व्यवहारिक जीवन में अग्नि के कई उपयोग हैं, पर जब यह मानवीय स्वरूप धरती है तब इसके गुण और विशिष्ट हो जाते हैं। शीतमनाओं को यह ऊष्मा देती है, धारक को जलाकर ही उसे तपाती है, यदि अनियन्त्रित हो गयी तो धारक को ही राख कर देती है और सबसे महत्वपूर्ण यह कि, यदि एक बार बुझ गयी तो पुनः जगाने के लिये बहुत यत्न करने पड़ते हैं। अग्नि जगत में क्रियाशीलता का प्रतीक है। जिस सूर्य की ऊर्जा से सारा विश्व चल रहा है, उसके भी उर में अग्नि धधकती रहती है। अग्नि प्रकाश देती है, प्रकाश पथ दिखलाता है, नेतृत्व का प्रतीक है। ध्यान से देखें तो हर जीव में जिजीविषा का आधार अग्नि ही है।
अग्नि को सभ्यताओं के विकास से जोड़ते हुये एक विस्तृत स्वरूप दिया जा सकता है, पर वर्तमान संदर्भ उर्वशी में वर्णित उस अग्नि तक सीमित रखा जायेगा जो एक नर के भीतर धधकती है और नर को एक विशिष्ट प्रकार से व्यवहार करने को विवश करती है, वह अग्नि जो उर्वशी को पुरुरवा के प्रति आकर्षण-पथ पर ले जाती है। एक नर की जीवन यात्रा, इसी अग्नि की यात्रा है। यही अग्नि हमें सतत कर्म करने को उद्धत करती है, शान्त बैठना कठिन हो जाता है तब, एक के बाद दूसरा कर्म, दूसरे के बाद तीसरा कर्म। प्रेम के संदर्भों में अग्नि को समझने के पहले यह समझना आवश्यक था कि नर में अग्नि का मौलिक स्वरूप क्या है? यह अग्नि नारी के भीतर उपस्थित कामना-वह्नि से भिन्न है, वह विषय और भी विशिष्ट है।
तो क्या यह अग्नि एक कर्म के बाद बुझ जाती है, संभवतः नहीं। एक कड़ी सी बनती जाती है, अनवरत असन्तोष, स्वयं से, सृष्टि से। जो भी इसे दो, उसे क्षणभर में राख कर देती है यह अग्नि, इसीलिये पुनः प्यास लग आती है, और प्यास भी ऐसी कि बुझती ही नहीं। कभी तो लगता है कि हम सच्चे सुख को परिभाषित ही नहीं कर पाये हैं, पर उधर तो जो भी जायेगा, वह इस अग्नि में जल जायेगा। मुक्ति का उपाय तब क्या हो, दाह पर दाह या अग्नि की शान्ति। नित नया दाह न केवल विश्व को तपा डालेगा वरन नर को भी तनाव के कगार पर ले जायेगा। वहीं दूसरी ओर अग्नि की शान्ति नर को नर नहीं रहने देगी, आध्यात्मिक कर देगी, देवता बना देगी। तब क्या उपाय है, नर के निर्वाण का, अग्नि के समाधान का?
यही प्रश्न पुरुरवा उठाता है, वह इस अग्नि को यथासंभव व्यक्त करता है, इतनी स्पष्टता से जितना हम नर सोच भी नहीं पाते हैं। उर्वशी उसे देवता नहीं बनने देती है, जानती है कि पुरुरवा के देवता बनने के प्रयास, प्रेम की उस विमा को लील जायेंगे, जो उसे सर्वाधिक प्रिय हैं। पुरुरवा अब इस अग्नि को रखकर क्या करे? वह अपने कण्ठ में उपस्थित तृषा को नहीं समझ पाता है, उस वेदना को नहीं समझ पाता है, उस रहस्यमयी अग्नि को नहीं समझ पाता है, जो न तो शान्त होती है और न ही खुलकर खेलती है। वह उर्वशी से पूछता है कि यह तुम्हारे रूप की अग्नि है या कि मेरे रक्त की अग्नि है, जो मुझे शान्ति से जीने नहीं देती है। इतने बड़े प्रतापी राजा के अन्दर पता नहीं इतनी उद्विग्नता कहाँ से आती है?
