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15.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १७

अष्टांग योग चित्त की स्थिर करने के उद्देश्य से हर संभव प्रकार से उसे साधने का प्रयत्न करता है। चित्त की वृत्ति अनेक हैं, अनन्त वर्षों के कर्म और उनके संस्कार संचित हैं। पंच क्लेश है, बिना उन क्लेशों के निवारण के संस्कारों का बनना बन्द नहीं होता है। इतने महत्कर्म को समग्रता और सम्पूर्णता से निर्वाह करना सरल कार्य नहीं है, हर संभव प्रकार से प्रयत्न करना होता है। प्रयास की भिन्नता अन्ततः उद्देश्य की एकाग्रता में समाहित हो जाती है। 

तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान को पतंजलि ने क्रियायोग से भी परिभाषित किया है। इन कर्तव्यों का मुख्य कार्य पंच क्लेशों को क्षीण करना है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश पंच क्लेश हैं, इनकी विस्तृत व्याख्या अन्य अंकों में पर यहाँ यही समझना पर्याप्त होगा कि बिना इन्हें क्षीण किये योग में बढ़ना असंभव है। 

तप है, द्वन्द्व को सहन करना। द्वन्द्व प्रकृति का मूल गुण है, जब प्रकृति नहीं होगी या प्रकृति प्रकट हो रही होगी, उस समय सब शून्य ही होगा, अपरिभाषित ही होगा, अव्यक्त ही होगा। फिर प्रकट हुआ, कुछ धनात्मक, कुछ ऋणात्मक, सुख-दुख, शीत-ऊष्ण, रात-दिन, लाभ-हानि, मान-अपमान। हमें स्रोत तक जाना है तो मध्य से जाना पड़ेगा, साम्य से होकर जाना होगा। तभी श्रीकृष्ण ने गीता में समेकृत्वा के भाव को उद्भाषित करने के लिये कहा है। समत्वं योग उच्यते। जब तक द्वन्द्व को सहन नहीं करेंगे, समत्व को प्राप्त नहीं करेंगे। दुख को सहन करना और साथ ही साथ सुख को भी सहन करना। सुख में मर्यादा न खोना और दुख में विश्वास न खोना। जो द्वन्द्व को सहन करना जानते हैं, जो द्वन्द्व को समझने लगते हैं, वे जानते हैं कि ये चक्रीय हैं, सबके जीवन में आते हैं, दिन रात की तरह, शीत ऊष्ण की तरह।

सोने में निखार लाने के लिये, उसे शुद्ध करने के लिये तपाना पड़ता है। तपाने से आन्तरिक अशुद्धियाँ पिघलकर बाहर आ जाती है। तप भी यही करता है। जब भी हम विपरीत स्थिति में जाते हैं, हम तपते हैं। तप क्षमतानुसार ही हो, धीरे धीरे, उत्तरोत्तर, क्रमशः। तप इतना भी न कर दें कि चित्त विचलित हो जाये, स्वास्थ्य बिगड़ जाये। तब तो उद्देश्य ही परास्त हो जायेगा। योगियों के लिये द्वन्द्व साधना भी है और साधना का मापन भी है। कौन कितना सह सकता है, वह उतना बड़ा योगी है। योग में रमे को द्वन्द्व सताना बन्द कर देते हैं।

स्वाध्याय का अर्थ है, मोक्षशास्त्रों का अध्ययन या प्रणव का जप। वेद, उपनिषद इत्यादि। स्व का अध्ययन करना, अपने को केन्द्रित रख कर चलना पड़ेगा। यह स्वार्थ नहीं है। अपने बारे में अध्ययन जिज्ञासा के उन ३५० प्रश्नों का उत्तर पाना है जिससे उपनिषद भरे पड़े हैं। स्वाध्याय अकेले कार्य नहीं करता है, साधक जैसे जैसे योग में आगे बढ़ता है, उसे वेदों और उपनिषदों के गूढ़ वाक्यों का अर्थ समझ आने लगता है।

