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6.7.21

सात चक्र - स्थिति

 

सात चक्रों की अवधारणा संभवतः भारतीय सिद्धान्त पक्ष का सर्वाधिक चर्चित तत्व है। शरीर में स्थित ऊर्जा के ये चक्र न केवल शरीर को अध्यात्म से जोड़ते हैं वरन भूत, भविष्य और वर्तमान से होते हुये कालातीत अवस्था तक पहुँच जाते हैं। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की भिन्न अवस्थाओं को भी ये चक्र विश्लेषित करते हैं। योग हो, तन्त्र साधना हो, बौद्धपंथ हो, आधुनिक मनोविज्ञान हो, प्राच्य और पाश्चात्य के सभी मत मानसिक संरचना को इसी सिद्धान्त से समझने का प्रयत्न करते हैं। समझ में थोड़ा बहुत अन्तर काल और विकास के कारण है। साथ ही अपने पंथ के अन्य सिद्धान्तों से संयोजन के प्रयास में इसके मूलभूत स्वरूप में न्यूनतम छेड़छाड़ दृष्टव्य है।


संलग्न चित्र में चक्र, उनके स्थान, सम्बद्ध काल, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक लक्षण दिखाये गये हैं। इन्हें पूरा समझ पाना किसी योगी के लिये ही संभव है पर कुछ आधारभूत तथ्य इसे क्रमशः खोलने में सहायक होंगे।


प्रथम दो चक्र समझ आते हैं, वे क्रमशः भूत और भविष्य से सम्बद्ध हैं। अन्तिम दो भी स्पष्ट हैं, वे वर्तमान और कालातीत अवस्था को व्यक्त करते हैं। मध्य में स्थित शेष तीन काल की व्यापित अवस्थाओं के परिचायक हैं। व्यापित काल अवस्थायें बन्धनकारी लग सकती है। प्रारम्भिक स्थितियों में ऐसा होता भी है, ऊर्जा बट जाती है। कालान्तर में इनमें साम्य आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं होगा तो हमारा विकास नहीं होगा, हम उसी चक्र में अटके रहेंगे। विकास से हम ऊपरी चक्रों में क्रमशः बढ़ते जाते हैं और पहले अपने अन्दर, फिर परिवार में, फिर समाज में और अन्ततः सकल विश्व में एक संतुलित स्वरूप देख पाते हैं। ऊर्जा, साम्य, विकास और संतुलन को यह क्रम लगभग हर विषय में प्रयुक्त होता है।


मध्य के ये तीन चक्र बद्धता और उन्मुक्तता के बीच के संक्रमण की स्थिति है, बद्धता भूत और भविष्य की, उन्मुक्तता वर्तमान की। बद्धता सब कुछ अपने में समेट लेने की, उन्मुक्तता सब में व्याप्त हो जाने की। स्वाभाविक है कि इस यात्रा में परिश्रम अधिक करना पड़ता है, समय अधिक लगता है। जहाँ होड़ लगी थी, प्रतियोगी मानसिकता थी, वहाँ साम्य बिठाना पड़ता है। बन्धन से बाहर आने के क्रम में चित्र में इंगित गुण विकसित होते हैं। बन्धन से बाहर आने का प्रयास ही उन गुणों को जीवन में परिवर्धित करते हैं जो विस्तारमना होते हैं। यह तब तक संभव नहीं है जब तक हम भूत और भविष्य को संतुलित रूप में वर्तमान के साथ नहीं रखते हैं। एकता, समग्रता में विस्तार की आवश्यकता है। विस्तार तीनों कालों का, विस्तार तीनों कालों के परस्पर प्रभाव का।


अन्ततः वर्तमान ही सब कुछ है। यदि वर्तमान को जी लिया और बिना कुछ बोझ लिये आगे बढ़ गये तो काल की बन्धनकारी प्रवृत्ति भी कम रहेगी। यदि वर्तमान को पूर्णता से नहीं जिया, निष्कर्ष तक नहीं पहुँचाया तो वह अतृप्त रहेगा और आगत काल में अपना भाग माँगेगा। यही संभवतः कर्मफल का सिद्धान्त है। बिना क्लेष के जी पाना, बिना अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश के जी पाना।


