जीवन में गहराई हो या मात्रा हो, यह प्रश्न सदा ही उठता रहा है। प्रेम के संदर्भों में भी यह प्रश्न उठ खड़ा होता है, विशेषकर तब, जब संवाद चित्रलेखा और सुकन्या के बीच हो रहा हो। चित्रलेखा, एक अप्सरा और सुकन्या, महर्षि च्यवन की सहधर्मिणी। उर्वशी महर्षि च्यवन के आश्रम में अपने पुत्र को जन्म देती है, सुकन्या की देख रेख में। उर्वशी की सखियाँ भी बहुधा वहाँ आती हैं, कभी सहायता करने और कभी उत्सुकतावश, यह देखने कि स्वर्ग और मही के संयोग में किसको कितना भाग मिला है, पुत्र में किसका अंश अधिक है।
आश्रम में चहल पहल रहती है। चित्रलेखा और सुकन्या, दोनों के लिये ही यह पहला अवसर है, एक दूसरे की जीवन पद्धतियों को समझने का। दोनों ही प्रेम में पगी हैं, एक समस्त देवताओं की आकांक्षाओं से प्लावित, एक महर्षि के एकनिष्ठ प्रेम में अनुप्राणित। दोनों के ही जीवन में प्रेम है, पर उसका स्वरूप भिन्न भिन्न है, एक के लिये समन्दर सा, एक के लिये दसियों घट जैसा। दोनों के ही प्रश्न एक दूसरे से सहज हैं, सुकन्या को मात्र एक नर में संतुष्ट रह पाना चित्रलेखा के लिये आश्चर्य है तो चित्रलेखा के प्रेम में गाढ़ेपन की अनुपस्थिति सुकन्या को आश्चर्यचकित करता है।
हम व्यक्ति के रूप में भावों की जिस उड़ान में बने रहना चाहते है, समाज के रूप में उससे कहीं भिन्न और बँधा हुआ सोचने लगते हैं। व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर उठ समाज के स्तर में पहुँचने में कई बंधन स्वीकारने पड़ते हैं। संबंधों में बँधे जाने के भाव सन्निहित हैं, अच्छी प्रकार से बँधने का या ढंग से बँध जाने का। हमें दोनों दिखायी पड़ते हैं, एक ओर अप्सराओं और देवताओं की प्रेमासित उन्मुक्तता और दूसरी ओर ब्रह्मवादियों की संसार को त्याग देने की प्रवृत्ति। विवाह दोनों के बीच का मार्ग है, प्रवृत्ति और निवृत्ति के बीच का मार्ग, नर की अग्नि और कामना वह्नि को अनियन्त्रित न होने देने का प्रयास।
मुक्त समाज की उपस्थिति आधुनिकता की आहट मानी जाती है, पर सदियों से हम परिवार के रूप में रह रहे हैं, मन में प्रेम की उत्कट अभिलाषा और समाज में बन्धनपूर्ण व्यवहार के झूले में झूलते हुये। मध्यममार्ग अपना रखा है, न ही उन्मुक्तता और न ही त्याग। हमने प्रेम के अल्पकालिक उन्माद के ऊपर उसका दीर्घकालिक सौन्दर्य चुना, हमने दसियों घट के स्थान पर एक समन्दर चुना। समाज में मिलकर रहने का यही मार्ग सर्वोत्तम लगा होगा हमारे पूर्वजों को।
सुकन्या का प्रश्न अप्सराओं से बहुत ही सरल था, जब आपके अन्दर एक ही प्राण हैं तो वह इतने पुरुषों को कैसे दे बैठती हैं? यदि इतनों को प्रेम बाँटती हैं तो प्रेम में प्रत्याशा क्या है? यदि प्रेम ही महत्वपूर्ण है तो प्रेमी को इतना न्यून महत्व क्यों? घट घट का स्वाद चखने वालों के लिये किसी एक का महत्व कहाँ? निर्मोही और उत्श्रंखल व्यक्तित्व निर्माण करती है यह सोच, अप्सराओं के प्रति देवताओं के अघट आकर्षण का कारण हो यह सोच, भोग विलास में निशदिन पसरे देवताओं के लिये एक वरदान है यह सोच। न ढलने वाले शरीर, न व्यस्त रहने के लिये कोई कर्म, न संबंधों में बद्ध जीवन, भोग में विविधता और नित नवीनता, पर फिर भी क्या वांछित प्रसन्नता मिल पाती है, इस सोच के पोषकों को। न स्वर्ग को समझ पायें, तो वर्तमान विश्व में कुछ संस्कृतियाँ इस विचारधारा की उपासक हैं। सुकन्या का प्रश्न उनसे भी वही है, एक प्राण का इतना विभाजन क्यों?
