता है। अब कौन याद दिलाये कि मन भटक रहा है, क्योंकि याद दिलाने का ऊपर उत्तरदायित्व तो मन ने ही उठा रखा था। अब वही घूमने चला गया तो कौन याद दिलायेगा?

मन जिस समय जो सोचता है, हम उस समय वही हो जाते हैं। शरीर भले ही किसी बैठक में हो, पर मन किसी दूसरे ही उपक्रम में लगा रहता है। यदि सड़क में चलता व्यक्ति मन में घर के बारे में सोच रहा होता है, तो वह मानसिक रूप से घर में ही होता है। इस तरह देखा जाये तो मन के माध्यम से न जाने हम कितने जन्म जी लेते हैं, वर्तमान में ही रहते हुये ही भूत में घूम आते हैं, भविष्य में घूम आते हैं।

विवाह किये हुये लोगों में एक भयमिश्रित उत्सुकता रहती है कि सात जन्म साथ रहने वाला सत्य क्या है? क्या प्रेम की प्रासंगिकता सात जन्म तक ही सीमित रहती है? क्या सात जन्मों के बाद पुनर्विचार याचिका स्वीकार की जा सकती है? ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न उमड़ते है, प्रसन्न व्यक्ति को लगता है कि सात जन्म भी कम हैं, दुखी मानुषों को लगता है कि ईश्वर करे, यही सातवाँ जन्म हो जाये।

देखा जाये तो जन्म का अर्थ है अस्तित्व, अपने मन की भ्रमणशील प्रकृति के कारण हम एक शरीर में रहते हुये भी भिन्न भिन्न अस्तित्वों में जीते हैं। रोचक तथ्य यह है कि ये अस्तित्व भी सात ही होते हैं। इन अस्तित्वों को समझ लेने से विवाह के सात जन्मों की उत्कण्ठा शमित हो जायेगी, अपरिग्रह की जन्म आधारित विमा भी समझ आ जायेगी, कर्म और कर्मफल का रहस्य स्पष्ट होगा और साथ ही प्राप्त होगा वर्तमान में पूर्णता से जीने के आनन्द का रहस्य।

ये सात जन्म है, विशु्द्ध भूत, विशुद्ध भविष्य, भूत आरोपित भविष्य, भविष्य आरोपित भूत, भूत और भविष्य उद्वेलित वर्तमान, विशु्द्ध वर्तमान, विशुद्ध अस्तित्व।

विगत स्मृतियों में डूबना विशुद्ध भूत है, आगत की मानसिक संरचना विशुद्ध भविष्य है। भूत में प्राप्त अनुभवों के आधार पर भविष्य का निर्धारण भूत आरोपित भविष्य है। इसमें हम सुखों की परिभाषायें बनाते हैं और भविष्य को उसी राह में देखते हैं। अनुभव जैसे जैसे बढ़ते जाते हैं, भविष्य की संरचना परिवर्तित होती जाती है। भविष्य की छवि के आधार पर भूत का पुनर्मूल्यांकन भविष्य आरोपित भूत है। हो सकता है कि बचपन में हमें खिलौने, पुस्तक और मिठाई एक जैसे ही अच्छे लगते हों, पर यदि भविष्य में हमने स्वयं को महाविद्वान के रूप में देखते हैं तो भूत में प्राप्त अनुभवों को उसी अनुसार वरीयता देते हैं। तब हम बचपन में पढ़ी पुस्तकों को अधिक वरीयता देकर अपने भूत को पुनर्परिभाषित करने लगेंगे।

हो सकता है कि मन वर्तमान में हो, पर भूत में प्राप्त अनुभवों को जीना चाहता है या भविष्य की आकांक्षाओं में लगना चाहता हो, तो वह भूत और भविष्य आरोपित वर्तमान कहलायेगा। इस स्थिति में हम वर्तमान को अपूर्ण मानते रहते हैं और भूत या भविष्य से प्रभावित बने रहते हैं। विशुद्ध वर्तमान के अस्तित्व में हम परिवेश में घटने वाली घटनाओं से परिचित रहते हैं और उन पर ध्यान देते हैं। विशुद्ध अस्तित्व में हम वर्तमान के भाग न बनकर अपने भिन्न अस्तित्व का अनुभव करते हैं, वर्तमान में अपना अस्तित्व देखते हैं। विशुद्ध अस्तित्व पूर्णतः आध्यात्मिक अवस्था है।

