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23.10.13

हल्की साइकिलें

मुझे साइकिल के आविष्कार ने विशेष प्रभावित किया है। सरल सा यन्त्र, आपके प्रयास का पूरा मोल देता है आपको, आपकी ऊर्जा पूरी तरह से गति में बदलता हुआ, बिना कुछ भी व्यर्थ किये। दक्षता की दृष्टि से देखा जाये तो यह सर्वोत्तम यन्त्र है। घर्षण में थोड़ी बहुत ऊर्जा जाती है, पर वह भी न के बराबर। कुल मिला कर चार स्थान ऐसे होते हैं जहाँ घर्षण हो सकता है, दो पहिये के संपर्क बिन्दु और दो चेन के धुरे। दक्षता प्रतिशत में नापी जाती है, जितना निष्कर्ष निकला, उसे लगे हुये प्रयास से भाग देकर सौ से गुणा कर दीजिये। जब व्यर्थ हुयी ऊर्जा न्यूनतम होती है तो दक्षता अधिकतम होती है। साइकिल के लिये यह लगभग ९८% तक होती है। एक नियत दूरी तय करने में, यातायात के अन्य साधनों में भी लगी ऊर्जा साइकिल की तुलना में कहीं अधिक होती है। यहाँ तक कि पैदल चलने में भी साइकिल से अधिक ऊर्जा लगती है।

पिछले सौ वर्षों में साइकिल की मौलिक डिज़ाइन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। जो भी विकास हुआ है, वह नयी और हल्की धातुओं से उसका ढाँचा बनाने में और गियर बॉक्स परिवर्धित करने में हुआ है। मैं कल ही बंगलौर में देख रहा था, पहाड़ों पर चलाने वाली २४ गियर की साइकिल का भार मात्र १२ किलो था। पहाड़ो पर चलने वाली सबसे हल्की साइकिल ६.४ किलो की है। सामान्य श्रेणी में सबसे हल्साइकिल २.७ किलो की है जो आपका छोटा सा बच्चा भी उठा लेगा।

पर्यटन की दृष्टि से देखा जाये तो इस प्रकार की हल्की साइकिलें साथ में ले जाने में असुविधाजनक है, कारण उनका बड़ा आकार है। यदि ऐसी साइकिलों को ट्रेन के सामान डब्बे में रखने और उतारने की सुविधा रहे तो ही लम्बी यात्राओं में इनका उपयोग किया जा सकता है। यदि ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाती है तो उस स्थिति में ऐसी साइकिल हो जो सहजता से मोड़ कर सीट के नीचे रखा जा सके। इस दृष्टि से बिना उपयोगिता प्रभावित किये हुये, साइकिलों का ढाँचा बदल कर, उनका भार १० किलो तक लाया जा चुका है। घुमक्कड़ों के लिये ऐसी मोड़ कर रखी जा सकने वाली साइकिलें भविष्य में बहुत उपयोगी सिद्ध होने वाली हैं।

हल्की साइकिलें, सहयोगी
इण्टरनेट देखें तो साइकिल के गुणगान से अध्याय भरे पड़े हैं, हर दृष्टि में साइकिल धुँये उगलते राक्षसों से श्रेष्ठ है। यदि आस पास दृष्टि उठाकर देखें तो परिस्थितियाँ सर्वथा पलट हैं, सड़कों पर एक साइकिल नहीं दिखती है। हाँ, कॉलोनी या मुहल्लों में साइकिल दिखती है पर वह विशुद्ध मनोरंजन और खेलकूद के प्रायोजन से। बंगलोर को पिछले ४ वर्षों से देख रहा हूँ, दो समस्यायें नित ही दिखायी पड़ती हैं। एक तो सड़कें वाहनों से भरी पड़ी हैं और उसमें बैठे लोग अति बेडौल होते जा रहे हैं। यह विडम्बना ही कही जायेगी कि यहाँ पर वाहनों की औसत चाल १०-१५ किमी प्रतिघंटे से अधिक नहीं है। यातायात का बोझ यहाँ की सड़कें उठाने में अक्षम हैं और अपना बोझ उठाने में यहाँ के सुविधाभोगी नागरिक। काश ऐसा होता कि १० किमी के तक के कार्य स्थलों के लिये साइकिल अनिवार्य हो जाती, उसके अनुसार सुरक्षित मार्ग बन जाते, तो यहाँ का पर्यावरण, सड़कें और नागरिक सौन्दर्य, व्यवस्था और स्वास्थ्य से लहलहा उठते।