ईश्वरप्रणिधान का अर्थ है, परमगुरु में अपने सारे कर्मों का अर्पण करना। कर्म महत्वपूर्ण हैं पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि उन्हें किस भाव से किया जा रहा है। ईश्वर के शब्दरूप प्रणव का जप तो स्वाध्याय में आ ही गया है। जब ईश्वर को केन्द्रबिन्दु में रखकर कार्य किये जाते हैं, व्यक्ति स्वस्थ रहेगा, अपने में स्थित, परमात्मा के साथ स्थित, परमात्मनिष्ठ। वितर्कों के जाल को क्षीण करता हुआ (यमों के विपरीत जो भाव है, वह वितर्क हैं), संसार के बीज के क्षय को देखता हुआ। ऐसा व्यक्ति नित्यमुक्त होता है। यही ईश्वरप्रणिधान है। इससे प्रत्यक् चेतनाधिगम एवं अन्तराय समूह का अभाव होता है, विघ्न नष्ट होते हैं। ईश्वर को समर्पण करने से अकर्ता का भाव आयेगा, निष्काम कर्म हो जायेगा क्योंकि फल की इच्छा ही नहीं रहेगी। इसे यम नियम के अन्त में रखा गया है, यदि यह सम्हल गया तो सब सम्हल जाता है। ईश्वर अपने संकल्प मात्र से उसको समाधि प्राप्त करा देते हैं, यह ईश्वर की कृपा पर आधारित है।

दो प्रकार के लोग होते हैं। कुछ तपपूर्वक योग करते हैं, प्रयत्नपूर्वक करते हैं, व्रत अधिक करते हैं, उनमें यम की अधिकता है। कुछ सहज भाव से करते हैं पर ईश्वर के प्रति श्रद्धा बनाये रखते हैं, शरीर को अकारण कष्ट नहीं देते हैं, प्रवृत्ति और स्वभाव के अनुसार करते हैं। दोनों ही स्वीकार्य है। योग में कोई सहाय्य हो तो उसमें तो आनन्द का भाव आना चाहिये, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव आना चाहिये, अभिमान त्यागकर। वेद में कहा गया है, कर्म के आरम्भ में, मध्य में और अन्त में ईश्वर की प्रार्थना और ध्यान करना चाहिये। ईश्वर प्रणिधान भी प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है, पूर्ण पुरुषार्थ के साथ ही ईश्वर प्रार्थना, आगत विघ्नों को नाश करने के लिये।

पतंजलि कहते हैं कि हिंसा आदि भाव मन में आये तो प्रतिपक्ष की भावना देखनी चाहिये। किसी अपकारी के प्रति नकारात्मक भाव आये, हनन करना, असत्य बात करना, इसकी वस्तु लेना, दारा के साथ व्यभिचार करना आदि का भाव आता है, पाँचों यमो के विपरीत कर्म का भाव। इसकी प्रतिपक्ष की भावना है कि इतने श्रम से तो योग की राह में चल पा रहा हूँ, तब यह कैसे कुत्तों जैसा कार्य कर रहा हूँ। मनुस्मृति में कहा है, जब मनुष्य अपने अधर्म की निन्दा करने लगे, हानि देखने लगे तो वह अपने आप छूट जाता है। उस आचरण से होने वाली हानि को देखना प्रतिपक्षभाव है। हिंसा, अनृत, स्तेय आदि वितर्क कृत, कारित और अनुमोदित, क्रोध, लोभ तथा मोहपूर्वक आचरित तथा मृदु, मध्य और अधिमात्र होते हैं। वे अनन्त दुख और अनन्त अज्ञान के कारण हैं। यही प्रतिपक्षभावन है।


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12.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १६