आपका जीवन ऊर्जा के इन सात चक्रों में कहीं न कहीं रहेगा ही। मन में उत्पन्न विचार किसी न किसी चक्र का भाग रहेगा ही। निम्न चक्र प्रारम्भ में जागृत रहते हैं पर बिना उनको पार किये, बिना उन पर ध्यान दिये, बिना उनको निष्कर्ष पर पहुँचाये विकास संभव भी नहीं है। विकास के प्रारम्भिक चरणों में प्राथमिकता वही है। बिना उन आवश्यकताओं को पूर्ण किये हुये संतुलन और एकाग्रता की बात करना हास्यास्पद है। पर उन आवश्कताओं में कितना समय दें, यह प्रश्न सदा ही बना रहता है। उनको यथोचित समय और ऊर्जा देकर ही आगे बढ़ा जा सकता है, नहीं तो अवसर पाकर वे पुनः भड़केंगी। इन आवश्यकताओं का एक मूलभूत नियत स्तर बनाकर रखना ही होता है। शरीर और परिवेश की सुरक्षा, खाने को भोजन, रहने को घर, जीवकोपार्जन, भविष्य का चिन्तन, सन्तति का क्रम, आधार का निर्माण करना ही पड़ता है।


यदि प्रथम चक्र में ही अटक गये, उसी में सारा समय व्यतीत कर दिया, उसी में निमग्न हो गये, उसी में सुख ढूढ़ने लगे तो मान लीजिये कि आपने सारी संभावनाओं को नकार दिया है। एक दिन मन भर जायेगा, काल में सबका अवरोह आता है, सुख के अनुभव का भी। बार बार एक ही विषय सुख देना बन्द कर देता है। तब कहाँ जायेंगे, तब ऊपर के चक्रों में जाने का मन तो करेगा पर आपके पास न ऊर्जा रहेगी और न ही समय। निःशब्द, निर्व्यक्त, निरुपाय आप जीवन से प्रयाण कर जायेंगे। काल की कला से बाहर आना है तो कालातीत तो होना ही पड़ेगा।


धर्म रक्षित अर्थ और काम के प्रयास मोक्ष तक ले जाने की सामर्थ्य रखते हैं। धर्मविहित अर्थ समाज के द्वेष का कारण बनता है और धर्मविहित काम समाज की निन्दा का। वाल्मीकि रामायण में राम के मुख से निकले ये शब्द असमञ्जस की किसी भी स्थिति से बाहर निकाल लाते हैं और एक सहज सा साम्य प्रकट कर देते हैं। वैशेषिक भी जीवन के दो ध्येय कहता है, एक अभ्युदय औऱ दूसरा निःश्रेयस। एक भौतिक श्रेष्ठता तो दूसरा सर्वोत्तम तक की यात्रा, एक के बाद एक चक्रों से होते हुये, ऊर्ध्वमना हो।


सात जन्म, मन की सात अवस्थायें, काल की सात कलायें, सात चक्र, ये सब अन्ततः एक बिन्दु पर अपनी निष्पत्ति पा जाते हैं। इन सात चरणों की यात्रा के व्यवहारिक पक्ष अगले ब्लाग में।

1.7.21

सात जन्म - क्रम


ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की विमाओं में भूत, भविष्य और वर्तमान को कैसे साधा जाये, यह जीवन का मूल प्रश्न हो जाता है। साथ ही ढेर सारे और भी अनुप्रश्न उठते हैं, जिनका निवारण आवश्यक हो जाता है। जो प्रश्न हमारे हैं वही प्रश्न हमारे पूर्वजों के भी थे। जब जीवन की आपाधापी से कुछ समय निकाल कर अपने पूर्वजों के साथ बैठता हूँ तो दो भाव उमड़ते हैं। एक भाव होता है अगाध आदर का। अद्भुत मेधा, अद्भुत चिन्तन, अद्भुत उहा और विचारों का एक व्यवस्थित क्रम। दूसरा भाव होता है, आनन्द के अतिरेक में उनसे लिपट जाने का। गर्व होता है, मन करता है कि साँस रोके रहूँ और उस गर्वानुभूति को जाने ही न दूँ। प्रश्न घुमड़ते हैं, जब तक उत्तर नहीं पा जाता मन, अतृप्ति बनी रहती है। उत्तर पाते ही आनन्द की रेख पूरे अस्तित्व में तड़ित तरंगा सी समा जाती है।


