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31.7.16

चीन यात्रा - १

ब्लॉगजगत से पिछले ४ सप्ताहों से अनुपस्थित था। रेलवे द्वारा एक सेमिनार के लिये चीन भेजा गया था। गूगल, फेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर आदि कितनी ही साइटें जिन पर हम यहाँ व्यस्त रहते हैं, वहाँ पर ध्वस्त थीं। मन में व्यक्त करने को बहुत कुछ था पर चाह कर भी कुछ लिख न सका। यदि इसके बारे में ज्ञात होता तो सततता बनाये रखने के लिये पहले से कुछ लिखकर डाला सकता था। कुछ लिखा तो न गया पर इस यात्रा में दिखा बहुत कुछ।

चीन का संदर्भ आते ही मन में क्या कौंधता है? दो पुरानी सभ्यतायें, सदियों की संस्कृति का आदान प्रदान, जनप्लावित दो देश, विश्वविकास को खींचते विश्व के दो बाजार, बौद्धिकबल से संतृप्त दो देश, पंचशील, १९६२ का युद्ध, सीमा पर तनाव, अकसाई चिन। समझ में नहीं आ रहा था कि किस पूर्वमनस्थिति से चीन को समझा जाये। विकास की अग्रता में उसकी विस्तार की उग्रता को कैसे समझा जाये? यद्यपि मेरे लिये रेलवे द्वारा प्रदत्त ३-४ विषयों को समझना ही पर्याप्त था, पर उपरोक्त पक्ष मन में भला कहाँ शान्त रह पाते हैं?

३ दिनों का बीजिंग प्रवास और शेष दिन चेन्दू में रहना हुआ। चेन्दू वहाँ का चौथा बड़ा नगर है, बीजिंग, शंघाई और गुआन्झो के बाद। चेन्दू दक्षिण-पश्चिम चीन में है और गुवाहटी से लगभग २ घंटे की हवाई दूरी पर है। इतना निकट होने के बाद भी हम दिल्ली से गुआन्झो होते हुये लगभग १२ घंटों के बाद चेन्दू पहुँचे, यदि काठमान्डू होकर जाते तो ४ घंटे में ही पहुँच जाते। यद्यपि यह यात्रा चीन के द्वारा प्रायोजित थी पर चीन की अन्य बातों की तरह ही हमें यह बात भी समझ नहीं आयी। रेलवे के १९ अधिकारियों के इस दल के रहने की व्यवस्था चेन्दू के परिवहन विश्वविद्यालय में की गयी थी।

वहाँ संवाद की समस्या मुखर थी। वहाँ के निवासियों को अपनी भाषा छोड़कर कोई और भाषा नहीं आती है। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की अंग्रेजी भी टूटी फूटी ही कही जा सकती है। जिन दो प्रोफेसरों की शिक्षा अमेरिका में हुयी थी, सार्थक संवाद बस उन्हीं से हो सका। यहाँ की सारी व्यवस्था, सारी शिक्षा, सारा साहित्य मान्डरिन भाषा में ही है। पारम्परिक मान्डरिन की जटिलता को तनिक संवर्धित कर सरल मान्डरिन को विकसित किया गया और उसी में विज्ञान और तकनीक जैसे कठिन मान लिये विषय पढ़ाये जाते हैं यहाँ। मान्डरिन शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के मन्त्रिन् शब्द से हुआ बताते हैं, जिसे मिंग और क्विंग राजाओं के राजदरबारों में मंत्रणा के लिये उपयोग में लाया जाता था।

मान्डरिन की संरचना को समझना थोड़ा कठिन है। यह अक्षर और शब्दों में पिरोयी भाषा नहीं है, इसमें हर वस्तु और क्रिया के लिये एक विशेष वर्ण हैं। इस भाषा में लगभग ७००० वर्ण थे पर सरलीकरण की प्रक्रिया में यह संख्या घटकर ३५०० रह गयी है। उनमें से यदि आप २६०० वर्णों को पहचान लेते हैं तो आप लगभग ९८ प्रतिशत लेखन पढ़ सकेंगे। जब आड़ी तिरछी रेखाओं से आपको ३५०० आकृतियाँ बनाने या समझने को कहा जाये तो निश्चय मानिये कि जटिलता आपके मस्तिष्क में स्थायी रूप से निवास करने लगेगी। ऐसी कठिन भाषा सीखना अपने आप में एक दुरूह कार्य है। तत्पश्चात उस भाषा में विज्ञान और दर्शन के जटिल सिद्धान्त पिरोना असंभव को संभव बनाने सा कार्य है।

इतनी कठिन भाषा सीखने के प्रयास में ही मस्तिष्क जितना विकसित हो जाता होगा, विषय की कठिनता तो उसके सामने नगण्य ही होगी। यही कारण है कि यहाँ के छात्रों की बौद्धिक क्षमता अच्छी है। पिछले एक वर्ष से संस्कृत व्याकरण का स्वरूप समझने का प्रयास कर रहा हूँ। मुझे ये दोनों भाषायें मानवीय अभिव्यक्ति के दो दूरस्थ सिरों पर स्थित दिखायीं देती हैं। एक असीमित से प्रारम्भ होती है तो दूसरी असीमित तक जाने की क्षमता रखती है। एक की उत्पत्ति के आधार इतने सरलीकृत हैं कि जिसमें हर दिखने वाली वस्तु को एक आकार दिया जाता रहा। देखा जाये तो एक भी ऐसा वर्ण नहीं जिसका कुछ भी अर्थ न हो, कुछ भी व्यर्थ नहीं। वहीं दूसरे की उत्पत्ति का व्याकरणीय वैशिष्ट्य इतना रोचक है जिसमें अभिव्यक्ति के आधार इतने वैज्ञानिक और सुकृत बनाये गये जो अनन्त को समझ पाने में सक्षम रहे।


यात्रा में जब भी कुछ समय मिला, वहाँ के समाज को वहाँ की भाषा के माध्यम से समझने का प्रयास किया। भाषा का जटिल स्वरूप पर सरल जीवनशैली। भाषा सीखने के प्रयास में जटिल हुआ मस्तिष्क इतने सरलीकृत चिन्तन में कैसे पहुँचा? उत्तर देर से मिले पर रोचक मिले। अगले ब्लॉग में उन्हीं तथ्यों को समझने का प्रयास करेंगे। 

21.6.15

आँखों की भाषा

कितने स्वप्न सँजों रखे हैं,
कब से सोयी है अभिलाषा,
चुपके चुपके कह जाती है,
आँखों से आँखों की भाषा । १।

ज्ञात नहीं मैं कहाँ खड़ा हूँ,
आकर्षण का घना कुहासा,
मन्त्रमुग्ध पर खींच रही है,
आँखों से आँखों की भाषा । २।

जाने कब से आस लगाये,
आँखें तकता है मन प्यासा,
फिर भी प्यास बढ़ा जाती है,
आँखों से आँखों की भाषा । ३।

तुम पर निर्भर स्वप्न सलोने,
तुम पर निर्भर सारी आशा,
कब देगी पहला आमन्त्रण,
आँखों से आँखों की भाषा । ४।