यही अग्नि नर में संघर्ष लाती है, एक के बाद एक उपलब्धियाँ, यही अग्नि यश लाती है, प्रताप लाती है, यही जीवन को जीवन बनाती है। संघर्षपूर्ण नर ही नारी को सुहाता है, उसके पसीने के बूँदें ही पुष्प से सम्मान पाती हैं। यही अग्नि द्वन्द्व का आधार भी है, अपरिमित उत्साह देती है तो विक्षोभ में एकान्त को प्रेरित भी करती है, जीत का उन्माद देती है तो हार का अवसाद भी सहना सिखाती है, आक्रोश में निर्मम बनाती है तो शोक में निरीह, प्रेम में अपरिमित डूबना सिखाती है तो डूबकर अतृप्त रहना भी।
ऐसा क्यों है कि मिलन के बाद भी प्रेम अतृप्त रहता है? प्रेम का प्रथम चरण दृष्टिपथ से होकर जाता है, रूप दृष्टि का पेय होता है, पर प्रेम दृष्टि पर ही तो नहीं रुक पाता है, उसे तृप्त होने के लिये रक्त को भी तुष्ट करना पड़ता है। दृष्टि कल्पनालोक का तत्व है, रक्त मृत्युलोक का तत्व है, रक्त शरीर में दौड़ता है, रक्त में अग्नि दौड़ती है। जब तक रक्त की अग्नि शमित नहीं होती है, प्रेम अतृप्त बना रहता है। रक्त बुद्धि से भी अधिक बली है, रक्त बुद्धि से भी अधिक ज्ञानी है, क्योंकि बुद्धि केवल सोचती है जबकि रक्त अनुभव करता है। रक्त का यह अनुभव नर की अग्नि का अनुभव है, यह अग्नि नियन्त्रित रहे तो नर संयत बना रहता है।
रक्त की अग्नि को जब तक शान्त नहीं किया जाता है तब तक नर हिलोर लेता है। वह उत्साह में जितना उमड़ता है, जितना अग्निमय होता है, निरुत्साह में उतना ही निश्चेष्ट हो जाता है। वह अपने में ही सिमट जाना चाहता है, पर अन्दर तो अग्नि है, अन्दर तो अहम है। तब उसे माँ की गोद याद आती है या पत्नी का आलिंगन।
प्रेम में यदि यह अग्नि पूरी तृप्त न हो तो पुनः जग जाती है, उसे पूरी तरह से शमित करने के प्रयास में नर स्वयं को और पहचानता है, अपने अन्दर एक और नर ढूढ़ता है। अग्नि के न बुझने का कारण समझता है, साथ में यह भी समझता है कि नारी ही उसे पूर्णतया शमित कर सकती है, दृष्टिमय रूपमय नारी नहीं, एक और ही नारी, जिसे वह उस नारी के भीतर ढूढ़ता है। उर्वशी यह जानती है कि पुरुरवा की अग्नि उसके ही अधिकार क्षेत्र का विषय है। उर्वशी यह भी जानती है कि उसे न केवल पुरुरवा की अग्नि नियन्त्रित करनी होगी, वरन उसे एक सृजनात्मक दिशा भी देनी होगी। उसके उर पर सर धरे निश्चेष्ट पुरुरवा अपनी अग्निमयता भुला सो जाना चाहता है, कपाल में खेलती अग्नि को भला इससे शीतल आश्रय कहाँ मिल सकता है?
नर की अतृप्त इच्छाओं का ताण्डव नित परिलक्षित है। आत्मज्ञान जब सहज उपलब्ध नहीं हो, निवृत्ति मार्ग दुरुह हो, विश्व हेतु कर्मशील बने रहना विवशता हो, तो कौन शमित करेगा नर के भीतर की अग्नि, सृष्टिचक्र की इस नितान्त आवश्यकता का भार कौन वहन करेगा? कौन सा मार्ग है तब? क्या उपाय है तब? उर्वशी तो पुरुरवा पर एक उपकार हुयी तब।
अग्नि को सभ्यताओं के विकास से जोड़ते हुये एक विस्तृत स्वरूप दिया जा सकता है, पर वर्तमान संदर्भ उर्वशी में वर्णित उस अग्नि तक सीमित रखा जायेगा जो एक नर के भीतर धधकती है और नर को एक विशिष्ट प्रकार से व्यवहार करने को विवश करती है, वह अग्नि जो उर्वशी को पुरुरवा के प्रति आकर्षण-पथ पर ले जाती है। एक नर की जीवन यात्रा, इसी अग्नि की यात्रा है। यही अग्नि हमें सतत कर्म करने को उद्धत करती है, शान्त बैठना कठिन हो जाता है तब, एक के बाद दूसरा कर्म, दूसरे के बाद तीसरा कर्म। प्रेम के संदर्भों में अग्नि को समझने के पहले यह समझना आवश्यक था कि नर में अग्नि का मौलिक स्वरूप क्या है? यह अग्नि नारी के भीतर उपस्थित कामना-वह्नि से भिन्न है, वह विषय और भी विशिष्ट है।
तो क्या यह अग्नि एक कर्म के बाद बुझ जाती है, संभवतः नहीं। एक कड़ी सी बनती जाती है, अनवरत असन्तोष, स्वयं से, सृष्टि से। जो भी इसे दो, उसे क्षणभर में राख कर देती है यह अग्नि, इसीलिये पुनः प्यास लग आती है, और प्यास भी ऐसी कि बुझती ही नहीं। कभी तो लगता है कि हम सच्चे सुख को परिभाषित ही नहीं कर पाये हैं, पर उधर तो जो भी जायेगा, वह इस अग्नि में जल जायेगा। मुक्ति का उपाय तब क्या हो, दाह पर दाह या अग्नि की शान्ति। नित नया दाह न केवल विश्व को तपा डालेगा वरन नर को भी तनाव के कगार पर ले जायेगा। वहीं दूसरी ओर अग्नि की शान्ति नर को नर नहीं रहने देगी, आध्यात्मिक कर देगी, देवता बना देगी। तब क्या उपाय है, नर के निर्वाण का, अग्नि के समाधान का?