उनके लिखे हुये में और हमारे समझे हुये में बस प्रत्यक्ष का अन्तर होता है। उन्होंने समस्त ज्ञान का प्रत्यक्ष किया होता है, एक प्रक्रिया में उतर कर। योग के सम्यक अनुपालन से और ध्यान, धारणा और समाधि से होते हुये जब तथ्य उद्भाषित होते हैं तब व्यक्त शब्द आप्त द्वारा प्रत्यक्ष किये गये ज्ञान की सामर्थ्य पा जाते हैं। हमें वही ज्ञान अनुमान से प्राप्त होता है और शब्द रूप में सहज उपलब्ध है। यही कारण है कि शाब्दिक ज्ञान जानने के बाद भी उसका मर्म समझने में हमें वर्षों लग जाते हैं। अनुभव बहुत कुछ सिखाता है, शब्दों में पड़ा ज्ञान, श्लोकों में निहित शिक्षा, सूत्रों में क्रमबद्ध पिरोया ज्ञान अपने आप को धीरे धीरे व्यक्त करने लगता है।


जीवन को जानने और समुचित निभाने के लिये ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की विमाओं को समझना आवश्यक है। किस प्राथमिकता और क्रम में ऊर्जा लगायी जाये, किस प्रकार विपरीतता में साम्य स्थापित किया जाये, किस प्रकार आवश्यक विकास लब्ध हो और अन्ततः किस प्रकार समग्रता से आन्तरिक और वाह्य विश्व में एकत्व संस्थापित किया जाये? पिछले ब्लाग में देखा कि भूत, भविष्य और वर्तमान में भटकता मन ऊर्जा खींचता है, पहले क्या कर्म निष्पादित हों? क्या धरें और क्या तजें? धरना भविष्य का द्योतक है, तजना भूत का, यथास्थिति वर्तमान की। किसको कितना महत्व दिया जाये कि सब संतुलित चले? तब संतुलन की स्थिति में किस प्रकार गति हो? तब किस प्रकार गतिमय जीवन के सम्बन्धों में तदात्म्य स्थापित हो, अन्य जीवों के साथ, प्रकृति के साथ, स्वयं की इन्द्रिय, मन, बुद्धि और आत्मा के साथ।


जब क्रिया का एक मात्र अवसर वर्तमान ही है, जो भी करना होगा वर्तमान में ही करना होगा। स्मृति भी वर्तमान के क्षण में आयेगी, कल्पना भी वर्तमान के क्षण ही आयेगी, ज्ञान भी वर्तमान में प्राप्त होगा और कर्म भी वर्तमान में ही सम्पादित होंगे। स्मृति और कल्पना के साथ न्याय करने के लिये ज्ञान आवश्यक है, आगे बढ़ने के लिये कर्म आवश्यक है। वर्तमान को सही प्रकार से निभाना जिसे आ गया, उसे जीवन जीने की कला का मर्म भी आ गया।


विकास क्रमिक है। समग्र में क्रमशः शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास। हर अंग का अपना क्रमिक विकास। स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ें, नीचे से ऊपर बढ़ें, वाह्य से अन्दर बढ़ें तो शारीरिक स्तर पर ही, सुरक्षा, प्रजनन, पाचन, संचालन, संप्रेषण, संतुलन से होते हुये स्थैर्य आता है। मानसिक स्तर पर इन्द्रिय सुख, प्रसन्नता, व्यापकता, समर्पित प्रेम, स्वतन्त्रता, शुद्धता होते हुये अस्तित्व की अनुभूति होती है। बौद्धिक स्तर पर स्थायित्व, रचनात्मकता, मौलिकता, सहृदयता, उन्मुक्त विचार, दृश्य चेतना से होते हुये एकता स्थापित होती है। इसी प्रकार आध्यात्मिक स्तर पर अस्मिता, उत्सुकता, विकास, समर्पण, विशिष्टता, प्रज्ञा के मार्ग से ऋतम्भरा प्रतिष्ठित होती है।