किन्तु प्रश्न केवल मात्रा, विविधता या गुणवत्ता का ही नहीं है। अप्सरायें सुकन्या को वह विवशता भी बता सकती हैं जिसके कारण मृत्युलोक में उतनी उत्श्रंखलता नहीं है। विवशता सौन्दर्य के ढल जाने की, विवशता अंगों के शिथिल हो जाने की, विवशता वृद्ध हो जाने की। जीवन का एक चौथाई भाग भले ही शारीरिक आकर्षण में बीत जाये, पर शेष तीन चौथाई का क्या? जब शरीर अपना आकर्षण त्याग देगा, तब आपको किसका आधार मिलेगा? इसे विवशता कह लें या समझदारी पर शरीर के परे भी जाकर सोचना आवश्यक हो जाता है तब। हृदय का आकर्षण तब भी शेष रहता है, उसका आधार जीवनपर्यन्त चलता है। यह भी एक कारण तो रहा ही होगा जो हमें प्रेम के शारीरिक पक्ष से भी आगे जा प्रेम के मानसिक पक्ष पर सोचने को प्रेरित करता है। शरीर ढलने पर आकर्षण भी कम हो जाता है। तो बुढ़ापे में भी प्यार बना रहे, उसके लिये समर्पण होना आवश्यक है। स्थायित्व की आस क्या प्रेम का स्वरूप सीमित कर देती है या प्रेम का विस्तार बढ़ा जाती है? सागर की गहराई या तालों का छिछलापन। दोनों को ही एक स्थायी आधार चाहिये होता है जो वृद्धावस्था तक शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाये रखता है, जीवन को केवल युवावस्था मान बैठना अपरिपक्व सोच है।
सुकन्या कहती है कि तप और त्याग के भूषणों से सुशोभित महर्षि च्यवन ने अपना सर्वस्व उन पर अर्पित कर दिया है, उनका यह एकात्म समर्पण आकर्षण का अनन्त स्रोत है, हृदय से निकले प्रेम का अक्षुण्ण प्रवाह, जिस प्रवाह में उनका जीवन सदा ही आनन्दित रहता है। महर्षि च्यवन ही उनके लिये सब कुछ हैं, उन्हीं से भोग सीखा है, उन्हीं से योग सीखा है, उन्हीं के साथ अध्यात्म में अग्रसर भी हैं। सारा विश्व उनको मान देता है और वह मुझे अपना मान बैठे हैं, इससे अधिक गर्व भरा भाव और क्या हो सकता है भला? इस समर्पण के भाव से हमारा प्रेम पल्लवित होता है, समर्पण से आत्मीयता और गहराती है, प्रेम नवीन बना रहता है। मधुपूर्ण हृदय का प्रेम और भी गहरा होता है, सुख की गुणवत्ता बढ़ती है। तो क्या एक के ही साथ बने रहने से क्या सुख की मात्रा कम हो जाती है? नहीं, जब प्रेम का स्रोत शरीर से हट हृदयारूढ़ हो जाये तो सुख की मात्रा प्रतिपल द्विगुणित होती रहती है।
तो क्या प्रेम की दृष्टि से विवाह की संस्था दोष रहित है? इसमें भी दोष हैं, संबंधों में मोह हो जाता है, तब प्रेमी का बिछड़ना दुखदायी हो जाता है। बच्चों के प्रति वात्सल्य स्थायी रूप से परिवार में समेट लेता है, तब यही मोह अध्यात्म में बाधक होने लगता है। बहुधा ऐसा भी होता है कि हमारी आकाक्षायें प्रेमी की क्षमता के अनुरूप नहीं होती हैं, गुणों में तालमेल नहीं बैठता है। क्या तब भी हम साथ बने रहें और नित पीड़ा का गरल पीते रहें? तालमेल बिठाने के लिये थोड़ा त्याग तो अपेक्षित है, पर पीड़ा और त्याग के अन्तर को समझे बिना समस्या के साथ सदा के लिये बैठ जाने का कोई अर्थ नहीं है। यदि तालमेल नहीं बैठता है तो अलग हो जाना ही श्रेयस्कर है, पर बात अन्ततः दीर्घकालिक संबंधों की पुनः उठेगी। प्रेम का जो भी स्रोत हो, दीर्घकालिक हो।