कभी किसी का ध्यान न लग रहा हो तो उससे पूछिये कि क्या सोच रहे थे, इससे आपको ज्ञात हो जायेगा कि वह किस जन्म में जी रहा है। हम नब्बे प्रतिशत अधिक समय तो वर्तमान में रहते ही नहीं है, या भूत आरोपित रहते हैं, या भविष्य आरोपित रहते हैं। मन को भटकना अच्छा लगता है, सो भटकते रहते हैं।

वर्तमान में न जीने से हम न जाने कितना आनन्द खो देते हैं। हमारे सामने हमारे बच्चा कुछ प्यारी सी बात बता रहा है और हम मन में किसी से हुये मन मुटाव के बारे में सोच रहे हैं और उद्वेलित हैं। वर्तमान में होते हुये भी हम न जाने किसी और स्थान पर रहते हैं, विचारों के बवंडर से घिरे रहते हैं। अपरिग्रह का पक्ष यह भी है कि अन्य जन्मों का त्याग कर वर्तमान में ही जिया जाये, वर्तमान का आनन्द लिया जाये, अस्तित्व के हल्केपन में उड़ा जाये। शेष जन्मों को लादे रहने का क्या लाभ। भूत और भविष्य पर चिन्तन आवश्यक है, भूत से सीखने के लिये, भविष्य गढ़ने के लिये, पर वर्तमान को तज कर नहीं और न ही आवश्यकता से अधिक।

वर्तमान को जीना ही होता है, हम उससे भाग नहीं सकते हैं। वर्तमान का जो क्षण हमारे सामने उपस्थित है, उसे हमें पूर्ण करना है, उसका पालन करना है। ऐसा नहीं करने से वह हमारे ऊपर ऋण सा बना रहेगा, कल कभी न कभी हमें उसे जीना ही होगा, स्मृति के रूप में, समस्या के रूप में, विकृति के रूप में, और तब हम उस समय के वर्तमान को नहीं जी रहे होंगे। वर्तमान को वर्तमान में न जीने के इस व्यवहार के कारण हम जन्मों का बोझ उठाये फिरते रहते हैं, अतृप्त, अपूर्ण, उलझे।

मेरे लिये यही सात जन्मों का सिद्धान्त है, यही कर्मफल का सिद्धान्त है, यही अपरिग्रह के सिद्धान्त की पूर्णता है, यही आनन्द और मुक्त भाव से जीने का सिद्ध मार्ग है। चलिये वर्तमान में ही जीते हैं, पूर्णता से जीते हैं।

19.6.13

जो है, सो है

अपने मित्र आलोक की फेसबुक पर बदले चित्र पर ध्यान गया, उसमें कुछ लिखा हुआ था। आलोक प्रमुखतः चित्रकार हैं और उसके सारे चित्रों में कुछ न कुछ गूढ़ता छिपी होती है, अर्थभरी कलात्मकता छिपी रहती है। आलोक बहुत अच्छे फोटोग्राफर भी हैं और उनकी मूक फोटो बहुत कुछ कहती हैं। आलोक को पढ़ते पढ़ते दार्शनिकता में डुबकी लगाने में भी रुचि है, उनसे किसी भी विषय पर बात करना एक अनुभव है, हर बार कुछ न कुछ सीखने को मिल जाता है।

चित्र में उनके रेत पर चलते हुये पैर का धुँधला दृश्य था, उनके ही पैर का होगा क्योंकि आलोक गोवा में रहते हैं। उस पर लिखा था, Whatever is could not be otherwise - Eckhart Tolle. अर्थ है, जो है, वह उससे इतर संभव नहीं था। या कहें कि जो है, वह उसके अतिरिक्त कुछ और हो भी नहीं सकता था। पर इसे पढ़ते ही मेरे मन मे जो शब्द आये, वे थे, 'जो है, सो है'।

