Showing posts with label विश्व. Show all posts
Showing posts with label विश्व. Show all posts

9.8.14

नैतिकता के स्थापन

कहाँ रह गये अब वह जीवन,
जिनकी हमको मिली धरोहर ।
छिन्न-भिन्न सारी जग रचना,
मचा हुआ क्यों ताण्डव भू पर ।।

जीवन के सारे दृश्यों से,
रोदन स्वर क्यों फूट रहे हैं ।
क्यों नैतिकता के स्थापन,
जगह जगह से टूट रहे हैं ।।

10.5.14

कहाँ अकेले रहते हैं हम

कहाँ अकेले रहते हैं हम?

अपने से ही सब दिखते हैं,
जितने गतिमय हम, उतने ही,
जितने जड़वत हम, उतने ही,
भले न बोलें शब्द एक भी,
पर सहता मन रिक्त एक ही,
और भरे उत्साह, न थमता,
भीतर भारी शब्द धमकता,
लगता अपने संग चल रहा,
पथ पर प्रेरित दीप जल रहा,
लगता जीवन एक नियत क्रम,
कहाँँ अकेले रहते हैं हम?

औरों से हम क्यों छिपते हैं,
कर लें हृद को रुक्ष,  अनवरत,
नहीं वाह्यवत, अपने में रत,
मन में मन के क्रम उलझाये,
सहजीवन के तत्व छिपाये,
नहीं कहीं कुछ सुनना चाहें,
अपनी सुविधा, नियम बनायें,
एकान्ती भावुक उद्बोधन,
मूक रहे वैश्विक संबोधन,
शुष्क व्यवस्था और हृदय नम,
कहाँ अकेले रहते हैं हम? 

1.6.13

विश्व जियेगा

विश्व जियेगा और गर्भरण जीते बिटिया,
प्रथम युद्ध यह और जीतना होगा उसको,
संततियों का मोह, नहीं यदि गर्भधारिणी,
सह ले सृष्टि बिछोह, कौन ढूढ़ेगा किसको,

विश्व जियेगा और पढ़ेगी अपनी बिटिया,
आधा तम भर, आधा ठहरा, कौन बढ़ा है,
फिर भी शिक्षा रहती बाधित, सीमित, सिमटी,
बर्बरता की पुनर्कल्पना, जग सिकुड़ा है।

विश्व जियेगा और सुरक्षित होगी बिटिया,
आधा तज कर, बोलो अब तक कौन जिया है,
मुखर नहीं यदि हो पाता है फिर भी आग्रह,
विध्वंसों से पूर्व सृष्टि ने मौन पिया है। 

विश्व जियेगा, परिवारों को साधे बिटिया,
अस्त व्यस्त जग का हो पालन, तन्त्र वही है,
प्रेम तन्तु में गुँथे रहेंगे घर में जन जन,
विस्तृत हृद, धारण करती सब, मन्त्र मही है,

विश्व जियेगा, अधिकारों से प्लावित बिटिया,
घर, बाहर उसके हों निर्णय, नेह भरे जो,
लड़ लड़कर हम व्यर्थ कर चुके अपनी ऊर्जा,
जुड़ने का भी एक सुअवसर इस जग को हो,

विश्व जियेगा, करे साम्य स्थापित बिटिया,
समय संधि का, नहीं छिटक कर हट जाने का,
गर्व हमारा, शक्ति हमारी, क्यों खण्डित हो,
समय अभी है, बस मिल जुल कर, डट जाने का,

विश्व जियेगा और जियेगी सबकी आशा,
तत्व प्रकृति दो, संचालित हो, स्थिर, गतिमय,
यह विशिष्टता, द्वन्द्व हमारा, न हो घर्षण,
एक पुष्प, एक वात प्रवाहित, जगत सुरभिमय।

29.6.11

सृजन कठिनतम

आज के परिवेश में जब विश्व सिकुड़ कर सपाट होता जा रहा है, विभिन्न क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों को अपने अनुभव से लाभान्वित करने को उत्सुक हैं, पुष्ट सिद्धान्तों का प्रयोग निर्बाध रूप से सकल विश्व को ढाँक रहा है, नित नयी ज्ञान संरचनायें उभर कर स्थापित हो रही हैं, विचारों का प्रसार सीमाओं का आधिपत्य नकार चुका है, इस स्थिति में सृजन कठिनतम होता जा रहा है।