आइये देखते हैं कि किस तरह से साइकिल अन्य माध्यमों से अधिक उन्नत है। यहाँ के यातायात की स्थिति लें तो एक साइकिल की तुलना में कार से जाने में ८० गुना अधिक ऊर्जा लगती है, जबकि इसमें ट्रैफिक सिग्नल में व्यर्थ किया गया तेल जोड़ा नहीं गया है। साइकिल की औसत गति १५ किमी प्रतिघंटा तक होती है, जबकि यातायात वाहनों को १५ किमी प्रतिघंटों से अधिक चलने नहीं देता है। यदि सड़कों पर वाहनों से चलने वाला यातायात साइकिल पर स्थानान्तरित कर दिया जाये तो सड़कें एक दो तिहाई स्थान रिक्त हो जायेगा। ८० गुना अधिक ऊर्जा व्यर्थ करने का दुख तो फिर भी सहा जा सकता है, पर उससे उत्पन्न प्रदूषण का क्या करें जो हमें कहीं अधिक हानि पहुँचा जाता है।

नगर अपने यातायात का चरित्र और स्वरूप जब बदलें, तब बदलें, पर पर्यटन की दृष्टि से हल्की और मोड़ कर रख सकी जाने वाली साइकिलों का महत्व अभी भी है। यह आपको दूरियों नापने में आत्मनिर्भर बनाती है। हो सकता है कि नगर के बाहर के क्षेत्रों में अन्य वाहनों की औसत गति साइकिल से अधिक हो, पर उस साधन की प्रतीक्षा करने में लगा समय यदि बचा लिया जाये तो संभव है कि साइकिल की उपयोगिता नगर के बाहर भी उतनी ही होगी जितनी किसी नगर के अन्दर।

साइकिल की उपयोगिता ऊर्जा, गति, भार, धन और समय की दृष्टि से यातायात के अन्य साधनों की तुलना में कहीं अधिक है। साइकिल के लिये भारी आधारभूत ढाँचे की आवश्यकता नहीं, एक पतली सी पगडंडी में भी साइकिल बिना किसी समस्या के चलायी जा सकती है। भारी वाहनों के लिये बनायी गयी सड़कों में लगे धन का एक चौथाई भी लगाया जाये तो साइकिल के लिये एक अलग गलियारा तैयार किया जा सकता है। यही नहीं भूमि का अधिग्रहण भी उसी अनुपात में कम किया जा सकता है, खेती योग्य भूमि बचायी जा सकती है।

इन सब गुणों के अतिरिक्त साइकिल की बनावट और परिवर्धन में विशेष रुचि भी रही है। आईआईटी में तृतीय वर्ष के ग्रीष्मावकाश में वहीं पर रह गया था। एक प्रोफ़ेसर उस समय साइकिल की नयी बनावटों पर कुछ शोध कर रहे थे। उनके सान्निध्य में रहकर साइकिल की यान्त्रिकी कार्यपद्धति के बारे में बहुत कुछ जाना। यही नहीं, किस तरह से नयी धातुओं या कार्बन फ़ाइबर का उपयोग कर भार कम किया जा सकता है, किस तरह उसके बल संचरण को बनावट में परिवर्तन कर साधा जा सकता है, किस तरह चेन के स्थान पर सीधे ही पहियों में ही पैडल लगाया जा सकता। इसी तरह के भिन्न प्रश्नों ने पहली बार साइकिल जैसी साधारण लगने वाले यन्त्रों में संभावनाओं की खिड़की खोली थी। सच मानिये ग्रीष्म की गर्मी और तीन माह के समय का पता ही नहीं चला था उस रोचकता में।

