न दैन्यं न पलायनम्
Showing posts with label
विश्व
.
Show all posts
Showing posts with label
विश्व
.
Show all posts
9.8.14
नैतिकता के स्थापन
›
कहाँ रह गये अब वह जीवन , जिनकी हमको मिली धरोहर । छिन्न-भिन्न सारी जग रचना, मचा हुआ क्यों ताण्डव भू पर ।। जीवन के सारे ...
17 comments:
10.5.14
कहाँ अकेले रहते हैं हम
›
कहाँ अकेले रहते हैं हम? अपने से ही सब दिखते हैं, जितने गतिमय हम, उतने ही, जितने जड़वत हम, उतने ही, भले न बोलें शब्द एक भी, पर ...
30 comments:
1.6.13
विश्व जियेगा
›
विश्व जियेगा और गर्भरण जीते बिटिया, प्रथम युद्ध यह और जीतना होगा उसको, संततियों का मोह, नहीं यदि गर्भधारिणी, सह ले सृष्टि बिछोह, कौन...
38 comments:
29.6.11
सृजन कठिनतम
›
आज के परिवेश में जब विश्व सिकुड़ कर सपाट होता जा रहा है , विभिन्न क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों को अपने अनुभव से लाभान्वित करने को उत्सुक हैं ,...
54 comments:
7.5.11
विश्व बंधुत्व
›
बहुत पहले बीटल के एक सदस्य जॉन लेनन का एक गीत सुना था, शीर्षक था ' इमैजिन ' । बहुत ही प्यारा गीत लगता है, सुनने में, समझने में और...
78 comments:
›
Home
View web version