जब सुधीजनों के ज्ञान का स्तर बहुत अधिक हो तो सृजन भी बड़ा आहार चाहता है। उसके लिये यह बहुत ही आवश्यक है कि कई विषयों का ज्ञान हो सृजनात्मकता के लिये। इतिहास साक्षी है, जितने भी बड़े सृजनकर्ता हुये हैं, किसी भी क्षेत्र में, उनके ज्ञान का विस्तार हर क्षेत्रों में पाया गया है। सृजन की यह विशालता उसे कठिन बना देती है।

जो साधारण जीवन नहीं जीना चाहते हैं, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है। जिन्हें जीवन को समय की तरह बिताना अरुचिकर लगता है, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है। जो बनी बनायी राहों से हटकर कोई नया मार्ग ढूढ़ना चाहते हैं, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है। ऐसा क्या है उस सृजनशीलता में जो हमारे सर चढ़कर बोलने लगता है और हम सुविधाजनक जीवनशैली छोड़कर उन क्षेत्रों में उतरना चाहते हैं जहाँ अभी तक कोई पहुँच नहीं पाया है।

सृजन हार न मानने का नाम है। वर्तमान को स्थायी न मान अपने पुरुषार्थ के सहारे उस वर्तमान को प्रवाह दे देना सृजन है। किसी कार्य की इति ही उस पर होने वाले सृजन का आरम्भ होती हैगतिशीलता का सारथी बन सृजन कभी विश्व को स्थिर नहीं बैठने देता है

अब देखिये न, बहुधा ऐसा होता है कि हम जिन विषयों पर लिखने का विचार करते हैं, उस पर न जाने कितना साहित्य लिखा जा चुका होगा। फिर भी हमको लगता है कि कहीं न कहीं कुछ छूटा हुआ है। हम उस रिक्तता को भरने का प्रयास करते हैं सृजन से। समग्रता और एकाग्रता, ये दो गुणवत्ता के प्रखर मानक हैं। जब हमारी सृजन-दिशा समग्रता को ध्यान में रख कर होती है तब हमारे सृजन-प्रयास उस समग्रता को और भी गूढ़ बना देते हैं। एकाग्र मनन ही सृजन-प्रक्रिया को निखारता है और अन्ततः समग्रता को पोषित करता है।

कभी कभी आश्चर्य होने लगता है कि इन सृजनशील विचारों का स्रोत क्या है? जिस स्तर पर हम जीवन जीते हैं, सृजन उसके कहीं ऊपर के स्तरों पर निर्माणाधीन रहता है। आपको कभी कभी विश्वास ही नहीं होता है कि यह विचार आपके मन से उत्पन्न हुआ है। यह सोच कर बैठें कि आज सृजन करना है तो रात निराशा भरी होती है। बस अपने ज्ञानकोषों को ढीला और खुला छोड़ ध्यान की अवस्था में बैठ जायें, न जाने कौन देवदूत अपना कोष उसमें लुटा जायेगा।

सृजन निश्चय ही आपके परिवेश को या कहें तो सकल विश्व को एक नवीनता प्रदान करता है। परिवर्तन मानव मन को सुहाता है, सृजन उस परिवर्तन का कारक बनता है। सृजन हमारी मानसिक क्षुधा का नेवाला है, यदि सृजन नहीं रहेगा तो सब नीरस हो जायेगा। सृजन हमारी सुख उपासना को और भी रुचिकर बना देता है।

विश्व के कठिनतम मार्ग में प्रशस्त सृजन के समस्त अग्रदूतों को मेरा नमन।

7.5.11

विश्व बंधुत्व

बहुत पहले बीटल के एक सदस्य जॉन लेनन का एक गीत सुना था, शीर्षक था 'इमैजिन'। बहुत ही प्यारा गीत लगता है, सुनने में, समझने में और कल्पना करने में। भाव वसुधैव कुटुम्बकम् के हैं, सीमाओं से रहित विश्व की परिकल्पना है, वर्तमान में ही जी लेने को प्राथमिकता है, लोभ और भूख से मुक्त समाज का अह्वान है, जीवट स्वप्नशीलता है और उसके आगमन के प्रति उत्कट आशावादिता है।