2.11.13

भाषायी संबंध

न जाने कितना कुछ कहती यह भाषा
भाषा संबंधी अध्ययन के समय में एक विशेष प्रश्न आया था, कि किस प्रकार भाषा संस्कृतियों के पक्षों को अपने में समा कर रखती है और किस प्रकार वह चिन्तन को प्रभावित करती है। छोटा सा एक तुलनात्मक उदाहरण लें, वैज्ञानिक भाषा का और आदिवासी क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं का। वैज्ञानिक भाषा में प्रयुक्त शब्द जैसे एन्ट्रॉपी अपने आप में न जाने कितने सिद्धान्त समाहित किये बैठा है। जब भी वह बोला जायेगा, ऊष्मागतिकी के द्वितीय सिद्धांत तक प्रयुक्त सारा ज्ञान उस शब्द में व्याख्या सहित समाया मिलेगा। इसी प्रकार आदिवासीय क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा में प्रकृति की उपासना की प्रमुखता होगी, उन्नत शब्द प्रकृति की किसी शक्ति का वर्णन करते हुये ही दिखेंगे। ज्ञान के विकास में शब्द सामर्थ्यशाली होते चले जाते हैं और आने वाली पीढ़ियों की चिन्तन प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाते रहते हैं।

गहरे सिद्धान्तों को वहन कर सकने के लिये भाषा का स्वरूप और बनावट भी गहरी होनी चाहिये। रोमन अंक किसी भी स्थिति में गणित के अग्रतम सिद्धान्तों को व्यक्त नहीं कर पायेंगे। कल्पना कीजिये कि यदि रोमन अंकों में आपको गुणा करने का भी कार्य दिया जाता तो गणित के प्रति आपका क्या रुझान होता? इसी प्रकार देखिये तो कम्प्यूटर को अंग्रेजी सीधे समझ नहीं आती, अतः उससे कार्य निकालने के लिये जावा या सी प्लस आदि कम्प्यूटर भाषाओं का उपयोग किया जा रहा है। एस क्यू एल(Structured Query Language, SQL) के नाम से नयी कम्प्यूटर भाषा विकसित हो रही है, जिसमें एक व्यवस्थित क्रम हो और कम्प्यूटर को उस भाषा को समझने में कोई भी भ्रम न रहे, हर बार शब्द और निर्देश वही अर्थ बता सकें।

जहाँ तक देखा गया है, कोई एक संस्कृति या तन्त्र एक दिशा में बहुत आगे तक चली जाती है और उस संस्कृति को व्यक्त करने वाली भाषा संस्कृति के सशक्त पक्षों को अपने में समेट लेती है। कल्पना कीजिये कि भाषा की विकास प्रक्रिया तब कैसी होती होगी, जब किसी संस्कृति में दो पक्ष सशक्त होते होंगे। भाषा का आकार और शब्दकोश तब कैसे विकसित होता होगा? क्या होता होगा, जब संस्कृति का भौतिक पक्ष, मानसिक पक्ष, बौद्धिक पक्ष या आध्यात्मिक पक्ष संतुलित रहता होगा, भाषा तब कैसे अपना मार्ग ढूंढ़ती होगी, कैसे अपना समन्वय बिठाती होगी?

भाषा के शब्दों में कितना अर्थ छिपा है और वे एक वाक्य के रूप में कितना भ्रमरहित संप्रेषण करते हैं, यह किसी भी भाषा के सामर्थ्य को दिखाते हैं। यहाँ पर एक बात समझनी आवश्यक हो जाती है जो भाषा के अनुवादकों के कठिन श्रम को समझने में सहायक है। किसी एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद की प्रक्रिया केवल दोनों भाषाओं के शब्दकोश से होकर नहीं जाती है, वरन अनुवाद से न्याय करने के लिये शब्दों द्वारा व्यक्त संास्कृतिक अनुगूँज और उस भाषा में छिपे व्याकरणीय भ्रमतन्तु समझने आवश्यक हैं। सफल अनुवाद इन दोनों को पूरी तरह से समझे बिना संभव ही नहीं है। अनुवादकों का कार्य सृजनशीलता में लेखकों से भले ही कम हो, पर संप्रेषण में लगे श्रम और समझ की दृष्टि से बहुत अधिक है, दो भाषाओं की संस्कृति और भाषायी शैली समझने की दृष्टि से बहुत अधिक है।

अनुवादकों का कार्य तब कठिन हो जाता है जब संस्कृतियाँ सर्वथा भिन्न हो। गणित और विज्ञान ने पूरे विश्व में अपनी भाषा एक सी बना ली है अतः एक देश में हुये विकास को दूसरे देश में सरलता से पढ़ा जा सकता है, बिना अनुवादकों की सहायता के। वहीं दूसरी ओर एक संस्कृति में ही पोषित दो पड़ोसी भाषाओं के बीच भी अनुवाद बड़ी समस्या नहीं है। कई शब्दों की समानता और व्याकरण की समरूपता इस कार्य को उतना कठिन नहीं रहने देती है। भिन्न संस्कृतियों की भाषा के बीच सेतु का कार्य करने के लिये मन में SQL जैसी ही किसी भाषा का निर्माण करना पड़ता है, या कहें सेतुबन्ध बनाने के लिये अनुवादक को अलिखित तीसरी भाषा गढ़नी पड़ती है।

जब दो भाषायें संपर्क में आती हैं, उन दोनों के बीच शब्दों और सिद्धान्तों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान की प्रक्रिया चलती है। जानकर कोई आश्चर्य नहीं होगा कि जहाँ वैज्ञानिक शब्दकोश अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में आया है, भारतीय भाषाओं के आध्यात्मिक शब्दकोश से अंग्रेजी सम्पन्न हुयी है। कारण स्पष्ट है जब सारी वैज्ञानिक प्रगति अंग्रेजी में हो रही थी, भारतीय भाषाओं के अधिनायक अपनी स्वतन्त्रता के संघर्ष में डूबे थे। इसी प्रकार जब भारत में मनीषी अध्यात्म के उन्नत ग्रन्थ लिख रहे थे, यूरोप व अरब के देश अपने अंधे युग में थे।

हमको अपने सूत्र साधने
भारतीय भाषाओं में उपस्थित समानता और व्याकरण भारतीय भाषाओं के एक स्रोत की ओर इंगित करता है। यदि संस्कृत को केन्द्र में रखकर देखें तो तमिल को छोड़कर शेष सभी भारतीय भाषाओं की समरूपता का प्रतिशत ६५ से ऊपर है, कुछ में यह प्रतिशत ८५ तक भी पहुँच जाता है। व्याकरण और वर्णमाला के अतिरिक्त संस्कृति की समानता इसका प्रमुख कारण है। तमिल के साथ जहाँ सांस्कृतिक समैक्य है, व्याकरण और वर्णमाला थोड़ी भिन्न होने पर भी समानता का प्रतिशत ४५ के आसपास आता है। भाषाओं में बटे भारत में इस प्रकार की समानता ढूँढ निकालने का कार्य गम्भीरता से नहीं लिया गया है, एक भाषा को थोपे जाने के भावनात्मक भय ने एकता पाने की संभावनाओं पर भी कुठाराघात किया है। ६५ प्रतिशत की शाब्दिक समानता क्या पर्याप्त नहीं थी, हम लोगों को एक दूसरे के हृदय में पहुँच पाने के लिये?

