Showing posts with label नीरज जाट. Show all posts
Showing posts with label नीरज जाट. Show all posts

28.8.13

पर्यटन, रेल और नीरज जाट

नीरज जाट का नाम लेते ही, उनके द्वारा लिखे गये न जाने कितने यात्रा वृत्तान्त मन में कौंध जाते हैं। एक छवि जो किसी साइकिल में लेह की ऊँचाइयों में सड़कों की लम्बाई नाप रहा है। एक छवि जो ग्लेशियरों को उस समय देखने में अधिक उत्सुक है, जब वे जम कर कड़क हो चुके हैं। एक छवि जो रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में अपने घर से अधिक समय बिताता है। एक छवि जो छुट्टी मिलते ही घूमने की योजना में जुट जाता है। एक छवि जो जीवट है, जो जीवन्त है, जो जीना जानती है।

मेरे मन में नीरज के प्रति उत्सुकता चार स्तरों पर है। रेलवे, पर्यटन, ब्लॉगिंग और जीवन शैली। यदि इन चारों स्तरों को संक्षिप्त में कहूँ तो वह इस प्रकार होगा। देश के अन्दर पर्यटन के लिये रेलवे से अधिक मितव्ययी और द्रुतगामी साधन नहीं है। किन्तु रेलवे में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाना ही पर्यटन नहीं है। वहाँ पर रहने की व्यवस्था, पर्यटन स्थलों पर पहुँचने के स्थानीय साधन, भोजन आदि की व्यवस्था, दर्शन योग्य बातें, प्राथमिकतायें और एक पूर्ण पर्यटन अनुभव, इन समस्त बातों को मिला कर एक पर्यटक और एक पर्यटन स्थल का निर्माण होता है।

बहुधा ये सारे सूत्र पूर्व निर्धारित नहीं हो पाते हैं, अनिश्चिततायें अधिक रहती हैं, अधिकाधिक सुनिश्चित करने में अधिक धन व्यय होने संभावना रहती है, बहुधा तथ्यों का अभाव रहता है। पर्यटन एक व्यवसाय है, संभव है कि सामने वाला आपसे ही सारा लाभ लेने की मानसिकता में हो। रेलवे में, होटल में स्थान की उपलब्धता, स्थानीय साधनों की जानकारी, अधिक स्थानों को देखने का क्रम, ऐसी न जाने कितनी अनिश्चितताओं से भरा होता है हमारा पर्यटन।

एक पर्यटक के रूप में किस तरह नीरज उन अनिश्चितताओं को जीते हैं और किस तरह एक ब्लॉगर के रूप में उन्हें व्यक्त करते हैं, यह एक रोचक विषय है। साथ ही, अपनी व्यस्त घुमक्कड़ी का अपनी जीवन शैली से कैसे सामञ्जस्य बिठा पाते हैं, यह भी उतना ही रोचक विषय है।

आखिर मिल ही गये
उत्सुकता यद्यपि पिछले २ वर्षों से थी और पिछले वर्ष मिलने का निश्चय भी किया था, सेलम में, पर मेरी व्यस्तता उस भेंट को निगल गयी। इस वर्ष नीरज के कर्नाटक भ्रमण में निकटतम बिन्दु और अवकाश आदि की स्थिति देखने के बाद शिमोगा स्थित जोग फॉल में मिलने का योग बन गया। हम सुबह १० बजे ही सपरिवार जोग फ़ॉल में पहुँच गये, सोचा था बैठ कर बातें करेंगे, भोजन करेंगे। फ़ोन करने पर पता चला कि नीरजजी की एक ट्रेन छूट गयी है अतः दोपहर बाद ही आना होगा। हम लोग अपने कार्यक्रम में बढ़ गये और सायं ५ मिनट के लिये ही शिमोगा में मिल पाये।

हम लोग जब भी किसी यात्रा के लिये निकलते हैं तो उसी समय निकलते हैं जब घर में सबकी छुट्टियाँ चल रही हों। यही कारण रहता है कि जब लोग घूमने जाते हैं तो उस समय हर स्थान पर भीड़ बहुत रहती है, हर किसी साधन और संसाधन के लिये। ऐसे समय में व्यवस्थायें जुटा पाना किसी प्रतियोगी परीक्षा में विजयी होने जैसा होता है। एक एक व्यवस्था के लिये अत्यधिक श्रम करना पड़ता है और बहुधा बहुत धन व्यय हो जाता है। इतने बँधे हुये कार्यक्रम में घूमना कम, स्थानों को छूकर और उपस्थिति लगा आने जैसी स्थिति हो जाती है।