हमारे पूर्वजों को मनुष्य का अस्तित्व, उसका समाज में स्थान, जीवन का उद्देश्य आदि सभी विषयों का वैज्ञानिक ज्ञान था। बहुतों को लगता होगा कि वेद, उपनिषद आदि उपदेश मात्र हैं और इनका वैज्ञानिक आधार नहीं है। एक व्याख्यान सुन रहा था जिसमें बताया गया है कि उपनिषदों में लगभग ३५० प्रश्न हैं। इन सबका प्रमुख उद्देश्य स्वयं को जानने का है। प्रश्नपंक्ति की दिशा स्पष्ट है, सृष्टि का प्रारम्भ ही जिज्ञासा से हुआ, ब्रह्मा को ज्ञात ही नहीं था कि वह कौन हैं, कहाँ पर हैं और किसलिये हैं आये हैं? वेद का अर्थ ही जानना है, विद् धातु से आया है यह शब्द। जिज्ञासा का शमन है वेद का प्राकट्यीकरण। एक बार स्वयं को हर प्रकार से जान लिया तब यह निष्कर्ष निकालना अत्यन्त सरल हो जाता है कि हमसे क्या अपेक्षित है और वह क्यों अपेक्षित है? योग एक निष्कर्ष ग्रन्थ है, एक प्रक्रिया का निष्कर्ष जो आपको आप तक ले जायेगी, आपको स्वरूप तक ले जायेगी। उस यात्रा के लिये जिस अष्टांग योग का निरूपण किया गया है, उसका एक एक अंग और उपांग अपने अन्दर एक सामर्थ्य समाये है, अकेले ही गंतव्य तक ले जाने की।

सन्तोष एक अद्भुत गुण है। एक  दृष्टान्त के द्वारा, एक शास्त्रोक्ति के द्वारा इसकी महत्ता को वर्णित किया गया है। “ जैसे काँटे से बचने के लिये समस्त भूतल को चमड़े से नहीं ढका जा सकता किन्तु जूते पहने जा सकते हैं, ठीक वैसे ही ‘समस्त काम्य विषय पाकर सुखी होऊँ’ ऐसी इच्छा से सुख नहीं हो सकता, पर सन्तोष के द्वारा हो सकता है”। ययाति ने कहा है, कामना उपभोग से शमित नहीं होती है वरन हविषा डालने से अग्नि की तरह और बढ़ती है। तभी तो कहा गया है, सन्तोष एव पुरुषस्य परम निधानम्। जिसके पास सन्तोष है, उसके पास सब कुछ है। “चाह गयी चिन्ता गयी, मनवा बेपरवाह, जिनको कुछ नहीं चाहिये, वे शाहं के शाह”। जगत की आपाधापी से परे एक अद्भुत सी शान्ति है इस गुण को हर पल जीने वालों में, इस गुण को सिद्ध करने वालों में।

सन्तोष को व्यास अत्यन्त सरल शब्दों में व्याख्यायित करते हैं। सन्निहित साधन से अधिक की अनुपादित्सा। सन्निहित का अर्थ है, सब प्रकार से व्यवस्थित हित। जितने साधन आवश्यक हैं या उपस्थित हैं। अनुपादित्सा का अर्थ है, प्राप्त न करने की इच्छा। जितने साधन जीवन में उपस्थित हैं उससे अधिक प्राप्त न करने की इच्छा। जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है। कहना सरल है, करना कठिन। हमारे प्रयत्न होते हैं कुछ पाने के लिये। जितना प्रयास था, जितना अभीप्सित था, यदि उतना नहीं मिल पाता है तो कुछ अधूरा सा लगता है। अब दो विकल्प हैं, जितना मिल गया है, उसमें तुष्ट रहें, उपयोग करें या जो नहीं मिला उस पर दुखी होयें, असन्तुष्ट रहें। पहला विकल्प तो रखना ही है, पर दूसरे विकल्प को तनिक परिवर्धित करना होगा। बहुधा फल हमारे हाथ में नहीं होते है, कई कारक हैं सफलता के। ज्ञान की अल्पता, कर्म की न्यूनता, कर्ता की योग्यता, फल की अपरिपक्वता, प्रारब्ध की प्रतीक्षा या विधि का अन्य विधान। कई कारण हो सकते हैं, तो उसमें क्षोभ क्यों होना, दुखी क्यों होना। कर्म पुनः होंगे, प्रयास गुरुतर होंगे, फल तो मिलेगा ही, उत्साह और धैर्य, अदम्य उत्साह और अनन्त धैर्य।