आपको यह तथ्य निश्चय ही रोचक लगेगा कि प्रत्येक अंगों के विकासक्रम में सात ही चरण दिये गये हैं। सात की यह अवधारणा जिसे मैंने सात जन्मों के प्रश्न से ढूढ़ने का प्रयास किया था और क्रमशः काल और मन की गति से सम्बद्ध करने का प्रयास किया था, वह अवधारणा सात ऊर्जा चक्रों में अपनी निष्पत्ति पा जाती है।


शरीर में सात ऊर्जा चक्र माने गये हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार। नाड़ियों की संरचना में तन्त्रिका तन्तुओं के संगमस्थल ऊर्जा के केन्द्र माने गये हैं। समग्रता और निर्बाध रूप से जीने के लिये आवश्यक है कि इनमें ऊर्जा प्रवाहित होनी चाहिये। जहाँ पर यह प्रवाह बाधित हो जाता है, हम अस्तित्व के उसी बिन्दु पर अटक जाते हैं, ऊपर नहीं बढ़ पाते हैं। न केवल ये चक्र हमारी मानसिक गति से सम्बद्ध हैं वरन काल से भी जुड़े हैं। किस समय किसको प्राथमिकता देनी है, साम्य का स्तर क्या हो, ऊपर कैसे बढ़े और अन्ततः एकत्व कैसे आये, इसका एक अद्भुत विवरण इस प्रकरण में मिलता है।


ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की यात्रा है, इन चक्रों में क्रमशः ऊपर बढ़ना। जानेंगे इसके विश्लेषित रहस्य अगले ब्लाग में।

29.6.21

सात जन्म - मन

 

मन है तो गति करेगा, स्वाभाविक है। कहाँ तक गति करेगा? जहाँ तक उसकी सामर्थ्य है। कब किस काल में रहेगा, क्या पता? क्यों नहीं हमें सारी स्मृतियाँ एक साथ याद आती हैं? क्यों नहीं हमारा सारा जीवनकृत्य स्मृतियों में परिणित हो जाता है? क्या वह कारण है जो स्मृति विशेष को आकर्षित करता है? क्या कुछ होता है उन घटनाओं में जो वे स्मृति बन इतने गहरे चिपक जाती हैं? और क्या होता है उन घटनाओं में जो होती तो विशेष हैं पर स्मृति में नहीं आती हैं या कहें कि काल में कवलित हो जाती हैं।


मन की गति विशिष्ट है। वह एक पल स्मृतियों में जीता है, दूसरे पल कल्पना में, तीसरे पल वर्तमान को समझता है और चौथे पल कर्म में ध्यानस्थ हो जाता है। विश्लेषण करें कि कितने समय किस काल में रहा मन? और जिस काल में भी रहा, अन्य कालों से कितना प्रभावित रहा मन? जब सुख और दुख उसी मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता से व्यक्त हों, जब मन की गति जीवन के दिशा और दशा बदलने में सक्षम हो, जब भविष्य अनिश्चित हो और निर्णय अंधकूप के निष्कर्षसम हों, तो मन की गति के आधारभूत नियम जानना आवश्यक हो जाता है। यदि हम दृष्टा हैं तो कौन मन की यह गति नियन्त्रित कर रहा है? यदि कोई और नियन्त्रण में है तो सुख और दुख हमारे भाग में क्यों?


बड़ा असहाय सा लगता है जब दृष्टा मन के आन्दोलनों को झेल रहा होता है। तब मन न जाने कौन सी स्मृति सामने लाकर रख दे और आपको पुनः भयग्रस्त कर दे। सफलता की निर्मल आस को पुरानी असफलता की निर्मम स्मृतियों से ध्वस्त कर दे। एक पुरानी चोट की स्मृति आपके वर्तमान को अतिसावधान कर जाये। स्मृति में पड़ा एक छल का प्रकरण स्वस्थ परिवेश के प्रति भी अविश्वास उत्पन्न कर दे।