मोड़े जाने योग्य साइकिलों की बनावट अपने आप में एक पूर्ण विधा है। आप इण्टरनेट पर खोजना प्रारम्भ कीजिये, न जाने कितने प्रकार की तकनीक आपको दिख जायेंगी, सब की सब एक दूसरे से भिन्न और कई पक्षों में श्रेष्ठ। मुझे फिर भी एक बनावट की खोज है जिसमें एक साइकिल को न केवल मोड़ कर रखा जा सके, खोल कर चलाया जा सके, वरन आवश्यकता पड़ने पर व्हील चेयर के आकार में परिवर्तित कर हाथों से भी चलाया जा सके। इसके पीछे कारण बड़ा ही सरल है, कई बार ऐसा होता है कि लगातार एक दो घंटे तक साइकिल चलाते चलाते आपके पैर थक जायें तब आप बिना यात्रा बाधित करे बैठकर हाथों से साइकिल चलायें और पैरों को विश्राम दें। किसी न किसी साइकिल कम्पनी को यह विचार अवश्य ही भायेगा, तब निष्कर्ष निश्चय ही साइकिल के लिये अधिक उपयोगिता लेकर आयेंगे।

हल्की, उन्नत याइक बाइक
सम्पत्ति में हो रहे शोधों ने यदि किसी ने बहुत प्रभावित किया है तो वह है, याइक बाइक। यद्यपि यह परम्परागत पैडल वाली साइकिल नहीं है और इसमें एक छोटी सी मोटर भी लगी है, पर बनावट के दृष्टि से आधुनिक शोधों के लिये एक दिशा है। एक पहिये में मोटर लगी है जो बिजली से चार्ज हो जाती है और एक चार्ज में १४ किमी की दूरी तय कर लेती है। यही नहीं, ब्रेक लगाने से साइकिल की ऊर्जा वापस बैटरी में चली जाती है। १२ किलो की यह साइकिल बड़ी सुगमता से मोड़ी जा सकती है और नियमित कार्यालय जाने वालों के लिये यह एक वरदान सिद्ध हो सकती है। यद्यपि इसे मानवीय रूप ये चार्ज करने का प्रावधान नहीं है और बैटरी समाप्त होने की स्थिति में पैडल मारने की भी व्यवस्था नहीं है। यदि इन बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाये तो यह जनसाधारण और जनपदों के लिये एक वरदान हो सकती है।

साइकिल एक शताब्दी देख चुकी है पर अब भी संघर्षरत है। उसका संघर्ष तेल से है, तेल भरे और धुँआ उगलते राक्षसों से है, उसे निम्न समझने वालों की मानसिकता से है और साथ ही साथ उन सड़कों से भी है जहाँ पर उनको अपनी संरक्षा का भय है। पर्यटन और नगर यातायात में साइकिल के इस संघर्ष को हमें अपनाना होगा और उसे समुचित स्थान दिलाना होगा। यदि ऐसा हम नहीं करते हैं तो संभव है कि कल डॉलर और तेल मिल कर हमारा कॉलर पकड़ें और तेल निकाल दें।

चित्र साभार - singletrackworld.com, Yike Bike

21.9.13

साइकिल, टेण्ट और सूखे मेवे

नीरज की वर्तमान में की गयी साइकिल यात्रा के दो अन्य साथी भी थे, उनका अपना टेण्ट और बैग में पड़े सूखे मेवे। इन दोनों के सहारे उन्होने तो बहुत साहसी यात्रा सम्पादित कर ली, पर कम जीवट लोगों में इनका क्या प्रभाव पड़ता है, यह एक मननीय प्रश्न है।