जीवन का सत्य आदर्श की ओर निहार तो सकता है पर उसे स्वयं में बसा लेना सम्भव नहीं हो पाता है। कोई सीमायें न हों, मनुष्य का विघटनप्रिय मन इस उदारता को पचा न पाये सम्भवतः, पर सीमायें सांस्कृतिक शूल बन हृदय को सालती न रहें, इसका प्रयास तो किया ही जा सकता है।

धारा में मिल हम अपना व्यक्तित्व तिरोहित नहीं कर सकते हैं, वह बना रहे और उसकी पहचान भी बनी रहे। सीमाओं का निरूपण इसी तथ्य से ही प्रारम्भ हो जाता है। धीरे धीरे सीमायें सामुदायिक स्वरूप ले लेती हैं, बढ़ती जाती हैं, सबसे परे, होती हैं मनुष्य की ही कृति, पर इतनी बड़ी हो जाती हैं कि उन्हें पार करने में मनुष्य को 'इमैजिन' जैसी भावनात्मक पुकार लगानी होती है।

क्या आपको अच्छा नहीं लगेगा कि आप एक ऐसे विश्व में रहें जहाँ सब एक दूसरे के लिये जीने को कृतसंकल्प हों, जहाँ आँसुओं को निकलते ही काँधे मिल जाते हों, जहाँ कोई भूखा न रहे, जहाँ कोई विवाद न हो, जहाँ कोई रक्त न बहे। चाह कर भी ऐसा संभव नहीं होता है, मानसिक व आर्थिक भिन्नता बनी ही रहती है। कहीं भिन्नतायें मुखर न हो जायें, इसीलिये सीमायें खींच लेते हैं हम। धीरे धीरे सीमाओं से बँधी संवादहीनता विषबेल बन जाती है और विवाद गहराने लगता है। पता नहीं, विवाद कम करने के लिये निर्मित सीमायें विवाद कम करती हैं कि बढ़ा जाती हैं।  

समाज को सम्हालने के लिये बनायी गयी व्यवस्था को सम्हालना समाज को असहनीय हो गया है। आडम्बरों, क्रमों और उपक्रमों में कस कर बाँध दी गयी व्यवस्था असहाय है, संचालक उत्श्रंखल हैं, सर्वजन त्रस्त हैं। हमारी भिन्नता से होने वाले घर्षण से हमें बचाने के लिये निर्मित व्यवस्थायें उससे सौ गुनी अधिक पीड़ा बरसा रही हैं, सर्वजन द्रवित हैं। हम सब अपनी भिन्नता से बहुत ऊपर उठ गये हैं, सब समान हैं, पीड़ा ने सब अन्तरों को समतल कर दिया है, दूर दूर तक कोई भी झुका नहीं दिखायी देता है, कोई भी उठा नहीं दिखायी देता है, सभी निश्चेष्ट हैं, पहले भिन्न थे, अब छिन्न-भिन्न हैं।

हम धरती पर आये, हम स्थापित थे। मनुष्यमात्र भर होने से हमें आनन्द-प्राप्ति का वरदान मिला था। स्वयं को अनेकों उपाधियों में स्थापित करने के श्रम में उलझा हमारा व्यक्तित्व सदा ही उस आनन्द से दूर होता गया जो हमसे निकटस्थ था। प्रथम अवसर से ही मनुष्य बनकर रहना प्रारम्भ करना था हमें, हमने उस मनुष्य से अधिक उसकी उपाधि को ओढ़ना चाहा, हमने विघटन की व्याधि को ओढ़ना चाहा। मनुष्य बन रहना प्रारम्भ कर दें, 'इमैजिन' सच होने लगेगा।

कुछ नहीं तो अपने पड़ोसी से ही कुछ सीखें हम, सीमायें तो हैं पर उसका स्वरूप नहीं है, कोई भी वर्षों तक कहीं भी आकर रह सकता है वहाँ पर, कोई भी वहाँ से आकर धरती के स्वर्ग की सीमा में जा सकता है और वह भी सरकारी प्रयासों से, कोई भी आकर वहाँ पर किसी को मार सकता है और वह भी सगर्व। भारत में भले ही जॉन लेनन के 'इमैजिन' को सीमा में बाँध कर रख दिया जाये पर कई देश इन सीमाओं की परिभाषाओं पर विश्वास नहीं करते हैं।