जो है, सो है। बड़े दार्शनिक शब्द हैं ये। समय, व्यक्ति और स्थान की तुलनात्मक जकड़न से सहसा मुक्त करते शब्द हैं ये। न पहले सा समय आ सकता है, न हम औरों से ही बन सकते हैं और न ही हम किसी समय किसी और स्थान पर ही हो सकते हैं। यदि ऐसा होता तो वैसा हो जाता, यदि ऐसा न होता तो वैसा न हो पाता। ऐसे ही न जाने कितने मानसिक व्यायाम करते रहते हैं, हम सभी। ऐसा लगता है कि औरों की तुलना में सदा ही स्वयं को स्थापित करने के आधार ढूढ़ते रहते हैं हम। न जाने कितना समय व्यर्थ होता है इसमें, न जाने कितनी ऊर्जा बह जाती है इस चिंतन में। उस सभी विवशताओं से मुक्ति देता है, यह वाक्य। जो है, सो है।

एक्हार्ट टॉल के लेखन में आध्यात्मिकता की पर्याप्त उपस्थिति रहती है। उनकी लिखी पॉवर ऑफ नाउ नामक पुस्तक आप में से कइयों ने पढ़ी भी होगी। वर्तमान में जीने की चाह का ही रूपान्तरण है, उनकी यह पुस्तक। मन में एकत्र स्मृतियों और आगत के भय में झूलते वर्तमान को मुक्त कराते हैं, इस पुस्तक के चिन्तन पथ। अभी के मूलमन्त्र में जीवन जी लेने का भाव सहसा हर क्षण को उपयोगी बना देता है, जैसा उस क्षण का अस्तित्व है।

मन बड़ा कचोटता है, असंतुष्ट रहता है। कोई कारण नहीं, फिर भी अशान्त और व्यग्र सा घूमता है। कोई कारण पूछे तो बस तुलना भरे तर्क बतलाने लगता है। समय, व्यक्ति और स्थान की तुलना के तर्क। ऐसे तर्क जो कभी रहे ही नहीं। ऐसे जीवन से तुलना, जो हम कभी जिये ही नहीं। क्योंकि हम तो सदा वही रहे, एक अनोखे, जो हैं, सो हैं।

हम पहले जैसे प्रसन्न नहीं हैं, या भविष्य में अभी जैसे दुखी नहीं रहना चाहते हैं, यही तुलना हमें ले डूबती है। क्या लाभ उस समय को सोचने का जिसे हम भूतकाल कहते हैं और जिसे हम बदल नहीं सकते हैं। क्या लाभ उस समय को सोचने का जो आया ही नहीं और जिसकी चिन्ता में हम भयनिमग्न रहते हैं। मन हमें सदा ही तुलना को बाध्य करता रहता है और हम हैं कि उन्हीं मायावी तरंगों में आड़ोलित होते रहते हैं, अस्थिर से, आधारहीन से। वर्तमान ही है जिसे जीना प्रस्तुत कर्म है और हम इसी से ही भागते रहते हैं।

मन हमें या तो भूतकाल में या भविष्य में रखता है, वर्तमान में रहना उसके बस का नहीं। यदि मन वर्तमान में रहना सीख जायेगा तो वह स्थिर हो जायेगा, उसकी गति कम हो जायेगी, उसका आयाम कम हो जायेगा। किसी चंचल व्यक्तित्व को भला यह कैसे स्वीकार होगा कि उसकी गति कम हो जाये या उसके आयाम सिकुड़ जायें।

जब समय की विमा से हम बाहर आते हैं और वर्तमान में रुकते हैं, तब भी मन नहीं मानता है। किसी और स्थान से तुलना करना प्रारम्भ कर देता है, सोचने लगता है कि संभवतः किसी और स्थान में हमारा सुख छिपा है, यहाँ की तुलना में अच्छा विस्तार छिपा है। हमारा मन तब यहाँ न होकर वहाँ पहुँच जाता है और तुलना करने के अपने कर्म में जुट जाता है। यदि उस स्थान से किसी तरह सप्रयास आप वापस आ जायें, तो तुलना अन्य व्यक्तियों से प्रारम्भ हो जाती है।

मन अपनी उथल पुथल छोड़ नहीं सकता है, उसे साथी चाहिये अपने आनन्द में, हमें भी साथ ले डूबता है। मन को उछलना कूदना तो आता है, पीड़ा झेलना उसने कभी सीखा ही नहीं। मन छोटी से भी छोटी पीड़ा हम लोगों को सौंप देता है और चुपचाप खिसक लेता है।

