जीवन को पूरा समझ पाना, एक सतत प्रयत्न है, एक अन्तहीन निष्कर्ष भी। पक्ष खुलते हैं, प्रश्न उठते हैं, समस्या आती है, समाधान मिलते हैं। प्रकृति एक कुशल प्रशिक्षक बन आपको एक नये खिलाड़ी की तरह सिखाती रखती है, व्यस्त भी रखती है, जिससे आने वाले खेलों में आप अच्छा प्रदर्शन कर सकें। कोई शब्द नहीं, कोई संप्रेषण नहीं, कोई योजना नहीं, कोई नियम नहीं, बस चाल चल दी जाती है, पाँसे फेक दिये जाते हैं, अब आप निर्धारित कर लें कि आपको क्या करना है? रहस्य है, दर्शन से समझा जा सकता है, पर इमामबाड़े के रास्तों से भी अधिक कठिन हो जाता है बाहर आना। जो घटनायें बाद में बड़ी सरल सी दिखती हैं और उन पर लिये निर्णयों पर टीका टिप्पणी कर हम स्वयं को वेत्ता समझने लगते है, वस्तुतः वे घटनायें अपने वर्तमान में विशेष जटिलतायें लिये हुये होती हैं। अनुभव की शिक्षा जहाँ एक ओर ज्ञान का अग्रिम आनन्द देती है, वहीं भविष्य में कुछ कर सकने का आत्मविश्वास भी बढ़ा देती है।
जो अनुभव का एक क्षण दे जाता है, उसे पाने में दर्शनशास्त्र को सदियाँ लग जाती हैं। जो आनन्द अनुभव से समझने का है, वह संभवतः दर्शन में मिल ही न पाये। ज्ञानार्जन में औपचारिक शिक्षा तो मात्र 15 प्रतिशत योगदान ही देती है, शेष सब समाज से पाते हैं हम, अनुभव के मार्ग से। तब तो अनुभव से पूर्ण जीवन और भी महत्वपूर्ण हो चला।
कहते हैं कि यदि ईश्वर को हँसाना हो तो उसे अपने भविष्य की योजनायें बता दीजिये। कभी कभी हम अपना भविष्य निश्चित कर लेते हैं, मन ही मन, और प्रतीक्षा करते हैं कि जीवन उसी राह चलेगा। बहुधा नहीं चलता है, क्या करें सबकी इच्छायें पूरी होना संभव ही नहीं है। मन यह मान बैठता है कि अन्याय हो रहा है हमारे साथ, मन विक्षुब्ध हो जाता है, विषाद बढ़ जाता है, सारा दोष ईश्वर को दे बैठते हैं हम।
वह छोटी सी घटना जिसके लिये हम ईश्वर को अन्यायी की संज्ञा दे देते हैं, पूरे जीवन में कितना मूल्य रखती है? यह समझने के लिये बस 10 वर्ष पूर्व की कोई भी ऐसी ही घटना उठा लीजिये। सर्वप्रथम तो उसका कोई मूल्य नहीं लगेगा आपको, संभव है कि आपको स्वयं पर हँसी आये, संभव है कि उसमें आप ईश्वर की दैवीय योजना देखें जो आपको लाभ पहुँचाने के लिये बनायी गयी थी, संभव है आप ईश्वर को धन्यवाद दें उसके लिये। ऐसी ही घटनाओं के बिन्दु मिलाते चलें आपको कोई सार्थक आकृति उभरती दिख जायेगी।
कुछ वर्ष पहले ये पंक्तियाँ लिखकर भेजी थी, अपने अनुज अरविन्द को, उसकी पहली असफलता पर। संग्राम उसने हृदयगत किया, जूझा और उत्तर प्रदेश में आठवाँ स्थान ले आया, प्रादेशिक सिविल सेवा में। आज भाव हिलोरें ले रहे हैं, नयन सुखार्द्र हैं, कल उसका विवाह है।
फिर भी जीवन में कुछ तो है, हम थकने से रह जाते हैं,
भावनायें बहती, हृद धड़के, स्वप्न दिशा दे जाते हैं,
नहीं विजय यदि प्राप्त, हृदय में नीरवता सी छाये क्यों,
संग्रामों में हारे क्षण भी, हौले से थपकाते हैं।