तात्कालिकता के कारण हमें न पाने का दुख बहुत बड़ा लगने लगता है। कुछ वर्षों बाद बहुधा वही घटना एक मनोरंजक स्मृति बन जाती है। यदि इस अनुभव से कुछ ग्रहण करना हो तो कल्पनाशीलता को भविष्य में ले जाकर वर्तमान के बारे में सोचें, तात्कालिकता प्लावित दुख उतर जायेगा। सोचें कि आज से ५ वर्ष बाद इस घटना का क्या मोल? सोचें कि पारिवारिक और सामाजिक जुड़ाव में, वृहद परिप्रेक्ष्य में व्यक्तिगत न्यूनताओं का क्या मोल? सोचें कि इतने बड़े विश्व में एक घटना, सिन्धु में बिन्दु सी। संकुचित मन विस्तार पाते ही सहज होने लगता है। औदार्य और आर्जवता, ये दो परिप्रेक्ष्य सदा ही सहायक हैं। औदार्य घटना को बड़े परिप्रेक्ष्य में रखने के लिये। आर्जवता स्वयं को सरलता और सहजता में रखने के लिये। यदि अपने आप को सरल कर ले तो शंकर सम कैसा भी गरल भी पी जायेंगे।    

हम सबको बहुधा लगता है कि हमारी योग्यता के अनुसार हमें फल नहीं मिले, हमारी क्षमता के अनुसार हमें पद नहीं मिले, यदि हम रहते तो कहीं अच्छा करते, जितना हमने दिया उतना नहीं मिला। परिप्रेक्ष्य पुनः बदलें। जितना प्राप्त है, पर्याप्त है। औदार्य और आर्जवता। जो है, उसमें सुखी रहें, जो नहीं है, वह नहीं है, उसमें दुखी क्यों होना? यदि किसी को देखकर असन्तोष की भावना आती है तो अन्य को देखकर संतोष का भी भाव उठे। तुलना से बहुत हानि होती है, यदि हम ऊपर देखते हैं, यदि नीचे देखते हुये चलें तो मन करूणा से भर जाता है, आभार से भर जाता है।

असन्तोष की भावना ही आपको और करने को प्रेरित करती है। वह बस प्रेरित करे, दुखी न करे। उत्साह भरे, नैराश्य न बने। वहीं दूसरी ओर सन्तोष का भाव भी अकर्मण्यता को प्रेरित न करे। प्रयत्नशीलता तो बनी रहे, आलस्य और संतोष में प्रयत्नों का अंतर है। एक कर्म न करने दे तो दूसरी कर्मफल न मिलने पर भी न थकने दे।

अस्तेय, अपरिग्रह और संतोष में क्रमिक विकास की स्पष्ट झलक है पर सूक्ष्म भिन्नता भी है। अस्तेय अधिकार से अधिक न पाने की इच्छा है। अपरिग्रह आवश्यकता से अधिक न पाने की इच्छा है। संतोष फल से अधिक न पाने की इच्छा है। अधिकार, आवश्यकता और फल के अन्तर को क्रमशः विकसित करता है इनका आचरण, एक दूसरे को प्रेरित और पोषित करता हुआ। अधिकार से फल की यह समझ श्रीकृष्ण की प्रख्यात घोषणा में भी बसती है, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (कर्म में आपका अधिकार है, फल में नहीं।)

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8.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १५

अष्टांग योग मन की बाहर से अन्दर की ओर की यात्रा है, बाह्य विषयों से अन्तःस्वरूप तक की व्यवस्थित विकास प्रक्रिया। यम के द्वारा सामाजिक उद्वेलन को मंद करते हुये नियम के द्वारा मन को पुनः न उद्धत होने देना, आसन के द्वारा शरीर की अन्य इन्द्रियों की स्थिरता, प्राणायाम द्वारा प्राण पर नियन्त्रण, प्रत्याहार में कूर्मरूप हो इन्द्रियों को विषयों से खींच लेना, ये पाँच एक आवश्यक और दृढ़ आधार निर्मित कर देते हैं। तत्पश्चात स्थूल से सूक्ष्म विषयों पर संयम (धारणा, ध्यान और समाधि) के द्वारा चित्त की वृत्तियों का क्रमशः संकुचन और निरोध। प्रारम्भ में संयम क्षणिक और क्षीण होता है, अभ्यास से अवधि और गहराई बढ़ती जाती है, समाधिस्थ होने तक। जैसा पहले भी कहा है कि अगले चरण में जाने के लिये पूर्वचरण पूर्णतया सिद्ध करने की बाध्यता नहीं है। कई चरणों को एक साथ साधा जा सकता है, ये एक दूसरे को प्रेरित और पोषित करते रहते हैं।