पता नहीं, आलोक की तर्करेखा भी मेरी तर्करेखा से मिलती है या नहीं, कभी पूछा भी नहीं। पर एक स्थान से चले यात्री कुछ समय पश्चात पुनः एक स्थान पर आकर मिल जायें तो पथ का प्रश्न गौड़ हो जाता है। चित्र में एक पथ दिख रहा है, एक पग दिख रहा है, वर्तमान की दिशा का निर्देशित वाक्य दिख रहा है, यह सब देख मुझे तो यही लगता है कि आलोक मेरे पथ पर ही है। वह तनिक आगे होगा, मैं तनिक पीछे। वह तनिक गतिशील होगा, मैं तनिक मंथर।

यह चित्र एक और बात स्पष्ट रूप से बता रहा है, इसमें न पथ का भविष्य दिख रहा है, न पथ का भूतकाल, बस पथ दिख रहा है, बस पग दिख रहा है। सब के सब वर्तमान की ओर इंगित करते हुये। आप भी बस अभी की सोचिये, यहीं की सोचिये, अपने बारे में सोचिये। मैं तो कहूँगा कि सोचिये ही नहीं, सोचना आपको बहा कर ले जायेगा, आगे या पीछे। आप बस रहिये, वर्तमान में, जो है, सो है।

9.3.13

हम जिये है पूर्ण, छवि व्यापी रहे

मौन क्यों रहता नियन्ता,
क्या जगत का दाह दिखता नहीं उसको?
मूर्ति बन रहती प्रकृति क्यों,
क्या नहीं उत्साह, पालित हो रहे जो?
काल क्यों हतभाग बैठा,
क्या सुखद निष्कर्ष सूझे नहीं जग को?

प्राण का निष्प्राण बहना,
आस का असहाय ढहना,
हार बैठे मध्य में सब,
है नहीं कुछ शेष कहना,

वधिक बनती है अधोगति,
आत्महन्ता, सो गयी मति,
साँस फूला, राह भूला,
क्षुब्ध जीवन ढो रहा क्षति,

बस सशंकित सा श्रवण है
रुक गया अनुनाद क्रम है,
शब्द हो निष्तेज गिरता,
डस रहा जो, अन्ध तम है,

हाथ धर बैठे रहें क्यों,
आज जीवन, नहीं बरसों,
पूर्णता का अर्ध्य अर्पित,
जी सके प्रत्येक दिन यों,

तो नियन्ता को,  प्रकृति को, काल को,
भूत के गौरव, समुन्नत-भाल को,
कहो जाकर, सुनें सब, विधिवत सुनें,
शेष अब भी हैं हृदय में धड़कनें,
है उसी में शक्ति क्षण की, दंश है,
कहो उसमें जूझने का अंश है,

साँस साधे आज आगत साँस को,
दिन सधे दिन विगत से और मास को,
मास साधे और क्रम चलता रहे,
साधने का नियम नित फलता रहे,
व्यक्ति से हो व्यक्ति पूरित, श्रंखला,
भाव के शत-चन्द्र चमके चंचला,

कहो जाकर, मंच अब तैयार हों,
अब चरित्रों में भरे अधिकार हों,
कहो कब तक, पढ़ें हम अनुवाद को,
छद्म सारे अभिनयों का त्याग हो,
सूत्रधारों में छिपे मन के कुटिल,
पारदर्शी हो दिखें संभ्रम जटिल,

दृष्टि में करुणा जगे, आशा जगे,
जहाँ वंचित, धन वहीं बहने लगे,
पूर्ण निश्चित, आंशिक क्यों क्रम रहे,
सूर्य चमके, क्यों तिमिर का भ्रम रहे,
रात आये, किन्तु यह विश्वास हो,
दिन मिलेगा, स्वप्न में भी आस हो,

आ रहा है समय, शत स्वागत उठें,
विगत अनुभव और सब आगत जुटें,
सुखों का संधान क्यों एकल रहे,
कर्मनद प्रत्येक सुख सागर मिले,
रहे अंकित, काल भी साखी रहे,
हम जिये है पूर्ण, छवि व्यापी रहे।