जब यातायात के साधन अधिक नहीं थे, यात्रायें पैदल होती थीं। यात्रायें सीमित थी, व्यापार आधारित थीं, धर्म आधारित थीं, ज्ञान आधारित थीं। लोग पढ़ने जाते थे, बनारस, तक्षशिला, नालन्दा। चार धाम की तीर्थ यात्रा पर जाते थे। यही नहीं, जितने भी इतिहास पुरुष हुये हैं, सबने ही यात्रायें की, बड़ी बड़ी। राम की पैदल यात्रा ४००० किमी से कम नहीं थी, कृष्ण भी १५०० किमी चले, शंकराचार्य तो ७००० किमी के ऊपर चले। मार्ग, साधन और भोजन आदि की व्यापक व्यवस्था थी, हर समय उपलब्धता थी। जब कभी भी नियत मार्ग से भिन्न गाँवों तक की यात्रा होती थी, अतिथि देवो भव का भाव प्रधान रहता होगा। लोग थोड़ा बहुत भोजन लेकर चलना अवश्य चलते थे पर शेष की अनिश्चितता तो फिर भी नहीं रहती थी।

कितना अच्छा वातावरण था तब पर्यटन या देश भ्रमण के लिये। लोग घूमते भी थे, कहीं भी पहुँचे तो रहने के लिये आश्रय और खाने के लिये भोजन। अतिथि को कभी ऐसा लगता ही नहीं था कि वह कहीं और आ गया है। तब घुमक्कड़ी का महत्व था, लोग मिलते रहते थे, ज्ञान फैलता रहता था। तीर्थ स्थान आधारित पर्यटन था, धर्मशाला, छायादार वृक्ष और आतिथ्य।

अब हमें न वैसा समय मिलेगा और न ही वैसा विश्वास। अब तो साथ में टेण्ट लेकर चलना पड़ेगा, यदि कहीं सोने की व्यवस्था न मिले। अब साथ में साइकिल भी रखनी पड़ेगी, यदि नगर के बाहर कहीं सुरक्षित स्थान पर रहना पड़े। अब साथ में थोड़ा बहुत खाना, सूखे मेवे, बिस्कुट आदि भी लेकर चलना होगा, यदि कहीं कोई आतिथ्य भी न मिले।

रेलवे के माध्यम से मुख्य दूरी तय करने के बाद स्थानीय दूरियाँ साइकिल से निपटायी जा सकती हैं। यदि पर्यटन स्थल के में ही साइकिल किराये पर मिल जाये तो १०० किमी की परिधि में सारे क्षेत्र घूमे जा सकते हैं, ५० किमी प्रतिदिन के औसत से। रेलवे के मानचित्र में रेलवे लाइन के दोनों ओर १०० किमी पट्टी में पर्यटन योग्य अधिकतम भूभाग मिल जायेगा, जो एक रात टेण्ट में और शेष ट्रेन में बिता कर पूरा घूमा जा सकता है।

कहीं भी मंगल हो जायेगा
अपने एक रेलवे के मित्र से बात कर रहा था, विषय था रेलवे की पटरियों के किनारों के क्षेत्रों में बिखरा प्राकृतिक सौन्दर्य। हम दोनों साथ में किसी कार्यवश बंगलोर से ७० किमी उत्तर में गये थे। एक ओर पहाड़ी, दूसरी ओर मैदान, मैदान में झील। अपना कार्य समाप्त करने के बाद हम दोनों अपनी शारीरिक क्षमता परखने के लिये पहाड़ी पर बहुत ऊपर चढ़ते चले गये। ऊपर से जो दृश्य दिखा, जो शीतल हवा का आनन्द मिला, वह अतुलनीय था। बहुत देर तक बस ऐसे ही बैठे रहे और प्रकृति के सौन्दर्य को आँकते और फाँकते रहे। बात चली कि हम कितने दूर तक घूमने जाते हैं, पैसा व्यय करते हैं, अच्छा लगता है, संतुष्टि भी मिलती है, पर रेलवे के पटरियों के किनारे सौन्दर्य के सागर बिखरे पड़े हैं, उन्हें कैसे उलीचा जाये। जिस खंड में भी आप निकल जायें, नगर की सीमायें समाप्त होते ही आनन्द की सीमायें प्रारम्भ हो जाती हैं।

