करवट बदलने पर आज दबा हुआ हाथ असहज अनुभव कर रहा है, बाहर निकलना चाहता है। जानता हूँ कि समय के ढलान में दूसरा हाथ भी यही नौटंकी करेगा, पुनः पीठ के बल लेट जाता हूँ, फिर वही पंखा, आँख जोर से भींच लेता हूँ, संभवतः उसमें बचे हुये खारेपन को प्रत्युत्तर सा कुछ अनुभव हो जाये। पहले तो लगता था कि आँख बन्द होना ही नींद होता है, आज तो पुतलियाँ बन्द आँखों में भी मचल रही हैं, कभी बायें तो कभी दायें। कुछ स्थिर हुयी आँखें तो कान जग गये। घड़ी का स्वर, टिक टिक, समय भाग रहा है, केवल टिक टिक का शब्द रह रहकर सुनाई दे रहा है। अन्य दिन तो यह थकान के पीछे छिप जाता था। आज थकान गौड़ हो गयी है, विचारों ने उसका अपहरण कर लिया है। आज टिक टिक पर ध्यान लग गया है।
एक संतोष था मन में, यदि नल न बंद करता तो न जाने कितना जल बह जाता, वह जल जो जीवन देता है, न जाने कितनों को। शान्ति मिली, मन की अग्नि बुझने सी लगी, नल तो बन्द करना ही होगा, दिन मे भी वही किया और रात में भी।
मुझे तो टप टप सुनायी पड़ता है, आपको सुनायी पड़ रहा है? ध्यान से सुनिये आप भी, जहाँ भी टिक टिक सुनायी पड़े, जायें और तुरंत नयी डिजिटल घड़ी ले आयें, तकनीक अपना लें। टप टप सुनायी दे तो नल को कस कर बन्द कर दें, एक बूँद भी न टपके।
देश के सन्दर्भों में देखेंगे तो न जाने कितना टिकटिकीय कोलाहल उत्पन्न कर दिया है विकास के नाम पर, न जाने कितने नल खोल दिये हैं धनलोलुपों ने और देश की सम्पदा बही जा रही है, न जाने कितने जुझारू पंखो के ऊपर कालिमा पोत दी है जिससे वे कुछ चेष्टा ही न कर सकें।
देश के सन्दर्भों में देखेंगे तो न जाने कितना टिकटिकीय कोलाहल उत्पन्न कर दिया है विकास के नाम पर, न जाने कितने नल खोल दिये हैं धनलोलुपों ने और देश की सम्पदा बही जा रही है, न जाने कितने जुझारू पंखो के ऊपर कालिमा पोत दी है जिससे वे कुछ चेष्टा ही न कर सकें।
न टिक टिक सहन हो, न टप टप, न मूढ़ बकर, न व्यर्थ बूँद भर, निश्चय तो करें। पंखा चले, कालिमा लगे तो लगे।
वह एक प्रयासरत है, हम सब भी प्रयासरत हों, तब जाकर देश चैन से सो पायेगा।