देश के भाषायी प्रश्न को भावनात्मकता से विलग कर तथ्यात्मक आधार पर देखा जाये तो भाषायें न केवल एक दूसरे पर अपना प्रभाव डालती रहती हैं, वरन औरों के प्रभाव से स्वयं को बचाती रहती हैं। दूसरी भाषा के शब्दों को अपनी भाषा में लेने से भाषा के समृद्धिकरण के लाभ भी हैं और स्वयं के निगले जाने का भय भी। दो भाषाओं के जन के बीच संपर्क किसी एक भाषा में ही होता है। आवश्यकतानुसार लोग एक दूसरे की भाषा बोल भी लेते हैं, पर यह बात मानकर चलिये कि आवश्यकता कितनी भी गहरी हो, अपनी भाषा के मोहतन्तु इतनी सरलता से जाते नहीं हैं। बाह्य परिवेश में विवशतावश कोई भी भाषा बोले, पर घर आकर लोग अपनी मातृभाषा ही बोलते हैं। अपनी भाषा को, अपनी संस्कृति को बचाये रखने का मोह सबको होता है।

कभी सोचा है कि किसी एक बांग्लाभाषी का बंगलोर में क्या भाषायी आधार रहता होगा? मैं बताता हूँ क्योंकि मैं ऐसे कई परिवारों को जानता हूँ। घर में बांग्ला, बाहर कन्नड़, कार्यालय में अंग्रेजी और मेरे साथ हिन्दी। प्रश्न और जटिल कर देते हैं, पति पत्नी दोनों ही अलग भाषा बोलते हैं, बच्चा कौन सी भाषा सीखेगा? अंग्रेजी विश्व से जुड़ने की भाषा है, परिवेश की भाषा कुछ और हो सकती है? ऐसी भाषायी संबंधों में वह क्या ग्रहण करता होगा, किस भाषा में कितनी गहराई तक जा पाता होगा? या भ्रम में कुछ भी नहीं सीख पाता होगा? एक से अधिक भाषा जानने के लिये तब अधिक समस्या नहीं रहती होगी जब दोनों भाषाओं में सांस्कृतिक समानता हो। तब संभव है कि शब्द भी उभयनिष्ठ हों। समस्या तब आती है जब भाषाओं से संबद्ध संस्कृतियाँ भिन्न होती हैं, उनके भौतिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विमायें भिन्न होती हैं। अनुवादक का कार्य भी इसी आधार पर अपनी सरलता या जटिलता ढूँढता होगा।

जिस तरह से विश्व में भौगोलिकता के पार पारस्परिक संपर्कबिन्दु बढ़ रहे हैं, जिस तरह भाषाओं का आवागमन हो रहा है, जिस प्रकार बहुभाषी जन तैयार हो रहे हैं, उससे यह तो निश्चित है कि सभी भाषाओं में सतत परिवर्धन होगा। संस्कृतियों के इस वृहद मेले में भाषायें किस तरह प्रभावित होगीं, उनके आपसी संबंध किस तरह के होंगे, उनके संमिश्रण से शब्दकोश क्या आकार धरेंगे, यह शोध का विषय है। अंग्रेजी संस्कृति हर ओर फैली और निष्कर्ष स्वरूप शब्दकोश का आकार ३ हजार शब्दों से ३ लाख शब्दों तक हो गया है। अन्य भाषायें अंग्रेजी के इस ऐश्वर्य से प्रभावित होंगी कि अपनी राह स्वयं गढ़ेंगी? भारतीय भाषायें किस ओर बढ़ेंगी?

भाषाओं का प्रश्न जितना सरल लोग बनाने का प्रयास करते हैं, उतना सरल वह होता नहीं। मानव संबंधों से भी अधिक दुलार पाती हैं भाषाओं की भावनायें। जो हमको हमारे भाव समझाने का प्रयत्न अपने हर शब्द से करती हैं, हम भी उसके भाव समझ सकें, हम भी नित एक होते विश्व में भाषायी संबंध समझ सकें।

26.10.13

बचपन, भाषा, देश

जीवन के प्रथम दशक में हमारी भाषा, परिवेश का ज्ञान, विचारों की श्रंखलायें आदि अपना आकार ग्रहण करते हैं। यह प्रक्रिया बड़ी ही स्पष्ट है, आकृतियाँ, ध्वनि और संबद्ध वस्तुयें मन में एक के बाद एक सजती जाती हैं। इन वर्षों में हमारी समझ जितनी गहरी होती, ज्ञान का आधार उतना ही सुदृढ़ बनता है। कभी सोचा है कि जब हम बच्चे को एक के स्थान पर दो भाषायें सिखाने लगते हैं, ज्ञान की नींव पर उसका क्या प्रभाव पढ़ता होगा?

किस भाषा को किधर रखूँ मैं
यदि बचपन में हम एक भाषा के स्थान पर दो भाषाओं से लाद देते हैं तो जो ज्ञानार्जन करने में जो समय व मस्तिष्क लगना चाहिये वह अनुवाद करने में निकल जाता है। जब शब्द और उससे संबद्ध अर्थ सीखने का समय होता है तब मस्तिष्क आनुवादिक भ्रम में रहता है कि ज्ञान को किस प्रकार से ग्रहण किया जाये, हिन्दी में या अंग्रेजी में। ज्ञान के प्रवाह में एक स्तर और बढ़ जाने से श्रम बढ़ने लगता है और याद रखने की क्षमता भी आधी रह जाती है। जिस समय एक वस्तु के लिये एक शब्द होना था, एक शब्द सीखने के बाद शब्दों को संकलित कर वाक्य बनाने का समय था, उस समय हम अपना कार्य बढ़ाकर दूसरी भाषा में उसको अनुवाद करवा रहे होते हैं।

पता नहीं इस पर कभी कुछ विचार हुआ है कि नहीं कि नयी भाषा सीखने की सबसे उचित आयु कौन सी है। जब उसकी आवश्यकता पड़ती है तब तो लोग भाषा सीख ही लेते हैं और बहुत ही अच्छी सीखते हैं। यदि विज्ञान आदि पढ़ने के लिये अंग्रेजी सीखनी आवश्यक ही हो चले तो किस अवस्था में अंग्रेजी सीखनी प्रारम्भ करनी चाहिये? विकास की दौड़ में कोई भी पिछड़ना नहीं चाहता है, सबको लगता है अंग्रेजी बचपन से मस्तिष्क मे ठूँस देने से बच्चा सीधे ही अंग्रेजी बोलने लगेगा और कालान्तर में लॉट साहब बन जायेगा। लॉट साहब तो २०-२५ साल में ही बनते हैं, नौकरी भी उसी के बाद ही मिलती है। यह भी एक तथ्य है कि विकसित मस्तिष्क को अंग्रेजी सीखने में ३-४ वर्ष से अधिक समय नहीं लगता है। पर प्रारम्भ के तीन वर्ष जो जगत की समझ विकसित होती है, उसमें दूसरी भाषा ठूँस कर हम क्यों उसके भाषायी मानसिक आकारों को गुड़गोबर करने पर तुले हैं, किस आभासी लाभ के लिये यह व्यग्रता, क्यों यह मूढ़ता?

निम्हान्स के शोधकर्ताओं का भी मत है कि अधिक भाषायें सीखने से मस्तिष्क के सिकुड़ने का भय बना रहता है। हो सकता है कि अधिक भाषायें जान लेने से हम अधिक लोगों को जान पायें, भिन्न संस्कृतियों के विविध पर समझ पायें, पर गहराई में नीचे उतरने के लिये अपनी ही भाषा काम में आती है, शेष भाषा सामाजिकता की सतही आवश्यकतायें पूरी करती हुयी ही दिखती हैं, समझ विस्तारित तो होती है, गहरे उतरने से रह जाती है।

वहीं दूसरी ओर एक भाषा के माध्यम से देश की एकता की परिकल्पना करना भी भारत की विविधता को रास नहीं आया। भाषायी एकीकरण करने के लिये एक भाषा को अन्य पर थोपने के निष्कर्ष बड़े ही दुखमय रहे हैं, सबका अपनी भाषाओं के प्रति लगाव बढ़ा ही है, कम नहीं हुआ। अपितु थोपी जाने वाली भाषा के प्रति दुर्भाव बढ़ा ही है। राज्यों की सीमाओं को भाषायी आधार पर नियत होने में यह भी एक कारण रहा होगा। भाषायें अलगाव का प्रतीक बन गयीं, सबके अपने अस्तित्व का प्रमाण बन गयीं।