9.2.13

आईआईटी - एक आनन्द यात्रा

मेरे लिये तो आईआईटी किसी भी छात्र के विकास के लिये विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में एक है, विशेषकर उस छात्र के लिये जो अपने जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव में पाँव धरने जा रहा है। मैं कभी सोचता हूँ कि मैं क्यों गया वहाँ, और लोग भी क्यों जाते हैं वहाँ? मैंने वहाँ चार वर्षों में तीन तरह के लोग देखे। पहले वे जो यह सोच कर आये कि यहाँ आने से नौकरी पक्की हो गयी, लगभग ७५ प्रतिशत, ये लोग किसी तरह चार साल तक ग्रेडों और एसाइनमेन्ट से जूझ कर निकल जाते हैं, नौकरी मिलती है और उनकी आईआईटी यात्रा का ध्येय पूरा हो जाता है। हो सकता है मैं भी कई दिनों तक इसी मानसिकता में रहा हूँ पर वहाँ उपस्थित संभावनाओं ने मुझे शीघ्र ही दूसरी श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। ये श्रेणी अपनी बौद्धिक क्षमता को पैना करने और उसे सबके सामने सिद्ध करने यहाँ आती है। संभवतः उसे ज्ञात रहता है कि नौकरी तो मिल ही जानी है, आईआईटी की संभावनायें एक नौकरी से कहीं अधिक हैं। सघन बौद्धिक वातावरण फिर कहाँ मिलेगा भला, उसका उपयोग करना अधिक आवश्यक है, किसी क्षेत्र में अनुसंधान कर पैनापन प्राप्त करना यहाँ आने की सार्थकता होगी। इस श्रेणी में लगभग २४ प्रतिशत लोग आगे हैं।

मेरे आशाओं की धारा उन १ प्रतिशत पर आकर बाँध बनाने लगती है, जिन्हें न नौकरी की चाह होती है, न किसी विषय विशेष में अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्ध करने की चाह। जो यहाँ आते हैं, अद्भुत बौद्धिक स्थिति में, अल्पप्रयास में ही विषय की बाधायें पार कर लेते हैं, जो अच्छा लगता है वही पढ़ते हैं और संस्थान को छोड़ देते हैं। वे यहाँ आर्थिक और बौद्धिक यात्रा में सहायता लेने नहीं आते, वे आते हैं बस अपना आत्मविश्वास व्यक्त करने, अपने आप में। सर्वश्रेष्ठ संस्थान, सर्वश्रेष्ठ शिक्षा, सबका थोड़ा सा अंश लेकर कुछ अपने ही स्वप्न साकार करने चल देते हैं, चार सालों बाद। उसे मानसिक उन्मुक्तता बोलें या आध्यात्मिक आवारगी, अजब श्रेणी में आते हैं ये लोग, बहुत कम ही पैसे या अपने विषय में स्थिर रहते हैं। इस श्रेणी की असीम संभावनाओं की चर्चा आगे करेंगे, क्योंकि ये ही बदलाव के सूत्रधार बनने की क्षमता रखते हैं।

जैसे जैसे जीविका के साधनों की कमी हुयी है, नौकरी की निश्चितता प्रदान करने वाले संस्थान की माँग इतनी बढ़ चुकी है कि प्रतियोगी छात्र येन केन प्रकारेण इसमें आना चाहते हैं। कई वर्ष पहले से तैयारी, यान्त्रिक तैयारी, प्रश्नों और उनके उत्तरों के अस्त्र शस्त्रों से सज्जित, युद्ध सा व्यवहार। एक बार अन्दर आने के बाद वही प्रतियोगी मानसिकता, वहाँ भी आने निकलने की होड़, चार साल इसी उठापटक में निकल जाते हैं। आईआईटी एक फैक्टरी बन कर रह जाता है, कमाऊ पूत वहाँ की गयी प्रतियोगिता को अपना वैशिष्ट्य समझते हैं, जगत रण में जूझने को तैयार। हतभागा आईआईटी अपना माथा पीटकर रह जाता है, एक प्रश्न हर वर्ष पूछता है, क्या यही उसकी संभावनायें थीं। निश्चय ही ये उसके ७५ प्रतिशत उत्पाद अवश्य हैं, पर ये उसके श्रेष्ठ उत्पाद तो कदापि नहीं हैं।