तब क्यों न पटरियों के किनारे किनारे चल कर ही सारे देश को देखा जाये? हमारे मित्र उत्साह में बोल उठे। विचार अभिभूत कर देने वाला था, कोई कठिनता नहीं थी, दिन भर २५-३० किमी की पैदल यात्रा, सुन्दर और मनोहारी स्थानों का दर्शन, स्टेशन पहुँच कर भोजन आदि, पैसेन्जर ट्रेन द्वारा सुविधाजनक स्टेशन पर पहुँच कर रात्रि का विश्राम, अगले दिन पुनः वही क्रम। यदि टेण्ट और साइकिल आदि ले लिया तो और भी सुविधा। रेलवे स्टेशन के मार्ग में सहजता इसलिये भी लगी कि यह एक परिचित तन्त्र है और किसी भी पटरी से ७-८ किमी की परिधि में कोई पहचान का है।

क्या इस तरह ही पर्यटन गाँवों का पूरा संजाल हम नहीं बना सकते हैं, जिनका आधार बना कर सारे देश को इस तरह के पैदल और साइकिल के माध्यमों से जोड़ा जा सकता है। यदि बड़े नगर और उनके साधन हमारी आर्थिक पहुँच के बाहर हों तो उसकी परिधि में बसे गाँवों में पर्यटन गाँवों की संभावनायें खोजी जा सकती हैं। यदि स्थानीय यातायात के साधन मँहगे हों तो साइकिल जैसे सुलभ और स्वास्थ्यवर्धक साधनों से पर्यटन किया जा सकता है। तनिक कल्पना कीजिये कि कितना आनन्द आयेगा, जब पटरियों के किनारे, जंगलों के बीच, झरनों के नीचे, पहाड़ियों के बीच से, सागर के सामने होते हुये सारे देश का अनुभव करेंगे हमारे युवा। पर्यटन तब न केवल मनोरंजन के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करेगा वरन हमारे बौद्धिक और सांस्कृतिक एकता के आधार भी निर्माण करेगा।

पर्यटन के ऊपर मेरी सोच भले ही अभी व्यावहारिक न लगे पर इस प्रकार ही इसे विकसित करने से पर्यटन न केवल सर्वसुलभ हो जायेगा वरन अपने परिवेश में सारे देश को जोड़ लेगा। अभी पर्यटन में लगे व्यय को देखता हूँ तो लगता है कि पर्यटन भी सबकी पहुँच के बाहर होता जा रहा है, एक सुविधा होता जा रहा है। जिनके पास धन है, वे पर्यटन का आनन्द उठा पाते हैं, वे ही प्रारम्भ से अन्त तक सारे साधन व्यवस्थित रूप से साध पाते हैं। आज भले ही सुझाव व्यावहारिक न लगें, पर यदि पर्यटन को जनमानस के व्यवहार में उतारना है तो उसे सबकी पहुँच में लाना होगा।

ट्रेन की यात्रा, एक फोल्डेबल साइकिल, एक टेण्ट और सूखे मेवे। साथ में कुछ मित्र, थोड़ी जीवटता, माटी से जुड़ी मानसिकता, गले तक भरा उत्साह और पूरा देश नाप लेने का समय। बस इतना कुछ तो ही चाहिये हमें। यदि फिर भी स्वयं पर विश्वास न आये तो बार बार नीरज का ब्लॉग पढ़ते रहिये।

चित्र साभार - thereandbackagain-hendrikcyclessouth.blogspot.com

7.11.12

बंगलोर, मेट्रो और साइकिल

अभी कुछ दिन पहले एक समाचार पढ़ा कि बंगलोर मेट्रो अपने प्रमुख स्टेशनों पर साइकिलें रखेगी। इन साइकिलों का उपयोग मेट्रो में यात्रा करने वाले लोग अपने स्थान से मेट्रो स्टेशन आने जाने में कर सकेंगे। इनका रख रखाव व उपयोग पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पर आधारित होगा। यह सेवा सशुल्क होगी और उपयोगकर्ता प्रति घंटे से लेकर वार्षिक मूल्य तक एक बार में चुका सकते है। यह सेवा मेट्रो के लिये लाभदायक होगी, बंगलोर नगर के लिये लाभदायक होगी और यदि सब कुछ ठीक चलता रहता तो यह सेवा बंगलोर की सड़कों से बड़े वाहनों और यातायात के अवरोध को कम कर देगी। इस सेवा को लागू करने के ठेके दिये जा चुके हैं और इससे होने वाली आय में मेट्रो का भी भाग होगा।