संततियों की उत्पत्ति समाज के प्रवाह को स्थिरता देती है, संततियाँ न हों तो मृत्युलोक में जीवन समाप्त हो जायेगा। काल के साथ साथ हम रिले रेस दौड़ रहे हैं, उत्तरदायित्व अपनी संततियों को सौंपकर, वही हमारी उपस्थिति बन हमारे संघर्ष के संकेत बने रहते हैं। समाज के इस रूप को बनाये रखने के लिये और उसमें गुणवत्ता बनाये रखने के लिये, यह बहुत आवश्यक है कि उन्हें भी माता पिता का समुचित आश्रय मिले। एक परिवार का स्वरूप बच्चों के विकास के लिये महत्वपूर्ण है। उत्श्रंखल समाजों में बच्चों की मानसिक दुर्दशा बनी रहती है। बच्चों को दोनों का स्पर्श चाहिये, एक की तरह बन सकने के लिये और दूसरे को समझ सकने के लिये। यही स्पर्श उसके समुचित विकास के लिये अमृत है, उसकी उपस्थिति केवल परिवार में ही है। प्रेम की उद्दाम इच्छा समाज के स्थायित्व हेतु विवाह का रूप धर लेती हे, स्वर्गलोक की उत्श्रंखला से कहीं अलग। प्रेम के निष्कर्षों को समाज के संदर्भों में समझना होगा हमें।
गर्भवती उर्वशी को देखकर, उसे तट पर लगी नौका की उपमा देते हैं महर्षि च्वयन।
आश्रम में चहल पहल रहती है। चित्रलेखा और सुकन्या, दोनों के लिये ही यह पहला अवसर है, एक दूसरे की जीवन पद्धतियों को समझने का। दोनों ही प्रेम में पगी हैं, एक समस्त देवताओं की आकांक्षाओं से प्लावित, एक महर्षि के एकनिष्ठ प्रेम में अनुप्राणित। दोनों के ही जीवन में प्रेम है, पर उसका स्वरूप भिन्न भिन्न है, एक के लिये समन्दर सा, एक के लिये दसियों घट जैसा। दोनों के ही प्रश्न एक दूसरे से सहज हैं, सुकन्या को मात्र एक नर में संतुष्ट रह पाना चित्रलेखा के लिये आश्चर्य है तो चित्रलेखा के प्रेम में गाढ़ेपन की अनुपस्थिति सुकन्या को आश्चर्यचकित करता है।
हम व्यक्ति के रूप में भावों की जिस उड़ान में बने रहना चाहते है, समाज के रूप में उससे कहीं भिन्न और बँधा हुआ सोचने लगते हैं। व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर उठ समाज के स्तर में पहुँचने में कई बंधन स्वीकारने पड़ते हैं। संबंधों में बँधे जाने के भाव सन्निहित हैं, अच्छी प्रकार से बँधने का या ढंग से बँध जाने का। हमें दोनों दिखायी पड़ते हैं, एक ओर अप्सराओं और देवताओं की प्रेमासित उन्मुक्तता और दूसरी ओर ब्रह्मवादियों की संसार को त्याग देने की प्रवृत्ति। विवाह दोनों के बीच का मार्ग है, प्रवृत्ति और निवृत्ति के बीच का मार्ग, नर की अग्नि और कामना वह्नि को अनियन्त्रित न होने देने का प्रयास।
मुक्त समाज की उपस्थिति आधुनिकता की आहट मानी जाती है, पर सदियों से हम परिवार के रूप में रह रहे हैं, मन में प्रेम की उत्कट अभिलाषा और समाज में बन्धनपूर्ण व्यवहार के झूले में झूलते हुये। मध्यममार्ग अपना रखा है, न ही उन्मुक्तता और न ही त्याग। हमने प्रेम के अल्पकालिक उन्माद के ऊपर उसका दीर्घकालिक सौन्दर्य चुना, हमने दसियों घट के स्थान पर एक समन्दर चुना। समाज में मिलकर रहने का यही मार्ग सर्वोत्तम लगा होगा हमारे पूर्वजों को।
सुकन्या का प्रश्न अप्सराओं से बहुत ही सरल था, जब आपके अन्दर एक ही प्राण हैं तो वह इतने पुरुषों को कैसे दे बैठती हैं? यदि इतनों को प्रेम बाँटती हैं तो प्रेम में प्रत्याशा क्या है? यदि प्रेम ही महत्वपूर्ण है तो प्रेमी को इतना न्यून महत्व क्यों? घट घट का स्वाद चखने वालों के लिये किसी एक का महत्व कहाँ? निर्मोही और उत्श्रंखल व्यक्तित्व निर्माण करती है यह सोच, अप्सराओं के प्रति देवताओं के अघट आकर्षण का कारण हो यह सोच, भोग विलास में निशदिन पसरे देवताओं के लिये एक वरदान है यह सोच। न ढलने वाले शरीर, न व्यस्त रहने के लिये कोई कर्म, न संबंधों में बद्ध जीवन, भोग में विविधता और नित नवीनता, पर फिर भी क्या वांछित प्रसन्नता मिल पाती है, इस सोच के पोषकों को। न स्वर्ग को समझ पायें, तो वर्तमान विश्व में कुछ संस्कृतियाँ इस विचारधारा की उपासक हैं। सुकन्या का प्रश्न उनसे भी वही है, एक प्राण का इतना विभाजन क्यों?