अंकों की प्रतियोगिता एक आवश्यकता है यहाँ, पर वही सब कुछ नहीं। निश्चय ही अच्छे ग्रेड की चाह सबको रहती है, पर उसी में सर्वस्व समय न्योछावर कर दिया तो रीते हाथ ही बाहर आयेंगे। सीखने के लिये कितना कुछ है, आँखों से रथ में हाँके घोड़े के पट्टे हटाकर देखें तो। वहाँ के पुस्तकालय में विज्ञान विषय के अतिरिक्त कितना ज्ञान छिपा है। वहाँ के गहन बौद्धिक परिवेश में ज्ञान की कितनी और शाखायें अपना स्वरूप ले रही हैं। खेल, रुचियाँ, चर्चायें, संस्कृति और न जाने कितने अध्याय लिखे जाते हैं वहाँ, हम तनिक प्रतियोगिता से बाहर आकर उन पर दृष्टि तो डालें। जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान इस संस्थान का मानता हूँ, वह है देश के श्रेष्ठ मस्तिष्कों को एक साथ आने का सुयोग और मुझे उनके बीच रहने का मिला सौभाग्य। यहाँ आकर पहली बार आश्चर्य होना प्रारम्भ हुआ कि जिन समस्याओं का समाधान हम एकमार्गी माने बैठे रहते हैं, उनके मार्ग हर चर्चा के साथ चौराहे में बदलते जाते हैं। विज्ञान और तकनीक में उलझ जाने से हम उन मस्तिष्कों और उनकी क्षमताओं को भूल बैठते हैं जिनसे हमारी वर्तमान समस्याओं के सभी हल मिलना नियत हैं।

व्यक्तित्व विकास की असीम संभावना से भरे इस संस्थान में दबावमुक्त वातावरण की वकालत नहीं कर रहा हूँ मैं, दबाव आवश्यक है अपने आलस्य को तज कुछ नया ढूढ़ने के लिये, दबाव आवश्यक है अपनी क्षमताओं को उभारने के लिये, दबाव आवश्यक है सतत सोचने के लिये और नये मार्ग निकालने के लिये और दबाव निश्चय ही आवश्यक है हमें उस कठोर सत्य के प्रति तैयार करने के लिये जिसका सामना यहाँ से तुरन्त बाहर निकलने के बाद होने वाला है। असंभव जैसे शब्द पर विजय पाने के लिये हमें उन छोटे छोटे कठिन कार्यों को सिद्ध करना होता है, जिससे एक बड़े असंभव का निर्माण होता है। वहीं पर यह आत्मविश्वास हमें मिला, जिसने किसी भी कार्य के लिये हमें न कहना सिखाया ही नहीं।

वेतन के आगे लगे शून्य गिने जायें और उसके आधार पर संस्थान की श्रेष्ठता निर्धारित की जाये तो, यहाँ से निकलने वाले स्नातकों के वेतन में शून्य की संख्या निसंदेह सर्वाधिक होगी। पर क्या वही सब कुछ है? वेतन को एकमात्र मानक और कर्मफल मान बैठे स्नातकों की संख्या क्या कभी ७५ प्रतिशत से घटकर २५ प्रतिशत तक आ पायेगी? आईआईटी को यदि अपनी पूरी क्षमता में जीना है, विश्वस्तरीय मानक तय करने हैं, तक्षशिला और नालन्दा से अपना स्तरीय साम्य स्थापित करना है तो यह प्रतिशत हर वर्ष गिरना होगा, वह भी ५ प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से। अगले १० वर्षों में जब यह २५ प्रतिशत तक ही रह जायेगा तब कहीं जाकर आईआईटी अपनी ७५ प्रतिशत सार्थकता सिद्ध कर पायेगा। वेतन के आगे शून्य तब भी रहेंगे, उतने ही रहेंगे, तब भविष्य तनिक अलग होगा, तब भविष्य केवल कल्पना में नहीं जियेगा, साक्षात अनुभव किया जा सकेगा।