होना यह चाहिये था कि भाषाओं के बीच सेतुबन्ध निर्मित होने थे। भारत में एक ऐसा महाविद्यालय होता जहाँ पर सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य को संरक्षित और पल्लवित करने का अवसर मिलता। सभी भाषाओं के भाषाविद बैठकर अपनी भाषा के प्रभावी पक्षों को उजागर करते, साथ ही साथ अन्य भाषाओं के सुन्दर पक्षों को अपनी भाषा में लेकर आते। अनुवाद का कार्य होता वहाँ पर, संस्कृतियों में एकरूपता आती वहाँ पर। वहाँ पर एक भाषा से दूसरी भाषाओं में अनुवाद की सैद्धान्तिक रूपरेखा बनायी जाती, और यही नहीं, भारतीय भाषाओं को विश्व की अन्य भाषाओं से जोड़ने का कार्य होता।

होना यह चाहिये था कि हर भाषा का एक विश्वविद्यालय उस भाषा बोलने वाले राज्य की राजधानी में रहता, उस भाषा को केन्द्र में रखकर अन्य भाषाभाषियों को उस भाषा का कार्यकारी ज्ञान देने की प्रक्रियायें और पाठ्यक्रम निर्धारित किये जाते।

विश्व से जुड़ना भी हो
होना यह चाहिये था कि हर उस नगर में जहाँ पर बाहर के लोग कार्य करने आते हैं, एक भाषा विद्यालय होता जहाँ पर उन्हें वहाँ की स्थानीय भाषा आवश्यकतानुसार सिखायी जाती। जिनको समय हो उन्हें दिन में और जिनको समय न हो, उन्हें सायं या रात को। जब आसाम का कोई व्यक्ति कर्नाटक में आईएएस में चयनित होकर आता है, उसे कन्नड़ का पूरा ज्ञान दिया जाता है। उसे यह ज्ञान बहुत गहरा इसलिये दिया जाता है क्योंकि उसे राज्य के अन्दर तक जाकर स्थानीय लोगों की भाषा का निवारण करना पड़ता है। सबकी आवश्यकता इतनी वृहद नहीं हो सकती और उनका पाठ्यक्रम उसी के अनुसार कम या अधिक किया जा सकता है।

जहाँ हमारे संपर्क बिन्दु दो परस्पर भाषायें होनी थीं, किसी व्यवस्थित भाषायी प्रारूप के आभार में वह सिकुड़ कर अंग्रेजी मान्य होते जा रहे हैं। अब कितने प्रतिशत व्यक्ति जाकर विदेशों में कार्य करेंगे, जो करेंगे तो वे सीख भी लेंगे और वे सीखते भी हैं। अंग्रेजी ही क्यों आवश्यक हुआ तो चाइनीज़ या मंगोलियन भी सीख लेंगे। पर अंग्रेजी पर आवश्यक महत्व बढ़ाकर हम न केवल अपने नौनिहालों के मानसिक विकास में बाधा बने जा रहे हैं वरन अपनी भारतीय भाषाओं को भूलते जा रहे हैं। जहाँ भी किसी से संवाद की आवश्यकता होती है, लपक कर अंग्रेजी की वैशाखियों पर सवार हो लेते हैं।

जहाँ पर हमें भारतीय भाषाओं के मध्य सेतुबन्ध स्थापित करने थे और अपने देश में करने थे, उनका निर्माण करने के स्थान पर हम अपनी राह इंग्लैण्ड और अमेरिका जाकर बनाने लगते हैं। जहाँ बचपन में एक ही भाषा सिखानी चाहिये, दो दो भाषायें सिखाने लगते हैं। देश में एकता के सूत्र स्थापित करने के लिये एक भाषा थोपने की योजना बनाने लगते हैं।

भारतीय भाषायें यहाँ के जनमानस से सतही रूप से नहीं चिपकी हुयी हैं वरन उसकी जड़ें सांस्कृतिक और धार्मिक पक्षों को छूती हैं। उसे भूल जाने को कहना या उसका प्रयत्न भी करना दुखदायी रहा है, ऐसे ही असफल रहेगा और कटुता भी उत्पन्न करेगा। आपस में बात करने के लिये यदि हमें अंग्रेजी जैसी किसी मध्यस्थ भाषा की सहायता लेनी पड़े तब भी यह हमारे लिये लज्जा का विषय है। सब भाषाओं के प्रति पारस्परिक सम्मान का भाव व तदानुसार सेतुबन्ध बनाने के प्रयास ही भारत का भविष्य है। सेतुबन्ध न केवल हम सबको जोड़कर रखेगा वरन एक मार्ग भी बतायेगा जिससे नदी के दोनों ओर रहने वाले जन उसी एक जल से अपनी आर्थिक़, मानसिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समरसता सींच सकें।

10.8.13

मन की भाषायी चेतना

मन की भाषा के प्रश्न का प्रारम्भ तो ज्ञानदत्तजी के सरल से अवलोकन से हुआ था, पर वह छोटी सी प्रतीत होने वाली लहर अपने अन्दर इतनी उत्सुकता लेकर आयेगी, इसका तनिक भी आभास नहीं था। पिछले कुछ दिन बस भाषा पर लिखे गये शोधपत्रों को पढ़ने में बीते हैं। यह प्रश्न अविश्वसनीय ढंग से न जाने कितनी विधाओं में फैला है, मनोविज्ञान, दर्शन, शैक्षणिक क्षेत्र, भाषाविज्ञान, ध्वनिशास्त्र, उपनिषद, अध्यात्म आदि से होता हुआ पुनः मन पर आकर टिक जाता है। लगा था कि पिछली पोस्ट पर आनी वाली टिप्पणियाँ रही सही उलझन सुलझा देंगी, सीधे ही निष्कर्ष पर पहुँचा देंगी, पर जितना अधिक छोर को समेटना चाहा, जितना अधिक चिन्तन का धागा लपेटता गया, उतना अधिक उलझता गया। प्रश्न अधिक हो गये, विमायें अधिक हो गयीं, जिस मन की मौलिक भाषा ढूँढ़ने निकला था, वही मन अत्यधिक रहस्यमयी हो गया।

बड़ा ही रोचक लगता है न, कि चिन्तन अपने बारे में ही चिन्तन कर रहा है, अपनी भाषा के बारे में अपनी भाषा में ही चिन्तन कर रहा है। ठीक उसी तरह कि भोजन स्वयं को खा रहा है, स्वयं का ही पोषण कर रहा है। वैसे भी सारा चिन्तन स्वयं नहीं किया, इस चिन्तन पर ढेरों चिन्तन हो चुका है, आज से नहीं, सृष्टि के आदि बिन्दु से चल रहा है। यदि अस्तित्व के मूल प्रश्न को अब भी उठाना पड़ रहा है, तब तो यह प्रश्न अस्तित्व से भी बड़ा हो गया। जब सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माजी स्वयं को अकेले पा पूरी तरह संभ्रमित हो गये थे, उन्हें कुछ भी नहीं सूझ रहा था, तब उन्होंने ईश्वर को पुकारा और ईश्वर ने उनके अन्तःकरण में सारा ज्ञान प्रस्फुटित किया। ज्ञान के आनन्द से विह्वल ब्रह्मा स्तुति गाने लगे, ब्रह्मसंहिता के रूप में, गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि। कभी सोचा है, वह प्रथम पुकार और वह प्रथम ज्ञान किस भाषा में रहा होगा?

ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न उमड़ पड़ते हैं जब मन को कुरेदा जाता है, स्वयं की पहचान का कोई भी बिन्दु झंकृत किया जाता है, अनुनाद होने लगता है, बहुत देर तक, मानो अन्तःकरण को अपने बारे में कुछ पता होने देना अच्छा ही नहीं लगता है। पर जो भी हो, प्रश्न तो तब तक उठाये जायेंगे जब तक अस्तित्व है, सब जान जाने तक प्रश्न करना ही तो हमारी मूल प्रवृत्ति है, संभव है वेदांत सी जिज्ञासा ही हमारे निर्वाण का मार्ग हो।

मन की अपनी ही भाषा होती है, यह तो निश्चित है, पर उस भाषा का स्वरूप क्या होता है, उसका हमारे अस्तित्व और वाह्य विश्व से क्या संबंध है, इन प्रश्नों के उत्तर अपने आप में गहरे प्रश्न छोड़ जाते हैं। ऐसे प्रश्न, जो लोगों ने अनुभव तो किये हैं पर उसे व्यक्त नहीं कर पाये। व्यक्त कर पायें तो कैसे, क्योंकि व्यक्त करने के लिये जिस भाषा का हम उपयोग करते हैं, वह भाषा यह कार्य करने में सक्षम ही नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार आप रोमन अंकों में दो बड़ी संख्याओं का गुणा करने या पृथ्वी से चाँद की दूरी मापने का प्रयास करें, क्योंकि बिना दशमलव और शून्य के सिद्धान्त के यह संभव ही नहीं। उसे गणित की रोमन भाषा में नहीं वरन दशमलवीय भाषा में ही व्यक्त किया जा सकता है।

मन की भाषा की गहनता को समझने के लिये एक तुलना करना उचित रहेगा। मन की भाषा की, मानव की भाषा की और कम्प्यूटर की भाषा की। संभवतः यह तुलना मन की भाषा के बारे में कुछ कल्पना सूत्र दे जाये।

यदि हमें आपको कोई शब्द कम्प्यूटर के माध्यम से ईमेल करके भेजना है तो कम्प्यूटर उस टाइप शब्द को ० या १ में परिवर्तित कर एक श्रंखला बना लेगा। जो ईमेल होगी वह इन्हीं ० और १ की श्रंखलाओं के पैकेट होंगॆ। वह पैकेट जब दूसरे कम्प्यूटर पर पहुँचेंगे तो वह उन्हें वापस संकलित कर स्क्रीन पर वही शब्द दिखायेगा। कम्प्यूटर को ० और १ के अतिरिक्त कुछ आता ही नहीं है, किसी भी शब्द को वह ० और १ में तोड़ता है और तभी प्रेषित कर पाता है। हमें यह देख कर और समझ कर बहुत अटपटा लग सकता है, पर यही कम्प्यूटर की विधि है, यही उसकी विवशता है। वहीं दूसरी ओर हम वह शब्द मानव की भाषा में एक दूसरे से सहज ही कह देते हैं, न केवल शब्द, वरन सम्बन्धित रंग, रूप, आकार आदि सभी संप्रेषित कर देते हैं, एक ही शब्द में।

इसी प्रकार हमारे मन की भाषा के भाव हैं, उन्हें किसी दूसरे व्यक्ति को समझाने के लिये हमें एक मानवीय भाषा की आवश्यकता होती है। शब्द, वाक्य और व्याकरण उस संप्रेषण की आवश्यक सामग्री हैं, बिना उनके हम संवाद कर ही नहीं सकते। किसी के प्रति संवेदना व्यक्त करने के शाब्दिक प्रयास बड़े भारी भरकम होते हैं और उन प्रयास का भावनात्मक सहजता से अन्तर मानवीय भाषा की सीमित सीमाओं को स्पष्ट रूप से बता देता हैं। यह सब जानते हुये भी हम मानवीय भाषा से बद्ध हैं, ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कम्प्यूटर अपनी भाषा से बद्ध है। किसी की एक मुस्कान पर लोग अध्याय लिख देते हैं, काश वह मुस्कान लिखी व समझायी जा सकती, मन की भाषा में, एक ही शब्द में।

मन में आये एक विचार को व्यक्त करने में कितने शब्द सजाने पड़ते हैं और मन है कि ऐसे सहस्र विचारों की श्रंखलायें लिये बैठा है, एक के बाद एक सहज ही प्रस्तुत। मन का एक झोंका मानवीय भाषा के सैकड़ों अध्यायों से नहीं व्यक्त हो पाता है, कुछ न कुछ छूट ही जाता है, कुछ न कुछ संप्रेषण दोष रह ही जाता है। मात्र कहने में ही नहीं, वरन उसे समझने में भी कितना कुछ छूट जाता है। उसके मन में क्या विचार जगा, उसने उसे कैसे व्यक्त किया, हमने उसे कैसे समझा, यदि तुलना कर सकते तो लगता कि जिस प्रकार कम्प्यूटर महोदय इतने श्रम के बाद केवल शब्द ही संप्रेषित कर पाये थे, रूप, रंग, आकार के बिना, हम भी न जाने भाव की कितनी विमायें छोड़ देते हैं, जब मन की भाषा के भावों को मानव की भाषा में व्यक्त करते हैं। संगीत और चित्रों की भाषा में मन की भाषा के कुछ अंश देखे जा सकते हैं।

यदि मन की भाषा श्रेष्ठ है तो क्या मानव की भाषा से हमारा कोई विकास नहीं होता है? मानव की भाषा के बिना तो समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। सारे ज्ञान को प्रचारित और प्रसारित करने का कार्य तो भाषा ही करती है। नये सिद्धान्त, नयी प्रमेय, नये आविष्कार, नये विचार कैसे समस्त मानवता को प्राप्त हो पायेंगे। पर यह सारा ज्ञान स्रोत मन की भाषा से ही निकला है, मन की भाषा में समझा गया है, मानव की भाषा बस वह सीमित प्रयास कर पाती है, बार बार कई प्रयासों में उसे संप्रेषित करने का।

किसी भी भाषा का ज्ञानकोष, उस भाषा बोलने वाले समाज के लोगों की सम्मिलित मन की भाषा में उत्पन्न ज्ञान का संग्रहण होता है। कोई नयी मानवीय भाषा जानकर हम उन सारे ज्ञानकोष को अपना सकते हैं, अपना ज्ञानकोष समृद्ध कर सकते हैं। भिन्न भाषाओं मे फैली इस निधि को समेटना और सहेजना निश्चय ही मानवता का प्रमुख कार्य है, पर जिस मन की भाषा से यह सकल ज्ञान उत्प्रेरित रहा है, संवर्धित हुआ है, नयी विमाओं को छूकर आया है, उसे जानने और अनुभव करने का प्रयास भी हो, उस भाषा को जानने का प्रयास, जिस भाषा में हम मूलतः चिन्तन करते हैं।

अगली पोस्ट में मन की भाषा में और गहरे उतरेंगे और वह शब्द को किस तरह प्रभावित करती है या प्रभावित होती है, इन तथ्यों को भी समझेंगे। और आप निश्चय मानिये कि जो मन आपको सदा रोचकता बनाये रखने के लिये कचोटता रहता हो, उसके बारे में जानना कितना रोचक होगा?