नियम ५ हैं, शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान। नियमों के द्वारा व्यक्तिगत अनुशासन, सदाचार, चारित्रिक उन्नयन और अन्ततः जीवन नियमन होता है। नियमयन्ति प्रेरयन्तीति नियमाः। नियम के लिये प्रवृत्ति करनी होती है, प्रयत्न करना होता है। यम में निवृत्ति थी, निषेध था। जहाँ प्रवृत्ति और प्रक्रिया होती है, समय देना होता है, अनुशासन लाना पड़ता है, दिनचर्या में जोड़ना पड़ता है। ऐसे कार्य करने पड़ते हैं जिससे नियम पोषित हों। कोई भी भाव आने पर या कार्य में उद्धत होने पर यह सोचना होता है कि नियमों के पालन करने पर हमारा व्यवहार कैसा होगा?

पहला नियम है, शौच, अर्थ है शुद्धि, पवित्रता। यह वाह्य और अन्तः, दो प्रकार की होती है। मिट्टी, जल से प्रक्षालन के द्वारा की गयी शुद्धि वाह्य शुद्धि है। पहले साबुन इत्यादि का प्रयोग नहीं था, मिट्टी से ही हाथ धोना, स्नानादि किया जाता था। आज भी कई प्रकार की मिट्टी त्वचा और केशों के लिये अत्यन्त लाभदायी मानी जाती है। जल वाह्य मल को अपने साथ बहा ले जाता है। पानी पावनकारी है, पवन और पावक के समान।

मन के स्तर पर भी शौच महत्वपूर्ण है। मेधा के लिये हितकर वस्तुओं को ग्रहण करना भी शौच है। इस नियम के अन्तर्गत मादक पदार्थों का निषेध किया है, मेधा के लिये अहितकर होने के कारण। मादक पदार्थों से बुद्धि शिथिल हो जाती है, चित्त मलिन हो जाता है, चित्त स्थिर नहीं रहता है, कर्मण्यता से शून्य हो जाता है। इस स्थिति में शुभ अशुभ का विचार नहीं रहता है, विवेकशून्य हो जाता है। योग में चित्त को वशीकृत करना होता है, मादक पदार्थ उसे वशीकृत नहीं होने देते हैं, अतः वे योग के शत्रु हैं। आयुर्वेद के प्रणेता चरक भी कहते हैं, “परलोक और इहलोक में जो भी हितकर और परमश्रेयः है, वे सब देही को मन की समाधि के द्वारा प्राप्त होते हैं। परन्तु मद्य से मन में अत्यन्त संक्षोभ हो जाता है। मद्य से जो अंध है तथा मद्य में जिनकी लालसा है, वे श्रेयः से विमुख होते हैं।”

ईश्वर को न मानने वाले संप्रदाय पाँचवे नियम ईश्वरप्रणिधान को नहीं मानते हैं। उसके स्थान पर वे मादक पदार्थों के सेवन के निषेध को नियम मानते हैं। यद्यपि पतंजलि ने इसे शौच में लिया है, इसका आध्यात्मिक महत्व सबने स्वीकार किया है.