श्रेष्ठ संस्थानों से श्रेष्ठ की अपेक्षा यदि देश नहीं करेगा तो अपनी मुक्ति का मार्ग ढूढ़ने किसके द्वारे जाकर भिक्षापात्र फैलायेगा? श्रेष्ठ मस्तिष्क यदि अतिशय आत्मसंशय में पड़े रहे, भविष्य की पीढ़ियों के लिये धन जुटाते रहे तो वर्तमान पीढ़ियों को लुप्त होने की कगार से कौन बचायेगा? अपेक्षायें अधिक नहीं हैं पर स्पष्ट हैं। मस्तिष्कों का श्रेष्ठ समूह केवल धन कमाने की मशीन बनकर नहीं रह सकता, उसे ऊँचे ध्येय रचने और साधने होंगे। समाज के प्रति योगदान की दृष्टि किसी व्यक्तिगत त्याग के पथ से होकर नहीं जाती है, बस तनिक ऊँचा सोचने की आवश्यकता है, और अधिक भयरहित होने की आवश्यकता है। व्यक्तिगत धन कमाने से अधिक हमारा ध्यान उन तन्त्रों और व्यवस्थाओं को स्थापित करने में हो जो न केवल हजारों को जीविका दे सकें, वरन दस गुना धन कमा कर सम्मिलित सुख स्थापित कर सके। इस प्रयास में व्यक्तिगत रूप से भी हम वर्तमान से कहीं अधिक धन कमा पायेंगें, पर स्वयं को पुरुषार्थ के पथ पर स्थापित करने के बाद। मेरे कई मित्र हैं जो इसका महत्व समझते हैं और जिनके अन्दर यह क्षमता भी है, कई इस कार्य में लग चुके हैं और कई अपना मन बना रहे हैं।

बौद्धिक नेतृत्व के साथ आध्यात्मिक संतुष्टि का भावना दौड़ी चली आती है। समाज से एक बार जुड़ कर देखने की परिणिति उसके प्रति सतत कुछ करते रहने में होती है। एक बार लत लगने की देर है, तब जो आनन्द सम्मिलित विकास में आता है, सम्मिलित सुख में आता है, उसके समक्ष शेष व्यक्तिगत सुख बौना पड़ने लगता है।

आईआईटी में प्रवेश आपको एक राजमार्ग की संभावना देता है, यदि आप स्वार्थ की पगडंडी में त्यक्त से चले जायेंगे और अपनी जीविका में संतुष्ट हो जायेंगे तो संभवतः न आपको अपनी क्षमता पर तनिक विश्वास है और न ही संस्थान के वातावरण पर। जहाँ पर देश के श्रेष्ठ मस्तिष्क साथ बैठकर चार वर्ष निकाल देते हैं, वहाँ यदि एक वर्ष में चार टाटा-बिड़ला, चार नोबल विजेता, चार राजनेता और चार समाज सुधारक न निकलें तो श्रेष्ठ समूह का क्या प्रायोजन? जो समाज, देश, विज्ञान, राजनीति, अर्थव्यवस्था को दिशा दिखाने के लिये बने हैं, उन्हें चार वर्ष प्रतियोगिता के परिवेश में हाँक दिया जाये और जिनमें सागर लाँघ जाने की क्षमता है, वे भी हनुमान की तरह अपनी क्षमताओं को भुला बैठें, तो किसके सहारे देश अपने उत्कर्ष की आस लगायेगा? जामवन्त भला कब तक याद दिलाते रहेंगे, संस्थानों को अपनी श्रेष्ठता और सामाजिक अपेक्षायें की स्मृति कब आयेगी? कब मेरा आईआईटी एक आनन्द यात्रा में चल पड़ेगा?


(आईआईटी कानपुर में विनीत सिंह के साथ एक कमरे में तीन वर्ष बिताये हैं, आईआईटी के बारे में उनके ये विचार मेरे चिन्तन पथ पर बेधड़क अपनी छाप छोड़ गये, बस अनुवाद और कुछ शब्द मेरे हैं। विनीत अभी टाटा स्टील में महत्वपूर्ण पद पर हैं।)

19.2.11

फिर भी जीवन में कुछ तो है

जीवन को पूरा समझ पाना, एक सतत प्रयत्न है, एक अन्तहीन निष्कर्ष भी। पक्ष खुलते हैं, प्रश्न उठते हैं, समस्या आती है, समाधान मिलते हैं। प्रकृति एक कुशल प्रशिक्षक बन आपको एक नये खिलाड़ी की तरह सिखाती रखती है, व्यस्त भी रखती है, जिससे आने वाले खेलों में आप अच्छा प्रदर्शन कर सकें। कोई शब्द नहीं, कोई संप्रेषण नहीं, कोई योजना नहीं, कोई नियम नहीं, बस चाल चल दी जाती है, पाँसे फेक दिये जाते हैं, अब आप निर्धारित कर लें कि आपको क्या करना है? रहस्य है, दर्शन से समझा जा सकता है, पर इमामबाड़े के रास्तों से भी अधिक कठिन हो जाता है बाहर आना। जो घटनायें बाद में बड़ी सरल सी दिखती हैं और उन पर लिये निर्णयों पर टीका टिप्पणी कर हम स्वयं को वेत्ता समझने लगते है, वस्तुतः वे घटनायें अपने वर्तमान में विशेष जटिलतायें लिये हुये होती हैं। अनुभव की शिक्षा जहाँ एक ओर ज्ञान का अग्रिम आनन्द देती है, वहीं भविष्य में कुछ कर सकने का आत्मविश्वास भी बढ़ा देती है।

