न दैन्यं न पलायनम्
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कल्पना
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कल्पना
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15.11.14
प्रियतम
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खोजता दो नेत्र , जिनमें स्वयं को पहचान लूँ मैं , आप आये, पंथ को विश्राम मिल गया है । प्रेम की दो बूँद चाही, किन्तु स...
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1.11.14
स्वप्न सुनहला
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स्वप्न सुनहला देखा मैंने , सुन्दर चेहरा देखा मैंने । मन में संचित चित्रण को, बन सत्य पिघलते देखा मैंने ।।१।। आनन्दित जागृत...
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11.10.14
स्वप्न-सुन्दरी
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खड़ी कहीं पर दूर , कल्पना के अनन्त विस्तारों में , सुख मदिरा में चूर, नियन्त्रित नहीं मनस उद्गारों में, यौवन से भरपूर ...
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13.8.14
चित्र तुम्हारे
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कभी सजाये बड़े यत्न से , रंग कल्पना के चित्रों में , चित्र तुम्हारे आज स्वयं ही , फीके क्यों पड़ते जाते...
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2.7.14
कल्पना
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उत्कर्षों को छूती इच्छा , मात्र कल्पना का आच्छादन । निष्कर्षों से शून्य धरातल , जाने तुमसे क्या पाना ह...
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26.12.12
कोई हो
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खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे , देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे । काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब, कोई पहचानी, पुरानी आ ...
53 comments:
11.1.12
ऐसी सजनी हो
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आँखों ही आँखों में मन के, भाव समझकर पढ़ जाती हो, हृद की अन्तरतम सीमा में, सहज उतरकर बढ़ जाती हो । भावों में सागर लहरों सी, सतत बहे, मधुम...
99 comments:
20.4.11
पर साथ छोड़ क्यों चली गयी
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विवाह-पूर्व के प्रेमोद्गारों में एक अनकही सी कड़ी सेंसरशिप लगी रहती है। आप कितना भी उन्हें समझा लें कि यह रचना विशुद्ध कल्पनाशीलता का सुन...
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