आन्तरिक शौच चित्त के मल का आक्षालन है, मद, मान, असूय आदि का आक्षालन। इन चित्त विकारों के कारण व्यक्ति का आचरण विपरीत हो जाता है जो समाज के लिये अहितकर होता है। शौच के पालन में अत्यधिक सनक ठीक नहीं होती है। स्वास्थ्य सही रहे और सामने वाले को आपकी उपस्थिति अरुचिकर न लगे। बार बार वस्त्र बदलना, बार बार स्नान, कहीं कीटाणु न लग जायें उसके लिये किसी को स्पर्श न करना। ये सब सनक ही कहलायेगी और सामाजिक अप्रियता को बढ़ायेगी।

प्रकृति में स्वयं को शुद्ध रखने का अभूतपूर्व गुण हैं। प्रकृति का संतुलन ठीक रहे तो प्रकृति शुद्धता बनाये रहेगी। परिवेश स्वच्छ रहे, नदियाँ, झील, वायुमण्डल शुद्ध रहे, तन शुद्ध रहे, मन शुद्ध रहे। स्वच्छता के प्रति दृढ़ आग्रह हमारा सामाजिक दायित्व है। पर्यावरण को अशुद्ध रखने में जीवमात्र की हानि है। हमारे कार्य कहीं ऐसे न हों जो पर्यावरण को हानि पहुँचायें तो यह भी हिंसा होगी, आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिये घातक, आपके अपनों के स्वास्थ्य के लिये घातक। यह हमारा सौभाग्य है कि महान प्रयास इस दिशा में फलीभूत हो रहे हैं, विकास का भारतीय परिप्रेक्ष्य विश्वपटल पर अपना स्थान पा रहा है। संसाधनों का उतना ही संदोहन हो जिससे वे पुनः पनप सकें, पुनः उठ खड़े हो सकें। यदि प्रकृति पर अतिशय अत्याचार होगा तो प्रकृति अपने पावन करने वालों तत्वों से वंचित रह जायेगी और सब कुछ धरा का धरा रह जायेगा। असंतुलन फैलेगा, रोग फैलेंगे, सामाजिक त्रास फैलेगा।

जब हम निद्रा में होते हैं, हमारा शरीर स्वाभाविक रूप से सारे तन्त्रों को शुद्ध करता रहता है। मस्तिष्क से लेकर पाचनतन्त्र तक, कोशिका से लेकर रक्त तक सभी अपना अतिरिक्त पदार्थ मल के रूप में त्याग देते हैं। शौच बनाये रखने के लिये आवश्यक है कि हमारी निद्रा गाढ़ी हो, पूरी हो। अच्छी नींद के पश्चात एक ऊर्जान्वित दिन का प्रारम्भ होता है, नित्यकर्म करने के उपरान्त। यही शौच का प्रभाव है। शौच शरीर, मन, मस्तिष्क में एक स्फूर्ति लाती है। जीवन जीने के लिये सभी अंग मल उत्सर्जित करते हैं। उनकी शुद्धि हमें पुनः एक नयी ऊर्जा के साथ जीवन में उद्धत करती है। पतंजलि कहते हैं, शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः।२.४०। शौच की सिद्धि होने से अपने शरीर के प्रति जुगुप्सा और पर के साथ असंसर्ग का भाव आता है।

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17.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ९

यम और नियम कुल दस गुण हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यम कहलाते हैं। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान नियम हैं। यम निषेधपरक हैं, नियम विधिपरक। यम में हम अपनी उन प्रवृत्तियों को रोकते हैं जो हमें अस्थिर करती हैं। हम एक स्तर ऊपर उठ जाते हैं, संभवतः इसलिये कि बात आगे न बढ़े, अस्थिरता न बढ़े। नियम में हम उन गुणों को विकसित करते हैं जिससे हमें यम स्थिर रखने हेतु कुछ और मानसिक बल मिलता है। नियम से यम और भी नियमित हो जाते हैं।

मन साधने के लिये यह आवश्यक है कि शरीर सधे, परिवार सधे, समाज सधे। यदि ऐसा नहीं होगा तो मन वहीं लगा रहेगा। यदि समाज स्थिर नहीं रहेगा तो मन कैसे स्थिर रहेगा। इनको साधते साधते पर हम इतना खो जाते हैं कि मन साधने का प्रारम्भिक लक्ष्य भूल जाते हैं, नये पथ में रथ बढ़ा देते हैं। परिवार और समाज संबंधों का विस्तृत आकाश है, उसमें यदि सब मनमानी पर उतर आयेंगे तो अव्यवस्था पसर जायेगी। सुचारु व्यवस्था हेतु न्यूनतम आवश्यकतायें तो हमें माननी ही होंगी। सहजीवन के धर्म मानने होंगे।