जो अनुभव का एक क्षण दे जाता है, उसे पाने में दर्शनशास्त्र को सदियाँ लग जाती हैं। जो आनन्द अनुभव से समझने का है, वह संभवतः दर्शन में मिल ही न पाये। ज्ञानार्जन में औपचारिक शिक्षा तो मात्र 15 प्रतिशत योगदान ही देती है, शेष सब समाज से पाते हैं हम, अनुभव के मार्ग से। तब तो अनुभव से पूर्ण जीवन और भी महत्वपूर्ण हो चला।

कहते हैं कि यदि ईश्वर को हँसाना हो तो उसे अपने भविष्य की योजनायें बता दीजिये। कभी कभी हम अपना भविष्य निश्चित कर लेते हैं, मन ही मन, और प्रतीक्षा करते हैं कि जीवन उसी राह चलेगा। बहुधा नहीं चलता है, क्या करें सबकी इच्छायें पूरी होना संभव ही नहीं है। मन यह मान बैठता है कि अन्याय हो रहा है हमारे साथ, मन विक्षुब्ध हो जाता है, विषाद बढ़ जाता है, सारा दोष ईश्वर को दे बैठते हैं हम।

वह छोटी सी घटना जिसके लिये हम ईश्वर को अन्यायी की संज्ञा दे देते हैं, पूरे जीवन में कितना मूल्य रखती है? यह समझने के लिये बस 10 वर्ष पूर्व की कोई भी ऐसी ही घटना उठा लीजिये। सर्वप्रथम तो उसका कोई मूल्य नहीं लगेगा आपको, संभव है कि आपको स्वयं पर हँसी आये, संभव है कि उसमें आप ईश्वर की दैवीय योजना देखें जो आपको लाभ पहुँचाने के लिये बनायी गयी थी, संभव है आप ईश्वर को धन्यवाद दें उसके लिये। ऐसी ही घटनाओं के बिन्दु मिलाते चलें आपको कोई सार्थक आकृति उभरती दिख जायेगी।

मैं न सुधरने वाला आशावादी हूँ, आस लगाये बैठा रहता हूँ और बहुतों को सुधरते देखा भी है। भाग्यवादी नहीं हूँ पर इतना भी हठ नहीं है कि दुनिया का संचालन मेरे अनुसार हो। जीवन स्वयं में प्रकाशवान है, राह दिखाता रहता है, भविष्य के महल बना ऊर्जा क्यों व्यर्थ करना? वर्तमान पूरी शक्ति से निभाना है, यह मानकर कि भगवान की सहायता बस पहुँचती ही होगी। एक कृपण की तरह ऊर्जा बचा बचा कर किये गये अर्धप्रयास तो कहीं भी नहीं ले जायेंगे, गिन गिन कर पग बढ़ाने से गिनती ही याद रह पायेगी, जीवन खो जायेगा।

कुछ वर्ष पहले ये पंक्तियाँ लिखकर भेजी थी, अपने अनुज अरविन्द को, उसकी पहली असफलता पर। संग्राम उसने हृदयगत किया, जूझा और उत्तर प्रदेश में आठवाँ स्थान ले आया,  प्रादेशिक सिविल सेवा में। आज भाव हिलोरें ले रहे हैं, नयन सुखार्द्र हैं, कल उसका विवाह है।   

फिर भी जीवन में कुछ तो है, हम थकने से रह जाते हैं,
भावनायें बहती, हृद धड़के, स्वप्न दिशा दे जाते हैं,
नहीं विजय यदि प्राप्त, हृदय में नीरवता सी छाये क्यों,
संग्रामों में हारे क्षण भी, हौले से थपकाते हैं।