7.8.13

सोचने वाली भाषा

फेसबुक पर ज्ञानदत्तजी की एक पोस्ट पर ध्यान गया। उनका कहना था कि जब वह भावुक होते हैं तो हिन्दी में सोचते हैं, जब अच्छे निर्णय लेने होते हैं तो चिन्तन अंग्रेजी में हो जाता है।

यह एक ऐसा विषय है जिस पर बहुत शोध, सुशोध, प्रतिशोध और महाशोध हो चुका है। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में तो नहीं पर कहते हैं कि बाइबिल में एक उद्धरण हैं कि सबसे पहले एक ही भाषा थी, उसका आधार पा सब जन संगठित भी थे। अब सब अपनी संगठित शक्ति में मदांध हो स्वर्ग के लिये एक सीढ़ी बनाने लगे। यह देवों को कहाँ स्वीकार था, उन्होंने मानवता को श्राप दे दिया और श्राप स्वरूप इतनी अधिक भाषायें दे दीं कि मानवता कभी संगठित ही न रह पाये। लगता है कि सीढ़ी बनाने वालों में सर्वाधिक उत्साही जन भारत के ही होंगे, तभी भारत को सर्वाधिक भाषाओं का श्राप मिला।

ज्ञानदत्तजी उन वृहदचेतनमना जनों की श्रेणी में आते हैं जिन्हें दो भाषाओं पर पूर्ण नियन्त्रण है, यहाँ तक, कि भाषा चिन्तन प्रक्रिया में धँस चुकी है। वैसे देखा जाये तो देशवासी बहुधा अपनी मातृभाषा ही जान पाते हैं, दूसरी भाषा तो काम चला लेने के भाव से सीखी जाती हैं। थोड़ी बहुत अंग्रेजी सीख जाने पर भौकाल उत्पन्न करने की पूरी संभावना रहती है, विशेषकर उन पर जो उसे अत्यन्त प्रभावकारी भाषा मानते हैं। उस जनमानस के लिये अंग्रेजी मुख या आँख की सीमाओं के अन्दर नहीं जा पाती है। एक सरल प्रयोग किया जा सकता है कि अंग्रेजी जानने का दंभ भरने वालों को एक अंग्रेजी पुस्तक पढ़ने को दी जाये और देखा जाये कि १५ मिनट तक कितने लोग उसका प्रकोप झेल पाते हैं। जो १५ मिनट से अधिक जगे रह पाये तो समझ लीजिये कि उनके अन्दर अंग्रेजी में चिन्तन करने के लक्षण जाग रहे हैं। सारी संभावनायें जोड़ ली जायें तो भी उनकी संख्या १५ प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।

विश्व में अधिकता एक भाषा बोलने वालों की ही है। जहाँ पर वैश्वीकरण के संपर्कक्षेत्र हैं, बस वहीं पर दो या दो से अधिक भाषा बोलने वालों की संख्या पनप रही है। अब भारत में इतनी भाषायें हैं कि एक भाषा समाप्त होते ही दूसरी प्रारम्भ हो जाती है, यहाँ पर दो भाषायें बोलने वालों की संख्या अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक होगी। यदि भारतीय भाषाओं के शब्दकोश पर दृष्टि डाली जाये और संस्कृत शब्दावली से उसका मिलान किया जाये तो दो पड़ोसी भाषाओं में भिन्नता का प्रतिशत १५ प्रतिशत से अधिक नहीं आयेगा।

विश्व में कितने प्रतिशत लोग दो या अधिक भाषा जानते हैं, इस बारे में कोई आधिकारिक आँकड़े नहीं मिले। अनुमान यही है कि २५-३० प्रतिशत ही ऐसे हैं जो दो या अधिक भाषा बोल पाते हैं। अब उनमें से ऐसे कितने हैं जिनका दो भाषाओं पर इतना सम अधिकार हो कि वे चिन्तन पटल पर अधिकार जमा लें, तो प्रतिशत सिकुड़ कर दशमलव के कुछ स्थान अन्दर चला जायेगा। ऐसे जनों को वृहदचेतनमना ही कहा जा सकता है, ऐसे लोग ही उत्कृष्ट अनुवादक हो सकते हैं, ऐसे लोग ही दो संस्कृतियों के बीच सेतुबन्ध हो सकते हैं, ऐसे लोग ही विश्व एकीकरण के प्रबल कारक हो सकते हैं।

दो या अधिक भाषा जानने वालों की यह संख्या देख सर्वाधिक निराश वे होंगे जिन्हें भाषायी विविधता विघटनकारी लगती है। उन्हें लगता है कि एकीकरण का एकमेव मार्ग भाषायी एकरूपता है, सांस्कृतिक एकरूपता है, धार्मिक एकरूपता है। इस एकरूपता के बिना कोई समरसता, सौहार्द या सहजीवन संभव नहीं है। विविधता में भी जीवन पल्लवित होता है, इस पर ध्यान देने की न ही उनकी मानसिकता है, न ही समय है और न ही मंशा है। शोध भी यही बताते हैं कि हमारा मन, हमारे भाव, हमारा चिन्तन किसी भाषा, संस्कृति, धर्म आदि से प्रभावित तो हो सकते हैं पर उनका अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व है। यही कारण है कि सर्वथा भिन्न जन भी एक दूसरे के साथ प्रेमपूर्वक रह लेते हैं, समाज में व्याप्त विघटनकारी विष नित फैलने के बाद भी।

क्या हम किसी भाषा में चिन्तन करते हैं या चिन्तन की कोई अपनी ही भाषा होती है जो ईश्वर ने हमारे अस्तित्व में पूर्वबद्ध कर के भेजी है। पशु तो कभी कोई भाषा सीखते नहीं तो क्या वे सोचते भी नहीं हैं? एक बधिर व्यक्ति तो कभी कोई भाषा सीख ही नहीं पाता है तो क्या वह कभी सोचता ही नहीं? एक बच्चा जो अपनी माँ पर आँखें स्थिर कर उसे पहचान लेता है, क्या वह कुछ सोचता ही नहीं? यही प्रश्न चिन्तन की भाषा सम्बन्धी शोध के आधारभूत प्रश्न बने होंगे।

हम सबके अन्दर चिन्तन की एक भाषा पहले से ही विद्यमान है। भले ही उस भाषा को हम न समझ पायें और न ही उसे व्यक्त कर पायें, पर जब भी हम स्वयं से संवाद करते हैं, हम उसी भाषा का सहारा लेते हैं। विचार एक के बाद एक उसी भाषा में आते हैं। शरीर को संकेत भी उसी भाषा में मिलते हैं। प्यास लगती है, भूख लगती है, पीड़ा होती है, आनन्द होता है, संवेदना जागती है, क्रोध भड़कता है, दया उमड़ती है, सब का सब कार्य हमारी मूल भाषा में ही तो होता है। शिशु, बधिर, पशु आदि सभी तो स्वयं से बात करते ही होंगे, कुछ न कुछ तो संवाद अन्तरमन में चलता ही होगा। जिन्होंने कभी कोई भाषा ही नहीं सीखी, यदि उनकी बात भी छोड़ दें तो सिद्ध संगीतज्ञ, चित्रकार आदि किस भाषा में अपना मन रचते हैं, संभवतः वे विचारों की उस भाषा को समझने का प्रयास करते हों जो हमने कभी सुनी ही नहीं, उस समय के बाद, जब से हमने दूसरी भाषा का सहारा ले लिया।