पढ़कर बहुत अच्छा लगा। जो कार्य विकसित देशों के बड़े नगरों में हुआ हो और सकुशल चल रहा हो, वह यदि बंगलोर में भी चलने लगे तो प्रसन्नता स्वाभाविक ही है। न केवल चलने लगे, वरन अपने उद्देश्यों को पा भी ले, पर्यावरण की मार्मिक स्थिति को सुधार दे, धुँयें से भरी सड़कों पर शीतल स्वच्छ बयार बहा दे और यातायात अवरोध में घंटों व्यर्थ हुये समय को यथासंभव कम कर दे। मुझे इस प्रयास में जितनी अधिक रुचि है, इसकी सफलता में उतना ही अधिक संशय। मैं इसलिये प्रश्न नहीं खड़े करने जा रहा हूँ कि यह एक दोषपूर्ण अवधारणा है। मैं इसका विश्लेषण इसलिये करना चाहता हूँ क्योंकि समुचित और समग्र योजना के अभाव में इतने क्रान्तिकारी विचार को निष्फल होते नहीं देखना चाहता हूँ।

निश्चय ही दिल्ली मेट्रो ने यह सिद्ध किया है कि न केवल मेट्रो महत्वपूर्ण है वरन उस मेट्रो की फीडर सेवायें भी उतनी ही आवश्यक हैं। यातायात एक समग्र उत्पाद है और इसके कई अंग हैं। नगरीय सेवाओं का स्वरूप देखें तो दैनिक यात्री कुछ पैदल चलते हैं, कुछ फीडर सेवाओं से और शेष नगरीय बसों या मेट्रो से। यदि सेवायें इस दिशा में हों तो दैनिक यात्री को थोड़ा बहुत पैदल चलना अखरता नहीं है। फीडर सेवायें मेट्रो का प्राकृतिक विस्तार है, जनसंख्या या नगर में जितना गहरे तक जायेंगी, मेट्रो उतना ही सफल होगी, लोग अपने वाहन की सुविधा उतना ही तजकर और कुछ सौ मीटर पैदल चल कर मेट्रो का उपयोग करने लगेंगे।

नगर के अन्दर साइकिलों का उपयोग एक भिन्न प्रयोग है। साइकिल बहुत अधिक दूरी के लिये उपयोग में नहीं लाई जा सकती हैं, पर ६-७ किमी की दूरी के लिये सर्वोत्तम साधन है। २० मिनट में दूरी तय हो जाती है, हल्का व्यायाम हो जाता है और थकान भी नहीं होती है। हमारे गाँवों और छोटे नगरों में स्कूटर आदि आने के पहले तक साइकिल ही प्रमुख माध्यम होता था, छोटी दूरियाँ तय करने के लिये। नगरीय परिवेश में हर स्थान पर बस सेवायें नहीं जा सकतीं। नगर के प्रमुख केन्द्र से आसपास के व्यावसायिक और शैक्षणिक स्थानों पर जाने के लिये ऑटो या रिक्शा सबके लिये आर्थिक रूप से साध्य नहीं है। इस अन्तर को भरने का कार्य साइकिल से अच्छा कोई नहीं कर सकता है। पर्यटन स्थलों में जहाँ कई स्थान कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही होते हैं, साइकिल के द्वारा सरलता से पहुँचे जा सकते हैं।

पेरिस, मॉन्ट्रियल, कोपेनहेगन, ब्रिसबेन आदि नगरों में साइकिलों को बढ़ावा दिया गया है, बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य के, विशुद्ध पर्यावरणीय कारणों से, दैनिक यात्रियों और पर्यटकों की सुविधा के लिये। यदि एक यात्री भी अपना वाहन छोड़कर साइकिल की सुविधा अपना लेता है तो, साइकिल का मूल्य तो निकल ही आयेगा, उसके अतिरिक्त भी कितने लाभ होंगे, उसकी गणना विकास की अवरुद्ध राहें खोलने में सक्षम होगी। यदि इन सेवाओं को लागू करना हो तो उसमें उपयोगकर्ताओं से धन उगाहने का आग्रह तो बिल्कुल ही न हो, वरन उपयोगकर्ताओं को प्रोत्साहित करने के प्रयास हों।