यही प्रश्न पुरुरवा उठाता है, वह इस अग्नि को यथासंभव व्यक्त करता है, इतनी स्पष्टता से जितना हम नर सोच भी नहीं पाते हैं। उर्वशी उसे देवता नहीं बनने देती है, जानती है कि पुरुरवा के देवता बनने के प्रयास, प्रेम की उस विमा को लील जायेंगे, जो उसे सर्वाधिक प्रिय हैं। पुरुरवा अब इस अग्नि को रखकर क्या करे? वह अपने कण्ठ में उपस्थित तृषा को नहीं समझ पाता है, उस वेदना को नहीं समझ पाता है, उस रहस्यमयी अग्नि को नहीं समझ पाता है, जो न तो शान्त होती है और न ही खुलकर खेलती है। वह उर्वशी से पूछता है कि यह तुम्हारे रूप की अग्नि है या कि मेरे रक्त की अग्नि है, जो मुझे शान्ति से जीने नहीं देती है। इतने बड़े प्रतापी राजा के अन्दर पता नहीं इतनी उद्विग्नता कहाँ से आती है?
ऐसा क्यों है कि मिलन के बाद भी प्रेम अतृप्त रहता है? प्रेम का प्रथम चरण दृष्टिपथ से होकर जाता है, रूप दृष्टि का पेय होता है, पर प्रेम दृष्टि पर ही तो नहीं रुक पाता है, उसे तृप्त होने के लिये रक्त को भी तुष्ट करना पड़ता है। दृष्टि कल्पनालोक का तत्व है, रक्त मृत्युलोक का तत्व है, रक्त शरीर में दौड़ता है, रक्त में अग्नि दौड़ती है। जब तक रक्त की अग्नि शमित नहीं होती है, प्रेम अतृप्त बना रहता है। रक्त बुद्धि से भी अधिक बली है, रक्त बुद्धि से भी अधिक ज्ञानी है, क्योंकि बुद्धि केवल सोचती है जबकि रक्त अनुभव करता है। रक्त का यह अनुभव नर की अग्नि का अनुभव है, यह अग्नि नियन्त्रित रहे तो नर संयत बना रहता है।
रक्त की अग्नि को जब तक शान्त नहीं किया जाता है तब तक नर हिलोर लेता है। वह उत्साह में जितना उमड़ता है, जितना अग्निमय होता है, निरुत्साह में उतना ही निश्चेष्ट हो जाता है। वह अपने में ही सिमट जाना चाहता है, पर अन्दर तो अग्नि है, अन्दर तो अहम है। तब उसे माँ की गोद याद आती है या पत्नी का आलिंगन।
प्रेम में यदि यह अग्नि पूरी तृप्त न हो तो पुनः जग जाती है, उसे पूरी तरह से शमित करने के प्रयास में नर स्वयं को और पहचानता है, अपने अन्दर एक और नर ढूढ़ता है। अग्नि के न बुझने का कारण समझता है, साथ में यह भी समझता है कि नारी ही उसे पूर्णतया शमित कर सकती है, दृष्टिमय रूपमय नारी नहीं, एक और ही नारी, जिसे वह उस नारी के भीतर ढूढ़ता है। उर्वशी यह जानती है कि पुरुरवा की अग्नि उसके ही अधिकार क्षेत्र का विषय है। उर्वशी यह भी जानती है कि उसे न केवल पुरुरवा की अग्नि नियन्त्रित करनी होगी, वरन उसे एक सृजनात्मक दिशा भी देनी होगी। उसके उर पर सर धरे निश्चेष्ट पुरुरवा अपनी अग्निमयता भुला सो जाना चाहता है, कपाल में खेलती अग्नि को भला इससे शीतल आश्रय कहाँ मिल सकता है?
नर की अतृप्त इच्छाओं का ताण्डव नित परिलक्षित है। आत्मज्ञान जब सहज उपलब्ध नहीं हो, निवृत्ति मार्ग दुरुह हो, विश्व हेतु कर्मशील बने रहना विवशता हो, तो कौन शमित करेगा नर के भीतर की अग्नि, सृष्टिचक्र की इस नितान्त आवश्यकता का भार कौन वहन करेगा? कौन सा मार्ग है तब? क्या उपाय है तब? उर्वशी तो पुरुरवा पर एक उपकार हुयी तब।