धर्म वर्तमान का संभवतः सर्वाधिक शापित शब्द है, कोई इसका अर्थ समझना ही नहीं चाहता। इस शब्द को बहुधा कठघरे में उन शब्दों के साथ खड़ा कर दिया जाता है जिन पर हम अपनी दुर्गति और अवनति के आरोप थोपते आये होते हैं। संस्कृत की धृज् धातु से धर्म शब्द बना है, अर्थ है धारण करना। धार्यते इति धर्मः। जो समाज को धारण करे, आधार दे, स्थिरता दे, आश्रय दे, वह धर्म है। धर्म जोड़ने का कार्य करता है, तोड़ने का नहीं। धर्म की गति न्यायवत है, अन्यायवत नहीं। 

मित्र से बात हो रही थी। धर्म के नाम पर प्रचलित कई कुरीतियाँ, रूढ़ियाँ, और विक्षेपों से वह आहत हो जाते हैं। यह सब होते हुये धर्म को किस प्रकार समझा जाये, स्वीकार किया जाये। क्या माना जाये, क्या न माना जाये। धर्म के विषय में अपना दिशायन्त्र तब क्या हो भला? पशोपेश है कि संस्कृति की धरोहर न छोड़ते बनती है और न ही सहर्ष स्वीकार हो पाती है। 

जब डोर उलझ जाये तो सिरे ढूढ़ने होते हैं। मूल समझने से विकार का आकार और प्रकार सब समझ आ जाता है। क्या धर्म है और क्या नहीं, इस विषय पर सदा मनु द्वारा बताये धर्म के लक्षणों को ही स्मरण करने से भ्रम अवगलित हो जाता है। 

मनु धर्म के दस लक्षण बताते हैं। दशकम् धर्म लक्षणम् - धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्यम्, और अक्रोध। यदि कोई विचार, कृत्य, व्यक्ति आदि इन लक्षणों के विपरीत वर्ताव करता है तो वह धर्मसम्मत नहीं है। कर्मकाण्ड और पद्धतियाँ धर्म के लिङ्ग या चिन्ह तो हो सकते हैं पर मूल यही दस लक्षण ही होंगे। इससे स्पष्ट कोई और प्रमाण या परीक्षा हो ही नहीं सकती। यही नैतिकता भी है, वह जो आगे ले जाये। ‘नी’ धातु ‘ले जाने’ के अर्थ में आती है, नेता, नायक, नौका आदि।

ध्यान से देखे तो यम और नियम में वर्णित दस गुण और मनु द्वारा नियत धर्म के दस लक्षण लगभग एक ही हैं। अर्थ स्पष्ट है, यम और नियम का पालन सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक स्थायित्व देता है। संभवतः योग पथ में बढ़ने के लिये इससे सशक्त आधार और कुछ हो भी नहीं सकता है। 

यम यदि वाह्य साम्य स्थापित करता है तो नियम आन्तरिक साम्य। यम और नियम का क्रम अत्यन्त महत्वपूर्ण है, हम बाहर से अन्दर की ओर बढ़ रहे हैं। आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से हम और भी अन्दर तक जाते जायेंगे। अन्दर जानना आवश्यक है योग के लिये। जिसको जानना है, उसी के माध्यम से जानना है। मन को जानना है, मन के माध्यम से जानना। योग यही है, कठिन इसीलिये है, समय इसीलिये लगता है, इसीलिये मन की वृत्तियों को रोकना है अन्यथा न मन देख पायेगा और न मन दिख पायेगा। अन्दर देखने से मन की अन्य गति सीमित हो जाती है, तब बस दृष्टा और मन।

अगले ब्लाग में यम और नियम के व्यावहारिक और यौगिक पक्ष।