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19.6.21

चला भगवन पंथ तेरे

 

आज प्रभु जब निकट कुछ तेरे बढ़ा मैं,

मोह बन्धन जगत के दृढ़ खींचते हैं ।

पूछता मन प्रश्न बारम्बार निर्मम,

क्या कहूँ, जब नहीं उत्तर सूझते हैं ।।१।।

 

नहीं चाहूँ, जटिल मति के, कुटिल जग के,

तर्क अगणित बन विषों के बाण आते ।

कभी मैं बचता तुम्हारी प्रेरणा से,

किन्तु बहुधा वेदना बन समा जाते ।।२।।

 

किन्तु सुख अनुभव किया जो,

चरण में भगवन तुम्हारे ।

शब्द की अभिव्यक्ति के बिन,

छिपा रहता हृद हमारे ।।३।।

 

दर्श अदर्शन, लुप्त प्राय मति,

प्रेम-पुन्ज नवपंथ दिखा दो ।

स्थित हो जब सबमें प्रियतम,

द्वेषी जग से हृदय बचा लो ।।४।।

 

कुशल भगवन, सर्वहित प्रेरक बने हो,

तम हृदय में, प्रेम के दीपक जला दो ।

तव प्रतिष्ठा अनवरत होवे प्रचारित,

भावरस में ज्ञानपूरित स्वर मिला दो ।।५।।

22.10.14

मेरा भगवन

वह सुन्दर से भी सुन्दरतम,
वह ज्ञान सिन्धु का गर्भ-गहन,
वह विस्तृत जग का द्रव्य-सदन,
वह यशो-ज्योति का उद्दीपन,

वह वन्दनीय, वह आराधन,
वह साध्य और वह संसाधन,
वह रत, नभ नत सा अभिवादन,
वह मुक्त, शेष का मर्यादन,

वह महातेज, वह कृपाहस्त,
वह ज्योति जगत, अनवरत स्वस्थ,
वह शान्त प्रान्त, वह सतत व्यस्त,
वह सुखद स्रोत, दुख सहज अस्त,

वह अनुशासन से पूर्ण मुक्ति,
वह द्वन्द्व परे, परिशुद्ध युक्ति,
वह मन तरंग, एकाग्र शक्ति, 
वह प्रथम चरण, संपन्न भक्ति,

वह आदि, अन्त का वर्तमान,
सब कण राजे, फिर भी प्रधान,
वह प्रश्न, स्वयं ही समाधान,
वह आकर्षण शासित विधान,

वह प्रथम शब्द, वह प्रथम अज्ञ,
वह प्रथम नाद, वह प्रथम यज्ञ,


गुंजायमान प्रतिक्षण वन्दन,
है आनन्दित मेरा भगवन।