आज प्रभु जब निकट कुछ तेरे बढ़ा मैं,
मोह बन्धन जगत के दृढ़ खींचते हैं ।
पूछता मन प्रश्न बारम्बार निर्मम,
क्या कहूँ, जब नहीं उत्तर सूझते हैं ।।१।।
नहीं चाहूँ, जटिल मति के, कुटिल जग के,
तर्क अगणित बन विषों के बाण आते ।
कभी मैं बचता तुम्हारी प्रेरणा से,
किन्तु बहुधा वेदना बन समा जाते ।।२।।
किन्तु सुख अनुभव किया जो,
चरण में भगवन तुम्हारे ।
शब्द की अभिव्यक्ति के बिन,
छिपा रहता हृद हमारे ।।३।।
दर्श अदर्शन, लुप्त प्राय मति,
प्रेम-पुन्ज नवपंथ दिखा दो ।
स्थित हो जब सबमें प्रियतम,
द्वेषी जग से हृदय बचा लो ।।४।।
कुशल भगवन, सर्वहित प्रेरक बने हो,
तम हृदय में, प्रेम के दीपक जला दो ।
तव प्रतिष्ठा अनवरत होवे प्रचारित,
भावरस में ज्ञानपूरित स्वर मिला दो ।।५।।