जब यह सुविधा सर्वहितकारी है तो ऐसे क्या कारण हैं जो इसे लागू करने में कठिनाई उत्पन्न कर सकते हैं? दो प्रमुख आवश्यकतायें हैं और दोनों का ही निदान नगरीय प्रशासन के हाथों में है।

पहला तो साइकिल अन्य वाहनों के साथ नहीं चल सकती हैं। लहराते और मदमाते वाहनों से भरी सड़कों पर कोई भी इतना साहस नहीं कर पायेगा कि निशंक हो चल सके। वैसे अभी भी कई साहसी युवकों को देखता हूँ जो सर पर हेलमेट बाँधे तेज भागती गाड़ियों के बीच जूझते रहते हैं। पर रोमांच के लिये साइकिल चलाने और दैनिक जीवन में अपनाने में अन्तर है। यदि नगर में इसे लागू करना है तो पतला सा ही सही पर एक आरक्षित मार्ग सुनिश्चित करना होगा और वह भी हर स्थान पर पहुँचने के लिये। समस्या यहीं पर आ जाती है, जिस नगर में सारा यातायात रेंग रेंग कर चलता हो, वहाँ की सड़कें और पतली कर उसमें साइकिल मार्ग निकालने का प्रयास करेंगे तो समस्या सुलझने के पहले ही उलझ जायेगी। इसका समाधान निकालना ही होगा, आंशिक नहीं, वरन पूरा। एक कार के स्थान पर ४-६ साइकिलें आराम से चल सकती हैं, इस दृष्टि से अन्ततः समस्या सुलझनी ही है, पर इसे समुचित रूप से प्रारम्भ करने की कार्ययोजना बड़ी कठिन होगी और साथ ही साथ कई कड़े निर्णयों से भरी पूरी भी।

दूसरी कठिनाई होगी, स्थापित यातायात के साधनों का विरोध। वर्तमान में छोटी दूरी की आवश्यकताओं के फलस्वरूप करोड़ों की अर्थव्यवस्था चल रही है। बंगलोर में ही ७० हज़ार से अधिक ऑटो अधिकांशतः इसी आवश्यकता से पोषित होते हैं, साथ ही साथ टैक्सी सेवायें आदि भी इसी आवश्यकता से अपना व्यवसाय चला रही हैं। इनके विरोध और कार्य-विकल्प का समुचित प्रबन्ध करना पड़ेगा।

ऐसा नहीं है कि नगर का यातायात नहीं चल रहा है। आप एक से दूसरे स्थान पर पहुँच ही जाते हैं। बस समय अधिक लगता है, धन अधिक लगता है, असुविधा अधिक होती है और प्रदूषण अधिक होता है। मेट्रो, बस और साइकिल आदि इस दिशा में ही हैं जिससे सारे व्यर्थ हो रहे संसाधनों की बचत हो सके। तन्त्र में असीमित सुधार की संभावना़यें भी हैं, उपाय भी। प्रशासन में बैठे लोग संवेदनशील हैं और नागरिक जागरूक, समस्याओं को निदान मिलना ही है और निदान को दिशा भी। एक भविष्य का स्पष्ट खाका खींचिये और वहाँ तक पहुँचने के साधन और योजना जुटाइये, इसी में सर्वहित छिपा है।

बंगलोर मेट्रो का यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय है कि उन्होंने दो प्रयोगों को एक में ही समाहित करके एक नया तन्त्र बनाने का यत्न किया है। दोनों प्रयोग भिन्न हैं, दोनों की ही उपयोगिता है नगर के यातायात को सुधारने के लिये, पर इस तरह का बिन विचार किये हुये घालमेल करने से उसकी सफलता संशयपूर्ण लगती है। जिन दो तीन स्थानों पर मेट्रो स्टेशन देखना हुआ है, वहाँ की सड़कों पर साइकिलों को कैसे स्थान मिलेगा, यह एक यक्ष प्रश्न है।