किन्तु प्रश्न केवल मात्रा, विविधता या गुणवत्ता का ही नहीं है। अप्सरायें सुकन्या को वह विवशता भी बता सकती हैं जिसके कारण मृत्युलोक में उतनी उत्श्रंखलता नहीं है। विवशता सौन्दर्य के ढल जाने की, विवशता अंगों के शिथिल हो जाने की, विवशता वृद्ध हो जाने की। जीवन का एक चौथाई भाग भले ही शारीरिक आकर्षण में बीत जाये, पर शेष तीन चौथाई का क्या? जब शरीर अपना आकर्षण त्याग देगा, तब आपको किसका आधार मिलेगा? इसे विवशता कह लें या समझदारी पर शरीर के परे भी जाकर सोचना आवश्यक हो जाता है तब। हृदय का आकर्षण तब भी शेष रहता है, उसका आधार जीवनपर्यन्त चलता है। यह भी एक कारण तो रहा ही होगा जो हमें प्रेम के शारीरिक पक्ष से भी आगे जा प्रेम के मानसिक पक्ष पर सोचने को प्रेरित करता है। शरीर ढलने पर आकर्षण भी कम हो जाता है। तो बुढ़ापे में भी प्यार बना रहे, उसके लिये समर्पण होना आवश्यक है। स्थायित्व की आस क्या प्रेम का स्वरूप सीमित कर देती है या प्रेम का विस्तार बढ़ा जाती है? सागर की गहराई या तालों का छिछलापन। दोनों को ही एक स्थायी आधार चाहिये होता है जो वृद्धावस्था तक शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाये रखता है, जीवन को केवल युवावस्था मान बैठना अपरिपक्व सोच है।
तो क्या प्रेम की दृष्टि से विवाह की संस्था दोष रहित है? इसमें भी दोष हैं, संबंधों में मोह हो जाता है, तब प्रेमी का बिछड़ना दुखदायी हो जाता है। बच्चों के प्रति वात्सल्य स्थायी रूप से परिवार में समेट लेता है, तब यही मोह अध्यात्म में बाधक होने लगता है। बहुधा ऐसा भी होता है कि हमारी आकाक्षायें प्रेमी की क्षमता के अनुरूप नहीं होती हैं, गुणों में तालमेल नहीं बैठता है। क्या तब भी हम साथ बने रहें और नित पीड़ा का गरल पीते रहें? तालमेल बिठाने के लिये थोड़ा त्याग तो अपेक्षित है, पर पीड़ा और त्याग के अन्तर को समझे बिना समस्या के साथ सदा के लिये बैठ जाने का कोई अर्थ नहीं है। यदि तालमेल नहीं बैठता है तो अलग हो जाना ही श्रेयस्कर है, पर बात अन्ततः दीर्घकालिक संबंधों की पुनः उठेगी। प्रेम का जो भी स्रोत हो, दीर्घकालिक हो।
संततियों की उत्पत्ति समाज के प्रवाह को स्थिरता देती है, संततियाँ न हों तो मृत्युलोक में जीवन समाप्त हो जायेगा। काल के साथ साथ हम रिले रेस दौड़ रहे हैं, उत्तरदायित्व अपनी संततियों को सौंपकर, वही हमारी उपस्थिति बन हमारे संघर्ष के संकेत बने रहते हैं। समाज के इस रूप को बनाये रखने के लिये और उसमें गुणवत्ता बनाये रखने के लिये, यह बहुत आवश्यक है कि उन्हें भी माता पिता का समुचित आश्रय मिले। एक परिवार का स्वरूप बच्चों के विकास के लिये महत्वपूर्ण है। उत्श्रंखल समाजों में बच्चों की मानसिक दुर्दशा बनी रहती है। बच्चों को दोनों का स्पर्श चाहिये, एक की तरह बन सकने के लिये और दूसरे को समझ सकने के लिये। यही स्पर्श उसके समुचित विकास के लिये अमृत है, उसकी उपस्थिति केवल परिवार में ही है। प्रेम की उद्दाम इच्छा समाज के स्थायित्व हेतु विवाह का रूप धर लेती हे, स्वर्गलोक की उत्श्रंखला से कहीं अलग। प्रेम के निष्कर्षों को समाज के संदर्भों में समझना होगा हमें।
गर्भवती उर्वशी को देखकर, उसे तट पर लगी नौका की उपमा देते हैं महर्षि च्वयन।