इसका अर्थ यह हुआ कि जो भाषा हम सर्वप्रथम सीखते हैं, वह हमारी द्वितीय भाषा है, पर उस भाषा से हमारी आन्तरिक भाषा का प्राथमिक सम्बन्ध है। उसके माध्यम से हम जगत के साथ संवाद स्थापित करते हैं। सीखी हुयी भाषा सामाजिकता में सहयोगी भी है, उसके माध्यम से हम एक दूसरे को समझ पाते हैं, स्वयं को व्यक्त कर पाते हैं, सहजीवन का और ज्ञानवर्धन का एक माध्यम स्थापित कर पाते हैं। उसके बाद की जितनी भाषायें सीखी जाती हैं, वे एक दूसरे पर आरोपित होती रहती है। ज्ञान की कुछ छिटकन एक भाषा में, दूसरी छिटकन दूसरी भाषा में, एक सुभाषित एक भाषा में, दूसरा उद्धरण दूसरी भाषा में।

ज्ञान तो मस्तिष्क की परतों में अपनी जगह जाकर स्थापित होता रहता है, पर इन सीखी हुयी भाषाओं का क्या संघर्ष चलता होगा? कौन सी भाषा ऐसी होती होगी जो चिन्तन प्रकोष्ठ में जाकर अपना अधिकार जमा लेती होगी? कौन सी भाषा जाकर चिन्तन की मौलिक अदृश्य भाषा को विस्थापित कर चिन्तन की भाषा बन जाती हो? कौन किस भाषा में सोचता है, यदि एक से अधिक भाषा में सोचता हो तो कौन सी भाषा किन परिस्थितियों में प्रधान हो जाती हो? इन प्रश्नों का उत्तर बहुत कठिन है, क्योंकि इन पर कोई विधिवत शोध हुआ ही नहीं। जो भी आँकड़ा उपस्थित है, अनुभवजन्य है।

यह भी हो सकता है कि हम अपनी मौलिक भाषा में ही सोचते हों, पर जो ज्ञान हमने एकत्र कर रखा होता है, वह किसी विशेष भाषा में रहा होगा, अतः हमें उस भाषा विशेष में सोचने की अनुभूति होती होगी। उदाहरणार्थ यदि अध्यात्म के बारे में सोच रहे हों तो विचार संस्कृत में प्रवाहित होते प्रतीत होंगे। भौतिक विज्ञान के बारे में सोचेंगे तो अंग्रेजी में प्रवाह होता हुआ प्रतीत होगा। इन विषयों पर भी शोध होना शेष है कि यदि हम अध्यात्म और विज्ञान के सम्बन्धों के बारे में सोचेंगे तो विचारों का प्रवाह किस भाषा में होता हुआ लगेगा? संस्कृत में, अंग्रेजी में या मन की मौलिक भाषा में। एक बात और स्पष्ट होना आवश्यक है कि रटा रटाया कह देना चिन्तन नहीं है, मौलिक कहना चिन्तन है, तो वह मौलिक किस भाषा में सोचा जायेगा?

यह भी संभव है कि जब भी निर्णय लेने की बात होगी, ज्ञानदत्तजी को अंग्रेजी उद्धरण अधिक याद आते होंगे, प्रबन्धन के सूत्र अधिक याद आते होंगे, इसीलिये उन्हें लगता होगा कि वह अंग्रेजी में सोच रहे हैं। भावनात्मक विषयों पर अंग्रेजी कभी अपना स्थान बना नहीं पायी होगी, अतः उस विषय में हिन्दी में विचारशीलता प्रतीत होती होगी।

कल एक कार्यक्रम देख रहा था, कॉमेडी नाइट्स विद कपिल, उसमें किसी ने कहा था कि जिस भाषा में गाली निकलती है, वही आपकी असली भाषा है, वही आपकी चिन्तन की भाषा है। इसी तर्क को और बढ़ा दिया जाये तो जिस भाषा में आपके भाव बह निकलें वही आपकी चिन्तन की भाषा है।

यक्ष प्रश्न तो फिर भी रहा, कि चिन्तन की भाषा क्या है, मौलिक अदृश्य वाली या सीखी हुयी प्रथम भाषा या विषयगत ज्ञान देने वाली भाषा? आपके क्या विचार हैं, अपनी मौलिक भाषा में ही सोचकर बताइयेगा?

7.9.11

हिन्दी उत्थान और सहजता

घर में 'सब' चैनल के कार्यक्रम अधिक चलते हैं, हल्के फुल्के रहते हैं, परिवार के साथ बैठ कर देखे जा सकते हैं, बच्चों को भी सुहाते हैं, भारतीय परिवेश की सामान्य जीवनशैली पर आधारित होते हैं, स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करते हैं और कृत्रिमता से कोसों दूर होते हैं। मनोरंजन का अर्थ ही है कि आपके मन के कोमल भावों को गुदगुदाया जाये, कभी किसी परिस्थिति द्वारा, कभी किसी चरित्र के हाव भाव द्वारा, कभी किसी उहापोह से, कभी हास्य से, कभी बलवती आशाओं से, कभी क्षणिक निराशाओं से।

हो सकता है कि कभी हास्य का कोई रूप आपको थोड़ा हीन लगे पर संदर्भों के प्रवाह में वह भी मनोरंजन बनकर बह जाता हो, बिना कोई विशेष क्षोभ उत्पन्न किये हुये। ऐसा ही कुछ मुझे भी खटकता है, सामान्य हास्य नहीं लगता है। कुछ धारावाहिकों में एक ऐसा चरित्र दिखाया जाता है जो बड़ी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी बोलता है, छोटी बातों को भारी भरकम शब्दों से व्यक्त करता है, औरों को वह समझ में नहीं आता है, तब कोई समझदार सा लगने वाला चरित्र उसे सरल हिन्दी या अंग्रेजी में बता देता है, अन्य हँस देते हैं। आपके सामने वह हास्य और विनोद समझ कर परोस दिया जाता है।

धीरे धीरे यह धारणा बनायी जा रही है कि हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो संवाद और संप्रेषण योग्य नहीं है, जो वैज्ञानिक नहीं है, जो आधुनिक नहीं हैं। किसी तार्किक आधार की अनुपस्थिति में भी यह हल्का सा लगने वाला परिहास ही उस धारणा को स्थायी रूप देने लगता है। 

सरल भव, सहज भव
अति उत्साही हिन्दी-बुद्धिजीवियों को अपने संश्लिष्ट ज्ञान से हिन्दी को पीड़ा पहुँचाते हुये देखता हूँ, सरल से शब्दों को क्लिष्टता के आवरण से ढाँकते हुये देखता हूँ, शब्दों के अन्दर ही क्रियात्मकता और इतिहास ठूँस देने का प्रयास करते हुये देखता हूँ। उपर्युक्त कारणों से जब हिन्दी का मजाक उड़ाया जाता है, तो क्रोध भी आता है और दुख भी होता है। क्रिकेट और रेलगाड़ी जैसे सरल शब्दों पर किये गये अनुप्रयोग इस मूढ़ता के जीवन्त उदाहरण हैं, समझ में नहीं आता है कि वे भाषा का भला कर रहे हैं या उपहास कर रहे हैं। आप ही बताईये कि 'माइक्रोसॉफ्ट' को हिन्दी में 'अतिनरम' क्यों लिखा जाये?

