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9.8.14

नैतिकता के स्थापन

कहाँ रह गये अब वह जीवन,
जिनकी हमको मिली धरोहर ।
छिन्न-भिन्न सारी जग रचना,
मचा हुआ क्यों ताण्डव भू पर ।।

जीवन के सारे दृश्यों से,
रोदन स्वर क्यों फूट रहे हैं ।
क्यों नैतिकता के स्थापन,
जगह जगह से टूट रहे हैं ।।