यदि हम अपनी स्मृतियों से इतने बद्ध हैं, या इतने प्रभावित हैं, या इतने प्रताड़ित हैं, तो हम क्या वह हो पा रहे हैं जो हमें उस परिस्थिति में होना चाहिये? वर्तमान की स्मृतियों पर अतिनिर्भरता निश्चय ही भविष्य के लिये भी उचित नहीं है। यदि ऐसा है तो निश्चय ही हम एक पूर्वनिर्धारित जीवन जी रहे हैं। तब वह कल्पनाशीलता कहाँ से आयेगी। सृजन के साथ यह अन्याय होगा कि कल्पनाशीलता सुप्तप्राय हो जाये। तब क्या हम पशुवत नहीं हो जायेंगे?


कल्पनाशीलता के लिये आवश्यक है कि स्मृतियाँ बाधक न हों, अपितु साधक हों। स्मृतियों की अधिकता और प्रबलता दोनों ही बाधक होने की संभावना रखती हैं। साधक स्मृतियाँ प्रबल हों और बाधक निर्बल, तभी कल्पना प्रखर हो सकेगी। कल्पनाशीलता ही क्यों, वर्तमान में सामान्य रूप से कार्य करने के लिये भी स्मृतियों के उछाह का समुचित निस्तारण आवश्यक है।


तब एक सहज सा प्रश्न उठ सकता है कि अच्छा जीवन तो वह होता है जिसमें ढेर सी स्मृतियाँ हों। इसी मानसिकता में हम स्मृतियाँ बनाते रहते हैं, समेटते रहते हैं, इस तथ्य से सर्वथा अनभिज्ञ कि यही एक दिन बोझ बन जायेंगी, एक पग भी आगे नहीं बढ़ने देंगी, बद्ध कर लेंगी।


कभी कभी स्मृतियों की इस आधिपत्य से हम विद्रोह कर बैठते हैं। कष्टमय भूत को भुलाकर, मार्ग के विरुद्ध एक नये मार्ग पर हठ करके बढ़ जाते हैं। भूत से यह बलात विलगता आपको स्वतन्त्र करने के स्थान पर और भी क्षीण कर देती है। पहली इसलिये कि आप अपनी गति और मति के विरुद्ध जाते हैं जिससे आपको सामान्य से कहीं अधिक ऊर्जा लगती है, साथ ही आपका निर्मित आधार आपके काम नहीं आता है। दूसरी इसलिये कि भूत से बलात विलगता आपको अपने भूत से और भी बद्ध कर देती है।


जहाँ स्मृति का तांडव भय उत्पन्न करता है, आपको आवश्यकता से अधिक सावधान, संचय और उपक्रम एकत्र करने में लगा देता है, कल्पना का भी विषादपूर्ण योगदान कम नहीं है। कल्पना के द्वारा निर्मित आगत की आकृति और उसे पूर्ण करने की चिंता। भविष्य की चिंता में डूबा अस्तित्व व्यर्थ ही ऊर्जाहीन हो जाता है। आश्चर्य है कि यह दुख भूत के भय की तुलना में कई गुना होता है। जहाँ भूत में घटित घटना एक ही होती हैं, कल्पनाजनित संभावित भविष्य कई प्रकार के हो सकते हैं। हर संभावित भविष्य में जाकर उसे पूर्ण करने या न कर पाने की चिंता में हमारे द्वारा प्राप्त मानसिक दुख कई गुना बढ़ जाता है, शारीरिक पीड़ा के तुलना में तो सैकड़ों गुना। क्योंकि बहुत कुछ संभव है कि असफलता की संभावित परिस्थितियाँ आयें ही नहीं। 


भूत के भय और भविष्य की चिंता, दोनों ही मिलकर वर्तमान को अस्तव्यस्त करने की क्षमता रखते हैं। बहुधा हम जीवन इसी उठापटक में निकाल देते हैं और वर्तमान पर तनिक भी ध्यान नहीं देते हैं। वर्तमान पर क्षिप्त विक्षिप्त सी प्रतिक्रिया परिस्थितियों को और भी प्रतिकूल कर देती है और तब लगता है कि जीवन में सब कुछ हमारे नियन्त्रण से बाहर चला गया।