अगली बार इस तरह की मूढ़ता सुने तो विरोध अवश्य करे और प्रयास कर उन्हें सही शब्द भी बतायें। जो अवधारणायें नयी हैं, उनसे सम्बद्ध शब्द अन्य भाषाओं से लेते रहना चाहिये, उन अवधारणाओं के स्थानीय विकास के लिये। अंग्रेजी भी तो न जाने कितनी भाषाओं के शब्दों से भरी पड़ी है। बिना हलचल भाषाओं को भी स्वास्थ्य प्राप्त ही नहीं हो सकता, सजा कर रख दीजिये किसी जीवित प्राणी कोकुछ ही दिनों में कृशकाय हो जायेगा। हम अपनी माँदों से बाहर निकलेंप्रयोगों के खेल खेलेंनये शब्दों के खेल खेलेंसरलता आयेगी भाषा में, जनप्रियता आयेगी भाषा में, संभवतः वही भाषा का स्वास्थ्य भी होगा।

यह भी उचित नहीं होगा कि जिसका जैसा मन हो वह हिन्दी में अनुप्रयोग करे और हिन्दी में जो शब्द प्रचलित है उन्हें भी अन्य भाषाओं से बदल दे। अपनी तिजोरी देखने के पहले औरों से भीख माँगने की आदत, जो कई अन्य क्षेत्रों में है, हिन्दी में न लायी जाये। जिस देश में 12% जन भी अंग्रेजी नहीं समझते हैं, उन्हें नये अंग्रेजी शब्द याद कराने से अधिक सरल होगा उपस्थित हिन्दी शब्दों को अधिक उपयोग में लाना। जब अन्य भारतीय भाषाओं में उन शब्दों का प्रयोग हो रहा हो तो अंग्रेजी शब्द आयातित करना बौद्धिक भ्रष्टाचार सा लगता है। कई तथाकथित प्रबुद्ध हिन्दी समाचार पत्र इस प्रवृत्ति के पोषक बने हुये हैं।

हो सकता है कि हिन्दी उत्थान पर यह पोस्ट आपको उपदेशात्मक लगे, हिन्दी जैसे व्यक्तिगत विषयों पर टीका टिप्पणी करने जैसी लगे, क्रोध भी आये, पर इस पर विचार अवश्य हो कि क्या हिन्दी भाषा इस प्रकार के हास्य का विषय हो सकती है?

चित्र साभार - lalitdotcom.blogspot.com

13.11.10

भाषायी उत्पात और अंग्रेजी बंदर

Vishwanath in 2008
श्री विश्वनाथजी
पूर्वज तमिलनाडु से केरल गये, पिता महाराष्ट्र में, शिक्षा राजस्थान में, नौकरी पहले बिहार में शेष कर्नाटक में, निजी व्यवसाय अंग्रेजी में और ब्लॉगिंग हिन्दी में। पालक्काड तमिल, मलयालम, मराठी, कन्नड, हिन्दी और अंग्रेजी। कोई पहेली नहीं है पर आश्चर्य अवश्य है। आप सब उन्हें जानते भी हैं, श्री विश्वनाथजी। जहाँ भाषायी समस्या पर कोई भी चर्चा मात्र दस मिनट में धुँआ छोड़ देती हो, इस व्यक्तित्व को आप क्या नाम देंगे? निश्चय ही भारतीयता कहेंगे।

पर कितने भारतीय ऐसे हैं, जो स्वतः ही श्री विश्वनाथजी जैसे भाषाविद बनना चाहेंगे? बिना परिस्थितियों के संभवतः कोई भी नहीं। दूसरी भाषा भी जबरिया सिखायी जाती है हम सबको। जब इस भारतीयता के भाषायी स्वरूप को काढ़ा बनाकर पिलाने की तैयारी की जाती है, आरोपित भाषा नीति के माध्यम से, देश के अधिनायकों द्वारा, राजनैतिक दल बन जाते हैं, विष वमन प्रारम्भ हो जाता है, भाषायी उत्पात मचता है और पूरी रोटी हजम कर जाता है, अंग्रेजी बंदर।

पिछले एक वर्ष से कन्नड़ सीख रहा हूँ, गति बहुत धीमी है, कारण अंग्रेजी का पूर्व ज्ञान। दो दिन पहले बाल कटवाने गया था, एक युवक जो 2 माह पूर्व फैजाबाद से वहाँ आया था, कामचलाऊ कन्नड़ बोल रहा था। वहीं दूसरी ओर एक स्थानीय युवक जिसने मेरे बाल काटे, समझने योग्य हिन्दी में मुझसे बतिया रहा था।

कार्यालय में प्रशासनिक कार्य तो अंग्रेजी में निपटाना पड़ता है पर आगन्तुक स्थानीय निवासियों से दो शब्द कन्नड़ के बोलते ही जो भाषायी और भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित होता है, समस्याओं के समाधान में संजीवनी का कार्य करता है। अंग्रेजी में वह आत्मीयता कहाँ? सार्वजनिक सभाओं में मंत्री जी के व अन्य भाषणों में केवल शब्दों को पकड़ता हूँ, पूरा भाव स्पष्ट सा बिछ जाता है मस्तिष्क-पटल पर। एक प्रशासनिक सेवा के मित्र ने मेरी इस योग्यता की व्याख्या करते हुये बताया कि कन्नड़ और संस्कृत में लगभग 85% समानता है, कहीं कोई शब्द न सूझे तो संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग कर दें। किया भी, नीर, औषधि आदि।

तेजाब फिल्म के एक गाने 'एक दो तीन चार....' ने पूरे दक्षिण भारत को 13 तक की गिनती सिखा दी। अमिताभ बच्चन की फिल्मों का चाव यहाँ सर चढ़कर बोलता है। यहाँ के मुस्लिमों की दक्खिणी हिन्दी बहुत लाभदायक होती है, नवागुन्तकों को। भाषायी वृक्ष भावानात्मक सम्बन्धों से पल्लवित होते दिखा हर ओर, धीरे धीरे। इस वृक्ष को पल्लवित होते रहने दें, बिना किसी सरकारी आरोपण के, भाषायी फल मधुरतम खिलेंगे।

प्रश्न उठता है कि तब प्रशासनिक कार्य कैसे होंगे, विज्ञान कैसे बढ़ेगा? आईये गूगल का उदाहरण देखें, हर भाषा को समाहित कर रखा है अपने में, किसी भी साइट को आप अपनी भाषा में देख सकते हैं, भले ही टूटी फूटी क्यों न हो, अर्थ संप्रेषण तो हो ही जाता है। राज्यों को अपना सारा राजकीय कार्य स्थानीय भाषा में ही करने दिया जाये। इससे आमजन की पहुँच और विश्वास, दोनों ही बढ़ेगा, प्रशासन पर। प्रादेशिक सम्बन्धों के विषय जो कि कुल कार्य का 5% भी नहीं होता है, या तो कम्प्यूटरीकरण से अनुवाद कर किया जाये या अनुवादकों की सहायता से। तकनीक उपस्थित है तो जनमानस पर अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा का बोझ क्यों लादा जाये।

त्रिभाषायी समाधान का बौद्धिक अन्धापन, बच्चों पर लादी गयी अब तक की क्रूरतम विधा होगी। भाषा का माध्यम स्थानीय हो, सारा ज्ञान उसमें ही दिया जाये। अपने बच्चों को हिन्दी अंग्रेजी अनुवाद के दलदल में नित्य जूझते देखता हूँ तो कल्पना करता हूँ कि विषयों के मौलिक ज्ञान के समतल में कब तक आ पायेगें देश के कर्णधार। विश्व का ज्ञान उसके अंग्रेजी अर्थ तक सिमट कर रह गया है। एक बार समझ विकसित होने पर आवश्यकतानुसार अंग्रेजी सहित किसी भी भाषा का ज्ञान दिया जा सकता है। भविष्य में आवश्यकता उसकी भी नहीं पड़नी चाहिये यदि हम मात्र वैज्ञानिक शब्दकोष ही सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा संस्कृत में विकसित कर लें।

भाषायी उत्पात पर व्यर्थ हुयी ऊर्जा को देश के विकास व अपनी भाषायी संस्कृति हेतु तो बचाकर रखना ही होगा। 


भाषा है तो हम हैं।