अतिव्यवस्था में पर्यटन का स्वभाव घुटने लगता है, पर्यटन एक उत्पाद सा हो जाता है और स्थान देख आना उस उत्पाद का मूल्य। इसमें पर्यटन का आनन्द कहीं खिसक लेता है। यही नहीं हम जो सोच कर जाते हैं़ पर्यटन स्थल उससे कहीं भिन्न मिलता है। तब हम धन द्वारा साधे अपने सधे कार्यक्रम में बँधे अधिक हिल डुल नहीं पाते है और औसत से नीचे का अनुभव लेकर चले आते हैं। मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह कहता है कि जब भी पर्यटन को बाँधने का प्रयास किया है, स्वतन्त्र हो पर्यटन का आनन्द नहीं उठा पाये।

नीरज की पर्यटन तकनीक इन सब बन्धनों को तोड़ती सी दिखती है। उनकी घुमक्कड़ी में एक सहजता है, एक जीवटता है, एक खुलापन है, एक आनन्द है। अभी कुछ दिन पहले ही वह एक लाख किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुके हैं। वर्तमान की कुछ यात्रा योजनाओं को देख रहा था, साधारण श्रेणी में यात्रा की बहुलता थी। उसके अतिरिक्त स्लीपर क्लास की यात्रायें भी थीं। मैं गणना कर रहा था कि यदि एक लाख किलोमीटर तीन चौथाई साधारण श्रेणी व एक चौथाई स्लीपर क्लास में की जाये तो लगभग १२ हज़ार रुपये लगेंगे। एसी ३ में वही व्यय ६० हजार रुपये हो जायेगा। यदि यही दूरी अपने वाहन से तय की जाये तो ५ लाख रुपये लगेंगे। इस प्रकार देखा जाये तो यदि रेलवे में प्रमुखता से चला जाये, साधारण श्रेणी में देश देखने का उत्साह हो, तनिक सहनशीलता और तनिक जीवटता विकसित कर ली जाये और नीरज की विधि अपनायी जाये तो पर्यटन में होने वाला व्यय न्यूनतम हो सकता है।

नीरज से यह पूछने पर कि दिन में तो साधारण श्रेणी में काम चल जाता है पर रात्रि में यदि साधारण श्रेणी में चले और नींद नहीं हो पायी तो पर्यटन का आनन्द धुल जायेगा? नीरज ने बताया कि दिन के समय ही साधारण श्रेणी में चलते हैं। रात्रि के समय यदि आरक्षित स्थान मिल जाये तो नींद पूरी कर लेते हैं, नहीं तो किसी रिटायरिंग रूम में रुक कर नींद पूरी कर लेते हैं। नींद पूरी करना सर्वाधिक महत्व का कार्य है, अच्छे मन के लिये, ऊर्जा पूर्ण तन के लिये। यही नहीं, यदि एक रात्रि यात्रा में बीते तो एक दिन का होटल का खर्च भी बच जाता है। एक लाख किलोमीटर की यात्रा में लगभग ७० यात्रायें रात्रि में की होंगी, लगभग ३५ हज़ार रुपये होटल का व्यय बचाया होगा। यद्यपि नीरज अपने खर्चे की एक एक पाई का हिसाब रखते हैं, पर मेरे अनुमान यथार्थ के निकट ही होंगे।

विशुद्ध आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो रेल़वे के माध्यम से पर्यटन को कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। जितनी बार भी नीरज का ब्लॉग पढ़ता हूँ, उनके अनुभव जानता हूँ, उतनी बार मेरा यह विश्वास और भी दृढ़ होता जाता है। पर्यटन के और भी कई पक्ष हैं और उनके बारे में मेरी कई अवधारणायें भी हैं। रेलवे, पर्यटन और स्वयं के अनुभवों के आधार पर नीरज की घुमक्कड़ी तकनीक पर विमर्श चलता रहेगा, अगली पोस्ट में भी।