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9.4.11

टिक टिक, टप टप

रात आधी बीतने को है, चिन्तन पर विचारों के ज्वार ने अधिकार कर लिया है, ऐसी परवशता देखकर निद्रा भी रूठ कर चली गयी है, आँख गड़ गयी है छत पर लटके हुये पंखे पर, जिसके एक ब्लेड पर सतत चलते रहने से एक ओर ही कालापन उभर आया है। जो आगे रहकर जूझता है, सब कालिमा उसे ही ओढ़नी पड़ती है, समाज का नियम है, पंखा भी निभा रहा है। यह अधिक देख नहीं पाता हूँ, करवट बदल लेता हूँ, पंखे की हवा लेने वाले भी तो यही करते हैं।

करवट बदलने पर आज दबा हुआ हाथ असहज अनुभव कर रहा है, बाहर निकलना चाहता है। जानता हूँ कि समय के ढलान में दूसरा हाथ भी यही नौटंकी करेगा, पुनः पीठ के बल लेट जाता हूँ, फिर वही पंखा, आँख जोर से भींच लेता हूँ, संभवतः उसमें बचे हुये खारेपन को प्रत्युत्तर सा कुछ अनुभव हो जाये। पहले तो लगता था कि आँख बन्द होना ही नींद होता है, आज तो पुतलियाँ बन्द आँखों में भी मचल रही हैं, कभी बायें तो कभी दायें। कुछ स्थिर हुयी आँखें तो कान जग गये। घड़ी का स्वर, टिक टिक, समय भाग रहा है, केवल टिक टिक का शब्द रह रहकर सुनाई दे रहा है। अन्य दिन तो  यह थकान के पीछे छिप जाता था। आज थकान गौड़ हो गयी है, विचारों ने उसका अपहरण कर लिया है। आज टिक टिक पर ध्यान लग गया है।

विज्ञान पर क्रोध आ रहा है, समय का नपना तो बना दिया पर समय को अपना नहीं बनाया। दीवार पर चुपचाप जड़वत पड़ी घड़ी, सूर्यरथ से प्रेरणा ले कर्तव्यनिष्ठावश चलती रहती, अन्तर में कैसी चोट खाती रहती है, टिक टिक, टिक टिक, टिक टिक। सबको समय बताने वालों के हृदय भी ऐसे ही अनुनाद करते होंगे। नहीं नहीं, मुझे तो इस समय समयशून्य होना है, मुझे नहीं सुनना कोई भी स्वर जिससे समय का बोध हो, अपने होने का बोध हो। विज्ञान ने समय तो बताया पर अनवरत सी टिक टिक जोड़ दी जीवन में। अब कल ही जाकर डिजिटल घड़ी लूँगा, विज्ञान के माध्यम से ही विज्ञान का कोलाहल मिटाना पड़ेगा, शिवम् भूत्वा शिवम् यजेत।

शिवत्व का आरोहण और मन में समाधान आ जाने से धीरे धीरे टिक टिक स्वर विलुप्त हो गया। नींद तो फिर भी नहीं आयी, रात्रि के अन्य संकेत सो गये थे, पर पूर्ण स्तब्धता तो फिर भी नहीं थी, कुछ तो स्वर आ रहा था। ध्यान से सुना, टप टप, टप टप, टप टप। हाँ नल खुला था, नहीं नहीं ढीला था। यूँ ही टप टप बहता रहा तो न जाने कितना पानी बह जायेगा, कावेरी का पानी। कुछ कार्य करने की प्रेरणा हुयी। उठा, नल बन्द किया, जल देख प्यास लगना शाश्वत परम्परा है प्रकृति की, जल पीते समय आँखों को गिलास का गोल किनारा सम्मोहित करने लगा। जल की शीतलता और पात्र का सम्मोहन, शरीर के अंग ढीले पड़ने लगे। जाकर लेट गया, मन शान्त सा होता गया, धीरे धीरे, धीरे।

एक संतोष था मन में, यदि नल न बंद करता तो न जाने कितना जल बह जाता, वह जल जो जीवन देता है, न जाने कितनों को। शान्ति मिली, मन की अग्नि बुझने सी लगी, नल तो बन्द करना ही होगा, दिन मे भी वही किया और रात में भी।

मुझे तो टप टप सुनायी पड़ता है, आपको सुनायी पड़ रहा है?  ध्यान से सुनिये आप भी, जहाँ भी टिक टिक सुनायी पड़े, जायें और तुरंत नयी डिजिटल घड़ी ले आयें, तकनीक अपना लें। टप टप सुनायी दे तो नल को कस कर बन्द कर दें, एक बूँद भी न टपके। 

देश के सन्दर्भों में देखेंगे तो न जाने कितना टिकटिकीय कोलाहल उत्पन्न कर दिया है विकास के नाम पर, न जाने कितने नल खोल दिये हैं धनलोलुपों ने और देश की सम्पदा बही जा रही है, न जाने कितने जुझारू पंखो के ऊपर कालिमा पोत दी है जिससे वे कुछ चेष्टा ही न कर सकें।

न टिक टिक सहन हो, न टप टप, न मूढ़ बकर, न व्यर्थ बूँद भर, निश्चय तो करें। पंखा चले, कालिमा लगे तो लगे।

वह एक प्रयासरत है, हम सब भी प्रयासरत हों, तब जाकर देश चैन से सो पायेगा।