वर्तमान हमारे लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है। स्मृति में कोई घटना जायेगी कि नहीं इसका निर्धारण वर्तमान से ही होगा। भविष्य पीड़ासित होगा कि नहीं, इसका भी निर्धारण वर्तमान से होगा। इस तथ्य के विपरीत हम वर्तमान को दोनों ही ओर से खो देते हैं। संभवतः यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना है।


भूत, भविष्य और वर्तमान को साधने का क्रम अत्यन्त रोचक है। ऊर्जा, साम्य और एकता के पथ पर सध कर जाना पड़ता है। जानेंगे अगले ब्लाग में। 

29.5.21

हम काल कला से छले गये


गिरिजेशजी का जाना हृदय विदीर्ण कर गया, 

एक अद्भुत व्यक्तित्व चला गया, 

एक अश्रुपूरित शब्दांजलि......


हम काल कला से छले गये,

गिरिजेश! कहाँ तुम चले गये?


गहरे रहस्य, उद्भट प्रकथ्य,

सुर शब्दों में, संनिहित सत्य,

करना था कितना और व्यक्त,

सब कुछ पसार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।१।।


श्रम डूबे सब वांछित प्रयत्न,

मेधा से ढूढ़े अलख रत्न,

साझे, साधे अनगिनत यत्न,

सब कुछ बिसार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।२।।


दस वर्ष अधिक सम्बन्ध रहा,

संवाद सतत निर्द्वन्द्व बहा,

सोचा जो भी स्पष्ट कहा,

सब कुछ उतार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।३।।


संस्कृत संस्कृति के रहे प्राण

प्रस्तुत उत्तर, विस्तृत प्रमाण,

आगत प्रज्ञा, संशय प्रयाण,

सब कुछ विचार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।४।।


अलसाया चिठ्ठा रहे भुक्त,

हत मघा, करेगा कौन मुक्त,

कविता के सुन्दर स्रोत सुप्त,

सब पर प्रहार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।५।।


बाऊ बैठे, मनु उर्मि शान्त,

सब रामायण के पात्र क्लान्त,

शत शोकमग्न तिब्बत नितान्त,

सबको निहार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।६।।


माता बिन बीता एक माह,

मन पिता मन्त्र बहता प्रवाह,

क्यों लिये विकट स्मृति उछाह,

यह जगत पार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।७।।


जब रहे सनातन कालपथिक,

किसकी बाधा, क्यों हृदय व्यथित,

रुक जाते थोड़ा और तनिक,

जग तार तार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।८।।


8.5.21

काल के किस ओर जीवन


अंध व्यापा दिशा तम घनघोर जीवन,

कल जाने काल के किस ओर जीवन।


वृहद, आगत योजना के आकलन में,

रत रहे संसाधनों के संकलन में,

कर्म क्रम संभाव्य सीमा में समेटे,

सकल रचनावृत्त बाहों में लपेटे,

ज्ञात गति व्यवहार, अति आश्वस्त हम सब,

दृष्टिगत आकार में थे व्यस्त हम सब,

आज की निश्चिंतता किस छोर जीवन।

कल जाने काल के किस ओर जीवन ।१।


प्रकृति को कर हस्तगत, उत्ताल मद में,

दम्भ सृष्टा सा धरे विकराल हृद में,

नित्य निर्मित विश्व नव विस्तार अगनित,

सृष्टि पर अभिमानपूरित दृष्टि प्रमुदित,

अंध आँधी बन उमड़ती सृष्टियाँ सब,

भ्रमित शंकित रुद्ध बैठीं दृष्टियाँ सब,

क्या पता अब जगत के किस ठौर जीवन,

कल जाने काल के किस ओर जीवन ।२।


हम यथासंभव लड़ेंगे, लड़ रहे हैं,

सतत संकट सहन करते, बढ़ रहे हैं,

प्राण को जो पूर्णता से साधता है,

जो ग्रहों को घूर्णता से बाँधता है,

उस नियन्ता से यही आराधना है,

एक ही बस सर्वहित लघु प्रार्थना है,

रात्रि के उस पार पाये भोर जीवन।

कल जाने काल के किस ओर जीवन ।३।